क्षमागुण को मन में धर लो, क्षमा को वाणी में धर लो

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

क्षमागुण को मन में धर


तर्ज—तीरथ कर लो पुण्य कमा लो......
क्षमावणी पर्व

क्षमागुण को मन में धर लो, क्षमा को वाणी में धर लो।
शत्रु मित्र सबमें समता का भार हृदय धर लो।।
क्षमा गुण को मन में धर लो।। टेक.।।

मैत्री का हो भाव सभी प्राणी के प्रति मेरा,
गुणीजनों को देख हृदय आल्हादित हो मेरा।।
वही आल्हाद प्रकट कर लो,
क्रोध बैर भावों को तजकर मन पावन कर लो।
क्षमा गुण को मन में धर लो।।१।।

चिरकालीन शत्रुता भी यदि किसी से हो मेरी।
उसे भूलकर मित्रभावना बने प्रभो! मेरी।।
भावना सदा सरल कर दो,
चन्दन सी शीतलता से मन को शीतल कर दो।
क्षमा गुण को मन में धर लो।।२।।

एक-एक र्इंटों को चुनने से मकान बनता।
एक-एक धागा बुनने से परीधान बनता।।
यही क्रम गुण में भी धर लो,
एक-एक गुण से आत्मा को परमात्मा कर लो।
क्षमा गुण को मन में धर लो।।३।।

दश धर्मों के आराधन से मृदुता आती है।
भावों में ‘चंदनामती’ तब ऋजुता आती है।।
रत्नत्रय को धारण कर लो,
पर्वों का इतिहास यही जीवन में अमल कर लो।
क्षमा गुण को मन में धर लो।।४।।