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कषायप्राभृत की जयधवला टीका

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कषायप्राभृत की जयधवला टीका

कसायपाहुड और उसके चूर्णिसूत्रों के साथ जो विस्तृत टीका है उसका नाम जयधवला है। यों तो टीकाकार ने इस टीका की प्रथम मंगलगाथा के आदि में ही ‘जयइ धवलंगतेए-’ पद देकर इसके जयधवला नाम की सूचना दे दी है। किन्तु अंत में तो उसके नामका स्पष्ट उल्लेख कर दिया है। यथा-

‘‘एत्थ समप्पइ धवलियतिहुवणभवण पसिद्धमाहप्पा।

पाहुडसुत्ताणमिमा जयधलवासण्णिया टीका।।१।।’’

अर्थात्-‘तीनों लोकों के भवनों को धवलित करने वाली और प्रसिद्ध माहात्म्यवाली कसायपाहुड सूत्रों की यह जयधवला नामकी टीका यहाँ समाप्त होती है।।१।। ऊपर के उल्लेखों से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि इस टीका का नाम जयधवला है किन्तु यह जानने की आकांक्षा बनी ही रहती है कि इसको यह नाम क्यों दिया गया? टीकाकार ने स्वयं तो इस संबंध में स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं लिखा, किन्तु उनके उल्लेखों से कुछ कल्पना जरूर की जा सकती है। टीका के प्रारंभ में टीकाकार ने भगवान् चंद्रप्रभ स्वामी की जयकामना करते हुए उने धवलवर्ण शरीर का उल्लेख किया है। ८ वें तीर्थंकर श्री चंद्रप्रभ स्वामी के शरीर का वर्ण धवल श्वेत था यह प्रकट ही है। अत: इस पर से यह कल्पना की जा सकती है कि जिस वाटग्रामपुर में इस टीका की रचना हुई है उसके जिनालय में चंद्रप्रभ स्वामी की कोई श्वेतवर्ण मूर्ति रही होगी, उसी के सान्निध्य में होने के कारण टीकाकार ने अपनी टीका में चंद्रप्रभ भगवान का स्तवन किया है और उसी पर से जयधवला नाम की सृष्टि की गई है। किन्तु यह कल्पना करते समय हमें यह न भुला देना चाहिये कि टीकाकार श्री वीरसेन स्वामी ने इससे पहले प्रथम सिद्धांतग्रंथ षट्खंडागम पर धवला नाम की टीका बनाई थी। उसके पश्चात् इस जयधवला टीका का निर्माण हुआ है। अत: इस नाम का मूलाधार तो प्रथम टीका का धवला नाम है। उसी पर से इसका नाम जयधवला रखा गया है और दोनों में भेद डालने के लिए धवला के पहले जय विशेषण लगा दिया गया है। फिर भी यत: मूल नाम धवला है अत: उस नाम की कुछ सार्थकता तो इसमें होनी ही चाहिये, सम्भवत: इसीलिये इस टीका के प्रारंभ में धवलशरीर श्री चंद्रप्रभ भगवान का स्तवन किया गया है।

षट्खंडागम के प्रथम भाग की प्रस्तावना में उसकी टीका धवला के नाम की सार्थकता बतलाते हुए लिखा है कि ‘वीरसेन स्वामी ने अपनी टीका का नाम धवला क्यों रखा यह कहीं बतलाया गया दृष्टिगोचर नहीं हुआ। धवल का शब्दार्थ शुक्ल के अतिरिक्त शुद्ध, विशद, स्पष्ट भी होता है। संभव है अपनी टीका के इसी प्रसाद गुण को व्यक्त करने के लिए उन्होंने यह नाम चुना हो। यह टीका कार्तिक मास के धवलपक्ष की त्रयोदशी को समाप्त हुई थी। अत एव संभव है इसी निमित्त से रचयिता को यह नाम उपयुक्त जान पड़ा हो। यह टीका अमोघवर्ष (प्रथम) के राज्य के प्रारंभ काल में समाप्त हुई थी। अमोघवर्ष की अनेक उपाधियों में एक उपाधि 'अतिशयधवल’ भी मिलती है। संभव है उनकी यह उपाधि भी धवला के नामकारण में एक निमित्त कारण हुआ है।

उक्त संभावित तीनों ही कारण इस जयधवला टीका में भी पाये जाते हैं। प्रथम, धवला की तरह यह भी विशद है ही। दूसरे, इसकी समाप्ति भी शुक्ल पक्ष में हुई है और तीसरे, वह अमोघवर्ष (प्रथम) के राज्य काल में समाप्त हुई है। अत: यदि इन निमित्तों से टीका का नाम धवला पड़ा हो तो उन्हीं निमित्तों से इसका नाम भी धवला रखकर भेद डालने के लिए उसके पहले ‘जय’ विशेषण लगा दिया गया है। अस्तु, जो हो, किन्तु यह तो सुनिश्चित है कि नामकरण पहले धवला का ही किया गया है और वह केवल किसी एक निमित्त से ही नहीं किया गया। हमार अनुमान है कि धवला टीका की समाप्ति के समय उसका यह नामकरण किया गया है और नामकरण करते समय भूतबलि पुष्पदंत के धवलामल अंक को जरूर ध्यान में रखा गया है। भूतबलि पुष्पदंत के शरीर की धवलिमा, कुन्देंदुशंख वर्ण दो वृषभों का स्वप्न में धरसेन के पादमूलों में आकार नमना, धवलपक्ष में और ‘अतिशय धवल’ उपाधि के धारक राजा अमोघ वर्ष के राज्यकाल में ग्रंथ की समाप्ति होने आदि निमित्तों से पहली टीका का नाम धवला रखना ही उपयुक्त प्रतीत हुआ होगा।

