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कषायप्राभृत और चूर्णि सूत्रों के कर्ता

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कषायप्राभृत और चूर्णि सूत्रों के कर्ता

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(श्री गुणधर आचार्य एवं आचार्य श्री यतिवृषभ)

श्री वीरसेनस्वामी ने अपनी जयधवला टीका के प्रारंभ में मंगलाचरण करते हुए गुणधर भट्टारक, आर्यमंक्षु, नागहस्ति और यतिवृषभ नामक आचार्यों का निम्न शब्दों में स्मरण किया-

‘‘जेणिह कसायपाहुडमणेयणयमुज्जलं अणंतत्थं।

गाहाहि विवरियं तं गुणहरभडारयं वंदे।।६।।
गुणहरवयणविणिग्गयगाहाणत्थोवहारिओ सव्वो।
जेणज्जमंखुणा सो स णागहत्थी वरं देऊ।।७।।
जो अज्जामंखुसीसो अंतेवासी वि णागहत्थिस्स।
सो वित्तिसुत्तकत्ता जइवसहो मे वरं देऊ।।८।।

अर्थात्-‘‘जिन्होंने इस आर्यावर्त में अनेक नयों से युक्त, उज्ज्वल और अनंत पदार्थों से व्याप्त कषायप्राभृत का गाथाओं द्वारा व्याख्यान किया उन गुणधर भट्टारकों मैं वीरसेन आचार्य नमस्कार करता हूँ।।६।।

जिन आर्यमंक्षु आचार्य ने गुणधर आचार्य के मुख से प्रकट हुई गाथाओं के समस्त अर्आ का अवधारण किया, नागहस्ती आचार्यसहित वे आर्यमंक्षु आचार्य मुझे वर प्रदान करें।।७।।

जो आर्यमंक्षु आचार्य के शिष्य हैं और नागहस्ती आचार्य के अन्तेवासी हैं, वृत्तिसूत्र के कर्ता वे यतिवृषभ आचार्य मुझे वर प्रदान करें।।८।।’’

उक्त गाथाओं से स्पष्ट है कि कषायप्राभृत के रचयिता गुणधर हैं, उन्होंने गाथासूत्रों में कषायप्राभृत को निबद्ध किया था। उन गाथासूत्रों के समस्त अर्थ के जानने वाले आर्यमंक्षु और नागहस्ती नाम के आचार्य थे। उनसे अध्ययन करे यतिवृषभ ने कषायप्राभृत पर चूर्णिसूत्रों की रचना की थी। उक्त कषायप्राभृत और उस पर रचे गये चूर्णिसूत्रों पर ही भी वीरसेनस्वामी ने इस जयधवला नामक सिद्धांतग्रंथ की रचना की है, जैसा कि उनके निम्न प्रतिावाक्य से स्पष्ट है-

'‘‘णाणप्पवादामलदसमवत्थुतदियकसायपाहुडवहिजलणिवहप्पक्खालियमइणाणलोयणकलावपच्चक्खी-कयतिहुवणेण तिहुवणपरिपालएण गुणहरभडारएण तित्थवोच्छेदभयेणुवइट्ठगाहाणं अवगाहिय सयलपाहुडत्थाणं सचुण्णिसुत्ताणं विवरणं कस्सामो।’’

अर्थात्-ज्ञानप्रवाद नामक पूर्व की निर्दोष दसवीं वस्तु के तीसरे कषायप्राभृतरूपी समुद्र के जल समूह से धोए गए मतिज्ञान रूपी लोचनों से जिन्होंने त्रिभुवन को प्रत्यक्ष कर लिया है और जो तीनों लोकों के परिपालक हैं, उन गुणधर भट्टारक के द्वारा तीर्थ विच्छेद के भय से कही गर्इं गाथाओं का, जिनमें कि सम्पूर्ण कषायप्राभृत का अर्थ समाया हुआ है, चूर्णिसूत्रों के साथ मैं विवरण करता हू। इस प्रकार कषायप्राभृत और उस पर रचे गये चूर्णिसूत्रों का व्याख्यान करने वाले जयधवलाकार श्रीवीरसेन स्वामी के उक्त उल्लेखों से स्पष्ट है कि कषायप्राभृत के रचयिता श्रीगुणधर भट्टारक हैं और चूर्णिसूत्रों के रचयिता आचार्य यतिवृषभ हैं। जयधवलाकार के पश्चाद्भावी श्रुतावतारों के रचयिता आचार्य इन्द्रनन्दि और विबुध श्रीधर का भी ऐसा भी अभिप्राय है। जयधवला में जो चूर्णिसूत्र हैं उनमें न तो कषायप्राभृत के कर्ता का नपाम आता है और न चूर्णिसूत्रों के कर्ता का नाम आता है। किन्तु त्रिलोकप्रज्ञप्ति के अंत में दो गाथाएँ इस प्रकार पाई जाती हैं-

‘‘पणमह जिणवरवसहं गणहरवसहं तहेव गुणवसहं।

दट्ठूण परिसवसहं जदिवसहं धम्मसुत्तपाढरबस (वसहं)।।८०।।
चुण्णिसरूवत्थं करणसरूवपमाण होइ किं जत्तं।
अट्ठसहस्सपमाणं तिलोयपण्णत्तिणामाए।।८१।।

पहली गाथा में ग्रंथकार ने श्लेषरूप में अपना नाम दिया है और अपने नाम के अंत में बसहवृषभ शब्द होने से उसका अनुप्रास मिलाने के लिए द्वितीयाविभत्तयन्त सब शब्दों के अंत में वसह पद को स्थान दिया है। जिनवरवृषभ और गणधरवृषभ अर्थ तो स्पष्ट ही है। क्योंकि वृषभनाथ प्रथम तीर्थंकर थे और उनके प्रथम गणधर का नाम भी वृषभ ही था। किन्तु ‘गुणवसहं’ पद स्पष्ट नहीं है, यों तो ‘गुणवसहं’ को ‘गणहरवसहं’ का विशेषण किया जा सकता था, किन्तु यही गाथा जयधवला के सम्यक्त्व अनुयोगद्वार के प्रारंभ में मंगलाचरण के रूप में पाई जाती है और इससे उसमें कुछ अंतर है। गाथा इस प्रकार है-

‘‘पणमह जिणवरवसहं गणहरवसहं तहेव गुणहरवसहं।

दुसहपरीसहविसहं जइवसहं धम्मसुत्तपाढरवसहं।।’’

यहां ‘गुणवसहं’ के स्थान में ‘गुणहरवसहं’ पाठ पाया जाता है। जो गुणधराचार्य का बोध कराता है। अत: यदि ‘गुणवसहं’ का मतलब गुणधराचार्य से है तो स्पष्ट कि यतिवृषभ ने कषायप्राभृत के कर्ता गुणधराचार्य का उल्लेख किया है। और इस प्रकार उनके मत से भी इस बात की पुष्टि होती है कि कषायप्राभृत के कर्ता का नाम गुणधर था। क्योंकि किसी दूसरे गुणधराचार्य की तो कोई अस्तित्व पाया ही नहीं जाता है, और यदि हो भी तो उनको स्मरण करने का उन्हें प्रयोजन भी क्या था? दूसरी गाथा का पहला पाद यद्यपि सदोष प्रतीत होता है फिर भी किसी किसी प्रति में ‘त्थं करण’ के स्थान में ‘छक्करण’ पाठ भी पाया जाता है। और इस पर से यह अर्थ किया जाता है कि चूर्णिसूत्र और छक्करण स्वरूप ग्रंथों का जितना प्रमाण है उतना ही अर्थात् आठ हजार श्लोक प्रमाण त्रिलोकप्रज्ञप्ति का है। यहाँ ‘चूर्णि’ पद से ग्रंथकार सम्भवत: कषायप्राभृत पर रचे गये अपने चूर्णिसूत्रों का उल्लेख करते हैं। अत: उससे प्रमाणित होता है कि त्रिलोकप्रज्ञप्ति के रययिता आचार्य यतिवृषभ ही चूर्णिसूत्रों के भी रचयिता हैं।

कसायप्राभृत की कुल गाथाएँ २३१ हैं, यह हम पहले लिख आये हैं, किन्तु दूसरी गाथा ‘गाहासदे असीदे’ के आदि में ग्रंथकार ने १८० गाथाओं के ही रचने की प्रतिज्ञा की है। इस पर कुछ आचार्यों का मत है कि १८० गाथाओं के सिवाय १२ संबंधितगाथाएँ, ६ अद्धापरिमाणनिर्देशन से संबंध रखने वाली गाथाएँ, और ३५ संक्रम संबंधी गाथाएँ नागहस्ति आचार्य की बनाई हुई हैं। इसलिये ‘गाहासदे असीदे’ आदि जो प्रतिज्ञा है वह नागहस्ति आचार्य ने की है। किन्तु जयधवलाकार इस मत से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि ‘उक्त ५३ गाथाओं का कर्ता यदि नागहस्ति आचार्य को माना जायेगा तो ऐसी अवस्था में गुणधराचार्य अल्पज्ञ ठहरेंगे। अत: २३३ गाथाओं के होते हुए भी जो ‘गाहासदे असीदे’ आदि प्रतिज्ञा की है वह पंद्रह अधिकारों में से अमुक अमुक अधिकार में इतनी इतनी गाथाएँ हैं यह बतलाने के लिए की है। अर्थात् ‘गाहासदे असीदे’ के द्वारा ग्रंथकार ने कषायप्राभृत की कुल गाथाओं का निर्देश नहीं किया है किन्तु जो गाथाएँ पंद्रह अधिकारों से संबंध रखती हैं उनका ही निर्देश किया है। और ऐसी गाथाएँ १८० हैं। शेष ५३ गाथाओं में से १२ संबंध गाथाएँ किसी एक अधिकार से सम्बद्ध नहीं है क्योंकि ये गाथाएँ अमुक अमुक अधिकार से संबंध रखने वालीं गाथाओं का निदे्रश करती है। अद्धापरिमाणनिर्देश से संबंध रखने वाली ६ गाथाएँ भी किसी एक अधिकार से सम्बद्ध नहीं है क्योंकि अद्धापरिमाणनिर्देश न तो कोई स्वतंत्र अधिकार है औन न किसी एक अधिकार का ही अंग है। रह जाती हैं शेष ३५ गाथाएँ, सो ये गाथाएँ तीन गाथाओं मे कहे गये पाँच अधिकारों में से बंधक नाम के अधिकार में प्रतिबद्ध हैं अत: उनको भी १८० में सम्मिलित नहीं किया है।’’

जयधवलाकार श्री वीरसेन स्वामी का उक्त समाधान यद्यपि हृदय को लगता है फिर भी यह जिज्ञासा बनी ही रहती है कि जब संक्रमवृत्ति संबंधी ३५ गाथाएँ बंधक अधिकार से सम्बद्ध हैं तो उनको १८० में सम्मिलित क्यों नहीं किया? यहाँ एक बात यह भी ध्यान देने योग्य है कि श्री वीरसेनस्वामी ने जयधवला में जहाँ कहीं कसायपाहुड की गाथाओं का निर्देश किया है वहाँ १८० का ही निर्देश किया है, समस्त गाथाओं की गिनती कराने के सिवा अन्यत्र कहीं भी २३३ गाथाओं का उल्लेख हमारे देखने में नहीं आया। जब कि १८० का उल्लेख इसी खण्ड में अनेक जगह आता है। यहाँ यह स्मरण दिला देना अनुचित न होगा कि श्वेताम्बरगंरथ कर्मप्रकृति में कषायप्राभृत की जो अनेक गाथाएँ पाई जाती हैं वे संक्रमवृत्ति सम्बन्धी इन ३५ गाथाओं में से ही पाई जाती हैं। और कुछ आचार्य इनका कर्ता नागहस्ति आचार्य को मानते हैं। श्वेतामबर सम्प्रदाय में वाचकवंश के प्रस्तापक और कर्म प्रकृति के वेत्ता एक नागहस्ति आचार्य का नाम आता है जैसा कि हम आगे बतलायेंगे। शायद इसी लिये तो संक्रमवृत्ति संबंधी कुछ गाथाएँ उधर नहीं पार्इं जाती है? अस्तु, जो कुछ हो। किन्तु इतना स्पष्ट है कि सायपाहुड की १८० गाथाओं के संबंध में तो उनके रचयिता को लेकर कोई मतभेद नहीं था, सभी उनका कर्ता गुणधर आचार्य को मानते थे। किन्तु शेष ५३ गाथाओं के रचयिता के संबंध में मतभेद था। कुछ आचार्य उनका कर्ता नागहस्ति आचार्य को मानते थे और कुछ गुणधराचार्य को ही मानते थे। आचार्य यतिवृषभ का इस बारे में क्या मत था यह उनके चूर्णिसूत्रों से ज्ञात नहीं होता।

कसायपाहुड के रचयिता आचार्य गुणधर के संबंध में यदि कुछ थोड़ा बहुत ज्ञात हो सकता है तो वह केवल जयधवला और श्रुतावतारों से ही ज्ञात हो सकता है। अन्यत्र उनका कुछ भी उल्लेख नहीं पाया जाता। श्वेताम्बर परम्परा में भी इस नाम के किसी आचार्य के होने का कोई संकेत नहीं मिलता। जयधवला भी केवल इतना ही बतलायी है कि महावीर भगवान के निर्वाणलाभ के पश्चात् ६८३ वर्ष बीत जाने पर भरतक्षेत्र में जब सभी आचार्य सभी अंगों और पूर्वाे के एदेश के धारक होने लगे तो अंगों और पूर्वो का एकदेश आचार्यपरम्परा से गुणधर को प्राप्त हुआ। वे ज्ञानप्रवाद नामक पंचम पूर्व के दसवें वस्तु अधिकार के अंतर्गत तीसरे कसायपाहुडरूपी समुद्र के पारगामी थे। अंगज्ञान का दिन पर लोप होते हुए देखकर उन्होंने श्रुत का विनाश हो जाने के भय से प्रवचनवात्सल्य से प्रेरित होकर प्रकृत कषायप्राभृत का उद्धार किया।

भगवान महावीररूपी हिमाचल से उद्भत होकर द्वादशांगवाणी रूपी गंगा जिसप्रकार प्रवाहित होती हुई आचार्य गुणधर को प्राप्त हुई उसका वर्णन करते हुए जयधवलाकार ने लिखा है-

‘भगवान महावीर ने अपने गणधर आर्य इंद्रभूति गौतम को अर्थ का उपदेश किया। गौतम गणधर न उस अर्थ का अवधारण करके उसी समय द्वादशांग की रचना की और सुधर्माचार्य को उसका व्याख्यान किया। कुछ काल के पश्चात् इन्द्रभूति गणधर केवलज्ञान को प्राप्त करके और बारह वर्ष तक केवलरूपी से विहार करके मोक्ष को चले गये। जिस दिन वे मुक्त हुए उसी दिन सुधर्मस्वामी जम्बूस्वामी आदि अनेक आचार्यों को द्वादशांग का व्याख्यान करके केवली हुए और बारह वर्ष तक विहार करके मोक्ष को प्राप्त हुए। उसी दिन जम्बूस्वामी विष्णु आचार्य आदि अनेक ऋषियों को द्वादशांग व्याख्यान करके केवली हुए और अड़तीस वर्ष तक विहार करके मोक्ष को प्राप्त हुए। ये इस अवसर्पिणीकाल में अंतिम केवली हुए।

‘इनके मोक्ष चले जाने पर सकल सिद्धांत के ज्ञाता विष्णु आचार्य नन्दिमित्रआचार्य को द्वादशांग समर्पित करके देवलोक को चले गये। पुन: इसी क्रम से अपराजित, गोवद्र्धन और भद्रबाहु ये तीन श्रुतकेवली और हुए। इन पाँचों ही श्रुतकेवलियों का काल सौ वर्ष है। उसके बाद भद्रबाहु भगवान के स्वर्ग चले जाने पर सकल श्रुतज्ञान का विच्छेद हो गया। किन्तु विशाखाचार्य आचार आदि ग्यारह अंगों के और उत्पाद पूर्व आदि दस पूर्वों के तथा प्रत्याख्यान, प्राणावाय, क्रियाविशाल और लोकबिन्दुसार इस चार पूर्वो के एकदेश के धारक हुए। पुन: अविच्छिन्न सन्तानरूप से प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जयसेन, नागसेन, सिद्धार्थ, धुतिसेन, विजय, बुद्धिल्ल, गंगदेव और धर्मसेन ये ग्यारह मुनिजन दस पूर्वों के धारी हुए। उनका काल एक सौ तेरासी वर्ष होता है। भगवान धर्मसेन के स्वर्र्ग चले जाने पर भारतवर्ष में दस पूर्वों का विच्छेद हो गया। किन्तु इनती विशेषता है कि नक्षत्राचार्य, जसपाल, पांडु, ध्रुवसेन, वंâसाचार्य ये पाँच मुनिजन ग्यारह अंग के धारी और चौदह पूर्वों के एक देश के धारी हुए। इकना काल दो सौ बीस वर्ष होता है। पुन: ग्यारह अंगों के धारी वंâसाचार्य के स्वर्ग चले जाने पर भरतक्षेत्र में कोई भी ग्यारह अंग का धारी नहीं रहा।’

‘किन्तु उसी समय परम्परा से सुभद्र, यशोभद्र, यशोबाहु और लोहार्य ये चार आचार्य आचारां के धारी और शेष अंगों और पूर्वों के एकदेश के धारी हुए। इन आचारांगधारियों का काल एकसौ अठारह वर्ष होता है। लोहाचार्य के स्वर्ग चले जाने पर आचारांग का विच्छेद हो गया। इन सब आचार्यों के कालों का जोड़ ६८३ वर्ष होता है।

