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कषाय का वैज्ञानिक पक्ष

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कषाय का वैज्ञानिक पक्ष

सारांश व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की अशान्ति का मूलकारण कषाय है। कषाय से व्यक्ति का चिन्तन, वाणी और व्यवहार प्रभावित होता है। तदनुसार ही नाड़ीतन्त्र और क्रियातन्त्र भी सक्रिय होता है। परिणाम स्वरूप विविध शारीरिक, मानसिक व्याधियाँ जन्म लेती हैं। चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान भी मनोविकार और तनाव को अनेक रोगों का जनक मानता है। जैनागमों में मनोभावों को आध्यात्मिक व्याधियों का भी कारण कहा है। कषाय आत्मा का विकार है, मलिन चित्रवृत्ति है। जैनधर्म वैज्ञानिक होने का साथ व्यावहारिक भी है। कषायों से निवृत्ति के लिये जैन मनीषियों द्वारा प्रतिपादित कषाय का स्वरूप, भेदोपभेद तथा इहलौकिक और पारलौकिक परिणामों का विवेचन इस आलेख में प्रस्तुत है। मानव मन की अशांति और तन की अस्वस्थता का मूलमंत्र कषाय है। समग्र विश्व आज कषाय की अग्नि में जल रहा है, राष्ट्रों में युद्ध का आतंक है, परस्पर प्रतिस्पर्धा है। देशों में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है। समाज अनेक बुराइयों से दूषित है। उसमें संगठन का अभाव है, परिवार में कलह है, आपसी सामंजस्य का अभाव है। व्यक्ति िंचता, तनाव, कुण्ठा और मनोरोगों (हायपर टेंशन, डिप्रेशन, ब्लड प्रेशर) से ग्रस्त है। सुख और शांति तो जैसे कोसों दूर चले गए हैं। इन सभी का मूल कारण कषाय है। क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय हैं।

लोभ के वशीभूत मनुष्य की आकांक्षाएँ बढ़ती जाती हैं, इनकी प्राप्ति के लिए वह माया का सहारा लेता है। आकांक्षाएं पूर्ण होने पर उसे मान होता है, उसमें कोई बाधा हो तो वह क्रोध करता है। किसी कारणवश यदि वह अपनी महत्वाकांक्षाओं की र्पूित नहीं कर पाता है तो उसे तनाव (टेंशन) होता है या हीन भावना (डिप्रेशन) से ग्रस्त हो जाता है। परिणाम स्वरूप अनेक शारीरिक एवं मानसिक रोग घर कर लेते हैं। रोग और द्वेष से उत्पन्न क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय हैं, जो भाव और विचारों को उत्तेजित कर देते हैं। इसका प्रभाव मनुष्य के मन—मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, ज्ञानवाही, स्नायुमण्डल आदि पर पड़ता है। उत्तेजना से तनाव बढ़ता है, रक्तचाप बढ़ जाता है, शरीर में रासायनिक तत्त्वों का स्राव असंतुलित होने लगता है और विभिन्न रोग जन्म लेते हैं।

आज चिकित्सा विज्ञान के शोध परक निष्कर्ष ये तथ्य प्रस्तुत करते हैं कि शारीरिक बीमारियाँ का मूलकारण ही मानसिक तनाव है। मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है कि बीमारियों का असली कारण है मानसिक विकार या भावों का अशुभ होना। आगमों में भी मनोभावों को बीमारी का उत्पादक माना है और चार कषायों को आध्यात्मिक व्याधि कहा है। आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक व्याधियों से मुक्ति के लिए आवश्यक है कषाय मुक्ति जैन मनीषियों में आत्मा की शुद्ध अवस्था तक पहुँचने के लिए आत्मा की अशुद्ध अवस्था का विशेष िंचतन किया है और इसका मूल कारण कषाय को बताकर कषाय के स्वरूप, भेदोपभेद, पर्याय तथा उसके इहलौकिक तथा पारलौकिक परिणामों की विस्तृत व्याख्या की है।