ये तो हुए बाह्य निमित्त। उसके अंतरंग निमित्त अथवा धवला नामकी सार्थकता का उल्लेख तो ऊपर उद्धत जयधवला की प्रशस्ति के प्रथम पद्य में ‘धवलियतिहुअणभवणा’ विशेषण के द्वारा किया गया प्रतीत होता है। यद्यपि यह विशेषण जयधवला टीका के लिए दिया गया है किन्तु इसे धवला टीका में भी लगाया जा सकता है। यथार्थ में इन टीकाओं की उज्ज्वल ख्याति ने तीनों लोकों को धवलित कर दिया है। अत: इनका धवला नाम सार्थक है। इस प्रकार जब पहली टीका का नाम धवला रख लिया गया तो दूसरी टीका के नामकरण में अधिक सोचने विचार ने की आवश्यकता नहीं रही। धवला के पहले जय विशेषण लगा कर नाम जयधवला रख लिया गया। और टीका का प्रारंभ करते हुए ‘जयइ धवलंग’ आदि लिखकर उसकी सूचना दे दी गई। इस विवरण से इस टीका का नाम जयधवला क्यों रखा गया? इस प्रश्न पर प्रकाश पड़ता है। धवला की प्रतियों के अंत में एक वाक्य पाया जाता है ‘एवं सिद्धांतर्णवं पूर्तिमगमत्।’ अर्थात् इस प्रकार सिद्धांतसमुद्र पूर्ण हुआ। उसके पश्चात निम्न गाथा दी हुई हैं-

‘‘जस्स् सेसाएण (पसाएण) मए सिद्धांतमिदिं (मिदं) हि अहिलहुंदी।

महु सो एलाइरियो पसियउ वरवीरसेणस्स।।१।।

अर्थात् ‘जिसके प्रसाद से मैने यह सिद्धांत ग्रंथ लिख, वह एलाचार्य मुझ वीरसेन पर प्रसन्न हों।

ऊपर के दोनों उल्लेखों में धवला टीका को सिद्धांत ग्रंथ बतलाया है। किन्तु उसे सिद्धांत संज्ञा क्यों दी गई यह नहीं बतलाया। जयवधला टीका के अंत में इसका कारण बतलाते हुए लिखा है।

‘‘सिद्धानां कीर्तनादन्ते य: सिद्धांतप्रसिद्धवाक्।

सोऽनाद्यनन्तसन्तान: सिद्धांतो नोऽवताच्चिरम्।।१।।’’

अर्थ-अंत में सिद्धों का कथन किये जाने के कारण जो सिद्धांत नाम से प्रसिद्ध है, यह अनादि-अनंत संतानवाला सिद्धांत हमारी चिरकाल तक रक्षा करे।।१।।

इस श्लोक से यह स्पष्ट है कि चूँकि धवला और जयधवला टीका के अंत में सिद्धों का कथन किया गया है इसलिये उन्हें सिद्धांत कहा जाता है। उसके बिना कोई ग्रंथ सिद्धांत नहीं कहा जा सकता। और सम्भवत: इसी लिये कसायपाहुड अंत में सिद्धों की चर्चा की गई है।

बात यह है कि कसायपाहुड का व्याख्यान समाप्त करके जयधवलाकार ने चूर्णिसूत्र में निरूपित पश्चिमस्कंध नाम के अधिकार का वर्णन किया है। घातियाकर्मों के क्षय हो जाने पर अघातिया कर्म स्वरूप पीछे से रह जाता है उसे पश्चिमस्कंध कहते हैं। क्योंकि उसका सबसे पीछे क्षय होता है इसलिये उसका नाम पश्चिमस्कंध न्याय्य है, आदि। इस पश्चिमस्कंध अधिकार का व्याख्यान करते हुए गंरथकार ने लिखा है कि ‘यहाँ ऐसी आशंका न करना कि कसायपाहुड के समस्त अधिकारों और गाथाओं का विस्तार से वर्णन करके, उसे समाप्त करने के पश्चात् इस पश्चिमस्कंध नामक अधिकार का यहाँ समवतार क्यों किया? क्योंकि क्षपण अधिकार के संबंध से ही पश्चिमस्कंध का अवतार माना गया है। और अघातिकर्मों की क्षपणा के बिना क्षपणाधिकार सम्पूर्ण होता नहीं है। अत: क्षपणा अधिकार के संबंध से ही यहाँ उसके चूलिका रूप से पश्चिमस्कंध का वर्णन किया जाता है इसलिये यह सुसम्बद्ध ही है। तथा ऐसी भी आशंका न करना कि यह अधिकार तो महाकर्मप्रकृति प्राभृत के चौबीस अनुयोगद्वारों से सम्बद्ध है अत: उसका यहाँ कसायपाहुड में कथन क्यों किया? क्योंकि उसको दोनों ग्रंथों से सम्बद्ध मानने में कोई बाधा नहीं पाई जाती है।

