गुप्तकालीन जैन मूर्तिकला

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गुप्तकालीन जैन मूर्तिकला

—अभिषेक जैन
[ शोध छात्र, कुंदकुंद ज्ञानपीठ- इंदौर ]


सारांश
४ थी—६ठी श. ई. के मध्य भारत में राज करने वाले गुप्तवंशी शासक मूलत: ब्राह्मण थे किन्तु धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु थे। उनके शासन के पूर्व से ही उनके राज्य क्षेत्र में जैन धर्म समुन्नत था फलत: उनके राज्यकाल में भी वह संवद्र्धित होता रहा। प्रस्तुत आलेख में गुप्तकालीन मूर्तिकला का विवेचन किया गया।

कला, अभीष्ट दिव्यता की प्राप्ति का और उसके साथ एकाकार हो जाने का पवित्रतम साधन है। इसी कारण जैनों ने सदैव ललित कलाओं के विभिन्न रूपों और शैलियों को प्रोत्साहन दिया। कलाओं ने धर्म की कठोरता को मृदुल बनाने में सहायता की। जैन धर्म की आत्मा उसकी कला में स्पष्ट प्रतिबिम्बित हुई हैं। यह विविधता पूर्ण व वैभवशाली तो है ही, साथ ही आत्मोसर्ग, शांति एवं समत्व की भावनाओं को भी प्रोत्साहन देती है। एकांत एवं शांत क्षेत्रों में स्थित तीर्थस्थलों पर मूर्तिमान तीर्थंकर, प्रतिमाएँ अपनी—अपनी अनंत शांति, वीतरागता और एकाग्रता से भक्त/तीर्थयात्री को परमात्म तत्व के समीप्य का अनुभव करा देती है।

प्रारंभ से ही जैन धर्म मूर्ति पूजा से सम्बन्ध रहा है। तीर्थंकर आध्यात्मिक आदर्श रहे हैं। उनके महान गुणों को मूर्तरूप देने तथा उनके गुणों को अपने में विकसित करने के लिए तीर्थंकरों की मूर्तियाँ बनाना आवश्यक था। जैन मूर्तियों में तीर्थंकरों की मूर्तियाँ ही सर्वाधिक है। आरंभ में तीर्थंकर प्रतिमा निर्माण सादगी पूर्ण रहा, किन्तु कालांतर में कला के विकास के साथ तीर्थंकर के चारों ओर अनेक अलंकरण एवं उनके परिकरों आदि का अंकन किया जाने लगा। जैन मूर्तिकला में तीर्थंकरों की मूर्तियों के अतिरिक्त इन्द्र—इन्द्राणी आदि देवगण, तीर्थंकरों के अनुचर, यक्ष—यक्षिणी, नाग—नाागिन, देवी सरस्वती, नवग्रह आदि की प्रतिमाएँ मिली है।

गुप्तकाल

चौथी शती ई. के प्रारंभ से छठी शती ई. के मध्य तक गुप्तों के शासन काल में संस्कृति एवं कला का सर्वपक्षीय विकास हुआ। समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय एवं स्वंदगुप्त जैसे पराक्रमी शासकों ने उत्तर भारत को एकसूत्र में बांधे रखा। शांतिपूर्ण वातावरण में व्यवसायों एवं देशव्यापी व्यापार का पुनरुत्थान हुआ और आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई। गुप्त युग में भड़ौच, उज्जैनी, विदिशा, वाराणसी, पाटलिपुत्र, कोशाम्बी, मथुरा आदि व्यापारिक महत्व के प्रमुख नगर स्थल मार्ग से एक दूसरे से सम्बद्ध थे।

गुप्त शासक मुख्यत: ब्राह्मण धर्मावलम्बी होते हुए भी अन्य धर्मों के प्रति उदार थे। अभिलेखिय एवं साहित्यिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि इस युग में जैन धर्म की अधिक उन्नति नहीं हुई। इस काल में जैनधर्म समुन्नत दशा में था। फाह्यान के यात्रा विवरण में भी जैन धर्म का अनुल्लेख है। रामगुप्त के अतिरिक्त अन्य किसी भी गुप्त शासक द्वारा जैन मूर्ति निर्माण का उल्लेख नहीं मिलता है। गुप्त संवत् तिथियों वाली मूर्तियाँ चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम एवं स्वंदगुप्त के समय की है।

गुप्तकालीन जैन मूर्तिकला—

गुप्तकाल में जैन मूर्तियों की प्राप्ति का क्षेत्र विस्तृत हो गया। कुषाणकालीन कलावशेष जहाँ केवल मथुरा एवं चौसा से मिले हैं, वहीं गुप्तकाल में जैन मूर्तियाँ मथुरा एवं चौसा के अतिरिक्त राजगिर, विदिशा, पन्ना, उदयगिरि, कहौम, वाराणसी एवं अकोटा (गुजरात) में भी मिली हैं, इसके अलावा बेसनगर, बूढ़ी चंदेरी तथा देवगढ़ में भी गुप्तयुगीन मूर्तिकला के दर्शन होते हैं। जिनों के साथ लांछनों एवं यक्ष—यक्षी युगलों के निरूपण की परम्परा भी गुप्तयुग में ही प्रारंभ हुई। तीर्थंकर मूर्तियों में ऋषभनाथ, चन्द्रप्रभ, पुष्पदंत, नेमिनाथ,पार्श्वनाथ एवं महावीर का निरूपण हुआ। साथ ही अष्टग्रहों, गंधर्वों तथा नेमिनाथ के साथ वासुदेव, बलराम आदि की मूर्तियाँ भी प्राप्त होती है। श्री वासुदेव उपाध्याय ने लिखा है ‘गुप्त लेखों में ऐसे वर्णन मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि उस समय जैन धर्मावलम्बी भी पर्याप्त संख्या में थे। गुप्तकलाकारों ने जैन मूर्तियों को उसी संदुरता के साथ तैयार किया है।

