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घर को जलाया घर के चिरागों ने

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घर को जलाया घर के चिरागों ने

जैन धर्म इस दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है और सार्वभौमिक था। दुनिया के हर हिस्से में इसके अवशेष मिलते हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि जैनियों की संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है। इसके लिए हम और हमारा समाज दोषी है। यदि इसी प्रकार जैनियों की संख्या घटती गई तो जैन समाज को आठवीं और नौवीं शताब्दी के इतिहास को दोहराना होगा जब हमारे मुनियों पर भयंकर अत्याचार हुए थे तथा जैनियों का व्यापक धर्म परिवर्तन हुआ था। जैन मंदिरों पर कब्जे हुए थे। इसका ज्वलंत उदाहरण दक्षिण भारत का प्रसिद्ध तिरुपति बाला जी मंदिर है जिसमें बालाजी की मूर्ति २२ वें तीर्थंकर नेमिनाथ जी की है जो कभी जैन मंदिर था।

वर्तमान में घटती हुई जैनियों की संख्या चिन्तन का विषय है। सन् १९४७ में अग्रेजों द्वारा दिये गजट में जैनियों की संख्या ९ करोड़ थी लेकिन ६५ वर्ष की आजादी के बाद ४० लाख जैन बचे हैं। हमारे अग्रवाल जैन भाइयों की संख्या तेजी के साथ गिरती जा रही है। पहले इसका अनुपात पचास-पचास प्रतिशत था लेकिन अब २० प्रतिशत ही शुद्ध बचे है। हम अपने नाम के आगे जैन लिखना भी पसन्द नहीं करते। हमारे साधू संतों को अन्य धर्मों में विवाह सम्बन्ध रोकने हेतु फतवा जारी करना चाहिए।

प्राचीन काल में जैनियों की संख्या ईसा पूर्व १००० वर्ष ४० करोड़ थी और ईसा पूर्व ५००-६०० वर्ष पूर्व २५ करोड़ थी और सन् ८१५ ई० में सम्राट अमोध वर्ष के काल में २० करोड़ जैन थे और सन् ११७३ ई० में महाराज कुवरपाल के शासन काल में १२ करोड़ जैन थे। और सन् १५५६ ई में अकबर बादशाह के शासन काल में ४ करोड़ जैन थे। यह अब्दुल फजल फैजी द्वारा लिखित किताब अकबरी आइनी में लिखित है। एक समय ऐसा भी था जब अफगानिस्तान तथा पाक्स्तिान में जैन धर्म का बोलबाला था। करांची में कुछ मुनि की समाधी है जो २४०० वर्ष पूर्व की है उस पर शिलालेख अंकित है। उच्च शिक्षित युवक तथा युवतियों का दूसरे धर्मों में तेजी के साथ समावेश हो रहा है। नई पीढ़ी संस्कार विहीन होती जा रही है और साधु संतों से विमुख हो रही है।

चन्दाओं के अथाह सागर में डूबा हुआ जैन समाज क्या अपनी समाज तथा बहू बेटियों की रक्षा करने में सक्षम है। फिरोजाबाद में एक जैन लड़की को मंदिर जाते समय एक मुसलमान लड़का छेड़ता था लड़की के विरोध करने पर लड़के ने मूूंह पर तेजाब डालकर जला दिया गया। पुलिस केस बना और वहाँ की स्थानीय समाज ने उस परिवार की क्या सहायता की ? और फिरोजाबाद में कई लड़कियां मुस्लिम परिवारों में जा चुकी हैं। दिल्ली की स्थिति इससे भी बेहतर है। एक घर में आधे जैन तथा आधे अजैनों को भी देखने का नजारा मिलता है। फिर भी हमारे साधु और संत मौन हैं। पुराने जमाने में व्यक्ति धर्म के लिए जान देता था लेकिन आज बिल्कुल स्थिति विपरीत है।

अब समाज को मंदिरों की नहीं, संगठन की जरूरत है। जो समाज को हर तरफ से सुरक्षा करने में सक्षम हो। भारत में जितनी जैन आबादी नहीं है उससे अधिक जैन प्रतिमाओं के रिकार्ड बनाने की होड़ सी मची हुई है। पुरातत्व महत्व के मन्दिरों को तोड़ा तथा मोड़ा जा रहा है और समाज मूकदर्शन बना हाथ पर हाथ धरे बैठा है। पंचकल्याणकों की बाढ़ सी आ गई है। नये-नये तीर्थ बनाये जा रहे है जबकि पुराने तीर्थ अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। गिरनार हमारे हाथों से खिसक रहा है।

कर्नाटक के शहर बेलगाँव से २० किलोमीटर हर एक गाँव के ९ जैन परिवारों ने गरीबी की हालत में ईसाई धर्म स्वीकार किया है। यह जैन समाज के लिए चुल्लूभर पानी में डूबने के समान है। हमारे भाई बन्धु भूखमरी के शिकार हो रहे हैं और हम करोड़ों रुपया चातुर्मासों पर व्यय कर रहे हैं। धर्म मनोरंजन का साधन बनता जा रहा है। हम ढोल मजीरे पीट पीटकर महावीर के उपदेश दे रहे हैं लेकिन उनके सिद्धान्त दैनिक जीवन में नहीं मान रहे हैं। यदि हमारे यही कर्म रहे तो अगले ५० वर्षो में हमारी संख्या १० लाख रह जावेगी तब मन्दिरों तथा बहू बेटियों की रक्षा करना असम्भव ही होगा। महासभा अध्यक्ष को तुरन्त एक प्रतिनिधि मंण्डल वहां भेजकर तथा आर्थिक मदद देकर पुन: अपने भाइयों को अपने धर्म में वापिस के लिए प्रयत्न करना चाहिए तथा संतों को भी आर्थिक मदद कराकर योगदान देना चाहिए।

नरेन्द्र कुमार जैन एडवोकेट
जैन गजट १० नवम्बर २०१४