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गोपाचल दुर्ग का जैन पुरावशेष

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गोपाचल दुर्ग का जैन पुरावशेष

गोपाचल दुर्ग तीन ओर से सुन्दर पर्वत मालाओं से आवेष्टित दिल्ली, बम्बई राजमार्ग पर अवस्थित (२६०१३’ उत्तर व ७८०१२’ पूर्व) अपने प्राचीन वास्तु एवं मूर्तिशिल्प से समृद्ध है। प्राकृतिक सौन्दर्य से युक्त यह दुर्ग अपने सामरिक महत्व से ईसा की ३ सरी शताब्दी पूर्व ही विख्यात था, ग्वालियर गढ़ के प्राचीन नाम गोपपर्वत (६ ठी शताब्दी) गोपगिरिन्द्र (विक्रम संवत् ९६९) गोर्पािद (वि. सं. ९३२, ११५०, १३३६ एवं १३५५ के अभिलेखों में) गोपागिरि (९३३ व १२७७ विक्रम संवत् के अभिलेख) एवं गोपाचल दुर्ग (विक्रम संवत १३५५, १४९७, १५२५ व १५५२ के अभिलेखों में) आदि नाम अभिलेखों में मिलते हैं। प्राचीन काल में ग्वालियर के कई नाम अभिलेक्षों व जैन हस्तलिखित ग्रंथों में मिलते हैं—गोपाद्रि, गोपगिरि, गोपाचल, गोपालाचल, गोवागिरि, गोवालगिरि, गोपालगिरि, ग्वाल्हेर, व गाह्वेर,। इसी गोपाद्रि का वर्तमान अपभ्रंश क्रमश: गोपालगिरि, गोआलगिरि, गुलालगिरि, ग्वालियर में परिर्वितत हुआ है। इस अंचल का महत्व मौर्य, शक, क्षत्रप, गुप्त, हूण, कच्छवाह, प्रतिहार, परमार, तोमर, मुगल, ब्रिटिश एवं मराठा काल में पर्याप्त महत्वपूर्ण रहा है और इसे ‘‘ग्वालों की पहाड़ी’’ तक कहा गया है। अनुश्रुति यह भी है कि कच्छवाह राजकुमार सूरजसेन को जब कुष्ठ रोग हो गया तो सन्यासी ग्वालियर ने सूरजकुण्ड का जल पीकर इस रोग से मुक्ति दिलाई इस प्रसन्नता को व्यक्त करने के लिये उसने कुण्ड को पक्का बनवाया ओर विस्तृत किया, उसके पास ही एक किले का निर्माण किया, उसी सन्यासी के नाम पर गोपाचल दुर्ग का नाम पड़ा (ग्वालिपा से ग्वाल्हरे)।

१५वीं १६ शताब्दी से ही ग्वालियर क्षेत्र में साहित्य, व्याकरण का पर्याप्त विकास हुआ और एक पारम्परिक व श्रद्धा भक्ति संपन्न श्लोक प्रचलित हो गया था।

‘‘गोपाचले महादुर्गा ग्वालिया यत्र तिष्ठते।

ऋद्धि सिद्धि प्रदातारौ, ये नमंति दिने दिने।।’’

यह श्लोक यहाँ की हस्तलिखित प्रतियों में पुष्पिका के रूप में प्राप्त होता है।[१] संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, मराठी, उर्दू, फारसी साहित्य में इस दुर्ग पर विपुल सामग्री प्राप्त होती है। जिसमें से कुछ इस प्रकार है—गोपाचल आख्यान लेखक खर्ग कवि। जयाजी प्रबंध, लेखक पं. अंनत बुआ बुधकर। खण्डेराय रासो—लेखक जदुनाथ। ग्वालिया नामा—लेखक जल्लाल हिसारी। ग्वालियर नामा लेखक हीरामन। गुबालियर नामा लेखक द्विज बादल दास कुवलाते ग्वालियर, लेखक फजल अली ओर कारनामा—ए—ग्वालियर, लेखक खेरूद्दीन (उर्दू) इत्यादि हस्तलिखित ग्रंथ ग्वालियर के सूरज ज्ञान भंडार, भंडारकर प्राचीन शोध संस्थान, पूना, सयाजीराव गायकवाड़ प्राच्य शोध संस्थान,, बड़ौदा व िंसधिया प्राच्य शोध संस्थान, उज्जैन में सुरक्षित हैं।

खड्गराय ने अपने ‘‘गोपाचल आख्यान’’ में इस महत्वपूर्ण दुर्ग का स्तवन किया है। गोपाचल के आसपास का क्षेत्र—सिन्धु जिसका मेरुदण्ड है जो पुण्या चर्मण्वती तथा पुण्यतोया वेत्रवती के अंचल से आवृत है यह गोपक्षेत्र भारत का हृदय क्षेत्र है अत: वंदनीय है। महीपाल का समय १०९३ ई. का है इनका पद्मनाथ मंदिर का शिलालेख सर्वप्रथम गोपगिरि का उल्लेख करता है।[२]

‘‘श्री गोपाद्री सुकृतनिलय: श्री महीपालदैव:।’’

