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ॐ ह्रीं शनिग्रहारिष्टशांतिकराय श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय नम:।

गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी एवं संस्कृत साहित्य के विकास में उनका योगदान

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गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी एवं संस्कृत साहित्य के विकास में उनका योगदान

जैनधर्म के अनुसार तीर्थंकर महापुरुषों की दिव्यध्वनि सात सौ अठारह भाषाओं में परिणत हुई मानी गई है इनमें से अठारह महाभाषाएं मानी गई हैं और सात सौ लघु भाषा हैं। उन महाभाषाओं के अन्तर्गत ही संस्कृत और प्राकृत को सर्वप्राचीन एवं प्रमुख भाषा के रूप में स्वीकृत किया जाता है। संस्कृत जहाँ एक परिष्कृत, लालित्यपूर्ण भाषा है वहीं उसे साहित्यकारों ने ‘देवनागरी’ भाषा कहकर सम्मान प्रदान किया है। अनेक साहित्यकारों द्वारा समय-समय पर इस भाषा में गद्य, पद्य व मिश्रित चम्पू साहित्य लिखकर प्राचीन महापुरुषों और सतियों के चारित्र से लोगों को परिचित कराया है।

इसी श्रृंंखला में बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्धकाल एक नई क्रांति के साथ प्रारंभ होकर अनेक साहित्यिक उपलब्धियों के साथ समाज की ओर अग्रसर है। सदैव उत्कृष्ट त्याग, ज्ञान व वैराग्य में प्रसिद्ध जैन समाज में उच्च कोटि के मनीषी लेखक के रूप में आचार्य श्री गुणभद्र स्वामी, कुन्दकुन्द, यतिवृषभ, पूज्यपाद आदि दिगम्बर जैनाचार्यों ने सिद्धान्त, न्याय, अध्यात्म, पुराण आदि ग्रंथ प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखकर जिज्ञासुओं को प्रदान किये किन्तु न जाने किस कारण से विदुषी गणिनी आर्यिका पद को प्राप्त दिगम्बर जैन साध्वियों के द्वारा लिखित कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं होता है। लगभग ढाई सहस्राब्दियों के इतिहास की साक्षी से तो साध्वियों ने ग्रंथलेखन नहीं किया अन्यथा देश के किसी संग्रहालय या पुस्तकालय में उनके कुछ अवशेष तो अवश्य प्राप्त होते।

मूलाचार आदि चरणानुयोग गंथों में वर्णित जैन मुनियों के समान ही आर्यिकाओं की चर्या में उन्हें सैद्धान्तिक सूत्रग्रंथों को पढ़ने का अधिकार प्रदान किया गया है। आचार्य जिनसेन कृत महापुराणग्रंथ में ग्यारह अंगरूप श्रुत में पारंगत आर्यिका सुलोचना का वर्णन आता है।

यह सारा ज्ञान तो भगवान महावीर तक अविच्छिन्न रूप से रहा है पुन: क्रम परम्परा से ईसा पूर्व लगभग तृतीय शताब्दी में इसका कुछ अंश श्री धरसेनाचार्य को प्राप्त हुआ और उसके पश्चात् अंग-पूर्वों का अंशात्मक ज्ञान ही अन्य संतों को मिला जो उनके द्वारा निबद्ध वर्तमान श्रुत में उपलब्ध होता है।

वर्तमान शताब्दी का उत्तरार्ध नारी प्रगति का प्रतीक रहा जिसका श्रेय प्राप्त किया शताब्दी की प्रथम बालसती गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने। ईसवी सन् १९३४ में २२ अक्टूबर को वि.सं. १९९१ की आश्विन शुक्ला पूनो (शरदपूर्णिमा) के शुभ दिन रात्रि में ९ बजकर १५ मिनट पर उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिले में ‘‘टिकैतनगर’’ कस्बे में श्रेष्ठी श्री धनकुमार जैन के सुपुत्र श्री छोटेलाल जी की धर्मपत्नी श्रीमती मोहिनी देवी ने प्रथम सन्तान के रूप में कन्यारत्न को जन्म दिया था। उसी कन्या ने शास्त्रीय इतिहास को साकार करने में गांधी के समान प्रथम आत्मस्वतंत्रता सेनानी के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की और तब सन् १९५२ में वि.सं. २००९ शरदपूर्णिमा के दिन से ही नया स्वर्णिम इतिहास शुरू हुआ अर्थात् ३ अक्टूबर सन् १९५२ में इन्होंने आचार्यरत्न श्री देशभूषण महाराज से सप्तम प्रतिमारूप आजन्म ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण कर घर का त्याग कर दिया।

