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जैनत्व के प्रतीक तीन कार्य

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जैनत्व के प्रतीक तीन कार्य

(जिनेन्द्र देव दर्शन, जलगालन और रात्रि भोजन त्याग)
डा. सुरेन्द्रकुमार जैन ‘भारती’

मनुष्य के रूप में जन्म लेने वाले व्यक्ति को यदि जैन कुल मिल जाये तो यह इस दृष्टि से महत संयोग है कि यदि वह जैन संस्कारों का पालन करेगा तो वह अपने मनुष्य जीवन को पतन से बचा सकता है और अपने मनुष्य भव को सार्थक करते हुये उत्थान की उस पराकाष्ठा को प्राप्त कर सकता है जिसे अध्यात्म की भाषा में मोक्ष कहते हैं। मनुष्य भव पाना दुर्लभ था सो पूर्व जन्म में किये अल्पआरंभ अल्पपरिग्रह और स्वभावगत मृदुता के परिणाम स्वरूप प्राप्त हो गया— ‘‘

अल्पारम्भपरिग्रहत्वम् मानुषस्य’’ (तत्त्वार्थ सूत्र— ६/१७), ‘‘ स्वभावमार्दवं च’’ (तत्वार्थ सूत्र—६/१८)। जैन कुल पाना दुर्लभ था सो वह भी अहिंसक आचरण और उच्च गोत्र की प्राप्ति में सहायक पर प्रशंसा, आत्मनिन्दा, सद्गुणों का उद्भावन और असद्गुणों का उच्छादन तथा नम्रवृत्ति और अनुत्सेक (निरभिमानता), (तत्वार्थ सूत्र—६/२६) को अपनाने के कारण हो गया। अब यह आवश्यक है कि आप और हम जिस स्थिति में बैठे हैं— जैनत्व के साथ, वहाँ से हम पतित न हो सके । इसलिये जरूरी है कि हम जैनोचित इन तीन कार्यों को दैनंदिन जीवन में आवश्यक रूप से अपनायें —

१. जिनेन्द्र देव दर्शन

२. जलगालन

३. रात्रि भोजन त्याग ।

जिनेन्द्र देव दर्शन

संसार के सभी मनुष्य प्रात: उठकर सर्वप्रथम अपने इष्टदेव का स्मरण करते हैं, जिन्हें वे परमपिता परमेश्वर ब्रह्मा या ईश्वर कहते हैं। भारतवर्ष में मनुष्य अध्यात्म को जीवन का एक अनिवार्य कर्म मानता है। धर्म उसकी आत्मा में बसता है और क्रियाओं में दिखता है। वह उतना कानून से नहीं डरता जितना कि धर्म से डरता है। पुण्य में संलग्न मनुष्य पाप— कार्यों से निवृत्ति चाहता है। जैन धर्म में परमात्मा को ‘जिन’ संज्ञा प्राप्त है, क्योंकि इन्द्रियों को जीते बिना जिन संज्ञा प्राप्त नहीं होती। जिनबिम्ब दर्शन प्रत्येक जैनी का प्रमुख कत्र्तव्य माना गया है। समाज में ऐसा व्यक्ति प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार के अनुसार—

आप्तेनोच्छिन्नदोषेण, सर्वज्ञेनागमेशिना।

भवितव्यं नियोगेन, नान्यथा ह्याप्ता भवेत् ।।(५)।।

अर्थात् नियम से वीतराग, सर्वज्ञ और आगम का ईश ही आप्त होता है, निश्चय करके किसी अन्य प्रकार आप्तपना नहीं हो सकता।यह आप्त ही जिनेन्द्र देव है।

जो करोड़ों सूर्यों के भी अधिक तेज से देदीप्यमान होता है वह देव है, जैसे—अरहन्त परमेष्ठी। अथवा, जो धर्मयुक्त व्यवहार का विधाता है वह देव है। अथवा जो लोक—अलोक को जानता है वह देव है जैसे—सिद्ध परमेष्ठी। अथवा, जो अपने आत्म स्वरूप का स्तवन करता है वह देव है जैसे— आचार्य , उपाध्याय, साधु।