‘उसके बाद अंगों और पूर्वों का एकदेश ही आचार्यपरम्परा से आकर गुणधराचार्य को प्राप्त हुआ। पुन: उन गुणधर भट्टारक ने, जो ज्ञानप्रवाद नामक पंचम पूर्व के दसवें वस्तु अधिकार के अंतर्गत तीसरे कषायप्राभृत के पारंगत थे, प्रवचनवात्सल्य के वशीभूत होकर ग्रंथ के विच्छेद के भय से सोलह हजार पद प्रमाण पेज्जदोसपाहुड का एकसौ अस्सी गाथाओं के द्वारा उपसंहार किया। पुन: वे ही सूत्रगाथाएँ आचार्यपरम्परा से आती हुर्इं आर्यमंक्षु और नागहस्ती आचार्य को प्राप्त हुई। उनके उन एकसौ अस्सी गाथाओं को भले प्रकार श्रवण करके प्रवचनवत्सल यतिवृषभ भट्टारक ने उन पर चूर्णिसूत्रों की रचना की। श्री वीरसेन स्वामी के उक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि भगवान महावीर के निर्वाणलाभ करने के पश्चात् ६८३ वर्ष तक अंगज्ञान की प्रवृत्ति रही। उसके बाद गुणधर भट्टारक हुए। उन्हें आचार्यपरम्परा के अंग और पूर्वां का एक देश प्राप्त हुआ। ग्रंथविच्छेद के भय से उन्होंने ज्ञानप्रवाद पूर्व के तीसरे वस्तु अधिकार के अंतर्गत कसायपाहुड को संक्षिप्त करके उसे १८० गाथाओं में निबद्ध किया।

श्री वीरसेन स्वामी के पश्चात् के आचार्य इंद्रनन्दि ने भी अपने श्रुतावतार में कषायप्राभृत की उत्पत्ति का विवरण दिया है। प्रारंभ में उन्होंने भी महावीर के पश्चात् होने वाले अंगज्ञान के धारक आचार्यों की परम्परा देकर ६८३ वर्ष तक अंगज्ञान की प्रवृत्ति बतलाई है। उसके बाद कुछ अन्य आचार्यों का उल्लेख करके उन धरसेन स्वामी का अस्तित्व बतलाया है, जिनसे अध्ययन करके आचार्य पुष्पदंत और भूतबलि ने षट्खंडागम को रचना की थी। षट्खंडागम की रचना का इतिवृत्त देकर उन्होंने कषायप्राभृत सूत्र की उत्पत्ति का वर्णन करने की प्रतिज्ञा की है और उसके आगे लिखा है कि ज्ञानप्रवाद नामक पंचम पूर्व के दसवें वस्तु अधिकार के अंतर्गत तीसरे प्राभृत के ज्ञाता गुणधर मुनीन्द्र हुए। यद्यपि इन्द्रनन्दि ने यह स्पष्ट नहीं लिखा कि भगवान महावीर के पश्चात् कब गुणधर आचार्य हुए। किन्तु उनके वर्णन से भी यही प्रकट होता है अंगज्ञानियों की परम्परा के पश्चात् ही गुणधराचार्य हुए हैं। कितने काल पश्चात् हुए हैं इसका भी कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलतां यदि गुणधराचाय्र की गुरुपरम्परा का कुछ पता चल जाता तो उस पर से भी सहायता मिल सकती थी। किन्तु इद्रनन्दि अपने श्रुतावतार में स्पष्ट लिखते हैं-

‘‘गुणधरधरसेनान्वयगुर्वो: पूर्वापरकमोऽस्माभि:।

न ज्ञायते तदन्वयकथकागममुनिजनाभावात्।।१५१।।’’

अर्थात्-गुणधर और धरसेन क गुरुवंश का पूर्वापरक्रम हम नहीं जानते हैं, क्योंकि उनके अन्वय के कहने वाले आगम और मुनिजनों का अभाव है। श्रीयुत पं. नाथूराम जी प्रेमी का अनुमान है कि श्रुतावतार के कर्ता वे ही इन्द्रनन्दि हैं जिनका उल्लेख आचार्य नेमिचंद्र ने गोम्मटसार कर्मकाण्ड की ३९६ वीं गाथा में गुरुरूप से किया है। उनके इस अनुमान का आधार क्या है? यह तो उन्होंने नहीं बतलाया। सम्भवत: श्रुतावतार का यथासम्भव जो प्रमाणिक वर्णन इन्द्रनन्दि ने दिया है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण उक्त श्लोक है उसी के आधार पर प्रेमी जाने उक्त अनुमान किया हो। अस्तु, जो कुछ हो, किन्तु यह निश्चित है कि धवला और जयधवला के रयचिता श्री वीरसेनस्वामी भी धरसेन और गुणधर आचार्य की गुरुपरम्परा से अपरिचित थे। सम्भवत: उनके समय में भी इन दोनों आचार्यों की गुरुपरम्परा को कहने वाला कोई आगम या मुनिजन नहीं थे। अन्यथा वे धवला और जयधवला के प्रारंभ में श्रुतावतार का इतिवृत्त लिखते हुए उसे अवश्य निबद्ध करते। अत: जब षट्खंडागम और कषायप्राभृत के आदरणीय टीकाकार ने ही उक्त दोनों आचार्यों की गुरुपरम्परा के बारे में कुछ भी नहीं लिखा तो उसके पश्चाद्भावी इन्द्रनन्दि को यदि यह लिखना पड़े कि हम गुणधर और धरसेन की गुरुपरम्परा को नहीं जानते हैं तो इसमें अचरज ही क्या है? जयधवला में एक स्थान पर गुणधर को वाचक लिखा है। यथा-

वाचक शब्द वाचना से बना है। और ग्रंथ, उसके अर्थ अथवा दोनों का देना वाचना कहलाता है। अर्थात् जो साधु शिष्यों को ग्रंथदान और अर्थदान करते थे उन्हें शास्त्राभ्यास कराते थे वे वाचक कहे जाते थे। वाचकशब्द का यौगिक अर्थ ते इतना ही है। श्वेताम्बर साहित्य में भी वाचक का यही अर्थ किया है। किन्तु ऐसाा प्रतीत होता है कि वाचक एक पद था और वह पद उन आचार्यों को दिया जाता था जो अंगों और पूर्वों के पठन पाठन में रत रहते थे। इस वाचकाचार्यों के द्वारा ही अर्थ और सूत्ररूप प्रवचन शिष्यशिष्य परम्परा से प्रवाहित होता था। श्वेताम्बर परम्परा में तो वाचक का अर्थ ही पूर्ववित् रूढ़ हो गया है। जो मुनि पूर्वग्रंथों का जानकर होता था उसे ही वाचक कहा जाता था। आचार्य गुणधर भी पूर्ववित् थे सम्भवत: इसीलिये के वाचक कहे जाते थे। जयधवला में लिखा है कि गुणधराचार्य के द्वारा रची गर्इं गाथाएँ आचार्य परम्परा से आकर आर्यमंक्षु और नागहस्ती आचार्यों को प्राप्त हुर्इं। इन दोनों आचार्यों के मंतों का उल्लेख जयधवला में अनेक जगह आता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जयधवला के सामने इन दोनों आचार्यों की कोई कृति मौजूद थी या उन्हें गुरुपरम्परा से इन दोनों आचार्यों के मत प्राप्त हुए थे। क्योंकि ऐसा हुए बिना निश्चित रीति से अमुक अमुक विषयों पर दोनों के जुदे जुदे मतों का इस प्रकार उल्लेख करना संभव प्रतीत नहीं होता। इन दोनों में आर्चमंक्षु जेठे मालूम होते हैं क्योंकि सब जगह उन्हीं का पहले उल्लेख किया गया है। किन्तु जेठे होने पर भी आर्यमंक्षु के उपदेश को अपवाइज्जमाण और नागहस्ती के उपदेश को पवाइज्जमाण कहा है। जो उपदेश सर्वाचार्ययम्मत होता है और चिरकाल से अविच्छिन्न सम्प्रदाय के क्रम से चला आता हुआ शिष्यपरम्परा के द्वारा लाया जाता है वह पत्राइज्जमाण कहा जाता है। अर्थात् आर्यमंक्षु का उपदेस सर्वचार्यसम्मत और अविच्छनन सम्प्रदाय के क्रम से आया हुआ नहीं था किन्तु नागहस्ती आचार्य का उपदेश सर्वाचार्यसम्मत और अविच्छिन्न सम्प्रदाय के क्रम से चला आया हुआ था। पश्चिम स्वंâध में एक जगह इसीप्रकार दोनों आचार्यों के मतों का उल्लेख करते हुए जयधवलाकार ने लिखा है।

‘‘एत्थ दुहे अवएसा अत्थि त्ति के वि भणंति। तं कथम्? महावाचयाणमज्जमंखुखवणाणमुवदेसेण लोगे पूरिदे आउगसमं णामागोदवेदणीयाण् ट्ठिदिसंतकम्मं ठवेदि। महावाचयाणं णागहत्थिखवणाणमुवएसेण लोगे पूरिदे णामागोदवेयणीयाणं ट्ठिदिसंतकम्ममंतोमुहुत्तपमाणं होदि। होतं पि आउगादो संखेज्जगुणमेत्तं ठवेदित्ति। णवरि एसो वक्खाणसंपदाओ चुण्णिसुत्तविरुद्धो। चुण्णि सुत्त मुत्तकंठमेव संखेज्जमुणमाउआदो त्ति णिद्दिट्ठत्तादो। तदो पवाइज्जंतोवएसो एसो चेव पहाणभावेणावलंबेयव्वो।।’’ प्रे. का. पृ. ७५८१।।

अर्थात्-इस विषय में दो उपदेश पाये जाते हैं। वे उपदेश इस प्रकार हैं-महावाचक आर्यमंक्षु क्षपण के उपदेश से लोकपूरण करने पर नाम, गोत्र और वेदनीय कर्म की स्थिति को आयु के समान करता है। और महावाचक नागहस्ती क्षपण के उपदेश से लोकपूरण करने पर, नाम, गोत्र और वेदनीय कर्म की स्थिति अंतमुर्हूत प्रमाण करता है। अंतमुर्हूत प्रमाण करने पर भी आयु से संख्यातगुणीमात्र करता है। इन दोनों उपदेशों में से पहला उपदेश चूर्णिसूत्र से विरुद्ध है क्योंकि चूर्णिसूत्र में स्पष्ट ही ‘संखेज्जगुणमाउआदो’ ऐसा कहा है। अत: दूसरा जो पवाइज्जंत उपदेश है उसी का मुख्यता से अवलम्बन करना चाहिए। यद्यपि सम्यक्त्व अनुयोगद्वार में दोनों के ही उपदेशों का पवाइज्जंत कहा है। यथा-

‘‘पवाइज्जंतेण पुण उवएसेण सव्वाइरियसम्मदेण अज्जमंखुणागहत्थिमहावाचयमुहकमलविणिग्गयेण सम्मत्तस्स अट्ठवस्साणि।।’’ प्रे. पृ. ६२६१।

किन्तु इसका कारण यह मालूम होता है कि यहाँ दोनों आचार्यों में मतभेद नहीं है। अर्थात् आर्यमंक्षु का भी वही मत है जो नागहस्ती का है। यदि आर्यमंक्षु का मत नागहस्ती के प्रतिवूâल होता है तो यहाँ भी उसे अपवाइज्जंत ही कहा जाता। अत: यह स्पष्ट है कि जेठे होने पर भी आर्यमंक्षु की अपेक्षा प्राय: नागहस्ती का मत ही सर्वाचार्यसम्मत माना जाता था, कम से कम जयधवलाकार को तो यही इष्ट था। इन दोनों आचार्यों को भी जयधवलाकार ने महावाचक लिखा है और इन दोनों आचार्यों का भी उल्लेख धवला, जयधवला और श्रुतावतार के सिवाय उपलबध दिगम्बर साहित्य में अन्यत्र नहीं पाया जाता है। किन्तु कुछ श्वेताम्बर पट्टावलियों में अज्जमंगु और अज्जनागहत्थी का उल्लेख मिलता है। नन्दिसूत्र की पट्टावली में अज्जमंगु को नमस्कार करते हुए लिखा है-

‘‘भणणं करगं झरगं पभावगं णाणदंसणगुणाणं।

वंदामि अज्जमंगु सुयसागरपारगं धीरं।।२८।।

अर्थात्-सूत्रों का कथन करने वाले, उनमें कहे गये आचार का पालन करने वाले, ध्यानी, ज्ञान और दर्शन गुणों के प्रभावक तथा श्रुतसमुद्र के पारगामी धीर आर्यमंगु को नमस्कार करता हूँ। आगे नागहस्ती का स्मरण करते हुए लिखा है-

‘‘बड्ढउ वायगवंसो जसवंसो अज्जणागहत्थीणं।

वागरणकरणभंगियकम्मपयडीपहाणाणं।।३०।।

अर्थात्-व्याकरण, करण, चतुर्भंगी आदि के निरूपण शास्त्र तथा कर्मप्रकृति में प्रधान आर्य नागहस्ती का यशस्त्री वाचक वंश बढ़े। नन्दिसूत्र में आर्यमंगु के पश्चात् कार्य नन्दिल का स्मरण किया है और उसके पश्वात् नागहस्ती का। नन्दिसूत्र की चूर्णि तथा हारिभद्रीय वृत्ति में भी यही क्रम पाया जाता है। तथा दोनों में आर्यमंगु का शिष्य आर्यनन्दिल का शिष्य नागहस्ती को बतलाया है। यथा-

‘‘आर्यमंगुशिष्यं आर्यनंदिलक्षपणं शिरसां वंदे। आर्यनंदिलक्षपणशिष्याणां आर्यनागहस्तीगां।’ हा. वृ.।

इससे आर्यमंगु के प्रशिष्य आर्यनागहस्ति थे ऐसा प्रमाणित होता है। तथा नागहस्ति को कर्मप्रकृति के प्रधान बतलाया है और उनके वाचक वंश की वृद्धि की कामना की। कुछ श्वेताम्बरीय ग्रंथों में आर्यमंगु की एक कथा भी मिलती है जिसमें लिखा है कि वे मथुरा में जाकर भ्रष्ट हो गये थे। नागहस्ती को वाचकवंश का प्रस्थापक भी बतलाया है इससे स्पष्ट है कि वे वाचक जरूर थे तभी तो उनकी शिष्य परम्परा वाचक कहलाई। इन सब बातें पर दृष्टि देने से तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्वेताम्बर परम्परा के आर्यमंगु और नागहस्ती तथा धवला जयधवला के महावाचक आर्यमंक्षु और महावाचक नागहस्ति सम्भवत: एक ही हैं किन्तु मुनि कल्याणविजय जी कहना है कि आर्यमंगु और आर्यनन्दिल के बीच में चार आचार्य और हो गये हैं। उनका यह भी कहना है कि नन्दिसूत्र की पट्टावली में आर्यमंगू और आर्यनन्दिल के बीच में होने वाले उन चार आचार्यों के संबंध की दो गाथाएँ छूट गई हैं जो अन्यत्र मिलती है। अपने इस मत की पुाqष्ट में उनका कहना है कि आर्यमंगु का युगप्रधानत्व वीर नि. सम्वत् ४५१ से ४७० तक था। परन्तु आर्यनन्दिल का समय आर्यमंगु से बहुत पीछे का है क्योंकि वे आर्यरक्षित के पश्चात् भावी स्थविर थैं, और आर्यरक्षित का स्वर्गवास वीर नि. संवत् ५९७ में हुआ था। इसलिये आर्यनंदिल ५९७ के पीछे के स्थविर हो सकते हैं। इस प्रकार मुनिजी की कालगणाना के अनुसार आर्यमंगु और आर्यनन्दिल के बीच में १२७ वर्ष का अंतर रहता है। और उसमें आर्यनन्दिल का समय और जोड़ देने पर आर्यमंगु और नागहस्ति के बीच में १५० वर्ष के लगभग अंतर बैठता है। अत: आर्यमंगु और नागहस्ति समकालीन व्यक्ति नहीं हो सकते। किन्तु जयधवलाकार चूर्णिसूत्रों के कर्ता आचार्य यतिवृषभ को दोनों का शिष्य बतलाते हैं। यथा-

‘‘जो अज्जमंखुसिस्सो अंतेवासी वि नागहत्थिस्स।

सो वित्तिसुत्तकत्ता जइवसहो मे वरं देउ।।

समय की इस समस्या को सुलझाने के लिए यतिवृषभ को आर्यमंक्षु परम्पराशिष्य और आय नागहस्ति का साक्षात् शिष्य मान लिया जा सकता था और ऐसा मानने में जयधवलाकार के उक्त उल्लेख से कोई विरोध नहीं आता था। क्योंकि वे यतिवृषभ को आर्यमंक्षु का शिष्य और नागहस्ति का अन्तेवासी बतलाते हैं। यद्यपि साधारण तौर पर शिष्य और अंतेवासी का एक ही अर्थ माना जाता है। फिर भी अन्तेवासी का शब्दार्थ निकट में रहने वाला भी होता है और इसलिये नागहस्ति का उन्हें निकटवर्ती साक्षात् शिष्य और आर्यमंक्षु का शिष्य-परम्परा शिष्य मान लिया जा सकता था। किन्तु उससे भी समस्या नहीं सुझलती है। क्योंकि जयधवलाकार का कहना है कि गुणधररचित गाथाएँ आचार्य परम्परा से आकर आर्यमंक्षु और नागहस्ति आचार्य को प्राप्त हुर्इं और गुणधर आचार्य अंगज्ञानियों की परम्परा के पश्चात् अर्थात् वीर नि. सम्वत् ६८३ के बाद में हुए। अब यदि आर्यमंक्षु का अन्त वी. सं. ४७० में ही हो जाता है तो उन्हें तो गुणधर की गाथाएँ प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि गुणधर का समय उनसे दो सौ वर्ष से भी बाद में पड़ता है। रह जाते हैं नागहस्ति। उनका युगप्रधानत्वकाल श्वेताम्बर परम्परा में ६९ वर्ष माना गय है। अत: यदि वे वी. नि. सं. ६२० में पट्टासीन होते हैं तो उनका समय ६८६ तक जाता है यदि गुणधर को वी.नि.सं. ६८३ के लगभग ही विद्वान् मानकर सीधे गुणधर से ही नागहस्ति को कसायपाहुड की प्राप्ति हुई मान जी जाय जैसा कि इन्दनन्दि का मत है तो गुणधर और नागहस्ति का पौर्वापर्य ठीक बैठ जाता है। किन्तु उसमें एक दूसरी अड़चन उपस्थित हो जाती है।

