चातुर्मास स्थापना वर्षायोग धर्म विकास की आधारशिला हैं

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चातुर्मास स्थापना वर्षायोग धर्म विकास की आधारशिला हैं

स्मरण करूं जिनदेव का,

गुरू को उर में धार
जिनवाणी को ध्याय के,
नमन करूं शतबार
पानी से पूछा गया कैसा तेरा रंग

जैसी संगति मिल गई, वैसा मेरा रंग।।

संत समुदाय हमारे राष्ट्र की सर्वश्रेष्ठ पूंजी है। सर्वश्रेष्ठ धरोहर है। भारत संतों की जन्मभूमि है। भारतीय इतिहास में जैन श्रमणों का सर्वोपरी स्थान रहा है। वर्षायोग— चातुर्मास का प्राचीन नाम है ‘वर्षायोग’ आत्मसाधना हेतु जिसका स्वस्थ सुयोग। वनस्पति कायिक जीवों का विधात न होवे, अहिंसा धर्म की रक्षा हो, सब रहे निरोग!!!

धन्य है हमारे पूर्वाचार्य जिन्होंने वर्षायोग के विज्ञान को अहिंसामूलक धर्म की चाशनी में लपेटकर सहज ही श्रद्धा से मानव के गले में उतार दिया । शरीर मन और आत्मा तीनों तलों पर विरागी साधु को स्वास्थ्य संरक्षण की आध्यात्मिक औषधि थमा दी।

सांसारिक आपाधापी में फंसे मानव भोग— विलासों, भौतिक साधन सुविधाओं , राजनीति और अर्थतंत्र के कलापूर्ण चातुर्य की वैविध्यताओं से ग्रसित प्रमादों की चादर तानकर सोये अविवेकी जन के लिए ये चलते—फिरते तीर्थ (दिगम्बर जैन संत) कुछ समय के लिए ठहर जाते हैं। जागो, उठो चलो........ चातुर्मास एक धर्म पुरूषार्थ का समय है। ऐसे मौकों को चूकना नहीं चाहिए कारण चातुर्मास साल में सिर्फ एक बार आता है। चातुर्मास समर्पण—सेवा व संकल्प का त्यौहार है। यह ध्यान—साधन—प्रभावना का पर्व है।

वर्षायोग दो शब्दों से मिलकर बना है वर्षा और इसका योग। वर्षा का अर्थ है। पानी का बरसना और योग का अर्थ है जोड़ अर्थात् आकाश से वर्षा होती है और वह धरती से जुड़ जाती है और धरती से अंकुरण की उत्पत्ति होती है इसी प्रकार संत की वाणी रूपी वर्षा श्रावक रूपी भूमि में पहुँच जाती है तो धर्म संस्कारों का अंकुर प्रस्फुरित हो जाता है।

चातुर्मास के चार चरण

(१) दर्शनाराधना

(२) ज्ञानाराधना

(३) चरित्राराधना

(४) तपाराधना

‘इन चारों का अनुकरण करते हुए चातुर्मास आराधना में संलग्न चतुर्विध संघ की साधना में सहायक बनना चाहिये।’

चातुर्मास के महीने—

(१) आषाढ़ का महीना कहता है— आलस्य छोड़ो

(२) श्रावण का महिना कहता है— श्रावण की कला सीखो

(३) भाद्र महीना कहता है—भद्र परिणामी बनो वर्ना क्वार के महीने में कोरे रह जाओंगे।

मुनियों के लिए चातुर्मास का प्रतिष्ठान (शुभारम्भ) आषाढ़ सुदी चातुर्मास से शुरू होता है। वर्षायोग यदि निश्चित समय पर स्थापित न हो सका तो उसे सावन वदी पंचमी को भी स्थापित कर सकते है। चातुमार्स स्थापना मुनिराज अहिंसा महाव्रत को पालन करने के लिये करते हैं। चातुर्मास के पहले दिन मुनि वार्षिक प्रतिक्रमण करते हैं। चार महीने एक स्थान पर रहना यह मुनियों के दस कल्पों में दसवां ‘कल्पपाद्य’ नाम का स्थिति कल्प है। त्रस स्थावर जीवों की रक्षा के लिये मुनि १२० दिन एक स्थान पर रहते हैं। यह उत्सर्ग नियम है। कारणवश कम या अधिक भी रह सकते हैं। श्रावकों के लिये चातुर्मास भद्रता प्रदान करने वाला मोह नींद में सोए हुए संसारी जीवों के लिए महान पर्व है।

गुरू भक्ति — उपासना — वैयावृत्ति आदि द्वारा इन दिनों श्रावक का कर्तव्य हैं कि अधिक से अधिक ‘धर्म धारण करें’ इन दिनों में व्यापार का सीजन मंद रहने से धर्म का सीजन तेज रहता है। अत: श्रावकों को चातुर्मास पर्व के अमूल्य अवसर को चूकना नहीं चाहिए और जीवन में आत्मोत्थान को प्राप्त कर स्वर्णिम अवसर से लाभ प्राप्त लेना चाहिए।

ऋषभ देशना
जुलाई २०१४