Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास टिकैतनगर-बाराबंकी में चल रहा है, दर्शन कर लाभ लेवें |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

कुमाऊँ में जैन धर्म की प्राचीनता

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कुमाऊँ में जैन धर्म की प्राचीनता

कैलाशचन्द्र जैन
सारांश

भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) के पुत्र भरत का प्राचीन काल में कैलास—मानसरोवर जाने का रास्ता ‘कुमाऊँ’ से था, जो कि चीन के तिब्बत, पश्चिम नेपाल और भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित है। कुमाऊँ (एवं संपूर्ण उत्तराखंड) के प्राचीन शासकों ‘कत्यूरी—राजाओं’ के समय में भी जैन धर्म का प्रचार इस क्षेत्र में था। कुमाऊँ के प्रवेश द्वार से सटे तराई भाँवर के क्षेत्र में ही ‘अहिच्छत्रा जैन तीर्थ’ स्थित है। जो कभी प्राचीन उत्तर—पाँचाल राज्य की राजधानी थी। साथ ही साथ कुमाऊँ में स्थित प्राचीन जैन चरण पादुकाओं की जानकारी देना भी इस लेख का उद्देश्य है।

उत्तराखण्ड में नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिलों को कुमायूँ (कुमाऊँ) जनपद या क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। जब से उत्तराखंड राज्य, उत्तरप्रदेश से अलग होकर एक अलग राज्य बना है तब से प्रशासनिक दृष्टिकोण से इसको अन्य कई छोटे—छोटे जिलों में बांट दिया गया है। परन्तु प्रस्तुत लेख में हम पुराने जिलों यानि नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिलों को मानकर ही विचार करेंगे।

प्राचीन काल से ही कुमायूँ में जैन संस्कृति का प्रचार रहा है, जो भारत के उत्तर में, हिमालय पर्वत श्रेणी के ठीक बीचों बीच यानि मध्य में स्थित है। कुमायूँ के उत्तर में तिब्बत (कैलाश पर्वत/अष्टापद), पश्चिम में गढ़वाल, दक्षिण में उत्तर प्रदेश का बरेली/रुहेलखण्ड, तथा पूर्व में नेपाल की पश्चिमी सीमा लगी हुई है। इसके पूर्व में काली नदी (घाघरा और शारदा) तथा पश्चिम में रामगंगा नदियाँ बहती हैं। इसकी तलहटी में एक लंबी पट्टी में मैदानी भाग है, जिसे तराई या भाँवर नाम से जाना जाता है। भगवान ऋषभदेव इसी हिमालय में स्थित पर्वतराज ‘‘कैलाश’’ उपनाम अष्टापद से मोक्ष सिधारे थे। भगवान आदिनाथ के निर्वाण का समाचार ज्ञात होने पर उनके ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती राजा ‘‘भरत’’ कुमाऊँ के भूभाग के रास्ते से होते हुए ही सपरिवार कैलाश पर्वत पर गये थे और समारोहपूर्वक भगवान का निर्वाण पूजोत्सव मनाया था। आज भी कैलाश और मानसरोवर यात्रा पर भारत से जाने के लिये अनेकों रास्ते हैं परन्तु इनमें से सबसे सुगम एवं सुरक्षित मार्ग कुमाऊँ में स्थित ‘‘लिपुलेख’’ दर्रे को माना जाता है। इसके बाबत सुप्रसिद्ध, लेखक, तथा साधक एवं यात्री स्वामी प्रणवानंद लिखते हैं।