इस काल की तीर्थंकर प्रतिमाओं में सामान्य विशेषताएँ तो वही हैं जो कुषाणकाल में विकसित थीं, किन्तु उनके परिकरों में इस समय कुछ वैशिष्टय दिखाई देता है। प्रतिमाओं का उष्णीष कुछ अधिक सौंदर्य व घुंघरालेपन को लिए हुए पाया जाता है। प्रभावल में विशेष सजावट दिखाई देती है। आसन में अलंकारिता और साजसज्जा, धर्मचक्र के आधार में अल्पता, परमेष्ठियों का चित्रण, गंधर्व युगल का अंकन नवग्रह तथा भामण्डल का प्रतिरूपण इस काल की मूर्तियों की विशेषता है। प्रतिमाओं की हथेली पर चक्र चिन्ह तथा पैरों के तलुओं में चक्र और त्रिरत्न उकेरा जाता था। छत्रत्रय और छत्रवली तथा लांछन का अभाव इस समय की मूर्तियों में स्पष्ट दिखाई देता है।

राजगिर, कुमाराहार, वैशाली, चौसा, पहाड़पुर आदि से प्राप्त कांस्य, प्रस्तर तथा मृण्र्मूिमूर्तियों को देखने से यह पता चलता है कि कलाकारों में सौंदर्य—बोध बढ़ चुकामूर्तितयों के भावों में सरलता, सामंजस्य और आध्यात्मिकता का अंकर और अधिक स्पष्ट हो गया था। प्रतिमाओं पर कुछ चिन्ह भी बनने लगे थे।

मथुरा

गुप्त युग की ३८ प्रतिमाओं का परिचय उक्त मथुरा संग्रहालय की सूची में कराया गया है। मथुरा से प्राप्त सामग्री के रूप में ध्यानस्थ मुद्रा में आसीन तीर्थंकरों की पच्चीसमूर्तितयाँ, खडगासन मुद्रा में तीर्थंकरों की छहमूर्तितयाँ, तीर्थकरमूर्तितयों के तेईस वियुक्त सिर और कुछ खण्डित कृतियाँ मिलती है। आयागपटों और सरस्वती, बलभद्र, धरणेन्द्र जैसे जैन देवताओं या अन्य शासन देवों या शासन देवियों की पृथकमूर्तितयों का तो स्पष्ट रूप से अभाव है। यहाँ तक की सर्वतोभद्रमूर्तितयाँ तो लगभग न मिलने के समान है। मथुरा में गुप्तकाल में भगवान पार्श्वनाथ की अपेक्षा भगवान ऋषभनाथ की अधिकमूर्तितयाँ उत्कीर्ण हुई। ऋषभनाथ एवंपार्श्वनाथ की पहचान पहले ही की तरह लटकती जटाओं एवं सात सर्पफणों के छत्र के आधार पर की गई है। मथुरा संग्रहालय में संरक्षित गुप्तकालीन जैन तीर्थंकर की एक प्रतिमा प्राप्त हुई है। इस प्रतिमा के सिंहासन पर एक तरफ अपनी थैली सहित धनपति कुबेर और दूसरी तरफ एक बालक को अपनी बांयी जांघ पर बैठाये हुए मातृदेवी (अम्बिका) की आकृति उत्कीर्ण है। इनके ऊपर दोनों ओर चार—चार कमलासीन प्रतिमाएँ दिखाई गई हैं, जो सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और राहु इन आठ ग्रहों की प्रतीक मानी गयी है। इस अलंकरण के आधार पर यह प्रतिमा गुप्त युग से मध्य युग के बीच स्वीकार की जाती है, क्योंकि यह प्रतिमा शैली उस काल में अधिक विकसित हुई थी।

इसी संग्रहालय में सुरक्षित संधिकाल की अन्यमूर्ति का उल्लेख डॉ. हीरालाल जैन ने किया है, जिसमें सिंहासन परपार्श्वनाथ सिंहों के मध्य मीन युगल दिखाया गया है। जिनके मुख खुले हुए हैं और उनसे सूत्र लटक रहा है। आगे चलकर मीन अठारहवें तीर्थंकर अरनाथ का चिन्ह पाया जाता है। अत: यह प्रतिमा अरनाथ की है। एक खण्डितमूर्तित में दाहिनी ओर की वनमाला तथा सर्पफणों एवं हल से युक्त बलराम कीमूर्तित के आधार पर जिन की पहचान नेमिनाथ से की गई हैं एक दूसरी नेमिमूर्तित में भी बलरात एवं कृष्ण मूर्तितत हैं।

