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घर का भेदी

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घर का भेदी

१. कुंजवन और पानी के फुब्बारे भी कुछ आनन्द नहीं देते यदि उनसे बीमारी पैदा होती है, इसी प्रकार अपने नातेदार भी विद्वेष योग्य हो जाते हैं जबकि वे उसका सर्वनाश करना चाहते हैं।

२. उस शत्रु से अधिक डरने की जरूरत नहीं है कि जो नंगी तलवार की तरह है किन्तु उस शत्रु से सावधान रहो कि जो मित्र बनकर तुम्हारे पास आता है।

३. अपने गुप्तवैरी से सदा सजग रहो क्योंकि संकट के समय वह तुम्हें कुम्हार की डोरी के समान बड़ी सफाई से काट डालेगा।

४. यदि तुम्हारा कोई ऐसा शत्रु है कि जो मित्र के रूप में घूमता फिरता है तो वह शीघ्र ही तुम्हारे साथियों में फूट के बीज बो देगा और तुम्हारे शिर पर सैकडों बलाऐं ला डालेगा।

५. जब कोई भाई बन्धु तुम्हारे प्रतिवूâल विद्रोह करे तो वह तुम पर अनगिनते संकट ला सकता है यहाँ तक कि उनसे स्वयं तुम्हारे प्राण संकट में पड़ जावेंगे।

६. जब किसी राजा के दरबार में छलकपट प्रवेश कर जाता है तो फिर यह असंभव है कि एक न एक दिन वह उसका स्वयं भक्ष्य न बन जाय।

७. जिस घर में भेदवृत्ति पड़ गई वह उस वर्तन के समान है जिसमें ढक्कन लगा हुआ है, यद्यपि वे दोनों देखने में एक से मालूम होते हैं फिर भी वे एक कभी नहीं हो सकते।

८. देखो जिस घर में फूट पड़ी हुई है वह रेती से रेते हुए लोहे के समान कण कण होकर धूल में मिल जायेगा।

९. जिस घर में पारस्परिक कलह है सर्वनाश उसके शिर पर लटका रहा है फिर वह कलह चाहे तिल में पड़ी हुई दरार की तरह ही छोटा क्यों न हों।

१०. देखो जो मनुष्य ऐसे आदमी के साथ बिना मान सम्मान के व्यवहार करता है कि जो मन ही मन में उससे द्वेष रखता है, वह उस मनुष्य के समान है जो काले नाग को साथी बनाकर एक ही झोपड़ी में रखता है।

वीतराग वाणी
माह—मई /जून २०१४