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कल्याण मंदिर स्तोत्र

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विषय सूची

अभीप्सितकार्य सिद्धिदायक

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कल्याणमन्दिरमुदारमवद्य - भेदि -

भीताभय - प्रदमनिन्दितमङ्घ्रिपद्मम्।
संसारसागर - निमज्जदशेष-जन्तु-

पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य।।१।।
—कुसुमलता छंद—
पारस प्रभु कल्याण के मंदिर, निज-पर पाप विनाशक हैं।

अति उदार हैं भयाकुलित, मानव के लिए अभयप्रद हैं।।
भवसमुद्र में पतितजनों के, लिए एक अवलम्बन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।१।।

अन्वयार्थ - (कल्याणमंदिरम्) कल्याणकों के मंदिर, (उदारम्) उदार, (अवद्यभेदि) पापों को नष्ट करने वाले, (भीताभयप्रदम्) संसार से डरे हुए जीवों को अभयपद देने वाले, (अनिन्दितम्) प्रशंसनीय और (संसार सागर निमज्जत् अशेष-जन्तु-पोतायमानम्) संसाररूपी समुद्र में डूबते हुए समस्त जीवों के लिए जहाज के समान (जिनेश्वरस्य) जिनेन्द्रभगवान के (अंघ्रिपद्मम्) चरण कमल को (अभिनम्य) नमस्कार करके।

ॐ ह्रीं भवसमुद्रतरणे पोतायमानकल्याणमंदिरस्वरूपाय श्रीपार्श्वनाथ-जिनेन्द्राय नम:।
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यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशे:,

स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम्।
तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतो-

स्तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये।।२।।
सागर सम गंभीर गुणों से, अनुपम हैं जो तीर्थंकर।

सुरगुरु भी जिनकी महिमा को, कह न सके वे क्षेमंकर।।
महाप्रतापी कमठासुर का, मान किया प्रभु खण्डन है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।२।।

अन्वयार्थ - (गरिमाम्बुराशे:) गौरव के समुद्र (यस्य) जिन पार्श्वनाथ की (स्तोत्रम्) स्तुति, (विधातुम्) करने के लिए (स्वयं सुरगुरु:) खुद बृहस्पति भी (सुविस्तृतमति) विस्तृत बुद्धि वाले (विभु-) समर्थ (न ‘अस्ति’) नहीं हैं, (कमठस्मयधूमकेतो:) कमठ का मान भस्म करने के लिए अग्निस्वरूप (तस्य) उन (तीर्थेश्वरस्य) पार्श्वनाथ भगवान की (किल) आश्चर्य है कि (एष: अहम्) यह मैं (संस्तवनम्) स्तुति (करिष्ये) करूँगा।

अर्थ - हे विश्वगुणभूषण! कल्याणकों के मंदिर, अत्यन्त उदार, अपने और औरों के पापों के नाशक, संसार के दु:खों से डरने वालों के अभयप्रद, अतिश्रेष्ठ, संसार-सागर में डूबते हुए प्राणियों के उद्धारक, श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र के चरण-कमलों को नमस्कार करके गंभीरता के समुद्र, जिनकी स्तुति करने के लिए विशालबुद्धि वाला देवताओं का गुरु स्वयं बृहस्पति भी समर्थ नहीं है तथा जो प्रतापी कमठ के अभिमान को भस्मीभूत करने के लिए धूमकेतु अर्थात् सपुच्छग्रह (पुच्छलतारा) रूप हैं, उन तेईसवें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ भगवान का मुझ जैसा अल्पज्ञ स्तवन करता है, यह आश्चर्य है!।।१-२।।

ॐ ह्रीं कमठस्य धूमकेतूपमाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

The poet declares his intention of praising Lord Parshvanatha Having bowed to the lotus feet of that Jineshvara (Tirthankar Lord Parshvanatha), who is the ocean of greatness. whom (even) the preceptor of Gops (Brihaspati) himself in spite of his supremely wide knowledge is unable to praise and who is a comet (or fire) in destroying the arrogance of Kamatha-the feet which are, the temple of bliss' which are sublime, which can destroy sins and give safety to the terrified, which are faultless and (i.e. serva the purpose of) a life-boat for all beings sinking in the ocean of existence. I will indeed compose a hymn (in honour) of Him

जलभय-निवारक

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सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-

मस्मादृश: कथमधीश! भवन्त्यधीशा:।।
धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो,

रूपं प्ररूपयति किन किल घर्मरश्मे:?।।३।।
दिवाअन्ध ज्यों कौशिक शिशु नहिं, सूर्य का वर्णन कर सकता।

वैसे ही मुझ सम अज्ञानी, कैसे प्रभु गुण कह सकता।।
सूर्य बिम्ब सम जगमग-जगमग, जिनवर का मुखमंडल है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।३।।

अन्वयार्थ - (अधीश!) हे स्वामिन्! (सामान्यत: अपि) सामान्य रीति से भी (तव) तुम्हारे (स्वरूपम्) स्वरूप को (वर्णयितुं) वर्णन करने के लिए (अस्मादृशा:) मुझ जैसे मनुष्य (कथम्) कैसे (अधीशा:) समर्थ (भवन्ति) हो सकते हैं? अर्थात् नहीं हो सकते। (यदि वा) अथवा (दिवान्ध:) दिन में अंधा रहने वाला (कौशिक शिशु:) उलूक का बच्चा (धृष्ट: अपि) ढीठ होता हुआ भी (किम्) क्या (घर्मरश्मे:) सूर्य के (रूपम्) रूप का (प्ररूपयति किल) वर्णन कर सकता है क्या?

अर्थ - हे सप्तभयविनाशक देव! आपके गुणों का सामान्यरूप से भी वर्णन करने के लिए हम सरीखे मन्दबुद्धि वाले पुरुष कैसे समर्थ हो सकते हैं? अर्थात् नहीं हो सकते। जैसे जिसे दिन में स्वयं नहीं सूझता ऐसा उलूक (उल्लू) पक्षी का बच्चा ढीठ होकर भी क्या सूर्य के जगमगाते बिम्ब का वर्णन कर सकता है? अर्थात् कदापि नहीं कर सकता।। ।।

ॐ ह्रीं त्रैलोक्याधीशाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

He points out his incompetency to under take such a work.

Oh Lord ! how can persons like us succeed in giving even a general outline of Thy nature? Is indeed a young-one of an owl blind by day capable of describing the orb of the hot-rayed one (sun). however presumptuous it may be?

असमयनिधन-निवारक

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मोह-क्षयादनुभवन्नपि नाथ! मत्र्यो,

नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत।
कल्पान्त-वान्त-पयस: प्रकटोऽपि यस्मा-

न्मीयेत केन जलधे-र्ननु रत्नराशि:?।।४।।


प्रलय अनंतर स्वच्छ सिन्धु में, भी ज्यों रत्न न गिन सकते।

वैसे ही तव क्षीणमोह के, गुण अनंत नहिं गिन सकते।।
उनके क्षायिक गुण कहने में, पुद्गल शब्द न सक्षम हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।४।।

अन्वयार्थ - (नाथ!) हे पाश्र्वनाथ! (मत्र्य:) मनुष्य (मोहक्षयात्) मोहनीय कर्म के क्षय से (अनुभवन् अपि) अनुभव करता हुआ भी (तव) आपके (गुणान्) गुणों को (गणयितुम्) गिनने के लिए (नूनम्) निश्चय करके (न क्षमेत) समर्थ नहीं हो सकता है। (यस्मात्) क्योंकि (कल्पान्तवान्तपयस:) प्रलय काल के समय जिसका जल बाहर हो गया है, ऐसे (जलधे:) समुद्र की (प्रकट: अपि) प्रकट हुई भी (रत्नराशि:) रत्नों की राशि (ननु केन मीयेत) किसके द्वारा गिनी जा सकती है?

अर्थ - हे अनन्तगुणनिधान! जैसे प्रलयकाल के समय सब पानी निकल जाने पर भी साफ दिखने वाले समुद्र के रत्नों की गणना नहीं हो सकती है, वैसे ही मोहाभाव से प्रतिभासमान आपके गुणों की गिनती भी किसी भी मनुष्य द्वारा नहीं हो सकती, क्योंकि आपके गुण अनन्तानन्त हैं।।४।।

ॐ ह्रीं सर्वपीड़ानिवारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
He suggests that even the omniscient cannot enumerate Thy virtues

Oh Lord ! a mortal is surely incapable of counting Thy merits, in spite of his realizing them, owing to the annihilation of his infatution,(for) who can measure the heap of jewels, though obvious, in the ocean emptied of waters at the time of the destruction of the universe ?

प्रच्छन्नधनप्रदर्शक

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अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ! जडाशयोऽपि,

कर्तुं स्तवं लसदसंख्य-गुणाकरस्य।
बालोऽपि किं न निजबाहु-युगं वितत्य,

विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशे:।।५।।
शिशु निज कर फैलाकर जैसे, बतलाता सागर का माप।

वैसे ही हम शक्तिहीन नर, कर लेते हैं व्यर्थ प्रलाप।।
सच तो प्रभु गुणरत्नखान अरु, अतिशायी सुन्दर तन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।५।।


अन्वयार्थ - (नाथ!) हे स्वामिन्! (जडाशय: अपि अहम्) मैं मूर्ख भी (लसदसंख्यगुणाकरस्य) शोभायमान असंख्यात गुणों की खानि स्वरूप (तव) आपके (स्तवम् कर्तुम्) स्तवन करने के लिए (अभ्युद्यत: अस्मि) तैयार हुआ हूँ। क्योंकि (बाल:अपि) बालक भी (स्वधिया) अपनी बुद्धि के अनुसार (निजबाहुयुगम्) अपने दोनों हाथों को (वितत्य) फैलाकर (किम्) क्या (अम्बुराशे:) समुद्र के (विस्तीर्णताम्) विस्तार को (न कथयति) नहीं कहता ?

अर्थ - हे गुणगणाधिप! जैसे शक्तिहीन अबोध बालक सहज स्वभाव से अपनी पतली छोटी-छोटी दोनों भुजाओं को पसारकर विशाल समुद्र के विस्तार (फैलाव) को बतलाने का असफल प्रयास करता है, ठीक वैसे ही हे भगवन्! मैं महामूर्ख तथा जड़बुद्धि वाला होकर भी अपूर्व अपरिमित गुणों से सुशोभित आपके सच्चिदानन्द स्वरूप की अमर्यादित महिमा का वर्णन करने के लिए उद्यत हो गया हूँ।।५।।

ॐ ह्रीं सुखविधायकाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Oh Lord! I, though dull-witted, have started to sing a song of Thine, the mine of innumerable resplendent virtures. (For) does not even a child describe according to its own intellect the vastness of the ocean by stretching its arms?

सन्तानसम्पत्ति प्रसाधक

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ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश!