इस शंका समाधान से यह स्पष्ट है कि जो पश्चिमस्कंध महाकर्मप्रकृति प्राभृत से सम्बद्ध है उसका कथन कसायपाहुड के अंत में चूर्णिसूत्रकार ने इसलिये किया है कि उसके बिना कसायपाहुड का चारित्रमोह की क्षपणा नाम का अधिकार अपूर्ण सा ही रह जाता है। जयधवलाकार का यह भी कहना है कि यह पश्चिमस्कंध नाम का अधिकार सकल श्रुतस्कंध के चूलिका रूप से स्थित है अत: उसे शास्त्र के अंत में अवश्य कहना चाहिये। इस पश्चिमस्कंध में अघातियों के क्षय के द्वारा सिद्धपर्याय की प्राप्ति करने का कथन रहता है। और जिसके अंत में सिद्धों का वर्णन हो वही सिद्धांत है। इसलिये धवला और जयधवला को सिद्धांत ग्रंथ भी कहते हैं। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि प्रथम सिद्धांत ग्रंथ षट्खंडागम उद्भव तो महाकर्मप्रकृति प्राभृत से ही हुआ है अत: उसके अंत में तो पश्चिमस्कंध अधिकार होना आवश्यक ही है किन्तु कसायपाहुड का उद्गम महाकर्मप्रकृति प्राभृत से नहीं हुआ और इसलिये उसके अंत में जो पश्चिमस्कंध का वर्णन किया गया है वह इसलिये किया है कि उसके बिना उसकी सिद्धांत संज्ञा नहीं बन सकती थी, क्योंकि सिद्धों का वर्णन कसायपाहुड में नहीं है। इस विवरण से पाठक यह जान सकेगे कि इन ग्रंथों को सिद्धांत क्यों कहा जाता है?

सिद्धांत शब्द पुल्लिंग हैं और धवला जयधवला नाम स्त्रीलिंग है। स्त्रीलिंग शब्द के साथ पुल्लिंग शब्द की संगति ठीक बैठती नहीं। इसलिए धवला और जयधवला को धवल और जयधवल रूप देकर के धवल सिद्धांत और जयधवल सिद्धांत नाम प्रचलित हो गया है।

जयधवला की अंतिम प्रशस्ति में कुछ पद्य ऐसे आते हैं जिनसे जयधवला की रचनाशैली पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। उनमें से एक पद्य इस प्रकार है-

‘‘प्राय: प्राकृतभारत्या क्वचित् संस्कृतमिश्रया।

मणिप्रवालन्यायेन प्रोक्तोऽयं ग्रन्थविस्तर:।।३७।।’’

इसमें बतलाया है कि इस विस्तृत ग्रंथ की रचना प्राय: प्राकृत भारती में की गई है, बीच में कहीं कही उसमें संस्कृत का भी मिश्रण हो गया है प्राकृत के साथ संस्कृत का यह मेल ऐसा प्रतीत होता है मानों मणियों की माला के बीच में कहीं कहीं मूंगे के दाने पिरो दिय गये हैं। मणि और मूंगे का यह मेल सचमुच हृदयहारी है। इस सिद्धांत समुद्र में गोता लगाने पर जब पाठक की दृष्टि प्राकृत भारतीरूपी मणियों पर से उतरती हुई संस्कृत रूपी प्रवाल के दानों पर पड़ती है तो उसे बहुत ही अच्छा मालूम होता है।

धवला की अपेक्षा जयधवला प्राकृतबहुल है। इसमें प्राय: दार्शनिक चर्चाओं और व्युत्पत्ति आदि में ही संस्कृत भाषा का उपयोग किया है। सैद्धांतिक चर्चाओं के लिये तो प्राय: प्राकृत का ही अवलम्बन लिया है। किन्तु फिर भी दोनों भाषाओं के उपयोग की कोई परिधि नहीं है। ग्रंथकार प्राकृत की मणियों के बीच में जहाँ कहीं भी संस्कृत के प्रवाल का मिश्रण करके उसके सौन्दर्य को द्विगुणित कर देते हैं। ऐसे भी अनेक वाक्य मिलेंगे जिनमें कुछ शब्द प्राकृत के और कुछ शब्द संस्कृत के होंगे। दोनों भाषाओं पर उनका प्रभुत्व है और इच्छानुसार वे दोनों का उपयोग करते हैं। उनकी भाषा प्रवाह इतना अनुपम है कि उसमें दूर तक प्रवाहित होकर भी पाठक थकता नहीं है, प्रत्युत उसे आगे बढ़ने की ही इच्छा होती है।

टीकाकार का भाषा पर जितना प्रभुत्व है उससे भी असाधारण प्रभुत्व तो उनका ग्रंथ में चर्चित विषय पर है। जिस विषय पर वे लेखनी चलाते हैं उसमें ही कमाल करते हैं। ऐसा मालूम होता है मानों किसी ज्ञानकुबेर के द्वार पर पहुँच गये हैं जो अपने अटूट ज्ञानभंडार को लुटाने के लिये तुला बैठा है। वह किसी को निराश नहीं करना चाहता और इस लिये सिद्धांत की गहन चर्चाओं को शंकाएं उठा उठाकर इतना स्पष्ट कर डालना चाहता है कि बुद्धि में दरिद्र से दरिद्र व्यक्ति भी उसके द्वार से कुछ न कुछ लेकर ही लौटे। वह शब्दों और विकल्पों के जाल में डालकर अपने पाठक पर अपनी विद्वत्ता की घाक जमाना नहीं चाहता, किन्तु चर्चित विषय को अधिक से अधिक स्पष्ट करके पाठक के मानस पर उसका चित्र खींच देना चाहता है। यही उसकी रचना शैली का सौष्ठव है। इस लिये जयधवला के अंत का निम्न पद्य जयधवलाकार ने यथार्थ ही कहा है-

‘‘होइ सुगमं पि दुग्गममणिवुणवक्खाणकारदोसेण।

जयधवलाकुसलाणं सुगमं वि य दुग्गमा वि अत्थगई।।७।।’’

अर्थात्-अनिपुण व्याख्याता के दोष से सुगम बात भी दुर्गम हो जाती है। किन्तु जयधवला में जो कुशल है उनको दुर्गम अर्थ का भी ज्ञान सुगम हो जाता है।