यह संपूर्ण क्षेत्र जैन पुरावशेषों से समृद्ध है। यहाँ पर ग्वालियर दुर्ग व उसके समीपस्थ पवाया (प्राचीन पद्मावती) सुहानिया, सुरवाया (अभिलेखों में सरस्वती पट्टण) पधावली इत्यादि स्थानों से एकत्रित जैन मूर्तिशिल्प जो ग्वालियर के केन्द्रिय पुरातत्व संग्रहालय, गुजरी महल में सुरक्षित है, ऐसे जैन पुरावशेषों के कलात्मक पक्ष की समीक्षा की जायेगी। इस क्षेत्र में इतनी प्रभूत मात्रा में जैन पुरासामग्री यत्र—तत्र विकीर्ण है कि उसे सहेजना इस लघु शोध निबंध में संभव भी नहीं है।

कुछ पुरातत्ववेत्ताओं ने इस दुर्ग का ३०० वर्ष ईसापूर्व का इतिहास ज्ञात किया है।[३] पुरासामग्री ईसा पूर्व ३०० वर्षों की प्राप्त होती है। इस दुर्ग की गणना भारत के प्राचीन दुर्गों में की जाती है। कई जैन हस्तलिखित ग्रंथों में इस दुर्ग पर अनेक जैन गणधिरों ने तपस्या की थी, ऐसा उल्लेख मिलता है। किला ३०० फुट ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर इसकी लम्बाई पौने दो मील है तथा पूर्व से पश्चिम तक इसकी चौड़ाई ६०० से २८०० फुट तक है। किले में मान मंदिर, गुजरी महल, करण मन्दिर, विक्रम मन्दिर, जहाँगीर महल और शाहजहानी महल, ग्वालिपा, सूर्यदेव, चतुर्भुज, जयंती धोरा, तेली का मन्दिर, सास—बहु का मन्दिर मातादेवी, धीन्धदेव महादेव और जैन मंदिर महत्वपूर्ण स्थापत्य है जिनमें प्राचीन शिल्प सुरक्षित है। जनरल किंनधम ने १८४४ ई. में यहाँ के जैन मन्दिर को खोजा व जैन मूर्तियों व जैन अभिलेखों को प्रकाश में लाने का कार्य किया। तब से लेकर इस किले के परिसर में अनेक जैन मूर्तियाँ, अभिलेख, चौमुखी व ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं जो यथार्थ में जैन पुरावशेषों की समृद्ध परम्परा के द्योतक व अगली कड़ी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनका अभ्यास प्राचीन भारतीय स्थाप्त्य मूर्ति एवं शिल्पकला के समग्र रूपायन के लिये अत्यन्त आवश्यक है।

जैन हस्तलिखित ग्रंथों के अनुसार गोपाचल दुर्ग पर विभिन्न राजवंशों ने जो शासन किया वह इस प्रकार है—सूरजपाल ने यहाँ ३६ वर्षों तक राज्य किया। इस वंश में रसकपाल, नहरपाल, भीमपाल, अमरपाल, गंगवाल, भोजपाल, पद्मपाल, अनंत, इन्द्रपाल, ढाण्डूपाल, लक्ष्मणपाल, नहरपाल, मम्डरपाल, अजीतपाल, बुद्धपाल आदि ८४ राजाओं ने राज्य किया और इनका राज्यकाल लगभग ९८९ वर्ष तक रहा। फिर यहाँ परिहार वंश का १०२ वर्ष तक राज्य रहा।

ऐतिहासिक दृष्टि से गोपाचल दुर्ग का सर्वप्रथम उल्लेख हूण सरदार मिहिरकुल के सूर्यमन्दिर वोल शिलालेख में मिलता है।[४] हूण शासक मिहिरकुल के १५ वें वर्ष का शिलालेख है। जिसमें गोपपर्वत पर सूर्यमन्दिर के निर्माण का उल्लेख है। मातृचेल ने सूर्य मंदिर की स्थापना की थी। इसी प्रकार चतुर्भुज मन्दिर के विक्रम संवत् ९३२ के शिलालेख में उक्त दुर्ग का उल्लेख है।[५] इस प्रकार है।

‘‘श्री मदादिवराहेण त्रैलोक्यं विजिगीषुणा।

तद्गुणान्य परिज्ञाय क्रतो गोपन्द्रिपालने।।’’

इसमें कन्नौज के प्रतिहार रामदेव के पुत्र आदिवराह (भोजदेव) का उल्लेख है। पता चलता है कि प्रतिहार राजा भोज ने इसे जीतकर अपने कन्नौज राज्य में मिला लिया था। विक्रम की ११वीं शताब्दी में कच्छुप घात वंशी वङ्कानाभ या वङ्कादामन नामक नरेश ने ग्वालियर को जीतकर अपने अधिकार में कर लिया। विक्रम संवत् १०३४ में उसने एक जैन मूर्ति की प्रतिष्ठा भी कराई थी।[६] मूर्तिलेख से ज्ञात होता है कि जैनधर्म के प्रति इस शासक की कितनी गहरी आस्था थी। प्रतिहारवंश की द्वितीय शाखा ने इस पर अपना अधिकार किया। ग्वालियर के इतिहास में विक्रम संवत् १२४९ का समय संकटमय रहा। दिल्ली के शासक अल्तमिश ने दुर्ग पर घेरा डाल दिया और पर्याप्त विनाश लीला की इस राजनीतिक अस्थिरता में कोई जैन ग्रंथ नहीं लिखे गये और न ही किसी मन्दिर व मूर्तिकला का निर्माण हो सका। सारंगदेव और उनके १५०० वीर राजपूत वीरतापूर्वक लड़े और मातृभूमि के प्रति अपने जीवन का उत्सर्ग कर गये। स्त्रियों ने जौहर किया जहाँ जौहर हुआ वह स्थल आज भी जौहर ताल के नाम से प्रसिद्ध है। तब से किले पर अल्तमिश का अधिकार हुआ और उसे फिर मुक्त कराया, तोमर वंशी नरेशों ने। एक प्रकार से तोमर नरेशों के काल में गोपाचल दुर्ग व आंचलिक प्रदेश में जैनधर्म का विशेष उत्साह से विकास एवं प्रसार हुआ।