जैन धर्म में नव देवता माने गये हैं—

अरहंतसिद्धसाहूतिदयं जिणधम्मवयण पडिमाहू।

जिणणिलया इदिराए णवदेवता दिंतु मे बोहि।।

अर्थात् पंचपरमेष्ठी (अरहन्त, सिद्ध, आचार्य,उपाध्याय, साधु), जिनधर्म, जिनवचन, जिन प्रतिमा और जैनमन्दिर ये नव देवता मुझे बोधि प्रदान करें।

एक सच्चे जैन को चाहिए कि इन राग—द्बेष से परे, इन्द्रियजयी, हितोपदेशी, वीतरागी अरहन्त (सर्वज्ञ) भगवान की प्रशान्त मुद्रा युक्त छवि उसके मन—मस्तिष्क में सदैव विद्यमान रहे। यही कारण है कि संसार में सुख की चाह जिन्हें है वे प्रात: काल उठकर जिनदेवदर्शन करते हैं। आचार्य सकलकीर्ति ने पार्श्वनाथ‎ चरित में लिखा है कि— ‘‘जिनेन्द्र भगवान के उत्तम बिम्ब आदि का दर्शन करने वाले धर्माभिलाषी भव्य जीवों के परिणाम तत्काल शुभ व श्रेष्ठ हो जाते हैं। जिनेन्द्र भगवान् का सादृश्य रखने वाली महाप्रतिमाओं के दर्शन से साक्षात् जिनेन्द्र भगवान् का स्मरण होता है, निरन्तर उनका साक्षात् ध्यान होता है और उसके फलस्वरूप पापों का निरोध होता है। जिनबिम्ब में समता आदि गुण व कीर्ति , कान्ति व ,शान्ति तथा मुक्ति का साधनभूत स्थिर वङ्काासन और नाराग्रदृष्टि देखी जाती है। इसी प्रकार धर्म के प्रवर्तक जिनेंद्र भगवान में ये सब गुण विद्यमान हैं। तीर्थंकर भगवान का परम निश्चय होता है इसलिये उन जैसे परिणाम होने से, उनका ध्यान व स्मरण आने से तथा उनका निश्चय होने से धर्मात्मा जनों को महान पुण्य होता है ।जिस प्रकार अचेतन मणि, मंत्र, औषधि आदि विष तथा रोगादिक को नष्ट करते हैं, उसी प्रकार अचेतन प्रतिमाएँ भी पूजा—भक्ति करने वाले पुरूषों के विष तथा रोगादिक (जन्म—मरण के रोग) को नष्ट करती हैं। ऐसी महनीय प्रभावशाली जिनभक्ति कही गयी है। लोक मर्यादा है कि —

रिक्तपाणिर्न पश्येत् राजानंं देवतां गुरुम् ।

नैमित्तिकविशेषेण फलेन फलमादिशेत्।।

अर्थात् राजा, गुरु और देव के समक्ष खाली हाथ कभी नहीं जाना चाहिये। निमित्त— नैमित्तिक तथा द्रव्य की विशेषता से फल में भी विशेषता आती है। हमारे यहाँ जिनदेव के समक्ष चढ़ाये जाने वाले द्रव्यों में भी संसार मुक्ति की कामना समाहित है। द्रव्य चढ़ाते समय व्यक्ति/पूजक यही यही भावना भाता है। जल चढ़ते समय जन्म—जरा—मृत्यु के नाश, चंदन चढ़ाते समय संसार के ताप के नाश, अक्षत (चावल) चढ़ाते समय अक्षय पद (मोक्ष) प्राप्ति, पुष्प चढ़ाते समय काम भावना के नाश, नैवेद्य चढ़ाते समय क्षुधा नाश ,दीप चढ़ाते समय अज्ञान नाश, धूप चढ़ाते समय अष्ट कर्मों का नाश और फल चढ़ाते समय मोक्ष फल प्राप्ति की भावना रखते हुए साधक/दर्शन करने वाला/ पूजक है उसे संसार —स्वर्ग के सुख नहीं , बल्कि मोक्ष सुख की ही प्रबल और एक मात्र चाह रहती है। उसकी सब क्रियाएँ, भावनाएँ आत्मा से आत्मा के लिए होती हैं, शरीर को तो वह मात्र साधक मानता है।