वत्तुंक़ कथं भवति तेषु ममावकाश:।
जाता तदेव-मसमीक्षित-कारितेयं,

जल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि।।६।।
बड़े-बड़े योगी भी जिनके, गुणवर्णन में नहिं सक्षम।

तब अबोध बालक सम मैं, कैसे कर सकता भला कथन।।
फिर भी पक्षीसम वाणी से, करूँ पुण्य का अर्जन मैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।६।।

अन्वयार्थ - (ईश!) हे स्वामिन्! (तव) आपके (ये गुणा:) जो गुण (योगिनाम् अपि) योगियों को भी (वत्तुम्) कहने के लिए (न यान्ति) नहीं प्राप्त होते (तेषु) उनमें (मम) मेरा (अवकाश:) अवकाश (कथम् भवति) कैसे हो सकता है? (तत्) इसलिए (एवम्) इस प्रकार (इयम्) मेरा यह (असमीक्षितकारिता जाता) बिना विचारे काम करता हुआ (वा) अथवा (पक्षिण: अपि) पक्षी भी (निजगिरा) अपनी वाणी से (जल्पन्तिननु) बोला करते हैं।

अर्थ - हे गुणगणालंकृतदेव! आपके जिन अपरिमित गुणों का वर्णन करने में बड़े-बड़े योगी और धुरन्धर विद्वान् तक अपने आपको असमर्थ मानते हैं; उन गुणों का वर्णन मुझ जैसा अल्पज्ञ मानव कैसे कर सकता है? अत: स्तवन प्रारंभ करने के पूर्व अपनी शक्ति को न तौलकर मैंने आपकी जो स्तुति प्रारंभ की है, वास्तव में मेरा यह प्रयत्न बिना विचारे ही हुआ, फिर भी मानवजाति की वाणी बोलने में असमर्थ पशु पक्षी अपनी ही बोली में बोला करते हैं, वैसे ही मैं भी अपनी बोली में आपकी प्रभावशालिनी, पुण्यदायिनी स्तुति करने के लिए प्रवृत्त होता हू।।६।।

ॐ ह्रीं अव्यक्तगुणाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Oh Lord! whence can it be within my scop to describe Thy merits, when even the masterly saints fail to do so? Therefore, this attempt of mine is a thoughtless act; or why, even birds do speak in their own tongue

अभीप्सितजनाकर्षक

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आस्तामचिन्त्य-महिमा जिन! संस्तवस्ते,

नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति।
तीव्राऽऽतपोपहत-पान्थ-जनान्निदाघे,

प्रीणाति पद्म-सरस: स-रसोऽनिलोऽपि।।७।।
जलाशयों की जलकणयुत, वायू भी जैसे सुखकारी।

ग्रीष्मवायु से थके पथिक के, लिए वही है श्रमहारी।।
वैसे ही प्रभुनाम मंत्र भी, मात्र हमारा संबल है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।७।।

अन्वयार्थ - (जिन!) हे जिनेन्द्र! (अचिन्त्य महिमा) अचिंत्य है महात्म्य जिसका ऐसा (ते) आपका (संस्तत:) स्तव (आस्ताम्) दूर रहे, (भवत:) आपका (नाम अपि) नाम भी (जगन्ति) जीवों को (भवत:) संसार से (पाति) बचा लेता है क्योंकि (निदाघे) ग्रीष्मकाल में (तीव्रातपोपहतपान्थजनान्) तीव्र धूप से सताये हुए पथिक जनों को (पद्मसरस:) कमलों के सरोवर का (सरस:) सरस-शीतल (अनिल:अपि) पवन भी (प्रीणाति) सन्तुष्ट करता है।

अर्थ - हे सातिशयनामन्! जैसे गीष्मकाल में असह्य प्रचण्ड धूप से व्याकुल राहगीरों को केवल कमलों से युक्त सरोवर ही सुखदायक नहीं होते; अपितु उन जलाशयों की जल-कण-मिश्रित ठंडी-ठंडी झकोरें भी सुखकर प्रतीत होती हैं। वैसे ही प्रभो! आपका स्तवन ही प्रभावशाली नहीं है, वरन् आपके पवित्र ‘नाम’ का स्मरण भी जगत के जीवों को संसार के दारुण दु:खों से बचा लेता है। वास्तव में प्रभु के गुणगान और उनके नाम की महिमा अचिन्त्य है।।७।।

ॐ ह्रीं भवाटवीनिवारकाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
God's name brings to an end the cycle of births and deaths-

Oh Jina! Let Thy hymn whose sublimity is inconceivable he out of considaration; (For) even Thy name saves the (living beings of ihe) three worlds from (this) worldly existence. Even the cool breeze of a lotus-lake gives delight in summer to the travellers tormented by the immense heat (of the sun).

कुपितोपदंशविनाशक

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हृद्वर्तिनि त्वयि विभो! शिथिलीभवन्ति,

जन्तो: क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धा।
सद्यो भुजङ्गम-मया इव मध्य-भाग-

मभ्यागते वन-शिखण्डिनि चन्दनस्य।।८।।
जो नर मनमंदिर में अपने, प्रभु का वास कराते हैं।

उनके कर्मों के दृढ़तर, बंधन ढीले पड़ जाते हैं।।
चंदन तरु लिपटे भुजंग के, लिए मयूर वचन सम हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।८।।

अन्वयार्थ - (विभो!) हे पार्श्वनाथ! (त्वयि) आपके (हृद्वर्तिनि) हृदय में रहते हुए (जन्तो:) जीवों के (निविडा: अपि) सघन भी (कर्म-बंधा:) कर्मों के बंधन (क्षणेन) क्षण भर में (वन शिखण्डिनि) वन मयूर के (चन्दनस्य मध्यभागम् अभ्यागते ‘सत’) चन्दन तरु के बीच में आने पर (भुजंगममया इव) सर्पों की कुण्डलियों के समान (सद्य:) शीघ्र ही (शिथिली भवन्ति) ढीले हो जाते हैं।

अर्थ - हे कर्मबन्धनविमुक्त! जिनेश! जैसे जंगली मयूरो के आते ही मलयागिरि के सुगन्धित चन्दन के सघन वृक्षों में कोेंडराकार लिपटे हुए भयंकर भुजङ्गों की दृढ़ कुण्डलियाँ तत्काल ढीली पड़ जाती हैं; वैसे ही संसारी जीवों के मन-मंदिरों के उच्च सिंहासनों पर आपके विराजमान होने पर-आपका ‘नाम-मंत्र’ स्मरण करने पर उनके ज्ञानावरणादि अष्टकर्मों के कठोरतम बन्धन क्षणमात्र में अनायास ही ढीले पड़ जाते हैं।।८।।

ॐ ह्रीं कर्माहिबन्धमोचनाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
He mentions the result of contemplating God.

Oh Lord! when Thou art enshrined in the heart by a living being, his firm fetters of Karmans, however tight they may become certainly loose within a moment like the serpent-bands of a sandal tree, immediately when a wild peacock arrives at its centre.

सर्पवृश्चिकविषविनाशक

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मुच्यन्त एव मनुजा: सहसा जिनेन्द्र!

रौद्रै-रुपद्रव-शतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि।
गो-स्वामिनि स्पुरित-तेजसि दृष्टमात्रे,

चौरैरिवाशु पशव: प्रपलायमानै:।।९।।


ग्वाले के दिखते ही जैसे, चोर पशूधन तज जाते।

वैसे ही तव मुद्रा लखकर, पाप शीघ्र ही भग जाते।।
कैसा हो संकट समक्ष प्रभु, ही हरने में सक्षम हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।९।।

अन्वयार्थ - (जिनेन्द्र!) हे जिनेन्द्रदेव! (स्पुरिततेजसि) पराक्रमी (गोस्वामिनि) गोपालक (दृष्टमात्रे) दिखते ही (आशु) शीघ्र ही (प्रपलायमानै:) भागते हुए (चौरै:) चोरों के द्वारा (पशव:इव) पशुओं की तरह (त्वयि वीक्षते अपि) आपके दर्शन करते ही (मनुजा:) मनुष्य (रौद्रै:) भयंकर (उपद्रवशतै:) सैकड़ों उपद्रवों के द्वारा (सहसा एव) शीघ्र ही (मुच्यन्ते) छोड़ दिए जाते हैं।

अर्थ - हे संकटमोचन! जिस तरह प्रचण्ड सूर्य, पराक्रमी भूपाल तथा बलिष्ठ गो-पालकों (ग्वालो) के दिखते ही भय से शीघ्र भागते हुए चोरों के पंजे से पशु-धन छूट जाता है, उसी तरह हे कृपालुदेव! आपकी वीतराग मुद्रा को देखते ही मानव महा-भयंकर सैकड़ों संकटों से तत्काल छुटकारा पाते हैं।।९।।

ॐ ह्रीं सर्वोपद्रवहरणाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
He Points out advantage of seeing God.

Oh Lord of the Jinas! No sooner art Thou merely seen by persons, than they are indeed spontaneously released from hundreds of horrible adversities, like the beasts from the thieves that are fleeing away at the mere sight of (1) the sun resplendent with lustre, (2) the king or (3) the cowherd shining with vaiour.

तस्कर भय विनाशक

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त्वं तारको जिन! कथं भविनां त एव,

त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्त:।
यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून-

मन्तर्गतस्य मरुत: स किलानुभाव:।।१०।।
भवपयोधितारक हे जिनवर! तुम्हें हृदय में धारण कर।

तिर सकते हैं जैसे पवन, सहित तिरती है चर्ममसक।।
इसीलिए भवसागर तिरने, में कारण प्रभु चिन्तन है।

ऐेसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।१०।।

अन्वयार्थ - (जिन!) हे जिनेन्द्रदेव! (त्वम् भविनाम् तारक: कथम्) आप संसारी जीवों के तारने वाले कैसे हो सकते हैं? (यत्) क्योंकि (उत्तरन्त:) संसार-समुद्र से पार होते हुए (ते एव) वे ही (हृदयेन) हृदय से (त्वम्) आपको (उद्वहन्ति) तिरा ले जाते हैं (यद्वा) अथवा ठीक है कि (दृति:) मसक (यत्) जो (जलम् तरति) पानी में तैरती है, (स: एष:) वह (नूनम्) निश्चय से (अन्तर्गतस्य) भीतरस्थित (मरुत:) हवा का ही (अनुभाव: किल) प्रभाव है।

अर्थ - हे भवपयोधितारक! जिस तरह अपने भीतर भरी हुई पवन के प्रभाव से चर्म-मसक पानी के ऊपर तैरती हुई किनारे लग जाती है, उसी तरह मन-वचन-काय से आपको अपने मन-मंदिर में विराजमान कर आपका ही रात-दिन चिन्तवन करने वाले भव्यजन संसार-सागर से बेखटके (बिना बाधा के) पार लग जाते हैं।।१०।।

ॐ ह्रीं भवोदधितारकाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
He suggests the advantage of consiant contemplation about God.

Oh Jina! How art Thou the saviour of mundane beings when (on the contrary) they themselves carry Thee in their hearts while crosing (the ocean of existence)? Or indeed, that a leatner bag (for holding water) floats in water, is certainly the effect of the air inside it.

जलाग्निभयविनाशक

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यस्मिन्हर-प्रभृतयोऽपि हत-प्रभावा:,

सोऽपि त्वया रति-पति: क्षपित: क्षणेन।
विध्यापिता हुतभुज: पयसाथ येन,

पीतं न विं तदपि दुर्धर-वाडवेन?।।११।।
हे अनङ्गविजयिन्! हरिहर, आदिक भी जिससे हार गये।

कामदेव के वे प्रहार भी, तुम सम्मुख आ हार गये।।
दावानल शांती में जल सम, प्रभु इन्द्रियजित् सक्षम हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।११।।

अन्वयार्थ - (यस्मिन्) जिसके विषय में (हरप्रभृतय: अपि) महादेव आदि भी (हतप्रभावा:) प्रभाव रहित हैं (स:) वह (रतिपति:) कामदेव भी (त्वया) आपके द्वारा (क्षणेन) क्षणमात्र में (क्षपित:) नष्टकर दिया गया (अथ) अथवा ठीक है कि (येन पयसा) जिस जल ने (हुतभुज: विध्यापिता:) अग्नि को बुझाया है (तत् अपि) वह जल भी (दुद्र्धरवाडवेन) प्रचण्ड दावानल के द्वारा (किम्) क्या (न पीतम्) नहीं पिया गया?

अर्थ - हे अनङ्गविजयिन्। जिस काम ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि प्रख्यात पुरुषों को पराजित कर जनसाधारण की दृष्टि में प्रभावहीन बना दिया है। हे जितेन्द्रिय जिनेन्द्र! उसी काम (विषय वासनाओं) को आपने क्षण भर में नष्ट कर दिया, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि जो प्रचण्ड अग्नि को बुझाने की सामथ्र्य रखता है, वह जल जब समुद्र में पहुँचकर एकत्र हो जाता है तब क्या वह अपने ही उदर में उत्पन्न हुए बडवानल (सामुद्रिक अग्नि) द्वारा नहीं सोख लिया जाता? अर्थात् नहीं जला दिया जाता?।।११।।

ॐ ह्रीं हुतभुग्भयनिवारकाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

He establishes the pre-eminence of Lord Parshva in virtue of His dispassion.Even that Cupid (the husband of Rati) who baffled even Harr (Siva) and others was destroyed within a moment by Thee. (For), is not even that water which extinguishes (earthly) conflagrations swallowed up by the irresistible submarine fire?