There are several routes to the Holy Kailas (Kailasa) and Mansarover from different places, i.e., (i) From Almora.... Lipulekh pass to Kailas (ii) -------(XIV) from kullu via Thuling...... Manasarovar..Fme Øekeâej mJeeceer peer ves Yeejle mes kewâueeMe/ceevemejesJej lekeâ Deeves peeves kesâ efJeefYeVe Ûeewon jemleeW keâe JeCe&ve keâj Devle ceW efueKeles nQ—``The first route i.e. from Almora via Lipu-Lekh pass is the easiest and safest for people going from plains.2 According to some historians the great Emperor (Asoka (269 B.C.) deputed the Katyuri Raja Nandi Dev of Kumaon who invaded westeren Tibet through Unta-dhura pass and annexed it to the Indian Empire. On his return journey he visited Kailas and Mansarovar. NandiDev visited this Region once again in the following year, according to the copper plate inscription in the temple of Pandukeshvar (Village in midway between Joshimath and Badrinath). The copper plate dates the 25th year of Vikrama era, (i.e. about 33 B.C).3 Thus the earliest ruling dynasty known to authentic history is the Katyuris. The Katyuri Raja of Kumaon and Garhwal was styled ``Sri Besdeo Giriraj Chakra Churamani and the earuiest traditions record that of the Joshmath Katyuri's possessions extended from the Satlaj as far as the Gandaki and from the snow to the plains including the whole of Rohilkhand. ``Tradition gives the origin of their Raj at Joshimath in the north near Badrinath and a subsequent migration to Katyur velley in Almora district where a city called Kartti-Keyapura was founded.4 In 335 AD the kingdom of kartipura was a semi-tributory State of the Gupta empire. In the Allahabad inscription of Samudra Gupta this state is mentioned to the west of Nepal. Kartripura is identifies with katyuriraj in Kumon.5

नौनीताल के प्रसिद्ध नैनादेवी मंदिर में काशीपुर निवासी श्री उग्रसेन जी तथा अन्य कई सज्जनों ने कुछ वर्ष हुए एक मनोज्ञ जैन तीर्थंकर प्रतिमा देखी थी। बाद में वह वहाँ नहीं रही और बताया गया कि कतिपय अन्य र्मूितयों के साथ वह भी चोरी हो गई है।७ अगस्त २०१२ एवं १५-०९-२०१२ में मैंने अपने एक पुराने मित्र डा. डी. एन. तिवारी से दूरभाष पर वार्ता की तो उन्होंने भी लगभग चौथी—पाँचवी ईस्वी शताब्दी के एक जैन शिलालेख, जो कि जैन तीर्थंकर र्मूित पर था, के बाबत् बताया। उनके द्वारा यह भी बताया गया कि यह लेख नैनीताल जिल में पाया गया है। उस समय (५वीं शताब्दी ई.) कुमायूँ में कुणिन्दों अथवा कत्यूरी राजाओं का शासन था, जो कि गुप्त साम्राज्य के सामंत थे। कत्यूरी राजाओं के शासन काल को कुमायूँ का स्वर्णकाल कहा जा सकता है। ऐसा यहाँ के सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं लेखक श्री यमुनादत्त वैष्णव ‘‘अशोक’’ का कथन है। कुमायूँ में एक इलाका कत्यूर घाटी (थाने) लगभग १०० वर्गमील के क्षेत्र में स्थित है। खश, हूण, शक आदि जातियों की भाँति कत्यूरी लोग भी भारत के बाहर से आये। सिकन्दर के आक्रमण के बाद कत्यूरी राजाओं ने काबुल में कई शताब्दियों तक राज्य किया। उस प्रान्त में वे कतूरा, कटोर वंशीय कहलाते थे। ये लोग ‘‘इंडोसीथियन’’ थे। इन्हीं लोगों की एक शाखा ने बदरीनाथ के निकट जोशीमठ को अपनी राजधानी बनाया था। बाद में उन्होंने किसी उथल—पुथल के कारण अपनी राजधानी कुमायूँ में ‘र्काितकेयपुर’ (पार्वती एवं शिवजी के ज्येष्ठ पुत्र) में बसाई। यह वही इन्डोसीथिन या शक जाति है जिसके वंशजो / क्षत्रपों का शासन एक समय पूरे उत्तर भारत में था। नहपान इस वंश का सर्वप्रसिद्ध, प्रतापी एवं महत्वपूर्ण नरेश था। जैन अनुश्रुति में उसके नहवाण, नरवाहन, नमोवाहन, नभसेन या नरसेन आदि नाम मिलते हैं। यूनानी भूगोलवेत्ता टालेमी ने भी इस नरेश का उल्लेख किया है। नहपान ने राज्यभार अपने जामाता उशवदात, मंत्री अयम और सेनापति यशोमतिक को सौपकर स्वयं जिनदीक्षा ले ली प्रतीत होती है। यानि जो भी शक राजा थे उनका पूर्णतया भारतीयकरण हो गया था।