कषाय का अर्थ, परिभाषा—

कोशकारों के अनुसार कषाय का व्युत्पत्तिलब्ध अर्थ कसैलापन, मैल, लिप्त करना, आवेश, संवेग तथा विषयों में आसक्ति है।[१]जैनागम में कषाय शब्द, कसैलेपन[२], क्रोधादि भाव[३], कटु[४] वचन, आदि के लिए प्रयुक्त है। आगमों में कषाय की विविध परिभाषाएँ दी गई हैं तदनुसार जो दु:ख का कारण है, वे कष् हैं और उनकी प्राप्ति कषाय है।[५] िंहसार्थक ‘कष्’ धातु से व्युत्पन्न कषाय का अर्थ है, जो आत्म स्वरूप का हनन या िंहसा करता है।[६] जीतने के अर्थ में कष् धातु से निष्पन्न कषाय कर्मरूपी खेत को जोतकर सुख—दुख रूप फलस तैयार करता है।[७]कषाय कर्म बंध का हेतु है[८], इससे जीवन जन्म—मरण के चक्र में पड़ता है। आचरण विशुद्धि तथा आत्म साक्षात्कार में बाधक तत्त्व भाव है। कषाय आत्मा का स्वभाव नहीं, अपितु विभाव है। यह तो उस गोंद के समान है जो वृक्ष से छूटकर भी उससे चिपका रता है, उसी प्रकार कषाय भी आत्मा से अलग होकर भी उससे लिप्त रहते हैं।

कषाय के भेद—

१. कषाय पाहुड़ के सिद्धान्त पर रचित र्चूिणसूत्र में यतिवृषाभाचार्य तथा विशेषावश्यकभाष्य में जिनभद्रगणि में निक्षेप की अपेक्षा से आठ प्रकार के कषाय का कथन किया है[९]. नाम, स्थापना, द्रव्य, प्रत्यय, समुत्पत्तिक, (उत्पत्ति) आदेश, रस तथा भाव कषाय। इन आठ भेदों में सभी दृष्टि से कषायों की व्याख्या की जा सकती है।

२. क्रोध, मान, माया और लोभ रूप चार कषाय हैं।[१०]

३. आसक्ति की तीव्रता और मंदता के आधार पर प्रत्येक के अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रात्याख्यान तथा संज्वलन चार—चार भेद करने से इनकी संख्या सोलह है।[११]

४. हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद ये नोकषाय हैं।

५. नोकषाय तथा सोलह भेद मिलकर कुल पच्चीस भेद कहे गए हैं।

६. क्रोधादि चार कषाय तथा हास्यादि नोकषाय अर्थात् तेरह कषाय के अनंतानुबंधी आदि चार—चार भेद करने से १र्३ े ४ ृ ५२ कषाय कहे गए हैं।[१२]

७. कषाय के उपयुक्त भेदोपभेदों का अंतर्भाव राग और द्वेष में किया जा सकता है। आगमों में भी कर्मबंध के ये दो स्थान ही कहे गए हैं।[१३] राग से माया और लोभ की तथा द्वेष से क्रोध और मान की उत्पत्ति होती है। क्रोध, मान, माया और लोभ रूप चारों कषाय आत्मा की आवेग अभिव्यक्तियाँ हैं।

