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कायोत्सर्ग :

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कायोत्सर्ग :

दैवसिकनियमादिषु, यथोक्तमानेन उक्तकाले।


जिनगुणचिन्तनयुक्त:, कायोत्सर्गस्तनुविसर्ग:।।

—समणसुत्त : ४३४

दैनिक प्रतिक्रमण के नियमानुसार यथोचित समयावधि (२७ श्वासोच्छ्वास) तक जिनप्रभु के गुणों का चिन्तन करते हुए शरीर की ममता को छोड़ देना कायोत्सर्ग है।

देहमति: जाड्यशुद्धि: सुखदु:ख—तितिक्षता अनुप्रेक्षा।


ध्यायति च शुभं ध्यानम् एकाग्र: कायोत्सर्गे।।

—समणसुत्त : ४८१

कायोत्सर्ग करने से शरीर की जड़ता समाप्त होती है (उसके कफ आदि दोष दूर होते हैं)। बुद्धि की जड़ता समाप्त होती है (जागरूकता बढ़ती है)। सुख—दु:ख समतापूर्वक सहने की शक्ति बढ़ती है। धर्म—भावनाओं को यथोचित अवसर मिलता है और शुभ ध्यान के लिए आवश्यक एकाग्रता मिलती है।