देवदर्शन का फल देवदर्शन की प्रक्रिया से ही प्रारम्भ हो जाता है। आचार्य रविषेण ने पद्मपुराण में लिखा है कि ‘‘जो मनुष्य जिनप्रतिमा के दर्शन का चिन्तवन करता है वह बेला का, जो उद्यम का अभिलाषी होता है वह तेला का, जो जाना प्रारम्भ करता है वह चौला का, जो जाने लगता है वह पांच उपवास का, जो कुछ दूर पहुँच जाता है वह बारह उपवास का, जो बीच में पहुँच जाता है वह पन्द्रह उपवास का, जो मन्दिर के दर्शन करता है वह मासोपवास का, जो द्वार में प्रवेश करता है वह वर्षोपवास का, जो प्रदक्षिणा देता है वह शत वर्षोपवास का और जो स्वभाव से स्तुतिकरता है वह अनन्त उपवास का फल प्राप्त करता है। वास्तव में जिनेन्द्रभक्ति से बढ़कर उत्तम पुण्य नहीं है। जिनभक्ति से कर्मक्षय को प्राप्त हो जाते हैं और जिसके कर्म क्षीण हो जाते हैं वह अनुपम सुख से सम्पन्न परम—पद को प्राप्त होता है।’’

जब हम जिनबिम्ब का दर्शन करते हैं तब हमें रागी और वीतरागी, शरीर और आत्मा का भेद ज्ञात होता है। कवि कहता है कि भक्त और भगवान में बस यही तो अन्तर है कि हम संसार में दु:खी हैं और वे शरीर छोड़कर परमात्मा पद को प्राप्त हो चुके हैं—।

हे राजन्! यद्यपि जिन— प्रतिमा अचेतन है तथापि उसे वेदन शून्य नहीं मानना चाहिए। संसार में निश्चित रूप से परिणाम ही पुण्य पाप का कारण होता है। जिस प्रकार वङ्काभित्ति पर कन्दुक पटकने पर उसके सम्मुख यह फट जाती है, उसी प्रकार दु:ख —सुख कारक निन्दा एवं स्तुतिपरक वचनों के प्रभाव से यद्यपि प्रतिमा भग्न नहीं होती तथापि उससे शुभाशुभ कर्म तुरन्त लग जाते हैं। धार्मिक कर्मों को स्वर्ग कारण कहा गया है। यह जानकर शुद्ध भावनापूर्वक जिन भगवान का चिन्तन करो और उनकी प्रतिमा का अहर्निश ध्यान करो। ‘दर्शन पाठ’ के अनुसार—

दर्शनंदेव देवस्य, दर्शनं पापनाशनं।

दर्शनं स्वर्गसोपानं, दर्शनं मोक्षसाधनं।।

अर्थात् जिनेन्द्र देव के दर्शन करने से पापों का नाश होता है। जिनेन्द्र देव का दर्शन स्वर्ग के लिए सीढ़ियों के समान है। जिनेन्द्र देव का दर्शन मोक्ष का साधन (उपाय) है।

हे जिनेन्द्र भगवान! आज आपके चरण कमल के देखने से हमार दोनों नैत्र सफल हो गए हैं। आज तीन लोक तिलक स्वरूप जिनेन्द्र देव का दर्शन करने से हमारा संसार समुद्र अंजुली के समान रह गया है। यह दिन हमारे जीवन में बार—बार आये : ऐसी मंगल कामना करता हूँ।