चौदहवीं सदी ई. के उत्तराद्र्र में भारत पर तैमूर के आक्रमण तथा उसके परिणाम स्वरूप सता के डांवाडोल होने की परिस्थिति का लाभ उठाकर ग्वालियर के तोमरवंश के सरदार ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। ग्वालियर पर इस वंश का प्रभुत्व १६ वीं सदी ईसवीं के पूर्वाद्र्ध तक रहा। इस वंशे का संस्थापक वीरिंसह देव था। यह अलाउद्दीन के सेनापति सिकंदर खाँ की नौकरी में था। ग्वालियर पर इस वंश का अधिकार विक्रम संवत् १५९३ तक रहा। विक्रमदेव का उत्तराधिकारी डुँगरेन्द्र सिंह १४२४ ई. में गद्दी पर बैठा। डूँगरेन्द्रसिंहका राज्यकाल, उसके द्वारा जैन धर्म को दिये गये प्रश्रय के लिये प्रसिद्ध है। ग्वालियर के किले की दीवारों पर उत्कीर्ण जैन प्रतिमाएँ तथा उनकी चरण चौकियों पर उसके राज्यकाल में लिखे गये लेख इस बात की साक्षी हैं।

ग्वालियर दुर्ग में विक्रम संवत् १४९० का जैन मूर्ति लेख, जिसमें तोमर शासक महाराजाधिराज श्री डूँगरेन्द्रिंसह तथा गोपाचल दुर्ग का उल्लेख है।[७] विक्रम संवत् १५१० का जैन प्रतिमा लेख जिसमें तोमर शासक डूँगरेन्द्रिंसह के शासन काल में कर्मिंसह द्वारा चन्द्रप्रभ की मूर्ति प्रतिष्ठा का उल्लेख है।[८] इसी प्रकार विक्रम संवत् १५१० का एक अन्य जैन प्रतिमा लेख जिसमें तोमर डूँगरिंसह के शासनकाल में मूर्ति प्रतिष्ठा का उल्लेख है।

विक्रम संवत् १५१४ का जैन प्रतिमा लेख जिसमें डूँगरिंसह के शासनकाल में गुहा मन्दिर बनाने का उल्लेख है।[९] विक्रम संवत् १५२२ में तोमर शासक र्काितसिंह गद्दी पर बैठ चुका था। इसका प्रमाण उरवाही द्वार की ओर स्थित जैन प्रतिमा पर उत्कीर्ण वि. सं. १५२२ के लेख से पुष्ट होता है।[१०] इसमें तोमर शासक र्कीितिंसह का उल्लेख है। इसके तीन वर्ष बाद विक्रम संवत् १५२५ का जैन प्रतिमा—लेख जिसमें तोमर र्कीितिंसह देव के शासनकाल में शांतिनाथ की प्रतिमा की प्रतिष्ठा का उल्लेख है, प्राप्त होता है।[११]

तोमर नरेश र्कीितिंसह देव ने एक ओर तीर्थंकर प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा कराई दो दूसरी ओर जैन आचार्य व जैनसंघ के प्रमुखों द्वारा प्रतिमाएँ भी अधिष्ठित करवाई है।[१२] प्रमाण स्वरूप विक्रम संवत् १५२५ का जैन प्रतिमा लेख जिसमें संघाधिपति हेमराज द्वारा युगाधिनाथ की प्रतिमा प्रतिष्ठा तथा अनेक जैन आचार्यों का उल्लेख है। विक्रम संवत् १५२५ का जैन प्रतिमा लेख सूचना देता है कि र्कीितिंसह के शासनकाल में पार्श्र्वनाथ की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई।[१३] विक्रम संवत् १५२५ का जैन प्रतिमा लेख जिसमें जैन प्रतिमा की स्थापना और जैन आचार्यों का उल्लेख है।[१४] विक्रम संवत् १५२५ के जैन प्रतिमा लेख में गोपाचल दुर्ग का उल्लेख है व डूँगरिंसह के पुत्र र्कीितिंसह के शासनकाल का उल्लेख है।[१५]

विक्रम संवत् १५२५ के जैन प्रतिमा लेख में महाराज र्कीितदेव तथा उसके अधिकारी गुणभद्रदेव का उल्लेख है।[१६] कुशलराज की पत्नी की अनुरक्ति पार्श्र्वनाथ के प्रति अत्यधिक थी अत: उसने र्कीितिंसह के शासनकाल में पार्श्र्वनाथ की मूर्ति स्थापित कराई और परिणाम स्वरूप अभिलेख उत्कीर्ण कराया।[१७] दुर्ग में स्थापित जैन मूर्ति के विक्रम संवत् १५२७ से पुष्टि होती है कि यह विशाल प्रतिमा किस संघ द्वारा प्रतिष्ठित की गई थी।[१८] र्कीितिंसह का एक अन्य जैन मूर्ति अभिलेख विक्रम संवत् १५२९ का है जो समीप के परिहार नामक स्थान से मिला है जिसमें जैन साधुओं का उल्लेख है।[१९] विक्रम संवत् १५३१ का जैन प्रतिमा लेख पुन: दर्ग में ही सुरक्षित है जिसमें एक ओर महाराज र्कीितिंसह के शासन का उल्लेख है तो दूसरी तरफ चंपा नामक स्त्री द्वारा मूर्ति प्रतिष्ठा का विवरण भी प्राप्त होता है।[२०] उरूवाही द्वार पर एक अन्य एक अन्य जैन मूर्ति लेख है जो ग्वालियर पुरातत्व रिपोर्ट वर्ष १९८४ विक्रम संवत् के अभिलेख क्रमांक २० में प्रकाशित है। एम. बी. गर्दे द्वारा र्नििमत ‘‘डायरेक्टरी ऑफ फोर्ट्स इन ग्वालियर स्टेट’’ संवत् १९७२ के अभिलेख क्रमांक ९, पृ. ५४ व ५७ एवं कनिर्धम द्वारा लिखित र्आिकयोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, रिपोटर््स, भाग २ पृ. ३५६ के अनुसार जैन मूर्ति लेख र्कीितिंसह के शासनकाल में उत्कीर्ण किया गया था।