जयधवलाकार और इन्दनन्दि दोनों का कहना हे कि आर्यमंक्षु और नागहस्ति के पास में कषायप्राभृत का अध्ययन करके आचार्य यतिवृषभ ने उन पर चूर्णिसूत्र रचे। किन्तु आचार्य यतिवृषभ समय, जैसा कि हम आगे बतलायेंगे, वी.नि.सं. १००० के लगभग बैठता है। अत: यदि जयधवला के आर्यमंक्षु और नागहस्ति का श्वेताम्बर परम्परा के आर्यमंगु और नागहस्ति माना जाता है तो गुणधर, आर्यमंक्षु और नागहस्ति तथा यतिवृषभ का वह पौवापर्य नहीं बैठता जिसका उल्लेख जयधवलाकार ने किया है और जा श्रुतवातार के कर्ता इन्द्रनन्दि को भी अभीष्ट है। उनका ऐक्य मानने से गुणधर और नागहस्ति का पौर्वापर्य बन जाने पर भी कम से कम आर्यमंक्षु और नागहस्ति तथा यतिवृषभ गुरुशिष्यभाव तो छोड़ना ही पड़ता है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि स्वयं यतिवृषभ इस तरह का कोई उल्लेख नहीं करते हैं। उन्होंने अपने गुरु का या कषायपाहुड सूत्र की प्राप्ति होने का कोई उल्लेख नहीं किया। अपने चूर्णिसूत्रों में वे पवाइज्जमाण और अपवाइज्जमाण उपदेशों का निर्देश अवश्य करते हैं किन्तु किसका उपदेश पवाइज्जमाण है और किसका उपदेश अपवाइज्जमाण है इसकी कोई चर्चा नहीं करते। यह चरचा करते हैं जयधवलाकार श्री वीरसेन स्वामी, जिन्हें इस विषय में अवश्य ही अपने पूर्व के अन्य टीकाकारों का उपदेश प्राप्त था। ऐसी अवस्था में एकदम यह भी कह देना शक्य नहीं है कि आर्यमंक्षु नागहस्ति और यतिवृषभ के गुरुशिष्य भाव की कल्पना भ्रान्त है। तब क्या दिगम्बर परम्परा में इन नामों के कोई पृथक ही आचार्य हुए हैं जो महावाचक और क्षमाश्रमण जैसी उपाधियों के विभूषित थे? किन्तु इसका भी कहीं अन्यत्र से समर्थन नहीं होता है।

हमने जो ऊपर जो यतिवृषभ का समय बतलाया है वह त्रिलोकप्रज्ञप्ति और चूर्णिसूत्रों के रचयिता यतिवृषभ को एक मानकर उनकी त्रिलोकप्रज्ञप्ति के आधार पर लिख है। यदि यह कल्पना की जाये कि चूर्णिसूत्रकार यतिवृषभ कोई दूसरे व्यक्ति थे जो नागहस्ति के समकालीन थे तो जयधवलाकार के उल्लेख की संगति ठीक बैठ जाती है किन्तु इस नाम के दो आचार्यों के होने का भी अभी तक कोई उल्लेख प्राप्त नहीं हो सका है। दूसरे त्रिलोकप्रज्ञप्ति के अंत की एक गाथा के चूर्णिसूत्र और गुणधर का उल्लेख पाया जाता है। अत: दोनों के कर्ता के यतिवृषभ नहीं सकते। गुणधर, आर्यमंक्षु और नागहस्ति तथा यतिवृषभ के पौर्वापर्य की इस चर्चा की बीच में ही छोड़ कर हम आगे यतिवृषभ के समय का विचार करेंगे।

आचार्य यतिवृषभ अपने समय के एक बहुत ही समर्थ विद्वान थे। उनके चूर्णिसूत्र और त्रिलोकप्रज्ञप्ति नामक ग्रंथ की उनकी विद्वत्ता की साक्षी के लिये पर्याप्त हैं। जयधवलाकार ने जयधवला में जगह जगह जो उनके मान्तव्यों की चर्चा की है, और चर्चा करते हुए उनके वचनों से यतिवृषभ के प्रति जो आदर और श्रद्धा टपकती हैं उन सबसे भी इस बात का समर्थन होता है। उदाहरण के लिए यहाँ एक दो प्रसंग उद्धत किये जाते हैं।

जयधवलाकार की यह शैली है कि वे अपने प्रत्येक कथन की साक्षी में प्रमाण दिये विना आगे नहीं बढ़ते। एक जगह कुछ चर्चा कर चुकने पर शंकाकार उनसे प्रश्न करता है कि आपने यह वैâसे जाना? तो उनका उत्तर देते है कि यतिवृषभ आचार्य के मुखकमल से निकले हुए इसी चूर्णिसूत्र से जाना। इस पर शंकाकार पुन: प्रश्न करता है कि चूर्णिसूत्र मिथ्या क्यों नहीं हो सकता? तो उसका उत्तर देते हैं कि राग द्वेष और मोह का अभाव होने से यतिवृषभ के वचन प्रमाण हैं, वे असत्य नहीं हो सकता। कितना सीधा सादा और भावपूर्या समाधान है।

इसी प्रकार के एक दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा है-विपुलाचल के शिखर पर स्थित महावीररूपी दिवाकर से निकलकर गौतम, लोहार्य, जम्बूस्वामी आदि आचार्यपरम्परा से आकर, गुणधराचार्य को प्राप्त होकर गाथा रूप से परिणत हो पुन: आर्यमंक्षु-नागहस्ति के द्वार यतिवृषभ के मुख से चूर्णिसूत्र रूप से परिणत हुई दिव्यध्वनिरूपी किरणों से हमने ऐसा जाना है।

यतिवृषभ की वीतरागता और उनके वचनों की भगवान महावीर की दिव्यध्वनि के साथ एकरसता बतलाने से यह स्पष्ट है कि आचार्यपरम्परा में यतिवृषभ के व्यक्ति के प्रति कितना समादर था और उनका स्थान कितना महान और प्रतिष्ठित था। इन यतिवृषभ ने अपनी त्रिलोक प्रज्ञप्ति में भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात् की आचार्य परम्परा और उसकी कालगणना इस प्रकार दी है-

‘‘जादो सिद्धो वीरो तद्दिवसे गोदमो परमणाणी।

जादे तस्ंिस सिद्धे सुघम्मसामी तदो जादो।।६६।।
तम्मि कदकम्मणासे जंबूसामि त्ति केवली जादो।
तत्थ वि सिद्धिपवण्णे केवलिणो णत्थि अणुबद्धा।।६७।।
वासट्ठी वासाणि गोदमपहुदीण णाणवंताणं।
धम्मपयट्टणकालो परिमाणं पिंडरूवेण।।६८।।

अर्थ-जिस दिन श्री वीर भगवान का मोक्ष हुआ उसी दिन गौतम गणधर केवलज्ञानी हुए। उनके सिद्ध होने पर सुधर्मास्वामी केवली हुए। सुधर्मास्वामी के कृतकर्मों का नाश कर चुकने पर जम्बूस्वामी केवली हुए। उनके सिद्धि प्राप्त कर लेने पर कोई केवली नहीं हुआ। इन गौतम आदि केवलियों के धर्मप्रवर्तन के काल का परिणाम पिण्डरूप से ६२ वर्ष है।।६६-६८।।

‘‘णंदी य णंदिमित्तो विदिओ अवराजिदो तइं जाया (तईओ य)।

गोवद्धणी चउतथो पंचमो भद्दबाहु त्ति।।७२।।
पंच इमे पुरिसवरा चउदसपुव्वी जगम्मि विक्खादा।
त्ते बारसअंगधरा तित्थे सिरिवड्ढमाणस्स।।७३।।
पंचाण मेलिदाणं कालपमाणं हवेदि वाससवं।
वारिम्मि य पंचमए भरहे सुदकेवली णत्थि।।७४।।

अर्थ-नन्दि, दूसरे नन्दिमित्र, तीसरे अपराजित, चौथे गोवर्धन और पाँचवे भद्रबाहु, ये पाँच पुरुषश्रेष्ठ श्रीवद्र्धमान स्वामी के तीर्थ में जगत में प्रसिद्ध चतुर्दशपूर्वधारी हुए। ये द्वादशांग के ज्ञाता थे। इन पाँचों का काल मिलाकर एक सौ वर्ष होता है। इनके बाद भरतक्षेत्र में इस पंचमकाल में और कोई श्रुतकेवली नहीं हुआ।।७२-७४।।

‘‘पढमो विसाहणामो पुट्ठिल्लो खत्तिओ जओ णागो।

सिद्धत्थो घिदिसेणो विजओ बुद्धिल्लगंगदेवा य।।७५।।
एक्करसो य सुधम्मो दसपुव्वधरा इमे सुविक्खादा।
पारंपरिउवगमदो तेसीदिसदं च ताण वासाणि।।७६।।
सव्वेसु वि कालवसा तेसु अदीदेसु भरहखेतम्मि।
वियसंतभव्वकमला ण संति दसपुव्विदिवसयरा।।७७।।

अर्थ-विशाख, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जय, नाग, सिद्धार्थ, धृतिसेन, विजय, बुद्धिल, गंगदेव और सुधर्म ये ग्यारह आचार्य एक के बाद एक क्रम से दसपूर्व के धारी विख्यात हुए। इनका काल १८३ वर्ष है। कालवश से इन सबके अतीत हो जाने पर भरतक्षेत्र में भव्यरूपी कमलों को प्रफुल्लित करने वाले दसपूर्वके धारक सूर्य नहीं हुए।।७५-७७।।

‘‘णक्खतो जयपालो पंडुअ-धुवसेण-कंस आइरिया।

एक्कारसंगधारी पंच इमे वीरतित्थम्मि।।७८।।
दोण्णिसया वीसजुदा वासाणं ताण पिंडपरिमाणं।
तेसु अतीदे णत्थि हु भरहे एक्कारसंगधरा।।७९।।

अर्थ-नक्षत्र, जयपाल, पाण्डु, ध्रुवसेन और कंस ये पांच आचार्य वीर भगवान के तीर्थ में ग्यारह अंग के धारी हुए। इनके समय का एकत्र परिणाम २२० वर्ष होता है। इनके बाद भरतक्षेत्र में ग्यारह अंगों का धारक कोई नहीं हुआ।।७८-७९।।

‘‘पढमो सुभद्दणामो जसभद्दो तह य होदि जसबाहु।

तुरिमो य लोयणामी एदे आयारअंगधरा।।८०।।
सेसेकरसंगार्णि (गाणं) चोद्दसपुव्वाणमेक्कदेसधरा।
एक्कसयं अट्ठारसवासजुदं ताण परिमाणं।।८१।।
तेसु अदीदेसु तदा आचारधरा ण होंति भरहम्मि।
गोदममुणिपहुदीणं वासाणं छस्सदाणि तेसीदी।।८२।।

अर्थ-सुभद्र, यशोभद्र, यशोबाहु और लोह ये चार आचार्य आचारांग के धारी हुए। ये सभी आचार्य शेष ग्यारह अंग और चौदह पूर्व के एक देश के ज्ञाता थे। इनके समय का परिणाम ११८ वर्ष होता है। इनके बाद भरतक्षेत्र में आचारांग के धारी नहीं हुए। गौतमगणधर से लेकर इन सभी आचार्यों का काल ६८३ वर्ष हुआ। ८०-८२।। इस प्रकार त्रिलोकप्रज्ञप्ति में भगवान महावीर के बाद की जो आचार्यपरम्परा तथा कालगणना दी है उसका नाम क्रम इस प्रकार होता है- ६२ वर्ष में ३ केवलज्ञानी १०० वर्ष में ५ श्रुत केवली १८३ वर्ष में ११ ग्यारह अंग और दस पूर्व के धारी २२० वर्ष में ५ ग्यारह अंग के धारी ११८ वर्ष में ४ आचारांग के धारी ६८३ वर्ष जहाँ तक हम जानते हैं भगवान महावीर के बाद की आचार्य परम्परा और कालगुणना का यह उल्लेख कम से कम दिगम्बर परम्परा में तो सबसे प्राचीन है। इसके बाद हरिवंशपुराण, धवला, जयधवला, आदिपुराण इन्दनन्दि के श्रुतावतार और ब्रह्महेमचंद्र के श्रुतस्कंध में भी उक्त उल्लेख पाया जाता है। जो प्राय: त्रिलोकप्रज्ञप्ति से मिलता जुलता है। किन्हीं किन्हीं आचार्यों के नामों में थोड़ा सा अंतर है जो प्राकृत नामों का संस्कृत में रूपांतर करने के कारण भी हुआ जान पड़ता है। किन्तु सभी उल्लेखों में गौतम स्वामी से लेकर लोहाचार्य तक का काल ६८३ वर्ष ही स्वाकार किया है। स्पष्टीकरण के लिये उक्त सभी उल्लेखों की तालिका नीचे दी गई है- त्रि. प्र. धवला ज. धवला आदिपुराण श्रुतावतार काल (वेदना खंड) १ गौतम गौतम गौतम गौतम गौतम

२ सुधर्मा लोहार्य सुधर्मा सुधर्म सुधर्म ३ केवली-६२ वर्ष

३ जम्बू जम्बू जम्बू जम्बू जम्बू

१ नन्दि विष्णु विष्णु विष्णु विष्णु

२ नन्दिमित्र नन्दि नन्दिमित्र नन्दिमित्र नन्दि

३ अपराजित अपराजित अपराजित अपराजित अपराजित ५ श्रुतकेवली-१०० वर्ष

४ गोवर्धन गोवर्धन गोवर्धन गोवर्धन गोवर्धन

५ भद्रबाहु भद्रबाहु भद्रबाहु भद्रबाहु भद्रबाहु

१ विशाख विशाख विशाखाचार्य विशाखाचार्य विशाखाचार्य

२ प्रोष्ठिल प्रोष्ठिल प्रोष्ठिल प्रोष्ठिल प्रोष्ठिल

३ क्षत्रिय क्षत्रिय क्षत्रिय क्षत्रिय क्षत्रिय

४ जय जय जयसेन जयसेन जयसेन

५ नाग नाग नागसेन नागसेन नागसेन

६ सिद्धार्थ सिद्धार्थ सिद्धार्थ सिद्धार्थ सिद्धार्थ ११ दशपूर्वी-१८३ वर्ष

७ घृतिसेन घृतिसेन घृतिसेन घृतिसेन घृतिसेन

८ विजय विजय विजय विजय विजयसेन

९ बुद्धिल बुद्धिल बुद्धिल बुद्धिल बुद्धिमान

१० गंगदेव गंगदेव गंगदेव गंगदेव गंग

११ सुधर्म धर्मसेन धर्मसेन धर्मसेन धर्म

१ नक्षत्र नक्षत्र नक्षत्र नक्षत्र नक्षत्र

२ जयपाल जयपाल जयपाल जयपाल जयपाल

३ पाण्डु पाण्डु पाण्डु पाण्डु पाण्डु ५ एकादशांगधारी-२२० वर्ष

४ ध्रुवसेन ध्रुवसेन ध्रुवसेन ध्रुवसेन द्रुमसेन

५ कंसार्य कंस कंसाचार्य कंसाचार्य कंस

१ सुभद्र सुभद्र सुभद्र सुभद्र सुभद्र

२ यशोभद्र यशोभद्र यशोभद्र यशोभद्र अभयभद्र

३ यशोबाहु यशोबाहु यशोबाहु यशोबाहु यशोबाहु

४ लोहार्य लोहाचार्य लोहाचार्य लोहार्य लोहार्य ४ आचारांगधारी-११८ वर्ष ६८३

इस प्रकार वीर निर्वाण के बाद की आचार्य परम्परा का उल्लेख करके त्रिलोकप्रज्ञप्ति में वीर निर्वाण के बाद की राजकाल गणना भी दी है, जो इस प्रकार है-

‘‘यं काले वीरजिणो णिस्सेयससंपयं समावणो।

तक्काले अभिसित्तो पालयणामो अवंतिसुदो।।९५।।
पालकरज्जं सट्ठिं इगिसयपणवण्णवियवंसभवा।
चालं मुरुदयवंसा तीसं वस्सा दु पुस्समित्तम्मि।।९६।।
वसुमित्त अग्गिमित्ता सट्ठी गंधव्वया वि सयमेक्कं।
नरवाहणो य चालं तत्तो भत्थट्ठणा जादा।।९७।।
भत्थट्ठणाण कालो दीण्णि सयाइं हवंति वादाला।
तत्तो गुत्ता ताणं रज्जो दोण्णिसयाणि इगितीसा।।९८।।
तत्तो कक्की जादो इंदसुदो तस्स चउमुहो णामो।
सत्तरिवरिसा आऊ विगुणिय इगवीस रज्जत्तो।।९।।