अलमोड़ा जिले के द्वाराहाट कस्बे में संवत् १०४४ (सन् १०४४ ईस्वी) का संस्कृत नागरी में एक लेख चरण—पादुका के पास खुदा हुआ है। इस शिलालेख में उक्त वर्ष तथा र्आियका देवश्री और ललितश्री का नाम अंकित है। द्वाराहाट के इस लेख से यह सिद्ध होता है कि जैन साध्वियों का बिहार हिमाल की दुर्गम उपत्यकाओं तक होता रहता था। द्वाराहाट की ऊँचाई समुद्रतल से लगभग ५०३१ फीट और इसकी अंतिम रेल हेड काठगोदाम से दूरी (मोटर मार्ग द्वारा) लगभग १२० कि.मी. है। यहाँ कत्यूरी राजाओं का शासन १५वीं शताब्दी तक रहा था। एक पूरा जैन मंदिर इस कस्बे में निर्मित था, जिसमें स्थापित भगवान पाश्र्वनाथ की खंडित र्मूित अब अल्मोड़ा म्यूजियम में प्रदर्शनार्थ रखी हुई है।

इसे कत्यूरी राजाओं के समय लगभग ९वीं शती में गूजर साहू अथवा चौधरी परिवार ने बनवाया था। यहाँ पर इस तथ्य का उल्लेख करना जरूरी है कि इस हिमालयीन भूभाग में ‘लगभग सातवीं शती ई. से काष्ठ—देवालयों के स्थान पर प्रस्तर खंडों से देवालयों का निर्माण होने लगा जो निरन्तर जारी रहा। यानि इस भू—भाग में सातवीं शताब्दी से पूर्व पत्थरों के देवालय/चैत्य र्नििमत नहीं होते थे, क्योंकि लकड़ी की इमारतें इस भूकम्प—प्रवण क्षेत्र में ज्यादा मजबूत और सुरक्षित मानी जाती हैं और इस भूभाग में विश्व की सर्वश्रेष्ठ लकड़ी के जंगल अनादिकाल से पाये जाते हैं। उत्तराखंड में अभी तक पत्थरों से र्नििमत जितने भी देवालय/मंदिर (प्राचीन) ज्ञात हैं वह प्राय: आठवीं शताब्दी के आसपास अथवा बाद में र्नििमत है। अत: पर्वतीय क्षेत्र में जैन धर्म की उपस्थिति उतनी ही प्राचीन मानी जा सकती है, जितनी कि अन्य सनातन धर्मों की। संभवत: इन्हीं सब तथ्यों के कारण ही प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार और गजेटियर लेख एटकिन्सन महोदय ने लिखा है कि ‘‘यह प्रदेश पूर्व ब्राह्माणिक एवं बौद्ध क्रिया—कलापों का मिला जुला स्वरूप है’’।

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या जैन धर्म में पूजा / उपासना के चिन्ह मात्र काष्ठ/पत्थर र्नििमत देवालय/चैत्य/मंदिर ही थे ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जैन मान्यता में तीर्थकरों और महापुरुषों की चरण—पादुकाऐं स्थापित करने की प्रथा बहुत प्राचीन काल से रही है। अन्य धर्मों में ऐसी प्रथा दृष्टिगोचर नहीं होती। सम्मेदशिखर, श्रीनगर (गढ़वाल) आदि पर्वतों पर चरणपादुकाओं के माध्यम से ही भक्त अपने भावों को निर्मल करते हैं। प्राय: सभी प्राचीन जैन मंदिरों में चरणपादुकाऐं स्थापित करने के स्पष्ट निर्देश दिये गये है और विधि भी बतलाई गई है।१६ करने के स्पष्ट निर्देश दिये गये हैं और विधि भी बतलाई गई है। इसी तारतम्य में महाकवि कालिदास ने अपने मेघदूत नामक काव्यग्रंथ के श्लोक ५५ में हिमालय के भूगोल के वर्णन में ‘‘चरणपादुका’’ का उल्लेख करते हुए लिखा हैं कि हे मेघ ‘‘उसी पहाड़ (हिमालय) में महादेव की चरण—शिला नामक स्थान है, जिसे योगी नित्य पूजते हैं। तुम भी भक्तिभाव से नम्रतापूर्वक उनकी (चरण—चिह्नों) प्रदक्षिणा करना। यह चरणपादुकाऐं आज भी बद्रीनाथ तीर्थ के पास स्थित हैं।

इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण नैनीताल जिले में काठगोदाम और नैनीताल के बीच में स्थित रानीबाग के पास चित्रशिला नाम से प्रसिद्ध स्थान में स्थित हैं।१८ लगभग दो हजार वर्ष पूर्व से कुमाऊँ क्षेत्र में यक्षों की पूजा की जाती थी।

By483 (1).jpg

जैन अनुयायिओं में भी ‘‘तीर्थकरों’’ के साथ साथ यक्ष—यक्षणियों की पूजा का प्राचीनकाल से ही प्रचार था और उनकी र्मूितयाँ भी स्थापित की जाती थी।’’२० अल्मोड़ा जिले के एक ग्राम बमनसुआल, जहाँ महादेव शिव के प्राचीन मंदिरों का समूह स्थित है, में एक र्मूित तीर्थंकर नेमिनाथ की पाई गई है। अब खंडित अवस्था में यह राजकीय संग्रहालय, अलमोड़ा में प्रदर्शनार्थ रखी हुई है।

By483 (2).jpg

एक और जैन र्मूित पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर की गुफा में पाई गई है। इसके बाबत् यह जानकारी नहीं मिल पाई हैं कि यह किस तीर्थंकर की प्रतिमा है और किस संवत् की है। परन्तु यह निश्चित है कि यह प्रतिमा पूर्व मध्यकालीन समय की है। उपरोक्त के अलावा कुमाऊँ के गजेटियर में भी जैन मतावलंबियों और सम्प्रदाय के बारे में काफी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है, जिसका विवरण निम्न प्रकार है—

श्री एटकिन्सन महोदय को स्थानीय विद्वान कुमाऊँ (पहाड़ों का) का वेदव्यास मानते हैं। इन्हों ने उस समय, जब इस क्षेत्र में आवागमन के साधन अल्प थे, बहुत मेहनत एवं लगन से हिमालय के इन दुर्गम क्षेत्रों में बसी विभिन्न जातियों, नगरों एवं धर्मों इत्यादि की जानकारी इकट्ठी कर गजेटियर में प्रकाशित कराई। कुमाऊँ में जैन धर्म / जातियों का विवरण निम्न प्रकार से दिया गया है—

(a) AGARWALS —Among the Baniya class, the Agrawals from the plain have some importance in KUMAON and although some account has been given else where (i.e. Gaz II 395), it will be interesting to record that is told by an intelligent member of the community at Naini-tal. The Agrawals claim to have been Rajputs, but failing to oppose Shihabud-din Gori when he destroyed Agroha, they took to trade. They neither eat fist nor flesh, nor they drink spirits and have strict ceremonial observations. Marriage in the same gotra is prohibited. A few are Saivas but the majority is Vaishnavas or Jainas and many worship the unseen god, `Permeshwar Nirankar.'

(b) SARAUGIS—The Saraugis or Jainas, who are frequently spoken of a caste, are named after the religion professes by them (Gaz III, 497). Their temples are separate and contained naked images of their (Tirthankaras. Their great teacher was Parasanth, and they hold within their pale people (keâcepeesj, #eerCekeâeÙe, ogyeues heleues ceveg<Ùe, Oece& Yeer¤) of very different origin. They are very scruspulous in their ceremonial Oservances with a view to avoid doing injury to the slightest living organism; some called Bhauras go so far as to wear a bandage over their mouths lest any thing should enter by accident. The bride passes the night before marriage in the temple of Parasnath. As a rule, few of the ceremonies enjoyed by orthodox HINDU custom are observed.

(c) SAHUS—The sahus of DORA (A Patti of Pargana in Pali Pachhaon of Kumoan) belong to bharadvaj, vasishtha and kasyapa gotras and Madhyandiniya sakha. One of the Sahus was in former times appointed Chaudhri of the Almora bazar with duties of a chakrayat or superintendent and managed to keep the office hereditary in his family for some generation, so that his descendants still call themselves Chaudhris. The Sahus profess ro be Rajput but they are neither rajpur nor vaisyas and it is difficult to place them in correct castes. They first came into notice when employed by Rudra Chand (Raja of Kumoan) in the latter half of the sixteenth century. They now occupy themselves with trade and service. The Chaudhris of Dwarahat ascribe their origin to ``Kangra' and they still workship the kot-kangra Devi of Jwalamukhi. They belong to very miscellaneous gotra called Vatsa-Bhargava. The name `Chaudari is given by courtesy as in plains to the Heads of Particular occupations among the Baniyas