क्रोध—

क्रोध कषाय के वशीभूत मनुष्य जघन्य अपराध कर बैठता है। परिवार में कलह, पड़ोस तथा समुदाय में वाद—विवाद, हत्या, आत्महत्या, भयंकर नरसंहार, आगजनी आदि क्रोध कषाय के ही परिणाम हैं। क्रोध में सर्वप्रथम स्वयं का चित्त अशांत होता है, विवेक नष्ट हो जाता है, भावों में कालुष्य और विचारों में उग्रता आ जाती है। क्रोधी पहले अपनी क्रोध अग्नि में झुलसता है और बाद में अपनी प्रतिक्रिया से दूसरे को जलाता है।[१४] यदि दूसरा क्षमाशील है तो गीले वृक्ष के समान क्रोधाग्नि उसे नहीं जल सकती।[१५] जैन विचार में क्रोध के दो रूप हैं—द्रव्य क्रोध और भाव क्रोध। द्रव्य क्रोध अभिव्यक्ति पक्ष है, जिसमें शारीरिक परिवर्तन होते हैं। भाव क्रोध अनुभूति पक्ष (भाव, विचार पक्ष) है। इसमें मानसिक परिवर्तन होते हैं। क्रोध सिर्पक उत्तेजित होना मात्र नहीं है, चित्त की कई प्रतिकूल अवस्थाओं को क्रोध कहा जाता है। जैसे—१. क्रोध (आवेग), २. कोप, ३. रोष, ४. दोष (दोष थोपना), ५. अक्षमा, ६. संज्वलन (ईष्र्या), ७. कलह, ८. चाण्डिक्य (उग्ररूप धारण), ९. भण्डन (हाथापाई), १०. विवाद (आक्षेपात्मक भाषण)।[१६]

मान—

परिवारों का विघटन, वर्ग संघर्ष, अमीरी—गरीबी का भेदभाव, तिरस्कार का बदला, पर िंनदा, एक व्यक्ति को दूसरे को नीचे दिखाना, मान कषाय का परिणाम हैं। मनुष्य का अहं कई दिशाओं में होता है, जैसे—श्रेष्ठ कुल में जन्म, बुद्धि, समृद्धि, बल, प्रभुत्व, शक्ति आदि। अहं में चूर व्यक्ति दूसरे को परछाई के समान समझता है।[१७] अभिमानी के जीवन में स्वच्छंदता बढ़ जाती है, उसे हेय—उपादेय का ज्ञान नहीं रहता।[१८] वह विनयाचार का उल्लंघन करता है। आचार्य हेमचंद्र ने कहा है कि मान, विनय, श्रुत और शील सदाचार का विनाशक है। धर्म, अर्थ और काम का घातक है तथा विवेक चक्षु के अंधत्व का कारक है।[१९]समवायांग[२०]और भगवती सूत्र[२१] में मान के विविध स्तरों की व्याख्या उसके बारह पर्यायों में की है। यथा—मान, मद, दर्प, स्तंभ, गर्व, अत्युत्कोश, परपरिवाद, उत्कर्ष, अपकर्ष, उन्नत नाम, उन्नत दुर्नाम।

माया—

स्वार्थ र्पूित हेतु माया कषाय का आश्रय लेकर मनुष्य अनुचित आचरण करता है। पाप का संचय करता है, उसके विचार, वचन और व्यवहार में एकरूपता नहीं रहती है। वह अपने कार्य की सिद्धि में छल और कुटिलता का आश्रय लेता है। असत्य भाषण और िंहसा भी करता है। मायावी का व्यवहार सरल और सहज नहीं होता, जैसा कि आज आतंक का सिरमौर पाकिस्तान, कश्मीर हथियाने के लिए निरंतर मायाचारी कर रहा है। देश की राजनीति तो मायाचारी का गढ़ बन गई है। भाई, भाई की सम्पत्ति हथियाने के लिए झूठ—फरेब, हत्या का, झूठे हस्तावेज का रास्ता अपना रहा है। देश, समाज और परिवार में कूटनीति का बोलबाला है।

आचारांग में कहा है कि माया का आश्रय नहीं लेना चाहिए, क्योंकि मायावी और प्रमादी बारबार जन्म लेता है।[२२] हेमचंद्राचार्य ने माया के स्वरूप का विश्लेषण किया है—माया, असत्य की जननी, शील वृक्ष को काटने की कुल्हाड़ी, मिथ्यात्व एवं अज्ञान का जन्म स्थान[२३] तथा दुर्गति का कारण है। माया कषाय अविद्या की भूमि अपयश का घर तथा पापरूपी पज्र् का विशाल गड्ढ़ा है।[२४] माया तो मोक्ष को रोकने की अर्गला है।[२५] भगवतीसूत्र में माया के पन्द्रह नाम बताये हैं[२६]—माया, उपाधि, निकृति, वलय, गूहन, कल्क, नूम, कुरूप, जिहृनता, किल्वषिक, आदरणता, गूहनता, वंचकता, प्रतिकुंचनता, सातियोग।