वास्तव में जयधवलाकार कुशल व्याख्याता थे और उन्होंने अपनी रुचिकर व्याख्यानशैली से दुर्गम पदार्थों को भी सुगम बना दिया है, जैसा कि आगे के लेख से स्पष्ट है।

हम पहले लिख आये हैं कि जयधवला कोई स्वंतत्र रचना नहीं है किन्तु कसायपाहुड और उसके चूर्णिसूत्रों का सुविशद व्याख्यान है। जब जयधवला ६० हजार श्लोक प्रमाण है। अर्थात् चूर्णिसूत्रों से उनकी टीका का प्रमाण प्राय: दसगुना है। इसका कारण उसकी रचनाशैलों की विशदता है। जिसका स्पष्ट उनकी व्याख्यानशैली में मिलती है। अत: जरा उनकी व्याख्यानशैली पर ध्यान दीजिये।

जयधवलाकार सबसे पहले स्वतंत्र भाव से गाथा का व्याख्यान करते हैं। उसके पश्चात् चूर्णिसूत्रों का व्याख्यान करते हैं। गाथा का व्याख्यान करते हुए वे चूर्णिसूत्रों पर आश्रित नहीं रहते, किन्तु गाथाओं का अनुगम करके गाथासूत्रकार का जो हृद्य है उसे ही सामने रखते हैं और जहां उन्हें गाथासूत्रकार के आशय के आशय में भेद दिखाई देता है वहाँ उसे वे स्पष्ट कर देते हैं और उसका कारण भी बतला देते हैं। जैसा कि अधिकारों के मदभेद के संबंध में हम चूर्णिसूत्रों का परिचय कराते हुए लिख आये हैं। चूर्णिसूत्रों का व्याख्यान करते समय वे उनके किसी भी अंश को दृष्टि से ओझल नहीं होने देते। यहाँ तक कि यदि किन्हीं चूर्णिसूत्रों के आगे १, २ आदि अंक पड़े हुए हों तो उन तक का भी स्पष्टीकरण कर देते हैं कि यहाँ ये अंक क्यों डाले गये? उदाहरण के लिय अर्थाधिकार के प्रकरण में प्रत्येक अर्थाधिकार सूत्र के आगे पड़े हुए अंकों की सार्थकता का वर्णन इसी भाग में देखने को मिलेगा। जहाँ कहीं चूर्णिसूत्र संक्षिप्त होता है वहाँ वे उसके व्याख्यान के लिए उच्चारणवृत्ति वगैरह का अवलम्बन लेते हैं, और जहाँ उसका अवलम्बन लेते हैं वहाँ उसका स्पष्ट निर्देश कर देते हैं।

जयधवला की व्याख्यानशैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जयधवलाकार गाथा सूत्रकार का, चूर्णिसूत्रकार का, अन्य किसी आचार्य का या अपना किसी संबंध में जो मत देते हैं वह दृढ़ता के साथ अधिकारपूर्वक देते हैं। उनके किसी भी व्याख्यान को पढ़ जाइये, किसी में भी ऐसा प्रतीत न होगा कि उन्होंने अमुक विषय में झिझक खाई है। उनके वर्णन की प्राञ्जलता और युक्तिवादिता को देखकर पाठक दंग रह जाता है और उसके मुख से बरबस यह निकले बिना नहीं रहता कि अपने विषय का कितना प्रौढ असाधारण अधिकारी विद्वान था इसका टीकाकार। वह अपने कथन के समर्थन में प्रमाण दिये बिना आगे बढ़ते ही नहीं, उनके प्रत्येक कथन के साथ एक ‘कुदो’ लगा ही रहता है। ‘कुदो’ के द्वारा इधर प्रश्न किय गया और उधर तड़ाक से उसका समाधान पाठक के सामने आ गया। फिर भी यदि किसी ‘कुदो’ की संभावना बनी रही तो शंका-समाधान झड़ी लग जाती है। जब वे समझ लेते हैं कि अब किसी ‘कुदो’ की गुंजाइश नहीं है तब कहीं आगे बढ़ते है। उनके प्रश्नों का एक प्रकार है-‘तं कुदो णवव्दे’। जिसका अर्थ होता है कि तुमने यहकैसे जाना? इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देते हुए टीकाकार जहाँ से उन्होंने वह बात जानी है उसका उल्लेख कर देते हैं। किन्तु कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिनके बारे में कोई शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। उनके बारे में वे जो उत्तर देते हैं वही उनकी दृढ़ता, बहुज्ञता और आत्मविश्वास का परिचायक है। यथा, इस प्रकार के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए वे लिखते हैं-

‘‘णत्थि एत्थ अम्हाणं विसिट्ठोवएसा किंतु एक्केक्कम्हि फालिट्ठाणे एक्को वा दो वा उक्कस्सेण असंखेज्जा वा जीवा होंति ति अम्हाणं णिच्छओ।’’ ज.घ.प्रे.पृ. १८७८।

अर्थात्-इस विषय में हमें कोई विशिष्ट उपदेश प्राप्त नहीं है, किन्तु एक एक फालिस्थान में एक अथवा दो अथवा उत्कृष्ट से असंख्यात जीव होते हैं ऐसा हमारा निश्चय है।

एक दूसरे प्रश्न के उत्तर में कहते हैं-

‘‘एत्थ एलाइरियवच्छयस्स णिच्छओ’’ज.घ.प्रे.पृ. १९५३।

‘‘इस विषय में एलाचार्य के शिष्य अर्थात् जयधवलाकार श्रीवीरसेनस्वामी ऐसा निश्चय है।

जो टीकाकार उपस्थित विषयों में इतने अधिकार पूर्वक अपने मत का उल्लेख कर सकता है उसकी व्याख्यान शैली की प्राजंलता पर प्रकाश डालना सूर्य को दीपक दिखाना है।