विक्रम संवत् १५२९ के बरई ग्राम के जैन प्रतिमा लेख में तोमर र्कीितिंसह देव का उल्लेख है।[२१] इस समस्त विवरण से यह बात पुष्ट होती है कि १४५५ ईसवीं के लगभग डूंगरेन्द्रिंसह का उत्तराधिकारी र्कीितिंसह गद्दी पर बैठा और उसने अपने २५ वर्षों के यशस्वी शासनकाल में जैन मूर्तियों का निर्माण करवाया, जैसा कि चौकियों पर उत्कीर्ण उसके दस अभिलेखों से ज्ञात होता है। इस वंश में फिर कल्याण ऑमल का पुत्र मानिंसह उत्पन्न हुआ जो बड़ा प्रतापी शासक था और १४८६ ई. से १५१७ ई. तक उसने राज्य किया और ग्वालियर भू भाग में राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ प्रदान की। उसने संगीत का ‘‘मान कौतूहल’’ नामक विख्यात ग्रंथ रचा और दुर्ग के भीतर मानमन्दिर ओर गूजरी महल का निर्माण कराया जा भारतीय स्थापत्य कला के अप्रतिम उदाहरण है।

विक्रम संवत् १४८८ के तिकोनिया तालाब के अभिलेख से जैन प्रतिमा प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार विक्रम संवत् १४९७ के जैन मूर्तिलेख में आदिनाथ भगवान की मूर्ति के निर्माण का विवरण प्राप्त होता है।[२२]

विक्रम संवत् १४९७ के उरवाही द्वार की ओर की जैन मूर्ति लेख में देवसेन, यशर्कीित, जयर्कीित आदि जैन आचार्यों के नाम का उल्लेख है।[२३] विक्रम संवत् १५२५ के तीन जैन प्रतिमा अभिलेख ग्वालियर दुर्ग के जन पुरावशेषों पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।[२४] विक्रम संवत् १५५२ के जैन अभिलेख में गोपाचल के महाराजा मल्लिंसह देव के राज्यकाल का उल्लेख है।[२५] दुण्डापुरा ग्राम जो ग्वालियर के निकट है वहाँ से जैन मंदिर के अभिलेख में विक्रम संवत् १५९८ का एक लेख उत्कीर्ण है, जो जैन स्थापत्य की सूचना देता है।[२६] तोमर वंश के बाद दुर्ग पर लोदी वंश, मुगल वंश, िंसधिया वंश और अन्त में अंग्रेजों का शासन रहा। ताजुल मआसिर के लेखक एक मुगल इतिहासकार ने इस किले को हिन्द के गले में पड़े हुए किलो के रत्नहार का एक उज्जवल रत्न बताया है। एक अन्य इतिहासकार ने इसे दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार बताया है।

गोपाचल दुर्ग में हाथी दरवाजे और सास—बहू के मन्दिर के मध्य में किंनधम को खुदाई में जैन मंदिर के अवशेष मिले, इनमें पद्मासना व कायोत्सर्ग आसन की प्रतिमाएँ महत्वपूर्ण हैं, ये सभी दिगम्बर संप्रदाय की हैं व एक पर विक्रम संवत् ११६५ उत्कीर्ण है। कायोत्सर्ग रूप वाली प्रतिमाओं में एक सर्पफणमंडित पार्श्र्वनाथ भगवान की है।

ग्वालियर दुर्ग में उकेरी गई विशाल जैन प्रतिमाओं से यह स्पष्ट आभास होता है कि पहले कलाकार जैन धर्म के सिद्धान्तों को आत्मसात एवं हृदयंगम करता था और फिर कठिन चट्टानों में १ सौम्य शांत एवं वीतरागता के भाव अंकित कर अपने कलात्मक स्वरूप को व्यक्त करता था। कलाकार ने संपूर्ण जैन दिव्यता को पाषाण में उत्खचित कर देता था। उन अनाम कलावंतों की अनन्य निष्ठा देखकर आज का दर्शक किंकर्तव्यविमूढ हो जाता है, और उसके सामने एक विशाल मूर्ति फलकों की शृंखला एक के बाद एक आती जाती है, जिसमें तीर्थंकरों का सौम्य वदन दर्शकों को सत्य, अिंहसा व अपरिग्रह का दिव्य संदेश प्रकट करता लगता है। सुचिक्कण शरीर यष्टि पर सुंदर आत्माभिमुख दृष्टि, एक अद्भुत आध्यात्मपरक वातावरण की सृष्टि करती है। योग की पारंगत अवस्था का स्वरूप पद्मासना व खड्गासना प्रतिमाओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