जलगालन

जल को संसार में जीवन कहा गया है, क्योंकि यह प्राणियों की अनिवार्य आवश्यकता है। चाहे वे मनुष्य हो या पशु—पक्षी । चूँकि जल में हर चीज घुल जाती है, अत: इसमें अशुद्धि की संभावना बनी रहती है। इस अशुद्धि में धूल, मिट्टी, लवण, खनिज एवं अनेक सूक्ष्म जीव मिले होते हैं। जलचर जीवों की बहुलता भी जल को निरन्तर अशुद्ध बनाये रखती है। वायुमंडल में ऑक्सीजन, कार्बन डाइ आक्साइड, नाइट्रोजन, नाइट्रोजन डाई आक्साइड, सल्फर डाइ आक्साइड आदि गैसें पाई जाती हैं जो जल में घुलकर उसे दूषित कर देती हैं। विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के दूषित पदार्थों के नदियों में छोड़े जाने से भी जल प्रदूषित हो जाता है।

‘‘विकास के तमाम दावों के बावजूद विश्व की लगभग १ अरब आबादी को पीने का साफ पानी भी मयस्सर नहीं होता। एक अनुमान के अनुसार लगभग २ हजार लोग प्रतिदिन दुनिया में गंदे जल के सेवन की वजह से अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।’’

जल प्रकृति का अक्षय और सर्वश्रेष्ठ वरदान है। विज्ञान की दृष्टि में जल को ळहग्न्त् एदत्नहू माना गया है, क्योंकि इसमें अन्य पदार्थों को स्वयं में विलय करने की शक्ति होती है। जल में शीतलता का स्वाभाविक गुण पाया जाता है जिसको स्वच्छ बनाये रखना हम सबका परम कर्तव्य है।

पेयजल निरन्तर कम होता जा रहा है। एक ओर उद्योगों के विषैले रासायनिक पदार्थ हैं तो दूसरी और शहरों की सीवर लाइन्स सीधे नदियों से जोड़ दी गयी हैं। आज कच्चे तेल आयात—निर्यात का कार्य समुद्री मार्ग से ही बहुतायत में होता है। तेल के जहाजों से करोड़ों टन तेल समुद्री जल में रिस जाता है फलत: एक ओर समुद्री जीव—जन्तुओं को मौत के मुँह में जाना पड़ता है तथा जल में तैलीय तत्व की अधिकता हो जाती है। इस तरह मानवीय जरूरतों की कीमत मानवों को ही नहीं बल्कि अन्य जीव—जन्तुओं को भी देनी पड़ती है।

धर्मात्मा पुरूषों को मद्य, मांस, मधु आदि की भाँति राग और जीव हिंसा से बचने के लिए रात्रि भोजन का त्याग करना चाहिए। जो दोष रात्रि भोजन में लगते हैं , वही दोष अगलित पेय पदार्थों में लगते हैं। यह जानकर बिना छने जल , दूध, घी, तेल आदि द्रव्यों के सेवन का त्याग करना चाहिए। इस प्रकार जलगालन का प्रयोजन बाह्य अशुद्धियों से छुटकारा, जल में विद्यमान जीवों की रक्षा तथा स्वयं को स्वस्थ बनाये रखना होता है।

जलगालन के उपाय:

जल की शुद्धि अर्थात जल को जीवरहित करने के निम्न उपाय हैं :

१. वस्त्र से जल छानकर जिवाणी यथास्थान विसर्जित करना।

२. प्लास्टिक की छन्नी , थैली आदि से जल छानना।

३. सौर ऊर्जा द्वारा जल को जीवरहित करना।

इनमें से प्रथम उपाय ही श्रेयस्कर एवं उपादेय है क्योंकि इसमें एक ओर जल शुद्ध होगा, साथ ही जीवों की रक्षा भी होगी।

दूसरे एवं तीसरे उपाय में जल भले ही छन जाये किन्तु जीव रक्षा संभव नहीं है बल्कि मृत जीवों का मिला रहना भी संभव है। अत: जल वस्त्र से ही छानें।