राजगिर

राजगिर (बिहार) के पर्वत पर ध्वस्त जैन मंदिरों के अवशेष मिले हैं, जिसमें लगभग चौथी शती ई. की चार जिनमूर्तितयाँ मिली है। जिनमें एक वैभार पहाड़ी के घ्वस्त मंदिर से प्राप्त बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ की प्रतिमा है। काले पत्थर की इस प्रतिमा पर एक अस्पष्ट शिलालेख पाया गया है जिसमें गुप्त लिपि में (महाराजाधिराज) श्री चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमा दित्य) के नाम का उल्लेख है। इस तीर्थंकर प्रतिमा का शीर्ष टूट गया है अन्यथा यह प्रतिमा गुप्त कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। तीर्थंकरमूर्तित को सिंहासन पर ध्यानमुद्रा में अंकित किया गया है। सिंहासन के अंतिम सिरों पर उग्र सिहों का अंकन किया गया है। और एक अण्डाकार आरे युक्त चक्र की परिधि में एक राजपुरुष को खड़ा हुआ दिखाया गया है उसके दोनों ओर दो केशहीन तीर्थंकरमूर्तितयाँ ध्यान मुद्रा में उत्कीर्ण हैं। एक अन्य राजगिर के तृतीय पर्वत पर एक फण युक्तपार्श्वनाथ की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इस प्रतिमा का सिंहासन एवं मुख निर्माण सर्वथा गुप्त कला के अनुरूप है।

इन मूर्तितयों की शैलीगत विशेषताएँ उन शैलियों को प्रर्दिशत करती हैं जो सारनाथ तथा देवगढ़ में साकार हुई और जिन्होंने पूर्वी — भारत मेंमूर्तित निर्माण गतिविधि को प्रभावित किया। राजगिर की जैन कला में कम से कम दो पृथक शैलीगत वर्ग स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं। पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व वैभारगिरि के ध्वस्त मंदिर से प्राप्त नेमिनाथ की प्रतिमा और पूर्वी सोनभण्डार गुफा की छह अन्य तीर्थंकर शिल्पाकृतियाँ करती हैं। इनमें दूसरे वर्ग की अपेक्षा इनमें अधिक लालित्य है एवं शरीर रचना में अंगों का पारस्परिक संबंध अधिक अच्छी तरह दिखाया जा सकता है। दूसरे वर्ग में तीन प्रतिमाएँ आती हैं जो ध्वस्त मंदिर की उसी कोठरी में नेमिनाथ की प्रतिमा के साथ ही प्राप्त हुई थी। इस वर्ग की प्रतिमाओं की विशेषताएँ हैं — अपेक्षाकृत सुगठित धड़, स्तंभ — जैसे पैर और नाभि के नीचे सुस्पष्ट मांस — पिण्ड जिसके नीचे एक गहरी उत्कीर्ण रेखा है जो आकृति को स्पष्ट काटती है। यह बात गर्दन में भी देखने को मिलती है। दोनों ही वर्गों की तीर्थकर प्रतिमाओं के हाथों का अंकन भी इस दृष्टि से असंगत है कि सामने की भुजाएँ पाश्र्व हाथों से जोड़ी गयी हैं, साथ ही दोनों वर्गों में स्तंभ जैसे पैर हैं तथा टांगों के अंकन में शीघ्रता से काम किया गया है। इस प्रकार ये प्रतिमाएं एक नयी शैली की सूचना देती हैं जो उस समय अपना स्थान बनाती जा रही थी। मिश्रित अंकन के अतिरिक्त इन प्रतिमाओं पर तीर्थंकरों के वे परिचय चिन्ह भी अंकित हैं जो प्रतिमा विज्ञान में स्वीकार किए जा रहे थे तथा जिनसे विभिन्न तीर्थंकरों की पहचान करने में सहायता मिलती है।

विदिशा

मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में ‘हेलियोडोरस’ के प्रसिद्ध अभिलेख वाला ‘गरुड़ स्तम्भ’ जहाँ से प्राप्त हुआ, उस बेसनगर के केवल तीन किलोमीटर की दूरी पर, ‘दुर्जनपुर’ गाँव में, खेती के लिये बुलडोजर से जमीन तोड़ते समय तीनमूर्तितयाँ प्राप्त हुई थी। बुलडोजर के कठोर आघातों से इन तीनोंमूर्तितयों को विशेषकर उनके मुख भागों को तथा पाश्र्व भागों को, भारी हानि पहुँची है। इन तीनोंमूर्तितयों पर उकेरे हुए तीनों अभिलेख बहुत संतोषजनक स्थिति में नहीं थे, परन्तु गहन परीक्षण पर वे गुप्त राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालने वाले अत्यधिक महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में सामने आये है।

इन उत्कीर्ण लेखों में महाराजाधिराज रामगुप्त का उल्लेख है। लेखों की लिपि प्रारंभिक गुप्तकालीन है। श्री कृष्णदत्त बाजपेयी का भीकहना है कि प्रतिमा लेख चौथी शती ई. के हैं, क्योंकि उनकी लिपि चन्द्रगुप्त द्वितीय के साँची और उदयगिरि के गुहालेखों से मिलती है। प्रतिमाओं की कला शैली के संबंध में उनके विचार है कि इन प्रतिमाओं में कुषाण कालीन तथा पाँचवी शती ई. की गुप्तकालीनमूर्तित कला के बीच के लक्षण दृष्टिगत होते हैं। लिपि,मूर्तितयों की निर्माण शैली तथा ‘महाराजाधिराज’ उपाधि के साथ रामगुप्त के नामोल्लेख से र्मूियों का चौथी शती ई. के अंतिम चतुर्थांश में र्नििमत होना प्रमाणित हुआ। दो पीठिाका लेखों में तीर्थंकरों का नाम चन्द्रप्रभ तथा तीसरे में पुष्पदंत दिया है।

