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चैतन्य रत्नाकर लाला श्री छोटेलाल जैन

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चैतन्य रत्नाकर लाला श्री छोटेलाल जैन

श्रीमती त्रिशला जैन, लखनऊ
(१)

इक गांव बसा है छोटा सा जिसका नाम टिकैतनगर।
जहां सुबह सवेरे होती है तैयारी मंदिर की घर घर।।
है गुजरे एक सौ बीस बरस रहते थे धन्यकुमार वहां।
 भार्या थी उनकी फूलमती अच्छे धार्मिक संस्कार अहा।।

(२)

उनके थे चार पुत्र उसमें दूजें का छोटेलाल नाम।
जीवन उनका सीधा सादा अतिथि का करते सदा मान।।
यौवनावस्था के आते ही मोहिनी संग इनका व्याह किया।
बस इसी समय से जीवन का था शुरू नया अध्याय हुआ।।

(३)

है अवध प्रान्त के अन्तर्गत महमूदाबाद ग्राम छोटा।
प्यारी सी मोहिनी को जनकर क्या नानी ने सोचा होगा।।
आगे चलकर ये मेरी लाडली रत्नों की खानि कहायेगी।
इतने रत्नों को पैदाकर खुद ‘‘रत्नमती’’ बन जायेगी।।

(४)

दो पुत्र पुत्रियों से प्यारा परिवार बना नाना जी का।
सुखपालदास मत्तोदेवी यह नाम था नानानानी का।।
उस समय पुत्रियों को सारी शिक्षायें न दी जाती थी।
पर तीक्ष्ण बुद्धि माँ मोहिनी ने बिनपढ़े स्वयं ही पाली थी।।

(५)

जब महीपाल को उर्दू की शिक्षा देने घर आते थे।
तब पठन मौलवी का सुनकर दो कान स्वयं पढ़ जाते थे।।
पर भ्रातृप्रेम में लगकर वो ज्यादा आगे न पढ़ पाई।
लेकिन जितनी भी शिक्षा थी उसमें जो अव्वल थी आई।।

(६)

फिर जैसा होता आया है पुत्री पर घर की लक्ष्मी है।
करते चुनाव है मात पिता पर होता भाग्य यहां भी है।।
इसतरह भाग्य ले गया उन्हें श्री छोटे के सुंदर घर में।
उस सुंदर से घर में इतनी खुशियाँ आई अगले पल में।।

(७)

सब मातापिता को होती है पहली संतान बहुत प्यारी।
वैसा ही प्यारा नाम रखा मैना फुलों सी सुकुमारी।।
वह शरदपूर्णिमा दिन प्यारा सब ओर उजाला छाया था।
माँ मोहिनी देवी के घर में वो चांद उतरकर आया था।

(८)

जैसे जैसे वह बड़ी हुई वो ऐसी बाते करती थी।
सखियां जब कहे खेलने को वे मना उन्हें कर देती थी।।
मां के संग सारा काम करे शास्त्रों का नित स्वाध्याय करे।
और काम पिता के करने को हरदम मैना तैयार रहे।।

(९)

मातापिता और भाईबहन की सेवा ही बस जीवन था।
नहिं कोई शरारत करती थी और नहीं खेलने में मन था।।
एक बार एक नाटक देखा अकलंक और निकलंक नाम।
कीचड़ में पग रख कर धोना न रखना ये ही सही काम।।

(१०)

बस यही सूक्ति थी उतर गयी मन में वैराग्य समाया था।
छोटी सी वह में ही इनने घर से मिथ्यात्व भगाया था।।
एक समय भाईयों के ऊपर चेचक का बड़ा प्रकोप हुआ।
सब कहे गांव वाले बेटा यह तो माता का कोप हुआ।।

(११)

उनकी पूजा कर लेने से यह व्याधि तन से मिटती है।
पर बात गले से ना उतरी यह व्याधि तन की लगती है।।
वह रोज जिनालय जा करके अभिषेक सहित पूजा करती।
श्रद्धा से गंधोदक लाकर बच्चों के तन पर छिड़काती।।

(१२)

जिनभक्ती का प्रभाव देखो मैना की सेवा रंग लायी।
और दोनो भाई स्वस्थ हुए घर में थी खुशियां छायी।।
सब ओर प्रशंसा मैना की ये तो कोई देवी लगती ।
इसमें ही अलग बात सबसे इसमें तो है कोई शक्ति।।

(१३)

