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चन्द्रगुप्त मौर्य व उनकी कृति सुदर्शन झील

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चन्द्रगुप्त मौर्य व उनकी कृति सुदर्शन झील

सुदर्शन झील पश्चिम भारत के सौराष्ट्र देश के गिरिनगर स्थित गिरनार पर्वत की प्रान्तीय नदियों पर बांध बांधकर चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा बनवाई गई थी। इस झील के सन्दर्भ में समय-समय पर अनेक विद्वानों ने लिखा है किन्तु कहीं पर भी पूर्ण जानकारी न मिलने से इस झील का इतिहास अधूरा जान पड़ता है। इस लेख के माध्यम से इस झील व झील के निर्माता की विस्तृत जानकारी देने का प्रयास किया गया है। आशा है पाठकगण इससे लाभन्वित होंगे। इसके लिए सर्वप्रथम मौर्य वंशी सम्राट चन्द्रगुप्त के इतिहास पर एक दृष्टि डालनी अति आवश्यक है।

कलिंगजिन (आद्य तीर्थंकर वृषभदेव) मूर्ति पूजक एवं जैन धर्मोपासक नंद वंश के अंतिम नरेश धननन्द को पराजित कर चन्द्रगुप्त मौर्य ने पाटली पुत्र (वर्तमान पटना) के राज सिंहासन को एक धार्मिक और शक्तिशाली सम्राट के रूप में सुशोभित किया व मगध में मौर्य वंश के शासक की स्थापना की।

कौटिल्य अर्थशास्त्र, कथासरित्सागर तथा बौद्ध साहित्य के अनुसार आप एक क्षत्रिय राजा थे।[१] विष्णुपुराण एवं मुद्राराक्षक के अनुसार उसे नन्दराजा की शूद्रा दासी मुरा या धर्मघाती जाति की पत्नी से उत्पन्न कहा गया है।[२]इतिहासकार बी.पी. सिन्हा की मान्यता है कि मगध उस काल में आर्येतर समाज का दुर्ग था तथा आर्यगण उस क्षेत्र के निवासियों को व्रात्य कहते थे। अब क्योंकि चन्द्रगुप्त विस्तृत मगध क्षेत्र का स्थानीय नायक था, अत: वह उपेक्षित रहा।[३] पाश्चात्य विद्वान् राईस डेविड्स के अनुसार चूँकि चन्द्रगुप्त जैन धर्मानुयायी हो गया था इसी कारण जैनेतरों द्वारा वह अगली दस सहस्राब्दियों तक इतिहास में नितान्त उपेक्षणीय रहा।[४] इतिहासकार टामस इस सम्राट को जैन समाज का महापुरुष मानते हैं[५] सुप्रसिद्ध विद्वान रैप्सनने इस सम्राट को इतिहास का लंगर (The Sheet anchor of Indian chronology) कहा है।[६]

यूनानी दूत मैगिस्थिनीज भी यही लिखते हैं कि चन्द्रगुप्त ने ब्राह्मणों के सिद्धांत के विरोध में श्रमणों (जैनों) के उपदेश को स्वीकार किया था।[७] यूनानी ग्रीक इतिहासकारों ने इसे सैण्ड्रोकोट्टस माना है[८] जिसकी पुष्टि सर विलियम- जोन्स भी करते हैं।[९]

