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चत्तारि मंगल में पाठ भेद

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चत्तारि मंगल में पाठ भेद

(१) प्राचीन पाठ—

चत्तारि मंगलं - अरिहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहु मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा - अरिहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहु लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि - अरिहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्ध सरणं पव्वज्जामि, साहु सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि।[१]

(२) ‘चत्तारि लोगोत्तमा’ पाठ—

चत्तारिमंगलं - अरहंतमंगलं, सिद्धमंगलं, साहुमंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगोत्तमा - अरहंत लोगोत्तमा, सिद्ध लोगोत्तमा, साहु लोगोत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारिसरणं पव्वज्जामि - अरहंतसरणं पव्वज्जामि, सिद्धसरणं पव्वज्जामि, साहुसरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि।[२]

(३) चत्तारि मंगल में ‘साहू’ पाठ—

चत्तारिमङ्गलं - अरहंत मङ्गलं, सिद्ध मङ्गलं, साहू मङ्गलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मङ्गलं।
चत्तारि लोगुत्तमा - अरहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि - अरहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्ध सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि।[३]

(४) वर्तमान में संशोधित नया पाठ—[४]

चत्तारिमंगलं - अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा - अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि - अरहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि।
वर्तमान में विभक्ति लगाकर ‘चत्तारिमंगल पाठ’-नया पाठ पढ़ा जा रहा है। जो कि विचारणीय है। यह पाठ सन् १९७४ के बाद में अपनी दिगम्बर जैन परम्परा में आया है। यह संशोधित पाठ नहीं पढ़ना चाहिए।


‘चत्तारिमंगल’ पाठ को भी ग्रन्थों में अनादिनिधन माना है। देखिये प्रमाण—

(१) प्रतिष्ठासारोद्धार में—

णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं। चत्तारिमंगलं-अरहंतमंगलं, सिद्धमंगलं, साहुमंगलं केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगोत्तमा-अरहंतलोगोत्तमा, सिद्धलोगोत्तमा, साहुलोगोत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा। चत्तारिसरणं पव्वज्जामि-अरहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्धसरणं पव्वज्जामि, साहुसरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि ह्रौं स्वाहा। अनादिसिद्धमंत्रः[५] प्रतिष्ठासारोद्धार यह वीर सं. २४४३ में छपा है। इसमें बिना विभक्ति का प्राचीन पाठ है। साहु में ‘हु’ ह्रस्व है। ‘लोगोत्तमा’ पाठ है।

(२) प्रतिष्ठासार संग्रह (हस्तलिखित) में (श्री वसुनन्दि आचार्य विरचित)—

ऊँ णमो अरहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं। णमो लोये सव्वसाहूणं। चत्तारि मंगलं। अरहंतमंगलं। सिद्धमंगलं। साऊमंगलं। केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारिलोगोत्तमा। अरहंतलोगोत्तमा। सिद्धलोगोत्तमा। साऊलोगोत्तमा। केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगोत्तमा। चत्तारिसरणं पव्वज्जामि। अरहंतसरणं पव्वज्जामि। सिद्धसरणं पव्वज्जामि। साऊसरणं पव्वज्जामि। केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि। ह्रौं शांतिं कुरु स्वाहा। अनादिसिद्धमंत्रः।[६] इसमें भी बिना विभक्ति का प्राचीन पाठ है। साहु’ में ‘हु’ हृस्व है। ‘लोगोत्तमा’’ पाठ है।

(३) प्रतिष्ठापाठ में—

(आचार्य श्री वसुविंदु-अपरनाम जयसेनाचार्य द्वारा रचित) प्रतिष्ठापाठ जो कि वीर सं. २४५२ में प्रकाशित है। उसमें भी प्राचीन पाठ है। साहु में ‘हु’ हृस्व है। ‘लोगोत्तुमा’ पाठ है। इसमें भी चत्तारिमंगल के पाठ के अंत में अनादि सिद्ध मंत्र लिखा है।[७]

(४) प्रतिष्ठातिलक—

यह वीर सं. २४५१ में सोलापुर से प्रकाशित है इसमें भी बिना विभक्ति का प्राचीन पाठ है। साहु में ‘हु’ हृस्व है। लोगुत्तमा पाठ है।[८]

(५) ज्ञानार्णव—

इस प्राचीन ग्रंथ में भी बिना विभक्ति का प्राचीन पाठ है। यह विक्रम सम्वत् १९६३ से लेकर कई संस्करणों में वि. सं. २०५४ तक में प्रकाशित है। इसमें ‘साहु’ में ‘हु’ सर्वत्र हृस्व है। ‘लोगुत्तमा’ पाठ है। ज्ञानार्णव में चत्तारिमंगल के बारे में एक श्लोक में लिखा है—

मङ्गल शरणोत्तमपद निकुरम्बं यस्तु संयमी स्मरति।
अविकलमेकाग्रधिया स चापवर्गश्रियं श्रयति।।५७।।
[९]

अर्थ — जो संयमी मुनि एकाग्र बुद्धि से मंगल, शरण, उत्तम इन पदों के समूह का स्मरण करता है वह मोक्षलक्ष्मी का आश्रय करता है। वह मंगलकारक उत्तम पदों का समूह चत्तारिमंगल पाठ है। सभी प्राचीन ग्रंथों में बिना विभक्ति का ही पाठ है पुनः यह संशोधित पाठ क्यों पढ़ा जाता है ? क्या ये पूर्व के आचार्य व्याकरण के ज्ञाता नहीं थे ? इन आचार्यों की कृति में परिवर्तन, परिवर्धन व संशोधन कहाँ तक उचित है ? मैंने पं. सुमेरचंद दिवाकर, पं. पन्नालाल साहित्याचार्य, प्रो. मोतीलाल कोठारी, फल्टन आदि अनेक विद्वानों से चर्चा की थी। ये विद्वान भी प्राचीन पाठ के समर्थक थे। एक बार पं. पन्नालाल जी सोनी व्यावर वालों ने कहा था कि जितने भी प्राचीन यंत्र हैं व प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ हैं, सभी में बिना विभक्ति का प्राचीन पाठ ही मिलता है। अतः ये ही प्रमाणीक है। यह विभक्ति सहित अर्वाचीन पाठ श्वेताम्बर परम्परा से आया है ऐसा पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य ने कहा था। जो भी हो, हमें और आपको प्राचीन पाठ ही पढ़ना चाहिए। सभी पुस्तकों में प्राचीन पाठ ही छपाना चाहिए व मानना चाहिए। नया परिवर्धित पाठ नहीं पढ़ना चाहिए।


टिप्पणी

  1. क्रिया कलाप-पृ. ८९, १४४ (वीर सं. २४६२ में प्रकाशित)।
  2. प्रतिष्ठासारोद्धार पृ. ८१।
  3. सामायिक भाष्य पृ. १३ (श्री प्रभाचंद्राचार्य द्वारा ‘देववंदना (की संस्कृत में यह पाठ है।)।
  4. श्रमणचर्या—पृ. १०, १६, ३७, ४९।
  5. प्रतिष्ठासारोद्धार अध्याय-३ पृ. ८१।
  6. प्रतिष्ठासार संग्रह-पृ. ५।
  7. प्रतिष्ठापाठ पृ. ८१।
  8. प्रतिष्ठातिलक पृ. ४०।
  9. ज्ञानार्णव—पृ. ३०९, ३०८।