किन्तु इससे यह न समझ लेना चाहिए कि टीकाकार ने आगमिक विषयों में मनमानी की है। आगमि परम्परा को सुरक्षित रखने की उनकी बलवती इच्छा के दर्शन उनकी व्याख्यानशैली के पद पदपर होते हैं। हम लिख आये है कि जयधवला में एक ही विषय में प्राप्त विभिन्न आचार्यों के विभिन्न उपदेशों का उल्लेख है। उनमें से अमुक उपदेश असत्य है और अमुक उपदेश सत्य है ऐसा जयधवलाकार ने भी नहीं लिखा। उदाहरण के लिये इसी भाग में आगत भगवान महावीर के काल की चर्चा की ही ले लीलिये। एक उपदेश के अनुसार भगवान महावीर की आयु ७२ वर्ष है और दूसरे उपदेश के अनुसार ७१ वर्ष ३ माह २५ दिन बतलाई गई है। जब धवलकार से पूछा जाता है कि इन दोनों में कौन ठीक है तो वे कहते हैं-

‘‘दोसू वि उवदेसेसु को एत्थ समंजसो? एत्थ ण बाहइ जीब्भमेलाइरियवच्छओ अलद्धोवदेसत्तादो, दोण्हमेक्कस्स वाहाणुवलम्भादो। किन्तु दोसु एक्केण होदव्वं, तं च उवदेसं लहिय वत्तव्वं। कासायपा. भा. १ पृ. ८१।।

इन दोनों उपदेशों में कौन ठीक है? इस विषय में एलाचार्य के शिष्य को अपनी जवान नहीं चलाना चाहिये, क्योंकि दोनों में से एक में भी कोई बाधा नहीं पाई जाती है, किनतु होना तो दोनों में से एक ही चाहिये और वह कौन हैं यह बात उपदेश प्राप्त करके ही कहना चाहिए।

भला बताईय तो सही जो आचार्य इस प्रकार के उपदेशों के विरुद्ध भी तब तक कुछ नहीं कहना चाहते है जब तक उन्हें किसी एक उपदेशी की सत्यता के बारे में परम्परागत उपदेश प्राप्त न हो, उनके बारे में यह कल्पना करना भी कि वे आगमिक विषयों में मनमानी कर सकते हैं, पाप है। ऐसे निष्पक्षपात स्फुटबृद्धि आचार्यों के निणर्य कितने प्रामाणिक होते हैं यह बतलाने की आवश्यकता नहीं है, अत: जयधवला की व्याख्यान शैली की विवेचनपरता, स्पष्टता और प्रामाणिकता आदि को दृष्टि में रखकर यही कहना पड़ता है कि-‘‘टीका श्रीवीरसेनीया शेषा: पद्धतिपंजिका:।’’ यदि कोई टीका है तो वह श्री वीरसेनस्वामी महाराज की धवला और जयधवला है, शेष या तो पद्धति कही जाने के योग्य हैं या पंजिका।’

जयधवला में निर्दिष्ट ग्रंथ और ग्रंथकार-

जयधवला में कसायपाहुड और उसके वृत्तिग्रंथों तथा उनके रचयिताओं के जो नाम आये हैं उनका निर्देश पहले यथास्थान कर आये हैं तथा आगे भी समयनिर्णय में करेंगे। उनके सिवा जिन ग्रंथ और ग्रंथकारों का उल्लेख आया है उनका परिचय यहाँ कराया जाता है।

इस मुद्रित भाग के प्रारंभ में मंगलचर्चा में यह कहा गया है कि गौतम स्वामी ने चौबीस अनुयोग द्वार के आदि में मंगल किया है। तथा जयधवला के अंत में पश्चिमस्कंध में कहा गया है कि यह अधिकार महाकर्मप्रकृतिप्राभृत के चौबीस अनुयोगद्वारों में प्रतिबद्ध है। इससे स्पष्ट है कि महाकर्मप्रकृति प्राभृत के चौबीस अनुयागद्वार थे। अत: ये दोनों एक ही ग्रंथ के नाम हैं। मूलनाम महाकर्मप्रकृतिप्राभृत है और उसमें चौबीस अनुयोगद्वार होने से उसे चौबीस अनुयोगद्वार भी कह देते हैं। यह महाकर्मप्रकृति प्राभृत अग्रायणीयपूर्व के चयनलब्धि नामक पाँचवें वस्तु अधिकार का चौथा प्राभृत है। इसी के ज्ञाता धरसेना स्वामी थे। ाqजनसे अध्ययन करे भूतबलि और पुष्पदंत ने षट्खंडागम की रचना की। चूँकि यह महाकर्मप्रकृति पूर्वका ही एक अंश है और अंक तथा पूर्वों की रचना गौतमगणधर ने की थी, अत: उसके कर्ता गौतम स्वामी थे। जैसा कि धवला के निम्न अंश से भी प्रकट है-

‘‘महाकम्मपयडिपाहुडस्स कदिआदिचउवीसअणियोगावयस्य आदीय गोदमसामिणा परूविदस्स।

जयधवला के पंद्रहवें अधिकार में एक स्थान पर लिखा है-
‘‘एत्थ एदाओ भवपच्चइयाओ एदाओ च परिणामपच्चइयाओ त्ति एसो अत्थविसेसो संतकम्मपाहुडे वित्थारेण भणिदो। एत्थ पुण गंथगउरवभएण ण भणिदो।’’ प्रे. का.पृ. ७४४१।