अग्निभय विनाशक

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स्वामिन्ननल्प-गरिमाणमपि प्रपन्ना-

स्त्वां जन्तव: कथमहो हृदये दधाना:।।
जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन,

चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभाव:।।१२।।
हे त्रैलोक्यतिलक! जिसकी, तुलना न किसी से हो सकती।

उन अनंत गुणभार को मन में, धर जनता कैसे तिरती।।
किन्तु यही आश्चर्य हुआ, तिरते जिनवर भाक्तिकजन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।१२।।

अन्वयार्थ - (स्वामिन्!) हे प्रभो! (अहो) आश्चर्य है कि (अनल्पगरिमाणम् अपि) अधिक गौरव से युक्त भी विरोध पक्ष में अत्यन्त वजनदार (त्वाम्) आपको (प्रपन्ना:) प्राप्त हो (हृदये दधाना:) हृदय में धारण करने वाले (जन्तव:) प्राणी (जन्मोदधिम्) संसार समुद्र को (अति लाघवेन) बहुत ही लघुता से (कथम्) कैसे (लघु) शीघ्र (तरन्ति) तर जाते हैं। (यदि वा) अथवा (हन्त) हर्ष है कि (महताम्) महापुरुषों का (प्रभाव:) प्रभाव (चिन्त्य:) चिन्तवन के योग्य (न भवति) नहीं होता है।

अर्थ - हे त्रैलोक्यतिलक! जिसकी तुलना किसी दूसरे से नहीं की जा सकती, अथवा विश्व में जिसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता, ऐसे अतिगौरव को प्राप्त (अनन्त गुणों के बोझीले भार से युक्त) आपको हृदय में धारण कर यह जीव संसार-सागर से अतिशीघ्र कैसे तर जाता है? अथवा आश्चर्य की बात है; कि महापुरुषों की महिमा चिन्तवन में नहीं आ सकती।।१२।।

ॐ ह्रीं हृदयधार्यमाणभव्यगणतारकाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:। '
Power of the great is unimaginable.'

Oh Master! How do the beings who resort to Thee soon cross the ocean of births (and deaths) with the greatest ease, when they carry in their heart, Thee, that excessively heavy (dignified)? Or why, prowess of the great is incomprehensible.

जलमिष्टताकारक

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क्रोधस्त्वया यदि विभो! प्रथमं निरस्तो,

ध्वस्तास्तदा १वद कथं किल कर्म-चौरा:?
प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके,

नील-द्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी?।।१३।।
प्रभो! क्रोध को प्रथम जीतकर, कर्मचोर कैसे जीता?

प्रश्न उठा मन में बस केवल, इसीलिए तुमसे पूछा।।
उत्तर आया हिम तुषार ज्यों, जला सके वन-उपवन है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।१३।।

अन्वयार्थ - (विभो!) हे पार्श्वनाथ! (यदि) यदि (त्वया) आपके द्वारा (क्रोध:) क्रोध (प्रथमम्) पहले ही (निरस्त:) नष्ट कर दिया गया था, (तदा) तो फिर (वद) बोलिए कि (कर्मचौरा:) कर्मरूपी चोर (कथम्) कैसे (ध्वस्ता: किल) नष्ट किये? (यदि वा) अथवा (अमुत्त लोके) इस लोक में (हिमानी अपि) बर्प होने पर भी (किम्) क्या (नील द्रुमाणि) हरे-हरे वृक्ष जिनमें ऐसे (विपिनानि) वनों को (न प्लोषति) नहीं जला देता है! अर्थात् जला देता है, मुरझा देता है।

अर्थ - हे कोपदमन! यदि आपने अपने क्रोध को पहिले ही नष्ट कर दिया तो फिर आप ही बतलाइये कि आपने क्रोध के बिना कर्मरूपी चोरों का कैसे नाश किया? अथवा इस लोक में बर्प (तुषार) एकदम ठंडा होने पर भी क्या हरे-हरे वृक्षों वाले वन-उपवनों को नहीं जला देता है? अर्थात् जला ही देता है।।१३।।

ॐ ह्रीं कर्मचौरविध्वंसकाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

How couldst Thou indeed (manage to) destroy Karman-thieves, when Thou, oh Omnipresent one! hadst at the very outset annihilated anger? Or why, does not the mass of snow though cold burn forests having dark-blue (or fig) trees?

शत्रुस्नेह जनक

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त्वां योगिनो जिन! सदा परमात्मरूप,

मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुज-कोष-देशे।
पूतस्य निर्मल-रुचेर्यदि वा किमन्य-

दक्षस्य सम्भव-पदं ननु कर्णिकाया:।।१४।।
हे जिनवर! योगीजन तुमको, हृदयकोष के मध्य रखें।

वैसे ही ज्यों कमल कर्णिका, कमलबीज को संग रखे।।
शुद्धात्मा के अन्वेषण में, हृदय कमल ही माध्यम है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।१४।।

अन्वयार्थ - (जिन!) हे पार्श्वनाथ! (योगिन:) ध्यान करने वाले मुनीश्वर (सदा) हमेशा (परमात्मरूपम्) परमात्मस्वरूप (त्वाम्) आपको (हृदयाम्बुजकोषदेशे) अपने हृदयरूपी कमल के मध्य भाग में (अन्वेषयन्ति) खोजते हैं। (यदि वा) अथवा ठीक है कि (पूतस्य) पवित्र और (निर्मल-रुचे:) निर्मल कान्तिवाले (अक्षस्य) कमल के बीज का अथवा शुद्धात्मा का (संभवपदम्) उत्पत्ति स्थान अथवा खोज करने का स्थान (कर्णिकाया: अन्यत्) कमल की डण्ठल को छोड़कर (अन्यत् किम् ननु) दूसरा क्या हो सकता है?

अर्थ - हे तरण-तारण! महर्षिजन परमात्मस्वरूप आपकोे सदा अपने हृदयाम्बुज के मध्यभाग में अपने ज्ञानरूपी नेत्र द्वारा खोजते हैं, ठीक ही है कि जिस प्रकार पवित्र, निर्मल कान्तियुक्त कमल के बीज का उत्पत्तिस्थान कमल की कर्णिका ही है, उसी प्रकार शुद्धात्मा के अन्वेषण का स्थान हृदय-कमल का मध्यभाग ही है।।१४।।

ॐ हीं हृदयाम्बुजान्वेषिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Oh Jina! theYogins always search after Thee, the supreme soul in the interior of their heart-lotus-bud. Or why, is there any other abode for the pure and the unsulliedly splendid lotusseed than the pericarp?

चोरिकागत द्रव्यदायक

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ध्यानाज्जिनेश! भवतो भविन: क्षणेन,

देहं विहाय परमात्म-दशां व्रजन्ति।
तीव्रानलादुपल-भावमपास्य लोके,

चामीकरत्वमचिरादिव धातु-भेदा:।।१५।।
हे जिनेश! तव ध्यानमात्र से, परमातम पद पाते जीव।

अग्निनिमित पा करके जैसे, सोना बनता शुद्ध सदैव।।
ऐसी शक्ती देने में निज, ज्ञानपुञ्ज ही सक्षम है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।१५।।

अन्वयार्थ - (जिनेश!) हे पार्श्वनाथ! (लोके) लोक में (तीव्रानलात्) तीव्र अग्नि के संबंध से (धातु भेदा:) अनेक धातुएँ (उपलभावम्) पत्थर रूप पूर्व पर्याय को (अपास्य) छोड़कर (अचिरात्) शीघ्र ही (चामीकरत्वम् इव) जिस तरह सुवर्ण पर्याय को प्राप्त हो जाती हैं, उसी तरह (भविन:) भव्य प्राणी (भवत:) आपके (ध्यानात्) ध्यान से (देहम्) शरीर को (विहाय) छोड़कर (क्षणेन) क्षणभर में (परमात्मदशाम्) परमात्मा की अवस्था को (व्रजन्ति) प्राप्त हो जाते हैं। अर्थ - हे अलौकिकज्ञानपुंज! जैसे संसार में जिन धातुओं से सोना बनता है, वे नाना प्रकार की धातुएँ तेज अग्नि के ताव से अपने पूर्व पाषाणरूप पर्याय को छोड़कर शीघ्र स्वर्ण हो जाती हैं, वैसे ही आपके ध्यान से संसारी जीव क्षणमात्र में शरीर छोड़कर परमात्मावस्था को प्राप्त हो जाते हैं।।१५।।

ॐ ह्रीं जन्ममरणरोगहराय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
Meditation of Jina leads to equality witw. Him.

Oh Lord of the Jina! by mediting upon Thee, mundane beings attain in a moment the supreme status leaving aside their body, as is the case in this world with pieces of ore which soon cease to be stones and become gold by the application of severe heat.

गहन वन-पर्वत भय विनाशक

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अन्त: सदैव जिन! यस्य विभाव्यसे त्वं,

भव्यै: कथं तदपि नाशयसे शरीरम्।
एतत्स्वरूपमथ मध्य-विवर्तिनो हि,

यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावा:।।१६।।
जिस काया के मध्य भव्यजन, सदा आपका ध्यान करें।

उस काया का ही विनाश, क्यों करते हो भगवान्! अरे।।
अथवा उचित यही जो विग्रह-तन तजते बन भगवन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।१६।।

अन्वयार्थ - (जिन!) हे जिनेन्द्र! (भव्यै:) भव्यजीवों के द्वारा (यस्य) जिस शरीर के (अन्त:) भीतर (त्वम्) आप (सदैव) हमेशा (विभाव्यसे) ध्याये जाते हों (तत्) उस (शरीरम् अपि) शरीर को भी आप (कथम्) क्यों (नाशयसे) नष्ट करा देते हैं? (अथ) अथवा (एतत्स्वरूपम्) यह स्वभाव ही है (यत्) कि (मध्यविवर्तिन:) बीच में रहने वाले और रागद्वेष से रहित (महानुभावा:) महापुरुष (विग्रहम्) विग्रह-शरीर और द्वेष को (प्रशमयन्ति) शान्त करते हैं।

अर्थ - हे देवाधिदेव! जिस शरीर के मध्य में स्थित करके भव्यजन सदैव आपका ध्यान करते हैं, उस शरीर को ही आप क्यों नाश करा देते हो? जिस शरीर में आपका ध्यान किया जाता है, आपको उसकी रक्षा करना चाहिए, परन्तु आप इससे विपरीत करते हैं। अथवा ठीक ही है कि मध्यस्थ महानुभाव विग्रह (शरीर और कलह) को शांत कर देते हैं अत: आप भी ध्यान के समय ध्याता के शरीर के मध्य में स्थित होकर विग्रह अर्थात् शरीर को नष्ट कर देते हो अर्थात् आपके ध्यान से शरीर छूट जाता है और आत्मा मुक्त हो जाती है।।१६।।

ॐ ह्रीं विग्रहनिवारकाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Oh Jina! How is it that Thou destroyest that very body of the, Bhavyas in the interior of which they enshrine Thee? Or why, this is the nature of an arbitrator (one who remains impartial) : for, great personages bring the discord (the body) to an end (or this is the nature; for, great persons who are impartial, remove the quarrel).