लोभ—

सभी तरह की मायाचारी का मूल लोभ है। पंचेन्द्रिय विषयों की एवं मानादि कषायों की र्पूित की लालसा ही लोभ है। बाह्य पदार्थों में मम बुद्धि लोभ है।[२७] लोभी संग्रह करता है। बारबार सुख की कामना करता है और दु:ख पाता है। लोभ सभी अनर्थो का मूल तथा िंहसादि सभी दोषों की खान है।[२८] लोभ कषाय से पीड़ित मनुष्य अपने मालिक, गुरू, बंधु, वृद्ध, स्त्री, बालक, दुर्बल तथा अनाथ आदि को भी मारकर धन प्राप्त करता है। सभी क्षेत्रों में रिश्वतखोरी, चोरी, कालाबाजारी, लूटपाट, हत्या तथा अवैध कार्यों में भी लोभ की प्रवृत्ति ही प्रबल है।

धर्मामृत अनगार में भी कहा गया है कि मनुष्य तब तक ही यश की चाह करता है, मित्रता का निरंतर पालन करता है, चारित्रबल में वृद्धि करता है, आश्रितों का सम्यक् रीति से पालन करता है, जब तक वह लोभ के वशीभूत नहीं होता है।[२९] लोभ तो सभी व्यसनों का राजमार्ग है।[३०] सभी गुणों को ग्रसने वाला राक्षस है।[३१] असंतोष और अन्य वृत्तियों का दमन ये लोभ के लक्षण है। लोभ पापों में सबसे बड़ा है। इसकी सोलह अवस्थाएँ है।[३२] १. लोभ,

२. इच्छा,

३. मूच्र्छा,

४. आकांक्षा,

५. गृद्धि,

६. तृष्णा,

७. मिथ्या,

८. अभिध्या,

९. आशंसना,

१०. प्रार्थना,

११. लालपनता,

१२. कामाशा,

१३. भोगाशा,

१४. जीविताशा,

१५. मरणाशा,

१६. नंदिराग।

कषाय की तीव्रता और मंदता के आधार पर इसके चार स्तर हैं—अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन कषाय। जैनाचार्यों ने चारों कषाय के चार स्वरूपों को प्रतीकों के माध्यम से स्पष्ट किया है।[३३] क्रोध कषाय क्रमश: पत्थर, भूमि, बालू और धूलि की रेखा के समान होता है। मान कषाय क्रमश: शैलस्तंभ, अस्थि, काष्ठ और लता (बेंत) जैसा होता है। माया कषाय क्रमश: बांस की जड़, मेढ़ें का सींग, चलते हुए बैल की धार और छिलते हुए बांस की छाल की तरह होती है। लोभ कषाय क्रमश: कृमि रेशम, कीचड़, गाड़ी के खंजन और हल्दी के रंग के समान होता है। अनंतानुबंधी कषाय सम्यक् का विनाश करता है। इसक फल नरकगति है, अप्रत्याख्यान कषाय श्रावकत्व का विनाशकर, तिर्यंचगति का प्रदाता है, प्रत्याख्यानी कषाय सर्वव्रतों का नाशकर मनुष्यगति प्राप्त करता है, संज्वलन कषाय वीतरागता का विनाश कर देवगति का फल देता है। कर्मशास्त्रों के अनुसार कषायों से या अशुभ भावों से कर्मों का आस्रव और बंध होता है। जब अशुभ भावों से कर्मों का आस्रव और बंध होता है, जब अशुभ कर्मों के फल भोगने का क्षण आता है, तब कषायों की तीव्र स्पंदन होता है। वह लेश्या को अशुद्ध करता हुआ अत:स्रावी ग्रंथियों के माध्यम से वृत्तियों और वासनाओं को प्रकट करता है, जिससे आत्मपरिणाम संक्लिष्ट होते हैं। फलत: बाहरी व्यक्तित्व भी अशुभ बन जाता है। आज चिकित्सा विज्ञान के शोधपरक निष्कर्षों ने भी यह तथ्य प्रस्तुत किया कि शारीरिक बीमारियों का मूल कारण मानसिक तनाव है। चिकित्सा केवल शरीर की नहीं मन की भी होती है। हमारे जो निषेधात्मक विचार, िंचतन, संवेग और कार्य हैं, उन सभी का परिणाम शारीरिक समस्याएँ है।[३४] जैसे क्रोध से उत्तेजना, तनाव और रक्तस्राव बढ़ता है, जिससे हाइपरटेंशन और हार्ट अटैक जैसी बीमारियाँ हो जाती है।

