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कहकोसु में वर्णित सामाजिक चिंतन

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कहकोसु में वर्णित सामाजिक चिंतन

डॉ. दर्शना जैन

पालम गांव, नई दिल्ल- ११००७५

भूमिका :

कहकोसु एक जैन कथाग्रंथ है तथा भगवती आराधना पर आधारित है, इसमें विभिन्न कथाओं का वर्णन किया गया है।

कहकोसु नामक ग्रंथ के रचियता मुनि श्रीचन्द्र हैं। कवि श्रीचन्द्र ने अपना यह कथा ग्रंथ मूलराज नरेश के राज्यकाल में अणहिल्लपुर पाटन में समाप्त किया था। मूलराज सोलंकी ने सं० ९९८ में चावड़ा वंशीय अपने मामा सामन्तसिंह को मारकर राज्यछीन लिया था और स्वयं गुजरात पाटन अणहिलवाड़े की गद्दी पर बैठ गया।

मुनि श्रीचन्द्र ने कहकोसु की रचना के पूर्व भगवती आराधना कर दो गाथायें उद्धृत की हैं। कथाओं का प्रारंभिक परिचय एवं शीर्षक के बाद प्राय: भगवती आराधना की गाथाओं का भाग दिया है। डॉ. ए० एन० उपाध्ये ने कथाकोश अथवा कहकोसु की प्रस्तावना में एक तालिका दी है,[१] जिसमें यह दृष्टव्य है कि किस प्रकार विभिनन कथायें क्रमश: भगवती आराधना की गाथाओं से संबन्धित हैं। कई कथाओं में श्रीचन्द्र ने कहकोसु में भगवती आराधना का अनुशरण किया है। इस कहकोसु में ५३ संधियाँ हैं, जिनमें विविध व्रतों के अनुष्ठान द्वारा फल प्राप्त करने वालों की कथाओं का रोचक ढंग से संकलन किया गया है। कथाएँ सुन्दर और सुखद हैं। इस ग्रंथ की प्रत्येक सन्धि में कम से कम एक कथा अवश्य आई है। ये सभी कथाएं धार्मिक और उपदेशप्रद हैं। कथाओं का उद्देश्य मनुष्य के हृदय में निर्वेग भाव जागृत कर वैराग्य की ओर अग्रसर करना है। कथाकोश में आई हुई कथाएँ तीर्थंकर महावीर के काल से गुरुपरम्परा द्वारा निरन्तर चलती आ रही है।

अत: कहकोसु कथाग्रंथ में मुनि श्रीचन्द्र ने भगवती आराधना तथा बृहत्कथा कोश से कथावस्तु जी है इसीलिए सामाजिक चित्रण में पौराणिक समाज का प्रभाव आंशिक रूप से प्रतिबिम्बित होता है। कवि ने अपने समय में प्रचलित सामाजिक मान्यताओं, प्रथाओं तथा संस्थाओं को अल्प ही चित्रित किया है लेकिन इसके अनुशीलन से कुछ झलक तो अवश्य ही पाई जाती है। कहकोसु में चित्रित सामाजिक जीवन की झांकी निम्न रूप में हैं। समाज के घटक तत्व

वर्ण व्यवस्था -

वर्ण शब्द की व्युत्पत्ति ‘वृ’ (वृञ वरणे) धातु से मनी गई है, जिसका अर्थ होता है चयन या चुनाव करना। इस दृष्टि से व्यक्ति अपने जिस व्यवसाय का चुनाव करता है, उसी के अनुसार उसका वर्ण निर्धारित होता है। राज्य एवं समाज के रूप में समन्वय लाने के लिए कार्यगत प्रवीणता एवं कुशलता हेतु वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ। वर्ण व्यवस्था की संस्थापना वृत्ति और आजीविका को व्यवस्थित रूप देने के लिए थी न कि उच्चता व नीचता के कारण।

