कवलचान्द्रायण व्रत विधि

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कवलचान्द्रायण व्रत विधि

योऽमावास्योपवासी प्रतिपदि कवलाहारमात्र: पुरस्तात्।

तद्वृद्ध्या पौर्णमासीमुपवनयुतो न्हासयन्ग्रासमग्रे।।

सामावास्योपवास: स भजति तपसश्चंद्रगत्यानुपूर्व्या।

चार्व्या चांद्रायणस्य प्रविततयशस: कर्तृण: कर्तृभावं।।८।।

(जिनसेनाचार्य विरचित हरिवंश पु. सर्ग ३४) अर्थ—इस कवल चांद्रायण व्रत की विधि को जिनसेन स्वामी ने हरिवंश पुराण में इस प्रकार बताई है कि—अमावस्या को उपवास करके शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास, द्वितीया को दो ग्रास क्रमश: बढ़ते हुए चतुर्दशी को १४ ग्रास व पूर्णमासी को उपवास करके कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को १४ ग्रास दूज को १३ ऐसे चतुर्दशी को १ ग्रास लेवें व अमावस्या को उपवास करके प्रतिपदा को पारणा करें इस प्रकार चंद्र की कला के समान ग्रास की वृद्धि व हानिपूर्वक इस व्रत को करने वाले का चंद्रमा के समान यश वृद्धिंगत होता है।

‘‘व्रततिथि निर्णय में व किशनसिंहकृत क्रियाकोश में इस व्रत की विधि में कुछ अंतर है अर्थात् —अमावस्या को उपवास करके एकम से एक ग्रास से बढ़ते हुये पूर्णमासी को १५ ग्रास लेवें पुन: एकम को १४ ऐसे घटते हुए चतुर्दशी को १ ग्रास व अमावस्या को पारणा करें, व्रतों के दिन श्री चंद्रप्रभ भगवान का पंचामृताभिषेक करके नित्य पूजन, चंद्रप्रभ पूजन एवं जाप्य आदि करें। ऐसे ही दीप चान्द्रायण, धूप चान्द्रायण, फल व नैवेद्य चान्द्रायण भी होते हैं। अर्थात् १-१ दीप, धूप, फल व नैवेद्य के द्वारा वृद्धि करते हुए पूजन करें। जैसे—प्रतिपदा को १ दीपक से, दूज को दो दीपक से पूजन करें, इसी तरह वृद्धि व नंतर क्रमश: हानि करे। इस व्रत में जाप्य चन्द्रप्रभु भगवान की करें।

व्रत पूर्ण करके उद्यापन करें—इस कवल चांद्रायण का मंडल मांडकर सकलीकरण आदिपूर्वक विधिवत् अभिषेक करके मंडल पर जिनबिम्ब विराजमान करके उद्यापन पूजन करें, पूर्णार्घ्य के नंतर संकल्प, पुण्याहवाचन, शांति और विसर्जन करें व मंदिर में चंद्रोपक, शास्त्र, छत्र, चामर आदि उपकरण दान देवें और ३० श्रावकों को भोजन करावें तथा ३० श्रावकों के घर फल, मिष्ठान्न आदि बांटें और भी अपनी शक्ति के अनुसार रथयात्रा, पालकी, जलयात्रा आदि उत्सवों के द्वारा धर्मप्रभावना करें, चतुर्विध संघ का यथोचित पूजन दान आदि के द्वारा सत्कार करें।

यही उद्यापन की पूजन नित्य प्रति भी करते हैं, ३० अर्घ्यों में एकम के दिन १ अर्घ, दूज के दो ऐसे एक—एक बढ़ाते हुये ३० दिन तक ३० अर्घ्य पूर्ण होते हैं।