गोपाद्रि पर्वत पर कुल १५०० के लगभग जैन प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं, जो ६ इंच से लेकर ५७ फुट तक के आकार की हैं। यहाँ की सबसे विशाल मूर्ति भगवान आदिनाथ की है जो उरवाही दरवाजे के बाहर हैं। यह खड्गासन मुद्रा में है और ५७ फुट ऊँची है। दूसरी विशाल प्रतिमा एक पत्थर की बावड़ी में सुपाश्र्वनाथ की पद्मासन प्रतिमा है जो ३४ फुट ऊँची और ३० फुट चौड़ी है।

दुर्ग की प्रतिमाओं को कई समूहों में बांटा जा सकता है। प्रमुख आसन है पद्मासन व खड्गासन, साथ में पद्मावती, यक्ष, देवी प्रतिमाएं, चैत्यस्तंभ व शिलालेख। एक ओर विशाल प्रतिमा ऋषभदेव की है जो ५७ फुट ऊँची है। मूर्ति लेख के अनुसार इस मूर्ति के प्रतिष्ठाकारक साहू कमलिंसह तथा प्रतिष्ठाचार्य रइधू थे। उरवाही द्वार के दोनों ओर खड्गासन में तीर्थंकर मूर्तियाँ हैं।

तैली का मन्दिर ९ वीं शताब्दी में द्रविड़ शैली में र्नििमत १०० फुट ऊँचा एक जीर्ण मन्दिर है, कुछ विद्वान इसको तैलंग शैली के कारण अपभ्रंश में तेली का मन्दिर हो गया ऐसा अनुमान करते हैं। एक ही पत्थर की खुदी हुई प्राकृतिक बावड़ी के समूह में मूर्तियाँ अत्यन्त कलात्मक शिल्प में उकेरी गई है। अष्टप्रतिहार्यों से र्नििमत तीर्थंकर प्रतिमाएँ विशेष कलात्मकता को प्रकट करती हैं।

बावड़ी के बगल में दांयीं ओर पद्मासन में पार्श्र्वनाथ मूर्ति है आगे शान्तिनाथ, पद्मप्रभ, बाहुबली, नेमिनाथ, व फिर शांतिनाथ की प्रतिमाएँ हैं। ये अपने लांछन क्रमश: हरिण, पद्म, हरिण, अद्र्धचन्द्र एवं शंख के द्वारा पहचानी गई हैं। दुर्ग में आगे बढ़ने पर ९ मूर्तियाँ इस प्रकार हैं— (१) कुन्थुनाथ (छाग)

(२) सुपाश्र्वनाथ (नंद्यावर्त)

(३) आदिनाथ (वृषभ)

(४) शान्तिनाथ (हरिण)

(५) शांतिनाथ की आवृति

(६—७) पद्मासन

(८) शान्तिनाथ

(९) संभवनाथ (अश्व) ये अपने लांछन से पहचानी जा सकती है।

गोपाचल पीठ की भट्टारक परंपरा के दर्शन यहाँ से प्राप्त मूर्ति अभिलेखों में होते हैं। र्कीितिंसह के शासनकाल में भट्टारक गुणभद्र के उपदेश से अनेक मूर्तियों का निर्माण एवं प्रतिष्ठा हुई। भट्टारक महीचन्द्र ने एक पत्थर की बावड़ी के गुफा मन्दिर की प्रतिष्ठा करायी थी। भट्टारक र्कीितसिंहबावड़ी मूर्ति समूह की पार्श्र्वनाथ प्रतिमा की प्रतिष्ठा करायी थी। महाराज गणपतिंसह के शासनकाल में कुन्दकुन्द आम्नाय के भट्टारक शुभचन्द्र के मंडलाचार्य पंडित भगवंत के पुत्र खेमा और धर्मपत्नी खेमादे ने धातु की चौबीसी मूर्ति की प्रतिष्ठा कराई थी जो संवत् १४७९ वैशाख सुदी ३, शुक्रवार को की गई थी।

गोपाचल दुर्ग से प्राप्त मूर्तिलेखों में पंडित रइधू का नाम आता है। ये अपभ्रंश भाषा के मूर्धन्य कवि थे। आपने ३० से अधिक ग्रंथों का प्रणयन किया। उन्होंने अपने जीवन में अनेकों मूर्तियों की प्रतिष्ठा कराई। उरवाही द्वार के मूर्ति समूह में भगवान आदिनाथ की ५७ फुट ऊँची मूर्ति तथा चंद्रप्रभ भगवान की विशाल मूर्ति के लेखों में पंडित रइधू द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित करने का उल्लेख प्राप्त है। रइधू कवि के समय में ग्वालियर दुर्ग में जैन मूर्तियों का इतना अधिक निर्माण हुआ कि उन्होंने अपने काव्य में लिखा—

‘‘अगणिय अण पडित को लक्खइ।

सुरगुरू ताह गणण जई अक्खई।।’’