उपरोक्त अनेक विद्वानों व पुराणकारों के अध्ययन से पता चलता है कि मोर्य सम्राट चन्द्रगुप्त भारतीय इतिहास का अद्वितीय अमिट और अविस्मरणीय प्रकाश स्तम्भ है। ऐसे प्रतिभाशाली उदार और सौम्यदृष्टि सम्राट ने हारकर भागते हुये नन्द नरेश राजा धननन्द की पुत्री सुप्रभा के आग्रह पर राजकुमारी सुप्रभा के साथ विवाह कर उसे मगध राज्य की सम्राज्ञी बनाया। राज्य आरोहण के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने भारतीय पश्चिमी सीमा को यूनानी परतन्त्रता से मुक्त कराकर अपनी शक्ति और समृद्धि को उत्तरोत्तर वृद्धिंगत किया। विशाल वाहिनी के बल पर उसने सम्पूर्ण आर्यावर्त (उत्तरी भारत) पर अपनी विजय पताका फहराई। मालवा गुजरात और सौराष्ट्र देश पर विजय प्राप्त कर उसने नर्मदा तक साम्राज्य का विस्तार किया।[१०] यूनानी शासक सिकन्दर के पश्चात् उसका सेनापति सिल्यूकस मध्य एशिया के प्रान्तों का शासक बना और वह भी सिकन्दर के सामान भारत विजय करने आया परन्तु र्दुभाग्यवश उसे सम्राट चन्द्रगुप्त से अपमानजनक हारकर मुँह की खानी पड़ी। चन्द्रगुप्त ने उसके प्रयासों को विफल कर दिया। विवश होकर सिल्यूकस को सन्धि करनी पड़ी तथा पंजाब, सिंध अफगानिस्तान, सिंधु नदी के पश्चिम में एरियाना (हेरात, आफगानिस्तान का प्रान्तीय नगर)[११] पेरापेनीसड़ाई एरिया (काबुल घाटी), (प्राचीन कुंभा अथवा काबुल नदी के किनारे बसा नगर, जो आधुनिक अफगानिस्तान की राजधानी है।)[१२] (अराकोसिया (कन्दहार (अफगानिस्तान का दूसरा बड़ा नगर, जो एक महत्वपूर्ण मंडी भी है)[१३] बलूचस्तिान (भारतीय उपमाहद्वीप के पश्चिम में किरथर पर्वत श्रंखला के उस पार स्थित)[१४] आदिस्थान सम्राट को समर्पण कर दिए।[१५]

सम्राट के इस बल को देखकर सिल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेन का विवाह भी चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया तथा चन्द्रगुप्त ने सिर्फ ५०० हाथी सेनापति सिल्यूकस को उपहार स्परूप भेंट दिए।[१६] सिल्यूकस का दर्प चूर कर उत्तरपश्चिम में हिन्दूकुश पर्वत तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। समस्त उत्तरीय भारत को एक समुद्र को दूसरे समुद्र से मिलाकर उस पर एक छत्र साम्राज्य स्थापित कर लिया।[१७] इन्हीं उपलब्धियों के कारण चन्द्रगुप्त की गणना भारतीय इतिहास के महान और सर्वाधिक सफल सम्राटों में होती हैं।[१८]

युद्ध विजय के लगभग २ वर्षों के उपरांत सिल्यूकस निकेतर ने यूनानी राजपूत मेगस्थनीज को पाटली पुत्र दरबार में भेजा था। उसनें अपनी इंडिका नामक पुस्तक में पाटली पुत्र नगर के वर्णन के साथ-साथ उस समय के रीति-रिवाज का वर्णन किया था।[१९]

उनके अनुसार यह नगर सोन एवं गंगा नदी के संगम पर (आधुनिक दीनापुर के निकट) बसा था तथा इसका महल ऐश्वर्य और वैभव में सूसा और इकबताना के महलों को भी मात कराता था।[२०] इस नगर के चारों तरफ एक काठ की दीवार बनी थी, जिसमें ६४ फाटक तथा ५७० बुर्जियाँ थी। इस दीवार के चारों तरफ गहरी खाई थी, जिसमें सोन नदी का जल भरा रहता था।[२१] मौर्य सम्राट के शासनकाल में पाटली पुत्र को भारतीय साम्राज्य का केन्द्रस्थान प्राप्त होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और यह बहुत समय तक स्थित भी रहा।[२२]

तीर्थंकर वृषभदेव से भगवान महावीर की परंपरा के सूत्रधार पंचम अंतिम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहु स्वामी के शिष्य जैन मतावलंबी सम्राट मौर्य ने अपने शासन के सिद्धान्त प्रजाजन का कल्याण एवं नागरिक सुविधाओं को उपलब्ध कराने का रखा था। भ. ऋषभदेव की षट्क्रिया में प्रधान कर्म कृषि कार्य को बढ़ावा देने के लिए अनेक प्रयत्न किये थे। जिनमें दूरस्थ प्रांतों में खेती के लिए सिंचाई के साधन उपलब्ध कराए गये थे। राज्य में सिंचाई आदि के सर्व सुलभ साधनों का प्रयोग किया जाता था।