युद्धविग्रह विनाशक

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आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेद-बुद्ध्या,

ध्यातो जिनेन्द्र! भवतीह भवत्प्रभाव:।
पानीयमप्यमृतमित्यनुचिन्त्यमानं,

किं नाम नो विष-विकारमपाकरोति।।१७।।
हे जिनेन्द्र! मंत्रादिक से, जैसे जल अमृत बन जाता।

विषविकार हरने में सक्षम, वह परमौषधि कहलाता।।
इसी तरह तुमको ध्याकर, तुम सम बनते योगीजन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।१७।।

अन्वयार्थ - (जिनेन्द्र!) हे पाश्र्वनाथ (मनीषिभि:) बुद्धिमानों के द्वारा (त्वदभेदबुद्ध्या) आप से अभिन्न है ऐसी बुद्धि से (ध्यात:) ध्यान किया गया (अयम् आत्मा) यह आत्मा (भवत्प्रभाव:) आप ही के समान प्रभाव वाला (भवति) हो जाता है (अमृतम् इति अनुचिन्त्यमानम्) यह अमृत है इस तरह चिन्तवन करने वाला (पानीयम् अपि) पानी भी (किम्) क्या (विषविकारम्) विष विकार को (नो अपाकरोति नाम) दूर नहीं करता है? अर्थ - हे जिनेन्द्रदेव! जैसे पानी में ‘‘यह अमृत है’’ ऐसा विश्वास करने से मंत्रादि के संयोग से वह पानी भी विषविकारजन्य पीड़ा को नष्ट कर देता है। वैसे ही इस संसार में योगीजन अभेदबुद्धि से जब आपका ध्यान करते हैं तब वे अपनी आत्मा को आपके समान चिन्तवन करने से आप ही के समान हो जाते हैं।।१७।।

ॐ ह्रीं आत्मस्वरूपध्येयाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
Efficacy of meditation is extra-ordinary.

Oh Lord of the Jinas! this soul, when meditated upon by the talented as non-distinct from Thee attains to Thy prowess in this world. Does not even water when looked upon as nectar verily, destroy the effect of poison?

सर्पविष विनाशक

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त्वामेव वीत-तमसं परवादिनोऽपि,

नूनं विभो! हरि-हरादि-धिया प्रपन्ना:।
किं काच-कामलिभिरीश! सितोऽपि शङ्खो,

नो गृह्यते विविध-वर्ण-विपर्ययेण?।।१८।।
जैसे कामलरोगी को, दिखती पीली वस्तू सब हैं।

वैसे ही अज्ञानी को, प्रभुवर दिखते हरिहर सम हैं।।
हे त्रिभुवनपति! फिर भी वे, करते तेरी ही पूजन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।१८।।

अन्वयार्थ - (विभो!) हे पार्श्वनाथ! (परवादिन: अपि) अन्यमतावलम्बी पुरुष भी (वीत-तमसम्) अज्ञान अंधकार से रहित (त्वाम् एव) आपको ही (नूनम्) निश्चय से (हरिहरादिधिया) विष्णु महादेव आदि की कल्पना से (प्रपन्ना:) पूजते हैं। (किम्) क्या (ईश) हे विभो! (काचकामलिभि:) जिनकी आँख पर रंगदार चश्मा है, अथवा जिन्हें पीलिया रोग हो गया है ऐसे पुरुषों द्वारा (शंखसित: अपि) शंख सफेद होने पर भी (विविधवर्णविपर्ययेण) तरह-तरह के विपरीत वर्णों से (नो गृह्यते) नहीं ग्रहण किया जाता है? अर्थ - हे त्रिलोकाग्रशिखामणे! जिस तरह पीलिया रोग वाला व्यक्ति सफेद वर्ण वाले भी शंख को पीला और नीला आदि अनेक रंग वाला मानता है उसी प्रकार अन्य मतावलम्बी पुरुष रागद्वेषादि अन्धकार से रहित आपको ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि मान कर पूजते हैं।।१८।।

ॐ ह्रीं परवादिदेवस्वरूपध्येयाय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Oh omnipotent Being? even the followers of the other (non Jaina) schools philosophy certainly resort to Thee alone, mistaking Thee for Hari, Hara-and others-Thee from whom ignorance has departed. For, Oh God! is not even a white conch mistaken for one having various colours by those who suffer form Kacha-kamali (eyediseases like colour-blindness)?

नेत्ररोग विनाशक

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धर्मोपदेश-समये सविधानुभावा-

दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोक:।
अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि,

किं वा विबोधमुपयाति न जीव-लोक:।।१९।।
हे प्रभु पुण्य गुणों के आकर! तव महिमा का क्या कहना।

तरु भी शोकरहित तुम ढिग हों, फिर मानव का क्या कहना।।
रवि प्रगटित होते ही जैसे, कमल आदि खिलते सब हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।१९।।

अन्वयार्थ - (धर्मोपदेश समये) धर्मोपदेश के समय (ते) आपकी (सविधानुभावात्) समीपता के प्रभाव से (जन:आस्ताम्) मनुष्य तो दूर रहे (तरू: अपि) वृक्ष भी (अशोक:) शोक रहित (भवति) हो जाता है। (वा) अथवा (दिनपतौ अभ्युद्गते ‘सति’) सूर्य के उदय होने पर (समहीरुह: अपि जीव लोक:) वृक्षों सहित समस्त जीवलोक (किम्) क्या (विबोधम्) विशेषज्ञान को (न उपयाति) प्राप्त नहीं होते?

अर्थ - हे पुण्यगुणोत्कीर्ते! धर्मापदेश के समय आपकी समीपता के प्रभाव से मनुष्य की तो बात क्या, वृक्ष भी अशोक (शोकरहित) हो जाता है अथवा ठीक ही है कि सूर्य का उदय होने पर केवल मनुष्य ही विबोध (जागरण) को प्राप्त नहीं होते किन्तु कमल, पवार, तोरई आदि वनस्पति भी अपने संकोचरूप निद्रा को छोड़कर विकसित हो जाती हैं।।१९।।

ॐ ह्रीं अशोकवृक्षप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
Jina's vicinity averts Sorrow.

Leave aside the case of a human being (for) even a tree becomes free from sorrow (Asoka) on account of its being in Thy proximity at the time Thou preachest religion Aye, does not the world of living beings including even trees awake at the rise of the sun?

उच्चाटनकारक

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चित्रं विभो! कथमवाङ्मुख-वृन्तमेव,

विष्वक्पतत्यवरला सुर-पुष्प-वृष्टि:।
त्वद्गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!,

गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि।।२०।।
हे मुनीश! सुरपुष्पवृष्टि, जो तेरे ऊपर होती है।

उनकी डंठल नीचे अरु, ऊपर पंखुरियाँ होती हैं।।
यही सूचना है कि भव्य के, प्रभु ढिग खुलते बन्धन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।२०।।

अन्वयार्थ - (विभो!) हे जिनेन्द्र (चित्तम्) आश्चर्य है कि (विष्वक्) सब ओर (अविरला) व्यवधान रहित (सुरपुष्पवृष्टि:) देवों के द्वारा की हुई फूलों की वर्षा (अवाङ्मुखवृन्तम्) नीचे को बंधन करके ही (कथम्) क्यों (पतति) पड़ती है? (यदि वा) अथवा (मुनीश!) हे मुनियों के नाथ! (त्वद्गोचरे) आपके समीप (सुमनसाम्) पुष्पों अथवा विद्वानों के (बंधनानि) कर्मों के बंधन (नूनम् हि) निश्चय से (अध: एव गच्छन्ति) नीचे को ही जाते हैं।

अर्थ - हे धर्मसाम्राज्यनायक! देवों के द्वारा आपके ऊपर जो सघन पुष्पों की वृष्टि की जाती है, उनके डंठल नीचे की ओर और पांखुड़ी ऊपर की ओर रहती है, मानो वे डंठल इसी बात को सूचित करते हैं कि आप की निकटता से भव्यजनों के कर्मबंध्ना नीचे हो जाते हैं अर्थात् नष्ट हो जाते हैं।।२०।।

ॐ ह्रीं पुष्पवृष्टिप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
Jina's presenee is miraculous.

Oh pervader of the universe! it is a matter of surprise that uninterrupted shower of celestial blossoms falls all around with their stalks turned down-wards; or why, (it is natural that) in Thy presence, oh master of saints? fetters (stalks) of the good-minded (flowers) (ought to) certainly fall down.

शुष्कवनोपवनविकाशक

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स्थाने गभीर-हृदयोदधि-सम्भवाया:,

पीयूषतां तव गिर: समुदीरयन्ति।
पीत्वा यत: परम-सम्मद-सङ्ग-भाजो,

भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम्।।२१।।
तव गंभीर हृदय उदधी से, समुत्पन्न जो दिव्यध्वनी।

अमृततुल्य समझकर भविजन, पीकर बनते अतुलगुणी।।
सबकी भव बाधा हरने में, जिनवर गुण ही साधन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वंदन है।।२१।।

अन्वयार्थ - (गंभीरहृदयोदधिसंभवाया:) गंभीर हृदयरूपी समुद्र में पैदा हुई (तव) आपकी (गिर:) वाणी के (पीयूषताम्) अमृतपने को (स्थाने) ठीक ही (समुदीरयन्ति) प्रकट करते हैं। (यत:) क्योंकि (भव्या:) भव्यजीव (ताम् पीत्वा) उसे पीकर (परमसंमदसङ्गभाज:) परम सुख के भागी होते हुए (तरसा अपि) बहुत ही शीघ्र (अजरामरत्वम्) अजर अमरपने को (व्रजन्ति) प्राप्त होते हैं।

अर्थ - हे त्रिभुवनपते! आपके अति उदार अगाध हृदयरूपी समुद्र से उत्पन्न हुई दिव्य-वाणी (दिव्यध्वनि) को संसारी जीव सुधा समान बतलाते हैं, सो यह बात सोलह आना सच है क्योंकि धर्मानुरागी भव्यजन आपकी उस अमृततुल्यवाणी का पान करके निराकुल, अक्षय, अनंत सुख को प्राप्त करते हुए अजर-अमर पद को प्राप्त करते हैं।।२१।।

ॐ ह्रीं अजरामरदिव्यध्वनिप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
'
Jina's sermon leads to immortality.'

It is proper that Thy speech which springs up from the ocean of thy grave heart is spoken of as ambrosia; for, by drinking it, the Bhavyas who (hence) participate in the supreme joy, quickly attain the status of permanent youth and immortality.

मधुरफलप्रदायक

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स्वामिन्सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो,

मन्ये वदन्ति शुचय: सुर-चामरौघा:।
येऽस्मै नतिं विदधते मुनि-पुङ्गवाय,

ते नूनमूध्र्व-गतय: खलु शुद्ध-भावा:।।२२।।


देवों द्वारा ढुरते चामर, जब नीचे-ऊपर जाते।

विनयभाव वे भव्यजनों को, मानो करना सिखलाते।।
प्रातिहार्य यह प्रगटित कर, बन गये नाथ अब भगवन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।२२।।

अन्वयार्थ - (स्वामिन्) हे प्रभो! (मन्ये) मैं मानता हूँ कि (सुदूरम्) बहुत दूर तक (अवनम्य) नम्रीभूत होकर (समुत्पतन्त:) ऊपर को जाते हुए (शुचय:) पवित्र (सुरचामरौघा) देवों के चामर समूह (वदन्ति) कह रहे हैं कि (ये) जो (अस्मै मुनिपुङ्गवाय) इन श्रेष्ठ मुनि को (नतिम्) नमस्कार (विदधते) करते हैं, (ते) वे (नूनम्) निश्चय से (शुद्ध भावा:) विशुद्ध परिणाम वाले होकर (ऊध्र्वगतय:) ऊध्र्वगति वाले हो जाते हैं।

अर्थ - हे समवसरणलक्ष्मीसुशोभितदेव! जब देवगण आपके ऊपर चंवर ढोरते हैं तब वे पहिले नीचे की ओर झुकते हैं और बाद में ऊपर की ओर जाते हैं मानों वे जनता को यह ही सूचित करते हैं कि जिनेन्द्रदेव को झुक-झुक कर नमस्कार करने वाले व्यक्ति हमारे समान ही ऊपर को जाते हैं अर्थात् स्वर्ग या मोक्ष पाते हैं।।२२।।


ॐ ह्रीं चामरप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:। '
The poet describes the fourth Pratiharya.'

Oh Lord! I think, the clusers of the sacred (or bright) celestial chowries (Chamaras) which first bend very low and then rise up proclaim that those pure-hearted persons who bow to (Thee) this master of the sages are sure to the highest grade.

