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जैनधर्म के प्रारंभिक ज्ञान हेतु शिक्षण (बाल विकास २)

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जैनधर्म के प्रारंभिक ज्ञान हेतु शिक्षण
Teaching For The Basic Knowledge of Jainism
द्वारा— प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न चन्दनामती

Bal-Vikas Part-2

Lesson-1

USHA VANDANA
उषा वंदना (लघु तीर्थ वंदना)

उठो भव्य! खिल रही है उषा, तीर्थ वंदना स्तवन करो।
आर्तरौद्र दुध्र्यान छोड़कर, श्री जिनवर का ध्यान करो।।१।।
अष्टापद से ऋषभदेव जिन, वासुपूज्य चम्पापुर से।
ऊर्जयन्त से श्री नेमीश्वर, मुक्ति गये वंदों रुचि से।।२।।
पावापुरी सरोवर से इस, उषा काल में श्री महावीर।
विधुत क्लेश निर्वाण गये हैं, नमो उन्हें झट हो भवतीर।।३।।
बीस जिनेश्वर मोक्ष गये हैं, श्री सम्मेद शिखर गिरि से।
और असंख्य साधुगण भी, शिव गये उन्हें वंदों रुचि से।।४।।
जिनवर गणधर मुनिगण की, निर्वाण भूमियाँ सदा नमो।
पंचकल्याणक भूमि तथा, अतिशययुत क्षेत्र सभी प्रणमो।।५।।
शालिपिष्ट भी शर्वâरयुत, माधुर्य स्वादकारी जैसे।
पुण्य पुरुष के पद रज से ही, धरा पवित्र हुई वैसे।।६।।
त्रिभुवन के मस्तक पर सिद्ध-शिला पर सिद्ध अनंतानंत।
नमो नमो त्रिभुवन के सभी, तीर्थ को जिससे हो भव अंत।।७।।
तीर्थक्षेत्र वंदन से नंतानंत, जन्म कृत पाप हरो।
सम्यक् ‘‘ज्ञानमती’’ श्रद्धा से, शीघ्र सिद्ध सुख प्राप्त करो।।८।।
    Today you read the first Lesson of Bal Vikas Part-2. The name of this Lesson is-
    Usha Vandana, That is morning prayer. This is a poetry and you have to learn it.
    Every morning you have to sing this prayer in the way I have told you.
    Poojya Gyanmati Mataji has written this Usha Vandana with the feeling that when the day is started with uttering these auspicious lines, the whole day becomes auspicious and meaningful.
    Usually we see that in the present times people start their day either with news paper or with T.V. channels or with listening to the filmy songs and moreover with Whatsapp & Facebook, but you should know that by starting the day in this manner, the heart becomes anxious and peaceless, so in order to make your day peaceful, enjoying and meaningful, you should recite this prayer.
    I want to tell the parents also that they should make their children to wake up with the recitation of this Usha Vandana rather than using harsh words.
    In the morning, one should remember the holy pilgrimage places, which have become pious with the auspicious events of greatmen like Teerthankars etc., so that sadistic and violent feelings are erased.
    In essence, you should know that the salvation lands of twenty four Teerthankars are five because Bhagwan Rishabhdev got salvated from Ashtapad or Kailash parvat, Bhagwan Vasupujya from Champapur, Bhagwan Neminath from Girnar Parvat, Lord Mahaveer from Pavapuri and Twenty Teerthankars got salvated from Sammedshikhar Siddhakshetra.
    The other Salvation Lands like Sonagiri, Mangitungi, Siddhvarkoot etc. are also adorable. So all these Nirvan Bhumees should be remembered in the morning.
    As the wheat flour becomes sweet by adding the sugar, sugarcane juice etc., the lands become sacred by the Nirvan or Salvation of great Souls.
At last Poojya Mataji has told to bow down to infinite Siddhas or Liberated-Beings present on Siddhashila, so that our worldly transmigration also comes to an end.