जैन परम्परा के अनुसार यौगलिकों के समय वर्ण व्यवस्था नहीं थी। राजा नाभिराज ने प्रजा की आजीविका की समस्या का समाधान करने के लिए राजा आदिनाथ को आदेश दिया तथा राजा आदिनाथ ने क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र इन तीनों वर्णों की स्थापना कर कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था का सूत्रपात किया।[२] क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों का प्रमुख कर्म असि, मषि, कृषि, शिल्प, विद्या तथा वाणिज्य निश्चत किया गया। लेकिन कालान्तर में शिक्षा प्रदान करने तथा धार्मिक क्रियाकाण्ड व अनुष्ठान को संपन्न करने के लिए पृथक वर्ग की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी, इसके फलस्वरूप भरत चक्रवर्ती ने ऋषभदेव के केवलज्ञानोपरान्त ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की।[३] कहकोसु में चारों वर्णों का उल्लेख प्राप्त होता है। तथा वैश्य वर्ण में हरिदत्त वैश्य, सोमदत्त मुनि का गृहस्थ अवस्था का कुल वैश्य था। शुद्र वर्ण में यमपाल चाण्डाल का कथानक, तथा ब्राह्मण वर्ण में विष्णुकुमार मुनि कथा में चार ब्राह्मण मंत्रियों का कथानक दृष्टव्य है।

क्षत्रिय

क्षति से बचाने वाला वर्णही ‘क्षत्रिय’ इस सार्थक नाम से प्रसिद्ध हुआ। राज्य एवं समाज की रक्षा का भार क्षत्रिय वर्ण पर था। उनका वर्णगत गुण शासन और सैन्य कर्म था। न्याय की स्थापना तथा अधर्मियों को दण्ड देना क्षत्रियों के कर्तव्य क्षेत्र में सम्मिलित था। क्षत्रिय वर्ण का प्रमुख कत्र्तव्य भुजा में शस्त्र धारण करना था। शस्त्र धारण करने का प्रमुख उद्देश्य निर्दोष जीवों को क्षति न पहुँचा शरणागत रक्षण था। कहकोसु की दस संधियों में क्षत्रिय धर्म के दर्शन वारिषेण मुनि के कथानक में राजा श्रेणिक द्वारा चोरी के अपराध में वारिषेण को बिना पुत्र मोह के मृत्यु दण्ड देना है। द्वितीय दृष्टांत अंजनचोर के कथानक में अंजन चोर का सैनिकों के द्वारा पीछा किया गया तथा तृतीय दृष्टांत में हरिषेण चक्रवर्ती का युद्ध वर्णन प्राप्त होता है जिसमें वह क्षत्रिय धर्म का पालन करता हुआ दुष्टों पर विजय प्राप्त कर सज्जनों की रक्षा करता है। चतुर्थ कथानक में विष्णुकुमार मुनि कथा में राजा द्वारा चार मंत्रियों को नगर से निकाले जाने की सजा सुनाना है। इस प्रकार कहकासु में क्षत्रिय धर्म का वर्णन प्राप्त होता है।[४]

वैश्य

वैश्य अपने उदर की पूर्ति के साथ-साथ समाज की अर्थव्यवस्था एवं भरण-पोषण का भार वहन करते थे। वैश्य वर्ण के द्वारा ही राज्य को आर्थिक सुदृढ़ता प्राप्त होती थी। एक स्थान से दूसरे स्थान को वस्तुओं का आयात निर्यात कर प्रजा के जीवन में सुख का संचार करना चाहिए। जो व्यक्ति प्रस्तुत कार्य के निए सन्नद्ध हुए वह वैश्य की संज्ञा से अभिहीत किए गये।[५] कहकोसु से सोमदत्त मुनि की कथा में वैश्य वर्ण के दिग्दर्शन होते हैं। जहाँ पर सोमदत्त से व्यापार के लिए कुछ धन उधार माँगा था तथा मुनि बनने के बाद सोमदत्त मुनि से हरिदत्त अपना धन वापस करने को कहता है। अन्य बहुत से स्थानों पर वैश्य वर्ण का उल्लेख मिलता है। सूरमित्र की कथा में दोनों वणिक पुत्रों का महारत्न के लिए विदेश गमन का वर्णन वैश्य कुल की द्योतक है।[६]