था पितु का प्रेम बहुत ज्यादा मैना से ही सब बात करें।
एक दिन बातो ही बातों में मैना से यह बतलाय रहे।।
इक गाहक आया था दुकानपर चादर ओढे बैठा था।
इस गर्मी में यह ऐसा क्यों मन में विचार आ बैठा था।

(१४)

मै देखरहा चोरी करते पर नहीं कहा उससे कुछ भी।
चोरी कर कितना खायेगा मन में विचार आ गया तभी।।
मैना अचरज से देख रही कैसा विशुध्द मन पाया है।
हैं पिता बड़े सीधे साधे ना लोभ न कोई माया है।।

(१५)

जब कभी कही बाहर जाते आकर पहले स्नान करें।
मंदिर की चाबी मंगवा कर पहले मंदिर प्रस्थान करें।।
मंदिर के दर्शन किए बिना वो भोजन न करते थे।
अन्याय अनीति के द्वारा व्यवसाय कभी न करते थे।।

(१६)

इस तरह समय था बीत रहा अब बात चली थी शादी की।
मैनाबिटियां का व्याह करूं थी खोज शुरू सुंदर वर की।।
पर यह क्या सुना उन्होंने जब मैना ने था इंकार किया।
मै शादी नहीं करूंगी माँ कहकर हैरत में डाल दिया।।

(१७)

दुनियां की ऊँच नीच बातें समझाकर बहुत डराया था।
ममता की जब हो गयी हार मामा ने तब धमकाया था।।
लेकिन सबकी बातो का वह हो शांतिचित्त उत्तर देती।।
सब मन ही मन में सोच रहे ऐसी न कहीं ढृढता देखी।।

(१८)

मैना की दृढ़ता ने देखो कैसा संयोग बनाया था।
आचार्य देशभूषण जी का मुनिसंघ घूमता आया था।।
इनके तो जैसे भाग्य खुले अच्छा मिल गया बहाना था।
मैना पिंजरे में कब रहती इनको तो इकदिन जाना था।।

(१९)

एक दिन कुछ समय देखकरके मुनिवर से इच्छा जतलायी।
हमको अपने संग ले चलिए पर घड़ी परीक्षा की आई।।
सबके विरोध को देख समझ महाराज श्री भी मौन रहे।
अर्जुन की तरह लक्ष्य रखना ‘‘मैना को थे संबोध रहे।।

(२०)

थी दुखी बहुत मैना बिटिया गुरूवर के संग ना जाने से।
पर पिता और चाचाताऊ थे खुशी बात मनवाने से।।
बोले बेटी मत रूदन करो जल्दी ही दर्श करायेगे।
सम्मेदशिखर में संघ बड़ा हम जल्दी ही ले जायेगे।।

(२१)

अब शुरू हुई जिद जाने की पर चिंता भी करती मां की।
उनकी प्रसूति का समय निकट दुख देख करे सेवा उनकी।।
मंत्रित जल सहस्रनाम का जब मैना ने मां को पिला दिया।
तब हुई वेदना दूर और इक कन्या रत्न का जन्म हुआ।।

(२२)

यहाँ बेटी को अभिशाप समझने वाले जरा ध्यान देंगे।
श्रीछोटेलाल जैन के शब्दों से वे सदा जान लेंगे।।
सब अपना भाग्य लिये आई पुत्री तो घर की लक्ष्मी है।
सबको समान ही प्यार करो, तो हर घर आती लक्ष्मी है।।

(२३)

दादी ने पूछा मैना से तुमने क्या दवा पिलायी थी।
मंत्रित जल का ये असर देख, सबको श्रद्धा हो आयी थी।।
फिर से मैना का शुरू हुआ गाना अब हमको जाना है।
मां कहती कुछ दिन और रूकों ममता कर रही बहाना है।।

(२४)

कैसे ये छोटा सा रवीन्द्र तुमबिन खायेगा सोयेगा।
जब पिता लौट कर आयेंगे तब कौन उन्हें उत्तर देगा।
उससे पहले ही आ जाना वरना खायेगें डांट बहुत।
तेरी वैराग्य कथाओं से पहले ही है नाराज बहुत।।

(२५)

वह हरदम यही कहा करते जाने क्या घुट्टी पिला दिया।
ना कभी खेलने जाती है तुमने वैरागिन बना दिया।।
इसकी तो बातें दुनियां के बच्चों से बड़ी निराली है।
ना पता इन्हे इनकी बिटियां तो कितनी महिमाशाली है।।

(२६)