दुर्ग की जैन प्रतिमाओं में कुछ ऐसे व्यक्तियों का नामोल्लेख आया है, जिन्होंने मूर्तियों का निर्माण और उनकी प्रतिष्ठा गोपाचल दुर्ग पर कराई, ये नाम इस प्रकार हैं—संघवी कमल िंसह, खेल्हा ब्रह्मचारी, असपति साहू, संघाधिप नेमदास इत्यादि। ग्वालियर के गोलाराडान्वयी सेड साहू के पुत्र संघाधिप कुशराज ने महाराज र्कीितिंसह के शासनकाल में एक विशाल जिन—मंदिर का निर्माण कराया था। कुमुदचन्द्र ने संवत १४५८ में वापिका की ओर भट्टारकसिंहर्कीित द्वारा पार्श्र्वनाथ मूर्ति की प्रतिष्ठा कराई थी। साहू पद्मिंसह ने ग्वालियर दुर्ग पर २४ जिनालयों का निर्माण कराया था। संघपति सहदेव ने ग्वालियर दुर्ग में मूर्ति प्रतिष्ठा करायी थी व साहु कुशराज ने श्रावकों का सम्मान किया था।

गुजरी महल में स्थित केन्द्रीय पुरातत्व संग्रहलय में ग्वालियर, पधावली की जैन मूर्तियाँ संग्रहीत हैं। एक पद्मासन मूर्ति जो मानिंसह के शासनकाल में विक्रम संवत् १५५२ में प्रतिष्ठित की गई थी। पास ही दूसरी मूर्ति विक्रम संवत् १४७६, की पार्श्र्वनाथ की मूर्ति अत्यन्त भव्य व सुन्दर है। अन्य प्रतिमाएँ नेमिनाथ, धर्मनाथ, चन्द्रप्रभ की मूर्तियाँ जैन मूर्ति शिल्प के अनुसार निमत हैं। वृषभनाथ, अजितनाथ, महावीर और पार्श्र्वनाथ की चौमुखी मूर्तियाँ भी यहाँ सुशोभित हैं। संग्रहालय में आदिनाथ, धर्मनाथ, पद्मप्रभ, अजितनाथ और पार्श्र्वनाथ की मूर्तियाँ १२ वीं शताब्दी की हैं।

संग्रहालय के जैनकक्ष में सुरक्षित मूर्तियों का विवरण इस प्रकार है।[२७] ऋषभनाथ की ५र्५ ९५ से.मी. की प्रतिमा लश्कर से प्राप्त है। जैनयक्षी अम्बिका ४र्९ ३र्३ ४२ से.मी.सिंह पर आसीन है व गोद में बालक है। जो प्रियंकर है व बांयी ओर शुभकर खड़ा हुआ प्रर्दिशत है। अन्य प्रतिमाएँ इस प्रकार हैं— (१) पार्श्र्वनाथ का सिर, पद्मासना तीर्थंकर दोनों ओर पद्मासना अर्हंत, दो देवियाँ वाद्ययंत्र लिए हुए।

(२) चामर पुरुष व छत्रधारी खड़े हैं।

(३) साढ़े चार फुट के शिलाफलक पर दो खड्गासन तीर्थंकर, शीर्ष पर छत्र लिये सेवक दोनों पाश्र्व में आकाशचारी गंधर्व दोनों ओर दो समूहों में चमरेन्द्र खड़े हैं।

(४) सहस्रकूट चैत्यालय

(५) सर्वतोभद्रिका प्रतिमाएँ—खड्गासन मुद्रा में चारों कोनों में चामरावाहक

(६) आदिनाथ की पद्मासना प्रतिमा प्रभामंडल में उत्कृष्ट कला वैभव दृष्टव्य है

(७) पुष्पदंत तीर्थंकर की २.५ फिर ऊँची प्रतिमा देवदुंदु भी मध्य में चांवर धारी पुरुष।

(८) खड्गासना तीर्थंकर प्रतिमा परिकर में आकाराचारी गंधर्व और चंमरधारी पुरुष

(९) केवल पादपीठ व शेष भग्र

(१०) पद्मासन तीर्थंकर

(११) पद्मासन मुद्रा में एक तीर्थंकर पर लांछन भग्र संभवत महावीर हो आकार साढ़े चार फीट ऊँची।

(१२) सात फुट ऊँची पद्मासना तीन छत्रधारी तीर्थंकर प्रतिमा—ऊपर दोनों कोनों में मालाधारी पुरुष चांमरधारी पुरुष, व दोनों कोनों में यक्ष व यक्षिणी

(१३) ५ फीट ऊँची पार्श्र्वनाथ की प्रतिमा सर्पफण, छत्र व प्रभावली से सुशोभित प्रतिमा फलक यह एक सुंदर कलात्मक प्रतिमा है।

शेष अन्य प्रतिमाएँ इस प्रकार हैं—वृषभदेव, महावीर, अजितनाथ, सर्वतोभद्रिका, सहस्र जैन कूटट, पद्मासन में तीर्थंकर प्रतिमा इत्यादि।

संग्रहालय की सुंदर तीर्थंकर प्रतिमाओं में ध्यान मुद्रा में पद्मासन तीर्थंकर प्रतिमा (१.२र्३ २.१र्१ १.१६ मीटर) में, पृष्ठ भाग पर प्रभामंडल से सुसज्जित, छत्र व दुंदुभी, बादक से युक्त प्रतिमा महत्वपूर्ण है। इसमें विद्याधर, इंद्र, सुधर्मा व ईषान स्वर्ग भी बताये गये हैं। व्याल व मकराकृति के अंलकरण से प्रतिमा सुसज्जित है। नवगृह के अंकत वाली एक अन्य प्रतिमा भी अत्यन्त सुघढ़ व समानुपातिक पद्धति निर्मित है।