Bal Vikas (Part-2)

Lesson-2

चत्तारि मंगलं

    चत्तारि मंगलं-अरिहंत मंगल, सिद्ध मंगलं, साहू मंगलं, केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलि पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा। चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्ध सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलि पण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि।
    जो, मल अर्थात् पापों का गालन अर्थात् क्षालन करें अथवा जो पुण्य को देवे वह मंगल है।
    अर्थ-लोक में मंगल चार हैं-अरिहंत परमेष्ठी मंगल स्वरूप हैं (मंगल करने वाले हैं), सिद्ध परमेष्ठी मंगल स्वरूप हैं, साधु परमेष्ठी (आचार्य, उपाध्याय और साधु) मंगल स्वरूप हैं और केवली भगवान् के द्वारा प्रणीत धर्म मंगल स्वरूप हैं।
    लोक में चार ही सबसे उत्तम हैं-अरिहंत ही लोकोत्तम हैं, सिद्ध ही लोकोत्तम हैं, साधु ही लोकोत्तम हैं और केवली द्वारा प्रणीत धर्म ही लोक में उत्तम है।
    चार की ही मैं शरण लेता हूँ-अरिहंतों की मैं शरण लेता हूँ, सिद्धों की मैं शरण लेता हूँ, साधुओं की मैं शरण लेता हूँ और केवली भगवान द्वारा प्रणीत धर्म की मैं शरण लेता हूँ।
    वर्तमान में विभक्ति लगाकर ‘चत्तारिमंगल पाठ’-नया पाठ पढ़ा जा रहा है। जो कि विचारणीय है। यह पाठ सन् १९७४ के बाद में अपनी दिगम्बर जैन परम्परा में आया है। देखें प्रमाण-‘ज्ञानार्णव’ जैसे प्राचीन ग्रंथ में बिना विभक्ति का प्राचीन पाठ ही है। यह विक्रम सम्वत् १९६३ से लेकर कई संस्करणों में वि.सं. २०५४ तक में प्रकाशित है। पृ. ३०९ पर यही प्राचीन पाठ है। प्रतिष्ठातिलक जो कि वीर सं. २४५१ में सोलापुर से प्रकाशित है, उसमें पृष्ठ ४० पर यही प्राचीन पाठ है। आचार्य श्री वसुविंदु-अपरनाम जयसेनाचार्य द्वारा रचित ‘प्रतिष्ठापाठ’ जो कि वीर सं. २४५२ में प्रकाशित है। उसमें पृ. ८१ पर प्राचीन पाठ ही है। हस्तलिखित ‘श्री वसुनंदिप्रतिष्ठापाठ संग्रह’ में भी प्राचीन पाठ है। प्रतिष्ठासारोद्धार जो कि वीर सं. २४४३ में छपा है, उसमें भी यही पाठ है। ‘क्रियाकलाप’ जो कि वीर सं. २४६२ में छपा है, उसमें भी तथा जो ‘सामायिकभाष्य’ श्री प्रभाचंद्राचार्य द्वारा ‘देववंदना’ की संस्कृत टीका है, उसमें भी अरहंत मंगलं-अरहंत लोगुत्तमा,....... अरहंत सरणं पव्वज्जामि, यही पाठ है पुन: यह संशोधित नया पाठ क्यों पढ़ा जाता है। क्या ये पूर्व के आचार्य व्याकरण के ज्ञाता नहीं थे ? इन आचार्यों की कृति में परिवर्तन, परिवर्धन व संशोधन कहाँ तक उचित है ?

    
नया पाठ-

    चत्तारि मंगलं-अरहंता मंगलं...., अरहंता लोगुत्तमा......, अरहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि.....।
यह पाठ सन् १९७४ से आया है ऐसा पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य आदि विद्वानों ने कहा था। जो भी हो, हमें और आपको प्राचीन पाठ ही पढ़ना चाहिए। सभी पुस्तकों में प्राचीन पाठ ही छपाना चाहिए व मानना चाहिए। नया परिवद्र्धित पाठ नहीं पढ़ना चाहिए।