अर्थात्-‘‘अमुक प्रकृतियाँ भवप्रत्यया हैं और अमुक प्रकृतियाँ परिणामप्रत्यया हैं यह अर्थ विशेष संतकम्मपाहुड या सत्कर्मिप्राभृत में विस्तार से कहा है। किन्तु यहाँ ग्रंथगौरव के भय से नहीं कहा।’’ यह सत्कर्मप्राभृत षट्खंडागम का ही नाम है। उस पर इन्हीं ग्रंथकार की धवला टीका है। यहाँ जयधवलाकार ने संतकम्मपाहुड से अपनी उस धवला टीका का ही उल्लेख किया प्रतीत होता है। उसी में उक्त अर्थविशेष का विस्तार के कथन कर चुकने के कारण जयधवला में उसका कथन नहीं किया है। यह संतकम्मपाहुड धवला टीका के साथ अमरावती से प्रकाशित हो रहा है। इसके छह खंड हैं जीवठ्ठाण, खुद्दाबंध, बंधसामित्तविचय, वेदना, वर्गणा और महाबंध। जयधवला में इनमें से अंधसामित्तविचय को छोड़कर शेष खण्डों का अनेक जगह उल्लेख मिलता है। उनमें भी महाबंध का उल्लेख बहुतायत से पाया जाता है। यह महाबंध संतकम्मपाहुड से अलग है। इसके रचयिता भी भगवान भूतबलि ही हैं। अभी तक यह ग्रंथ मूडबिन्द्री के भंडार में ही सुरक्षित था किन्तु अब मूड़बिद्री के भट्टारक जी तथा पंचों की सदययता से उसकी प्रतिलिपि होकर बाहर आ गई है। आशा है कि निकट भविष्य में पाठक उनका भी स्वाध्या करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकेगे।

एक स्थान मे कहा है कि देशावधि, परमावधि और सर्वावध्यिा के लक्षण जैसे प्रकृति अनुयोगद्वार में कहे हैं वैसे ही यहाँ भी उनका कथन कर लेना चाहिए। यह प्रकृति अनुयोगद्वार वर्गणाखंड का ही एक अवान्तर अधिकार है।

चारित्रमोह की उपशामना नामक चौदहवें अधिकार में करणों का वर्णन करते हुए लिखा है-‘‘दसकरणीसंगहे पुण पयडिबंधसंभवमेत्तमवेक्खिय वेदणीयस्स वीयरायगुणट्ठाणेसु वि बंधणाकरणमोवट्टणाकरणं च दो वि भणिदाणि।’’ प्रे. पृ. ६६००।।

अर्थात्-‘‘दसकरणीसंग्रह नामक ग्रंथ में प्रकृतिबंध के सम्भवमात्र की अपेक्षा करके वीतरागगुण स्थानों में भी बंधनकरण और अपकर्षणकरण दोनों ही कहे हैं।’’

इस दसकरणीसंग्रह नामक ग्रंथ का पता अभी तक हमें नहीं चल सका है। इस ग्रंथ में, जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, दस करणों का संग्रह है। ऐसा मालूम होता है कि कारणों के स्वरूप का इसमें विस्तार से विचार किया गया होगा। दक्षिण के भण्डारों में इसकी खोज होने की आवश्यकता है। प्रकृत भाषा में नयों की चर्चा करते हुए तत्त्वार्थसूत्र का उल्लेख किया है और उसका तत्त्वार्थसूत्र एक सूत्र इस प्रकार उद्धत किया है-‘‘प्रमाणनयैर्वस्त्बधिगम:।’’

आजकल तत्त्वार्थसूत्र के जितने सूत्रपाठ मिलते हैं सबमें ‘‘प्रमाणनयैरधिगम:’’ पाठ ही पाया जाता है। यहाँ तक कि पूज्यपाद, भट्टाकलंक, विद्यानंद आदि टीकाकारों ने भी यही पाठ अपनाया है। किन्तु धवला और जयधवला दोनों टीकाओं में श्री वीरसेनस्वामी ने उक्त पाठ को ही स्थान दिया है। इस अंतर का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है। प्रदेशविभक्ति अधिकार में एक स्थान पर लिखा है-

‘‘ण परियम्मेण वियहिचारो तत्थ कालासंखाए विवक्खाभावादो।’’

अर्थात्-‘‘परिकर्म के व्यभिचार नहीं आता है क्योंकि वहाँ कला की संख्या की विवक्षा नहीं है।’’ इससे स्पष्ट है कि यह परिकर्म गणितशास्त्र का ग्रंथ है। धवला में भी इसका उल्लेख बहुतायत में पाया जाता है। पहले धवला के सम्पादकों का विचार था कि यह परिकर्म कुन्दकुन्दाचार्यकृत कोई व्याख्या ग्रंथ है किन्तु बाद को गणितशास्त्रविषयक उसके उद्धरणों को देखकर उन्हें भी यही जंचा कि यह कोई गणितशास्त्र ग्रंथ है। इसकी खोज होना आवश्यक है। नय के विवरण में जयधवलाकार ने नय का एक लक्षण उद्धत करके उसे सासंग्रह नामक ग्रंथ का बतलाया है। धवला में भी ‘‘सारसंग्रहेऽप्युत्तं पूज्यपादै:’’ करके यह लक्षण उद्धत किया गया है। इससे स्पष्ट हे कि श्री पूज्यपादस्वामी का सारसंग्रह नामक भी एक ग्रंथ था। यह ग्रंथ आज अनुपलबध है अत: उसके संबंध में कुछ कहना शक्य नहीं है।