शुद्र

श्री ऋषभदेव ने मानकों को यह प्रेरणा दी कि कर्म युग में एक दूसरे के सहयोग के बिना कार्य नहीं हो सकता। अत: सेवाभावी व्यक्ति शुद्र कहलाया।[७] जिस प्रकार शरीर का सारा भार पैरों पर होता है उसी प्रकार शुद्र वर्ण पर समाज की सेवा का पूरा-पूरा भार होता था।[८] कहकोसु में श्रुतविनय के आख्यान में विद्याधर युगल के द्वारा मातंग का वेष धारण करना, विष्णु पद्युम्न कथानाक में चाण्डान का कथन[९], उस समय जाति के सदभाव का द्योतक है।

ब्राह्मण

वैदिक संस्कृति ब्राह्मण वर्ण को प्रथमत: स्वीकार करती है लेकिन श्रमण संस्कृति में सर्वप्रथम क्षत्रिय वर्ण को माना गया। भरत के राज्यकाल में श्रावक कर्म उत्पन्न होने पर ब्राह्मण अर्थात् माहण की उत्पत्ति हुई। ब्राह्मण से त्याग, कर्तव्यपरायणता, साधना तथा बौद्धिक श्रेष्ठता की अपेक्षा की जाती थी। वह राज्य तथा समाज के हित के लिए धार्मिक क्रियाओं को संपन्न करता था तथा साधना और तपश्चर्या द्वारा समाज का मार्ग निर्देशन करता था।[१०] यह वर्ण अत्यन्त सरल स्वभावी तथा धर्मप्रेमी था इसलिए जब किसी को मारते पीटते देखते तो कहते थे माहण तभी से ये माहण ब्राह्मण भी कहे जाने लगे।[११] ब्राह्मण वर्ण यज्ञोपवीत धारण करता था[१२] तथा गर्भान्वय, कर्मान्वय तथा दीक्षान्वय क्रियाओं को करने वाला था। कहकोसु में ब्राह्मण वर्ण को पुरोहित के रूप में स्वीकार किया है। जिसमें कल्लासमित्र की कथा में शिवभूति पुरोहित नाम आता है।

मित्र प्रेम व गुरुभक्ति

मित्र का महत्व जीवन में असन्दिग्ध है। ‘सत्संगति कथय कि न करोति पुंसाम:।’ मित्र वह होता है जो गुणों को तो प्रकट है तथा दोषों को छिपाता है। अच्छे मित्र की संगति बुद्धि, यश, धन, सत्य, प्रसिद्धि हृदय में प्रसन्नता इत्यादि गुणों को प्रकट करती है। कहकोसु में मित्रता के लिए वारिषेण राजकुमार और उनका मित्र पुष्पडाल का नाम आता है तथा सोमदत्त मुनि और हरिदत्त की मित्रता तथा दुष्ट मित्रता के उदाहरण में बलि, प्रहलाद, नमुचि, बृहस्पति इन चार मंत्रियों का नामोल्लेख किया है जिसमें यह चारों सभी प्रकार के निंदनीय कार्य साथ में करते हैं।

स्त्रीवर्ग में भी अंतरंग सखियाँ होती थी तथा एक सखी से अपने हृदय में स्थित सभी प्रकार की गूढ से गूढ बात कर मन का बोध हलका कर लेती थी। श्रीचन्द्र मुनि ने इसका वर्ण दस संधियों के अतिरिक्त संधियों में किया है। उसमें सेठ सुदर्शन की कथा का वर्णन आता है जिसमें रानी की सखी का उल्लेख प्राप्त होता है।[१३]