उत्कृष्ट साध्वी के समान चर्या पालने वाली मैना ने पारिवारिक मोह व सामाजिक संघर्षों पर विजय प्राप्त कर १ मार्च १९५३ वि.सं. २००९ की चैत्र कृष्णा एकम, रविवार को श्रीमहावीर जी अतिशय क्षेत्र पर देशभूषण महाराज से क्षुल्लिका दीक्षा प्राप्त कर ‘‘वीरमती’’ नाम से सम्बोधित हो दीक्षित जीवन का प्रारंभीकरण किया।

सन् १९५४ में क्षुल्लिका विशालमती माताजी के साथ दक्षिण भारत यात्रा में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज का उद्बोधन प्राप्त कर पुन: गुरु के पास आकर सन् १९५४ का चातुर्मास जयपुर किया। इन्होंने मात्र दो माह में वहाँ ‘‘कातंत्ररूपमाला’’ नाम की जैन संस्कृत व्याकरण पढ़ी जो कि इनके जीवन में साहित्य सृजन का मूल आधार बनी। उसके बाद शांतिसागर महाराज की सल्लेखना देखने के उद्देश्य से ये पुन: उन्हीं क्षुल्लिका जी के साथ दक्षिण प्रांत गयीं और सन् १९५५ का चातुर्मास ‘‘म्हसवड़’’ शहर में किया जो कि उनके संस्कृत ज्ञान के प्रयोगात्मक काल का प्रारम्भीकरण था जब इन्होंने आचार्य श्री जिनसेन स्वामी रचित ‘सहस्रनाम स्तोत्र’ के आधार से भगवान के एक हजार आठ नाम निकालकर ‘‘सहस्रनाम मंत्र’’ बना दिये। प्रभु के चरणों में किया गया यह ज्ञानसमर्पण जीवन का वरदान बन अत्यन्त वृद्धि के साथ संस्कृत ज्ञान का विकास करने लगा।

तत्पश्चात् २६ अप्रैल १९५६ वि.सं. २०१२ में वैशाख कृ. द्वितीया के दिन राजस्थान के माधोराजपुरा ग्राम में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के प्रथम पट्टशिष्य आचार्य श्री वीरसागर महाराज के करकमलों से आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ‘‘ज्ञानमती’’ नाम प्रााप्त किया। नाम के साथ-साथ गुरु का एक लघु सम्बोधन मिला कि ‘‘ज्ञानमती! तुम अपने नाम का सदैव ध्यान रखना।’’

गुरुभक्ति से किया गया लेखनी का प्रारंभीकरण इनके जीवन में ज्ञान का भण्डार भरने में अतिशयकारी संबल बन गया और अपनी लघुवय में ही अपनी शिष्याओं को ग्रंथों को पढ़ा-पढ़ाकर ज्ञान को परिमार्जित किया पुन: उसका प्रयोगात्मक अध्ययन कर जन-जन को अपनी कृतियों से आश्चर्यचकित कर दिया।

आपकी प्रमुख शिष्या आर्यिका जिनमती माताजी (कु. प्रभावती-म्हसवड़, महा.) को सन् १९५५ में निकालकर ज्ञान के अमृत से समूलचूल अभिसिंचित किया था। इनकी साहित्यिक कृतियों के अवलोकन से ज्ञान होता है कि इनका प्रथम लक्ष्य बैंक के फिक्स डिपोजिट की तरह ज्ञान का कोठार भरकर समयानुसार उसका उपयोग करना है। इसी लक्ष्य के कारण सन् १९५५ से सन् १९६४ तथा मात्र अध्ययन-अध्यापन में समय व्यतीत करने के बाद पुन: सन् १९६५ से उसका प्रयोगात्मक कार्य साहित्यसृजन के रूप में प्रारंभ हुआ।

