Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


डिप्लोमा इन जैनोलोजी कोर्स का अध्ययन परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा प्रातः 6 बजे से 7 बजे तक प्रतिदिन पारस चैनल के माध्यम से कराया जा रहा है, अतः आप सभी अध्ययन हेतु सुबह 6 से 7 बजे तक पारस चैनल अवश्य देखें|

१८ अप्रैल से २३ अप्रैल तक मांगीतुंगी सिद्धक्ष्रेत्र ऋषभदेव पुरम में इन्द्रध्वज मंडल विधान आयोजित किया गया है |

२५ अप्रैल प्रातः ६:४० से पारस चैनल पर पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा षट्खण्डागम ग्रंथ का सार प्रसारित होगा |

चन्दनामती-काव्य पच्चीसी

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चन्दनामती-काव्य पच्चीसी

रचयित्री - ब्र.कु. सारिका जैन (संघस्थ)
दोहा-

वीतराग सर्वज्ञ को, नमूँ चित्त हरषाय।
जिनवाणी के नमन से, बोधिज्ञान मिल जाय।।१।।

श्रीगुरुओं की अर्चना, चारितनिष्ठ बनाए।
तीन रत्न की भक्ति से, रत्न तीन मिल जाएं।।२।।

ज्ञानमती जी मात की, शिष्या ‘‘छोटी मात’’।
प्रज्ञाश्रमणी चंदना-मती जगत् विख्यात।।३।।

उनकी काव्य पच्चीसिका, लिखने का पुरुषार्थ।
करना चाहूँ अल्पमति, यदि लेखनि दे साथ।।४।।

-चौपाई-

धन्य टिकैतनगर की धरती, होती जहाँ धर्म की वृष्टी।।१।।

छोटेलाल-मोहिनी जी से, जन्मे तेरह रत्न सुखद थे।।२।।

पहली रत्न ज्ञानमति माता, सब जग जिनको शीश झुकाता।।३।।

उनकी शिष्या प्रज्ञाश्रमणी-पूज्य चन्दनामति माताजी।।४।।

जन्मीं ज्येष्ठ बदी मावस में, सन् उन्निस सौ अट्ठावन में।।५।।

ग्यारह वर्ष की उम्र हुई जब, ब्रह्मचर्य व्रत धार लिया तब।।६।।

सन् उन्निस सौ इकहत्तर से, गुरु की सन्निधि में आ करके।।७।।

क्रम-क्रम से अध्यन-अध्यापन, गुरुसेवा-वैयावृत्ति-लेखन।।८।।

जम्बूद्वीप ज्ञानज्योती में, किए अनेकों ही प्रवचन हैं।।९।।

दीक्षा के शुभ भाव हुए जब, ज्ञानमती माताजी ने तब।।१०।।

ईसवी सन् उन्निस सौ नवासी, तिथि श्रावण शुक्ला एकादशि।।११।।

दीक्षा देकर धन्य किया था, नाम ‘‘चन्दनामती’’ दिया था।।१२।।

दीक्षा के पश्चात् बंधुओं!, की है पदयात्राएँ अनेकों।।१३।।

प्रतिभा दिन-दिन लगी निखरने, कई ग्रंथ रच दिए आपने।।१४।।

इसीलिए तो टी.एम.यू. ने, पीएच.डी. की पदवी दी है।।१५।।

इनकी गुरुभक्ती विशेष है, देती रहतीं सदुपदेश हैं।।१६।।

इनमें खूब भरी करुणा है, प्रेम-अहिंसा-दया-क्षमा है।।१७।।

पूज्य-पवित्र सदा तन-मन है, सागर सम गंभीर वचन हैं।।१८।।

आगम के अनुसार क्रिया हैं, अति प्राचीन शुद्ध चर्या है।।१९।।

शान्ति सिंधु की परम्परा के, लिए सदा तन-मन अर्पित है।।२०।।

परम्परा से डिगते जन को, देती हैं सम्बोधन उसको।।२१।।

देती रहतीं शिक्षा सबको, जिनवचनों पर श्रद्धा रक्खो।।२२।।

कैसी हो विपरीत परिस्थिति, धैर्य-धर्म-गुरु देंगे शक्ती।।२३।।

ऐसी मात चन्दनामति की, जय-जयकार करें हम नित ही।।२४।।

यही प्रार्थना करें प्रभू से, रहें स्वस्थ-दीर्घायु सदा ये।।२५।।

प्रज्ञाश्रमणी मात का, काव्य पचीसी पाठ।
पढ़ने-सुनने से सदा, मिले ज्ञान का लाभ।।१।।

वीर संवत् पच्चीस सौ, उनतालिस यह वर्ष।
तिथि वैशाख सु अष्टमी, मन में है अति हर्ष।।२।।

छोटी सी रचना रची, छोटी बुद्धि लगाय।
माताजी में गुण बहुत, शब्दों में न समाय।।३।।

कभी मुझे मिल जाए यदि, शब्दों का भण्डार।
करूँ ‘‘सारिका’’ मैं तभी, सुन्दर ग्रंथ तैयार।।४।।