ग्वालियर दुर्ग से ही प्राप्त सर्वतोभद्रिका मूर्ति (११र्४ ८४ से. मी.) आकार में समानुपातिक है, दो तीर्थंकर वृषभनाथ व पार्श्र्वनाथ पहचान लिये गये हैं। पर शेष दो भग्र हैं अत: पहचान कठिन है। अम्बिका की एक अन्य प्रतिमा विशेष कलात्मक सृष्टि का दिग्दर्शन करती है। वृषभ नाथ (११र्८ ७२ से. मी.)। संभवनाथ (३र्० ९२ से. मी.) अपने लांछन से पहचाने गये हैं। एक अन्य प्रतिमा फलक पर पद्मप्रभ स्वामी का अंकन (११र्६ ८३ से. मी.) है और जिस पर १५५२ विक्रम संवत् का अभिलेख उत्कीर्ण है। इसमें ग्वालियर के ‘‘भट्टारक पद्मनंदी जो सरस्वती गच्छ बलात्कार गण, मूलसंघ के थे, ऐसी सूचना प्राप्त होती है।

पंचर्तीिथका जो (१.२र्५ १.४२ से. मी.) मूल नायक चन्द्रप्रभ को व्यक्त करती है। संग्रहालय का एक श्रेष्ठ प्रतिमा फलक है। कायोत्सर्ग मुद्रा में तीर्थंकर खड़े हैं, चौकी को दोसिंहथामें खड़े हैं। पाश्र्व में चार तीर्थंकर उत्कीर्ण किये गये हैं।

कमलाकृति पर नेमिनाथ खड़े हैं जिनका इन्द्रयक्ष नमन कर रहा है। पादपीठ पर शंख, धर्म चक्र स्पष्ट है, एक अन्य प्रतिमा में पार्श्र्वनाथ प्रतिमा का निम्न शरीर भाग है, शेष भग्र है। एक अन्य महत्वपूर्ण प्रतिमा है पाश्र्व में यक्ष धरणेन्द्र व यक्षिणी पद्मावती उत्कीर्ण है, जिनके शीर्ष पर सर्पछाया है। पादपीठ पर विक्रम संवत् १४७६ है जो ग्वालियर के तोमर वंशी नरेश विक्रमादित्य का समय था। अभिलेख में भट्टारक सहस्र र्कीित जो पुष्करगण व माथुरान्वय व काष्ठागार संघ के थे ऐसा उल्लेख मिलता है। एक अन्य प्रतिमा पार्श्र्वनाथ की है। (जिसका आकार (३०र्६ ६र्७ ५७ से. मी.) है जो एक टूटे शीर्ष का भाग है।

१२र्६ ७१ से. मी. के आकार की तीर्थंकर प्रतिमा को लांछन के अभाव में पहचाना नहीं जा सकता है। तीर्थंकर पद्मासना ध्यान मुद्रा में प्रर्दिशत है। एक पट्ट पर १८ तीर्थंकर तीन कतारों में र्नििमत हैं जो १५ वीं शताब्दी में र्नििमत किये गये थे। संग्रहालय में एक सर्वतोभद्रिका प्रतिमा खण्ड (२६र्१ २६र्३ ११६ से. मी.) जो तोमर शासनकाल में र्नििमत हुआ था एक सुंदर मूर्तिकला का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसमें लांछन के आधार पर पार्श्र्वनाथ की पहचान होती है। संग्रहालय में मानस्तंभ भी है जिस पर १३९ कुल पद्मासना तीर्थंकर कतार में उत्कीर्ण किये गये हैं। इस मान स्तंभ पर केवल वृषभनाथ ही पहचान में आते हैं। इस प्रकार एक विशाल मूर्ति समूह संग्रहालय में ११ वीं से १७वीं शताब्दी का र्नििमत प्रर्दिशत किया गया है।

ग्वालियर के तोमरों के शासनकाल में अनेक जैन ग्रंथों की रचना हुई है। ऐसी सहस्रों हस्तलिखित प्रतियाँ जैन भंडारों में सुरक्षित हैं। वीरमदेव के राज्यकाल में अनेक जैन ग्रंथों की रचना हुई। विक्रम संवत् १४६० में गोपाचल में साहू वरदेव के चैत्यालय में भट्टारक हेमर्कीित के शिष्य मुनि धर्मचन्द्र में सम्यक्त्व कौमुदी की प्रति आत्म पठनार्थ लिखी थी। १४६८ विक्रम संवत में भट्टारक गुणर्कीित की आम्नाय में साहु मरुदेव की पुत्री देवसिरी ने ‘‘पंचस्तिकाय’’ टीका की प्रति करवायी।

विक्रम संवत् १४९७ में पांडवपुराण भट्टारक यशर्कीित ने लिखा और १५०० में हरिवंशपुराण की रचना अपभ्रंश भाषा में की गई, इन्होंने ही जिनरात्री कथा, रविव्रत कथा और चंद्रप्रभ चरित आदि ग्रंथ भी रचे। १५३१ विक्रम संवत् में पद्मिंसह ने महाकवि पुष्पदंत की अमरकृति आदिपुराण की एक लाख प्रतिलियाँ तैयार करके विभिन्न मन्दिरों में भेजी थी। संवत् १५५८ में गोपाचल दुर्ग में भट्टारक सोमर्कीित और भट्टारक विजयसेन के शिष्य ने षट्कर्मोंपदेश की प्रतिलिपि कराई। संवत् १५६९ में गोपाचल में श्रावक सिरिमल के पुत्र चतरू ने ४४ पद्मों में नेमीश्वर गीत की रचना की थी।