शास्त्रों में हाथी जैसे जानवर द्वारा गालित जल पीने के उदाहरण मिलते हैं तो फिर हम तो मनुष्य हैं ? क्यों ना हम भी जलगालन कर जल का सेवन करे ताकि हम भी स्वस्थ रहें और जीवों की भी रक्षा हो। आज जो डिब्बा या शीशी बंद पेय एवं भोज्य पदार्थ मिल रहे हैं वह जलगालन की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। अनेक बार इनमें जीव—जन्तु यहाँ तक कि केचुए तथा साँप आदि भी देखे गये हैं। अत: इनका भूल कर भी सेवन नहीं करना चाहिए। यही आपका हितैषी डॉक्टर कहता है और यही हजारों वर्षों से जैनाचार्य कहते आ रहे हैं। बस हमें इस सिद्धान्त के पालन की आवश्यकता है।

रात्रि भोजन त्याग

भोजन प्राणी मात्र की आवश्यकता है जिसे वह स्वशक्ति एवं स्वविवेक के अनुसार निजपुरूषार्थ से प्राप्त करता है। जहाँ अन्य प्राणियों में विवेक की कमी है वहीं मनुष्य को प्राणी जगत में सबसे अधिक विवेकी माना गया है अत: उसके भोजन को सात्विक होना अपेक्षित है। ऐसा हमारे धर्म ग्रन्थ, धर्माचार्य, नीतिनिर्धारक और अनुभवी जन बताते हैं। आज चिकित्साशास्त्रियों का भी यह स्पष्ट मत है कि चूँकि मनुष्य की शारीरिक संरचना विशेष रूप से उसका पेट, आँत, जबड़े, मुँह, दाँत, जीभ, तालु आदि पशुओं से भिन्न है अत: उसके लिए ऐसा भोजन उपयुक्त है जो सात्विक भी हो और समयानुकूल भी इसीलिए जहाँ मनुष्य के लिए शाकाहार को श्रेष्ठ आहार बताया गया वहीं दिन में ही भोजन करने के लिए बताया। अत: स्पष्ट है कि रात्रि भोजन मनुष्य के लिए इष्ट नहीं है। आचार्य समन्तभद्र के अनुसार—

अन्नं पानं खाद्यं लेह्यं नाश्नाति यो विभावर्याम् ।

स च रात्रिभुक्ति विरत: सत्वेष्वनुकम्पमानमना:।।
(रत्नकरण्ड श्रावकाचार—१४२)

अर्थात् जो जीवों पर दयायुक्त चित्तवाला होता हुआ रात्रि में अन्न, जल, लड्डू आदि खाद्य और रबड़ी आदि लेह्य पदार्थों को नही खाता है वह रात्रि भुक्ति त्याग नामक प्रतिमाधारी है। अर्थात् जीवों पर दया कर रात्रि में अन्न, पान, खाद्य और लेह्य इन चारों प्रकार के आहार का त्याग करना रात्रिभोजनविरमण नामक छठा अणुव्रत है।

‘कार्तिकेयानुप्रेक्षा’ (३८३) के अनुसार—

जोणिसि भुत्तिं वज्जदि, सो उववासं करेदि छम्मासं।
संवच्छरस्य मज्झे आरंभं मुयदि रयणीये।।

अर्थात् जो पुरुष रात्रिभोजन को छोड़ता है वह एक वर्ष में छह महीने का उपवास करता है। रात्रिभोजन का त्याग करने के कारण वह भोजन व व्यापार आदि से सम्बन्धित सम्पूर्ण आरंभ भी रात्रि को नहीं करता। अर्थात् आरंभी हिंसा से बच सकता है।