अभिलेख पद्मासनस्थ ध्यानमुद्रा में तीर्थकर प्रतिमाओं के पादपीठ पर अंकित है। पादपीठों के दोनों आरे पंखधारी सिंह तथा मध्य में धर्मचक्र उत्कीर्ण है, जिसकी परिधि का अंकन सामने की ओर है। इनमें से दो प्रतिमाओं की मुखाकृतियाँ विखण्डित हो चुकी है, किन्तु उनके पीछे भामण्डल तथा पाश्र्व में दोनों ओर चमरधारी पुरुष खड़े हैं। इन भामण्डलों की बाहरी परिधि नखाकार किनारी से अलंकृत है तथा केन्द्र में एक सुन्दर खिला हुआ बहुदल कमल है। तीसरीमूर्तित का प्रभामण्डल अधिकांशत: नष्ट हो गया है और यह भी निश्चित नहीं है कि इसमूर्तित के पाश्र्व में खड़े हुए सेवक अंकित थे या नहीं किन्तु तीर्थंकर की मुस्कानयुक्त मुखाकृति का एक अंश मात्र शेष है। नासिका, नेत्र और ललाट भाग खण्डित हो चुके है। शीर्ष के शेष भाग में कानों के लम्बे छिद्रयुक्त पिण्ड दिखाई देते हैं। इन तीनों प्रतिमाओं के वक्षस्थलों पर ‘श्रीवत्स’ चिन्ह स्पष्ट: परिलक्षित है। प्रत्येक तीर्थंकर का धड़ एक पूर्ण विकसित एवं सुस्पष्ट वक्ष स्थलयुक्त है जो गुप्तकालीन मूर्तिकला की अपनी विशेषता है। धड़ दोनों ओर निकली हुई कोहनी और भुजाओं की स्थिति विशेष प्रकार की है, जो समूची प्रतिमा को एक त्रिकोणाकार रूप प्रदान करती है, जिसके सिर त्रिकोण का शीर्षभाग और दोनों भुजाएँ त्रिकोण की दो भुजाओं का रूप ग्रहण करती प्रतीत होती है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि इस काल में और कम से कम जैन ध्यानावस्थित प्रतिमाओं में पद्मासन मुद्रा का अंकन योगासन की एक आदर्श मुद्रा के रूप में मान्य रहा होगा। येमूर्तितयाँ मात्र जैनधर्म के इतिहास तथा मूर्तिकला की दृष्टि से ही नहीं अपितु गुप्तकालीन कला के इतिहास की दृष्टि से भी विशेष महत्वपूर्ण है।

विदिशा के निकट उदयगिरि की एक गुफा (गुफा—२०) में गुप्त संवत् (१०६ (४२५-२६ शती ई.) कुमारगुप्त—प्रथम का शासनकाल का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है जिसमेंपार्श्वनाथ की एक प्रतिमा के निर्माण का उल्लेख है जो उनके सिर पर भयंकर नाग—फण के कारण भयमिश्रित पूज्य भाव को प्रेरित करती है। उक्त शिल्पांकितमूर्तित अब नष्टप्राय समझी जाती है। जोमूर्तित इस समय गुफा में स्थित है, वह बहुत परवर्ती काल की है तथापि, इस शिलालेख से यह पर्याप्त स्पष्ट नहीं है कि पार्श्वनाथ की प्रतिमा इस गुफा में एक पृथक प्रतिमा थी, क्योंकि शिलालेख में ‘अचिकरत् शब्द का उपयोग हुआ है। जिसका अर्थ है ‘निर्माण करवाया गया’ उत्कीर्ण करने यामूर्तित को प्रतिष्ठापित करने का भाव इसमें नहीं है। संभव है शिलालेख के आंशित रूप से खंडित हो चुकीपार्श्वनाथ की उस वर्तमान प्रतिमा का संदर्भ हो जो गुफा की भित्ति पर उत्कीर्ण है।

विदिशा के निकट बेसनगर से भी तीर्थंकर की उत्तर गुप्कालीन प्रतिमा प्राप्त हुई है। यह गुप्तकाल की उत्कृष्ट कलाकृति है। इसकी अवगाहना साढ़े छह फुट है। यह ग्वालियर संग्रहालय में सुरक्षित है। तीर्थंकर की घुटनों तक लम्बी भुजाएँ हैं, गोलाकार चौड़े कंधे है। धड़ की संरचना से प्रतिमा का रचनाकाल लगभग छठी शती का उत्तरार्ध प्रतीत होता है। इस तथ्य की पुष्टि प्रतिमा की विशिष्ट शिरोभूषा तथा सिर के दोनों ओर प्रभामण्डल के सम्मुख अंकित उड़ती हुई मालाधारी मानव आकृतियों से होती है। सिर के पीछे वृताकार प्रभामण्डल है जिसके केन्द्र में कमल है तथा उसकी परिधि का बाहरी किनारा गुलाब के छोटे—छोटे फूलों से अलंकृत है। पैरों के समीप दो सेवकों की आंकृतियाँ अर्धतिष्ठ मुद्रा में अंकित है। इनके सिर खण्डित हैं।