उपरोक्त गजेटियर का हिन्दी में संक्षिप्त निम्न प्रकार है|

(अ) अग्रवाल

यह वणिक वर्ग का एक महत्वपूर्ण समुदाय है। जिसका वर्णन नैनीताल में रहने वाले एक चतुर सुजान से पूछ कर लिखा गया है। वर्तमान में यह लोग राजपूत कौम से संबंधित हैं और अपने को अतीत में हुये कुरुक्षेत्र के राजा अग्रसेन का वंशज बताते हैं। शहाबुद्दीन गौरी ने जब अग्रोहा को विजित किया तो हारकर उन्होंने व्यापार को अपना पेशा बना लिया। इस समुदाय के व्यक्ति ना तो मछली खाते हैं ना ही माँस का भक्षण करते हैं और ना ही शराब पीते हैं। यह समुदाय अपने रीति रिवाजों में कट्टर है। अपने गोत्र में शादी—विवाह पूर्णत: र्विजत है। बहुत अल्प संख्या में शैव हैं परन्तु अधिकांश आबादी या तो वैष्णव हैं अथवा जैन मत के हैं।

(ब) सरावगी

यहाँ जैनों को प्राय: इसी (नाम) से जाना जाता है और यह इनका धर्म भी है। इस समुदाय के अलग मंदिर हैं, जिनमें यह दिगम्बर मूर्तिर्यों की पूजा करते हैं, जिन्हें ये तीर्थंकर कहते हैं। अपने आप को यह पाश्र्वनाथ भगवान का अनुयायी बताते हैं जिनका अभ्युदय काफी पहले हुआ था। यह अत्यन्त धर्मभीरु समुदाय है और अपने रीति रिवाजों का पालन सही प्रकार से करने पर विशेष ध्यान देते हैं। जगत के छोटे से छोटे जीवों की हिंसा नहीं हो इसलिये अपने मुँह पर सफेद पट्टी बाँधते हैं, जिससे मुँह में किसी भी प्रकार के कींड़े मकोंड़े (भौरा) प्रवेश नहीं कर सके। शादी के पूर्व नवबधु पाश्र्वनाथ भगवान के मंदिर में एक रात्रि व्यतीत करती है। इस समुदाय के कुछ रीति रिवाज कट्टर पंथी हिन्दुओं से मिलते जुलते हैं।

(स) साहु (या साह / शाह) प्राय: वैश्य समुदाय में गिने जाते हैं। ये भारद्वाज, वशिष्ठ और कश्यप गोत्र से संबंध रखते हैं। पुराने किसी समय में एक साहू व्यक्ति को अल्मोड़ा बाजार का अफसर या चौधरी (निरीक्षक) नियुक्त किया गया था (इसे चकुड़ायत भी कहते थे) चकुड़ायत बाजार की देखभाल के अलावा, वहाँ की खबरें राजदरबार तक पहुँचाते थे। सब से पहले १६ वीं शताब्दी में राजा रुद्र—चंद (चंद वंश के राजा) के समय इन्हें सेवा में लिया गया था। यह न तो राजपूत हैं, ना ही वैश्य। इनका संबंध कुमाऊँ के पाली पछाऊँ क्षेत्र से ज्यादा है। द्वाराहाट के चौधरी लोग अपना संबंध परिचमी ज्वालामुखी से बताते हैं और कोट—काँगड़ देवी की पूजा करते हैं।

अहिच्छत्रा हिमालय के पर्वतीय भूभाग की तलहटी (फुटहिल) को तराई अथवा भांवर कहते हैं। गढ़वाल और कुमाऊँ के बीचों बीच यानि मध्य तराई में रामनगर कस्बा है। जनश्रुति है कि पूरा रामनगर कस्बा किसी प्राचीन नगर की ईट / पत्थरों से र्नििमत है। लगभग २००० वर्षों पूर्व हिमालय की तराई में पूर्वी पंचाल राज्य की राजधानी अहिच्छत्रा ही वह नगरी थी जिसके मलवे से रामनगर कस्बे का निर्माण हुआ होगा क्योंकि आधुनिक रामनगर के पास ही प्राचीन अहिच्छत्रा स्थित है।