अर्थ-जिस समय वीर भगवान ने मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त किया, उसी समय अवन्तिके पुत्र पाल×ा¹ का अभिषेक हुआ। पालक का राज्य ६०वर्ष तक रहा। उसके बाद १५५ वर्ष तक विजय वंश के राजाओं ने, ४० वर्ष तक मरुदय (मौर्य) वंश ने, तीस वर्ष तक पुष्यमित्र ने, ६० वर्ष तक वसुमित्र अग्रिमित्र ने, सौ वर्ष तक गंधर्व राजाओं ने और ४० वर्ष तक नरवाहनन ने राज्य किया। उसके बाद भृत्यान्ध्र राजा हुए। उन भृत्यान्ध्र राजाओं का काल २४२ वर्ष होता है। उसके बाद २३१ वर्ष तक गुप्तों ने राज्य किया। उसके बाद इन्द्र का पुत्र चतुर्मुख नाम का कल्की हुआ। उसकी आयु सत्तर वर्ष की थी और उसने ४२ वर्ष तक राज्य किया। इस तरह सबको मिलाने से ६०±१५५±४०±३०±६०±१००±४०±२४२±२३१±४०·१००० वर्ष होता है। इस प्रकार भगवान महावीर के निर्वाण से १००० वर्ष तक के राजवंशों की गणना करके त्रिलोकप्रज्ञप्ति में पुन: लिखा है-

‘‘आचारंगधरादो पणहत्तरिजुतदुसयवासेसु।

वोलीणेसु बद्धो पट्टो कक्कीसणरवइणो।।१००।।’’

अर्थात्-आचारांगधारियों के बाद २७५ वर्ष बीतने पर कल्किराजा पट्टभिषेक हुआ। आचारांगधारियों का अस्तित्व वीर नि. सं. ६८३ तक बतलाया है। उसमें २७५ जोड़ने से ९५८ होते हैं। इसमें कल्कि के राज्य के ४२ वर्ष मिलाने से १००० वर्ष हो जाते हैं।

भगवान महावीर के निर्वाण से एक हजार वर्ष तक की इस राज्यकाल गणना के रहते हुए यह कैसे कहा जा सकता है कि त्रिलोकप्रज्ञप्ति के कत्र्ता उसे पहले हुए हैं? यदि यह राजकालगणना काल्पनिक होती और उन राजवंशों का भारतीय इतिहास में कोई अस्तित्व न मिलता जिनाक कि उसमें निर्देश किया गया है। तो उसे दृष्टि से ओझल भी किया जा सकता था। किन्तु जब उन सभी राजवंशों का अस्तित्व उसी क्रम से पाया जाता है जिस क्रम से वह त्रिलोकप्रज्ञप्ति में दिया गया है तो उसे कैसे भुलाया जा सकता है? खास करके आंध्रवंश और गुप्तवंश तो भारत के प्रख्यात राजवंशों में हैं। त्रिलोकप्रज्ञप्ति में गुप्तवंश के बाद कल्कि के राज्य का निर्देश किया है और लिखा है-

अह साहियाण कक्की णियजोग्गे जणपदे पयत्तेण।

सुक्कं जाचदि लुद्धो पिक्कं (पिंडं) जाव ताव समणाओ।।१०१।।
दादूणं पिंडग्गं समणा कालो य अंतराणं पि।
गछंति ओहिणाणं उप्पज्जइ तेसु एक्कं पि।।१०२।।
अह का दि असुरदेवा ओहीदो मुणिगणाण उवसग्गं।
णाटूणं तक्कक्की मारेदि हु धम्मदोहि त्ति।।१०३।।
कक्किसुदो अजिदंजयणमो रक्खंति णमदि तच्चरणे।
तं रक्खदि असुरदेओ धम्मे रज्जं करेज्जंति।।१०४।।
तत्ता दोवे वासो सम्मं धम्मो पयट्टदि जणाण।
कमसो दिवसे दिवसे कालमहप्पेण हाएदे।।१०५।।
एवं वस्ससहस्से पुह पुह कक्को हवेइ एक्केक्को।
पंचसयवच्छरेसु एक्केक्को तहय उवक्ककी।।१०६।।

अर्थात्-‘प्रयत्न करके अपने योग्य देशों को जीत लेने पर कल्की लोभी बनकर जिस जिस श्रमण-जैनमुनियों से कर मांगने लगता है। तब श्रमण अपना पहला ग्रास दे देकर भोजन में अंतराय हो जाने से चले जाते हैं। उनमें से एक को अवधिज्ञान हो जाता है। उसके बाद कोई असुरदेव अवधिज्ञान से मुनियों के उपसर्ग को जाकरक धर्मद्रोही समझकर उस कल्की को मार डालते हैं। कल्कि के पुत्र का नाम अजितंजय है वह उस असुरके चरणों पड़ जाता है। असुर उसकी रक्षा करता है और उससे धर्मराज्य कराता है। उसके बाद दो वर्ष तक लोगों में धर्म की प्रवृत्ति अच्छी तरह होने लगती है। किन्तु काल के प्रभाव से वह फिर दिनोंदिन घटने लगती है। इस प्रकार प्रत्येक एक हजार वर्ष के बाद एक कल्की होता है और क्रमश: प्रत्येक पाँच सौ वर्ष के बाद एक उपकल्कि होता है।’

इससे ऐसा मालूम होता है कि गुप्त राज्य को नष्ट करके कल्कि ने राज्य का विस्तार किया था। इतिहास से सिद्ध है कि गुप्तवंश के अंतिम प्रसिद्ध राजा स्कन्दगुप्त के समय में भारत पर श्वेतहूगों का आग्रमण हुआ। एक बार स्कन्दग्रुप्त ने उन्हें परास्त कर भगा दिया। किन्तु कुछ काल पश्चात् पुन: उनका अक्रमण हुआ। इस बार स्कन्दगुप्त को सफलता न मिती और गुप्त सामाज्य छिन्न भिन्न हो गया। किन्तु इसके बाद भी कुछ समय तक गुप्तराजाओं का नाम भारत में चलता रहा। ५०० ई. के करीब में हूणराजा तोरमाण ने गुप्त सामाज्य के कमजोर पाकर पंजाब से मालबा तक अधिकार कर लिया, और गुप्त नरेश भानुगुप्त को तोरमाण के बेटै मिहिरकुल को अपना स्वामी मानना पड़ा। यह मिहिरकुल बड़ा अत्याचारी था। इसने श्रमणों पर बड़े अत्याचार किये थे। चीनी पर्यटन ह्यून्त्सांग ने अपने यात्रा विवरण में उसका विस्तार से वर्णन किया है। इस मिहिरकुल को विष्णुयशोधर्मा ने परास्त किया था। श्रीयुत स्व. के.पी. जायसवाल का विचार था कि यह विष्णुयशोधर्मा ही कल्कि राजा है, क्योंकि हिन्दु पुराणों में कल्कि को धर्मरक्षक और लोकहित कर्ता बतलाया है। किन्तु जैन ग्रंथों में उसे अत्याचारी और धर्मघातक बतलाया है अत: स्व.डॉ. के.बी. पाठक का मत है कि मिहिरकुल ही कल्कि है। किन्तु दोनों पुरातत्त्ववेत्ताओं ने कल्कि का एक ही काल माना है और वह भी दिगम्बर ग्रंथों में उल्लेख के आधार पर। यद्यपि कल्कि के संबंधों में जो बातें त्रिलोकप्रज्ञप्ति में लिखी हैं उन सब बातों का संबंध किसी के साथ नहीं मिलता है, फिर भी ऐतिहासिक दृष्टि से ही मानकर चला जा सकता है कि गुप्त राज्य के बाद एक अत्याचारी राजा के होने का उल्लेख किया गया है। स्व. जायसवाल जी के लेखानुसार ईस्वी सन् ४६० के लगभग गुप्तसामाङ्काय नष्ट हुआ और उसके बाद तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल के अत्याचारों से भारत भूमि त्रस्त हो उठी। अत: त्रिलोकप्रज्ञप्ति की रचना जल्दी से जल्दी इसी समय के लगभग हुई मानी जा सकती है। यह समय विक्रम की छठी शताब्दी का उत्तरार्ध और शक की पांचवी शताब्दी का पूर्वाध पड़ता है। इससे पहले उसकी रचना मानने से उसमें गुप्तराज्य और उसके विनाशक कल्किराज्य का उल्लेख होना संभव प्रतीत नहीं होता। अत: इसे यतिवृषभ के समय की पूर्व अवधि माना जा सकता है। उत्तर अवधि के बारे में और विचार करना होगा।

१. श्वेताम्बर सम्प्रदायों कर्मप्रकृति नामक एक ग्रंथ है जो परम्परा से किन्हीं शिवशर्म सूरि के द्वारा रचित कहा जाता है। इन शिवशर्मसूरि को श्वेताम्बर विक्रम की पांचवी शताब्दी का विद्वान मानते हैं। कर्मप्रकृति पर एक चूर्णि है जिसके रचयिता का पता नहीं है। इस चूर्णि की तुलना चूर्णिसूत्रो के साथ करके हम पहले बतला आये हैं कि कहीं कहीं दोनों में कितना अधिक साम्य है। कर्मप्रकृति के उपशमना करण की ५७ वीं गाथा की चूर्णि तो चूर्णिसूत्र से बिल्कुल मिलती हुई है और खास बात यह है कि उस चूर्णि में जो चर्चा की गई है वह कर्मप्रकृति की ५७ वीं गाथा में है ही नहीं किन्त आगे पीछे भी नहीं है। दूसरी खास बात यह है कि उस चूर्णि में ‘तस्स विहासा’ लिखकर गाथा के पद का व्याख्यान किया गया है। जो कि चूर्णिसूत्र की अपनी शैली है। कर्मप्रकृति की चूर्णि में उस शैली का अन्यत्र आभास भी नहीं मिलता। इन सब बातों से हम इसी निर्णय पर पहुँच सके हैं कि चूर्णिसूत्र अवश्य देखे हैं। अत: चूर्णिसूत्रों की रचना कर्मप्रकृति की चूर्णि से पहले हुई हैं।

२. चूर्णिनाम से श्वेताम्बर सम्प्रदाय में बहुत सा साहित्य पाया जाता है। जैसे आवश्यक चूर्णि, निशीचूर्णि, उत्तराध्ययन चूर्णि आदि। एक समय आगमिक ग्रंथों पर इस चूर्णि साहित्य के रचना करने की खूब प्रवृत्ति रही है। जिनदासगणि महत्तर एक प्रसिद्ध चूर्णिकार हो गये हैं जिन्होंने वि.सं. ७३३ में नन्दिचूर्णि बनाई थी। किन्तु चूर्णिसाहित्य का सर्जन गुप्तकाल से ही होना शुरु हो गया था ऐसा श्वेताम्बर विद्वान मानते हैं। अत: चूर्णिसूत्र भी गुप्तकाल के लगभग की ही रचना होनी चाहिए।

३. आचारांग निर्युक्ति तथा विशेषावश्यक भाष्य में भी चूर्णिसूत्र के समान ही कषाय की प्ररूपणा के आठ विकल्प किये गये हैं। निर्युक्ति में तो विकल्पों के केवल नाम ही गिनाये हैं किन्तु विशेषावश्यक में उनका वर्णन किया गया है। चूर्णिसूत्र निम्न प्रकार हैं- ‘‘कसाओ ताव णिक्खिवियव्वो णामकसाओ ट्ठवणकसाओ दव्वकसाओ, पच्चयकसाओ समुप्पत्तियकसाओ आदेसकसाओ रसकसाओ भावसकसाओ चेदि।’’ विशेषावश्यक में लिखा है-

‘‘नामं ठवणा दविए उप्पत्ती पच्चए य आएसे।

रस-भाव-कसाए वि य परूवणा तेसिमा होइ।।२९८०।।

इन विकल्पों का निरूपण करते हुए भाष्यकार भी चूर्णिसूत्रकार की ही तरह, नामकषाय, स्थापनाकषाय और द्रव्यकषाय को सुगम जानकर छोड़ देते हैं और केवल नोमर्वद्रव्यकषाय का उदाहारण देते हैं और वह भी वैसा ही देते हैं जैसा चूर्णिसूत्रकार ने दिया है। यथा-‘‘णोआगमदव्वकसाओ जहा सज्जकसाओ सिरिसकसाओ एवमादि।’’ चृ.सू.। और वि.भा. में है-‘‘सज्जकसायाईओ नोकम्मदव्वओ कसाओऽयं।’’ इसके पश्चात् समुत्तपत्तिकषाय और आदेशकषाय के स्वरूप में शब्द भेद होते हुए भी आशय में ळभेद नहीं है। यहॉ तक के ऐक्य को देखकर यह कह सकना कठिन है कि किसने किसका अनुसरण किया है। किन्तु आगे आदेशकषाय के स्वरूप में अंतर पड़ गया है। चूर्णिसूत्रकार का कहना है कि चित्र में अंकित क्रोधी पुरुष की आकृति को आदेशकषाय कहते हैं। यथा- ‘‘आदेसकसाएण जहा चित्तकममे लिहिदो कोहो रूसिदो तिवलिदणिडालो भिउडिं काऊण।’’ अर्थात्-क्रोध के कारण जिसकी भृकुटि चढ़ गई है और मस्तक में तीन वली पड़ गर्इं हैं ऐस रुष्ट मनुष्य की चित्र में अंकित आकृति को आदेशकषाय कहते हैं। किन्तु भाष्यकार का कहना है कि अनंतरंग में कषाय के नहीं होने पर भी जो क्रोधी मनुष्य का छद्मरूप धारण किया जाता है जैसा कि नाटक में अभिनेता वगैरह को स्वांग धारण करना पड़ता है वह आदेशकषाय है। आदेशकषाय यह स्वरूप बतलाकर भाष्यकार, चूर्णिसूत्र में निर्दिष्ट स्वरूप का ‘केचित्’ करके उल्लेख करते हैं और कहते हैं कि वह स्थापनाकषाय से भिन्न नहीं है। अर्थात् चूर्णिसूत्र में जो आदेशकषाय का स्वरूप बतलाया है, भाष्यकार के मत से उसका अन्तर्भाव स्थापनाकषाय में हो जाता है यथा-

‘‘आएसओ कसाओ कइयवकयभिउडिभंगुराकारो।

केई चितइगओ ठवणाणत्थंतरो रोऽयं।।२९८१।।’’

इस प्रकार चूर्णिसूत्रगत आदेशकषाय भाष्यकार ने जो आपत्ति की, उसका समाधान जयधवला में देखने को मिलता है। जयधवलाकार ने आदेश कषाय और स्थापनाकषाय के भेद को स्पष्ट किया है। अत: भाष्यकार ने ‘केई’ करके आदेशकषाय के जिस स्वरूप का निर्देश किया है वह चूर्णिसूत्र में निर्दिष्ट स्वरूप ही है। अत: चूर्णिसूत्रकार यतिवृषभ भाष्यकार श्री जिनभद्रमणि क्षमाश्रमणा से पहले हुए हैं।

श्वेताम्बर पट्टावलियों के अनुसार क्षमश्रमणजी समय विक्रम की सातवीं सदी का पूर्वार्ध माना जाता है। यह भी मालूम हुआ है कि विशेषावश्यककषाय की एक प्रति में उसका रचनाकाल शक सवंत् ५३१ (वि.सं. ६६६) दिया है। अत: यतिवृषभ वि.सं. ६६६ के बाद के विद्वान् नहीं हो सकते। इस प्रकार उनकी उत्तर अवधि विक्रम सं. की सावतीं शताब्दी का मध्य भाग निश्चिम होती है।

इस विवेचन से हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि यत: त्रिलोकप्रज्ञप्ति में गुप्तवंश और उसके नाशक कल्कि राजा का उल्लेख है अत: यतिवृषभ विक्रम की छठी शताब्दी के उत्तरार्ध में पहले के विद्वान् नहीं हो सकते। और यत: उनके मत का निर्देश विशेषावश्यकभाष्य में पाया जाता है, जिसकी रचना वि.सं. ६६६ में होने का निर्देश मिलता है अत: वे विक्रम की सातवीं शताब्दी के मध्यभाग के बाद के विद्वान नहीं हो सकते। अत: वि.सं. ५५० से वि.सं. ६५० तक के समय में यतिवृषभ हुए हैं।

यतिवृषभ के इस समय के प्रतिकूल कुछ आपंत्तियाँ खड़ी होती हैं अत: उन पर भी विचार करना आवश्यक है। इन्द्रनन्दि ने अपने श्रुतावतार में कषायप्राभृत पर चूर्णिसूत्रों और उच्चारणवृत्ति की रचना हो जाने के बाद कुण्डकुन्दपुर में पद्मनंददि मुनि को उसकी प्राप्ति हुई ऐसा लिखा है। और उसके बाद शामकुण्डाचार्य, तुम्बूलूराचार्य, और समन्तभद्र को उसकी प्राप्ति होने का उल्लेख किया है। यदि यतिवृषभ का समय विक्रम की छठी शताब्दी माना जाता है तो ये सब आचार्य उसके बाद के विद्वान ठहरते हैं जो कि मान्य नहीं हो सकता। अत: यह विचार करना आवश्यक है इन्द्रनन्दि के द्वारा निर्दिष्ट क्रम कहाँ तक ठीक है। सबसे पहले हम कुण्डकुन्दपुर के आचार्य पद्मनन्द्रि को ही लेते हैं। यहाँ यह बतला देना अनुपयुक्त न होगा कि कुण्डकुन्दपुर के पद्मनंदि से आचार्य कुन्दकुन्द का अभिप्राय लिया जाता है।

आचार्य कुन्दकुन्द को यतिवृषभ के पश्चात् का विद्वान बतलाने वाला उल्लेख श्रुतावतार के सिवाय अन्यत्र हमारे देखने नहीं आया। इन्द्रनन्दि की इस मान्यता का आधार क्या था यह उन्होंने नहीं लिखा है। यदि दोनों या किसी एक सिद्धांत ग्रंथ पर आचार्य कुन्दकुन्द की तथोक्त टीका उपलब्ध होती तो उससे भी इन्द्रनन्दि के उक्त कथन पर कुछ प्रकाश पड़ सकता था किन्तु उसके अस्तित्व का भी कोई प्रमाण उपलबध नहीं होता। ऐसी अवस्था में इन्द्रनन्दि के उक्त कथन से प्रमाण कोटि में कैसे लिया जा सकता है?