कमलापति त्रिपाठी का कथन है कि मौर्यकाल में सिंचाई के लिए चार प्रकार के साधनों का प्रयोग किया जाता था– हाथों द्वारा सिंचाई करना, कंधों द्वारा पानी ले जाकर सिंचाई करना, स्रोत से यंत्रों द्वारा सिंचाई करना तथा नदी सरोवर तालाब और कूपों द्वारा सिंचाई करना।[२३] त्रिपाठी जी आगे कहते हैं कि मौर्यसम्राट के काल में पश्चिमीय प्रान्त के शासक पुष्यगुप्त ने गिरिनगर की पहाड़ी की एक नदी पर बांध बनवाया था। जिसके कारण वह झील रूप में परिवर्तित हो गई और उसका नाम सुर्दशन झील रखा गया।[२४]

भारतीय इतिहास कोष के अनुसार चन्द्रगुप्त मोर्य ने सौराष्ट्र में पुष्यगुप्त नामक एक वैश्य को अपना राष्ट्रीय प्रतिनिधि नियुक्त किया था, जिसने वहाँ की एक नदी पर बांध बनाकर प्रसिद्ध सुर्दशन झील का निर्माण कराया।[२५]

जे.एच. दबे के अनुसार चन्द्रगुप्त इस झील का निर्माण किसी अज्ञात राजा ने कराया था, जो अपरकोट से अश्वत्थामा गिरि तक स्वर्ण सिक्ता और पलासिनी नदी को घेरती हुई २६८ एकड़ भूमि में बनी थी। From the edicts of Ashoka it appears that this place and the town of Junagarh were famous during Maurgan times. On this very stone Containing edicts of Ashoka there is the inscriptiopn of the 2nd century A.D. of Kshatrapa Rudradaman. It records the repairing of the sudarshan talao, which was originally built by some unknown king, repaired by Ashoka and subsequently further repaired by Rudradaman and Skanda Gupta. The Gupta Emperor through his victory, Chakra Patila, again repaired this talao in A.D.455-56

Scholars believe that this sudarshana lake started from the Aswatthama hill, went up to the walls of uperkot, and was bounded by river Suvarna Rekha or Sonarekh and river Palasini. The Area of this lake was considered to be 268 acres.

चन्द्रगुप्त के राज्य में कृत्रिम नहरों का निर्माण करके कृषि कार्य में सहायता पहुँचाई जाती थी।नदियों पर बांध बांधे जाते थे। सरोवरों कूपों के निर्माण के साथ-साथ उनकी मरम्मत भी करवाई जाती थी। वर्षा के जलको एकत्रित करने के लिए नदियों के किनरे झीलें बनवाई जाती थीं, क्योंकि जल ही खेती बाड़ी का आधार था। इस लिए इस बात का पूरा प्रबन्ध किया जाता था कि प्रत्येक मनुष्य को आवश्यकतानुसार पर्याप्त जल भी उपलब्ध हो सके और जल की अधिकता से राज्य में खेती व व्यापार की हानि भी न हो सके।

इसी भावना से प्रेरित होकर मौर्य सम्राट ने ई.पू. ३७२ में उज्जयिनी को राजधानी बनाकर दक्षिण देशों को दिग्विजय करने के लिए प्रयाण किया और सौराष्ट्र नगर में प्रवेश किया। प्रथमत: गिरनार पर्वत पर विराजित भगवान नेमि जिन की वन्दना की पश्चात् पर्वतराज पर निग्र्रन्थ मुनियों के निवास के लिए वसतिका (गुफा) का निर्माण कराया, जो चन्द्रगुफा के नाम से विख्यात है।

तथा पर्वतराज की तलहटी में अश्वत्थामा गिरि से अपरकोट तक अपने राज्यपाल ‘‘पुष्यगुप्त’’ वैश्य की देख-रेख में आस-पास के क्षेत्रों में सिंचाई करने हेतु पर्वतीय नदी सुवर्णरेखा या सोनरेखा (स्वर्णसित्का) और पलासिनी नदी पर बांध बांधकर २६८ एकड़ भूमि में ‘‘सुदर्शन’’ नामक विशाल झील का निर्माण कराया।