निक्षेपों में नय योजना करते हुए जयधवलाकार ने ‘उत्तं च सिद्धसेणेण’ लिखकर एक गाथा उद्धत की है। यह गथा सन्मति तर्क के प्रथमखंड की छठवीं गाथा है। आगे उसी गाथा के संबंध में लिखा है। ‘ण च सम्मइसुत्तेण स विरोहो।’ अर्थात् ऐसा मानने से सन्मति के उक्त सूत्र के साथ विरोध नहीं आता है। इससे स्पष्ट है कि सिद्धसेन और उनके सन्मतितर्क का उल्लेख किया गया है। जैन परम्परा में सिद्धसेन एक बड़े भारी प्रखर तार्विक हो गये हैं। आदिपुराण और हरिवंशपुराण के प्रारंभ में उनका स्मरण बड़े आदर के साथ किया गया है। दिगम्बर परम्परा में उनके सन्मतिसूत्र का काफी आदर रहा है। जयधवला के प्रकृत मुद्रित भाग में ही उसकी अनेकों गाथाएँ उद्धत हैं। नय की चर्चा करते हुए जयधवलाकार ने सारसंग्रह नयलक्षण के बाद तत्त्वार्थभाष्यगत नय के लक्षण को। उद्धत किया है। यथा-

‘‘प्रमाणप्रकाशितार्थविशेषप्ररूपको नय:। अयं वाक्यनय: तत्त्वार्थभाष्यगत:। अस्यार्थ उच्यतेप्रकर्षेण मानं प्रमाणं सकलादेशीत्यर्थ:। तेन प्रकाशितानां प्रमाणपरिगृहीतानामित्यर्थ:। तेषामर्यानामस्तित्वनास्तित्वनित्यानित्याद्यनन्तात्मनां जीवादीनां ये विशेषा: पर्याया: तेषां प्रकर्षेण रूपक: प्ररूपक: निरुद्धदोषानुङ्गद्वारेणेत्यर्थ: स नय:।’’

यह नय का लक्षण भी भट्टाकलंकदेव के तत्त्वार्थराजर्वाितक का है। तत्त्वार्थसूत्र के पहले अध्याय के अंतिम सूत्र की पहली वार्तिक है-‘‘प्रमाणप्रकाशितार्थविशेषप्ररूपको नय:।’’ और ऊपर जो उसका अर्थ दिया गया है वह अकलंकदेवकृत उकसा व्याख्यान है। श्रीवीरसेन स्वामी ने धवला और जयधवला में अकलंकदेव के तत्त्वार्थराजवार्तिक का खूब उपयोग किया है और सर्वत्र उसका उल्लेख तत्तवार्थभाष्य के नाम से ही किया है। धवला में एक स्थान पर नय का उक्त लक्षण इस प्रकार दिया गया है-

‘‘पूज्यपादभट्टारवैरप्यभाणि-सामान्यलक्षणमिदमेव। तद्यथा-प्रमाणप्रकाशितार्थविशेषप्ररूपको नय इति।’’ इसके आगे ‘प्रकर्षेण मानं प्रमाणम्’ आदि उक्त व्याख्या भी दी है। इससे स्पष्ट है कि धवलाकार यहां ‘पूज्यपाद भट्टारक’ शब्द से अकलंकदेव का ही उल्लेख कर रहे हैं, न कि सर्वार्थसिद्धि के रचयिता पूज्यपाद स्वामी का। क्योंकि सर्वार्थसिद्धि में नय का उक्त लक्षण नहीं पाया जाता है। यह ठीक जै कि अकलंकदेव का उल्लेख ‘पूज्यपाद भट्टारक’ के नाम से अन्यत्र नहीं पाया जाता है, किन्तु जब धवलाकार उनका उल्लेख इस अत्यंत आदरसूचक विशेषण से कर रहे हैं तो उसमें आपत्ति ही क्या है? एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि जयधवलाकार ने पूज्यपाद स्वामी का उल्लेख केवल ‘पूज्यपाद’ शब्द से ही किया है। अत: ‘पूज्यपाद भट्टारक’ में जो ‘पूज्यपाद’ पद है वह भट्टारक का विशेषण है, और उसके साथ में भट्टारक पद इसीलिये लगाया गया है कि उससे प्रसिद्ध पूज्यपाद स्वामी का आशय न ले लिया जाए। इसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्य से समन्तभद्ररचित गंधहस्तीमाहभाष्य की भी कल्पना नहीं की जा सकती। क्योंकि यदि नय का उक्त लक्षण और उसका व्याख्यान तत्त्वार्थसूत्र की उपलब्ध टीकाओं में न पाया जाता तो उक्त कल्पना के लिए कुछ स्थान हो भी सकता था किन्तु जब राजवार्तिक में दोनों चीजें अक्षरश: उपलबध हैं तब इतनी किलष्ट कल्पना करने का स्थान ही नहीं है। यह कहना भी ठीक नहीं है कि राजवार्तिक का उल्लेख किसी भी आचार्य ने तत्वार्थभाष्य के नाम से नहीं किया। न्यायदीपिका में राजवार्तिक की वार्तिकों का वार्तिकरूप से और उसके व्याख्यान का भाष्य रूप से उल्लेख पाया जाता है। अत: नय के उक्त लक्षण को पूज्यपाद स्वामी की सर्वार्थसिद्धि में उद्धत बतलाकर उसे समन्तभद्रकृत गंधहस्तिमहाभाष्य का समझना भ्रमपूर्ण है। नये के निरूपण में जयधवलाकार के नय का एक लक्षण उद्धत किया है और उसे प्रभाचन्द्र का बतलाया है, तथा-‘‘अयं वाक्यनय: प्रभाचन्द्रीय:।’’ धवल के वेदनाखंड में भी नय का यह लक्षण ‘प्रभाचन्द्रभट्टारवैâरप्यभाणि’ करके उद्धत है। यह प्रभचंद्र वे प्रभाचंद्र तो हो ही नहीं सकते। जिनके प्रमेयकमलमार्तण्ड और न्यायकुमुदचंद्र नामक ग्रंथ उपलब्ध हैं, क्योंकि प्रथम तो नय का उक्त लक्षण उन ग्रंथों में पाया नहीं जाता, दूसरे उनका समय भी श्री वीरसेन स्वामी के पश्चात् सिद्ध हो चुका है। तीसरे अन्यत्र कहीं भी इन प्रभाचन्द्र का उल्लेख प्रभाचन्द्रभट्टारक के नाम से नहीं पाया जाता है। हमारा अनुमान है कि यह प्रभाचन्द्र भट्टारक और आदिपुराण तथा हरिवंशपुरण के आदि में स्मृत प्रभाचन्द्र एक ही व्यक्ति हैं। हरिवंशपुराण में उनके गुरु का नाम कुमार सेन बतलाया है और विद्यानंद ने अपनी अष्टसहस्री के अंत में लिखा है कि कुमार सेन की उक्ति से उनकी अष्टसहस्री वर्धमान हुई है। इससे प्रतीत होता है कि यह अच्छे दार्शनिक थे अत: उनके शिष्य प्रभाचन्द्र भी अच्छे दार्शनिक होने चाहिये और यह बात उनके नय के उक्त लक्षण से ही प्रकट होती है। इस प्रकार जयधवला का स्थूल दृष्टि से पर्यवेक्षण करने पर जिन ग्रंथों और गं्रथकारों का नाम उपलब्ध हो सका उनका परिचय यहाँ दिया गया है। यों तो जयधवला में इनके सिवाय भी अनेकों ग्रंथों से उद्धरण दिये गये हैं। यदि उन सब ग्रंथों का पता लग सके तो जैन साहित्य की अपार श्रीवृद्धि के होने में संदेह नहीं है।