तर्ज दे दी जगत को ........
तुमने तो मन रमा दिया इसका विराग में।
फिर किस तरह रहेगी घर मोहजाल में।।
पर मां की पारखी नजर ने था परख लिया।
ये सबके दुख को हरने वाली मेरी विशल्या।।

(२७)

अब मालती को गोद में लेकर किया था प्यार।
फिर सिलके अपने हाथो से पहनायी उसको प्रक।।
और आगयी जुदाई की वो आखिरी बेला।
लेकर चली वैलाश को जो साथ था खेला।।

(२८)

सब छोटे—छोटे भाई बहन रो रो के पूछते।
जीजी कहां पे जा रही है, मां से पूछते।।
बहला रही थी मां कहा लो बांध दो राखी।।
वे जानती थी लौटकर आयेगी ना कभी।।

(२९)

आतेही मैना बिटियां को लगे पुकारने।
ये जानकर वो है नहीं वो भी लगे रोने।।
मां ने कहा जा करके दो दिन बाद ले जाना।
अब दिल नहीं छोटा करो लो खा लो अब खाना।।

(३०)

दिन बीत रहे थे मगर जब वो नहीं आई।
मुनिराज के चरणों में उनने लौ थी लगाई।।
तब मातपिता उनको लिवाने को थे आये।
बेटी चलो अब घर तेरे बिन कुछ नहीं भाये।।

(३१)

उस दिन वहां आचार्यश्री का केशलोंच था।
आयी थी भारी भीड़ और भक्तों का शोर था।
इस बीच समय देखकर मैना लगी कहने।
दीक्षा हमेें दिला दो अब मुनिराज से कहके।।

(३२)

मैना ने फिर आचार्यश्री से जिद यही करी।
महाराज जी ने उनसे एक बात तब की।।
अबतक तुम्हारे पास अष्टमूलगुण नहीं।
इसके अलावा कोई व्रत भी तो लिया नहीं।।

(३३)

इस हेतु अभी थोड़े दिन अभ्यास तुम करो।
बोली तभी मैना विश्वास तो करो।।
जो भी कहेंगे व्रत वही पालन में करूंगी।
दीक्षा के नियम में कोई कमियां न करूंगी।।

(३४)

कहकर शुरू किया उन्होंने केशलोंच था।
यह देखकर जनता में मचा भारी क्षोभ था।।
माता ये दृश्य देखकर मूच्र्छित हुई वहीं।
छोटी सी मालती भी गोद में थी रो रही।।

(३५)

दु:ख से हुए विह्वल पिता जी उठ के थे गये।
दो दिन नही पता चाला जाने कहां गये।।
तब मां के मामाजी ने बढ़के रोक लिया हाथ।
कुछ तो रूको बेटी सुनो तुम पर मेरा अधिकार।।

(३६)

समझाबुझा के सबको थोड़ा शांत कर दिया।
जब सब चले गये तो समझाना शुरू किया।।
पर मैना ने लिया प्रभु के सामने नियम।
जब तक नहीं व्रत देंगे न उठेगे आज हम।।

(३७)