पन्ना

मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में गुप्तकालीन शिवमंदिर के लिये प्रसिद्ध नचना नामक स्थान के समीप सीरा पहाड़ी से गुप्तकालीन जैन प्रतिमाओं का एक समूह प्राप्त हुआ है, जिनमें से कुछ परवर्तीकाल की भी है। तीर्थंकर पद्मासन मुद्रा में अंकित हैं। उनके सिर के पीछे एक विस्तृत प्रभामण्डल है जिसके शीर्ष के निकट दोनों ओर उड़ते हुए गंधर्व युगल अंकित है। तीर्थंकर के पाश्र्व में दोनों में दोनों ओर चमर—धर यक्ष खड़े हुए हैं जो मुकुट पहने हैं और जिसके सामने का अलंकरण कुषाणों के विशेष शिरोभूषण के समान है जिसके इस प्रकार के मुकुटों का विकास हुआ है इन दोनों यक्षों के शरीर विन्यास का अंकन यक्षों और गंधर्वों के गले का आभूषण—एकावली, गंधर्वों का सजीव चित्रण तथा सौंडनी, एहोले आदि से उनकी समानता के कारण इस प्रतिमा का रचना काल लगभग चौथी शताब्दी का उत्तरार्ध अथवा पाँचवी शताब्दी का पूर्वार्ध प्रतीत होता है जो गुप्त शासन का प्रारंभिक काल था मुकुट पर इसी प्रकार के कला प्रतीक का अंकन उदयगिरि की एक गुफा के विख्यात वराह फलक पर अंकित नाग तथा दो या तीन खड़ी हुई छोटी आकृतियों के शिरोभूषणों में पाया गया है। तीर्थंकरों के शीर्ष तथा शरीर के अंकन की मथुरा की लगभग चौथी शताब्दी की प्रतिमाओं से समानता भी तिथि की पुष्टि करती है। पादपीठ के मध्य में धर्मचक्र ओर उसके दोनों ओर दो छोटे—छोटे सिंह अंकित किए गए हैं। इसी स्थन से प्राप्त आगे र्विणत ऋषभनाथ की खडगासन प्रतिमा के पादपीठ की सदृश्यता के आधार पर कहा जा सकता है कि तीर्थंकर की वह पद्मासनमूर्तित महावीर की है जिस पर उनका परिचय चिन्ह सिंह अंकित है।

सीरा पहाड़ी से प्राप्त ऋषभनाभ की खडगासन प्रतिमा के पादपीठ पर धर्मचक्र तथा उसके दोनों ओर दो भक्त अंकित हैं। पुनीत चक्र की परिधि के सामने की ओर से उसी प्रकार अंकित किया गया है, जैसे मथुरा की कुषाणकालीन प्रतिमाओं के पादपीठ पर। साथ ही, इस प्रतिमा के पादपीठ के दोनों सिरों पर विशिष्ट भारतीय वृषभ अंकित है जो ऋषभनाथ का परिचय चिन्ह है। परवर्ती जैनमूर्तितयों में सिंह का पादपीठ के दोनों पाश्र्वों में अंकित किया गया है जो सिंहासन का सूचक है, जबकि बौद्धमूर्तितयों के समान धर्मचक्र में दोनों ओर दो हरिणों का अंकन है। किन्तु इस प्रतिमा में वृषभ चिन्ह तो इसी प्रकार दर्शाया गया है, किन्तु धर्मचक्र के पाश्र्व में हरिण अंकित नहीं है। इससे स्पष्ट है कि यह प्रतिमा उस प्रारंभिक काल की है, जब प्रतिमाओं में परिचय चिन्हों के अंकन का आरंभ ही हुआ था और जब तीर्थंकरों के परिचय हेतु चिन्हों की परिपाटी पूर्णरूपेण निर्धारित नहीं हो पायी थी। इस सादृश्यता के आधार पर तीर्थंकर प्रतिमा को महावीर की प्रतिमा माना जा सकता है।

इन दोनोंमूर्तितयों की शैली शास्त्रीय गुप्त शैली के विशिष्ट कुषाण — प्रकारों से पलायन की सूचक है किन्तु तीर्थंकर महावीर की प्रतिमा एक सुंदर कलाकृति है, जिसमें विशेष रूप से मुखाकृति, का अंकन अत्यन्त उत्कृष्टता के साथ किया गया है। इसी स्थान से उपलब्ध और इसी काल की, संभवत: इससे कुछ पहले की एक अन्य कायोत्सर्ग प्रतिमा हैपार्श्वनाथ की। वस्त्र, विन्यास रहित इस प्रतिमा में तीर्थंकर की सम्पूर्ण आकृति के पीछे कुण्डली मारे हुए एक विशाल नाग को दर्शाया गया है, जिसने तीर्थंकर के शीर्ष पर अपने फण से एक छत्र बनाया हुआ है।

ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्तकाल में नचना के ब्राह्मण धर्म केन्द्र के निकट ही सीरा पहाड़ी पर जैन धर्म का केन्द्र था। इस क्षेत्र में यदि पुन: उत्खनन किया जाये तो और अधिक जैन अवशेष, मात्र इसी स्थान से ही नहीं अपितु इसके समीपवर्ती क्षेत्रों से भी, उपलब्ध हो सकते हैं।