शिवसागर महाराज के संघ में रहते हुए सन् १९५९ के अजमेर (राज.) के चातुर्मास में आपने अपने दीक्षागुरु पू. आचार्यश्री वीरसागर महाराज की व्याकरण, छंद, अलंकार और कोष के पूर्ण उपयोग के साथ ‘उपजाति’ छंद में एक स्तुति बनाई। इस छंद के माध्यम से शिष्या को अपने गुरुदेव की शारीरिक दु:ख के सहनशीलता की कहानी याद आती प्रतीत होती है। ऐसे वीतरागी गुरु की शिष्या वास्तव में खुद को गौरवशालिनी अनुभव करती हैं और उसी पथ की अनुगामिनी बनती हुई ज्ञानमती माताजी की चारित्रिक दृढ़ता भी सचमुच में अनुकरणीय है। सन् १९६४ तथा १९८५-१९८६ में उनकी रुग्णावस्था में भी आचरण की कट्टरता उनकी ही ऐतिहासिक कृति ‘मेरी स्मृतियाँ ’ से दृष्टव्य है।

इनकी स्तुतियों में आलंकारिक सौन्दर्य भरा पड़ा है, तभी तो सन् १९६३ में आप आर्यिकावस्था में जब अपने संघ के साथ सम्मेदशिखर यात्रा के लिए आचार्य शिवसागर जी के संघ से पृथक् विहार कर कलकत्ता, हैदराबाद चातुर्मास के पश्चात् सन् १९६५ में कर्नाटक प्राांत के ‘श्रवणबेलगोला’ तीर्थ पर पहुँचीं तो संघस्थ आर्यिकाओं में से कुछ के अस्वस्थ होने के कारण वहाँ एक वर्ष तक प्रवास रहा अत: भगवान बाहुबली के चरणों में ध्यान का अपूर्व अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ ध्यान में तेरहद्वीप रचना एवं जम्बूद्वीप की उपलब्धि के साथ-साथ आपकी काव्य प्रतिभा भी विशेषरूप से अविरल प्रवाह रूप में प्रस्फुटित हुई। वहाँ सर्वप्रथम ‘‘श्री बाहुबली स्तोत्रम्’’ नाम से भगवान बाहुबली की स्तुति बसन्ततिलका के ५१ छंदों में रची, जिसमें अलंकारों की बहुलता ने रत्नजटित आभूषणों से सुसज्जित सुन्दर कन्या की भांति अपना लालित्य प्रकट किया है। इनकी साहित्यिक कृतियों में सिद्ध शब्द से ही रचना की शुरूआत हुई है। सन् १९६५ के इसी प्रवास में माताजी ने वहाँ मालिनी छंद के ८२ श्लोकों में श्री जम्बूस्वामी की संस्कृत स्तुति लिखी है। इसी प्रकार श्री महावीर स्तुति, आचार्य शांतिसागर जी, आचार्य शिवसागर जी और युग की प्रथम गणिनी ब्राह्मी माता की स्तुतियाँ भी क्रमश: सांगत्यराग, भुजंगप्रयातं, बसन्ततिलका एवं अनुष्टुप् छंद में ४१ श्लोकों में रची हैं जो कि संस्कृत साहित्य के प्रति उनकी अमिट देन है। स्तोत्र साहित्य की शृंखला में सन् १९६५ में ६ स्तोत्रों में १११ श्लोकों की रचना मानो १०८ कर्मास्रव रोकने एवं रत्नत्रय की पूर्ण प्राप्ति हेतु की है, जो कि स्टूडियो से रिकार्डिंग होकर आकाशवाणी से प्रसारित भी हो चुका है। कर्नाटक में कुछ पुस्तकों के माध्यम से कन्नड़ भाषा सीखकर तुरंत बाहुबली भगवान, अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु की स्तुति एवं कन्नड़ की सुन्दर बारह भावना बनाई जो आज भी सबके आकर्षण का केन्द्र बनी हैै।