गुरु भक्ति

गुरु चिरकाल से ही पूजनीय रहे हैं। जैन परम्परा में गुरुओं का नाम देवशास्त्र के बाद लिया जाता है। अत: मुनि श्रीचंद्र ने भी गुरुओं का आख्यान किया है। गुरुओं के संबंध में कहकोसु में जो कथानक आये हैं उनसे यह ध्वनित होता है कि मुनि श्रीचंद्र ने दो प्रकार के गुरुओं का नाम दिया है, प्रथम दीक्षा गुरु अर्थात् निग्र्रन्थ दिगम्बर साधु तथा दूसरे शिक्षा गुरु जो राजमहलों में राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण करते थे। प्रथम निग्र्रंथ गुरुओं के कथानक में रेवती रानी के आख्यान में मुनिगुप्त ने दक्षिण मथुरा से विद्याधर श्रावक के साथ रेवती रानी को आशीर्वाद भेजा। तथा उसी कथानकमें दूसरी ओर भवसेन मुनि जो ग्यारह बंग के धारी थे परन्तु मिथ्यादृष्टि थे उनके वंदना भी नहीं की। इससे यह भी प्रतीत होता है कि सदगुरुओं का आदर जग में सभी जगह होता है तथा सदगुरु भी सम्यग्दृष्टि को सदैव आशीर्वाद आदि उपदेश दिया करते हैं तथा मिथ्यादृष्टियों को सम्मान भी नहीं देते हैं। दूसरे कथानक में विशाखा मुनिकी रानी चेलना के द्वारा वैयावृत्ति सदगुरु का आदर है। वारिषेण मुनि का नाम भी सच्चे गुरु की श्रेणी में गिना जाता है। विष्णुकुमार मुनि ने तो सच्चे गृरु होने का प्रमाण जग के सामने दर्पण के समान प्रतिबिम्बित किया है जिसमें उन्होंने अपने गुरु महापदम से आज्ञा लेकर अंकपनाचार्य आदि ७०० साधुओं का उपसर्ग दूर किया। साधु भी उपसर्ग दूर करने में समर्थ होते हैं। तृतीय उदाहरण में वङ्काकुमार ने धर्म की प्रभावना कराकर सच्चे गुरु होने का संकेत दिया है। सोमदत्त मुनि ने मुनि के अटठाईस मूलगुणों का विस्तृत वर्णन करके गुरु के महत्व को प्रदर्शित किया है। गुरुनिह्नव में जहाँ कालसंदीव मुनि को गौरसंदीव मुनि का गुरु बताया है वहीं पूर्व गृहस्थ अवस्था में कालसंदीव को चंदप्रद्योत का गुरु कहा है यहाँ पर गौरसंदीव के दीक्षा व शिक्षा गुरु के रूप में कालसंदीव का वर्ण है वहीं पर कालसंदीव को चंदप्रद्योत राजा का शिक्षा गुरु होने का सम्मान भी दिया गया है इसी प्रकार उपधान कथा, ज्ञान बहुमान कथा, व्यंजनहीन कथा, अर्थहीन कथा, व्यंजन अर्थहीन कथा, व्यंजन अर्थ-उभय शुद्धि कथा में शिक्षा गुरु का नामोल्लेख किया है जो राजकुमारों को पढ़ाने के लिए राजमहलों में जाया करते थे तथा राजमहलों में उन्हें पूरा सम्मान प्राप्त होता है। इस प्रकार गुरु को राजगुरु होने का गौरव भी प्राप्त होता था। कहकोसु में दीक्षा गुरु और शिक्षा के अतिरक्ति विद्या गुरु का भी आख्यान प्राप्त होता है। विद्याधर युगल का चाण्डाल के रूप में सुप्रतिष्ठित साधु को विद्या देना तथा अपने को गुरु के सम्मान के रूप में स्वीकार करने की शर्त रखना। विद्यागुरु होने के संकेत देते हैं।[१४]

मनोरंजन एवं धार्मिक उत्सव

प्रकृति के अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य की आमोद-प्रमोद में अधिक रुचि होती है। प्राचीन समय का मानव आज की तरह व्यस्त नहीं था वह मनोरंजन के लिए अनके प्रकार की कलाएं सीखता था, तथा स्वयं भी अनेक कलाओं का विकास करता था। इसके अतिरिक्त निरंतर कार्य करने से श्रान्त मानव क्रीड़ाविनोद द्वारा नई शक्ति तथा स्फूर्ति का संचय करता था तथा भावी जीवन में सफलता प्राप्त करता था। आदिपुराण में स्पष्ट कहा गया है कि ‘‘उन्मार्ग के न पीडयते्’’, ‘‘अत्यन्तरसि कानादौ नर्यन्ते प्राणहारिण:’’[१५] अर्थात् सर्वथा विनोद और क्रीडाओं का सेवन करने वाला व्यक्ति उन्मार्गगामी है।कहकोसु की दस संधियों में मनोरंजनार्थ नागक्रीड़ा, वनक्रीड़ा का उल्लेख प्राप्त होता है।

