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कषायमार्गणा अधिकार

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कषायमार्गणा अधिकार

अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन षट्सूत्रै: कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले कषायसहितानां अंतरनिरूपणत्वेन ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्याद्येकं सूत्रं। तदनु द्वितीयस्थले उपशान्तकषायाद्ययोगिनां अन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘अकसाईसु’’ इत्यादिपंचसूत्राणि इति समुदायपातनिका।
संप्रति कषायमार्गणायां चतुर्विधकषायेषु मिथ्यादृष्ट्यादिसूक्ष्मसांपरायान्तानां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-कसायाणुवादेण कोधकसाइ-माणकसाइ-मायकसाइ-लोहकसाईसु मिच्छादिट्ठिप्पहुडि जाव सुहुमसांपराइयउवसमा खवा त्ति मणजोगिभंगो।।२२३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सर्वं सुगमं वर्तते। त्रयाणामुपशामकानां त्रयाणां क्षपकानां च नानाजीवापेक्षया जघन्येन एकसमयं, उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वमिति।
चतुर्णां कषायाणामपि उत्कृष्टान्तरं षण्मासमात्रमेव सिद्ध्येत् इति ज्ञातव्यं।
एवं प्रथमस्थले कषायसहितानां अन्तरकथनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
संप्रति अकषायाणां नानैकजीवजघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-अकसाईसु उवसंतकसायवीदरागछदुमत्थाणमंतरं केवचिरं कालादोहोदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं।।२२४।।
उक्कस्सेण वासपुधत्तं।।२२५।।
एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।२२६।।
खीणकसायवीदरागछदुमत्था अजोगिकेवली ओघं।।२२७।।
सजोगिकेवली ओघं।।२२८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशान्तकषायस्य एकजीवापेक्षया अध: अवतीर्य अकषायत्वाविनाशेन पुन: उपशान्तपर्यायेण परिणमनाभावात् नास्त्यन्तरं। शेषमोघवद् ज्ञातव्यं।
तात्पर्यमेतत्-अकषायावस्थाया: प्राप्तये एव दीक्षाशिक्षाग्रहणं श्रुतस्याध्ययनं जिनानामकषायिणां भक्त्या प्रणमनं चेति ज्ञात्वा शनै: शनै: कषाया: कृशीकरणीया इति।
एवं द्वितीयस्थले अकषायिनां अन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्राणि पंच गतानि।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचमग्रंथे अन्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्त-चिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: समाप्त:।


अथ कषायमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब दो स्थलों में छह सूत्रों के द्वारा कषायमार्गणा नामका छठा अधिकार प्रारंभ होता है। उसमें से प्रथम स्थल में कषायसहित जीवों का अन्तर निरूपण करने वाला ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: द्वितीय स्थल में उपशान्तकषाय गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक भगवन्तों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘अकसाईसु’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब कषायमार्गणा में चारों प्रकार की कषाय से युक्त मिथ्यादृष्टि जीवों से लेकर सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान तक के महामुनियों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणा के अनुवाद से क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी जीवों में मिथ्यादृष्टि से लेकर सूक्ष्मसाम्पराय उपशामक और क्षपक तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों का अन्तर मनोयोगियों के समान है।।२२३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। तीनों उपशमश्रेणी चढ़ने वाले उपशामकों का तथा क्षपक श्रेणी चढ़ने वाले तीनों (आठवें, नवमें, दशवें गुणस्थानवर्ती) क्षपकों का नाना जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय है एवं उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है।

चारों कषायसहित जीवों का उत्कृष्ट अन्तर छहमास ही सिद्ध होता है ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में कषायसहित जीवों का अन्तर कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब अकषायी जीवों का नाना जीव एवं एक जीव की अपेक्षा जघन्य एवं उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अकषायी जीवों में उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थों का अन्तर कितने काल तक होता है ? नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य से एक समय अन्तर है।।२२४।।

उक्त जीवों का उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है।।२२५।।

उपशान्त कषायवीतरागछद्मस्थ का एक जीव की अपेक्षा अन्तर नहीं है, निरन्तर है।।२२६।।

अकषायी जीवों में क्षीणकषायीवीतरागछद्मस्थ और अयोगिकेवली जिनों का अन्तर गुणस्थान के समान है।।२२७।।

सयोगिकेवली जीवों का अन्तर गुणस्थान के समान है।।२२८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशान्तकषाय गुणस्थानवर्ती का एक जीव की अपेक्षा नीचे उतरकर अकषायपने का विनाश हुए बिना पुन: उपशांतपर्याय के परिणमन का अभाव होने से अन्तर नहीं है। शेष का अन्तर गुणस्थान के समान जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि अकषाय अवस्था की प्राप्ति के लिए ही दीक्षा-शिक्षा को ग्रहण किया जाता है, श्रुत का अध्ययन किया जाता है तथा कषायरहित जिनेन्द्र भगवन्तों को प्रणमन किया जाता है, ऐसा समझकर धीरे-धीरे अपनी कषायों को कृश करना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में अकषायी जीवों का अन्तर कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अन्तरानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि टीका में कषायमार्गणा नामका छठा अधिकार समाप्त हुआ।