    Now, you listen the lesson in English.
    Religious Brothers and Sisters!
    You are joining the live class of Basic knowledge of Jainism through Paras Channel.
    From yesterday, I have started Bal Vikas Part-2.
    You can see this book on our website jambudweep.org. From here also the PDF of this lesson has been sent on your Whatsapp no., so you open this and read it.
    The name of this second lesson is-Four Auspicious i.e. four Mangals. You have recited this Chattari Mangal Path just now. The question is-
What is the meaning of Mangal ?
    Which destroy sins and give pleasure are called Mangals.
    Meaning-In the universe, there are only four auspicious;
1. Arihant Parmeshthis are auspicious
2. Siddha Parmeshthis are auspicious
3. Sadhu Parmeshthis are auspicious
4. Religion preached by the Omniscient Soul (Kevali Bhagwan) is auspicious.
    There are four Supremes in the universe;
        1. The Semi-Salvated Souls (Arihants) are Supreme in the world.
        2. The Liberated Souls (Siddhas) are Supreme in the world.
        3. The Saints are Supreme in the world.
        4. Religion preached by the Kevali Bhagwan is Supreme in the world.
    In the universe I take shelter/protection with the four;
        1. I seek protection with the Semi-Salvated Souls (Arihants).
        2. I seek protection with the Liberated Souls (Siddhas).
        3. I seek protection with the Sadhus (Saints).
        4. I seek protection with the religion preached by the Kevali Bhagwan.
    Now, you know the essence of this lesson.
    The essence of this lesson is that Arihant Parmeshthi, Siddha Parmeshthi, Sadhu Parmeshthi and the Religion propagated by the kevly Bhagwan are the real auspicious entities. They are the only Supremes in the universe and they are the only real shelters in the universe.
Dear Children! You have to understand that at any stage of life, for any of your justified wishes or needs, you have to knock the door of only Lord Arihant, Siddha, Shadhu Parmeshthi and the true religion. This is one of the most important Fundamental of Jainism, that you have to remember throughout your life.

Lesson-3

तीर्थ का महत्व

    सुरेश-गुरु जी! पिता जी कहते हैं कि रोज तीर्थ वंदना पढ़ा करो, बहुत पुण्य मिलता है सो तीर्थ क्या है ?
    अध्यापक-हाँ सुरेश! तुमने प्रश्न तो बहुत अच्छा किया है, सभी बालको सुनों-जिससे संसार समुद्र तिरा जाये उसे तीर्थ कहते हैं। इस लक्षण से तो अर्हंत भगवान का धर्म ही सच्चा तीर्थ है तथा तीर्थंकर आदि महापुरुषों ने जहाँ जन्म लिया है या जहाँ से मोक्ष गये हैं या जहाँ पर अन्य कल्याणक हुए हैं ऐसे पंचकल्याणक स्थानों को भी तीर्थ कहते हैं क्योंकि महापुरुषों के चरणरज से वे स्थान भी पवित्र हो गये हैं।
    नरेश-हमारी माँ कहा करती हैं कि मनुष्य पर्याय पाकर जीवन में सम्मेदशिखर की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। ऐसा क्यों ?
    अध्यापक-यों तो गिरनार, चम्पापुर, पावापुर, अयोध्या, हस्तिनापुर आदि सभी तीर्थों की वंदना करना चाहिए। फिर भी सम्मेदशिखर के दर्शन का एक विशेष महत्त्व है। ‘‘एक बार वंदे जो कोई। ताहि नरक पशु गति नहिं होई’’। जो एक बार भी सम्मेदशिखर के पवित्र टोंकों की वंदना कर लेता है, वह जीव उस भव से मरकर नरक गति और तिर्यंचगति में नहीं जाता है नियम से वह जीव भव्य है-अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करेगा और तो क्या वह उनंचास भव से अधिक भव नहीं धारण कर सकता है। नियम से वह भव्य इसके अंदर ही अंदर मोक्ष चला जायेगा। अत: बालकों! तुम्हें सम्मेदशिखर महातीर्थ की यात्रा अवश्य करना चाहिए।

तर्ज-जरा सामने तो.......