इस झील का नाम सुदर्शन रखने का एक धार्मिक मन्तव्य है। प्रत्येक तीर्थंकर के काल में दस-दस अंत:कृत (उपसर्ग) केवली होते हैं। भगवान महावीर के शासनकाल में दस अंत:कृत केवलियों में से पाँचवें अंत:कृत केवली का नाम ‘सुदर्शन’ था। सुदर्शन पूर्व भव में सेठजी के यहाँ गोप नामक ग्वाला थे। ये एक समय गंगा नदी में फंस गए ओर महामंत्र का स्मरण करते-करते प्राण निकल गए। उस मंत्र के प्रभाव से उसी सेठजी के घर में पुत्र उत्पन्न हुए। अपने जीवन में मित्र-पत्नी, राजपत्नी (रानी) वैश्या आदि अनेकों स्त्रियों की कुदृष्टि से बचते हुए उपसर्ग सहते रहे और महामंत्र के प्रभाव से बचते रहे। अन्त में संसार शरीर भोगों से विरक्त होकर आत्म कल्याण कराने वाली दिगम्बरी दीक्षा ग्रहण कर श्मशान में ध्यानारूढ़ हो गए।वहाँ भी व्यंतरी के उपसर्ग को सहना पड़ा। उपसर्ग विजयी मुनिराज ने घातिया कर्मों का क्षय करके केवलज्ञान को प्राप्त किया तथा व्यंतरी ने भी उपदेश ग्रहणकर सम्यक्त्व भाव धारण किया। अपनी आयु को पूर्ण कर उपसर्ग-विजयी केवली भगवान सुदर्शन ने मुक्ति-रमा का वरण किया।[२६] उन केवली भगवान सुदर्शन की निधीधिका (चरणछत्री) मगधाधिपति सम्राट मौर्य की राजधानी पटना के गुलजार बाग में बनी हुई थी। सम्राट मोर्य संसारी बैर भाव को भुलाकर मोक्षपद में स्थित कराने वाले महामंत्र के आराधक थे ओर सुदर्शन केवली के उज्ज्वल चारित्र, उपसर्ग और महामंत्र के प्रभाव से भी अत्यंत प्रभावित थे। संभवत: उन्हीं की स्मृति स्वरूप केवली सुदर्शन के नाम पर स्वर्णसिक्ता और पलासिनी नदी पर बांध बांधकर बनने वाली झील का नाम ‘‘सुदर्शन झील’’ रखा गया जो सम्राट के पूर्व से पश्चिम तक के एक सूत्र शासन का प्रतीक थी।

सम्राट ने अनेक स्थलों पर धर्मायतनों का निर्माण कराकर सौराष्ट्र मार्ग से होते हुये महाराष्ट्र में प्रवेश किया तथा महाराष्ट्र कोंकण, कर्नाटक, तमिलदेश पर्यन्त समस्त दक्षिण भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। लगभग २४ वर्षों तक शासन करने के उपरांत अपने गुरु पंचम अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी से बारह वर्ष का अकाल जानकर संसार शरीर भोग से वैराग्य हो गया। अपने पुत्र बिन्दुसागर को राज्य देकर वे दिगम्बरी दीक्षा धारण कर मुनि बन गए। अपने गुरु के साथ दक्षिण दिशा की ओर प्रयाण किया वहां कटवप्र या कुमारी पर्वत पर अपने गुरु का संन्यासपूर्वक समाधिमरण कराया। १२ वर्ष के अकाल के पश्चात् देश-देशान्तर भ्रमण करके अंत में जिस स्थान पर भद्रबाहु स्वामी ने समाधिमरण पूर्वक नश्वर देह का त्याग किया था उस स्थान पर पहुँच गए। मान्यता है कि दक्षिण प्रांत के जिय कटवप्र या कुमारी पर्वत पर चन्द्रगुप्त मुनि ने तपस्या की थी व सल्लेखना पूव्रक शरीर का त्याग किया था इस घटना की स्मृति में वह पर्वत ‘चन्द्रगिरि’’ पर्वत कहलाया।[२७]

सम्राट की मृत्यु के उपरांत उनके पौत्र अशोक के शासनकाल में स्वयं अशोक ने भी अपने पश्चिमी प्रान्तीय यवन शासक तुषास्फ से इस सुर्दशन झील से नहरें निकलवार्इं थी।[२८]