फिर रात भर चलती रहीं मां बेटी की बातें।
रोती हुई ममता करें मनुहार की बातें।।
लेकिन नहीं मैना का दिल जरा भी पसीजा।
वैराग्य की बातों से उनने मां को भी जीता।।
(३८)
कहने लगी मां काश में भी दीक्षा धारती।
तेरे ही साथ इन व्रतों को मैं भी पालती।।
पर हूं विवश संसार की इस मोह माया से।
उनको करूं मैं पूरी जो जुड़ी इस काया से।।
(३९)
मां को बहुत मना के मैना ने लिखा लिया।
रोती हुई मां कांपते हाथों से लिख दिया।।
गुरूदेव! ये व्रत चाहती वो इसको दीजिए।
विश् वास है मेरा नहीं कुछ शंका कीजिए।।
(४०)
यह पत्र लिख के मां ने कहा सुन मेरी बेटी।
जब मेरा समय आयेगा तब साथ तो दोगी।।
जैसा तुम्हें मैने दिया है आज सहारा।
वैसे ही भवोदधि से मुझको भी उबारना।।
(४१)
मैना बहुत ही खुशहुई और दे दिया वचन।
जब भी गृहस्थ धर्म से ये ऊब जाये मन।।
तब आना मेरे पास देंगे धर्म की छाया।
फिर बीस वर्ष बाद उनने करके दिखाया।
(४२)
ये पत्र दिया और कहा मेरी गुरूवर जी एक प्रार्थना है।
ममता से मैं मजबूर हुई कल से ना खाया जाना है।।
यह बात सदैव गुप्त रखना वरना ना जाने क्या होगा।
सबके वाणों बौछारों से जीना मेरा मुश्किल होगा।।
(४३)
ना जाने इसके पिता मेरा क्या हाल करेंगे ना मालूम।
मेरी ज्यादा धार्मिकता से पहले ही रहते थे नाखुश।।
उनको लगता उनकी बेटी मेरे कारण ही जुदा हुई।
ना पता उन्हें उनकी बेटी सारे ही जग से प्रथक हुई।।
(४४)
अब आज सुबह कुछ अलग हुई मैना की दृढ़ता रंग लाई।
संयोग बना था कुछ ऐसा फिर आज शरदपूनों आई।।
अट्ठारह वर्षीय बाला ने कैसा साहस दिखलाया था।
दृढ़ता में कितनी शक्ती है जग को उनने सिखलाया था।।
(४५)
दो दिन पश्चात् पिताजी को सुनसान जगह रोते पाया।
तब ताऊजी लेकर आये सबने मिल उनको समझाया।।
फिर मैना से बोले बेटी अब तो तुम चलो टिकैतनगर।
मंदिरजी में ही रहलेना चाहो तो ना जाना तुम घर।।
(४६)
पर मैना बोली सुनो पिताजी मोहकर्म रूलवाता है।
क्यों इतने समझदार होकर भी रखो इससे नाता है।।
अब तो मै दीक्षा लेकर ही अपनी नगरी में आऊंगी।
यह नियम लिया है प्रभुसम्मुख इसको आजन्म निभाऊँगी।।
(४७)
माँ तो ममता की मूरत है उनने तो कुछ भी नहीं कहा।
पर पिता बहुत नाराज हुए नहीं मिलूंगा जावो जहां।।
मां साड़ी और पैसे देकर कत्र्तव्य पूर्णकर चली गयी।
बाराबंकी की जनता भी यह द्दश्य देखकर पिघल गयी।।
(४८)
किस तरह सभी भाई बहना रो रो रहे दुहाई थे।
जीजी घर चलो चला जीजी कहकर ले रहे विदाई थे।।
पर मैना की आंखों से उसदिन एक नही आंसू निकला।
पत्थर से अधिक कठोर बनी बातों से ना पिघला।।
(४९)
आचार्यश्री विस्मित थे उनकी ऐसी दृढ़ता लखकर।
यह जग में नाम कमायेगी निश्चित जल्दी दीक्षा लेकर।।
ये जन्म मरण के दु:खों से अब जल्द छूटने वाली है।
निश्चित ही भव्य जीव है ये और कितनी भोली भाली है।।
(५०)
मैना अब सप्तम प्रतिमा ले मुनिवर के संघ बिहार किया।
रस्ते में शीतऋतु में भी विस्तर तक नहीं प्रयोग किया।।
ना बनी अभी साध्वी लेकिन वे साध्वी सी चर्यापालें।
उनकी ऐसी चर्चा लखकर आचार्यश्री भी थे माने।।
(५१)
अतिशय पुरी महावीर जी मे संघ आ गया।
और मैना की दीक्षा का भी समय था आ गया।।
आचार्य श्री ने शुभ मुहूर्त में दिया दीक्षा।
था चैत्र कृष्ण एकम का दिन बड़ा अच्छा।।