१. इन्द्रनन्दि के श्रुतावतार के सिवाय आचार्य कुन्दकुन्द और यतिवृषभ के पौर्वापर्य पर त्रिलोक प्रज्ञप्ति से भी कुछ प्रकाश पड़ता है। त्रिलोकप्रज्ञप्ति में नौ अधिकार हैं। ग्रंथ में प्रारंभ में तो ग्रंथकार ने पंच परमेष्ठी का स्मरण किया है, किन्तु आगे प्रत्येक अधिकार के अंत और आदि में क्रमश: एक एक तीर्थंकर का स्मरण किया है। जैसे प्रथम अधिकार के अंत में आदिनाथ को नमस्कार किया है। दूसरे अधिकार के आदि में अजितनाथ को और अंत में सम्भवनाथ को नमस्कार किया है। इसी प्रकार आगे भी प्रत्येक अधिकार के आदि और अंत में एक एक तीर्थंकर को नमस्कार किया है। इस तरह नौवें अधिकार के प्रारंभ तक १६ तीर्थंकरों का स्तवन हो जाता है। शेष रह जाते हैं आठ तीर्थंकर। उन आठों का स्तवन नौवें अधिकार के अंत में किया है। उसमें भगवान महावीर के स्तवन की ‘‘एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदं’’ आदि गाथा वही है जो कुन्दकुन्द के प्रवचनसार के प्रारंभ में पाई जाती है। अब प्रश्न यह है कि इस गाथा का रचयिता कौन है-कुन्दकुन्द या यतिवृषभ?

प्रवचनसार में इस गाथा की स्थिति ऐसी है कि वहां से उसे पृथक नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस गाथा में भगवान महावीर को नमस्कार करके उससे आगे की गाथा ‘सेसे पुण तित्थयरे’ में शेष तीर्थंकरों को नमस्कार किया गया है। यदि उसे अलग कर दिया जाता है तो दूसरी गाथा लटकती हुई रह जाती है। कहा जा सकता है कि इस गाथा को त्रिलोकप्रज्ञप्ति से लेकर भी उसके आधार से दूसरी गाथा या गाथाएँ ऐसी बनाई जा सकती हैं जो सुसम्बद्ध हों। इस कथन पर यह प्रश्न किया जा सकता है कि क्या मंगलगाथा भी दूसरे गंरथ से उधार ली जा सकती है? किन्तु यह प्रश्न त्रिलोकप्रज्ञप्ति की ओर से भी किया जा सकता है कि जब ग्रंथकार ने तेईस तीर्थंकरों के स्तवन की गाथाओं का निर्माण किया तो क्या केवल एक गाथा का निर्माण से स्वयं नहीं कर सकते थे? अत: इन सब आपत्तियों और उनके परिहारों को एक ओर रखकर यह देखने की जरूरत है कि स्वयं गाथा इस संबंध में कुछ प्रकाश डालती है या नहीं? हमें गाथा के प्रारंभ का ‘एष’ पद त्रिलोकप्रज्ञप्तिकार की दृष्टि से उतना संगत प्रतीत नहीं होता जितना वह प्रवचनसार के कर्ता की दृष्टि से संगत प्रतीत हो है। त्रिलोकप्रज्ञप्ति में प्रथम तो अन्य किसी तीर्थंकर के स्तवन में ‘एष’ पद नहीं आया है। दूसरे नमस्कार को समाप्त करते हुए मध्य में वह इतना अधिक उपयुक्त नहीं जांचता है जितना प्रारंभ करते हुए जाँचता है। तीसरे इस गाथा के बाद ‘जयउ जिणवरिंदो’ आदि लिखकर ‘पणमह चउवीसजिणे’ आदि गाथा के द्वारा चौबीसों तीर्थंकरों को नमस्कार किया गया है और उसके पश्चात् ‘सेसे पुण तित्थयरे’ के द्वारा शेष तीर्थंकरों को नमस्कार किया गया है।। शेष तीर्थंकरों को नमस्कार न करके पहले महावीर को नमस्कार क्यों किया? इसका उत्तर गाथा का ‘तित्थं धरसत्त्स कत्तारं’ पद देता है। चूंकि वर्तमान में प्रचलित धर्मतीर्थ के कर्ता भगवान महावीर ही हैं इसलिये उन्हें पहले नमस्कार करके ‘पुण’ उसके बाद शेष तीर्थंकरों को नमस्कार करना उचित ही है। प्रवचनसार में पांच गाथाओं का कुलक है। अत: उक्त प्रथम गाथा के ‘एष’ पद की अनुवृत्ति पांचवी गाथा के अंत के ‘उपसंपयानि सम्मं’ तक जाती है और बतलाती है कि वह मैं इन सबको नमस्कार करके वीतरागचारित्र को स्वीकार करता हूँ। इस संबंध में अधिक लिखना व्यर्थ है, दोनों स्थलों को देखने से ही विद्वान पाठक स्वयं समझ सकते हैं कि उक्त गाथा त्रिलोकप्रज्ञप्ति में पाई जाती तो भी एक बात थी, किन्तु इसके सिवा भी अनेकों गाथाएँ त्रिलोकप्रज्ञप्ति में पाई जाती हैं। उनमें से कुछ गाथाओं का प्राचीन मानकर दरगुजर किया जा सकता है किन्तु कुछ गाथाएँ तो ऐसी हैं जो प्रवचनसार में ही पाई जाती हैं और उसमें उनकी स्थिति आवश्यक एवं उचित है। जैसे, सिद्धलोक अधिकार के अंत में सिद्धण्द की प्राप्ति के कारणसूत्र कर्मों को ..............जो गाथाएँ हैं उनमें अनेक गाथाएँ प्रवचनसार की ही हैं, वे अन्य किसी ग्रंथों में नहीं पाई जातीं। अत: ये मानना ही .......... कि कुन्दकुन्द के ग्रंथों की बहुत सी गाथाएँ त्रिलोकप्रज्ञप्ति में है और इसलिये कुन्दकुन्द यतिवृषभ के बाद के विद्वान नहीं हो सकते।

असल में त्रिलोकप्रज्ञप्ति के देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि वह एक संग्रह ग्रंथ है। त्रिलोकप्रज्ञप्तिकार ने उसमें चर्चित विषय के संबंध में पाये जाने वाले अनेक मतभेदों का संग्रह तो किया ही है। साथ ही उन्हें अपने से पूर्व के आचार्यों की जो गाथाएँ उपयोगी और आवश्यक प्रतीत हुर्इं यथास्थान उनका भी उपयोग उन्होंने किया है। यद्यपि उनके आशय की उन्हीं के समकक्ष गाथाएँ वे स्वयं भी बना सकते थे, किन्तु पूर्वाचार्यों की कृति को महज इसलिये बदलना कि वह उनकी कृति कहीं जाए, उनके जैसे वीतरागी और आचार्य परम्परा के उपासक ग्रंथकार को उचित प्रतीत नहीं हुआ होगा। क्योंकि उनकी ग्रंथरचना का उद्देश्य श्रुत की रक्षा करना था न कि अपने कर्तृत्य को व्यापक करना। अत: यदि उन्होंने कुन्दकुन्द जैसे आचार्य के वचनों को अपने गं्रथ में संकलित किया हो तो, कोई अचरज की बात नहीं है।

२. कुर्ग इन्सक्रिप्शंस में मर्कराफा एक ताम्रपत्र प्रगट हुआ है। उसमें वुंâदकुन्दान्वय के छह आचार्यों का उल्लेख है। तथा उसके लिखे जाने का समय सम्वत् ३८८ भी उसमें दिया है। इन छह आचार्यों का समय यदि १५० वर्ष भी मान लिया जाय तो ताम्रपत्र में उल्लिखित अंतिम भी गुणनंदि आचार्य का समय शक सं.-२३८ (वि.सं. ३७३) के लगभग ठहरता है। ये गुणनंदि कुन्दकुन्दान्वय के प्रथम पुरुष नहीं थे किन्तु कुन्दकुन्दान्वय में हुए थे। इसका मतलब यह हुआ कि कुन्दकुन्दान्वय उससे भी पहले से प्रचिलत थी। और इसलिये आचार्य कुन्दकुन्द विक्रम की तीसरी शताब्दी से भी पहले के विद्वान् थे। किन्तु श्रीयुत प्रेमीजी का मन्तव्य है कि कुन्दकुन्दान्वय का अर्थ आचार्य कुन्दकुन्द की वंशपरम्परा न करके कौण्डकुन्दपुर ग्राम से निकली हुई परम्परा करना चाहिये। उसका कारण यह है कि कुन्दकुन्द के नियमसार की सतरहवीं गाथा में लोकविभाग नामक ग्रंथ का उल्लेख है। और वर्तमान में जो संस्कृत लोकविभाग पाया जाता था, उसी की भाषा के परिवर्तित करके यह संस्कृत लोकविभाग रचा गया है। इस परसे यह निष्कर्ष निकाला जाता है यत: कुन्दकुन्द ने अपने नियमसार में शक सं. ३८० में रचे गये लोकविभाग ग्रंथ का उल्लेख किया है अत: वे मर्वâरा ताम्रपत्र में उल्लिखित कुन्दकुन्दान्वय के प्रवर्तक नहीं हो सकते। नियमसार की गाथा तथा उससे पहले की गाथा इस प्रकार है-

‘‘माणुस्सा दुवियप्पा कम्ममहीभोगभूमिसंजादा।

सत्तविहा णेरइया णादव्वा पुढविभेएण।।१६।।
चउदह भेदा भणिदा तेरिच्छा सुरगणा चउव्भेदा।
एदेसिं वित्थारं लोयविभागेसु णादव्वं।।१७।।

पद्मप्रभ मलधारी देव ने इसकी टीका में लिखा है कि इन चारगति के जीवों के भेदों का विस्तार लोकविभाग नाम के परमागम में देखना चाहिये। वर्तमान लोक विभाग में अन्य गति के जीवों का थोड़ा बहुत वर्णन प्रसन्नवश किया भी गया है किन्तु तिर्यंचों के चौदह भेदों का तो वहाँ नाम भी दृष्टिगोचर नहीं होता। अत: यदि नियमसार में लोकविभाग नाम के परमागम का उल्लेख है तो वह कम से कम वह लोकविभाग तो नहीं है जिसकी भाषा का परिवर्तन करके संस्कृत लोकविभाग की रचना की गई है और जो शक सं. ३८० में सर्वनन्दि के द्वारा रचा गया था। त्रिलोक प्रज्ञप्ति में भी लोकविभाग, लोकविनिश्य आदि ग्रंथों के मतों का उल्लेख जगह जगह मिलता है। लोकविभाग के मतों को वर्तमान लोकविभाग में खोजने पर उनमें से अनेकों बार में हमें निराश होना पड़ा है। यहाँ हम उनमें कुछ को उद्धृत करते हैं- १. त्रि. प्र. में लिखा है कि लोक विभाग में लोक के ऊपर वायु का धनफल अमुक बतलाया है। यथा-

‘‘दो-छ-बारस भागब्भहिओ कोसो कमेण वाउघणं।

लोयउवरिम्मि एवं लोयविनायम्मि पण्णत्तं।।२८२।।

किन्तु लोकविभाग में लोक के ऊपर तीनों वातवलयों की केवल मोटाई बतलाई है। यथा-

‘‘लोकाग्रे क्रोशयुग्मं तु गव्यूतिन्र्यूनगोरुतं।

न्यूनप्रमाणं धनुषां पंचविंशचतु:शतम्।।’’

२. त्रि. प. में लिखा है कि लोकविभाग में लवणसमुद्र की शिखर पर जल का विस्तार दस हजार योजन है। यह बात वर्तमान लोकविभाग में पाई जाती है किन्तु यहाँ त्रिलोकप्रज्ञप्तिकार लोकविभाग के साथ ‘संगाइणिए’ विशेषण का प्रयोग करते हैं यथा-

‘‘जलसिहरे विक्खंभो जलणिहिणो जोयणा दससहस्सा।

एवं संगाइणिए लोयविभाग विणिद्दिट्ठं।।४१।।’’

यहां ‘संगाइणिए’ विशेषण सम्भवत: किसी अन्य लोकविभाग से इसका पृथक्त्व बतलाने के लिए लगाया गया है। किन्तु इससे यह न समझ लेना चाहिए कि यह संगाइणी लोकविभाग ही वर्तमान लोकविभाग है, क्योंकि त्रिलोकप्रज्ञप्ति में संगाइणी के कर्ता के जो अन्य मत दिये हैं वे इस लोकविभाग में नहीं पाये जाते। यथा-

‘‘पणुवीस जायेणाइं दारापमुहम्मि होदि विक्खंभा।

संगायणिकत्तारो एवं णियमा परूवेदि।।१८।।
वासट्ठि जोयणाइं दो कोसा होदि कुंडविच्छारो।
संगायणिकत्तारो एवं णियमा परूवेदि।।२०।।

इनमें संगायणि के कर्ता के मत से गंगा का विष्कंभ २५ योजन और जिस कुण्ड में वह गिरती है उस कुण्ड का विस्तार ६२ योजन का दो कोस बतलाया है। किन्तु लोकविभाग में गंगा का विष्कम्भ तो बतलाना ही नहीं और कुण्ड का विस्तार भी ६० योजन ही बतलाया है। अत: प्रकृत लोकविभाग न तो वह लोकविभाग ही है और न संगायणी लोकविभाग ही है। ३. जिस तरह त्रिलोकप्रज्ञप्ति के लोकविभाग और संगायणि लोकविभाग का उल्लेख किया है उसी तरह एक लोगाइणि ग्रंथ का भी उल्लेख किया है। यथा-

‘‘अमवस्साए उवही सरिसे भूमीए होदि सिदपक्खे।

कम्म वट्टेदि णहेण कोसाणि दोण्णि पुणमीए।।३६।।
हायदि किण्हपकखे तेण कमेणं च जाव वड्ढिगदं।
एवं लोगाइणिए गंधपवरम्मि णिद्दिट्ठं।।३७।।’’

इसमें बतलाया है कि लोगइणि में कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष में लवण समुद्र के ऊपर प्रतिदिन दो कोस जल की हानि और वृद्धि होती है ऐसा कहा है। किन्तु प्रकृत लोकविभाग में बतलाया है कि अमावस्या से पूर्णमासी तक ५००० योजन जल की वृद्धि होती है अत: पाँच हजार में १५ का भाग देने से प्रतिदिन जल की वृद्धि का परिमाण आ जाता है। ४. त्रि. प्र. में अन्तद्र्वीपजों का वर्णन करके लिखा है-

‘‘लोयविभायाइरिया दीवाण कुमाणुसेहिं जुत्ताणं।

अण्णसरूवेण ट्ठिदिं भासंते तप्परूवेमो।।८४।।’’

अर्थात्-लोकविभाग के कत्र्ता आचार्य कुमनुष्यों से युक्त द्वीपों की स्थिति अन्य प्रकार से कहते हैं, उसका हम प्ररूपण करते हैं। किन्तु प्रकृत लोकविभाग में अन्तद्वीपों का जो वर्णन किया है वह त्रिलोकप्रज्ञप्ति से मिलता हुआ है और इसका एक दूसरा सबूत यह है कि उससे समर्थन में संस्कृत लोकविभाग के रचयिता ने त्रिलोकप्रज्ञप्ति की गाथाएँ उद्धत करते हुए उक्त गाथा से कुछ पहले तक की ही गाथाएँ उद्धत की हैं।

इसी तरह के अन्य भी अनेक प्रमाण उद्धत किये जा सकते हैं किन्तु उनसे गंरथ का भार व्यर्थ ही बढ़ेगा। अत: इतने में से ही संतोष मानकर हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि एक तो नियमसार और त्रिलोकप्रज्ञप्ति में जिस लोकविभाग या लोकविभागों की चर्चा है वह लोकविभाग नहीं है, दूसरे, लोकविभाग नाम के कई ग्रंथ प्राचीन आचार्यों के द्वारा बनाए गये थे। कम से कम वे दो अवश्य थे, और सर्वनन्दी के लोकविभाग से पृथक थे। सम्भवत: इसी से नियमसार में बहुवचन ‘लोयविभागेसु’ का प्रयोग किया गया है, क्योंकि प्राकृत में द्विवचन के स्थानों भी बहुवचन का प्रयोग होता है। अत: लोकविभाग के उल्लेख के आधार पर कुन्दकुन्द को शक सं. ३८० के बाद का विद्वान् नहीं माना जा सकता, और इसलिये मर्करा के ताम्रपत्र में जिस कुन्दकुन्दान्वय का उल्लेख है उसकी परम्परा कुन्दकुन्द ग्राम के नाम पर न मानकर कुन्दकुन्दाचार्य के नाम पर मानने में कोई आपत्ति नहीं है। जब कि आचार्य कुन्दकुन्द मूलसंघ के अग्रणी विद्वान कहे जाते हैं तो कुन्दकुन्दान्वय का उद्भव उन्हीं के नाम पर हुआ मानना ही उचित प्रतीत होता है। अत: आचार्य कुन्दकुन्द यतिवृषभ के बाद के विद्वान नहीं हो सकते। और इसलिये आचार्य इन्द्रनन्दि ने जो आचार्य कुन्दकुन्द को द्विविध सिद्धांत की प्राप्ति होने का उल्लेख किया है जिसमें आचार्य यतिवृषभ के चूर्णिसूत्र और उच्चारणचार्य की वृत्ति भी सम्मिलित है वह ठीक नहीं है। यदि कुन्द-कुन्द को दूसरा सिद्धांतग्रंथ प्राप्त हुआ होगा तो वह ववाल गुणधररचित कषायप्राभृत प्राप्त हुआ होगा। किन्तु उसके संबंध में भी इन्द्रनन्दि के उल्लेख के सिवाय दूसरा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अत: श्रुतावतार का उक्त उल्लेख आचार्य यतिवृषभ के उक्त समय में बाधक नहीं हो सकता।