तनावपूर्ण शारीरिक स्थिति के लिए हमारे असंतुलित विचार और भाव जिम्मेदार हैं, वे चाहे चेतना के स्तर पर हों या अचेतन स्तर पर, वर्तमान हो या अतीत, प्रिय हो या अप्रिय सदा हमारे जीवन को, व्यवहार को प्रभावित करते रहते हैं। घृणा, भय, िंचता, अशांति, वासना आदि रूपों में हमारा तनाव अभिव्यक्त होता है। डॉ. बेबीट का कथन है कि कुछ बीमारियाँ भौतिक स्तर पर शुरू होकर आध्यात्मिक स्तर को प्रभावित करती हैं और कुछ आध्यात्मिक स्तर पर शुरू होकर शारीरिक स्तर को प्रभावित करती हैं।[३५] मनोविज्ञान की दृष्टि से अशुभ भाव या मानसिक विकार ही समस्त व्याधियों को जन्म देते हैं। प्रत्येक घटना के साथ मन जुड़ा होता है, बिना मन जुड़े हममें न राग होता है, न द्वेष, न सुख, न दु:ख, न आनंद और न ही पीड़ा। मन का संवेदन जुड़ने पर ही रोग कष्ट देते हैं। आगमों में भी मनोभावों की बीमारियों का उत्पादक माना है। चार कषायों को आध्यात्मिक व्याधि कहा है। अठारह पाप, पांच आस्रव, अशुभ लेश्या आदि सावद्ययोग बीमारी को निमंत्रण देते हैं। आगमकारों ने आत्र्तध्यान, रौद्रध्यान आदि विकृत मनोभावों को पहचान कर उनके शोधन का मार्ग प्रशस्त किया। सूत्रकृतांग में कहा है कि भगवान महावीर ने वैवल्य प्राप्ति से पूर्व क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी आध्यात्मिक बीमारियों की चिकित्सा की।[३६] कषाय जितना तीव्र से तीव्रतम होता है, व्यक्ति उतना ही अशांत होता जाता है और दूसरों को भी अशांत करता है। कषाय जितना मंद से मंदतर होता जाता है, व्यक्ति उतना ही शांत रहता है और दूसरों के लिए शांति का कारण बनता है। आज वैश्विक अशांति का कारण कषाय ही है। आध्यात्मिक मानसिक और शारीरिक व्याधियों से मुक्ति के लिए अत्यावश्यक है कि कषाय की गति को क्षीण किया जाय। कषाय की मुक्ति का एकमात्र उपाय है, साधना। साधना का मूल प्रयोजन ही कषाय के अपवित्र जल को निकाल देना है, जिससे वह शुद्ध और पवित्र बन जाये।[३७] व्यावहारिक जीवन की सफलता तथा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए भावों की शुद्धि आवश्यक है और इसकी सामथ्र्य स्वयं व्यक्ति में है। इसके लिए व्यक्ति को अशुभ भावों और बुराइयों का प्रवेश रोकने और संचित बुराइयों को शुद्ध करने का प्रयास करना चाहिए। जैन सिद्धांत की भाषा में इसे संवर और निर्जरा कहा गया है। कषाय से कर्मों का आस्रव (आगमन) और बंध (बंधन) होता है तो संवर और निर्जरा से कषाय मुदित होती है। तत्त्वार्थसूत्र में संवर साधना के ५७ हेतु बताये हैं[३८] तथा निर्जरा के लिए बाह्य एवं आभ्यंतर तप का मार्ग बताया है। चारों कषायों का प्रतिपक्षी गुण दस धर्मों में निहित है। क्रोध का प्रतिपक्षी गुण क्षमा है, मान का मार्दव, विनय और त्याग, माया का आर्जव और सत्य तथा लोभ का प्रतिपक्षी गुण आिंकचन्य है।

