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किसी को दोस्त या सहेली बनाने से पहले सौ बार सोचना

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किसी को दोस्त या सहेली बनाने से पहले सौ बार सोचना,वरना इस भूल के लिए तुम्हें ताउम्र अपने आपको पड़ेगा कोसना।

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जीवन कई प्रकार के रंगों से भरा होता है। या यूँ कहें कि जीवन में कई प्रकार के रंग होते हैं। ये रंग व्यक्ति के स्वभाव, व्यवहार, आदत, चाल, चलन इत्यादि कई प्रकार के गुण—दोष के रूप में परिलक्षित होते हैं ।कुछ रंग जीवन में नई उमंग भरते हैं, तो कुछ रंग जीवन को ही बदरंग कर देते हैं। जो समय रहते जीवन की कीमत पहचान लेते हैं, उनके जीवन का रंग सबको लुभाता है। वहीं जिन्होंने जीवन की कीमत ही नहीं समझी, जीवन मूल्यों को समझा ही नहीं, उनका जीवन लोगों की दृष्टि में अत्यन्त उपेक्षित, दयनीय समझा जाता है।

कुछ रिश्ते भगवान बनाकर भेजता है, तो कुछ रिश्ते व्यवहार से अर्जित किये जाते हैं और रिश्तों की ये डोर मजबूती से बंधी रहे कभी टूटे नहीं, यह व्यक्ति विशेष के विवेक पर निर्भर करता है। इनमें से एक रिश्ता दोस्ती का भी होता है। यह रिश्ता अन्य रिश्तों की तुलना में अपनी विशिष्ट भूमिका का निर्वहन करता है।

कहते हैं दोस्त सगे भाई के समान होते हैं। पारिवारिक रिश्तों की तरह यह रिश्ता भी उतना ही मायने रखता है। या ये कह दूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक निश्चित उम्र के बाद दोस्ती का रिश्ता जीवन के विभिन्न पहलुओं में एक मुख्य भूमिका निभाने वाला आधारस्तम्भ होता है। लेकिन आज दोस्ती रूपी रिश्ते के मायने ही बदल गये हैं। अधिकांश दोस्त या सहेलियाँ आधुनिकता की अंधी दौड़ में होड़ लगाने हेतु प्रेरित करते हैं। बहुत कम दोस्त या सहेलियाँ ऐसी होंगी जो जीवन मूल्यों के महत्व को समझाकर आदर्श स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं।

वक्त ज्यों—ज्यों करवट बदलता गया, संचार साधनों में एक नई क्रांति का संचार होता गया। जिसके लाभ हानि से आप भली—भांति परिचित हैं। इन्टरनेट, मोबाईल, फेसबुक, वाट्सअप आदि के जितने फायदे हैं उतने नुकसान भी हैं। एक जगह कुआं खोदा गया है जिसका शीतल जल सबकी प्यास बुझता है, वहीं यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर बिना सोचे समझे उसमें गिरे तो उसी कुएं में वह काल का ग्रास भी बन जाता है। कुआं एक है, व्यक्ति वही है परन्तु विवेक और अविवेक के कारण परिणाम दो निकल सकते हैं। एक जीवन को अमृत पिलाकर प्यास बुझायेगा, दूसरा जीवन को ही नष्ट कर देगा। मतलब स्पष्ट है कि विवेक का अत्यन्त महत्व है। भौतिक संसाधनों से जीवन की गाड़ी को उत्थान की मंजिल तक पहुँचाना है या बर्बादी के गर्त में धकेलना है, यह आपके विवेक पर निर्भर है। विवेक पारिवारिक संस्कारों से तो आता ही है, दोस्तों की संगति भी व्यक्ति को संस्कारवान या संस्कारहीन बनाने में अहम् भूमिका निभाती है। दोस्त कैसा हो, सहेली कैसी हो? कौन दोस्त या सहेली हमें सन्मार्ग की ओर ले जा रही है या पतन के गर्त में धकेल रही है, बस यदि यह विवेक हर युवक और युवती ने रखा तो मेरा दावा है कि कोई भी भौतिक संसाधन या भौतिकवादी आँधियाँ उसे अपनी चपेट में नहीं ले सकती। मैं युवा पीढ़ी को एक बात बताना चाहूँगा कि मान लो तुम अपने घर के दरवाजे के बाहर खड़े हो या खड़ी हो और तुम्हारे सामने ही तुम्हारे पड़ोसी ने तुम्हारे घर के बाहर कचरा लाकर डाल दिया और तुम मौन रह गये। तुमने कोई आपत्ति नहीं की तो दूसरे दिन दूसरा पड़ोसी भी कचरा लाकर डालेगा और तीसरे दिन मुहल्ले वाले भी कचरा लाकर डालना शुरू कर देंगे और देखते ही देखते वहाँ कचरे का ढेर लग जायेगा। ठीक इसी तरह तुम्हारा कोई दोस्त या सहेली यदि तुमसे कोई गलत बात करे, अश्लील बात करे, माँ—बाप से छिप—छप करके रंगरेलियाँ मनाने हेतु प्रेरित करे, होटलों में साथ में आने के लिए आग्रह करे, प्रेम प्रसंगों की पींगें लड़ाने के लिए कहे तो उसी पल तुम्हें उसे रोकना होगा और कहना होगा कि मुझे मेरे माँ—बाप ने मेरा कैरियर बनाने के लिए भेजा है, मुझे मेरे खानदान की प्रतिष्ठा और मान—सम्मान की चिन्ता है और मैं जीवनमूल्यों की कीमत अच्छी तरह समझता हूँ या समझती हूँ । ये काम मेरा नहीं है। यदि दृढ़ता से अपने विवेक का उपयोग कर ये बात कहने की हिम्मत जुटा ली तो मेरा दावा है कि दुनिया की कोई ताकत तुम्हें गलत रास्ते पर नहीं ले जा सकती।

यदि तुमने दोस्ती के धरातल पर खड़े होकर आत्मचिन्तन करते हुए अपने दोस्तों और सहेलियों के विचारों का मूल्यांकन कर लिया तो जीवन में तुम्हें कभी बर्बादी व बदनामी के कगार पर खड़ा नहीं होना पड़ेगा।

कौरवों को शकुनि की संगति मिली तो दुर्योधन और दु:शासन का निर्माण हुआ और पाण्डवों को कृष्ण की सोहबत मिली तो धर्मराज युधिष्ठर व अर्जुन का निर्माण हुआ।

मित्रता अनमोल होती है। सच्चे मित्र ईश्वरीय वरदान स्वरूप होते हैं। इसलिए किसी को भी मित्र या सहेली बनाने से पहले सौ बार सोच लो। जीवन मूल्यों की कीमत समझना और पारिवारिक रिश्तों की डोर तुम्हारे व्यवहार के कारण कभी कमजोर न हो जाये, इस दिशा में सदैव जागृत रहना। सच्चा मित्र जीवन का अमूल्य उपहार है।

युगराज जैन
युग प्रवाह, पाक्षिक
१६ से ३१ अक्टुबर, २०१४