आचार्य इन्द्रनन्दि ने कुन्दकुन्द के बाद शामकुण्डाचार्य, तुम्बुलूराचार्य और आचार्य समंतभद्र को द्विविध सद्धांत की प्राप्ति होने का उल्लेख किया है। तथा बतलाया है कि इनमें से पहले के दो आचार्यों ने कषायप्राभृत पर टीकाएँ भी लिखीं थीं। इन टीकाओं के संबंध में हम पहले प्रकाश डाल चुके हैं। आचार्य कुन्दकुन्द की तरह आचार्य समन्तभद्र की भी किसी सिद्धांत ग्रंथ पर कोई वृत्ति उपलब्ध नहीं है और न उसका किसी अन्य आधार से समर्थन ही होता है। तथा समन्तभद्र को शामकुण्डचार्य और तुम्बुलूराचार्य के पश्चात् का विद्वान मानना भी युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता। अत: इन आचार्यों का उल्लेख भी यतिवृषभ के उक्त समय में तब तक बाधक नहीं हो सकता जब तक यह सिद्ध न हो जाये कि इन आचार्यों का उक्त पौवापर्य ठीक है तथा उनके सामने यतिवृषभ के चूर्णिसूत्र मौजूद थे। अत: आचार्य यतिवृषभ का समय विक्रम की छठी शताब्दी का उत्तरार्ध मानने में कोई भी बाधक नजर नहीं आता। और यत: उनसे पहले कषायप्राभृत पर किसी अन्य वृत्ति के होने का कोई उल्लेख नहीं मिलता। अत: कषायप्राभृत पर जिन वृत्तिटीकाओं के होने का उल्लेख पहले कर आये हैं वे सभी विक्रम की छठी शताब्दी के बाद की ही रचनाएँ होनी चाहिए।

इस प्रकार यतिवृषभ के समय पर विचार करके हम पुन: आचार्य गुणधर की ओर आते हैं। गुणधर के समय पर विचार करते हुए यह भी देखने की जरूरत है कि षट्खंडागम और कषायप्राभृत में से किसकी रचना पहले हुई है। दोनों ग्रंथों की तुलना करते हुए हम पहले लिख आये हैं कि अभी तक यह नहीं जाना जा सका है कि इन दोनों में से एकका दूसरे पर प्रभाव है। किन्तु दोनों के मतभेदों की चर्चा धवला-जयधवलाकार स्वयं करते हैं तथा यह भी कहते हैं कि षट्खंडागम के कषायप्राभृत का उपदेश भिन्न है। इससे इतना ही स्पष्ट होता है कि भूतबलि पुष्पदंत गुरुपरम्परा से गुणधराचार्य गुरुपरम्परा भिन्न थी। किन्तु दोनों में कौन पहले हुआ और कौन पीछे? इस पर कोई भी स्पष्ट प्रकाश नहीं डालता। दोनों को ही वी.नि. ६८३ के बाद में हुआ बतलाते हैं।

श्रुतावतार में पहले षट्खंडगाम की उत्पत्ति का वर्णन किया है और उसके पश्चात् कषायप्राभृत की उत्पत्ति का वर्णन किया है। श्रीवीरसेन स्वामी ने भी षट्खंडागम पर पहले टीका लिखी है और कषायप्राभृत पर बाद में। तथा श्रुतावतारों के अनुसार षट्खंडागम पुस्तक के रचे जाने पर ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन उसका पूजा महोत्सव किया गया। इस सब बातों को दृष्टि में रखते हुए तो ऐसा लगता है कि षट्खंडागम के बाद कषायप्राभृत की रचना हुई है। किन्तु हमारी यह केवल कल्पना ही है। तो भी दोनों के रचनाकाल में अधिक अंतर नहीं होना चाहिये, क्योंकि दोनों की रचनाएँ ऐसे समय में हुई हैं जब अंगज्ञान के अवशिष्ट अंश भी लुप्त होते जाते थे और इस तरह परमागम के विच्छेद का भय उपस्थित हो चुका था। यों तो पूर्वों का विच्छेद वीर निर्वाण से ३४५ वर्ष के पश्चात् ही हो गया था किन्तु उनका आंशिक ज्ञान बराबर चल आता था। जब उस बचे खुचे आंशिक ज्ञान के भी लोप का प्रसंग उपस्थित हुआ तब उसे सुरक्षित रखने की चिन्ता हुई। जिसके फलस्वरूप षट्खंडागम और कषायप्राभृत की रचना हुई।

यतिवृषभ के समय का विचार करते हुए हम त्रिलोक प्रज्ञप्ति में दी गई ६८३ वर्ष की अंग ज्ञानियों की आचार्य परम्परा का उल्लेख कर आये हैं और पुâटनोट में भी यह भी बतला आये हैं कि नन्दिसंघ की पट्टावली से उसमें ११८ वर्ष का अंतर है। त्रिलोक प्रज्ञप्ति के अनुसार अंतिम आचारांगधर लोहाचार्य तक वीर निर्वाण से ६८३ वर्ष होते हैं किन्तु नंदि संघ की पट्टावली के अनुसार ५६५ वर्ष होते हैं। इस प्रकार दोनों में ११८ वर्ष का अंतर है। यदि अंतिम आचारांगधर लोहाचार्य के समय की जाँच हो सके तो इस अंतर का स्पष्टीकरण हो सकता है। किंवदन्ती है कि इन लोहाचार्य ने अग्रवालों को जैन धर्म में दीक्षित किया था। यदि अग्रोहा के टीले से कुछ ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त हो सके तो शायद उससे इस समस्या पर प्रकाश पड़ सके। किन्तु जब तक ऐसा नहीं होता तब तक यह विषय विवादग्रस्त बना ही रहेगा। फिर भी आचार्य कुन्दकुन्द वगैरह के समय को देखते हुए त्रिलोकप्रज्ञप्ति में जो ग्यारह अंग के धारी ५ आचार्यों का समय २२० वर्ष और आचारांग के धारी ४ आचार्यों का समय ११८ वर्ष दिया है वह ऊपर के अन्य आचार्यों के काल की अपेक्षा अधिक प्रतीत होता है और उससे पट्टावली प्रतिपादित १२३ और ९७ वर्ष का समय अधिक उपयुक्त जाँचता है। यदि यही समय ठीक हो तो आचार्य गुणधर को वीर नि. सं. ५६५ के लगभग का आचार्य मानना होगा। यह समय श्वेताम्बर पट्टावली प्रतिपादित आर्य नागहस्ती के समय के भी अनुकूल है।

यदि आर्यमंक्षु नागहस्ती के दादागुरु रहे हों तो उन्हें भी आचार्य गुणधर का लघु समकालीन विद्वान होना चाहिए और उस अवस्था में आर्यमंक्षु और नागहस्ति को गुणधर से ही गाथाओं की प्राप्ति होनी चाहिए न कि आचार्य परम्परा से। यदि ये सब सम्भावनाएँ ठीक हों तो गुणधर का समय वीर नि. सं. ६०० तक, और आर्यमंक्षु का समय ६२० के आगे समझना चाहिये। किन्तु इस अवस्था में यतिवृषभ आर्यमंक्षु और नागहस्ति के शिष्य नहीं हो सकते, क्योंकि त्रिलोकप्रज्ञप्ति के आधार से वे वीर नि. सं. १००० के बाद के विद्वान ठहरते हैं। यदि चूर्णिसूत्रकार यतिवृषभ उन्हीं नागहस्ति के अन्तेवासी हैं जिनका उल्लेख श्वेताम्बर पट्टावलियों में हैं तो वे कम से कम वर्तमान स्वरूप में उपलब्ध त्रिलोकप्रज्ञप्ति के रचयिता तो हरगिज नहीं हो सकते। किन्तु यदि दिगम्बर परम्परा के आर्यमंक्षु और नागहस्ती श्वेतम्बार परम्परा से भिन्न ही व्यक्ति हों तो उनका समय विक्रम की पाँचवीं शताब्दी अंत और छठी का आदि होना चाहिये और गुणधर को विक्रम की तीसरी शताब्दी का विद्वान होना चाहिए। ऐसी अवस्था में गुणधर द्वारा रचित कषायप्राभृत की प्राप्ति आर्यमंक्षु और नागहस्ती को आचार्य परम्परा से ही प्राप्त होने का उल्लेख जयवधलाकार ने किया है वह भी ठीक बैठ जाता है, और यतिवृश और आर्यमंक्षु तथा नागहस्ती गुरुशिष्यभाव भी बन जाता है।

जहाँ तक चूर्णिसूत्रकार आचार्य यतिवृषभ की आम्नाय का संबंध है उसमें न तो कोई मतभेद है और न उसे लिये कोई स्थान ही है, क्योंकि उनकी त्रिलोकप्रज्ञप्ति में दी गई आचार्य परम्परा से ही यह स्पष्ट है कि वे दिगम्बर आम्नाय के आचार्य थे। किन्तु कषायप्राभृत के रचयिता आचार्य गुणधर के संबंध में कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे उनकी आम्नाय के संबंध कुछ भ्रम हो सकता है या भ्रम पैâलाया जा सकता है। अत: उन बातों के संबंध में थोड़ा ऊहापोह करना आवश्यक है। वे बातें निम्न प्रकार हैं-

प्रथम, आचार्य गुणधर को वाचक कहा गया है। दूसरे, उनके द्वारा रची गई गाथाओं की प्राप्ति आर्यमंक्षु और नागहस्ती को होने का और उनसे अध्ययन करके यतिवृषभ के उन पर चूर्णिसूत्रों की रचना का उल्लेख पाया जाता है। तीसरे, धवला और जयधवला में षट्खंडागम के उपदेश से कषायप्राभृत के उपदेश को भिन्न बतलाया है। इनमें से पहले वाचकपद को ही लेना चाहिये।

तत्त्वार्थसूत्र का जो पाठ श्वेताम्बर आम्नाय में प्रचलित है उस पर रचे गये तथोक्त स्वोपज्ञ माध्य के अंत में एक प्रशस्ति है। उस प्रशस्ति में सूत्रकार ने अपने गुरुओं को तथा अपने को वाचक लिखा है। तत्त्वार्थसूत्र के अपने गुजराती अनुवाद की प्रस्तवना में पं. सुखलाल जी ने सूत्रकार उमास्वामि की परम्परा बतलाते हुए लिखा था-

‘‘उमास्वामी के वाचक वंश का उल्लेख और उसी वंश में होने वाले अन्य आचार्यों का वर्णन श्वेताम्बर षट्टार्वालयों पत्रवण्णा और नन्दी की स्थविरावली में पाया जाता है।

‘ये वलीले वा. उमास्वामी को श्वेताम्बर परम्परा का मनवाती हैं और अब तक के समस्त श्वेताम्बर आचार्य उन्हें अपनी परम्परा पहले से मानते आये हैं। ऐसा होते हुए भी उनकी परम्परा के संबंध में कितने ही वाचन तथा विचार के पश्वात् जो कल्पना इस समय उत्पन्न हुई है उसकी भी अभ्यासियों के विचार से दे देना यहाँ उचित समझता हूँ।

‘जब किसी महान नेता के हाथ से स्थापित हुए सम्प्रदाय में मतभेद के बीच पड़ते हैं, पक्षों के मूल बंधते हैं और धीरे धीरे वे विरोधका रूप लेते हैं तथा एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी प्रतिपक्ष रूप से स्थित होते हैं। तब उस मूल सम्प्रदाय में एक ऐसा वर्ग खड़ा होता है जो परस्पर विरोध करने वाले और लड़ने वाले एक भी पक्षी की दुराग्रही तरफदारी नहीं करता हुआ अपने से जहाँ तक बने वहाँ तक मूल प्रवर्तक पुरुष के सम्प्रदाय को तटस्थल से ठीक रखने का और उस रूप से ही समझने का प्रयत्न करता है। मनुष्य स्वभाव के नियम का अनुसरण करते वाली यह कल्पना यदि सत्य हो तो प्रस्तुत विषय में यह कहना उचित जान पड़ता है कि जिस समय श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों पक्षों ने परस्पर विरोधीपने का रूप धारण किया और अमुक विषयसंबंध में मतभेद के झगड़े की तरफ वे ढले उस समय भगवान महावीर के शासन को मानने वाला अमुक वर्ग दोनों पक्षों से तटस्थ रहकर अपने से जहाँ तक बने वहाँ तक मूल सम्प्रदाय को ठीक रखने के काम में पड़ा। इस वर्ग का मुख्य काम परम्परा से चले आये हुए शास्त्रों को कण्ठस्थ रख कर उन्हें पढ़ना पढ़ाना था और परम्परा से प्राप्त हुए तत्वज्ञान तथा आचार से संबंध रखने वाली सभी बातों का संग्रह रखकर उसे अपनी शिष्य परम्परा को देना था। जिस प्रकार वेदरक्षक पाठक श्रुतियों को बराबर कण्ठस्थ रखकर एक भी मात्राका फैर न पड़े ऐसी सावधानी रखते और शिष्य परम्परा को सिखाते थे, उसी प्रकार यह तटस्थ वर्ग जैन श्रुत को कंठस्थ रखकर उसकी व्याख्याओं का समझता, उसके पाठभेदों तथा उनसे संबंध रखने वाला कल्पना को संभालता और शब्द तथा अर्थ से पठन-पाठन द्वारा अपने श्रुत का विस्तार करता था। यही वर्ग वाचक रूप से प्रसिद्ध हुआ। इसी कारण से इसे पट्टावली में वाचकवंश कहा गया हो ऐसा जान पड़ता है।

इस प्रकार पं. जी ने वाचक उमास्वाति को दिगम्बर तथा श्वेताम्बर इन दोनों पक्षों से बिल्कुल तटस्थ ऐसी एक पूर्वकाजलीन जैन परम्परा का विद्वान बतलाकर तत्त्वार्थसूत्र और उसके स्वोपज्ञ भाष्य से ऐसी बहुत सी बातें भी प्रमाणरूप से उपस्थित की थीं जिनके आधार पर उन्हें वाचकवंश की तस्थता की कल्पना हुई थी। किन्तु इधर उनके तत्त्वार्थसूत्र के गुजराती अनुवाद का जो हिन्दी भाषान्तर प्रकट हुआ है उसकी प्रस्तावना में से उन्होंने तटस्थता की ये सब बातें निकाल दी हैं और जिन बातों के आधार पर उक्त कल्पना की थी उनकी भी कोई चर्चा नहीं की है और न अपने इस मतपरितर्वन का कुछ कारण ही लिखा है। उमास्वाति ने अपनी तथोक्त स्वोपज्ञ प्रशस्ति में अपने को और अपने गुरुओं को वाचक जरूर लिखा है किन्तु वाचकवंशी नहीं लिखा है। इसी से मुनि दर्शनविजय जी ने लिखा था-‘वाचक उमास्वाति जी वाचक थे किन्तु वाचकवंश के नहीं थे।

अत: वाचकवंश का संबंध भले ही श्वेताम्बर परम्परा से रहा हो किन्तु वाचक पद का संबंध किसी एक परम्परा से नहीं था। यदि ऐसा होता तो जयधवलाकार गुणधर को वाचक और अपने एक गुरु आर्यनंदि को महावचक पद से अलंकृत न करते। अत: मात्र वाचक कहे जाने मात्र से गुणधराचार्य को श्वेताम्बर परम्परा का विद्वान नहीं कहा जा सकता। अब रह जाती है समस्या आर्यमंक्षु और नागहस्ती की, जिन्हें परम्परा से गुणधर आचार्यकृत गाथाएँ प्राप्त हुई थीं। इन दोनों आचार्यों का नाम नन्दिसूत्र की पट्टावली में अवश्य आता है और उसमें नागहस्ती को वाचकवंश का प्रस्थापक और कर्मप्रकृति का प्रधान विद्वान भी कहा गया है। किन्तु इन दोनों आचार्यों के मन्तव्य का एक भी उल्लेख श्वेताम्बर परम्परा के आगमिक या कर्मविषयक साहित्य में उपलब्ध नहीं होता, जब कि धवला और जयधवला में उनके मतों का उल्लेख बहुतायत से पाया जाता है। और ऐसा प्रतीत होता है कि संभवत: जयधवलाकार के सन्मुख इन दोनों आचार्यों की कोई कृति रही हो। इन्हीं दोनों आचार्यों के पास कसायपाहुड का अध्ययन करके आचार्य यतिवृषभ ने अपने चूर्णिसूत्रों की रचना की थी, और बाद को उन्हीं के आधार पर अनेक आचार्यों ने कसायपाहुड पर वृत्तियाँ आदि लिखीं थीं। सारांश यह है कि दिगम्बर परम्परा को कसायपाहुड और उसका ज्ञान आर्यमंक्षु और नागहस्ती से ही प्राप्त हुआ था। यदि ये दोनों आचार्य श्वेताम्बर परम्परा के ही होते तो कसायपाहुड या तो दिगम्बर परम्परा को प्राप्त ही नहीं होता यदि होता भी तो श्वेताम्बर परम्परा उससे एक दम अछूती न रह जाती।