सम्राट अशोक के पश्चात् ई. सन् १५० में रुद्रदामन ने इस झील का बांध टूट जाने पर उसका पुनर्निर्माण कराया।[२९] सन् ४५६-५७ ई. में स्कन्दगुप्त ने अपार धन खर्च करके इस झील का पुन; निर्माण कराया था। स्कन्दगुप्त ने साम्राज्य के भू-भाग पर पर्णदत्त को नियुक्त किया तथा पर्णदत्त ने शासन संचालन के लिए अपने पुत्र चक्रपालित को नियुक्त किया। चक्रपालित की देख-रेख में ही इस झील का पुनर्निर्माण किया गया। यथा स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ शिलालेख वर्ष १३६-३७ के अनुसार-गुप्तकाल के १३६ वें वर्ष (ई. सन् ४५५-५६) में भाद्रपद मास (अगस्त-सितम्बर) के छटे दिन रात्रि में भारी वर्षा के कारण सुदर्शन झील (जो कि गिरनार की तली में चारों ओर फैली घाटी में कण्ठनाली- जिसमें कि यह अभिलेख मिलता है– के पार बने हुए एक प्राचीन बांध निर्मित हुआ था) फूट पड़ा। बांध के पुनर्नवीनीकरण द्वारा विदारण का पुन: निर्माण चक्रपालित की आज्ञा से दो महीने के उपरांत वर्ष एक सौ सैंतीस में (ई. सन् ४५६-५७) में सम्पन्न हुआ।[३०]

इस प्रकार लगभग ८०० वर्षों तक मोर्य सम्राट द्वारा निर्मापित ‘‘सुदर्शन’’ झील से पश्चिमी देशों में सिंचाई का कार्य सुचारु रूप से चलता रहा। वर्तमान सरकार को इसका पुन: जीर्णोद्धार कराना चाहिए क्योंकि इस प्रकार के रचनात्मक कार्यों से प्राचीन भारतीय कृषि एवं सिंचाई व्यवस्था को अभूतपूर्व गौरव प्राप्त होता है।

टिप्पणी

  1. भद्रबाहु चाणक्य चन्द्रगुप्त प्रस्तावना पृ. २० डा. राजाराम जैन
  2. वही पृ.- २०
  3. वही पृ.- २०
  4. वही पृ.- २२
  5. वही पृ.- २२
  6. वही पृ.- २२
  7. वही पृ.- २२
  8. वही पृ.- २२
  9. वही पृ.- २२
  10. भारतीय इतिहास कोष पृ.- १४३
  11. वही पृ.- ५०२
  12. वही पृ.- ८९
  13. वही पृ.- ७२
  14. वही पृ.- २६५
  15. वही पृ.- १४३-४४, ४८४ व ३८७-८८
  16. वही पृ.- ४०४
  17. वही पृ.- १४३ तथा मौर्यकालीन भारत पृ.- १५
  18. भा.इ. को पृ.- १४४
  19. वही पृ.- १४४ व ३८०
  20. वही पृ.- १४४
  21. मौर्यकालीन भारत-कमलापति त्रिपाठी पृ.- १५
  22. वही पृ.- १५
  23. वही पृ.- ८५
  24. वही पृ.- ८७
  25. भ.इ. को पृ. 245 & Age of The nandas & Mauryas by A.K. Neelkant Shastri Page 155,
  26. सुदर्शण चरिउ-मुनि नयनन्दि रु. १०४३ प्राकृत जैन शोध संस्थान से प्रकाशित रामचन्द्र मुमुक्षु कृत पुण्यास्रव कथा कोष जीवराज जैन ग्रंथमाला से प्रकाशित चतुर्थ संस्करण सन् २००६ पृ. ८४-८५, हरिषेणाचार्य कृत बृहत्कथाकोष: सिंधि जैन ग्रंथमाला बम्बई सन् १९४३ पृ. १९६-१३१, प्रभाचन्द्राचार्य कृतकथा कोष: मणिकचन्द्र दि. जैन ग्रंथमाला प्रथम संस्करण सन् १९७४ पृ. ४२-४३ तथा भगवती आराधना, शिवकोटि आचार्य कृत विजयोदया टीका अपराजितसूरि, भा.टीका-पं कैलाशचन्द्र जी शास्त्री जीवराज जैन ग्रंथमाला सोलापुर से प्रकाशित, तृतीय संस्करण सन् २००६, पृ. ४७४ गाथा ७५८
  27. भद्रबाहु चा.कथानक प्रस्तावना एवं जैन साहित्य का इतिहास पूर्व पीठिका पृ. १८४-८५
  28. मौर्यकालीन भारत पृ.- ८७
  29. वही पृ. ८७
  30. भारतीय अभिलेख संग्रह भाग ३ सं. १४ by Dr. फ्लीट,
प्रतिष्ठाचार्य संदीप कुमार जैन,डी-२/२० जनकपुरी, नई दिल्ली-५८,अनेकान्त ६०/१-२ पृ. ५३ से ६०