बरेली जिले की आँवला तहसील के कस्बे रामनगर के बाह्य भाग में सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ अहिच्छत्रा स्थित है। इसी स्थान पर २३वें जैन तीर्थंकर पाश्र्वनाथ पर पुराण प्रसिद्ध उपसर्ग हुआ था और यहीं उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यहीं पर भगवान पाश्र्वनाथ के प्रथम समवसरण की रचना हुई थी। किसी समय यहाँ एक विशाल एवं रमणीक नगर था किन्तु अब जंगल में यत्र — तत्र फले प्राचीन टीले और ध्वस्त खंडहर ही शेष हैं। एक वेदी तिखाल वाले बाबा की कहलाती है, जिसमें भगवान पाश्र्वनाथ की प्रतिमा तथा चरण चिन्ह स्थापित हैं। अन्य मंदिरों की वेदियों में भी मनोज्ञ जैन प्रतिमायें विराजमान हैं।

यह स्थान २३ वें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ की ज्ञानकल्याणक भूमि है जो ई. पूर्व ८७७ में जन्में और ७७७ में निर्वाण प्राप्त किया। अहिच्छत्रा ‘‘उत्तर—पाँचाल’’ राज्य की राजधानी थी। ‘इसे विभिन्न धर्मों के पुराणों में पांचलपुरी अपरनाम परिचक्रा एवं शंखावती नाम से भी निर्देशित किया गया है। जब भगवान पाश्र्वनाथ इस नगरी के पास स्थित गहन वन ‘भीमावटी’ के जंगल में कायोत्सर्ग ध्यान मुद्रा में लीन थे, ‘शम्बर’ नामक दुष्ट असुर ने उन पर भीषण उपसर्ग किये। नागराज धरणेन्द्र और यक्षेश्वरी पद्मावती ने उन उपसर्गों के निवारण का यथाशक्ति प्रयत्न किया। नागराज (अहि) ने तो भगवान के सिर के ऊपर छत्राकार सहस्रफण मंडप बनाया था। इसीलिए यह पांचालनगरी लोक में अहिच्छत्रा नाम से प्रसिद्ध हुई।........२०वीं शताब्दी में हुए पुरातात्विक उत्खनन एवं खोज/शोध से जो सामग्री प्रकाश में आई, उसने सिद्ध कर दिया है कि कम से कम दो हजार वर्षों से यह स्थान अहिच्छत्रा नाम से जाना जाता है। अनेक जैन पुराणों एवं कथा ग्रंथों में अहिच्छत्रा के उल्लेख प्राप्त होते हैं। ई. पूर्व दूसरी शती के लगभग हुये अहिच्छत्रा के राजा ‘‘आषाणसेन’’ ने अपने भानजे कौशाम्बी के राजा वहसतिमित्र के राज्य में स्थित प्रभासगिरि (इलाहाबाद के स्थित—पभोसा) पर जैन मुनियों के लिये गुफायें बनावई थी। अहिच्छत्रा के कोत्तरी (कटारी) खेड़ा में दूसरी शती ई. के प्राचीन जैन मंदिर और र्मूितयों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनमें दूसरी शती ई. के एक लेख में ‘अहिच्छत्रा’ नाम भी स्पष्ट रूप में अंकित हैं। कुमाऊँ के एक स्थानीय इतिहासकार रामदत्त त्रिपाठी के अनुसार सूर्यवंशी ‘‘कत्यूरी राजाओं’’ से पहले दाणू कुमेर सेन का राज्य कुमाऊँ में था लेकिन इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं है। यदि ऐसा रहा भी तो केवल अल्पकाल (विक्रम शासन और शालिवाहन शासन के मध्य में कुछ वर्ष) तक रहा होगा।