ग्वालियर काष्ठासंघ माथुरागच्छ का भट्टारक पीठ था। मूर्तिलेखों में इस संघ के साथ काष्ठासंघ माथुरान्वय बलात्कार गण, सरस्वती गच्छ का प्रयोग मिलता है। शाखा के प्रारम्भ के भट्टारक माधवसेन थे उनके दो शिष्य, उद्धरसेन और विजयसेन की शिष्य परंपरा में देवसेन, विमलसेन, धर्मसेन, भावसेन, सहस्रर्कीित, गुणर्कीित, यशर्कीित, मलयर्कीित, गुणभद्र और गुणचंद्र भट्टारक हुए।

माधवसेन के दूसरे शिष्य विजयसेन से दूसरी परंपरा प्रारम्भ हुई। इस परंपरा में विजयसेन, नयसेन, श्रेयांससेन, अनन्तर्कीित, कमलर्कीित, क्षेमर्कीित, हेमर्कीित एवं कमलर्कीित हुए। ग्वालियर के इन भट्टारकों का अपने समय में राजा और प्रजा दोनों पर अद्भुत प्रभाव था। इन्होंने अनेक मन्दिरों और मूर्तियों का निर्माण कराया, अनेक भट्टारकों ने शास्त्र लिखे एवं महत्वपूर्ण ग्रंथों की हस्तलिखित प्रतियाँ तैयार कराई।

ग्वालियर जनपद के प्रतीक स्वरूप गोपाचल दुर्ग पर किये गये जैन कलात्मक उपक्रमों का सर्वेक्षण करने से एक बात स्पष्ट हो गई कि यह जैन सारस्वत साधना का एक महत्वपूर्ण पीठ था जहाँ जैन मंदिरों व मूर्तियों का समराधन किया गया ओर तीर्थंकरों की आराधना व आदरांजलियाँ मूर्ति प्रकल्पन द्वारा सर्मिपत की गई। राजवंशों ने उन जैन कलावतों को प्रश्रय प्रोत्साहन दिया व जैनग्रंथों व जैनशिल्प का प्रणयन व निर्माण कार्य संपन्न हुआ। यह सांस्कृतिक धरोहर हमारे आज के लिए वरदान है। उसे पुन: पुन: याद कर हम अपने प्राचीन शास्त्रकारों एवं भट्टारकों के औदार्य व अनुकंपा को स्मरण कर स्पूर्त, बल ओज व मेधा प्राप्त करते हैं।


१. हरिहर निवास द्विवेदी : ग्वालिय राज्य के अभिलेख, पृ. ५२.

१०. ग्वालियर पुरातत्व रिपोर्ट, संवत् १९८४, क्र. ३२

टिप्पणी

  1. ग्वालियर दर्शन, पृ. ९
  2. इंडियन एन्टीक्वीरी, भाग—२५, पृ. ३३.
  3. मालविका, डॉ. वि. श्री वाकणकर, ग्वालियर का पुरातत्व, ५५२
  4. फ्लीट कॉ इपिग्राफिया इडि. का भाग ३ पृ. १६२, इपि इंडि., भाग ३१, भांडारकर सूची व्रं. १८६८ व २१०९.
  5. इपि. इंडि. भाग १ (१८९२), पंक्ति ६ पृ. १५४.
  6. जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी बंगाल, भाग ३०, पृ. ३०, इपि. इंडि,
  7. इपि. इंडि., भाग १ (१८९२), पंक्ति ६ पृ. १५४.
  8. जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी बंगाल, भाग ३०, पृ. ३०, इपि. इंडि. क्रमांक १७-१८, भांडारकर सूची क्र. ८६ संवत् १५१० वर्षे माघ सुदी ८ सोमे गोपाल दुर्ग तोमरवंशान्वये महाराजधिराज राजा श्री डूँगरदेव राज्य पवित्रमाने श्री काटा संघ माथुरान्वये भट्टारक श्री गुणर्कीित देवास्तत्पट्टे श्री यशदेवर्कीित देवासतत्पट्टे श्री मलयर्कीित देवस्ततो भट्टारक गुणभद्र देव पंडितवर्य रइधू—देववृषयो’’
  9. संवत् १९८४, वही, क्र. २५
  10. वही, क्र. २३.
  11. वही, क्र. २८.
  12. वही, क्र. २६. इसमें संघाधिपति हेमराज द्वारा प्रतिमा की सूचना है इससे ग्वालियर जैन आचार्यों की परम्परा पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।
  13. वही, क्र. ३४.
  14. वही, क्र. ३०.
  15. वही, क्र. ३२
  16. वही, क्र. ३३
  17. वही, क्र. ३९
  18. वही, क्र. ४०
  19. ग्वालियर पुरातत्व रिपोट्र्स, संवत् १९९७, क्र. १.
  20. वही, क्र. ४१ व ४२.
  21. वही, संवत् १९७३, क्र. २.
  22. वही, संवत् १९८४ क्र. १९.
  23. वही, क्र. १८.
  24. वही, क्र. ३५, ३७ व ३८
  25. पूर्णचन्द्र नाहर—जैन अभिलेख, क्र. १४२९.
  26. ग्वालियर पुरातत्व रिपोटर्स, १९२९—३० पृ. १५.
  27. जैन आर्ट एण्ड र्आिकटेक्चर, संपादक—अमलानंद घोष, पृ. ५८१.



सुरेन्द्र कुमार आर्य
मानसेवी निदेशक—जयिंसह पुरा दिगम्बर जैन र्मूित संग्रहालय उज्जैन, निवास—२२ भक्तनगर दशहरा मैदार, उज्जैन
अर्हत् वचन जनवरी १९९३ पेज नं. १९-२७