जोन विलियम्स द्वारा गुप्तकालीन दो सुंदर तीर्थंकर प्रतिमाओं को प्रकाश में लाया गया है, जो जिला पुरातत्व संग्रहालय पन्ना में सुरक्षित है। बताया जाता है कि ये प्रतिमाएँ नचना से उपलब्ध हुई हैं। तीर्थंकर को पादपीठ स्थित आसन पर पदमासन मुद्रा में दर्शाया गया है। धर्मचक्र और उसके पाश्र्व में दोनों किनारों के निकट सिंह अंकित हैं धर्मचक्र के प्रत्येक छोर पर घुटनों के बल बैठा हुआ एक भक्त है, जो संभवत: तीर्थंकर का गणधर (प्रथम अनुयायी) या फिर कोई साधु है। दूसरी प्रतिमा में पादपीठ के मुखभाग पर चार भक्त अंकित हैं। प्रतिमा की मुखाकृति और सिर पूर्णरूपेण सुरक्षित है। तथा कंधे और धड़ की संरचना में उत्कृष्ट गुप्तकाल की कला परम्परा का निर्वाह हुआ। जहां तक मुखाकृति की भावाभिव्यक्ति का संबंध है, इसे गुप्तकालीन श्रेष्ठ तीर्थंकरमूर्तितयों की श्रेणी में रखा जा सकता है।

कहौम

कहौम (देवरिया, उ. प्र.) के ४६१ ई. के एक स्तम्भ लेख में पाँच जिनमूर्तितयों के स्थापित किए जाने का उल्लेख है। स्तम्भ की पाँच कायोत्सर्ग एवं दिगम्बर जिनमूर्तितयों की पहचान ऋषभनाथ, शांतिनाथ, नेमिनाथ,पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी से की गई है। सीतापुर (उ. प्र.) से भी एक जिनमूर्तित मिली है।

वाराणसी

वाराणसी से मिली लगभग छठी शती ई. की एक ध्यानस्थ महावीरमूर्तित भारत कला भवन, वाराणसी से संग्रहित है। राजगिर की नेमिमूर्तित के समान ही इसमें भी धर्मचक्र के दोनों ओर महावीर के सिंह लांछन उत्कीर्ण हैं। वाराणसी से मिली और राज्य संग्रहालय, लखनऊ में सुरक्षित लगभग छठी—सातवीं शती ई. की एक अजितनाथ कीमूर्तित में भी वीठिका पर गज लांछन की दो आकृतियाँ उत्कीर्ण है।

अकोटा

अकोटा (बड़ौदा,गुजरात) से चार गुप्तकालीन कांस्य मुर्तिया मिली हैं। पांचवी—छठी शती ई. की इन श्वेताम्बरमूर्तितयों में दो ऋषभनाथ की और दो जीवन्तस्वामी महावीर की है। सभी हैं। मूलनायक कायोत्सर्ग में खड़े हैं। एक ऋषभमूर्तित में धर्मचक्र के दोनों ओर दो मृग और पीठिका छोरों पर यक्ष—यक्षी निरूपित हैं। यक्ष—यक्षी के निरूपण का यह प्राचीनतम ज्ञात उदाहरण है। द्विभुज यक्ष—यक्षी सर्वानुभूति एवं अम्बिका है।

इनमूर्तितयों में एक तीर्थंकर ऋषभनाथ की धोती धारण किए हुए खडगासन कांस्य प्रतिमा है, पर दुर्भाग्य से यह आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है तथा इसका पादपीठ नष्ट हो चुका है। फिर भी इसकी रचना सुंदर है तथा विशुद्ध गुप्तकालीन शैली में है, जिसकी तुलना सुलतानगंज से प्राप्त उत्कृष्टता पूर्वक ढाली हुई बुद्ध की ताम्र प्रतिमा से की जा सकती है। अत्यधिक क्षतिग्रस्त होने पर भी यहमूर्तित उत्तर भारत में प्राप्त सुंदरतम कांस्य प्रतिमाओं में से एक है। रजतमण्डित अर्धनिमीलित नेत्र तीर्थंकर की आनंदमय मुद्रा का संकेत देते हैं। निचला अधर, जो महापुरुष लक्षण के अनुसार अरुणाभ होना चाहिए ताम्र मण्डित है तीन धारियों से युक्त अत्यधिक क्षतिग्रस्त ग्रीवा शंखाकार (कंबु—ग्रीव) है, जिसे गुप्तकाल में शरीर सौंदर्य का प्रतीक माना जाता था, सुघड़ता से रचित धड़ के विशाल तथा सुडौल स्वंध तथा क्षीण कटि (तनुवृत — मध्य) भी गुप्तशैली के अनुरूप है। स्वंधों तक लटकती केशराशि की सहायता से प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के रूप में इसकी पहचान संभव हुई है।