(५२)
गुण के ही अनुरूप उनका नाम रख दिया।
उनको बना के ‘‘बीरमती’’ कृतार्थ कर दिया।।
फिर कुछ समय के बाद अकस्मात आई मां।
माता बनी बेटी को नमस्कार किया हाँ।।
(५३)
फिर क्यों नहीं बुलाया गया ये किया गिला।
महाराज श्री के पस तब उत्तर उन्हें मिला।।
न घर में दी गयी थी इसलिए ये सूचना।
आकरके फिर से रोकेगें चाचा ताऊमामा।।
(५४)
कुछ दिन वहां रूककरके घर में जाके बताया।
सबको लगा धक्का मगर फिर सबने भुलाया।।
महावीर जी में लगता है हर चैत्र में मेला।
एक संघ और आने से था दृश्य अलबेला।।
(५५)
मेले के बाद विहार किया आचार्य देशभूषणजी ने।
वापस लखनऊ की ओर चले उनके सब शिष्य साथ में थे।।
सब श्रावकगण ने आकर गुरूवर से बहुत प्रार्थना की।
चलिए गुरूदेव टिकैतनगर हां कर दे बहुत कामना की।।
(५६)
था चतुर्मास का समय निकट सब लोग मनाकर हार गये।
पहले हो चुका विरोध बहुत इस कारण ना वे मान रहे।।
सबने तब कहा पिताजी से चलकर शायद तुम कहो तभी।
आयेंगे सुनकर चले तुरंत झुककरके क्षमायाचना की।।
(५७)
शायद ममता के वश होकर कटुशब्द कहे मैने गुरूवर।
स्वीकृति दें चातुमसि हेतु अब क्षमा करें और चलें नगर।।
होकर प्रसन् न आचार्यश्री ने चातुर्मास की स्वीकृति दी।
तब बेटी के दर्शन करके खुश होकर विदा वहां से ली।।
(५८)
इस चातुर्मास के अंतर्गत जो घटी बात बतलाते है।
हरदम स्वाध्याय लीन रहती तब कभी पिताजी आते है।।
ना कोई उनसे बात करें वे घंटो वैठे रहे वहां।
चर्या बेटी की देखदेख उनको मिलता था सु:ख महां।।
(५९)
इक दिन दादी आयी बोली बेटी कुछ सिक्के हैं रख लो।
माताजी ने तब कहा सुनों कुछ भी ना चाहिए अब मुझको।।
हमने सब परिग्रह छोड़ा है दो धोती मात्र परिग्रह है।
भोजन श्रावक दे देते है पुस्तक दे देते गुरूवर है।।
(६०)
यह सुनकर दादी दुखी हुई ये उम्र है सजने खाने की।
ना गहने जेवर ही पहना नादेखी खुशी जमाने की।।
ये मोहकर्म की है महिमा यह वीरमती जी सोच रहीं।
क्या खाया और नहीं पहना कुछ शाश्वत रहता यहां नहीं।।
(६१)
फिर भी यह प्राणी इन सबमें ही क्यों सुख माना करता है।
सच्चे सुख का ना भान इन्हें दुनियां में खोया रहता है।।
पर दुनियां वालो ने उसक्षण ऐसी न साधना देखी थी।
थी बालब्रह्यचारिणी पहली और संघ में सबसे छोटी थी।।
(६२)
ना पता चले दिन चातुर्मास के कैसे और कब बीत गये।
जब हुआ विहार नगरवासी और मातपिता भी दुखी भये।
सब लगे पुन: निजकार्यो में दुनियां का है दस्तूर यही।
मैना से छोटे पुत्र पुत्रियों की उनने शादियां करी।।
(६३)
करके विहार वे पुन: महावीर जी गये।
गुरू देशभूषण जी बहुत एक साथ चल रहे।
आदेश था गुरू का कि तुम अधिक नहीं चलो।
कमजोर है शरीर तुम पैदल नही चलो।।
(६४)
पर वीरमती क्षुल्लिका में आत्मशक्ति थी।
उनके हृदय में भरी बस जिनेन्द्रभक्ति थी।।
उनके ही साथ एक और थीं जो क्षुल्लिका।
थी वो विशालमती ख्याल रखती थी उनका।।
(६५)
उनसे सुनी आचार्य शांतिसागर की चर्चा।
मन था हुआ बेचैन उनकी करके को अर्चा।।
तब गुरू की आज्ञा लेके दर्शनार्थ वो गयी।
और आर्यिका की दीक्षा हेतु याचना करी।।
(६६)
आचार्य श्री शांतिसागर ने तभी कहा।
हमने तो अब दीक्षादि देना त्याग कर दिया।।
तुम जावो मरे शिष्य वीरसागर जी के पास।