वनक्रीड़ा

कहकोसु में कवि मुनि श्रीचंद ने वनक्रीड़ा का वर्णन प्रस्तुत किया है। वनक्रीड़ा के वर्णन में वङ्काकुमार राजकुमार का कथानक आता है। जब वह ह्नीमंत पर्वत पर प्रकृति की शोभा देखने को गया। इसी प्रकार का कथानक वनमहोत्सव के रूप में मदिरा व्यवसायी पूर्णचन्द्र ने वन में घी, शर्करा के मिष्ठान का आयोजन किया।[१६] इस प्रकार वन क्रीड़ा करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है।

नागक्रीड़ा

कहकोसु में मुनि श्रीचंद ने वनक्रीड़ा के अतिरिक्त नागक्रीड़ा का वर्णन भी किया है। इसमें नागदत्त राजकुमार नागों से खेलने का शौकीन होता है जिसको वैराग्य दिलाने के लिए उसका पूर्व भव का मित्र देव आता है और दो भयंकर नागों से खेलने के लिए नागदत्त को प्रेरित करता है नागदत्त उसकी प्रेरणा को चुनौती समझकर नागों से खेलने लगता है। बातों बातों में नाग नागदत्त को डस लेता है और नागदत्त मूर्छित हो जाता है। नागदत्त को जीवित करने के लिए देव ने नागदत्त के पिता राजा से नागदत्त को मुनि की शर्त रखी। इस प्रकार नागक्रीड़ा का वर्णन प्राप्त होता है।[१७]

अष्टाह्निक महोत्सव

यह पर्व कार्तिक, फाल्गुन, आषाढ़ मास के अन्त के आठ दिनों में मानया जाता है। जैन मान्यतानुसार इस पृथ्वी पर आठवाँ नन्दीश्वर द्वीप है। उस द्वीप में ५२ जिनालय बने हुये हैं। उनकी पूजा करने के लिए स्वर्ग से देवता उक्त दिनों में जाते हैं चूंकि मनुष्य वहाँ नहीं जा सकते, इसलिए वे उक्त दिनों में पर्व मनाकर यहीं पूजा कर लेते हैं जो व्यक्ति इसे भाव सहित तीन वर्षों तक करता है उसे स्वर्गसुख की प्राप्ति होत है।[१८] कहकोसु में दो स्थानों पर आष्टाह्निक पर्व का उल्लेख आता है राजा पृथ्वीमुख की रानी ओर्विला प्रतिवर्ष अपने नगर में जिनेन्द्र भगवान की रथयात्रा निकालती थी। द्वितीय उदाहरण में हरिषेण चक्री अपनी माता के अष्टाह्निन पर्व पर रथयात्रा निकाले के संकल्प को पूरा करता है।[१९] इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में धर्म के पर्वों में भी उत्सव मनाया जाता था।

राज्याभिषेकोत्सव

राजा राज्य सुख भोगने के पश्चात् तप और ध्यान के लिए दीक्षा ग्रहण करता था। उससे पूर्व वह राज्य का उत्तरदायित्व अपने सुयोग्य तथा समर्थ पुत्र को सौंपता था और इस हेतु पुत्र का राज्याभिषेक किया जाता था। कहकोसु में मुनि श्रीधर के पुन: राज्य स्वीकार करने पर मंत्रीवर्ग ने उनका राज्याभिषेक किया।[२०] इससे यह भी ध्वनित होता है कि पूर्व काल में मुनि भी अपने राज्य की रक्षा के लिए मुनि पद का त्याग पुन: अपना राज्य स्वीकार कर लेते थे परन्तु यह मार्ग अपवाद मार्ग है।