अकोटा समूह की एक अन्य प्रतिमा, जो कायोत्सर्ग मुद्रा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ की है, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसमें तीर्थंकर आयताकार पादपीठ के मध्य में खड़े हैं। पादपीठ के दोनों सिरों पर दो कमलपुष्प अंकित हैं, जिन पर प्रत्येक में एक यक्ष तथा यक्षी कीमूर्तितयाँ हैं। पृष्ठभाग में अन्य तीर्थंकरों के लिए पट्टिका अथवा प्रभामण्डल के लिए आधार पेटिका या दोनों मूलत: उन छिद्रों में स्थित थे, जो पादपीठ के ऊपरी तल पर दृष्टिगोचर होते हैं। वृत में अंकित ऋषभनाथ कीमूर्तित पृथक ढाली गयी है और केन्द्र में धर्मचक्र के ऊपर संयुक्त कर दी गयी। धर्मचक्र के दोनों ओर सुदर हरिण है। ऋषभनाथ के रूप में तीर्थ।कर की पहचान उनके स्वंधों पर लटकती हुई केशराशि से हुई है। इसमें संवारे हुए कुंचित केश और उष्णष दृष्टव्य हैं। बड़े नेत्र, विस्तृत ललाट, थोड़ी नुकीली नाक, सुडौल मुख तथा बौने धड़ पर छोटी ग्रीवा ऐसी विशेषताएँ हैं, जो प्रारंभ में गुजरात तथा पश्चिम भारत के अन्य स्थानों में प्रकट हुई हैं तीर्थकर के शरीर पर पारदर्शी धोती है, जिसमें से जिनेन्द्रिय का स्वरूप स्पष्ट झलकता है। धोती सुदंर रंगों में छापी गयी है, जिसमें समानांतर पंक्तियों के मध्य पुष्प अंकित है। पुष्पों का अंकन एक आद्य काला प्रतीक है। स्वंध चौड़े और सुदृढ़ हैं, कटि पतली, हाथ और टाँगे, सुर्नििमत हैं तथा वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह है। ये सभी विशिष्टताएँ उत्तर गुप्त युग, लगभग ५४० — ५० शती ई. की बोधक है।

अकोटा समूह में उपलब्ध कुछ और कांस्यमूर्तितयों को उनकी शैली तथा कहीं—कहीं उनके अभिलेखों की पुरालिपि के साक्ष्य के आधार पर इस युग के अंतिम भाग की माना जा सकता है। जैन कला तथा प्रतिमा विज्ञान के इतिहास में जीवंतस्वामी की दो कांस्यमूर्तितयां (एक अभिलेखांकित पादपीठ सहित तथा दूसरी पादपीठ रहित) अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। जीवंतस्वामी की पहली कांस्य प्रतिमा का पादपीठ नष्ट हो गया ओर जो आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है। फिर भी, मुकुट सहित शीर्ष पूर्णत: सुरक्षित है। यह ऊँचा मुकुट मथुरा के कुषाणयुगीन विष्णु के बेलनाकार मुकट के समान र्नििमत है। यह चौकोर है, जिसमें सामने की ओर चैत्य वातायन के समान अलंकरण तथा पाश्र्व शीर्ष और पृष्ठभाग में कमल प्रतीक अंकित है। बालों की कुण्डलित लटें कंघों पर तीन पंक्तियों में गिरती हैं और सुन्दर शैली में संवारे हुए केश पट्टे के नीचे दिखाई देते हैं, जो संभवत: मुकुट का ही भाग हैंमूर्तित का निचला अधर ताम्र जड़ित है, जो अंधेरों के अरुणाभ होने का संकेत देता है। रजत मण्डित अर्धनितीलित नयन ध्यान की गहनता का आभास देते हैं। उनके विशाल मस्तक पर वृत्ताकार तिलक का चिन्ह है। आध्यात्मिक ध्यान एवं आनंद तथा पूर्ण यौवन की आभा से प्रदीप्त मुखमण्डल युक्त महावीर की यह प्रतिमा कदाचित अब तक प्राप्तमूर्तितयों में श्रेष्ठतम है। मेखला (करधनी) से कसी हुई घुटनों से नीचे तक लटकी हुई है। मेखला के मध्य में बनी कुण्डलपाश से बांधा हुआ पर्यसत्क पाश्र्व में नीचे की ओर लटक रहा है। धोती के मध्य भाग में एक अलंकृत लघुवस्त्र (पर्यसत्क) बँधा है, जिसके एक छोर की चुन्नटें नीचे की ओर लटक रही हैं तथा दूसरा छोर जो बायीं जाँघ को ढँकता है, विलक्षण अर्धवृत्ताकार चुन्नट में वल्ली जैसा प्रतीत होता है। इस प्रकार की धोती नि:संदेह पश्चिम भारतीय मूर्तिकला की आरंभिक शैली की विशेषता है। तीन धारियों युक्त ग्रीवा, चौड़े स्वंध, लम्बी भुजाएँ, साधारण रूप में उभरा वक्ष और क्षीण कठि में गुप्तकला की सभी विशेषताएँ हैं।

अकोटा से प्राप्त जीवंतस्वामी की दूसरी प्रतिमा में उन्हें एक ऊँचे अभिलेखांकित पादपीठ पर खडगासन ध्यानमुद्रा में दिखाया गया है। पादपीठ का अभिलेख लगभग ५५० ई. की लिपि में उत्कीर्ण है कायोत्सर्ग मुद्रा में यह प्रतिमा मुकुट, कुण्डल, भुजबंध, कंगन और धोती से युक्त है। धोती के दो छोर मध्य में बँधे हुए लहरा रहे हैं। भुजबँध मणिमय स्वर्णमाल युक्त है, दायें कान में मोती का कुण्डल लटक रहा है और बायें में मकर कुण्डल प्रतीत होता है। त्रिकुट (त्रिकोणात्मक) मुकुट मध्य में बड़ी और दुहरे चूड़ामणि युक्त पर्त तथा दोनों ओर दो छोटी पर्तों से र्नििमत है। ग्रीवा में मनोहर एकावली है।

नयनों में रंजित रजत, जो धूमिल पड़ चुकी है, विस्तृत स्वंधों युक्त देह, सुविकसित वक्षस्थल, कुछ—कुछ क्षीण कटि—प्रदेश, सुंदर मुख, किनारी पर मणिकाओं युक्त अण्डाकार प्रभामण्डल तथा अभिलेख की पुरालिपि के आधार पर हम इस कांस्यमूर्तित को लगभग छठी शती के मध्यकाल का मान सकते हैं।