आत्म विशुद्धि के लिए जैन वाड्मय में बारह अनुप्रेक्षाओं अर्थात् भावनाओं का चित्रण किया है, जिनसे व्यक्ति आत्म िंचतन या आत्म विश्लेषण कर सकता है। ‘तप’ शुद्धि हेतु रसायन है जो आत्मरूपी स्वर्ण को तपा कर निर्मल और तेजस्वी बनाता है। इसमें आहार नियंत्रण के माध्यम से शुद्धि के छ: मार्ग (अनशन, अवमौदर्य, भिक्षाचर्या, रसपरित्याग, कायाक्लेश और संलीनता) हैं तथा भाव परिवर्तन के लिए छ: आभ्यान्तर तप (प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान और व्युत्सर्ग) हैं। पूर्वकृत दोषों के प्रायश्चित मन विशुद्धि तथा इन्द्रियों की स्थिरता हेतु ध्यान और कायोत्सर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण है। कायोत्सर्ग से शारीरिक एवं मानसिक तनावों से मुक्ति हो जाती है। भाव, विचार और व्यवहार व्यक्तित्व के तीन पहलू है। व्यवहार कायिक प्रवृत्ति है, विचार मानसिक प्रवृत्ति है। दोनों स्नायुओं से संबंधित हैं तथा ये दोनों ही भावों पर आधारित हैं। अत: भावों का विशेषत: काषायिक भावों का शोधन आवश्यक है। जैनधर्म और दर्शन वैज्ञानिक होने के साथ ही साथ पूर्णत: व्यावहारिक भी है, इसकी शिक्षाओं का अनुपालन करने से शारीरिक और मानसिक व्याधियों से मुक्ति मिलती है। साथ ही आत्मिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है। फलत: व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, राष्ट्र एवं विश्व में शांति की स्थापना हो सकती है।


संगीता मेहता'
प्राध्यापक—संस्कृत, शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इंदौर (म. प्र.)—४५२ ००१
जनवरी—जून २०१४ पेज नं. ११-१६