विवाह संस्कार

शस्त्रकारों ने विवाह की परिभाषा बतलाते हुए लिखा है - सद्वेद्यस्य चारित्रमोहस्य चोदयात् विवहनं कन्यावरणं विवाह इत्याख्याते अर्थात् सातावेदनीय और चारित्रमोहनीय के उदय से विवहन, कन्यावरण करना विवाह कहा जाता है। अग्नि, देव और द्विज की साक्षी पूर्वक पाणिग्रहण क्रिया का संपन्न होना विवाह है।

सोमदत्त तथा यज्ञदत्ता के विवाह संबन्ध के उल्लेख से यह प्रतीत होता है कि बुआ तथा मामा के पुत्र व पुत्री का विवाह संबन्ध स्वीकार था कहकोसु में बहुविवाह की प्रथा का समर्थन भी प्राप्त होता है यथा-हरिषेण १६००० कन्याओं से विवाह कर उन्हें अपनी रानी बनाया। रानी चेलना के पुत्र वारिषेण का विवाह ३२ सुन्दर कन्याओं के साथ हुआ। राजकुमार वङ्काकुमार ने मदनवेगा राजकुमारी के साथ विवाह किया। कल्लासमित्र की कथा में मदिरा व्यापारी पूर्णचंद्र अपने पुत्री का विवाह बड़े उत्सव के रूप में करता है तथा उसने पुत्री का विवाह के उपलक्ष्य में पूरे नगर को भोजन दिया था।

कहकोसु में विजातीय के संबंध में उल्लेख प्राप्त होता है। कहकोसु में बुद्धदासी के कथा में राजा जैनधर्म का अनुयायी और क्षत्रिय था तथा बुद्धदासी रानी वैश्य और बुद्धदासी को देखकर प्रेम हो जाने के कारण राजा ने धर्म परिवर्तन का बुद्धदासी से विवाह कर लिया। इसे प्रेम विवाह भी कह सकते हैं। वहीं दूसरे कथानक में राजा विशाखादत्त ने अपने नगर में रहने वाले चित्रकार विचित्र की पुत्री बुद्धिमती से विवाह किया। जो शिल्प का कार्य करने वाले चित्रकार की पुत्री थी। प्राचीन समय में कर्म के अनुसार वर्णों का विभाजन होता था उसमें चित्र आदि शिल्प का कार्य करने वाले व्यक्ति को शुद्र की श्रेणी में रखते थे। अत: राजा विशाखदत्त ने क्षत्रिय वंश के होतेहुए भी शुद्र की कन्या से विवाह किया। इससे यह भी ध्वनित होता है कि प्रम के वशीभूत होकर राजा भी विजातीय विवाह कर लेता था।

पुरातन काल में वयस्क होने पर कन्याओं के विवाह हुआ करते थे, जिससे वे अपने वर के लिए कुछ शर्तें भी रखती थी। तथा अपने पति से गूढ़, प्रश्न भी पूछती थी तथ कुछ अलौकिक ज्ञान तथा तपस्वी आदि करने में महारत हासिल करती थी। वङ्काकुमार की पति मदनवेगा ने वन में जाकर तपस्या की यह उसकी वयस्का होने का प्रतीक है। हरिषेण ने लावण्ययुक्त मदनावती से विवाह किया लावण्यता उसकी वयस्का होने का कारण है। बुद्धिमती अत्यधिक चतुर थी तथा उसके अंगों से सुंदरता तथा लावण्यता झलक रही थी। यह भी उसकी वयस्का होने का संकेत है।[२१] इससे यह ज्ञात होता है कि वयस्क कन्या का ही विवाह होता था, अवयस्क कन्या को विवाह के योग्य नहीं समझा जाता था।

प्राचीन समय में विद्याधरों की कन्याओं के साथ युवकों के विवाह हुआ करते थे। हरिषेण ने ३२००० विद्याधन कन्याओं से विवाह किया।[२२]