हैं वृद्ध आर्यिकाएें वहां रहना उनके साथ।।
(६७)
वुंâथलगिरी में उनकी फिर समाधि थी हुई।
आचार्यपट्ट वीर सागर को दिया सही।।
दीक्षा की आस लेके आयी इनके संघ में।
और पास होती गयी परीक्षा की जंग में।।
(६८)
पाकरके दीक्षा आर्यिका की तृप्ति हो गयी।
और वीरमती से वे ‘‘ज्ञानमती’’ हो गयी।।
आचार्य वीरसागर का सानिध्य मिल गया।
फिर पहला वर्षायोग भी जयपुर में थ किया।।
(६९)
इनका विशद वर्णन अगर पढ़ना है देखिए।
लिक्खी ‘‘मेरी स्मृतियाँ’’ जो हम सबके है लिए।।
साहस और सहनशीलता की ये मिशाल है।
जो धर्म के इच्छुक बने उनकी ये ढाल हैं।।
(७०)
क्योंकि उन्होंने जाने कितने शिष्य बनाए।
कितनों को ज्ञाददान दिया शास्त्र पढ़ाए।।
ना है जरा भी मान उन्हें अपने ज्ञान का।
गुरूओं की भक्ति में ही सदा ध्यान है उनका।
(७१)
जयपुर की खानियां में फिर समाधि थी हुई।
गुरूवीरसिंधुने उन्हें शिक्षाएं यही दी।।
‘‘सुई का काम करना वैंची का ना कभी’’
‘‘गुरू जो कहें वह ही करों गुरू की नकल नही’’
(७२)
‘‘ना गांठ बांधकार रखना कभी भी सुधीजनो।
अनबन कभी हो जाये भी झटपट खतम करो।।’’
क्योंकि कषाय रखना है भवभव में दु:खदायी।
उनकी यही सूक्ति सदा ही काम है आयी।।
(७३)
उनका ही संघ उस समय सबसे विशाल था।
इक सूत्र में बंधा सबकुछ खुशहाल था।।
उनके ही पट्टधीश शिवसागर गुरू हुए।
इतना समय बीता मगर दर्शन नहीं किए।।
(७४)
इक दिन कहा एक आर्यिका ने ज्ञानमती से।
जब हैं तुम्हारे मातापिता क्यो ंजाते नही वे।।
तब उनने कहा घर में ना ये ही पता होगा।
मै हूं कहां ना कोई समाचार ही होगा।।
(७५)
यह सुनके उनसे लेके पता पत्र था लिखा।
ब्यावर में शिवसागर गुरू का संघ है ठहरा।।
इस संघ में है आपकी बेटी जो ज्ञानमती।
और मेरा नाम भी आर्यिका श्री चंद्रमती।।
(७६)
मैं धर्म प्रेम से तुम्हें ये पत्र लिख रही।
आ करके अपनी बेटी के दर्शन करो सही।।
उनके चरित्र ज्ञान से खुशबहुत यहां।
हैं धन्य आप ऐसी कन्या को जनम दिया।।
(७७)
यह पत्र पढ़के मां के हर्षाश्रु निकल पड़े।
ब्यावर चलने के हेतु फिर अरमां मचल उठे।।
लेकिन पिता कुछ सोचकर बोले अभी नही।
पहले सुभाष कैलाश को भेजों वहां सही।।
(७८)
क्योंकि बेटी मनोवती की कामना।
माताजी के दर्शन तथा दीक्षाकी भावना।
शायद उन्हें आभास था गर ले गये वहां।
ये लौटकर ना आयेगी रह जायेगी वहां।।
(७९)
इस तरह पिता की आज्ञा ले दोनो भाई व्यावर पहुंचे।
करके दर्शन वे बैठ गये नैनो से अश्रु लगे बहने।।
तब लोगों ने पूछा बेटे हो कौन कहाँ से आये हो।
किसके हो पुत्र नाम क्या है क्यों इतना तुम घबड़ाये हो।।
(८०)
जो बहन बनी माताती थी वे भी पहचान न पाई थी।
जो भाई गोदी में खेले उनको सर्वथा भुलाई थी।।
ये देख हो रहे दु:खी बहुत फिर पंडित जी ने समझाया।
हम सब भी देख चकित इनकी वैराग्यमयी ऐसी चर्या।।
(८१)
ये ज्ञानाराधन में हरदम इतनी तल्लीन रहा करती।
ना निजशरीर का भान इन्हें तो पर में ये कैसे रमती।।
स्नान और भोजन करके सब समाचार फिर बतलाये।
वैâसे हैं मनोवती व्याकुल इसलिए पिताजी न आये।।
(८२)
शांती मेरा और श्रीमती का अब तक लाला ने व्याह किया।
पर मनोवती ने रो रोकर अपने को है बेहाल किया।
दो तीन दिनों तक रहकर के जब वे दोनों घर को आये।
