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गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल पदार्पण जन्मभूमि टिकैतनगर में १५ नवंबर को

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

चलो कुण्डलपुर चलना है

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चलो कुण्डलपुर चलना है

भगवान महावीर स्वामी का २६००वाँ जन्मकल्याणक महोत्सव वर्ष पूरे जैन समाज द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों के साथ मनाया जा रहा था परन्तु जहाँ उन्होंने जन्म लिया था उस भूमि की ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया। जब पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने यह सुना कि कई वर्षों से भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर में मात्र एक छोटे से मंदिर के सिवाय और कुछ नहीं है, तब उन्होंने चिन्तन किया कि भगवान महावीर जन्मकल्याणक वर्ष में जन्मभूमि का विकास अत्यन्त आवश्यक है, ऐसा विचार करते ही उनके मुख से सहसा निकल पड़ा-

‘‘चलो कुंण्डलपुर चलना है, वीर को वंदन करना है।

महावीर की जन्मभूमि में, उत्सव करना है।।

और इसी के साथ ही पूज्य माताजी के कदम २० फरवरी २००२ को राजधानी दिल्ली के इण्डियागेट से कुण्डलपुर की ओर बढ़ चले तथा ‘‘तीरथ विकास क्रम जारी है, अब कुण्डलपुर की बारी है’’ जैसे नारों से धरती-अम्बर को गुंजायमान करते हुए पूज्य माताजी २९ दिसम्बर २००२ को कुण्डलपुर पहुुँच गर्इं। उसी दिन भगवान महावीर मंदिर का शिलान्यास हुआ पुनः ७ फरवरी से १२ फरवरी २००३ तक भगवान महावीर की अवगाहना प्रमाण (सात हाथ की) चमत्कारी प्रतिमा का, भगवान ऋषभदेव की १४ फुट उत्तुंग पद्मासन प्रतिमा तथा त्रैकालिक चौबीसी की ७२ जिनप्रतिमाओं का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव विशाल स्तर पर सम्पन्न हुआ। फिर देखते ही देखते तीन जिनमंदिर निर्मित हो गए और उन पर सुन्दर कलात्मक शिखरों का निर्माण भी हो गया। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि मानो देवकारीगरों ने ही इतनी शीघ्रता से ये सब कार्य सम्पन्न कर दिए हैं। कुण्डलपुर के आसपास की ग्रामीण जनता तो यह सब कार्य देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित है। कई लोग तो कह देते हैं कि ‘‘ये सब मंदिर धरती से खुदाई में निकले हैं।’’ वास्तव में हमें एक छोटा सा मकान बनवाना होता है तो हम कई दिन तो सोचने में ही निकाल देते हैं पुनः उसका निर्माण होने मेें वर्षों निकल जाते हैं परन्तु कुण्डलपुर तीर्थ का निर्माण हमारे लिए एक अनुपम उदाहरण है। इस मौके पर मुझे पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा रचित भजन की पंक्तियाँ याद आ रही हैं-

श्री ज्ञानमती माताजी को हमने, तीर्थ बनाते देखा,

ये हैं इतिहास प्रणेता-२।।

मुझे इस बात का भी गौरव है कि पूज्य माताजी ने दिल्ली से कुण्डलपुर मंगल विहार में मुझे अपने संघसेवक के रूप में स्वीकार किया। संघपति कहकर माताजी एवं पूरा संघ मुझे जो वात्सल्य प्रदान करता है, वह मैं कभी विस्मृत नहीं कर सकता इनकी प्रेरणा से ही कुण्डलपुर के नूतन मुख्य जिनमंदिर में भगवान महावीर की अवगाहना प्रमाण श्वेत खड्गासन प्रतिमा विराजमान करने का महान सौभाग्य मेरे परिवार को प्राप्त हुआ है। अपने परिवार के कुलगुरु के रूप में सदैव इनकी छत्रछाया पाने की भावना रहती है। जिस प्रकार माताजी के अनुग्रह से मुझे अनेक तीर्थों की यात्रा, उनका जीर्णोद्धार-विकास एवं विशाल प्रतिमाएं विराजमान करने का पुण्य प्राप्त होता रहता है, उसी प्रकार मैं पूज्य माताजी से निवेदन करता हूँ कि मुझे अपने साथ सिद्धशिला तक की यात्रा अवश्य करवा दीजिएगा ताकि संसारसागर से शीघ्र ही पार हो सवूँâ। अन्त में युगपुरुष भगवान महावीर स्वामी को शत-शत नमन एवं इतिहास को पुनर्जीवित करने वाली पूज्य गणिनी माताजी के चरणों में शत-शत नमन।

-महावीर प्रसाद जैन (संघपति)
साउथ एक्स., दिल्ली