चरित्त :

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चरित्त :

चारित्तं समभावो
—पंचास्तिकाय : १०७

समभाव ही चारित्र है।

असुहादो विणिवित्ती, सुहे पवित्ती य जाण चारित्तं।
—द्रवसंग्रह : ४५

अशुभ से निवृत्ति और शुभ में प्रवृत्ति करना—इसे ही चारित्र समझना चाहिए।

थोवम्मि सिक्खिदे जिणइ, बहुसुदं जो चरित्तसंपुण्णो।

जो पुण चरित्तहीणो, िंक तस्स सुदेण बहुएण।।

—मूलाचार : १०-६

चारित्रसम्पन्न का अल्पतम ज्ञान भी अधिक है और चारित्रहीन का बहुत अधिक शास्त्रज्ञान भी निष्फल है