टिप्पणी

  1. संस्कृत—हिन्दी कोश, वामन शिवराम आप्टे, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, १९९३, पृ. २६०, २६१
  2. ण तित्ते, ण कडुए, ण कसाएँ, ण अंबिले, ण महुरे। आयारो अ. ५, उ. ६, सूत्र १३०
  3. कसाए पयणुए किच्चा.......आयारो अ ८ / उ ६ / सूत्र १०५
  4. संस्कृत हिन्दी कोष—वामन शिवराम आप्टे पृ. २३९, २६०
  5. कम्मं कस भवो वा कसमाओ िंस जओ कसाआ ता।कसगाययान्त जाओ गमयंतिकसं करनाय ति।। विशेषावश्यक भाए गाथा २ पे. ७८
  6. कषाय वेदनीयस्योदयादात्मान कालुष्यं क्रोधादि रूप। मुत्पथमानं कषत्यात्मानं हिनस्ति’ कषाय’ इत्युच्यते। राजर्वाितक / अध्याय २ / सूत्र ६
  7. सुखदु: खसुबहुसस्यं कर्मक्षेत्रं कृषति जीवस्य। संसारदूरमर्यादं तेन कषाय इतीमं बुवन्ति।।गोम्मटसार/जीवकाण्ड/अधिकार ६, गाथा २८२
  8. मिथ्या दर्शनाविरति प्रमाद कषययोगा बन्धहेतत:।तत्त्वार्थसूत्र—आ. उमास्वामि, अध्याय ८, सूत्र १
  9. कसावो ताव णिक्खिवियव्वो—णामकसाओ ठवणकसाओदखकसाओ पच्चयकसाओ समुप्पत्तियकसाओ आदेसकसाओ रसकसाओ भावकसाओ चेदि।। कषायपाहुड । र्चिणसूत्र / अध्याय १ / गाथा १३, १४, सूत्र ३९
  10. समवाय ४ सूत्र १
  11. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय ८, सूत्र १
  12. . जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश—जिनेन्द्र वर्णी, भाग—२ पृ. ३५
  13. वही पृ. ३९
  14. पूर्वमात्मानमेवासौ क्रोधान्धो दहति ध्रुवम्। पश्चादन्यान् न वा लोको विवेकविकलाशय:।। ज्ञानार्णव १९ /६
  15. उत्पद्यमान: प्रथमं दहत्येव स्वमाश्रयम्। क्रोध कृशानुवत् पश्चादन्यं दहति वा न वा।। योगशास्त्र, हेमचंद्राचार्य, प्रकाश ४, गाथा १०
  16. भगवतीसूत्र, १२ /०३
  17. अण्णं जणं पस्सति िंबबभूयं।। सूत्रकृतांग, अध्याय १३, गाथा ८
  18. करोत्युद्धधीर्मानाद्विनयाचारलंघनम्। विराध्याराध्यसन्तानं स्वेच्छाचारेण वर्तते।। ज्ञानार्णव, १९/५३
  19. विनय श्रुतशीलानां त्रिवर्गस्य च घातक:। विवेक लोचनं लूम्पन, मानोऽन्धंकरणो नृणाम्।। योगशास्त्र ४/१२
  20. समवायांग, ५२ /१
  21. भगवतीसूत्र, १२/५/३ की वृत्ति
  22. . माई पमाई पुणरेह गब्भं। आयारो अ. ३ / उ. १/ सूत्र १४
  23. असुनृतस्य जननी परशु: शीलशाखिन:। जन्मभूमिरविद्यानां माया दुर्गतिकारणम्।। योगशास्त्र प्र. ४/ मा १४
  24. ज्ञानार्णव, आचार्य शुभचन्द्र, श्री परमश्रुत प्रभावक मण्डल, श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम, अगासा, १९९८, १९/५८
  25. अर्गलापवर्गस्य........ज्ञानार्णव सर्ग १९/५९
  26. भगवतीसूत्र १२/४
  27. धवला—१२/४/२/८
  28. स्वामिगुरुबन्धुवृद्धानबलाबालांश्च जीर्णदीनादीन्। व्यापाद्य विगतशंको लोभार्तों वित्तमादत्ते।। ज्ञानार्णव १९/७०
  29. धर्मामृत अनगार, पृ. आशाधर अ. ६ गा. २७
  30. सर्वविनाशाश्रयिण: सर्वव्यसनैकराजमार्गस्य।।
  31. . आकर: सर्वदोषाणां गुणग्रसनराक्षस: कन्दो व्यसनवल्लीनां लोभ: सर्वार्थबाधक:।। आचार्य हेमचन्द्र, योगशास्त्र, प्र. ४, गाथा १८
  32. भगवती सूत्र, १२ / १०४-१०६
  33. पञ्चसंग्रह, भारतीय ज्ञानपीठ, बनारस, वि. सं. १९९०, प्राकृत अधिकार—१/१११—११४
  34. Alex jones-Seven Mantions of Colour JP. 123
  35. BD Babbit, The Philosophy of care, An Exhaustre Surey compiled by health reaserch, Colour Healing. P. 29.
  36. सूत्रकृतां ग, १/६/२६
  37. आभामण्डल, आचार्य महाप्रज्ञ, आदर्श साहित्य संघ, चुरु (राज.) १९९५, पृ. २१
  38. स. गुप्तिसमिति धर्मानुप्रेक्षा परिषहजय चारित्रै:।। तत्त्वार्थसूत्र आ. उमास्वामी ९/२, अर्थात् तीनगुप्ति, पाँच समिति, दसधर्म, बारह अनुप्रेक्षा, बाईस परीषहजय और पाँच चारित्र।