यूँ तो संसार के सामान्य प्राणियों की भाँति जन्म लेकर आयु के क्षणों को व्यतीत कर प्रयाण कर जाना कोई विशेष बात नहीं है लेकिन विशेष आत्मा, विलक्षण प्रतिभा की धनी पूज्य माताजी का जीवन सामाजिक कुरीतियों को दूर करने व दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है। इन्होंने शरदपूर्णिमा के दिन मात्र जन्म ही धारण नहीं किया प्रत्युत वह तिथि इनकी संयम जयंती बन गई। इनके जन्मदिन की सार्थकता संस्कृत साहित्य रचना से है तभी तो उस दिन ख्याति, लाभ, पूजा की इच्छा न रखते हुए श्री जी के चरणों में कोई न कोई अपना भक्तिसाहित्य का पुष्प समर्पित करने लगीं। यह मौन झलक इनके द्वारा रचित स्तोत्रों की श्लोकगणना में मिलती है जैसे सन् १९६६ के सोलापुर चातुर्मास में इन्होंने शरदपूर्णिमा के दिन जन्म के ३२ वर्ष पूर्ण कर ३३वें वर्ष में प्रवेश किया था अत: उस दिन ‘चन्द्रप्रभु स्तुति:’ के ३२ छंद भुजंगप्रयात आदि छंद में बनाकर ३२ वर्ष पूर्व की रोमांचक गाथा ‘‘जो इनके गृहत्याग के समय घटित हुई थी’’ का वर्णन बनारस की घटनावली समन्तभद्र स्वामी की चमत्कारिक स्तुति का ही स्मरण कराती है। इसके अलावा इसी चातुर्मास में आर्याछंद के ६३ श्लोकों में एक ‘त्रैलोक्य वंदना’ व सन् ६६ में ८४ श्लोकों के द्वारा ‘श्री सम्मेदशिखर वंदना’ लिखकर हिन्दी पद्यानुवाद भी जनसामान्य के रसास्वादन हेतु किया।

सोलापुर के ‘श्राविकाश्रम’ में किये गये चातुर्मास के मध्य रचित ‘उषा वंदना’ की स्मृति आज भी वहाँ नजर आती है। उपर्युक्त स्तुतियों पर यदि विद्वानों द्वारा संस्कृत-हिन्दी टीकाओं का लेखन किया जाये तो कालिदास के रघुवंश आदि काव्यों की भाँति इनकी लोकप्रियता में निश्चितरूप से वृद्धि हो सकती है।

सन् १९६७ के सनावद चातुर्मास में अपने जीवन के ३४वें वर्ष के प्रवेश पर इन्होंने पृथ्वीछंद के ३४ श्लोकों में शांतिनाथ भगवान की स्तुति रचना की। संस्कृत की इस मूलरचना के साथ ही इस चातुर्मास में माताजी ने ‘पात्रकेसरी स्तोत्र’ एवं ‘आलापपद्धति’ नामक पुस्तक का हिन्दी अनुवाद भी किया जो पुस्तक रूप में प्रकाशित हो चुकी है। इसी प्रकार सन् १९६८ के प्रतापगढ़ (राज.) के चातुर्मास में ३५ श्लोकों में ‘पंचमेरु स्तुति’ की रचना हुई जिसके अंत में प्राकृत की अंचलिका जोड़कर आचार्य श्री कुन्दकुन्द एवं पूज्यपाद स्वामी द्वारा रचित दश भक्तियों के समान यह नई भक्ति बना दी है जिसे अनेक साधु-साध्वी पंचमेरु व्रतादि में पढ़कर अतिशय प्रसन्न होते हैं। सन् १९६९ के जयपुर चातुर्मास में इन्होंने ३६ श्लोकों में ‘‘वीरजिनस्तुति:’’ बनाई और उस समय शांतिसागराचार्य के पट्ट पर आसीन तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर महाराज की दो स्तुतियाँ (प्रथम-बसंततिलका छंद के ८ श्लोक व दूसरी उपजाति के १२ छंद) संस्कृत में लिखी। जयपुर चातुर्मास में मैं प्रथम बार पूज्य माताजी के दर्शनार्थ आई तो देखा मेंहदी चौक के मंदिर में एक आर्यिका माताजी सुबह ७ से १०, मध्यान्ह में ११ से १२ तक तथा अपरान्ह में १ से ५ बजे तक अनेक मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिकाओं को अपने विशिष्ट ज्ञान के आधार पर संस्कृत, व्याकरण, न्याय, छंद, अलंकार, सिद्धान्तादि का अध्ययन करा रहीं थीं, यह क्रम सन् १९५७ से सन् १९७१ तक और उसके बाद समय-समय पर चलता रहा। उसी कक्षा में बैठने वाले पं. पन्नालाल जी सोनी-ब्यावर, पं. गुलाबचंद जी दर्शनाचार्य-जयपुर आदि यह देखकर दांतों तले अंगुली दबाते थे व आचार्य श्री वीरसागर जी, शिवसागर जी व धर्मसागर जी अतीव प्रसन्न होते थे। जबकि उन दिनों ये संग्रहणी रोग से ग्रस्त थीं और आहार में रूखा-सूखा नि:स्वाद भोजन (प्राय: केवल मट्ठा रोटी) लेती थीं। बिना ग्रंथों को पढ़े दूसरों को पढ़ाकर निष्णात करना इनकी आत्मशक्ति, ब्रह्मचर्य का प्रभाव व पूर्वजन्म के संस्कारों का ही प्रतिफल था। जैन साहित्य जगत् का इतिहास ऐसी अलौकिक साध्वी के उपकारों को युगों-युगों तक भूल नहीं सकता है।

