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खतरे तमाम हैं ध्वनि प्रदूषण के

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खतरे तमाम हैं ध्वनि प्रदूषण के

मधुर संगीतमय धुन और शांत वातावरण सभी को सुहाता है। गायों एवं भैसों को मधुर संगीत वाले वातावरण में रखने से दूध की मात्रा बढ जाती हैं। विभिन्न अध्ययनों से देखा गया है कि तेज आवाज की अपेक्षा संगीतमय मधुर आवाज में पेड़ जल्दी बढ़ते हैं, उनका विकास ठीक होता है, और फल भी ज्यादा देते हैं । कई पागल लोगों का इलाज शांत वातावरण में रखकर किया गया और आशातीत परिणाम मिले हैं। प्राचीन काल में हमारे,ऋषि, मुनि शांति और मौन पर अधिक जोर देते थे। वे अपने निवास स्थान, शिक्षण, तप तथा ध्यान करने के स्थान को शांतिमय बनाये रखने के स्थान को शांतिमय बनाये रखने पर विशेष ध्यान देते थे। प्रकृति व मानव के लिये हानिकारक अस्वास्थ्यप्रद, अवांछित शोर ध्वनि प्रदूषण कहलाता है। विभिन्न उम्र एवं विभिन्न व्यक्तियों द्वारा सुरक्षित ढंग से शोर सुनने एवं सहन करने की तीव्रता अलग अलग होती है। ध्वनि प्रदूषण फैलाने में १५ से २५ साल तक के बच्चों का अधिक योगदान रहता है। शहरीकरण, औद्योगीकरण, जनसंख्यावृद्धि, यातायात, दूरसंचार माध्यम, चुनाव, शादी—ब्याह, त्यौहार, आदि कई कारण हैं जो प्रकृति में शोर की मात्रा बढ़ाते हैं और सजीव—निर्जीव सभी पर अपना दुष्प्रभाव छोड़ते हैं ध्वनि प्रदूषण के खतरे तमाम हैं । अधिक शोर में रहने से मस्तिष्क के कुछ भागों पर कुप्रभाव पड़ता है और स्मरण शक्ति क्षीण हो जाती है। हमारी एकाग्रता भंग होती है। पाठशाला जाने वाले बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता। बच्चों एवं बड़ों के व्यवहार में चिड़चिड़ापन आ जाता है।

शोर मे रहने से तेज

शोर मे रहने से तेज बोलना पड़ता है जिससे गला एवं श्वसन तंत्र खराब हो जाते हैं । कम सुनने लगते हैं एवं कर्ण रोग हो जाते हैं। तेज आवाज से मनुष्य घबराने लगते हैं जिससे कई बार उन्हें उच्च रक्तचाप या दिल की अन्य बीमारियां हो सकती हैं। हृदय गति भी बढ़ जाती है। मानसिक तनाव भी बढता है। शोर के कारण हमारी नाड़ियां सुचारू रूप से कार्य नहीं कर सकती और कार्य करने से मनुष्य के हाथ पांव कांपने लग सकते हैं। हम सो नहीं सकते जिससे अनिद्रा रोग एवं आंखों की बीमारियां हो जाती हैं। मनुष्य के सिर में दर्द होता है यहां तक कि अधिक शोर से सिर की खून की नालियां भी फट सकती हैं। गर्भवती महिला के बच्चे के विकास में बाधा होती है एवं मानसिक रूप से अविकसित बच्चे हो सकते हैं। ध्वनि की तीव्रता से कंपन होता है जिससे भूमि में भी कंपन होता है और इमारतों व मकानों की उम्र कम हो जाती है। अधिकांश राष्ट्रों ने शोर की अधिकतम एवं न्यूनतम सीमायें भी निर्धारित की हैं। सबसे कम ध्वनि शयनकक्ष एवं अस्पतालों के लिये उत्तम रहती है। हमें शोर कम करने का प्रयत्न करना चाहिए। शोर पैदा करने वाले कारकों पर ध्यान देना चाहिए। ध्वनि को अवशोषित करने वाले घने वृक्ष सड़कों के दोनों और लगाने चाहिए। नीम, बरगद पीपल, इमली के वृक्ष ध्वनि प्रदूषण की प्रचंडता एवं उसके स्तर को काफी कम कर देते हैं। अत्यधिक शोर वाले स्थानों पर रूई या ईअर प्लग लगाना चाहिए। ध्वनि शोषण यंत्रों का उपयोग करना चाहिए। खटारा मोटर गाड़ियों , ट्रकों को आवासीय क्षेत्रों से निकलने पर रोक रहनी चाहिए एवं वाहनों की आवाज कम करने की व्यवस्था होनी चाहिए। मोटर वाहनों में तेज ध्वनि वाले हार्न नहीं होना चाहिए। कल कारखानों को शहर से दूर स्थापित करना चाहिए। , जनसंख्या वृद्धि दर पर रोक लगानी चाहिए। कम दूरी तय करने के लिये साईकिल से या पैदल जाना चाहिए। कार्य स्थल तक अलग—अलग गाड़ियों में जाने की अपेक्षा बस से भी एक गाड़ी में यथासंभव जाना चाहिए। रेडियों, टी.वी. टेपरिकार्डर धीमी आवाज में सुनें और अगर अकेले ही सुन रहें हो तो टेपरिकार्डर एवं रेडियों के लिये ईयर फोन का उपयोग करना सर्वोत्तम रहता है।

चुनाव, शादी ब्याह, त्यौहार आदि अवसरों पर लाउडीस्पीकर द्वारा शोर मचने की प्रथा बिल्कुल बंद होनी चाहिए। सबसे प्रमुख बात है शोर के प्रति जागरूक रहने की।