जिनवाणी सुन प्राणी

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जिनवाणी सुन प्राणी


तर्ज—इक रोज तो चलना है......

जिनवाणी सुन प्राणी, शिवमार्ग बताती है।
जन-जन की कल्याणी, प्रभु द्वार दिखाती है।। टेक.।।

क्रोधादि कषायों ने, तुझे जग में भ्रमाया है।
अनमोल रत्न चेतन, विषयों में गंवाया है।।
बनो शीघ्रमोक्षगामी, यह सार सुनाती है।
जन-जन की कल्याणी, प्रभु द्वार दिखाती है।।१।।

सोचो निज जीवन में, हमने क्या जाना है।
पर परिणति चिन्तन में, आतम सुख माना है।।
अज्ञान छोड़ ज्ञानी, यह ज्ञान सिखाती है।
जन-जन की कल्याणी, प्रभु द्वार दिखाती है।।२।।

स्वाध्याय परम तप से, दृष्टी सम्यक् होती।
चारित्र ज्ञान गंगा, भवि के कल्मष धोती।।
‘चंदनामती’ प्रभु की, वाणी समझाती है।
जन-जन की कल्याणी, प्रभु द्वार दिखाती है।।३।।

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