सन् १९७० में टोंक (राज.) का चातुर्मास एक अविस्मरणीय देन बन गया जिसमें संस्कृत साहित्य की क्लिष्टता में जैनागम का न्यायग्रंथ ‘‘अष्टस्रहसी’’ जिसे उसके रचयिता श्रीविद्यानन्दि आचार्य ने स्वयं ‘‘कष्टसहस्री’’ संज्ञा से सम्बोधित किया है उसका हिन्दी अनुवाद ‘स्याद्वादचिन्तामणिटीका’ के नाम से प्रारंभ करके चातुर्मास के पश्चात् पौष शुक्ला द्वादशी को लगभग डेढ़ वर्ष में पूर्ण कर दिया जिसे देखकर न्यायदर्शन के उच्चकोटि के विद्वान हतप्रभ रह गये। इस दुरुह कार्य को अपने अथक परिश्रम से ज्ञानमती माताजी ने सरल रूप में उपलब्ध कराकर वास्तव में संस्कृत साहित्य के विस्तारीकरण में अपूर्व योगदान प्रदान किया है। इस अनुवाद की पूर्णता पर असीम प्रसन्न हो माताजी ने अनुष्टुप्, मन्दाक्रान्ता, आर्या और उपजाति इन चार छंदों का प्रयोग करते हुए २४ श्लोकों में एक ‘अष्टसहस्रीवंदना’ संस्कृत में रची है। इसी शृंखला में अपने ३७वें वर्ष के प्रवेश में सन् १९७० में इन्होंने २४ श्लोकों में ‘‘उपसर्ग विजयीपार्श्वनाथ स्तुति:’ तथा एक १३ श्लोक प्रमाण ‘‘श्री पाश्र्वजिनस्तुति:’’ रची। सन् १९७१ में अजमेर (राज.) चातुर्मास में सुप्रभात स्तोत्र, मंगलस्तुति (५ श्लोक), जम्बूद्वीप भक्ति (२० श्लोक) रची। सन् १९७२ में भारत की राजधानी दिल्ली में ये अपनी गृहस्थावस्था की माँ के साथ विराजमान रहीं जो कि इन्हीं की प्रेरणा से अजमेर चातुर्मास में धर्मसागराचार्य से दीक्षित होकर ‘रत्नमती माताजी’ इस सार्थक नाम को प्राप्त कर चुकी थीं। सन् १९७२ से १९९२ तक २० वर्ष के काल में माताजी का प्रवास मुख्य रूप से दिल्ली, हस्तिनापुर एवं पश्चिमी उत्तरप्रदेश में रहा जिसमें जम्बूद्वीप रचना निर्माण प्रेरणा व विशाल साहित्य का सृजन इनका प्रमुख लक्ष्य रहा। संस्कृत साहित्य की रचना के अंतर्गत इन्होंने सन् १९७२ में ‘‘चतुर्विंशतिजिनस्तोत्रम्’’ नाम से उपजाति के २५ श्लोकों में चौबीस तीर्थंकर स्तुति, अनुष्टुप के २५ छंदों में ‘श्रीतीर्थंकरस्तुति:’ रची। दिल्ली में विराजमान क्षुल्लिका दीक्षागुरु भारतगौरव आचार्य देशभूषण जी के १७ वर्ष पश्चात् हुए दर्शन की खुशी में १० श्लोकों की एक स्तुति गुरु चरणों में समर्पित की। सन् १९७२ के चातुर्मास में करणानुयोग से संबंधित ग्रंथ ‘‘त्रिलोकभास्कर’’ लिखा पुन: सन् १९७३ में अनुष्टुप् छंद के ४१ श्लोकों में एक ‘‘गणधरवलय स्तुति:’’ रची और कातंत्ररूपमाला (जैन व्याकरण), भावसंग्रह, भावत्रिभंगी, आस्रवत्रिभंगी नामक संस्कृत ग्रंथों का हिन्दी अनुवाद किया तथा एक मौलिक ग्रंथ ‘न्यायसार’ लिखा जो न्यायग्रंथों के ज्ञान प्राप्त कराने हेतु कुंजी के समान है। साथ ही आचार्य पूज्यपाद रचित संस्कृत व्याकरण ‘‘जैनेन्द्र प्रक्रिया’ का हिन्दी अनुवाद प्रारंभ किया जो अन्य कार्य की व्यस्ततावश छूट गया था वह अब भी अधूरा ही है।

