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चौका

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चौका

जैन चौके का पहला शृंगार है— अहिंसा। जल से लेकर अन्न तक, रसोईघर के फर्श से लेकर उसकी छत तक, यह देखना कि उसका फर्श प्रासुक है, उसका आकाश प्रासुक है। पहली शर्त है कि छत को या तो नियमित साफ रखा जाए या फिर चँदोवा बाँधा जाए। चँदोवा यदि लगाएँ तो उसे सप्ताह में या फिर १५ दिन में एक बार जरूर धोएँ।

अलमारियाँ साफ रखें। पात्र पोंछने के पोंछे व नेपकिन स्वच्छ रखें। जिन पात्रों में कच्ची सामग्री हो, उन्हें सकरे हाथों से न छुएँ। खाने — पीने की वस्तुओं को शोधें, छानें, बीनें। तरल पदार्थों को छानने के लिए शुद्ध सूती वस्त्र काम में लें। स्वच्छता इतनी रखें कि चीटियाँ, तिलचट्टे, मकड़ियाँ , चूहे, छछूँदर और बिल्ली आपके चौके में परिक्रमा न करें। अप्रमत्त रहकर हम जैन किचन के इस शीर्ष शृंगार को अविचल रख सकते हैं। अहिंसा के अंतर्गत रसोई बनाने वाले पर यह दायित्व अपने आप आ जाता है कि वह न तो स्वयं की भावनाओं को दूषित रखे, और न ही चौके में भोजन के लिए पधारे परिजनों और अतिथियों के प्रति कोई दुर्भाव रखे।

दुसरा शृंगार है— प्रासुकता व निर्जंतुकता।

चौके की हर वस्तु को यहाँ तक कि मन को भी प्रासुक रखें। हर चीज इस तरह और इतनी अवधि तक रखें कि वह निर्जंतुक और पोष्टिक बनी रहे। दु:खद है कि पश्चिम के जंक और फास्ट (तुरत) फूड ने हमारे चौके की प्रभुसत्त और वैयक्तिकता को लगभग ध्वस्त और खंडित कर दिया है। जल गालन अर्थात् पानी छानना चौके का तृतीय शृंगार है। तेल, दूध जो भी तरल पदार्थ हों, उन्हें अवश्य छानें। पानी छानकर पीने के अपने व्रत व अपनी मर्यादा को अवश्य निभाएँ। चौथा शृंगार है शुद्धता अर्थात् बर्तन धोना, सब्जी सुधारना, निर्जांतुक खाद्यों का इस्तेमाल करना शुद्धता के अंतगर्त आता है। किसी ऐसी वस्तु का इस्तेमाल जो ऐसी जगह उत्पादित हो जहाँ हिंसा होती है या हुई हो इसके अंतर्गत आ जाता है। जहाँ अहिंसा और प्रासुकता का पालन है, वहाँ करुणा की झिरियाँ (पाँचवाँ शृंगार) मन के भीतर खुद—ब—खुद फुट पड़ती हैं। ध्यान रहे, करुणा की नहीं जाती, हो जाती है।

छठवें शृंगार का संबंध स्वाद और परिणाम से है। हम कैसा खा सकते हैं, और कितना खा रहे हैं; चौका इस पर तब नजर रख सकता है, जब हम चौके के अलावा कहीं और न खाते—पीते हों। यदि हमारा चौका मीलों तक फैला हुआ है, तो संयम का प्रश्न बहुत मुश्किल होता है। हम एक तो अस्वाद को अपने जीवन में लाएँ और दूसरा पेट में जितना आ सकता है, उसका तीन—चौथाई खाएँ । खाने के लिए न जीएँ, जीने के लिए खाएँ; बेहतर जीने के लिए बेहतर खाएँ। सांतवें शृंगार के लिए हमने सादगी को चुना है। प्रोसेस्ड व संसाधित खाने से बचें, कम मसाले खाएँ तले हुये पदार्थ रोज न खाएँ । ऐसा खाना खाएं जो प्राकृतिक रूप से और आसानी से बनाया जा सके और जिसे हमारा पाचन तंत्र सरलता से पचा सके। वस्तुत: तामसिक पदार्थों से तन—मन की रक्षा ही सादगी है।

अब आठवें शृंगार में बात आती है स्वच्छता की । नहाएँ, धोएँ, झाड़ें, बुहारें, माँजें। दो वस्तुओं को अनावश्यक रूप से एक—दूसरे में न मिलाएँ। समय कर मर्यादा का पालन करें। रसोई के उपकरणों को निर्मल एवं स्वच्छ रखें। उनकी सावधानीपूर्वक देखभाल करें।

ाqनरामिषता को हम नवम् शृंगार कह सकते हैं। जैन चौके में मांस, मछली, अंडे के प्रवेश का तो प्रश्न ही नहीं है। अहिंसा और प्रासुकता में निरामिषता अपने आप शामिल है। मधु, मांस, मद्य इन तीनों मकारों (मक्कारों) के लिए चौके के द्वार बंद हैं। इन्हें कभी न खोलें न खुलने दें। दसवाँ शृंगार है जमीकंदों का त्याग। ये एकेद्रीय जीवों की कॉलोनियाँ हैं, इन्हें न खाएँ। जो पदार्थ सूर्य की रोशनी में पनपते हैं, वे स्वास्थ्यकर और श्रेष्ठ होते हैं। अँधेरे में रहकर प्रकाश को जन्म दे पाना जमीकंदों के बस की बात नहीं है। जैन चौके का ग्यारहवाँ शृंगार है रात्रि में आहार निषेध। जैन ग्रंथों में रात्रि में भोजन करना निषेध है। महाभारत जैसे महान ग्रंथ में लिखा है— मद्यमांसाशन रात्रौ भोजनं कंदभक्षणाम् । ये कुर्वांति वृथा, तेषां, तीर्थंयात्रा जपस्तप: ।। (जो पुरुष मद्यपान करते है, मांस खाते हैं, रात में भोजन करते हैं, कंद का भक्षण करते हैं। उनकी तीर्थयात्रा और जप—तप व्यर्थ हैं।) महर्षि मार्कडेय का कथन है— अस्तंगते दिवानाथे, आपो रुधिरमुच्चयते। अन्न मांस समं प्रोक्त मार्कडेय महषिणा।। (अर्थात् सूर्यास्त के बाद जल रूधिर हो जाता है, और अन्न मांस) अब समय है सूरज से निवेदन करने का, कि वह पहले की तरह फिर से जैन चौके की चिटकनी ही नहीं, ताला भी बंद करें।

बारहवाँ शृगांर— किचन में सड़ी—गली वस्तुओं के प्रवेश का कोई सवाल नहीं है। आचार तक वर्जित है। धर्म के अलावा यदि हम धर्म के अलावा यदि हम स्वास्थ और स्वच्छता के साधारण नियमों का भी ध्यान रखते हैं तो किचन में बाजारू जंक/फास्ट फूड के प्रवेश की अनुमति नहीं दें सकते। यह पैकेजिंग के आकर्षण के कारण बाहर से खूबसूरत दिखते हैं किंतु भीतर ही भीतर सड़ते रहते हैं। इसी तरह प्रिज में रख देने से वस्तु समय की मार से नहीं बच सकती है। अत: वस्तुओं का इस्तेमाल करिए परंतु प्रिजर्वेटिव्ह्ज के चक्कर में अपने स्वास्थ्य को खतरे में मत डालिए।

—श्रीमती सुधा चौधरी, म.प्र., सराक सोपान , मासिक अगस्त , २०१४