कषाय :

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कषाय :

ज्ञानेन च ध्यानेन च, तपोबलेन च बलान्निरुध्यन्ते।

इन्द्रियविषयकषाया, धृतास्तुरगा इव रज्जुभि:।।

—समणसुत्त : १३१

ज्ञान, ध्यान और तपोबल से इन्द्रिय—विषयों और कषायों को बलपूर्वक रोकना चाहिए, जैसे कि लगाम के द्वारा घोड़ों को बलपूर्वकर रोका जाता है।

ऋणस्तोदकम् व्रणस्तोकम्, अग्निस्तोवंâ कषास्तोवंâ च।

न हि भवद्भिर्विश्वसितव्यं, स्तोकमपि खलु तद् बहु भवति।

—समणसुत्त : १३४

ऋण को थोड़ा, घाव को छोटा, आग को तनिक और कषाय को अल्प मान, विश्वस्त होकर नहीं बैठ जाना चाहिए क्योंकि ये थोड़े भी बढ़कर बहुत हो जाते हैं।