इसके साथ ही बालक, युवा, प्रौढ़, विद्वान, भक्त आदि सभी की रुचि अनुसार उपन्यास, साहित्य, नाटक, पूजा आदि लगभग २०० ग्रंथ लिखे हैं। स्तुति साहित्य रचना की शृंखला में सन् १९७४ से १९७७ के मध्य इन्होंने स्रग्धरा छंद में ‘श्रीमहावीरस्तवनम्’ (६ श्लोक) बसंततिलका छंद में ‘सुदर्शनमेरुभक्ति’ (५ श्लोक) अनुष्टुप छंद में ‘निरंजन स्तुति:’ (५१ श्लोक), कल्याणकल्पतरु स्तोत्रम् (२१२ श्लोक) वंदना (९ श्लोक), ‘श्री त्रिंशवच्चतुर्विंशतिनामस्तवनं’ (३०श्लोक) आदि रचनाएं की हैं। इसी चातुर्मास में इन्होंने तीस चौबीसी के ७२० तीर्थंकरों के नाममंत्र भी बनाए। इसी प्रकार ५ महाविदेह क्षेत्रों में सदैव विद्यमान रहने वाले ‘विहरमाण बीस तीर्थंकर’ के नाम से मंत्र भी रचे व हिन्दी में उनकी स्तुति बनाई। इन स्तोत्रों में ‘‘कल्याणकल्पतरुस्तोत्रम्’ की विशेष महिमा है। यह वास्तव में पठनीय छंद शास्त्र है। इसमें २४ तीर्थंकरों की पृथक-पृथक स्तुतियाँ व अंत में एक ‘चतुर्विंशतितीर्थंकर स्तोत्र’ नाम से समुच्चय स्तोत्र है। इसमें वर्णिक, मात्रिक, सम, विषम और दण्डक इन ५ प्रकार के छंदों का प्रयोग है। पुस्तक के अंत में ‘एकाक्षरी कोश’ भी प्रकाशित है। कुल मिलाकर यह कल्याणकल्पतरू स्तोत्र पढ़ने वाले भक्तों के लिए कल्याणकारी हो सभी को कल्पवृक्ष के समान इच्छित फल को प्रदान करेगा यही मेरा विश्वास है।

सन् १९७७ में पूज्य माताजी ने हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र पर मूलाचार, आचारसार, अनगारधर्मामृत, भगवती आराधना आदि ग्रंथों के आधार से ४४४ श्लोक प्रमाण एक ‘‘आराधना’’ नाम से दिगम्बर जैन मुनि-आर्यिका आदि की चर्या को बतलाने वाला आचारसंहिता ग्रंथ रचा और उसका हिन्दी अनुवाद भी स्वयं किया, जो कि सन् १९७९ में प्रकाशित हो चुका है। इनकी संस्कृत-हिन्दी टीका हो जाने पर निश्चित ही यह एक ‘मूलाचार’ ग्रंथ की भांति साधुओं की संहिता के रूप में प्रचलित हो जायेगा। इनके द्वारा लिखित नियमसार की स्याद्वादचन्द्रिका टीका अध्यात्म जगत को अमर देन है। जिसकी प्रस्तावना में डॉ. लालबहादुर जैन-शास्त्री दिल्ली ने लिखा है कि ‘‘यदि इस टीका को साहित्य जगत के मस्तक का टीका कहा जाये तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी क्योंकि किसी महिला साध्वी के द्वारा की गई यह पहली टीका है जो शब्द, अर्थ और अभिप्रायों से सम्पन्न है। नियमसार में मुनियों के व्यवहार और निश्चय रत्नत्रय का वर्णन सूक्ष्मता से किया गया है। इसमें आचार्यश्री जयसेन स्वामी की समयसार, प्रवचनसार आदि की तात्पर्यवृत्ति टीका पद्धति की पूरी छाप दिखती है। यह अत्यन्त सरल और प्रभावक तो है ही साथ ही अनेक ग्रंथों के प्रमाण इसकी प्रामाणिकता को द्विगुणित करते हैं। सन् १९७८ के एक प्रशिक्षण शिविर में हस्तिनापुर पधारे जैन समाज के उच्चकोटि के लगभग १०० विद्वानों में से एक मुरैना के पं. मक्खनलाल जी शास्त्री तो इस टीका को देखकर भक्तिवश बोल पड़े कि आप इस युग की श्रुतकेवली हैं। इसके अलावा अनेक विद्वानों एवं स्वाध्यायियों ने ग्रंथ का स्वाध्याय करके अपने अच्छे-अच्छे विचार प्रगट किये हैं।