राज्यसन्मानदायक

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श्यामं गभीर-गिरमुज्ज्वल-हेम-रत्न

सिंहासनस्थमिह भव्य-शिखण्डिनस्त्वाम्।
आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चै-

श्चामीकराद्रि-शिरसीव नवाम्बुवाहम्।।२३।
स्वर्ण-रत्नमय सिंहासन पर, श्यामवर्ण प्रभु जब राजें।

स्वर्ण मेरु पर कृष्ण मेघ लख, मानों मोर स्वयं नाचें।।
इसी तरह जिनवर सम्मुख, आल्हादित होते भविजन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।२३।।

अन्वयार्थ - (इह) इस लोक में (श्यामं) श्याम वर्ण (गभीरगिरम्) गंभीर दिव्यध्वनि युक्त और (उज्ज्वलहेम रत्नसिंहासनस्थम्) निर्मल सुवर्ण के बने हुए रत्नजड़ित सिंहासन पर स्थित (त्वाम्) आपको (भव्यशिखण्डिन:) भव्य जीवरूपी मयूर (चामीकराद्रिशिरसि) सुवर्णमय मेरुपर्वत के शिखर पर (उच्चै:) जोर से (नदन्तम्) गर्जते हुए (नवाम्बुवाहम् इव) नूतन मेघ की तरह (रभसेन) उत्कण्ठापूर्वक (आलोकयन्ति) देखते हैं।

अर्थ - हे भगवन्! स्वर्णनिर्मित और रतनजड़ित सिंहासन पर विराजमान और दिव्यध्वनि को प्रकट करता हुआ आपका सांवला शरीर ऐसा जान पड़ता है जैसे स्वर्णमय सुमेरुपर्वत पर वर्षाकालीन नवीन काले मेघ गर्जना कर रहे हों। उन मेघों को जैसे मयूर बड़ी उत्सुकता से देखते हैं उसी प्रकार भव्य जीव आपको भी बड़ी उत्सुकता से देखते हैं।।२३।।

ॐ ह्रीं सिंहासनप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
The poet describes the fifth Pratiharya.

The Bhavyas here ardently look at Thee who art dark (in complexion), whose speech is grave and who art seated on a glitterirg golden lion-throne studded with jewels, as is the case with the Peacocks who eagerly look at the mightily thundering, dark and fresh cloud which has arisen to the summit of the golden mountain (Meru).

शत्रुविजितराज्यप्रदायक

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उद्गच्छता तव शिति-द्युति-मण्डलेन,

लुप्तच्छदच्छविरशोक-तरुर्बभूव।
सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग!

नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि।।२४।।
तव भामण्डल प्रभ से जब, तरुवर अशोक भी कान्तिविहीन।

हो जाता है तब बोलो क्यों?, भव्यराग नहिं होगा क्षीण।।
वीतरागता के इस अतिशय, से लाभान्वित भविजन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।२४।।

अन्वयार्थ - (उद्गच्छता) स्पुâरायमान (तव) आपके (शितिद्युतिमण्डलेन) श्यामप्रभामण्डल के द्वारा (अशोकतरु:) अशोकवृक्ष (लुप्तच्छदच्छवि:) कान्तिहीन पत्रों वाला (बभूव) हो गया, (यदि वा) अथवा (वीतराग!) हे रागद्वेष रहित देव! (तव सान्निध्यत: अपि) आपकी समीपता मात्र से ही (क: सचेतन: अपि) कौन पुरुष सचेतन होकर भी (नीरागताम्) अनुराग के अभाव को (न व्रजति) नहीं प्राप्त होता है? अर्थ - हे वीतराग देव! जबकि आपके दैदीप्यमान भामण्डल की प्रभा से अशोक वृक्ष के पत्तों की लालिमा भी लुप्त हो जाती है अर्थात् आपकी समीपता से वृक्षों का राग (लालिमा) भी जाता रहता है तब ऐसा कौन सचेतन पुरुष है जो आपके ध्यान द्वारा या आपकी समीपता से वीतरागता को प्राप्त न होगा?।।२४।।

ॐ ह्रीं भामण्डलप्रातिहार्यप्रभास्वते श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
Even God's presence destroys passions.

The colour of leaves of Asoka Tree is obscured by the dark halo of the orb of Thy light (Bhamandala) which is spreading above Or why, oh passionless one! which animate being is not set free from attachment (and aversion) by the influence of Thy mere presence?

असाध्यरोग शामक

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भो भो:! प्रमादमवधूय भजध्वमेन-

मागत्य निर्वृति-पुरीं प्रति सार्थवाहम्।
एतन्निवेदयति देव! जगत्त्रयाय,

मन्ये नदन्नभिनभ: सुरदुन्दुभिस्ते।।२५।।
हे प्रभु! देवदुन्दुभी बाजे, जब त्रिलोक में बजते हैं।

तब असंख्य देवों-मनुजों को, वे आमंत्रित करते हैं।।
तज प्रमाद शिवपुर यात्रा, करना चाहें तब भविजन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।२५।।

अन्वयार्थ - (देव:) हे देव (मन्ये) मैं समझता हूँ कि (अभिनभ:) आकाश में सब ओर (नदन्) शब्द करती हुई (ते) आपकी (सुरदुन्दुभि:) देवों के द्वारा बजाई गई दुन्दुभि (जगत्त्रयाय) तीनों लोक के जीवों को (एतत्-निवेदयति) यह बतला रही है कि (भो: भो:) रे रे प्राणियों! (प्रमादम् अवधूय) प्रमाद को छोड़कर (निर्वृतिपुरीम् प्रति सार्थवाहम्) मोक्षपुरी को ले जाने में अगुआ (एवम्) इन भगवान को (आगत्य) आकर (भजध्वम्) भजो।

अर्थ - हे मुक्तिसार्थकवाहक! आकाश में जो देवों के द्वारा नगाड़ा बज रहा है वह मानो चिल्ला-चिल्लाकर तीनों लोकों के जीवों को सचेत ही कर रहा है कि जो मोक्षनगरी की यात्रा को जाना चाहते हैं वे प्रमाद छोड़कर भगवान पार्श्वनाथ की सेवा करें।।२५।।

ॐ ह्रीं दुन्दुभिप्रातिहार्योपशोभिताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
The seventh Pratiharya viz, the celestial drum like the previous objects is suggestive.

Oh God! I believe that the celestial drum which is resounding in the sky announces to the three worlds:- Haloo, Haloo, shake off idleness, approach (this god) and resort to him the leader of the caravan leading to (proceeding towards) the city of the final emancipation.

वचनसिद्धिप्रतिष्ठापक

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उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!,

तारान्वितो विधुरयं विहताधिकार:।
मुक्ता-कलाप-कलितोल्ल-सितातपत्र-

व्याजात्त्रिधा धृत-तनुध्र्रुवमभ्युपेत:।।२६।।
तीन छत्र हे नाथ! चन्द्रमा, मानो स्वयं बना आकर।

निज अधिकार पुन: लेने को, सेवा में वह है तत्पर।।
छत्रों के मोती बन मानो, ग्रह भी करते वंदन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।२६।।

अन्वयार्थ - (नाथ!) हे स्वामिन्! (भवता भुवनेषु उद्योति तेषु) आपके द्वारा तीनों लोकों के प्रकाशित होने पर (विहताधिकार:) अपने अधिकार से भ्रष्ट तथा (मुक्ताकलापकलितोल्लसितातपत्रव्याजात्) मोतियों के समूह से सहित अतएव शोभायमान सफेद छत्र के छल से (तारान्वित) ताराओं से वेष्टित (अयम् विधु:) यह चन्द्रमा (त्रिधा धृततनु) तीन-तीन शरीर धारण कर (ध्रुवम्) निश्चय से (अभ्युपेत:) सेवा को प्राप्त हुआ है।

अर्थ - हे अपूर्वतेजपुञ्ज! आपने तीनों लोकों को प्रकाशित कर दिया, अब चन्द्रमा किसे प्रकाशित करे? इसीलिए वह तीन छत्र का वेष धारण कर अपना अधिकार वापिस लेने की इच्छा से आपकी सेवा में उपस्थित हुआ है। छत्रों मे जो मोती लगे हैं तो मानों चन्द्रमा के परिवारस्वरूप तारागण ही हैं।।२६।।

ॐ ह्रीं छत्रत्रयप्रातिहार्यविराजिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
The poet delineates the eighth or the final Pratiharya .

Oh Lord! as the worlds have been (already) illuminated by Thee, this moon accompanied by stars, (being thus) deprived of her authority has certainly approached Thee by assuming the three bodies in the disguise of the (three) canopies which are shining on account of their being adorned by a cluster of pearls.

वैरविरोधविनाशक

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स्वेन प्रपूरित-जगत्त्रय-पिण्डितेन,

कान्ति-प्रताप-यशसामिव संचयेन।
माणिक्य-हेम-रजत-प्रविनिर्मितेन,

१सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि।।२७।।
समवसरण में माणिक-सोने-चांदी के त्रय कोट बने।

माना नाथ! तुम्हारी कांती-कीर्ती और प्रताप इन्हें।।
जन्मजात वैरी के भी, हो जाते मैत्रीयुत मन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।२७।।

अन्वयार्थ - (भगवन्!) हे भगवन्! आप (अभित:) चारों ओर से (प्रपूरित-जगत्त्रयपिण्डितेन) भरे हुए जगत्त्रय के पिण्ड अवस्था को प्राप्त (स्वेन कान्तिप्रतापयशसाम् सञ्चयेन इव) अपने कान्ति, प्रताप और यश के समूह के समान शोभायमान (माणिक्य-हेम-रजत-प्रविनिर्मितेन) माणिक्य, सुवर्ण और चाँदी से बने हुए (सालत्रयेण) तीनों कोटों से (विभासि) शोभायमान होते हैं।

अर्थ - हे प्रतापपुंज! समवसरण भूमि में आपके चारों ओर माणिक्य, स्वर्ण और चाँदी के बने तीन कोट हैं, वे मानो आपकी कान्ति, प्रताप और कीर्ति के वर्तुलाकार समूह ही हैं।।२७।।

ॐ ह्रीं वप्रत्रयविराजिताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
The poet depicts the triad of ramparts.

Oh (all) knowing being! Thou shinest in all directions on account of the triad of the ramparts beautifully made of rubies, gold and silver-the triad which is as it were the store of Thy lustre, prowess and glory, that fill up the three worlds and are amassed together.

यश:कीर्तिप्रसारक

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दव्य-स्रजो जिन! नमत्त्रिदशाधिपाना-

मुत्सृज्य रत्न-रचितानपि मौलि-बन्धान्।
पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वा परत्र१,

त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव।।२८।।
प्रभु! इन्द्रों के नत मुकुटों की, पुष्पमालिका कहती हैं।

तव पद का सामीप्य प्राप्त कर, प्रगट हुई जो भक्ती है।।
इसका अर्थ समझिये प्रभु से, जुड़े सभी अन्तर्मन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।२८।।

अन्वयार्थ - (जिन!) हे जिनेन्द्र! (दिव्यस्रज:) दिव्यपुरुषों की मालाएँ (नमत्त्रिदशाधिपानाम्) नमस्कार करते हुए इन्द्रों के (रत्न रचितान् अपि मौलिबन्धान्) रत्नों से बने हुए मुकुटों को भी (विहाय) छोड़कर (भवत: पादौ श्रयन्ति) आपके चरणों का आश्रय लेती हैं। (यदि वा) अथवा (त्वत्सङ्गमे) आपका समागम होने पर (सुमनस:) पुष्प अथवा विद्वान पुरुष (परत्र) किसी दूसरी जगह (न एव रमन्ते) नहीं रमण करते हैं।

अर्थ - हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार करते समय इन्द्रों के मुकुटों में लगी हुई दिव्य पुष्पमालाएँ आपके श्रीचरणों में गिर जाती हैं मानो वे पुष्पमालाएँ आपसे इतना पे्रेम करती हैं कि उसके पीछे इन्द्रों के रत्ननिर्मित मुकुटों को भी वे छोड़ देती हैं। अर्थात् आपके लिए बड़े-बड़े इन्द्र भी नमस्कार करते हैं।।२८।।

ॐ ह्रीं पुष्पमाला-निषेवितचरणाम्बुजाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
The poet praises God by resorting to a rhetorical inconsistency.