लब्धिसार ग्रंथ की प्रथम गाथा की उत्थानिका में टीकाकार श्रीकेशववणों ने लिखा है-‘‘श्रीमन्नेमिचन्द्र-सिद्धांतचक्रवर्ती

सम्यक्त्वचूडामणिप्रभृतिगुणनामाज्र्तिचामुण्डरायप्रश्नानुसारेण कषायप्राभृतस्य जयधवला-ख्यद्वितीयसिद्धांतस्य पंचदशानां महाधिकाराणां मध्ये पश्चिमस्कन्धाख्यस्य पंचदशस्यार्थ संगृह्य लब्धिसारनामधेयं शास्त्रं।’’

अर्थात्-‘‘सम्यक्तवचूणामणि आदि सार्थक उपाधियों से विभूषित चामुण्डराय के प्रश्न के अनुसार जयधवलानामक द्वितीय सिद्धांतग्रंथ कषायप्राभृत के पंद्रह महाधिकारों में से पश्चिमस्कंध नामक पंद्रवें अधिकार के अर्थ का संग्रह करके श्रीनेमीचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती लब्धिसार नामक शास्त्र को प्रारंभ करते हैं।’’

इससे प्रकट है कि श्रीनेमीचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती ने जैसे प्रथम सिद्धांत ग्रंथ का सार लेकर गोमट्टसार को रचना वैसे ही द्वितीय सिद्धांतग्रंथ और उसकी जयधवलाटीका का सार लेकर उन्होंने लब्धिसार-क्षपणसार ग्रंथ की रचना की। लब्धिसार और क्षपणासार के अवलोकन से भी इस बात का समर्थन होता है। किन्तु ऐसा मालूम होता है कि टीकाकार को सिद्धांत ग्रंथों के अवलोकन का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका था। क्योंकि यद्यपि यह ठीक है कि कषायप्राभृत में पंद्रह अधिकार हैं किन्तु पंद्रहवां अधिकार चारित्रमोह की क्षपण नाम का है, उसके पश्चात् पश्चिमस्कंध को सकल श्रुतस्कंध की चूलिका मानकर अंत में उसका कथन किया गया है। तथा लब्धिसार और क्षपणसार की रचना केवल इस अधिकार के आधार पर ही नहीं हुई है, क्योंकि पश्चिमस्कंध में तो केवल अघातिया कर्मों के क्षपणा का विधान है जब कि लब्धिसार-क्षपणसार में दर्शनमोह और चारित्रमोह की उपशमना और क्षपण का भी विस्तृत कथन है। लब्धिसार में है। अत: इन ग्रंथों की रचना मुख्यतया दर्शनमोह की उपशमना, क्षपण तथा चारित्र मोह की उपशमना और क्षपण नामक अधिकारों के आधार पर की गई है, इन अधिकारों की अनेक मूल गाथाएँ लब्धिसार-क्षपणसार में ज्यों कि त्यों सम्मिलित कर ली गई हैं। जैसा धवला और जयधवला टीका ने प्रथम और द्वितीय सिद्धांत ग्रंथों के स्थान लेकर मूल को अपने में छिपा लिया और प्रथम सिद्धांत ग्रंथ धवल, दूसरा सिद्धांत ग्रंथ जयधवला और महाबंध महाधवल कहा जाने लगा। वैसे ही इन सिद्धांत ग्रंथों का सार लेकर रचे गये कर्मकाण्ड, लब्धिसार-क्षपणसार ने भी अपने उद्गम स्थान को जनता के हृदय से विस्मृतसा कर दिया। अच्छी रचनाओं की यही तो कसौटी है। यथार्थ में सिद्धांत ग्रंथों को जैसा टीकाकार प्राप्त हुआ वैसा ही टीकाकार को संग्रहकार भी म