इस वृहत्कार्य के पश्चात् भी पूज्य माताजी ने साहित्यिक कार्यों से विराम न लेकर प्रत्युत् समयोचित ग्रंथों का भी सृजन किया और यदा-कदा संस्कृत स्तुति, भक्ति आदि का लेखन भी चलता रहा अत: संस्कृत काव्यशृंखला में पुन: संख्यावृद्धि हुई। दशलक्षण भक्ति (१२ श्लोक), मंगलचतुर्विंशतिका (२५ श्लोक), मंगलाष्टक स्तोत्र (अनुष्टुप् ९ श्लोक), मंगलाष्टक (अनुष्टुप् ९ श्लोक), स्वस्तिस्तवनम् (इन्द्रवङ्काा ९ श्लोक), आचार्य श्री वीरसागर स्तुति (६ श्लोक), समयसार वंदना (११ श्लोक), सोलहकारण भक्ति (१८ श्लोक), दशधर्मस्तुति ५४ छंदों में निबद्ध है। ये सभी काव्यप्रतिभा का दिग्दर्शन कराते हैं। इनकी रचनाओं में कहीं भी ग्रामीण एवं अश्लील शब्दों का प्रयोग तो देखने में ही नहीं आता है प्रत्युत् उच्चकोटि के साहित्यिक शब्दों का प्रयोग संस्कृत कोष के अध्ययन का प्रयोग है। इनकी संस्कृत रचनाओं में जैन व्याकरण के एक विशेष नियम का प्रयोग है। कातंत्र व्याकरण का ९२वें सूत्र ‘विरामे वा’ जबकि यह नियम अन्य व्याकरण में नहीं है, सर्वत्र विराम में अनुस्वार न करने अर्थात् मकार ही रखने का विधान है। इस नियम को प्रमाण मानकर विद्वज्जन माताजी द्वारा रचित गद्य-पद्य सभी रचनाओं में पदान्त में प्रयुक्त अनुस्वार को व्याकरण की गलती न समझकर विशेष नियम का प्रयोग ही समझें।

इन सभी कृतियों के अतिरिक्त पूज्य माताजी ने जैनधर्म के सर्वप्राचीन सिद्धान्तग्रंथ षट्खण्डागम पर स्वतंत्र संस्कृत टीका ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नाम से ८ अक्टूबर सन् १९९५ को शरदपूर्णिमा के पावन दिवस पर प्रारंभ कर मात्र १३५ दिन में प्रथम खण्ड की एक पुस्तक में निहित १७७ सूत्रों की संस्कृत टीका पूर्ण कर दी जो मेरे द्वारा की गई हिन्दी टीका सहित ५ अक्टूबर १९९८ को ग्रंथरूप में प्रकाशित हो चुकी है। इस टीका का नाम पूज्य माताजी ने ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ यह सार्थक ही रखा है। इनकी संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है— षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में छह पुस्तके हैं जिनकी सूत्र संख्या २३७५ है। द्वितीय खण्ड में सातवीं पुस्तक है उसकी सूत्र संख्या १५९४ है। तृतीय खण्ड में आठवीं पुस्तक है उसकी सूत्र संख्या ३२४ है। चतुर्थ खण्ड में नौ से बारह तक चार पुस्तके हैं जिनकी सूत्र संख्या १२११ है। पंचम खण्ड में तेरह से सोलह तक चार पुस्तके हैं जिनकी सूत्र संख्या १४११ है। इस प्रकार कुल ५६२५ सूत्रों की संस्कृत टीका हो चुकी है, इनकी हिन्दी टीका का कार्य (मेरे द्वारा) चालू है जो यथासमय प्रकाशित होकर ग्रंथरूप में पाठकों के हाथों तक पहुँचेंगे। लगभग बत्तीस सौ पृष्ठों में सोलहों पुस्तकों की संस्कृत टीका सन् २००७ में पूर्ण हो चुकी है। बीसवीं सदी में जब इन्होंने प्रथम कुमारी कन्या के रूप में आर्यिका दीक्षा धारण कर ‘‘ज्ञानमती’’ नाम प्राप्त किया है तब तक ‘‘ज्ञानमती’’ नाम से कोई भी आर्यिका-क्षुल्लिका नहीं थीं किन्तु उसके बाद कुछ अन्य संघों में भी ‘ज्ञानमती’ नाम की एक-दो आर्यिकाओं का प्रादुर्भाव हुआ है अत: सामान्य लोग कभी-कभी नामसाम्य से दिग्भ्रमित हो जाते हैं किन्तु इनकी कृतियाँ विलक्षण प्रतिभाओं से युक्त होने के कारण इनके व्यक्तित्व का बिल्कुल पृथक् ही अस्तित्व झलकाती हैं।

