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चक्रवर्ती का वैराग्य

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चक्रवर्ती का वैराग्य

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अरुण कुमार - गुरूजी! यदि कोई अपनी जिम्मेदारी को न संभालकर दीक्षा ले लेता है तो उसे बहुत ही पाप लगेगा।

गुरूजी - नहीं अरुण, ऐसी बात नहीं है। क्या जब यमराज आता है तब कोई अपनी जिम्मेदारी ही संभालते रहते हैं?

अरुण कुमार - मृत्यु के सामने तो सभी की लाचारी है।

गुरूजी - ऐसा सोचकर ही तो लोग विरक्त होकर दीक्षा लेते हैं। वैराग्य का कोई समय निश्चित नहीं है। संसार के प्रपंच में कुछ-न-कुछ कत्र्तव्य तो बने ही रहते हैं लेकिन विरक्तमना जीव उनको नगण्य समझते हैं क्योंकि काल का कोई भरोसा नहीं है और मनुष्य पर्याय अत्यन्त ही दुर्लभ है।

किसी समय की घटना है कि चक्रवर्ती वङ्कादन्त अपने सिहासन पर आरूढ़ थे। इतने में वनपाल ने एक सुगन्धित कमल लाकर उन्हें अर्पित किया। राजा ने बड़ी प्रसन्नता से उसे सूँघा। उस कमल के भीतर एक गंधलोलुप भ्रमर मरा हुआ पड़ा था। राजा उस भ्रमर को देखते ही संसार के भोगों से विरक्त हो गये। चक्रवर्ती का इतना विशाल वैभव वैराग्यरूपी संपत्ति में उन्हें पुराने तृण के समान तुच्छ भासने लगा। उस समय चक्रवर्ती अपने राज्य का भार पुत्र अमिततेज को देना चाहते थे। तब वह बोलता है-पिताजी! जब आप ही इस वैभव को छोड़ना चाहते हैं तब हमें भी यह क्यों कर चाहिये? इसे आप अस्थिर समझकर ही स्थिर सुख की आकांक्षा से छोड़ रहे हैं अत: हमें भी इस तुच्छ राज्य के अतिरिक्त अलौकिक आत्मिक साम्राज्य ही चाहिये।

जब राजा ने सभी पुत्रों का यह निश्चय देखा तब वे अमिततेज के पुत्र पुण्डरीक को, जो कि अभी बालक ही था, उसी को राज्यतिलक करके दीक्षा के लिए वन में चले गये। वहाँ यशोधर तीर्थंकर के शिष्य गुणधर मुनिराज के समीप वे दीक्षित हो गये। उस समय उनके साथ साठ हजार रानियों ने आर्यिका दीक्षा ले ली तथा बीस हजार राजाओं और एक हजार पुत्रों ने मुनि दीक्षा ले ली।

तब रानी लक्ष्मीमती पति और पुत्र के वियोग से शोक को प्राप्त हुई सोचने लगीं कि इतना छोटा बालक पुण्डरीक इतने विशाल राज्य को कैसे संभालेगा? पुन: रानी ने सोच-विचार कर अपने जमाई (पुत्री श्रीमती के पति) राजा वङ्काजंघ के पास सारा समाचार भेजा और कहलाया कि आप आकर इस राज्य की व्यवस्था सुचारू करें। इस समाचार को विदित कर राजा वङ्काजंघ रानी श्रीमती के साथ वहाँ पहँचे और व्यवस्था संभाली। आश्रित राजाओं को पूर्ववत् अपने-अपने कार्यों में नियुक्त करके वे महाराज पुण्डरीक बालक को राज्य िंसहासन पर आरूढ़ कर कुशल मन्त्रियों के हाथ में राज्य-भार सौंपकर वापस आ गये।

मार्ग में जाते समय राजा वङ्काजंघ ने अपने ही युगल पुत्रों को, मुनिवेश में चारणऋद्धिधारी महामुनियों को आहारदान देकर असीम पुण्य संचित किया था अर्थात् वङ्काजंघनृपति के पिता वङ्काबाहु जब दीक्षित हुए थे तब उनके साथ वङ्काजंघ के ९८ पुत्र सभी के सभी दीक्षित हो गये थे। उसमें से अंतिम दो पुत्र चारणमुनि के रूप में उनके पड़ाव में आये थे और राजा ने आहारदान देकर पंचाश्चर्य को प्राप्त किया था।

