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कविवर परिमल

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                     हिंदी साहित्य के संवर्धन में जैन कवियों का विशिष्ट योगदान रहा है |उन्होंने इस काव्य वाटिका की शोभा को द्विगुणित किया है और हिंदी को जनप्रिय बनाया है |ऐसा ही एक ग्रन्थ वरहिया जाति के रत्न कुम्हरिया गौत्रोत्पन्न महाकवि परिमल्ल का 'श्रीपाल-चरित'है |
                                                                                          श्रीपाल का कथानक जैन जगत में बहुत लोकप्रिय है |श्रीपाल और मैना सुंदरी अटूट धर्म- निष्ठा और विश्वास का ऐसा अनुपम उदाहरण है जो धर्मप्राण लोगों को अक्षय उर्जा प्रदान करता रहा है |यही कारण है कि जैन कवियों और विद्वानों ने इस विषय पर अपनी लेखनी चलाई है लेकिन जितनी लोकप्रियता महाकवि परिमल के 'श्रीपाल-चरित' को मिली ,उतनी किसी अन्य विद्वान् की इस विषयक कृति को नहीं मिली |यही कारण है कि जैन शास्त्र भंडारों में परिमल के श्रीपाल-चरित की पांडुलिपियां सर्वाधिक संख्या में प्राप्त हुई हैं |
                                                                     'श्रीपाल-चरित' की भाषा व्रजभाषा है |चूँकि आगरा व्रजभाषा का केंद्र रहा है इसलिए कवि ने व्रजभाषा को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में चुना |इस विषय पर लिखी गई अन्य कृतियों के साथ कवि  परिमल कृत 'श्रीपाल-चरित'की तुलना करने पर यह कृति  भाषा ,काव्य और प्रस्तुति सभी दृष्टियों से अत्यंत प्रभावशाली है |कवि ने नायक नायिका के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं और उससे जुडी अंतर्कथाओं का बहुत प्रभावशाली और सहज बोधगम्य चित्रण किया है जो मनोमुग्धकारी है |कवि ने अपनी तूलिका से सभी पात्रों को जीवन्त कर दिया है |
                                                                  कविवर परिमल्ल 16वीं -17वीं शती के कवि हैं |उनका जन्म ग्वालियर में हुआ |यहीं उनका बाल्यकाल बीता और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा हुई |कविवर परिमल्ल के पिता का नाम आशकरण चौधरी था जो शास्त्रों के ज्ञाता और मर्मज्ञ थे |उनके प्रपितामह चन्दन चौधरी ग्वालियर के महाराजा मानसिंह (सन 1480-1516 ई.)द्वारा सम्मानित नगर श्रेष्ठी थे और उनका बहुत बहुमान था |कवि परिमल्ल ने अपने पूर्वजों का इस प्रकार उल्लेख किया है --
                                      गोवर गिरि गढ़ उत्तम थान,शूरवीर तहां राजा मान |
                                      ता आगे चन्दन चौधरी,कीरति सब जग में विस्तरी |
                                      जाति वरहिया गुन-गंभीर,अति प्रताप कुल राजे धीर |
                                      ता सुत रामदास परवीन,नंदन आशकरण शुभ दीन |
                                      ता सुत कुलमंडल परिमल्ल,बसे आगरा में तजि सल्ल |

कवि ने श्रीपाल-चरित की रचना मुग़ल बादशाह अकबर के काल में की है किन्तु उल्लेखनीय है कि व्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि परिमल्ल किसी के आश्रित नहीं थे |कवि ने रचना के प्रारंभ के काल का उल्लेख संवत 1651 अषाढ़ सुदी अष्टमी किया है --

                                     संवत सोलह सौ ऊपरे ,सावन इक्यावन आगरे |
                                     मास अषाढ़ पहुती आई ,वर्षा ऋतू को कहे बड़ाई |
                                     पक्ष उजालो आठे जान,शुक्कर वार पार परवान |
                                     कवि परिमल्ल शुद्ध करि चित्त,आराम्भ्यो श्रीपाल चरित्त ||