कहकोसु में एक ऐसा उदाहरण भी जिसमें कन्या दान के लिए धन देना पड़ता था। तथा कन्या का पिता अपनी पुत्री का विवाह धन लेकर करता था। यथा-टक्क देश में बलदेवपुर नाम का नगर है। वहाँ का राजा बलभद्र है। उसके राज्य में धनदत्त नाम का सेठ रहता था। जिसकी धनवती नाम की एक पुत्री थी। उसी नगर में पूर्णभद्र नाम का अन्य वणिक निवास करता था। जिसके पूर्णचन्द्र नाम का पुत्र था। पूर्णचन्द्र ने अपने पुत्र के लिए धनदत्त की पुत्री धनवती की याचना की। तब धनदत्त ने पूर्णभद्र से धन लेकर अपनी कन्या का दान दी।[२३] यह उदाहरण यह भी प्रस्तुत करता है कि कन्या के जगह धन का अदान-प्रदान भी इस काल में प्रचलित था।

शिक्षा

शिक्षा से मनुष्य में ज्ञान उत्पन्न होता है। ज्ञानोदभव का आधार तत्व शास्त्र और विवेक माना गया है। समाज में दो प्रकार के लोग रहते हैं एक तो वे जो प्रत्येक कार्य को समझकर अथवा ज्ञान से करते हैं। दूसरे वे जो बिना समझे अथवा अज्ञान से करते हैं। जो कर्म समझकर ज्ञान से किए जाते हैं, वे कर्म शक्तिशाली तथा सफल होते हैं। अतः शिक्षा का महत्व स्यवंसिद्ध है।

शिक्षा की समुचित व्यवस्था पर सांस्कृतिक, बौद्धिक तथा वैज्ञानिक प्रगति संभव है। संपूर्ण जीवन शिक्षा के लिए है तथा शिक्षा संपूर्ण जीवन के लिए। इस विधान के साथ-साथ प्राचीन समय में प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य को विशेष रूप से शिखा का काल घोषित किया गया था। कहकोसु कालीन समाज पूर्ण रूप से शिक्षा समाज था। माता-पिता अपनी संतान को शिक्षा प्रदान करने में कोई कमी नहीं रखते थे।

इस काल में शिक्षा उच्चकुल में सर्वाधिक महत्वपूर्ण समझी जाती थी। राजा अपने राजकुमार को अवश्य शिक्षा देता था। कोई भी पिता अपने गुरु को जो उसके पद अथवा व्यापार का उत्तराधिकारी है, उसे शिक्षा देना अनिवार्य मानता था।कहकोसु की व्यंजनहीन कथा राजा वीरसेन ने अपने पुत्र सिंहरथ के अध्ययन के अपने राज्य व्यवस्था संबन्धी पत्र में एक वाक्य लिखा - सिंहो अध्यापयितव्य: अर्थात् सिंहरथ की अध्ययन की व्यवस्था की जाए। तथा अर्थहीन कथा में राजा वसुपाल ने अपने पुत्र वसुमित्र के अध्ययन के लिए गर्ग नामक एक विद्वान नियुक्त किया था।[२४] इससे यह प्रतीत होता है कि उस समय अध्ययन कितना आवश्यक था कि राजा युद्ध क्षेत्र से भी अपने पुत्र के अध्ययन के लिए व्यवस्था किया करते थे।

टिप्पणी

  1. कहकोसु, प्रस्तावना, पृ. ११
  2. पुरुदेवचम्पू ७/१४
  3. पुरुदेवचम्पू १०/४५
  4. कहकोसु, संधि ३,२,८
  5. महापुराण २४४/१६/३६८, ऋषभदेव एक परिशीलन पृ. ८६
  6. कहकोसु संधि ५,७
  7. महापुराण २४५/१६/३६८
  8. पुरुदेवचम्पू ७/२७
  9. कहकोसु संधि ६,९
  10. पुरुदेवचम्पू १०/४५
  11. जैन आगम साहित्य में भारतीय समाज पृ २२३
  12. पुरुदेवचम्पू १०/४२
  13. कहकोसु संधि २२
  14. कहकोसु संधि २, ३, ४, ५, ६
  15. आदिपुराण में प्रतिपादित भारत पृ. २३९
  16. काहकोसु संधि ४, ७
  17. कहकोसु संधि ७
  18. जैन व्रतकथा संग्रह पृ. १२९
  19. कहकोसु संधि ४, ८
  20. कहकोसु संधि १०
  21. कहकोसु संधि ४, ५, ८
  22. कहकोसु संधि ८
  23. काहकोसु संधि ७
  24. कहकोसु सधि ६