Oh Jina! celestial garlands of the bowing lords of heavens leave aside their diadems, (even) though (they are) studded with jewels and resort to Thy feet. Or indeed the good-minded (flowers) do not find pleasure any where else when there is Thy company.

आकर्षणकारक

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त्वं नाथ! जन्मजलधेर्विपराङ् मुखोऽपि,

यत्तारयस्यसुमतो निज-पृष्ठ-लग्नान्१।
युत्तं हि पार्थिव-नृपस्य सतस्तवैव,

चित्रं विभो! यदसि कर्म-विपाक-शून्य:।।२९।।
हे कृपालु! जिस तरह अधोमुखि, पका घड़ा करता नदि पार।

कर्मपाक से रहित प्रभो! त्यों ही तुम करते भवि भवपार।।
इस उपकारमयी प्रकृति का, जिनमें अति आकर्षण है।।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।२९।।

अन्वयार्थ - (नाथ!) हे स्वामिन् (त्वम्) आप (जन्मजलधे:) संसाररूप समुद्र से (विपराङ् मुख: अपि सन्) पराङ्मुख होते हुए भी (यत्) जो (निजपृष्ठलग्नान्) अपने पीछे लगे हुए अनुयायी (अनुमत:) जीवों को (तारयसि) तार देते हो, (तत्) वह (पार्थिवनृपस्य सत:) राजाधिराज अथवा मिट्टी के पके हुए घड़े की तरह परिणमन करने वाले (तव) आपको (युक्तम् एव) उचित ही है। परन्तु (विभो!) हे प्रभो! (चित्रम्) आश्चर्य की बात है (यत्) जो आप (कर्मविपाक शून्य: असि) कर्मोदय रूप क्रिया से रहित हो।

अर्थ - हे कृपालु देव! जिस तरह जल में अधोमुख (उलटा) पक्का घड़ा अपनी पीठ पर आरूढ़ मनुष्यों को जलाशय से पार कर देता है, उसी तरह भव-समुद्र से परान्मुख हुए आप अपने अनुयायी भव्यजनों को तार देते हो सो यह उचित ही है, परन्तु घड़ा तो जलाशय से वही पार कर सकता है जो विपाकसहित (पकाया हुआ) है; परन्तु आप तो विपाक (कर्मफलानुभव) रहित होकर तारते हैं। यह आपकी अचिन्त्य महिमा है।।२९।।

ॐ ह्रीं संसारसागरतारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
Even one who indirectly follows Jina i. e.
directly follows Jainism gets liberated.

Oh Lord! though Thou hast turned away Thy face from the ocean of births (and deaths), yet Thou enablest the living beings clinging to Thy back to cross it Nevertheless, this is justifiable in the case of Thine that art the good governor of the world (Parthiva-nipa). This is also seen in the case of an earthen pot (Parthiva-nipa). But, this is strange that Thou art not subject to the effects of Karmans (Karma-vipaka-sunya) whereas that earthen pot is not so. (There is another interpretation possible. viz, it is strange that Thou enablest the beings to cross Samsara even when Thou art Karma-vipaka-sunya, but such is not the case with an earthen pot which is not annealed.

असंभवकार्यसाधक

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विश्वेश्वरोऽपि जन-पालक! दुर्गतस्त्वं,

किं वाऽक्षर-प्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश!
अज्ञानवत्यपि सदैव कथंचिदेव,

ज्ञानं त्वयि स्पुरति विश्व-विकास-हेतु:।।३०।।
हे जगपालक! तुम त्रिलोकपति, हो फिर भी निर्धन दिखते।

अक्षरयुत हो लेखरहित, अज्ञानी हो ज्ञानी दिखते।।
शब्द विरोधी अलंकार हैं, प्रभु तो गुण के उपवन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३०।।

अन्वयार्थ - (जनपालक!) हे जीवों के रक्षक! (त्वम्) आप (जिनेश्वर: अपि दुर्गत:) तीन लोक के स्वामि होकर भी दरिद्र हैं (किं वा) और (अक्षर प्रकृति: अपि त्वम् अलिपि:) अक्षर स्वभाव होकर भी लेखन क्रिया से रहित हैं। (ईश!) हे स्वामिन्! (कथञ्चित्) किसी प्रकार से (अज्ञानवति अपि त्वयि) अज्ञानवान होने पर भी आप में (विश्वविकास हेतु ज्ञानम्) सभी पदार्थों को प्रकाशित करने वाला ज्ञान (सदा एव स्पुरति) हमेशा स्पुरायमान रहता है।

अर्थ - हे जगपालक! आप तीन लोक के स्वामी होकर भी निर्धन हैं। अक्षरस्वभाव होकर भी लेखनक्रियारहित हैं; इसी प्रकार से अज्ञानी होकर भी त्रिकाल और त्रिलोकवर्ती पदार्थों के जानने वाले ज्ञान से विभूषित हैं। जिस अलंकार में शब्द से विरोध प्रतीत होने पर भी वस्तुत: विरोध नहीं होता उसे विरोधाभास अलंकार कहते हैं। इस श्लोक में इसी अलंकार का आश्रय लेकर वर्णन किया गया है, उपर्युक्त अर्थ में दिखने वाले विरोध का परिहार इस प्रकार है- हे भगवन्! आप त्रिलोकीनाथ हैं और कठिनाई से जाने जा सकते हैं। अविनश्वर स्वभाव वाले होकर भी आकार रहित (निराकार) हैं। अज्ञानी मनुष्यों की रक्षा करने वाले हैं। आप में सदा केवलज्ञान प्रकाशित रहता है।।३०।।

ॐ ह्रीं अद्भुतगुणविराजितरूपाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।'

Oh saviour of mankind (Jarapalaka)! though Thou art the master of the universe, yet Thou art poor (Durgata) Oh God! although Thy very nature is a letter (Akshara), yet Thou art not forming an alphabet (Thou art Alipi) Moreover, how is it that knowledge the acause of the illumination of the universe permanently shines in Thee, even when Thou art ignorant (Ajnanavati)? These apparent contradictions can by removed be rendering the verse as follows:- Oh saviour of mankind! as Thou art the master of the universe, Thou art realized with great difficulty (Durgata). Or, Oh saviour of mankind: (Janapa)! though Thou art the master of the universe. Thou art bald-headed (Alakadurgata). Or Though are the protector from the mundane existence (Durga) as Thy very nature is imperishable (Akshara). Thou art not enshrouded with karmans (Alipi). And there is no wonder if knowledge, the cause of the illumination of the universe, always shines in Thee, even when Thou redeemest the ignorant (Ajnanavati).

शुभाशुभ प्रश्न दर्शक

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प्राग्भार-सम्भृत-नभांसि रजांसि रोषा-

दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि।
छायापि तैस्तव न नाथ! हता हताशो,

ग्रस्तस्त्वमीभिरयमेव परं दुरात्मा।।३१।।
हे जितशत्रु! कमठ वैरी ने, तुम पर बहु उपसर्ग किया।

किन्तु विफल हो कर्म रजों से, कमठ स्वयं ही जकड़ गया।।
कर न सका कुछ अहित चूँकि, ध्यानस्थ हुए जब भगवन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३१।।

अन्वयार्थ - (नाथ!) हे स्वामिन्! (शठेन) मूर्ख (कमठेन) कमठ के द्वारा (रोषात्) क्रोध से (प्राग्भारसम्भृतनभांसि) सम्पूर्ण रूप से आकाश को व्याप्त करने वाली (यानि) जो (रजांसि) धूल (उत्थापितानि) आपके ऊपर उड़ाई गई थी (तै:तु) उससे तो (तव) आपकी (छाया अपि) छाया भी (न हता) नहीं नष्ट हुई थी। (परम्) किन्तु (अयमेव दुरात्मा) यही दुष्ट (हताश:) हताश हो (अमीभि:) कर्मरूप रजों से (ग्रस्त:) जकड़ा गया।

अर्थ - हे जितशत्रो! आपके पूर्वभव के बैरी ‘कमठ’ ने आप पर भारी धूल उड़ा कर उपसर्ग किया परन्तु वह धूलि आपके शरीर की छाया भी नष्ट नहीं कर सकी, प्रत्युत् तिरस्कार की दृष्टि से किया गया उसका यह कार्य तो दूर रहे किन्तु विफल मनोरथ हताश वह दुष्ट कमठ का जीव ही रज-कणों (पापकर्मों) से कस कर जकड़ा गया।।३१।।

ॐ ह्रीं रजोवृष्ट्यक्षोभ्याय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।'
Those who try to harass God are caught in their own trap.'

Masses of dust which entirely filled up the sky and which were thrown up in rage by malevolent Kamatha failed to mar, oh Lord, even Thy loveliness. On the contrary, that very wretch whose hopes were shattered, was caught in this trap (of masses of dust).

दुष्टताप्रतिरोधी

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यद्गर्जदूर्जित-घनौघमदभ्र-भीम

भ्रश्यत्तडिन्-मुसल-मांसल-घोरधारम्।
दैत्येन मुक्तमथ दुस्तर-वारि दध्रे,

तेनैव तस्य जिन! दुस्तर-वारिकृत्यम्।।३२।।
हे बलशाली! तुम पर मूसल-धारा दैत्य ने बरसाई।

भीम भयंकर बिजली की, गर्जना उसी ने करवाई।।
खोटे कर्म बंधे उसके पर, जिनवर तो निश्चल तन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३२।।

अन्वयार्थ - (अथ) और (जिन!) हे जिनेश्वर! (दैत्येन) उस कमठ ने (गर्जदूर्जितघनौघम्) खूब गर्ज रहे हैं बलिष्ठ-मेघ-समूह जिसमें (भ्रश्यत्तडित्) गिर रही है बिजली और (मुसलमांसलघोरधारम्) मूसल के समान बड़ी है मोटी धारा जिसमें तथा (अदभ्रभीम) अत्यंत भयज्र्र (यत्) जो (दुस्तरवारि) अथाह जल (मुक्तम्) वर्षाया था (तेन) उस जलवृष्टि से (तस्य एव) उस कमठ ने ही अपने लिए (दुस्तरवारिकृत्यम्) तीक्ष्ण तलवार का काम कर लिया था।

अर्थ - हे महाबल! आप पर मूसलाधार पानी वर्षा कर कमठ ने जो महान उपसर्ग किया था उससे आपका क्या बिगड़ा? परन्तु उसी ने स्वयं अपने लिए तलवार का घाव कर लिया। अर्थात् ऐसा खोटा कृत्य करने के कारण स्वयं उसने घोर पापकर्मों का बन्ध कर लिया।।३२।।

ॐ ह्रीं कमठदैत्यमुक्तवारिधाराक्षोभ्याय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Oh Jina! that very shower which was let loose (upon Thee) by the demon (kamatha)-the shower which was unfordable and excessively horrible and which was accompanied by a range of thundering mighty clouds. flashes of lightnings horribly emanating (from the sky) and terrible drops of water thick like a club served in his own (kamatha's) case the purpose of a bad sword.