सब हाल वहां के सुन सुनकर सब मातापिता संग हर्षाये।।
(८३)
(तर्ज— उड़ जा कोलेकांवा.......?)
सात वर्ष के बाद पिताजी दर्शन करने आए।
मां थी साथ मगर ना मनोवती को संग में लाए।।
गोदी में थी बहन माधुरी और प्रकाश भी आए।
छहमहिने तक रहे संघ में उनसठ की घटना ये।।
कि सबके ही कदम बढ़े बहन का अनुकरण करे—२
(८४)
फिर जबरन घर ले जाकरके शादी कर दी उनकी।
लेकिन मनोवती जब आई वे घर फिर ना लौटी।।
आज आर्यिका अभयमती के नाम से सब जग जाने।
सन् बासठ का किस्सा है ये मां ने भी व्रत लीने।।
कि सबके हैं कदम बढ़े बहन का अनुकरण करे....२
(८५)
 इसके बाद पिताजी का कुछ स्वास्थ्य रहा न अच्छा।
जैसे जैसे गयी बेटियां मन रहता था कच्चा।।
क्योंकि उनका मोह पुत्रियों में कुछ ज्यादा ही था।
चार पुत्र नौ पुत्रीयुत परिवार बड़ा उनका था।।
कि मैना से था प्रेम बहुत और ‘‘बिटियों’’ से भी प्रेम बहुत...२
(८६)
अंतिमसमय पिताजी मां से बोले सुनो यहां।
धर्म कार्य में तुमको रोका अब आजाद किया।।
ज्ञानमती माताजी के अब दर्शन मुझे करा दो।
जिसको भी अपशब्द कहें हो सबसे क्षमा करा दो।।
उन्हें ही बस याद किया उन्हीं का बस ध्यान किया..२
१. प्रकाशचंद्र की
सब पुत्रों ने मिलकर उनको मंत्र नवकार सुनाया।
माताजी की पिच्छी लगाकर उनको था बहलाया।।
समझो तुमको माताजी ही पिच्छी लगा रही है।
आंख बंद कर ली तब उनने मानो बुला रही है।।
उन्हें ही बस याद किया उन्हीं का बस ध्यान किया...२
(८८)
वह दिन था बड़ा मगर वह दिन दुख भी दे गया बड़ा हमको।
दुर्दैव योग से छीन लिया छोटी वय में हमसे पितुको।।
अब याद हमें वे दिन आते कितना करते थे प्यार हमें।
सितला विटिया—सितलाबिटिया कहते वे कभी नही थकते।।
(८९)
थे नौवरष नौंवे महिने के नौ दिन थे जब वीते।
जब आप छोड़कर हमें गये तब हम थे बहुत छोटे।।
जीवन में आये याद बहुत ना जाने कितनी बार।
जब किसी पिता को देखती करते पुत्री को प्यार।।
कि मन ही मन रोये नहीं पिता किसी के खोये।....२
(९०)
बचपन की ये यादे अब भी सहला जाती है।
कुछ कुछ बाते उनकी अब भी याद आ जाती है।।
आवो बिटियां पैर दबादो देगें तुम्हें चबन्नी।
ज्यादा देर दवाओगी तो देंगे और अठन्नी।।
कि सितला विटिया हो..... यही कहते थे वो....२
(९१)
इस गुड़िया का फोटो हमको दिखलाकर ये बोले।
जब तुम पास नही आती हो हम इससे ही खेले।।
ऐसी प्यार भरी बातों को जब जब याद करे हम।
इतने दिन है बीत गये पर आंखे हो जाती नम।।
कि अब जब समझे हम......... नही मिल सकते हम.......२
(९२)
इसके बाद इकहत्तर सत्तर में क्रम क्रम से आये।
भाई रवीन्दर और माधुरी ने भी व्रत है पाये।।
अध्ययन करवाती थी उस क्षण ज्ञानमती जी माता।
मैं भी आई दर्शन करने ये सौभाग्य मिला था।।
कि हमें भी कुछ ज्ञान मिला इन्हीं से सदज्ञान मिला। .........२
(९३)
सन् सत्तर की घटना है ये संघ टोंक में ठहरा।
चतुर्मास में आयी माता मौका बड़ा सुनहरा।।
महिने भर के बाद समय जब आया घर जाने का।
सप्तम प्रतिमा के व्रत लेकर वादा किया आने का।।
कि कामिनी की शादी कर दूं फिर आके मैं यही पर रहलूँ।..........२
(९४)
जाते समय कहा मां से त्रिशला को छोड़ के जावो।
कुछ दिन इसे पढ़ा दूं फिर वापस आकर ले जावो।
छोटी सी शास्त्री बनने का पहला बना उदाहरण।