शायद कहा जाये, जैसा कि हम पहले लिख आये हैं, कि कषाय प्राभृत के संक्रम अनयोगद्वार की कुछ गाथायें कर्म प्रकृति में पाई जाती हैं अत: श्वेताम्बर परम्परा को उससे एकदम अछूता तो नहीं कहा जा सकता। इसके संबंध में हमारा मन्तव्य है कि प्रथम तो संक्रम अनुयोग द्वार संबंधी गाथाओं के गुणधर रचित होने में पूर्वाचार्यों में मतभेद था। कुछ आचार्यों का मत था कि उनके रचयिता आचार्य नागहस्ती थे। यद्यपि जयधवलाकार इस मत से सहमत नहीं हैं, फिर भी मात्र उतनी गाथाओं के कर्मप्रकृति में पाये जाने से यह नहीं कहा जा सकता कि आचार्य गुणधर का वारसा दिगम्बर परम्परा की तरह श्वेताम्बर परम्परा को भी प्राप्त था। दूसरे, यह हम पहले बतला आये हैं कि कषायप्राभृत की संक्रमवृत्ति संबंधी जो गाथाएँ कर्मप्रकृति में पाई जाती हैं, उनमें कषायप्राभृत की गाथाओं से कुछ भेद भी है और वह भेद सैद्धांतिक मतभेद को लिये हुए है। यदि कषायप्राभृत में उपलब्ध पाठ श्वेताम्बर परम्परा को मान्य होता तो कर्मप्रकृति में उसे हम ज्यों का त्यों पाते, कम से कम उसमें सैद्धांतिक मतभेद तो न होता। अत: वाचक पदालंकृत होने से या आर्यमंगु और नागहस्ती नाम श्वेताम्बर परम्परा में पाया जाने से कषायप्राभृत के रचयिता आचार्य गुणधर को श्वेताम्बर परम्परा का विद्वान नहीं माना जा सकता है। अब रह जाती है शेष तीसरी बात। किन्तु उससे भी यह नहीं कहा जा सकता कि षट्खंडागम के कषायप्राभृत की अम्नाय ही भिन्न थी। एक ही आम्नाय में होने वाले आचार्यों में बहुधा मतभेद पाया जाता है और इस मतभेद पर से मात्र इतना ही निष्कर्ष निकाला जाता है कि उन आचार्यों की गुरुपरम्पराएँ भिन्न थीं। जिसको गुरुपरम्परा से जो उपदेश प्राप्त हुआ उसने उसी को अपनाया। कर्मशास्त्र विषयक इन मतभेदों की चर्चा दोनों ही सम्प्रदायों में बहुतायत में पायी जाती है। अत: भिन्न उपदेश कहे जाने से भी यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि षट्खंडागम के कषायप्राभृत भिन्न सम्प्रदाय का ग्रंथ है। अत: कषायप्राभृत के रचयिता दिगम्बर सम्प्रदाय के ही आचार्य थे।

३. जय धवला के रचयिता-

जयधवला के अंत में एक लम्बी प्रशस्ति है, जिसमें उसके रचयिता, रचनाकाल तथा रचनादेश के संबंध में प्रकाश डाला गया है। रचयिता के संबंध में प्रशस्ति में लिखा है-

‘‘आसीदासीददासन्नभव्यसत्तवकुमुद्वतीम्।

मुद्वतीं कर्तुमीशो य: शशांक इव पुष्कल:।।१८।।
श्री वीरसेन इत्यात्तभट्टारकपृथुप्रथ:।
पारदृश्वाधिविधानां साक्षादिव स केवली।।१९।।
प्रीणितप्राणिसंपत्तिराक्रान्ताशेषगोचरा।
भारती भारतीवाज्ञा षट्खण्डे यस्य नास्खलत्।।२०।।
यस्य नैसर्गिकीं प्रज्ञां दृष्टवा सर्वार्थंगामिनीम्।
जाता: सर्वज्ञसद्भावे निरारेका मनीषिण:।।२१।।
यं प्राहु: प्रस्फुरद्वोधदीधितिप्रसरोदयम्।
श्रुतकेवलिनं प्राज्ञा: प्रज्ञाश्रमणसत्तमम्।।२२।।
प्रसिद्धसिद्धसिद्धान्तवार्धिवार्धौतशुद्धघी:।
सार्धं प्रत्येकबुद्धैर्य: स्पर्धते धीद्धबुद्धिभि:।।२३।।
पुस्तकानां चिरन्तानां गुरुत्वमिह कुर्वता।
येनातिशयिता: पूर्वे सर्वे पुस्तकशिष्यका:।।२४।।
यस्तपोदीप्तकिरणैर्भव्याम्भोजानि बोधयन्।
व्यद्योतिष्ट मुनीनेन: पंचस्तूपान्वयाम्वरे।।२५।।
प्रशिष्यश्चन्द्रसेनस्य य: शिष्योऽप्यार्यनन्दिनाम्।
कुलं गणं च सन्तानं स्वगुणैरुदजिज्वलत्।।२६।।
तस्य शिष्योऽभवच्छ्रीमान् जिनसेन: समिद्धधी:।
अविद्धावपि यत्कणौं विद्धौ ज्ञानशलाकया।।२७।।
यस्मिन्नासन्नभव्यत्वान्मुक्तिलक्ष्मी: समुत्सुका।
स्वयं वरीतुकामेव श्रौतिं मालामयूयुजत्।।२८।।
येनानुचरिता (तं) बाल्याद्रब्रह्यव्रतमखण्डितम्।
स्वयंरविधानेन चित्रमूढ़ा सरस्वती।।२९।।
यो नातिसुन्दराकारो न चाातिचतुरो मुनि:।
तथाप्यनन्यशरणा यं सरस्वत्युपाचरत्।।३०।।
धी: शमो विनयश्चेति यस्य नैसर्गिका: गुणा:।
सूरीनाराधयंति स्म गुणैराराध्यते न क:।।३१।।
य: कृशोऽपि शरीरेण न कृशोऽभूत्तपोगुणै:।
न कृशत्वं हि शरीरं गुणैरेव कृश: कृश:।।३२।।
ये (यो ) नाग्रहीत्कपिलिका नाप्यचिन्तयदंजसा।
तथाप्यध्यात्मविद्याब्धे: परं पारमशिश्रियत्।।३३।।
ज्ञानाराधनया यस्य गत: कालो निरन्तरम्।
ततो ज्ञानमयं पिण्डं यमाहुस्तत्त्वदर्शिन:।।३४।।
तेनेदमनतिप्रौढमतिना गुरुशासनात्।
लिखितं विशदैरेभिरक्षरै: पुण्यशासनम्।।३५।।
गुरुणार्धेऽग्रिमे भूरिवक्तव्ये संप्रकाशिते।
तन्निरीक्ष्याल्पवक्तव्य: पश्चार्धस्तेन पूरित:।।३६।।

इस प्रशस्ति के पूर्वार्ध में आचार्य वीरसेन के गुणों का वर्णन किया गया है और उत्तरार्ध में उनके शिष्य आचार्य जिनसेन का। इसमें संदेह नहीं कि आचार्य वीरसेन अपने समय के एक बहुत बड़े विद्वान् थे। उन्होंने अपनी दोनों टीकाओं में जिन विविध विषयों का संकलन तथा निरूपण किया है उन्हें देखकर यदि उस समय के भी विद्वानों की सर्वज्ञ के सद्भाव विषयक शंका दूर हो गई थी तो उसमें अचरज नहीं है, क्योंकि इस समय भी उसे पढ़कर विद्वानों को यह अचरज हुए बिना नहीं रहता कि एक व्यक्ति को कितने विषयों का कितना अधिक ज्ञान था। इसके साथ ही साथ वे दोनों सिद्धांत ग्रंथों के रहस्य के अपूर्व वेत्ता थे तथा प्रथम सिद्धांत ग्रंथ षट्खंडागम के छहों खण्डों में तो उनकी भारती भारती आज्ञा के समान अस्खलितगति थी। सम्भवत: वे प्रथम चक्रवर्ती भरत के ही समान प्रथम सिद्धांतचक्रवर्ती थे। उनके बाद से ही सिद्धांतग्रंथों के ज्ञाताओं को यह पद दिया जाने लगा था। उनके आगमविषयक ज्ञान और बुद्धिचातुरी को देखकर विद्वान उन्हें श्रुतकेवली और प्रज्ञाश्रमणों में श्रेष्ठ तक कहते थे। ग्यारह अंग और चौदह पूर्व का पाठी न होने पर भी श्रुतावरण और वीर्यान्तराय के प्रकृष्ट क्षयोपश्म से जो असाधरण प्रज्ञाशक्ति प्राप्त हो जाती है जिसके कारण द्वादशांग के विषयों का नि:संशय कथन किया जा सकता है उसे प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि कहते हैं। और उसके धारक मुनि प्रज्ञाश्रमण कहलाते हैं। श्री वीरसेनस्वामी की इस प्रज्ञाशक्ति के दर्शन उनकी टीकाओं में पद पद पर होते हैं। प्रशस्तिकार के इन उल्लेखों से पता चलता हे कि अपने समय में ही वे किस कोटि के ज्ञानी और संयमी समझे जाते थे। वे प्राचीन पुस्तकों के पढ़ने के भी इतने प्रेमी थे कि वे अपने से पूर्व के सब पुस्तकों से बढ़ गये थे। उनकी टीकाओं में जिन विविधग्रंथों से उद्धारण लिये गये हैं और उनसे सिद्धांत ग्रंथों की जिन अनेक टीकाओं के संलोडन का परिचय मिलता है उससे भी उनके इस पुस्तकप्रेम का समर्थन होता है।

इन साक्षात् सर्वज्ञसम, प्रज्ञाश्रमणों में श्रेष्ठ श्री वीरसेनस्वामी के शिष्य की जिनसेन भी अपने गुरु के अनुरूप ही विद्वान थे। मालूम होता है वे बाल्यकाल से ही गुरुकुल में बास करने लगे थे इसलिये उनका कनछेदन भी न हो सका था। वे शरीर से कृश थे, अति सुन्दर भी नहीं थे, फिर भी उनके गुणों पर मोक्षलक्ष्मी और सरस्वती दोनों ही मुग्ध थीं। एक ओर वे अखंड ब्रह्मचारी और परिपूर्णसंयमी थे तो दूसरी और अनुपम विद्वान थे। इन दोनों गुरुशिष्यों ने ही इस जयधवला टीका का निर्माण किया है। प्रशस्ति के ३५ वें श्लोक से यह स्पष्ट है कि यह प्रशस्ति स्वयं श्री जिनसेन की बनाई हुई है क्योंकि उसमें वे लिखते हैं कि उस अनतिप्रौढमति जिनसेन ने गुरु की आज्ञा से यह पुण्य शासन-पवित्र प्रशस्ति लिखी।

प्रशस्ति के ३६ वें श्लोंक में लिखा है कि गं्रथ का पूर्वार्धं गुरु वीरसेन ने रचा था और उत्तरार्ध शिष्य जिनसेन ने। किन्तु वह पूर्वार्धं कहां तक समझा जाय इसका कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है, न कहीं बीच में ही कोई इस प्रकार का उल्लेख वगैरह मिल सका है जिससे यह निर्णय किया जा सके कि यहाँ तक श्री वीरसेन स्वामी की रचना है। यद्यपि श्री स्वामी रचित भाग को टीका कहा है, फिर भी ग्रंथ के वर्णन क्रम में भी कोई ऐसी स्पष्ट भेदक शैली नहीं मिलती जिससे यह निर्णय किया जा सके कि किसने कितना भाग रचा था। हाँ, श्रुतावतार में आचार्य इन्द्रनन्दि ने यह अवश्य निर्देश किया है कि कषायप्राभृत की चार विभक्तियों पर बीस हजार प्रमाण रचना करके श्री वीरसेन स्वामी स्वर्ग को सिधार गये। उसके पश्वात् उनके शिष्य जयसेन गुरु ने ४० हजार श्लोकप्रमाण में उस टीका को समाप्त किया और इस प्रकार वह टीका ६० हजार प्रमाण हुई। प्रशस्ति में एक श्लोक निम्नप्रकार है-

‘‘विभक्ति: प्रथमस्कन्धो द्वितीय: संक्रमोदय:।

उपयोगश्च शेषस्तु तृतीय: स्कंध इष्यते।।१०।।’’

अर्थात्-इस ग्रंथ में तीन स्कंध हैं। उनमें से विभक्ति तक पहला स्कंध है। संक्रम उदय और उपयोगाधिकार तक दूसरा स्कंध है और शेष भाग तीसरा स्कंधमाना जाता है। इसके अनुसार पेज्जदोषविभक्ति, प्रकृतिविभक्ति, अनुभागविभक्ति, और प्रदेश विभक्ति तक पहला स्कंध होता है। और चूँकि झीणाझीण और स्थित्यन्तिक अधिकार प्रदेशविभक्ति अधिकार के ही चूलिका रूप से कहे गये हैं तथा दूसरा स्कंध संक्रम अधिकार से गिना है इस लिये इन्हें भी विभक्तिस्कंध में ही सम्मिलित समझना चाहिए।

इन्द्रनन्दि के कथनानुसार पहले स्कंध की टीका श्री वीरसेन स्वामी ने रची थी। यद्यपि वे चार विभक्तियों पर टीका लिखने का उल्लेख करते हैं किन्तु पेज्जदोषविभक्ति, स्थिति विभक्ति, अनुभागविभक्ति और प्रदेश विभक्ति में उक्त सभी अधिकार गर्भित समझे जाते हैं अत: चार विभक्ति के उल्लेख से उनका आशय प्रथम स्कंध का मालूम होता है। किन्तु जयधवला की प्रति के आधार से गणना करने पर विभक्ति अधिकार पर्यन्त ग्रंथ का परिणाम लगभग साढे २६ हजार श्लोक प्रमाण बैठता है। यहाँ तक ग्रंथ का विवेचन विस्तृत और स्पष्ट भी प्रतीत होता है, आगे उनका विस्तृत वर्णन भी नहीं है। अत: सम्भवत: पहले स्कंध पर्यन्त श्री वीरसेन स्वामी की रचना है। इन्द्रनन्दि ने प्रत्येक स्कंध को एक एक भाग समझकर मोटे रूप से उसका परिणाम २० हजार लिख दिया जान पड़ता है। अथवा यह भी संभव है कि उन्होंने चार विभक्ति से केवल चार ही विभक्ति का ग्रहण किया हो और पूरे प्रथम स्कंध का ग्रहण न किया हो। अस्तु, जो कुछ हो, किन्तु इतना स्पष्ट है कि इन्द्रनन्दि के कथनानुसार एक भाग के रचयिता श्री वीरसेन स्वामी थे और शेष दो भाग प्रमाण ग्रंथ उनके शिष्य जिनसेन ने रचकर समाप्त किया था। इस बारे में जिनसेन स्वयं इतना ही कहते हैं कि बहुवक्तव्य पूर्वार्ध की रचना उनके गुरु ने की और अल्पवक्तव्य पश्चार्ध की रचना उन्होंने की। वह बहुवक्तव्य पूर्वार्ध विभक्ति अधिकार पर्यन्त प्रतीत होता है। जयधवला की अंतिम प्रशस्ति के आरंभ में उसकी रचना काल और स्थान बतलाते हुए लिखा है-

‘‘इति श्री वीरसेनीया टीका सुत्रार्थदर्शिनी।

वाटग्रामपुरे श्रीमद्गुर्जरार्यानुपालिते।।६।।
फाल्गुणे मासि पूर्वाण्हे दशम्यां शुक्लपक्षके।
प्रवद्र्धमानपूजोरुनन्दीश्वरमहोत्सवे।।७।।
अमोघवर्षराजेन्द्रराज्यप्राज्यगुणोदया।
निष्ठिता प्रचयं यायादाकल्पान्तमनल्पिका।
एकान्नषष्ठिसमधिकसप्तशताब्देषु शकनरेन्द्रस्य।
समतीतेषु समाप्ता जयधवला प्राभृतव्याख्या।।११।।’’

इसमें बतलाया है कि कषाय प्राभृत की व्याख्या श्री वीरसेन रचित जयधवला टीका गुर्जरार्य के द्वारा पालित वाटग्रामपुर में, राजा अमोघवर्ष के राज्यकाल में, फाल्गुन शुक्ल दशमी के पूर्वाण्ह में जबकि नन्दीश्वर महोत्सव मनाया जा रहा था, शकराजा के ७५९ वर्ष बीतने पर समाप्त हुई। इससे स्पष्ट है कि शक सम्वत् ७५९ के फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि जो जयधवला समाप्त हुई थी। धवला की अंतिम प्रशस्ति में उसका रचनाकाल शक सम्वत् ७३८ दिया है। शक सम्वत् ७३८ के कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन धवला समाप्त हुई थी। अत: धवला से जयध्यावला अवस्था में भी २१ वर्ष और चार मास के लगभग छोटी है।

धवला में उस समय जगत्तुंगदेव का राज्य बतलाया है और अंत के एक श्लोक में यह भी लिखा है कि उस समय नरेन्द्र चूडामणि बोद्दणराय पृथ्वी को भोग रहे थे। किन्तु जयधवला में स्पष्ट रूप से अमोघ वर्ष राजा के राज्य का उल्लेख किया है। यह राजा जैन था और स्वामी जिनसेनाचार्य का भक्त शिष्य था। जिनसेन के शिष्य श्री गुणभद्राचार्य ने उत्तर पुराण के अंत में लिखा है राजा अमोघवर्ष स्वामी जिनसेन के चरणों में नमस्कार करके अपने को पवित्र हुआ मानता था यथा-