उल्कापातातिवृष्ट्यनावृष्टिनिरोधक

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ध्वस्तोध्र्व-केश-विकृताकृति-मत्र्य-मुण्ड-

प्रालम्बभृद्भयदवक्त्र-विनिर्यदग्नि:।
पे्रतव्रज: प्रति भवन्तमपीरितो य:,

सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भव-दु:ख-हेतु:।।३३।।
केशविकृत मृतमुंडमाल धर, कंठ रूप विकराल किया।

अग्नीज्वाला फैक-फैककर, विषधर सम मुख लाल किया।।
व्रूर दैत्यकृत इन कष्टों से, भी नहिं प्रभु विचलित मन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३३।।

अन्वयार्थ - (तेन असुरेण) उस असुर के द्वारा (ध्वस्तोध्र्वकेशविकृताकृति)मुड़े हुए तथा विकृत आकृति वाले (मत्र्यमुण्डप्रालम्बभृद्) नर कपालों की माला को धारण करने वाले (भयदवक्त्रविनिर्यदग्नि:) जिसके भयंकर मुख से अग्नि निकल रही है, ऐसा (य:) जो (प्रेतव्रज:) पिशाचों का समूह (भवन्तम् प्रति) आपके प्रति (ईरित:) प्रेरित किया गया था (स:) वह (अस्य) उस असुर को (प्रतिभवम्) प्रत्येक भव में (भवदु:ख हेतु:) संसार के दु:खों का कारण (अभवत्) हुआ।

अर्थ - हे उपसर्गविजयिन्! कमठ के जीव ने आपको कठोर तपस्या से चलायमान करने की खोटी नीयत से जो विकराल पिशाचों का समूह आप की तरफ उपद्रव करने के लिए दौड़ाया था, उससे आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ हुआ परन्तु उस व्रूâर कमठ के ही अनेक खोटे कर्मों का बन्ध हुआ, जिससे उसे भव-भव में असह्य यातनाएँ झेलनी पड़ीं।।३३।।

ॐ ह्रीं कमठदैत्यप्रेषितभूतपिशाचाद्यक्षोभ्याय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Even that very troop of the ghosts that was sent against Thee by him (kamatha)-the ghosts who were (round their necks) garlands (reaching their chests) of skulls of human beings, with dishevelled and erect hair and distorted features, and who were belching fire from their dreadful mouths became the cause of mundane sufferings in every birth in his (kamathas) case.

भूतपिशाचपीड़ा तथा शत्रुभय नाशक

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धन्यास्त एव भुवनाधिप! ये त्रिसंध्य-

माराधयन्ति विधिवद्विधुतान्य-कृत्या:।
भक्त्योल्लसत्पुलक-पक्ष्मल-देह-देशा:,

पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाज:।।३४।।
हे प्रभु! अन्यकार्य तज जो जन, तव पद आराधन करते।

भक्ति भरित पुलकित मन से, त्रय संध्या में तुमको यजते।।
धन्य-धन्य वे ही इस जग में, धन्य तुम्हारा दर्शन है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३४।।

अन्वयार्थ - (भुवनाधिप!) हे तीन लोक के नाथ! (ये) जो (जन्मभाज:) प्राणी (विधुतान्यकृत्या:) जिन्होंने अन्य काम छोड़ दिये हैं और (भक्त्या) भक्ति से (उल्लसत्) प्रकट हुए (पक्ष्मलदेहदेशा:) रोमांचों से जिनके शरीर का प्रत्येक अवयव व्याप्त है, ऐसे (सन्त:) होते हुए (विधिवत्) विधिपूर्वक (त्रिसन्ध्यम्) तीनों कालों में (तव) आपके (पादद्वयम् आराधयन्ति) चरण युगल की आराधना करते हैं। (विभो!) हे स्वामिन्! (भुवि) संसार में (ते एव) वे ही (धन्या:) धन्य हैं।

अर्थ - हे त्रिलोकीनाथ! जो प्राणी भक्ति से उत्पन्न रोमांचों से पुलकित होकर सांसारिक अन्य कार्यों को छोड़कर तीनों सन्ध्याओं में विधिपूर्वक आपके चरणों की आराधना करते हैं संसार में वे ही धन्य हैं।।३४।।

ॐ ह्रीं त्रिकालपूजनीयाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
Those who devote their time in worshipping God are fortunate.

Oh Lord of the universe! blessed are those persons alone who, by leaving aside their other activities worship here the pair of Thy feet. Oh mighty one, thrice a day (dawn, noon and sunset) according to the prescribed rules, with the different parts of their bodies covered up with bristling horripliation of devotion.

मृगी उन्माद अपस्मार विनाशक

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अस्मिन्नपार-भव-वारि-निधौ मुनीश!

मन्ये न मे श्रवण-गोचरतां गतोऽसि।
आकर्णिते तु तव गोत्र-पवित्र-मन्त्रे,

किं वा विपद्विषधरी सविधं समेति।।३५।।


इस भव सागर में प्रभु! तेरा, पुण्यनाम नहिं सुन पाये।

इसीलिए संसार जलधि में, बहुत दु:ख हमने पाये।।
जिनका नाम मंत्र जपने से, खुल जाते भवबंधन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३५।।

अन्वयार्थ - (मुनीश!) हे मुनीन्द्र! (मन्ये) मैं समझता हूँ कि (अस्मिन्) इस (अपारभववारिनिधौ) अपार संसाररूप समुद्र में कभी भी (मे) मेरे (कर्णगोचरताम् न गत: असि) कानों की विषयता को प्राप्त नहीं हुए हो। क्योंकि (तु) निश्चय से (तव गोत्र पवित्र मन्त्रे) आपके नामरूपी मंत्र के (आकर्णिते) सुन लेने पर (विपद् विषधरी) विपत्तिरूपी नागिन (किम् वा) क्या (सविधम्) समीप (समेति) आती है?

अर्थ - हे संकटमोचन! इस अपार संसार-सागर में मैंने आपका नाम नहीं सुना अर्थात् आपकी उत्तम कीर्ति मेरे कानों द्वारा नहीं सुनी गई; क्योंकि निश्चय से यदि आपका नामरूपी पवित्र मन्त्र मैंने सुना होता तो क्या विपत्तिरूपी नागिन मेरे समीप आती? अर्थात् कभी न आती।।३५।।


ॐ ह्रीं आपन्निवारकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।


The poet commences self-examination and resorts to repeniance.

Oh Lord of the saints! I do not believe that Thou hast (Thy name has) ever come within the range of my ears, in this endless ocean of existence; otherwise, can the venemons reptile of disasters approach (me), after the pure incantation (in the form) of Thy appellation has been listened to (by me)?

सर्पवशीकरण

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जन्मान्तरेऽपि तव पाद-युगं न देव!

मन्ये मया महितमीहित-दान-दक्षम्।
तेनेह जन्मनि मुनीश! पराभवानां,

जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम्।।३६।।
हे जिन! पूर्व भवों में शायद, चरणयुगल तव नहिं अर्चे।

तभी आज पर के निन्दायुत, वचनों से मन दुखित हुए।।
अब देकर आधार मुझे, कर दो मेरा मन पावन है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३६।।

अन्वयार्थ - (देव!) हे देव! (मन्ये) मैं मानता हूँ कि मैंने (जन्मान्तरे अपि) दूसरे जन्म में भी (ईहितदानदक्षम्) इच्छित फल देने में समर्थ (तव पादयुगम्) आपके चरण कमल (न महितम्) नहीं पूजे, (तेन) उसी से (इह जन्मनि) इस भव में (मुनीश!) हे मुनीश! (अहम्) मैं (मथिताशयानाम्) हृदयभेदी (पराभवानाम्) तिरस्कारों का (निकेतनम्) घर (जात:) हुआ हूँ।

अर्थ - हे वरद! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि पहिले के अनेक जन्मों में मैंने मनोवांछित फलों के देने में पूर्ण समर्थ आपके पवित्र चरणों की पूजा नहीं की, इसी से इस जन्म में मैं मर्मभेदी तिरस्कारों का आगार (घर) बना हुआ हूँ।।३६।।

ॐ ह्रीं सर्वपराभवहरणाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:। '


A worshipper of God can never suffer from humitiations and disappointments.'


Oh God! I believe that Thy (pair of) feet capable of granting desired gifts has not been worshipped by me even in the previous births. That is why I have (now) become in the birth an object of humiliations and an abode of frustrated hopes.

मानसिक कष्ट निवारक

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नूनं न मोह-तिमिरावृतलोचनेन,

पूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि।
मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्था:,

प्रोद्यत्प्रबन्ध-गतय: कथमन्यथैते।।३७।।
मोहतिमिरयुत नैनों ने, प्रभु का अवलोकन नहीं किया।

इसीलिए क्षायिक सम्यग्दर्शन आत्मा में नहीं हुआ।।
जिनके दर्शन से भूतादिक, के कट जाते संकट हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३७।।

अन्वयार्थ - (विभो!) हे स्वामिन्! (मोहतिमिरावृतलोचनेन) मोहरूपी अंधकार से ढके हुए हैं नेत्र जिसके ऐसे (मया) मेरे द्वारा आप (पूर्वम्) पहले कभी (सकृद्अपि) एकबार भी (नूनम्) निश्चय से (प्रविलोकित:न असि) अच्छी तरह अवलोकित नहीं हुए हो, अर्थात् मैंने आपके दर्शन नहीं किए। (अन्यथा हि) नहीं तो (प्रोद्यत्प्रबंधगतय:) जिनमें कर्मबंध की गति बढ़ रही है ऐसे (ऐते) ये (मर्माविध:) मर्मभेदी (अनर्था:) अनर्थ (माम्) मुझे (कथम्) क्यों (विधुरयन्ती) दु:खी करते ?

अर्थ - हे कष्टनिवारकदेव! मोहरूपी सघन अन्धकार से आच्छादित नेत्र सहित मैंने पूर्वजन्मों में कभी एक बार भी निश्चयपूर्वक आपको अच्छी तरह नहीं देखा, ऐसा मुझे दृढ़ विश्वास है। यदि मैंने कभी आपका दर्शन किया होता तो उत्कट संसारपरम्परा के वद्र्धक मर्मभेदी अनर्थ मुझे क्यों दुखी करते? क्योंकि आपके दर्शन करने वालों को कभी कोई भी अनर्थ दु:ख नहीं पहुँचा सकता।।३७।।

ॐ ह्रीं सर्वमनर्थमथनाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
The sight of God averts adversities.

It is certain, Oh Omnipotent one! that Thou hast not been formerly seen even once by me whose eyes are blinded by the darkness of infatuation. For, otherwise, how can these misfortunes which pierce the vital parts of the heart and which are quickly appearing in a continuous succession, make me miserable?

असह्यकष्ट निवारक

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आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि,

नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।
जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रं,

यस्मात्क्रिया: प्रतिफलन्ति न भाव-शून्या:।।३८।।
देखा सुना और पूजा भी, पर न प्रभो! तव ध्यान दिया।

भक्तिभाव से हृदय कमल में, नहिं उनको स्थान दिया।।
इसीलिए दुखपात्र बना, अब मिला भक्ति का साधन है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३८।।

अन्वयार्थ - (जनबान्धव!) हे जगद् बन्धो! (मया) मेरे द्वारा (आकर्णित: अपि) दर्शन किये गये हो (महित: अपि) पूजित भी हुए हो और (निरीक्षित: अपि) अवलोकित भी हुए हो फिर भी (नूनम्) निश्चय है कि (भक्त्या) भक्तिपूर्वक (चेतसि) चित्त में (न विधृत: असि) धारण नहीं किये गये हो। (तेन) उसी से (दु:खपात्रम् जात: अस्मि) दु:खों का पात्र हो रहा हूँ (यस्मात्) क्योंकि (भावशून्या:) भाव रहित (क्रिया:) क्रियाएँ (न प्रति फलन्ति) सफल नहीं होतीं।

अर्थ - हे जनबान्धव! पहिले किन्हीं जन्मों में मैंने आपका नाम भी सुना हो, आपकी पूजा भी की हो तथा आपका दर्शन भी किया हो तो भी यह निश्चय है कि मैंने भक्तिभाव से आपको अपने हृदय में कभी भी धारण नहीं किया, इसीलिए तो अब तक इस संसार में मैं दु:खों का पात्र ही बना रहा,क्योंकि भावरहित क्रियाएँ फलदायक नहीं होतीं।।३८।।

ॐ ह्रीं सर्वदु:खहराय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
Prayers eic, void of sincerity are fruittess.

Oh philanthrophist! though I have even heard, worshipped and seen Thee, yet I Have not reverentallw enshrined Thee in my heart. Hence I have become an object of miseries; for, actions. (such as hearing worshipping and seeing The) performed without sincerity (Bhava) do not yield fruits.

सर्वज्वरशामक

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त्वं नाथ! दु:खि-जन-वत्सल! हे शरण्य!