इसी प्रकार का कथन ‘‘कुमाऊँ का इतिहास’’ के प्रसिद्ध लेखक श्री बद्रीदत्त पांडे का है जिनके अनुसार जागेश्वर मंदिर के एक पत्थर में ‘माधवसेन’ नाम खुदा हुआ है। संभव है, मगध के सेन राजा माधवसेन कुमाऊँ में आये हों यद्यपि यह अनुमान एवं अनुसंधान का विषय है। वैसे अहिच्छत्रा में १९४०-४४ ईस्वी के बीच जो वैज्ञानिक उत्खनन हुआ है उससे यह प्रमाणित होता है कि यह नगर ईसा पूर्व ३०० से दसवीं शताब्दी तक एक सम्पन्न राज्य की राजधानी या नगरी अवश्य थी।२५ चूँकि यह नगर हिमालय की तराई में बसा हुआ है तो गढ़वाल—कुमाऊँ के दुर्गम भीतरी पर्वतीय भागों में आने जाने तथा देश व पहाड़ के बीच व्यापार के घाटे (दरे) का कार्य करता रहा है। पहले इसे ढिकुली अथवा चिलकिया नाम से जाना जाता था। अस्तु उपरोक्त तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में हम यह कह सकते हैं कि कुमाऊँ में जैनधर्म के लिखित प्रमाण ईसा पूर्व ३०० वर्ष से मिलने आरंभ हो जाते हैं। आगे जरूरत इस बात के तथ्य पर शोध करने की है कि नये—्नाये स्थानों पर चरण—पादुकाओं की खोज की जाए तो जैन धर्म का इतिहास इससे भी पूर्व का सिद्ध किया जा सकता है।

संदर्भ—

१. ज्योति प्रसाद जैन, उत्तर प्रदेश और जैन धर्म पृ. ३

२. KAILAS MANSAROVAR By Swami Pranavanand, F. R. G. S. (1949) Page 89.

३. वही, पृ. २१८

४.Khas, Familiy Law by L.D. Joshi P. 28

५. वही पृ. २९

६. श्री उग्रसेनजी (काशीपुर) के प्रयत्नों से रूहेलखंड कुमायूँ जैन परिषद् की स्थापना १९६० में हुई थी।

७. ज्योति प्रसाद जैन, रुहेलखंड—कुमाऊँ और जैनधर्म, (१९७० ई.)

८. निदेशक—राजकीय पुरातत्व संग्रहालय, जिला पिथौड़ागढ़ (उत्तराखंड)

९. डॉ. डी. एन. तिवारी से ०८/२०१२ को दूरभाष पर हुई वार्ता पर आधारित

१०. यमुनादत्त वैष्णव ‘‘अशोक’’ कुमाऊँ और गढ़वाल के दर्शनीय स्थल, (१९७८) पृ. ८

११. वही पृ. ६९

१२. ज्योति प्रसाद जैन, भारतीय इतिहास एक दृष्टि, पृ. ९५

१३. जैन शिला लेख संग्रह, भाग ५ १९७१ भारतीय ज्ञानपीठ, पृ. २२ और ३४.

१४. कुमाऊँ की पुरातात्विक धरोहर क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई, अल्मोड़ा उ. प्र. पुरातत्व विभाग का पेम्पलेट

१५. रामलीला स्मारिका १९८०, पर्वतीय अंक, श्री लक्ष्मी भंडार, खजांची मोहल्ला अल्मोड़ा पृ. ४६ डॉ. महेश्वर प्रसाद जोशी, विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा परिसर

१६. पद्मचंद शास्त्री, हिमालय में दिगम्बर मुनि, (१९७१) पृ. ५८

१७. ‘‘तीर्थांक’’ विशेषांक, ‘कल्याण’, (गोरखपुर) जनवरी १९५७, वर्ष ३१, सं. १, पूर्ण संख्या ३६२ पृ. ६० एवं ‘हिमालय में दिगम्बर मुनि’’, लेखक : पदमचन्द्र शास्त्री, पृ. ५७।

१८. यमुना दत्त वैष्णव, ‘‘अशोक’’ कुमाऊँ और गढ़वाल के दर्शनीय स्थल : पृ. ८-९

१९. देखें, संदर्भ क्रमांक १२—

२०. जैन शिलालेख संग्रह, भाग ३ पृ. २

२१. GAZETER, North Western Provinces, Vol XII (HIMALAYAN DISTRICTS Vol III) By E.T. ATKINSTON 1886, Page 440-442 (KUMOAN)

२२. ज्योतिप्रसाद जैन, उत्तर प्रदेश और जैन धर्म, पृ. ४७

२३. आचार्य भास्करानन्द लोहनी, कुमाऊँ लखनऊ (१९९५) पृ. ३१

२४. बद्रीदत्त पान्डे, कुमाऊँ का इतिहास लेखक पृ. २१०

२५. डॉ. वासुदेवसरण अग्रवाल, (Ancient India No. 4, Page 105)

२६. बद्रीदत्त पाण्डे, कुमाऊँ का इहितास, पृ. १३३


अर्हत् वचन अक्टूबर—दिसम्बर—२०१२