युग की आवश्यकता को देखते हुए पूज्य माताजी ने भगवान ऋषभदेव एवं जैनधर्म के सिद्धान्तों को देश-विदेश में प्रसारित करने का बीड़ा उठाया है उसी के अंतर्गत विद्वत्समाज की आवश्यकता पूर्ति हेतु ‘‘ऋषभदेवचरितम्’’ का लेखन ११ दिसम्बर १९९७ को प्रारंभ किया। षट्खण्डागम टीका एवं अन्य लेखन कार्यों के साथ-साथ इसका भी कार्य मध्यम गति से चला और कभी-कभी तो बिल्कुल बंद भी रहा तथापि २४ अक्टूबर १९९९, शरदपूर्णिमा को यह गंथ पूज्य माताजी ने लिखकर पूर्ण कर दिया। लगभग १६० पृष्ठों में माताजी द्वारा लिखित इस कृति का हिन्दी अनुवाद भी मेरे द्वारा किया जा चुका है।

भगवान महावीर के २६००वें जन्मकल्याणक महोत्सव के अवसर पर पूज्य माताजी ने महावीर स्वामी के गुणों का स्मरण करते हुए २६०० मंत्रों में नौ पूजाओं से समन्वित एक पूजन-विधान ग्रंथ मात्र दो माह में रचकर भगवान के चरणों में समर्पित किया, जो एक अमिट कृति है। इसके अतिरिक्त भगवान पार्श्वनाथ के १०८ मंत्रों की रचनापूर्वक ‘‘पार्श्वनाथ विधान’’ का सृजन एवं बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज के नाम पर ‘‘शांतिसागर विधान’’ एवं उनके प्रथम पट्टशिष्य आचार्य वीरसागर के नाम पर विधान लिखकर भी श्रद्धालु भक्तों को प्रदान किया है।

अपने अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग में संलग्न पूज्य माताजी की अनमोल साहित्य सेवा का मूल्यांकन करते हुए फैजाबाद (उ.प्र.) डॉ. राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय ने इन्हें ५ फरवरी १९९५ को एक विशेष दीक्षान्त समारोह में डी.लिट् की मानद उपाधि से अलंकृत कर अपने विश्वविद्यालय को गौरवान्वित अनुभव किया तथा सन् २०१२ में तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद द्वारा पूज्य माताजी के श्रीचरणों में ‘डी. लिट्’ की मानद उपाधि सर्मिपत करते हुए अपना अहोभाग्य माना। उपर्युक्त काव्यकृतियों के आधार पर यदि माताजी को ‘‘महाकवियित्री’’ कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि वैदिक परम्परा में महाकवि कालिदास आदि व जैन परम्परा में अकलंक देव आदि पूर्वाचार्यों की परम्परा का निर्वाह करने वाली पूज्य माताजी का वही स्थान मानना चाहिए। वर्तमान में भी वे निरंतर साहित्य सेवा में संलग्न रहती हैं।

ज्ञानमती माताजी की समस्त कृतियों में संस्कृत साहित्य की भाषा भी अत्यन्त सरल, सौष्ठवपूर्ण, माधुर्ययुक्त, लम्बे समासों व क्लिष्ट पदावली से रहित प्रभावोत्पादक व शीघ्र अभिप्राय दर्शाने वाली है। इन समस्त विशेषताओं से परिपूर्ण आपकी कृतियाँ संसार में सभी को समीचीन बोध प्रदान करें तथा देवभाषा संस्कृत की अभिवृद्धि में कारण बनें यही अभिलाषा है।