चौसा

बिहार में आरा के समीप चौसा नामक स्थान से ६ गुप्तकालीन जिनमूर्तितयाँ मिली हैं, जो सम्प्रति पटना संग्रहालय में हैं। ये सहज आकर्षण और अभिव्यक्ति की उपयुक्तता दर्शाती हैं। इनमें से दो आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभ की हैं जैसा कि उनके परिचय चिन्ह (अर्धचंद्र) से स्पष्ट है, जो शिरश्चक्र के ऊपर मध्य में दिखाया गया है। अन्य दो प्रतिमाएँ प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की हैं, जिनकी पहचान उनके कंधों तक आये बालों के कारण हो सकती है। शेष दो क्षीण हो जाने और इस कारण विवरणों का पता नहीं लग पाने से पहचानी नहीं जा सकती है। सभी तीर्थंकरों को पादपीठ पर ध्यान मुद्रा में आसीन अंकित किया गया है और सभी के वक्ष के मध्य में श्रीवत्स चिन्ह तथा पीछे की ओर शिरश्चक्र हैं। जिसमूर्तित का शिरश्चक्र अब लुप्त हो गया है, उसके पीछे की चूल से ज्ञात होता है कि वहाँ पहले शिरश्चक्र था। तीर्थंकर ऋषभदेव की दो प्रतिमाओं में से एक खडगासन मुद्रा में है। डॉ. बी. पी.सिंह ने इस प्रतिमा को बिहार से प्राप्त पाल कालीन प्रतिमाओं की कोटि में रखा है, किन्तु अंगों की संरचना, केश विन्यास एवं प्रभामण्डल की शोभा के आधार पर यह प्रतिमा गुप्तकालीन प्रतीत होती है।

देवगढ़

देवगढ़ मेंमूर्तितयों का निर्माण प्रचुरता से हुआ। उनकी संख्या और विविधता से प्रतीत होता है कि यहाँ बहुत बड़ामूर्तित निर्माण केन्द्र था, गुप्तकाल की अनेकमूर्तितयाँ यहाँ उपलब्ध है। मूर्तिकला की दृष्टि से देवगढ़ की अपनी स्वतंत्र शैली थी, जो गुप्तकाल में स्पष्टतर हो उठी।

देवगढ़ में अन्यमूर्तितयों की अपेक्षा तीर्थंकरों कीमूर्तितयाँ कई गुना अधिक है। मुख्य रूप से आदिनाथ,पार्श्वनाथ, नेमिनाथ, महावीर और शांतिनाथ कीमूर्तितयां है। बहुसंख्यकमूर्तितयों पर लांछन नहीं मिलता है। प्राय: सभी शिलपट्टों पर उत्कीर्ण की गई है। द्विमूर्तितकायें, त्रिमूर्तितकायें, सर्वतोर्भादुकाये और चतुर्विंशतिपट्ट प्रचुरता से उपलब्ध है। द्वारों पर भी तीर्थंकमूर्तितयों का अंकन हुआ है। प्राय: सभीमूर्तितयों के साथ भिन्न—भिन्न रूप से कुछ परम्पराओं का निर्वाह किया गया है। गुप्तकाल तक आते—आते देवगढ़ का कलाकारमूर्तितयों में सजीवता और भावना का संचार करने में पूर्ण सफल हो जाता है। यद्यपि अलंकरण की सादगी बनी रही, यूनानी प्रभाव लुप्त होकर भारतीय आकृति पूर्ण रूप से सामने आ जाती है।

गुप्तों का कलाप्रेम और उत्कृष्ट रुचि उनके युग की प्रत्येक कृति से टपकती है। गुप्तकालीन कला का उत्कर्ष गुप्त—साम्राज्य के नि:शेष हो जाने पर भी लगभग सौ वर्ष तक बना रहा। अर्थात् जहाँ तक कला का संबंध है,३२० ई. से ६०० ई. तक गुप्तकाल गिना जाता है। यद्यपि गुप्त मूर्तिकला वाकाटक मूर्तिकला की ही परम्परा है, किन्तु गुप्त इतने सुसंस्कृत थे और उनकी कलाभिरुचि इतनी सक्रिय थी कि उस काल की समूचि कला कृति पर चाहे वह गुप्त—साम्राज्य में रही हो चाहे वाकाटक—साम्राज्य में, गुप्त साम्राज्य मानना पड़ता है और इसी कारण उस काल की, भारत ही नहीं द्वीपस्थ भारत तक की, मूर्तिकला गुप्तकला कही जाती है।

मथुरा, राजगिर, विदिशा, नचना (सीरा पहाड़ी), उदयगिरि, कहौम, वाराणसी, अकोटा, चौसा तथा देवगढ़ आदि स्थानों से प्राप्त तीर्थंकरमूर्तितयों से ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्तकाल में तीर्थंकर प्रतिमाओं के कई निर्माण केन्द्र थे। इसी काल की अनेक जैन प्रतिमायें ग्वालियर के पास किले, बूढ़ी चंदेरी आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि गुप्तकाल में जैनमूर्तितयों को उत्कीर्ण करने तथा उन्हें प्रतिष्ठापित करने का कार्य प्रचलित रहा।

अर्हत् वचन जनवरी से जून २०११