‘‘यस्य प्रांशुनखांशुजालविसरद्वारन्तराविर्भव-

त्पांदाम्भोजरज:पिशंगमुकुटप्रत्यग्ररत्नद्युति:।
संस्मर्ता स्वममोघवर्षनृपति: पूतोऽहमद्येत्यलं
स श्री माज्जिनसेपूज्यभगवत्पादो जगन्मंलम्।।१०।।’’

अमोघवर्ष की राजधानी मान्यखोट थी। निजाम राज्य में शोलापुर से ९० मील दक्षिण-पूर्व में जो मलखेड़ा ग्राम विद्यमान है, उसे ही मान्यखोट कहा जाता है। शक सं. ७३६ में इसका राज्यारोहण हुआ माना जाता है। इस हिसाब से धवला उसके राज्य के दूसरे वर्ष में समाप्त हुई थी। जगत्तुंग अमोघवर्ष के पिता का नाम था, और वोद्दणराय सम्भवत: अमोघवर्ष का नाम था। इतिहासज्ञों का मत है कि अमोघवर्ष नाम नहीं था किन्तु उपाधि थी। परन्तु कालान्तर में रूढ़ हो जाने के कारण वही नाम हो गया। सम्भवत: इसीलिए धवला की प्रशस्ति में अमोघ वर्ष नाम नहीं पाया जाता क्योंकि धवला की समाप्ति के अमोघवर्ष का राज्याभिषेक हुए थोड़ा ही समय बीता था, और अमोघवर्ष को राज्य करते हुए २३ वर्ष हो रहे थे। अत: उस समय वे इसी नाम से प्रसिद्ध हो चुके होंगे। यही कारण है कि जयधवला में अमोघवर्ष राजेन्द्र के राज्य उल्लेख में मिलता है।

धवला की प्रशस्ति में धवला के रचना स्थान का निर्देश नहीं किया। किन्तु जयधवला की प्रशस्ति में वाटग्रामपुर में जयधवला की समाप्ति होने का उल्लेख किया है और यह भी लिखा है कि वाटग्रामपुर गुर्जरार्य द्वारा पालित था। आगे प्रशस्ति के श्लोक नं. १२ से १५ तक में गुर्जरनरेन्द्र की बड़ी प्रशंसा की है और बतलाया है कि गुर्जरनरेन्द्र की चंद्रमा के समान स्वच्छ कीर्ति के मध्य में पड़कर गुप्तनरेश शक की कीर्ति मच्छर के समान प्रतीत होती है। यह गुर्जरनरेन्द्र कौन था? और उससे पालित वाटग्रामपुर कहाँ है?

यह तो स्पष्ट ही है कि वह कोई गुजरात का राजा था, और उससे पालित वाटग्राम भी सम्भवत: गुजरात का कोई ग्राम होना चाहिये। किन्तु वह गुर्जरनरेन्द्र अमोघवर्ष ही था, या कोई दूसरा था?

अमोघवर्ष के पिता गोविन्दराज तृतीय के समय के श. सं. ७३५ के एक ताम्रपत्र से प्रतीत होता है कि उसने लाटदेश-गुजरात के मध्य और दक्षिणी भाग को जीतकर अपने छोटे भाई इन्द्रराज को वहाँ का राज्य दे दिया था। इसी इन्द्रराज ने गुजरात में राष्ट्रकूटों की दूसरी शाखा स्थापित की। शक सं. ७५७ का एक ताम्रपत्र बड़ौदा से मिला है। यह गुजरात के राजा माहसमन्ताधिपति राष्ट्रकूट ध्रुवराज है। इससे प्रकट होता है कि अमोघवर्ष के चाचा का नाम इंद्रराज था और उसके पुत्र कर्कराज ने बगावत करने वाले राष्ट्रकूटों से युद्ध कर अमोघवर्ष को राज्य दिलवाया था। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि लाटके राजा ध्रवराज प्रथम ने अमोघवर्ष के खिलाफ कुछ गड़बड़ मचाई थी। इसी से अमोघवर्ष को उस पर चढ़ाई करनी पड़ी और सम्भवत: इसी युद्ध में वह मारा गया। हमारा अनुमान भी ऐसा ही है। यद्यपि अमोघवर्ष से पहले उसके पिता गोविन्द्रराज तृतीय ने ही गुजरात के कुछ भाग को जीतकर अपने छोटे भाई इन्द्रराज को वहाँ का राजा बना दिया था, किन्तु अमोघवर्ष के राज्यकाल में लाट के राजा ध्रुवराज के द्वारा बगावत की जाने पर अमोघवर्ष को उस पर चढ़ाई करनी पड़ी और सम्भवत: गुजरात उसके राज्य में आ गया। यह घटना जयधवला की समाप्ति के कुछ ही समय पहले की होनी चाहिए, क्योंकि ध्रुवराज प्रथम का ताम्रपत्र श.सं. ७५७ का है और जयधवला की समाप्ति ७५९ श.सं. में हुई है। डॉ. आल्टेकर का अनुमान है कि यह वाटग्राम बड़ौदा हो सकता है, क्योंकि बड़ौदा का प्राचीन नाम वटप्रद था और वह गुजरात में भी है तथा वहाँ से राष्ट्रकूट राजाओं के कुछ ताम्रपत्र भी मिले हैं। वाटग्राम के गुजरात में होने और गुजरात का प्रदेश उसी समय के लगभग अमोघ वर्ष के राज्य में आने के कारण ही सम्भवत: श्री जिनसेन ने गुर्जरनरेन्द्र करके अमोघवर्ष का उल्लेख किया है। हम ऊपर लिख आये हैं कि गुर्जरनरेन्द्र की प्रशंसा करते हुए उसकी कीर्ति के सामने गुप्तनरेश की कीर्ति को भी अतितुच्छ बतलाया है। गुजरात के संजान स्थान से प्राप्त एक ताम्रपत्र में अमोघवर्ष की प्रशंसा में एक श्लोक इस प्रकार मिलता है-

‘‘हत्वा भ्रातरमेवराज्यमहरत् देवीं च दीनस्तथा,

लक्षं कोटिमलेखयत् किल कलौ दाता स गुप्तान्वय:।
येनात्याजि तनु: स्वराज्यमसकृत् वाह्यार्थवै: का कथा,
ह्रीस्तस्योन्नति राष्ट्रकूटतिलक दातेति कीत्र्यामपि।।४८।।

इसमें बतलाया है कि जिस अमोघवर्ष राजा ने अपना राज्य और शरीर तक त्याग दिया उसके सामने वह दीन गुप्तवंशी नरेश क्या चीज है जिसने अपने सहोदर भाई को ही मारकर उसका राज्य और पत्नी तक को हर लिया।

भारतीय इतिहास से परिचत जन जानते है कि गुप्तवंश में समुद्रगुप्त पुत्र चंद्रगुप्त विक्रमादित्य बड़ा प्रतापी राजा हुआ है। इसने भारत के शक राज्य को उखाड़ पेâका था। यह समुद्रगुप्त छोटा बेटा था। समुद्रगुप्त इसी को अपना उत्तरधिकारी बनाना चाहाता था। परन्तु मंत्रियों ने बड़े पुत्र रामगुप्त को ही राज्य दिलवाया। उसके राज्य पाते ही कुषानवंशी राजा ने गुप्त साम्राज्य पर चढ़ाई कर दी। रामगुप्त घिर गया। और अपनी रानी ध्रुवज्ञस्वामिनी को सौंप देने की शर्त पर उसने शत्रु से छुटकारा पाया। तब चन्द्र्रगुप्त ने कायर भाई को अपने मार्ग से हटाकर उसके राज्य और देवी ध्रुवस्वामिनी पर अपना अधिकार कर लिया। उक्त श्लोक में अमोघवर्ष की प्रशंसा करते हुए इसी घटना का चित्रण किया गया है। इस चित्रण के आधार पर हमारा अनुमान है कि जयधवला की प्रशस्ति के १२ वें श्लोक में जिस गुप्तनृपति का उल्लेख किया गया है वह चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ही होना चाहिये। शकों में भगाने के कारण उसकी उपाधि शकारि भी थी। सम्भवत: ‘शकस्य’ पद से उसकी उसी उपाधि की ओर या उसके कार्य की ओर संकेत किया गया है। इस पर से हमारे इस अनुमान की और भी पुष्टी होती है कि गुर्जरनरेन्द्र से आशय अमोघवर्ष का ही है। अत: जयधवला की अंतिम प्रशस्ति से यह स्पष्ट है कि जयधवला की रचना अमोघवर्ष के राज्य में शक सं. ७५९ में हुई थी।

धवला और जयधवला के रचनाकाल से आचार्य वीरसेन और जिनसेन के कार्यकाल पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। यह तो स्पष्ट ही है कि धवला के समाप्तिकाल श. सं. ७३८ में वीरसेन जीवित थे। धवला को समाप्त करके उन्होंने जयधवला को हाथ में लिया। किन्तु उसका पूर्वार्ध ही उन्होंने बना पाया। उत्तरार्ध की रचना उनके शिष्य जिनसेन ने पूर्ण की। जिस समय जयधवला की प्रशस्ति के ३५ वें श्लोक में यह पढ़ते हैं कि शायद उस समय भी स्वामी वीरसेन जीवित थे किन्तु अतिवृद्ध हो जाने के कारण जयधवला के लेखनकार्य को चलाने में वे असमर्थ थे, इस लिये उन्होंने इस कार्य को पूर्ण करने के का भार अपने सुयोग्य शिष्य जिनसेन को सौंप दिया था। किन्तु जब उसी प्रशस्ति के ३६ वें श्लोक में हम जिनसेन स्वामी को यह कहते हुए पाते हैं कि गुरु के द्वारा विस्तार से लिखे गये पूर्वार्ध को देखकर उसने (जिनसेन ने) पश्चार्ध को लिखा तो चित्त को एक ठोस सी लगती है और अन्त:करण में एक प्रश्न पैदा होता है कि यदि वीरसेन स्वामी उस समय जीवित होते तो जिनसेन को उनके बनाये हुए पूर्वार्ध को ही देखकर पश्चार्ध के पूरा करने की क्या आवश्यकता थी? वे वुद्ध गुरु के चरणों में बैठकर उसे पूराकर सकते थे। अत: इससे यही निष्कर्ष निकालना पड़ता है कि जयधवला के कार्य को अधूरा ही छोड़कर स्वामी वीरसेन दिवंगत हो गये थे।

धवला की समाप्ति श. सं. ७३८ में हुई थी और जयधवला की समाप्ति उससे २१ वर्ष पश्चात्। यदि स्वामी वीरसेन ने धवला को समाप्त करके ही जयधवला में हाथ लगा दिया होगा तो उन्होंने जयधवला का स्वरचित भाग अधिक से अधिक ७ वर्ष के लगभग श. सं. ७४५ में बना पाया होगा। इसी समय के लगभग उनका अंत होना चाहिये।

शक सं. ७०५ में समाप्त हुए हरिवंशपुराण के प्रारंभ में स्वामी वीरसेन और उनके शिष्य जिनसेन को स्मरण किया गया है। स्वामी वीरसेन को कवि चक्रवर्ती लिखा है और उनके शिष्य जिनसेन के विषय में लिखा है कि पाश्र्वाभ्युदय नामक काव्य में की गई पाश्र्वनाथ भगवान के गुणों की स्तुति उनकी कीर्ति का संकीर्तन करती है। इसका मतलब यह हुआ कि शक सं. ७०५ से पहले स्वामी वीरसेन के शिष्य स्वामी जिनसेन न केवल ग्रंथ रचना करना प्रारंभ कर दिया था किन्तु उनकी कृति का विद्वानों में समादर भी होने लगा था। किन्तु सम्भवत: उस समय तक उनके गुरु ने सिद्धांतग्रंथों की टीका करने में हाथ नहीं लगाया थ। हमारा अनुमान है कि पाश्र्वाभ्युदय हरिवंशपुराण से कुछ वर्ष पहले तो अवश्य ही समाप्त हो चुका होगा। अधिक नहीं तो हरिवंश की समाप्ति से ५ वर्ष पहले उसकी रचना अवश्य हो चुकी होगी। यदि हमारा अनुमान ठीक है तो शक सं. ७०० के आस पास उसकी रचना होनी चाहिए। उस समय जिनसेनाचार्य की अवस्था कम से कम बीस वर्ष की तो अवश्य रही होगी। जिनसेनाचार्य ने अपने को अविद्धकर्ण कहा है। इसका मतलब यह होता है कि कर्णवेध संस्कार होने से पूर्व ही वे गुरुचरणों में चले आये थे। तथा उन्होंने वीरसेन के सिवा किसी दूसरे को अपना गुरु नहीं बतलाया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विद्यागुरु और दीक्षागुरु वीरसेन ही थे। संभवत: होनहार समझकर गुरु वीरसेन ने उन्हें बचपन में ही अपने संघ में ले लिया था। यदि बालक जिनसेन ६ वर्ष की अवस्था में गुरु चरणों में आया हो ता उस समय गुरु वीरसेन की अवस्था कम से कम २१ वर्ष की तो अवश्य रही होगी। अर्थात् गुरु और शिष्य की अवस्था में १५ वर्ष का अंतर था ऐसा हमारा अनुमान है। इसका मतलब यह हुआ कि श. सं. ७०० में यदि जिनसेन २० वर्ष के थे तो उनके गुरु वीरसेन ३५ वर्ष के रहे होंगे। यद्यपि गुरु और शिष्य की अवस्था में इतना अंतर होना आवश्यक नहीं है, उससे बहुत कम अंतर हरते हुए भी गुरु-शिष्य भाव आजकल भी देखा जाता है। किन्तु एक तो दोनों के अंतिमकाल को दृष्टि में रखते हुए दोनों की अवस्था में इतना अंतर होना उचित प्रतीत होता है। दूसरे, दोनों में जिस प्रकार का गुरुशिष्य भाव था-अर्थात् यदि बचपन में से ही जिनसेन अपने गुरु के पादमूल में आ गये थे और उन्हीं के द्वारा उनकी शिक्षा और दीक्षा हुई थी तो इतना अंतर तो अवश्य होना ही चाहिए क्योंकि उसके बिना बालक जिनसेन के शिक्षण और पालन के लिए जिस पितृभाव की आवश्यकता हो सकती है एक दम नव-उम्र वीरसेन में वह भाव नहीं हो सकता। अत: श.सं. ७०० में वीरसेन की अवस्था ३५ की और जिनसेन की अवस्था २० की होनी चाहिए। धवला और जयधवला के रचना काल के आधार पर यह हम ऊपर लिख ही चुके हैं कि वीरसेन स्वामी की अवस्था ८० वर्ष के लगभग थी। शक सं. ६६५ के लगभग उनका जन्म हुआ और शं. सं. ७४५ के लगभग अंत। धवला की समाप्ति श. सं. ७३८ में हुई थी और जयधवला की समाप्ति उससे २१ वर्ष बाद श. सं. ७५९ में। यदि धवला की रचना में भी इतना ही समय लगा हो तो कहना होगा कि श. सं. ७१७ से ७४५ तक स्वामी वीरसेन का रचनाकाल रहा है।

स्वामी जिनसेन के पाश्र्वाभ्युदय का ऊपर उल्लेख कर आये हैं और यह भी बतला आये हैं कि वह श.सं. ७०० के लगभग की रचना होना चाहिए और उस समय जिनसेन स्वामी की अवस्था कम से कम २० वर्ष की अवश्य होनी चाहिए। इनकी दूसरी प्रसिद्ध कृति महापुरण है जिसके पूर्व भाग आदि पुराण के ४२ सर्ग ही उन्होंने बना पाये थे। शेष की पूर्ति उनके शिष्य गुणभद्राचार्य ने की थी। ऐसा प्रतीत होता है कि आदि पुराण की रचना धवला की रचना के बाद प्रारंभ की गई थी, क्योंकि उसके प्रारंभ में स्वामी वीरसेन का स्मरण करते हुए उनकी धवला भारती को नमस्कार किया है। अत: शक सं. ७३८ के पश्वात् उन्होंने आदि पुराण की रचना प्रारंभ की होगी। जयधवला को बीच में ही अधूरी छोड़कर स्वामी वीरसेन के स्वर्ग चले जाने के पश्चात् स्वामी जिनसेन को आदिपुराण को अधूरा ही छोड़कर उसमें अपना समय लगाना पड़ा होगा। क्योंकि उस समय उनकी अवस्था भी ६५ वर्ष के लगभग रही होगी। अत: वृद्धावस्था के कारण अपने आदिपुराण को समाप्त करके जयधवला कार्य पूरा करने की अपेक्षा उन्हें यह अधिक आवश्यक जान पड़ा होगा कि गुरु के अधूरे काम को पहले पूर्ण किया जाय। अत: उन्होंने जयधवला का कार्य हाथ में लेकर श. सं. ७५९ में उसे पूरा किया। उसके पश्चात् उनका स्वर्गवास हो जाने के कारण आदिपुराण अधूरा रह गया और उसे उनके शिष्य गुणभद्राचार्य ने पूरा किया। इस प्रकार श. सं. ७०० से ७६० तक स्वामी जिनसेन का कार्यकाल समझना चाहिए। इन दोनों गुरु शिष्यों ने जिन शासन की जो महती सेवा की जैन वांग्मय के इतिहास में वह सदा अमर रहेगी।