कारुण्य-पुण्य-वसते! वशिनां वरेण्य।
भक्त्या नते मयि महेश! दयां विधाय,

दुखांकुरोद्दलन-तत्परतां विधेहि।।३९।।
हे दयालु! शरणागत रक्षक, तुम दु:खितजनवत्सल हो।

पुण्यप्रभाकर इन्द्रियजेता, मुझ पर भी अब दया करो।।
जग के दु:खांकुर क्षय में, जिनकी भक्ती ही माध्यम है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।३९।।

अन्वयार्थ - (नाथ!) हे नाथ! (दु:खिजनवत्सल!) हे दुखियों पर प्रेम करने वाले (हे शरण्य) हे शरणागत प्रतिपालक! (कारुण्यपुण्य वसते!) हे दया की पवित्र भूमि! (वशिनाम् वरेण्य) हे जितेन्द्रियों में श्रेष्ठ! और (महेश!) हे महेश्वर! (भक्त्या) भक्ति से (नते मयि) नम्रीभूत मुझ पर (दयाम् विधाय) दया करके (दु:खाज्र्ुर) दु:खाज्र्ुर के (उद्दलन) नाश करने में (तत्परताम्) तत्परता (विधेहि) कीजिए।

अर्थ - हे दयालुदेव! आप दीनदयाल, शरणागतप्रतिपालक, दयानिधान, इन्द्रियविजेता, योगीन्द्र और महेश्वर हैं, अत: सच्ची भक्ति से नम्रीभूत मुझ पर दया करके मेरे दुखांकुरों के नाश करने में तत्परता कीजिये।।३९।।

ॐ ह्रीं जगज्जीवदयालवे श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।
The poet prays to God to be gracious.

Oh Lord, the cherisher of affection for the miserable! the protector! the hoty abode of compassion (or residence of mercy and merit) ! the best amongst those who have controlled their senses! great God! have pity on me who devotedly bow to Thee; and show readiness to destroy sprouts of my sufferings

विषमज्वरविघातक

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नि:संख्य-सार-शरणं शरणं शरण्य-

मासाद्य सादित-रिपु-प्रथितावदानम्।
त्वत्पाद-पंकजमपि प्रणिधान-वन्ध्यो,

बन्ध्योऽस्मि चेद् भुवन-पावन! हा हतोऽस्मि।।४०।।
हे त्रिभुवन पावन जिनवर! अशरण के भी तुम शरण कहे।

कर न सवें यदि भक्ति तुम्हारी, समझो पुण्यहीन हम हैं।
जिनका पुण्य नाम जपने से, होता नष्ट विषम ज्वर है।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।४०।।

अन्वयार्थ - (भुवनपावन) हे संसार को पवित्र करने वाले भगवन्! (नि:संख्यसारशरणम्) असंख्यात श्रेष्ठ पदार्थों के घर की (शरणम्) रक्षा करने वाले (शरण्यम्) शरणागत प्रतिपालक और (सादितरिपुप्रथितावदानम्) कर्मशत्रुओं के नाश से प्रसिद्ध है, पराक्रम जिनका ऐसे (त्वत्पादपज्र्जम्) आपके चरणकमलों को (आसाद्य अपि) पाकर भी (प्रणिधानबन्ध्य:) उनके ध्यान से रहित हुआ मैं (बन्ध्य: अस्मि) फलहीन हूँ (तत्) उससे (हा) खेद है कि मैं (हत: अस्मि) नष्ट हुआ जा रहा हूँ।

अर्थ - हे भुवनपावन! आपके अशरणशरण, शरणागतप्रतिपालक, कर्मविजेता और प्रसिद्ध प्रभावशाली चरण-कमलों को प्राप्त करके भी यदि मैंने उनका ध्यान नहीं किया तो मुझ सरीखा अभागा कोई नहीं होगा।।४०।।

ॐ ह्रीं सर्वशांतिकराय श्रीजिनचरणाम्बुजाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Even after having attained as a refuge Thy lotus-feet, which are the resting place of innumerable exellences, which are an object fit to be resorted to and the which has destroyed the famous prowess of foes (like attachment or which has destroyed enemies and which is well-known for purity). If I am lacking in the profound religious meditation, oh purifier of the univeres (or pure in the worlds)! I am fit to be killed and hence alas, I am undone

अस्त्र-शस्त्र विघातक

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देवेन्द्रवन्द्य! विदिताखिल-वस्तु-सार!

संसार-तारक! विभो! भुवनाधिनाथ!।
त्रायस्व देव! करुणा-हृद! मां पुनीहि,

सीदन्तमद्य भयद-व्यसनाम्बु-राशे:।।४१।।
हे देवेन्द्रवंद्य! सब जग का, सार तुम्हीं ने समझ लिया।

हे भुवनाधिप नाथ! तुम्हीं ने, जग को सच्चा मार्ग दिया।।
जनमानस की रक्षा करते, दयासरोवर भगवन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।४१।।

अन्वयार्थ - (देवेन्द्रवन्द्य!) हे इन्द्रों के वन्दनीय! (विदिताखिलवस्तुसार!) हे सब पदार्थों के रहस्य को जानने वाले! (संसारतारक!) हे संसार समुद्र से तारने वाले! (विभो!) हे प्रभो! (भुवनाधिनाथ!) हे तीन लोक के स्वामिन्! (करुणाहृद) हे दया के सरोवर! (देव) देव! (अद्य) आज (सीदन्तम्) तड़पते हुए (माम्) मुझको (भयदव्यसनाम्बुराशे:) भयज्र्र दु:खों के समुद्र से (त्रायस्व) बचाओ और (पुनीहि) पवित्र करो।

अर्थ - हे देवेन्द्रवन्द्य सर्वज्ञ, जगततारक, त्रिलोकीनाथ, दयासागर, जिनेन्द्रदेव! आज मुझ दुखिया की रक्षा करो तथा अतिभयानक दु:ख सागर से बचाओ।।४१।।

ॐ ह्रीं जगन्नायकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

Oh object of worship for the lords of gods! Conversant with the essence of every object! Saviour from this worldly existence (the ferryman that enables to cross the ocean of existence)! Pervader of the Universe! Ruler of the world! save me, oh God! oh reservoir of compassion! purify me who am now-a-days sinking in the terrifying sea of sufferings.

स्त्रीसम्बंधि समस्तरोगशामक

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यद्यस्ति नाथ! भवदङ्घ्रि-सरोरुहाणां,

भत्ते: फलं किमपि सन्ततसञ्चिताया:।
तन्मे त्वदेक-शरणस्य शरण्य! भूया:,

स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि।।४२।।
नाथ! तुम्हारे चरणों की, स्तुति में यह अभिलाषा है।

भव-भव में तुम मेरे स्वामी, रहो यही आकांक्षा है।।
जिन पद के आराधन से, मिटते सब रोग विघन घन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।४२।।

अन्वयार्थ - (नाथ!) हे नाथ! (त्वदेकशरणस्य) केवल आप ही की है शरण जिसको ऐसे मुझे (सन्तत सञ्चिताया:) चिरकाल से सञ्चित-एकत्रित हुई (भवदंघ्रिसरोरुहाणाम्) आपके चरण कमलों की (भत्तेâ:) भक्ति का (यदि) यदि (किमपि फलम् अस्ति) कुछ फल हो, (तत्) तो उससे (शरण्य) हे शरणागत प्रतिपालक! (त्वम् एव) आप ही (अत्र भुवने) इस लोक में और (भवान्तरे अपि) परलोक में भी (स्वामि) मेरे स्वामी (भूया:) होवें।

अर्थ - हे नाथ! आपकी स्तुति कर मैं आपसे अन्य किसी फल की चाह नहीं रखता, केवल यही चाहता हूँ कि भव-भवान्तरों में सदा आप ही मेरे स्वामी रहें, जिससे कि मैं आपको अपना आदर्श बनाकर अपने को आपके समान बना सवूँ।।४२।।

ॐ ह्रीं अशरणशरणाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

Oh Lord! if there can be any reward whatsoever for my having been devoted to Thy lotus-feet for a series of births, mayest Thou yield protection to me who have Thee as the only refuge (or Thee alone as the refuge) and mayest Thou alone be my master in this world and even in my future life (incarnations).

बन्धनमोचक एवं वैभववद्र्धक

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इत्थं समाहित-धियो विधिवज्जिनेन्द्र!

सान्द्रोल्लसत्पुलक-कञ्चुकिताङ्गभागा:।
त्वद्बिम्ब-निर्मल-मुखाम्बुज-बद्ध-लक्ष्या,

ये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्या:।।४३।।
हे जिनेन्द्र! तव रूप एकटक, देख-देख नहिं मन भरता।

रोम-रोम पुलकित हो जाता, जो विधिवत् सुमिरन करता।।
दिव्य विभव को देने वाले, रहते सदा अकिंचन हैं।

ऐसे पारस प्रभु के पद में, शीश झुकाकर वन्दन है।।४३।।

ॐ ह्रीं चित्तसमाधिसुसेविताय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

(आर्याछंद)

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जननयन ‘कुमुदचन्द्र’! प्रभास्वरा: स्वर्ग-सम्पदो भुक्त्वा।
ते विगलित-मल-निचया, अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते।।४४।।
जो जन नेत्र ‘कुमुद’ शशि की, किरणों का दिव्य प्रकाश भरें।

स्वर्गों के सुख भोग-भोग, कर्मों का शीघ्र विनाश करें।।
मोक्षधाम का द्वार खोलकर, सिद्धिप्रिया का वरण करें।

से पारस प्रभु को हम सब, शीश झुकाकर नमन करें।।४४।।

अन्वयार्थ - (जिनेन्द्र विभो!) हे जिनेन्द्रदेव! (ये भव्या:) जो भव्यजन (इत्थम्) इस तरह (समाहितधिय:) सावधानबुद्धि से युक्त हो (त्वद्बिम्बनिर्मल-मुखाम्बुजबद्धलक्ष्या:) आपके निर्मल मुख कमल पर बांधा है लक्ष्य जिन्होंने ऐसे (सान्द्रोल्लसत्पुलककञ्चुकितांगभागा:) सघन रूप से उठे हुए रोमांचों से व्याप्त है शरीर के अवयव जिनके ऐसे (सन्त:) होते हुए (विधिवत्) विधिपूर्वक (तव) आपका (संस्तवनम्) स्तोत्र (रचयन्ति) रचते हैं, (ते) वे (जननयनकुमुदचन्द्र) हे प्राणियों के नेत्ररूपी कुमुदों-कमलों को विकसित करने के लिए चन्द्रमा की तरह शोभायमान देव! (प्रभास्वरा:) दैदीप्यमान (स्वर्गसम्पद:) स्वर्ग की सम्पत्तियों को (भुक्त्वा) भोगकर (विगलित मलनिचया:) कर्मरूपी मल से रहित हो (अचिरात्) शीघ्र ही (मोक्षम् प्रपद्यन्ते) मुक्ति को पाते हैं।

अर्थ - हे जितेन्द्रिय जिनेश्वर! जो भव्यजन उपरोक्त प्रकार से प्रमादरहित होकर आपके देदीप्यमान मुखारविन्द की ओर टकटकी लगाकर और सघन तथा उठे हुए रोमांचरूपी वस्त्र पहिन कर विधिपूर्वक आपकी स्तुति करते हैं, वे भव्य देवलोक की सुखकर विविध सम्पत्तियों को भोग कर अष्टकर्मरूपी मल को आत्मा से दूर कर अविलम्ब अविनाशी मोक्ष सुख पाते हैं।।४३-४४।।

दोहा- इस स्तोत्र सुपाठ का, भाषामय अनुवाद ।

किया ‘‘चन्दनामति’’ सुखद, ले ज्ञानामृत स्वाद।।

ॐ ह्रीं परमशांतिविधायकाय श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

The poet sume up the paneggric and suggests his name.

Oh Lord of the Jinas! Oh Omni-potent Being! the Bhavyas who compose Thy hymn in accordance with the prescribed rules, with their mind thus concentrated, with portions of their body thickly covered up with hair standing erect and with their eyes (attention) fixed upon the pure face-lotus of Thy image, and whose heap of dirt is destroyed, attein in no time. Oh Moon (in opening) the night-lotuses (Kamuda-Chandra) (in the form) of eyes of human beings! salvation after enjoying the exceedingly brilliant prosperities of heaven.