कहने का मतलब यही है कि जब इस जीव को संसार, शरीर और भोगों से वैराग्य हो जाता है तब यह जीव सभी कुटुम्बियों से पूर्णतया निर्मम हो जाता है। यहाँ तक कि वह अपने शरीर से भी निर्मम हो जाता है तभी तो वह केशलोंच आदि कष्टों को प्रसन्नमना, दु:खरूप न समझते हुए सहन कर लेता है।

अरुण - क्या घर में रहकर निर्मम नहीं हुआ जा सकता है?

गुरूजी - यदि घर में रहकर भी निर्ममता हो जाती और मुक्ति मिल जाती तो तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र आदि महापुरुष क्यों घर छोड़ते और नग्न होकर क्यों वन में विचरते?

अरुण - आजकल पंचमकाल में तो निर्दोष मुनि होते ही नहीं हैं? पुन: घर में मोक्ष की साधना अच्छी है।

गुरूजी - ऐसी बात एकान्त से नहीं है क्योंकि श्री कुन्दकुन्द देव,श्री अमृतचन्द्र सूरि, श्री पूज्यपाद, श्री भट्टाकलंकदेव, श्री समन्तभद्र आदि मुनि भी इसी पंचमकाल में ही हुए हैं। उन्हें हम और आप निर्दोष मानते हैं। पुन: उनकी वाणी के अनुसार पंचमकाल के अंत तक निर्दोष मुनियों का अस्तित्व मानना ही होगा। मोक्षपाहुड़ ग्रन्थ में श्री कुन्दकुन्द देव कहते हैं-

भरहे दुस्समकाले, धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स।
तं अप्पसहावठिदे, णहु मण्णइ सो हु अण्णाणी।।१।।

इस भरतक्षेत्र में दु:षमकाल में साधुओं को आत्मस्वभाव में स्थित होने पर धर्मध्यान होता है किन्तु जो ऐसा नहीं मानते हैं, वे अज्ञानी हैं।

अज्जवि तियरणसुद्धा, अप्पा झाएहि लहइ इंदत्तं।
लोयंत्तियदेवत्तं, तत्थ चुदा णिव्वुद जंति।।२।।

आज भी रत्नत्रय से शुद्ध साधु आत्मा का ध्यान करके इन्द्रपद प्राप्त कर लेते हैं अथवा लौकांतिक देव हो जाते हैं और वहाँ से च्युत होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।

वर्तमान में आचार्य शान्तिसागर जी आदि की परम्परा में जो साधु हुए हैं वे सभी आगम की परम्परा के अनुयायी हैं, वे अपनी चर्या में सावधान हैं। इनको द्रव्यलिंगी या मिथ्यादृष्टि या हीनचारित्री कहना भी तो अतिसाहस है। जो ऐसा कहते हैं उन्हें एक बार मुनि बनकर निर्दोष चर्या विधि बता देनी चाहिये पुन: सारे साधु उनका अनुकरण कर लेंगे।

देखो अरुण! तुम भगवती आराधना का स्वाध्याय करो तथा प्रवचनसार में देखो, मुनियों को शिष्यों के संग्रह, अनुग्रह और पोषण का उपदेश दिया है, संघ की व्यवस्था बताई है। इसलिये आज भी मुनि हैं और आगे भी पंचम काल के अन्त तक रहेंगे। हाँ! जिस दिन मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका चतुर्विध संघ सल्लेखना ग्रहण कर लेंगे और तभी धर्म का, राजा और अग्नि का भी अभाव हो जायेगा। तिलोयपण्णत्ति और त्रिलोकसार ग्रन्थों का स्वाध्याय करो, तब तुम्हें सारी बातें मालूम पड़ेंगी।

अरुण - अच्छा गुरूजी! मैं अपने सम्यक्त्व को निर्मल बनाने के लिये चारों अनुयोगों के ग्रन्थों का स्वाध्याय करूँगा।