रात्रि में भोजन करने वालों की थालियों में डाँस, मच्छर, पतंगे आदि छोटे—छोटे जीव आ पड़ते हैं। यदि दीपक न जलाया जाय तो स्थूल जीव भी दिखाई नहीं पड़ते और यदि दीपक जला लिया जाय तो उसके प्रकाश से थाली आदि में और अनेक जीव आ जाते हैं। भोजन पकते समय भी उस अन्न की वायु (गंध) चारों ओर फैलती है इसलिए उस वायु के कारण अनेक पात्रों में अनन्त जीव आ—आ कर पड़ते हैं। पापों से डरने वालों को ऊपर लिखित अनेक दोषों से भरे हुए रात्रि भोजन को विष मिले अन्न के समान सदा के लिए अवश्य त्याग कर देना चाहिए। चतुर पुरुषों को लड्डू, पेड़ा, बर्फी आदि खाने की चीजें वा नारियल का दूध, फल आदि कोई भी पदार्थ ग्रहण नहीं करना चाहिए। जो पुरुष रात्रि में स्वाद्य पदार्थों को खाते हैं—अन्न के पदार्थ नहीं खाते वे भी पापी हैं क्योंकि अन्न वा स्वाद्य पदार्थों में कोई भेद नहीं है। चतुर पुरूषों को रात्रि में सुपारी, जावित्री, तांबूल आदि भी नहीं खाने चाहिए क्योंकि इनमें अनेक कीड़ों की संभावना रहती है अत: इनका खाना भी महापापोत्पादक है। धीर वीरों को दया धर्म पालनार्थ प्यास लगने पर भी अनेक सूक्ष्म जीवों से भरे जल को भी रात्रि में कभी नहीं पीना चाहिए।

जो विद्वान रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग कर देते है उन्हें प्रत्येक मास में पन्द्रह दिन उपवास करने का फल प्राप्त होता है।

लाटी संहिता (४७—४९) के अनुसार— रात्रि भोजन का त्याग करना कुलक्रिया है और उसके बिना दर्शन प्रतिमा या मूलगुण हो ही नहीं सकते। दूसरी बात यह है कि यदि रात्रि भोजन त्याग रूप कुलक्रिया का पालन न किया जायेगा तो फिर सर्वज्ञ देव की आज्ञा का लोप करना समझा जायेगा।

वास्तव में सर्वज्ञ देव के अनुसार जो क्रियावान् है— कुलक्रिया का पालन करता है। वही श्रावक माना जाता है, अत: रात्रि भोजन त्याग अवश्य करना चाहिए।

रात्रि भोजन करने में और भी दोष हैं जो इस प्रकार हैं :—

१.रात्रि में दीपक या बिजली के प्रकाश के सहारे पतंगा एवं अन्य कीड़े आ जाते हैं, क्योंकि विद्युत के तीव्र प्रकाश के कारण अनेक जीव उसकी ओर आकर्षित होते हैं, और जो गमनागमन के कारण या दूसरे जीवों से टकराने के कारण जरा सी देर में मरण को प्राप्त कर भोजन में मिल जाते हैं। कभी—कभी तो जीवित जीव—जन्तु भी भोजन में मिल जाते हैं।

२. रात्रि में भोजन करने में योग्य और अयोग्य का विचार नहीं रहता, क्योंकि सूक्ष्म दृष्टि रखने पर भी कुछ जीव दिखाई नहीं देते।

३. रात्रि भोजन संयम का घातक है।

४. रात्रि में बनने वाला भोजन, भोजन बनते समय अनेक जीवों का विघातक होता है तथा दूसरे दिन खाने पर उसके रूप, रस, गंध एवं स्वाद में भी बदलाव आ जाता है। अत: रात्रि भोजन त्यागी को रात्रि में बना भोजन भी इष्ट नहीं है।

५. जैन लोग कुलक्रमागत रीति से रात्रि भोजी नहीं है।

६. रात्रि भोजन करने से बर्तनों में पड़ी जूठन को खाने के लोभ में अनेक जीव उनमें गिर कर मर जाते हैं जिसका पाप रूप दोष रात्रि में भोजन करने वालों को ही लगता है।

७. भोजन शयन के एक प्रहर पूर्व कर लेने से स्वास्थ्य के लिये लाभदायक होता है ऐसा चिकित्सकों का मत है। ऐसा करने पर अजीर्ण नहीं होता। इस दृष्टि से भी रात्रि भोजन करना इष्ट नहीं है।