माताजी ने हमें पढ़ाए कैसे न्याय व्याकरण।।
कि उन्हीं की सब महिमा है ज्ञान की गरिमा है।..............२
(९५)
फिर आई अजमेर नगर में जैसा करे हमेशा।
महिने भर आहारदान दे खुद को धन्य है समझा।।
फिर जाने की बेला में बेटे बहुओं से बोली।
कुछ दिन और यहां पर रहलूं दीक्षाएं कुछ होंगी।।
कि देखकर आ जाऊंगी जल्द ही आ जाऊंगी............२
(९६)
मां के साथ माधुरी भी आई अजमेर नगर मे।
निजस्वभाव के वशीभूत हो समझाया माता ने।।
श्रीफल देकर दिलवाया था ब्रह्यचर्यव्रत उनको।
और वही माधुरी बनी है आज चन्दना देखो।।
कि माता की है शरण लिया उन्ही का अनुकरण किया.......२
(९७)
मातमोहिनी को भी सहसा जाने क्या मन भाया।
माताजी से आकर बोली आज समय वह आया।।
सब लड़के है योग्य नही मै अब घर जाना चाहूं।
आत्मा का कल्याण करूं अब दीक्षा लेना चाहूं।।
कि घर में था संदेशा गया सभी का मन दुखित हुआ.....२
(९८)
आये सब परिवार सहित खूब बिलख बिलखकर रोये।
क्यों अनाथ अब बना रही हो अभी पिता है खोये।।
त्रिशला और माधुरी की भी शादी तो कर जावो।
अभी बहुत है छोटी छोटी थोड़ा तो रूक जावो।।
सभी का कुछ ख्याल करो न इतना सबसे मो तजो...........२
(९९)
मगर बनी पाषाण हृदय वह जरा नहीं वे पिघली।
 बीस साल की चिंगारी अब ज्वाला बनकर निकली।।
सब कत्र्तव्य निभाये हमने बहुत दिनों घर रहकर।
अब हमको दीक्षा लेने दो यही है अब मेरा घर।।
कि अब तुम मोह तजो जाके निज करम करो..............! २
(१००)
धर्म सिंधु गुरूवर से फिर दीक्षा उनको दिलवाई।
केशलोंच की क्रिया देख सबकी आंखे भर आई।।
इतने छोटे केश थे उनके रक्त निकल आता था।
पर वैराग्य हुआ था इतना अश्रु नही आया था।।
कि ऐसी मां को नमन करे उन्हीं के गुण हमें मिले........! २
(१०१)
ऐसी धोर तपस्या फिर तेरह वरषों तक पाली।
हस्तिनागपुर में फिर उसकी अच्छी हुई समाधी।।
जग को ये संदेश दे गयी ऐसी सच्ची माता।
हम ही क्या सबका सिर उनके चरणों में झुक जाता।।
कि ऐसी मां को नमन करे उन्ही के गुण हमें मिलें.......! २
(१०२)
एक बार चन्दनामती माताजी मुझसे बोली।
मैत्रि१ में है सभी समाहित, तेरह बेटा—बेटी।।
मगर साथ ना कभी रहीं, सारी तेरह सन्तानें।
सुनकर सभी अचम्भित होकर कहें कि ये नौ बहनें।
न ऐसा घर—बार दिखा, न ऐसा बैराग्य दिखा...२
(१०३)
अंतिम समय मरण उत्तम हो, इसके लिए समाधि।
जैन धर्म में कही गई है, जब तन में हो व्याधी।।
उत्तम मरण समाधी लेना, साधूजन करते हैं।
इसमें अन्न—पान जल को क्रम से छोड़ा करते है।।
इसे हम नियम कहें, समाधिमरण कहेें।.....२
(१०४)
पर जो मुनी नहीं बन सकते, वे घर में ही रहकर।
मरण समय में साम्यभाव से, सर्वपरिग्रह तजकर।।
णमोकार आदिक मंत्रों को, सुनते—सुनते जाएं।
वे स्वर्गों की परमविभूति देखो ‘त्रिशला’ पाएँ।।
ये वीर सामधिमरण श्रावकों में उत्तम।...२
१‘‘ मै’’ मैना (पहली)
‘‘त्रि’’ से त्रिशला (आखिरी)
(१०५)
ऐसा मरण समाधी का विरले मानव पाते हैं।
उनमें मेरे पूज्य पिताजी, भी जाने जाते हैं।।
ऐसे मातपिता की गिनती इस दुनिया में कम है।
‘त्रिशला का उनके चरणों में सौ—सौ बार नमन है।।
कि उन्हें हम नमन करें, उन्हें ही स्मरण करेें।.....२


एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व का जीवन दर्शन