८. स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक प्रकाश की उपलब्धता के कारण सूर्यास्त से पूर्व भोजन करना परमहितकारी है, क्योंकि रात्रि के प्रथम और द्वितीय प्रहर में जितनी अच्छी तरह भोजन पचता है वैसा रात्रि के तीसरे और चौथे प्रहर में नहीं पचता।

९. सायंकालीन भोजन के पश्चात् भ्रमण करने से भोजन शीघ्र पचता है और वायुजन्य विकार भी उत्पन्न नहीं होते हैं, कब्ज भी नहीं बनता है। यदि रात्रि में भोजन किया गया तो भ्रमण के लिए अवसर ही कहाँ मिलता है।

१०. रात्रि भोजन हैजा आदि संक्रमण रोगों का जनक माना गया है। क्योंकि इस भोजन को अन्य जीवों द्वारा झूठा किया जाता है।

११. रात्रि में भोजन बनाने हेतु जलाई जाने वाली अग्नि में अनेक वायुमण्डल में रात्रि के कारण उन्मुक्त विचरण कर रहें जीव—जन्तुओं का जल कर मरना तय हो जाता है। अत: ऐसा करना उचित नहीं है। हमारी परम्परा रही है कि हम लोग रसोई घर में चूल्हे के ऊपर मोटे कपड़े का चाँदोवा बांधकर रखते हैं ताकि कोई जीव—जन्तु उसमें गिरकर जल न सके।

१२. यदि हम किसी को जीवन दे नहीं सकते तो किसी का जीवन लेने का हमारा क्या अधिकार है ? क्या कोई बता सकता है कि रात्रि भोजन में जीव हिंसा नहीं होती ? सामूहिक रात्रि भोजों में अनेक बार साँप, मकड़ी, छपकली, चूहा, चींटी आदि के मिल जाने से भोजन विषाक्त होने के कारण अनेक लोगों के बीमार हो जाने, उल्टी —दस्त होने और मर जाने तक के अनेक उदाहरण आये दिन हम पत्र—पत्रिकाओं में पढ़ते रहते हैं। पद्मपुराण में कथन है कि जिस समय लक्ष्मण जी जाने लगे तो उनकी नव विवाहिता वधू वनमाला ने वहा कि— ‘‘हे प्राणनाथ, मुझ अकेली को छोड़कर जो आप जाने का विचार करते हो तो मुझ विरहिणी का क्या हाल होगा ?’’ लक्ष्मण जी उत्तर देते हैं कि—

स्ववधूं लक्ष्मण: प्राह मुंच मां वनमालिके।

कार्यें त्वां लातुमेष्यामि देवादिशपथोऽस्तु मे।।
पुनरूचे तयेतीश: कथमप्यप्रतीतया।
ब्रूहि चेन्नैमि लिप्येऽहं रात्रिभुत्तेरघैस्तदा।।

अर्थात् हे वनमाले मुझे जाने दो, अभीष्ट कार्य के हो जाने पर मैं तुम्हें लेने के लिए अवश्य आऊँगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अगर मैं अपने वचनों को पूरा न करूँ तो जो दोष हिंसादि के करने से लगता है उसी दोष का मैं भागी होऊँ।

सुनकर वनमाला लक्ष्मण जी से बोली—मुझे आपके आने में फिर भी संदेह है इसलिए आप यह प्रतिज्ञा करें कि — ‘‘ यदि मैं न आऊँ तो रात्रि भोजन के पाप का भोगने वाला होउँ।

इस तरह पुराण ग्रन्थों में भी रात्रि भोजन त्याग की महत्ता बताई गई है। हमें भी अपने स्वास्थ्य, धर्म और कुलरीति की रक्षा के लिए रात्रि भोजन त्याग अवश्य करना चाहिए।

जैन तीर्थवंदना
सितम्बर—२०१४