तीरथयात्रा का पुण्य विशाल है, इसकी दूजी न कोई मिशाल है।

इससे आत्मा बनेगी परमात्मा, भवसागर से होकर पार है।।टेक.।।
कोई गंगा को तीरथ कह, उसमें डुबकी लगाते हैं।
कोई संगम तट पर जाकर, निज को शुद्ध बनाते हैं।।
सच्चे तीरथ की कीरत विशाल है, इसकी दूजी न कोई मिशाल है।
इससे आत्मा बनेगी परमात्मा, भवसागर से होकर पार है।।१।।
सत्य अहिंसा करुणा की, नदियाँ जहां कल कल बहती हैं।
उनमें पापों के क्षालन को, जनता आतुर रहती है।।
वही तीरथ अलौकिक विशाल है, इसकी दूजी न कोई मिशाल है।
इससे आत्मा बनेगी परमात्मा, भवसागर से होकर पार है।।२।।
कहीं किसी पर्वत पर जाकर, महामुनी तप करते हैं।
वृक्षों के नीचे भी तपकर, केवलज्ञानी बनते हैं।।
वे ही तीरथ कहाते विशाल हैं, इसकी दूजी न कोई मिशाल है।
इससे आत्मा बनेगी परमात्मा भवसागर से होकर पार है।।३।।
ये सब द्रव्य तीर्थ हैं चेतन भाव तीर्थ कहलाता है।
चलते फिरते तीर्थ साधुगण जिनका मोक्ष से नाता है।।
‘‘चंदनामति’’ ये तीरथ विशाल है, इसकी दूजी न कोई मिशाल है।

इससे आत्मा बनेगी परमात्मा, भवसागर से होकर पार है।।४।।

    Religious Brothers, Sisters and lovely Children!
    Today you will read the 3rd lesson of Bal Vikas Part-2. The name of the 3rd Lesson is-Importance of Pilgrimages. In this lesson you will know about pious lands that is Digambar Jain Pilgrimages-
    Now, I am telling you what has been written in the English book.
    A student is asking his teacher & Teacher gives the reply-
    What He is asking-Sir! My father has asked me to read “Tirth Vandana” daily, because it is auspicious and give heavenly pleasure. Please explain me the meaning of Tirth (holy places)?
    Then the Teacher replies-Yes! You have asked a very good question. All of you listen attentively. Tirth is that place from where one crosses over the endless worldly ocean.
    Because of this quality, teaching of Arihant Bhagwan is the only religion, which can be called as true “Tirth.” At the same time the places where Tirthankars or any other great persons are born or attain salvation and their other events of Panchkalyank have taken place, are called “Tirths”, because footsteps of great persons have made them auspicious.
    Another student is also asking-My mother often says that being a human one should go to Sammed Shikharji for worship at least once during his life time, why so sir?
    Teacher replies to this question also-Although you should also go to Girnarji, Champapuri, Pawapuri, Ayodhya, Hastinapur and many such holy places for worship, but to go to Sammed Shikharji for worship has a special importance. It is a common saying (belief): 'Ek Bar Vande Jo Koi, Tahi Narak Pashu Gati Nahi Hoi.'
    He, who once visits Sammed Shikharji for worship, will never go to hell or become a tiryanch (an animal). Virtually he is a Bhavya Jeev, who will liberate himself within forty nine births. It is by law that he will attain salvation. Therefore you must visit to great holy Tirth Sammed Shikharji for worship.
    Religious Gentlemen, Sisters & lovely Children!
    You must have understood the importance of Pilgrimage to Sammed Shikhar.
    As you must be knowing that in each and every jain home, there is the custom of pilgrimage to Teerthraj Sammedshikharji, You have to understand by this lesson that you must have the liking for going to jain pilgrimage places also as you are always keen to go to Nainital, Mussoorie etc. because on a tourist place you only get enjoyment, but at a Pilgrimage place you get the Punya also.
    One more thing is that if you have not gone to Sammedshikharji till now, you should certainly say to your family members to take you to this great Teerth, once al least.

तर्ज—फूलों सा चेहरा तेरा......

शाश्वत है तीरथ मेरा, सम्मेदगिरि नाम है।

गिरिवरों में श्रेष्ठ है, आदि सिद्धक्षेत्र है, मधुवन परम धाम है।। टेक.।।
कहते हैं इस गिरि की वन्दना से,
तिर्यंच नरकायु मिलती नहीं है।
श्रद्धा सहित इसकी अर्चना से,
भव्यत्व कलिका खिलती रही है।।
रात अंधेरी हो, भक्ति सहेली हो, लगता न डर पर्वत पर कभी।
अतिशय से गूँजे यहाँ, सांवरिया का नाम है।
गिरिवरों में श्रेष्ठ है, आदि सिद्धक्षेत्र है, मधुवन परम धाम है।।१।।
इस युग के चौबिस तीर्थंकरों में,
मोक्ष गए बीस जिनवर यहाँ से।
कितने करोड़ों मुनियों ने भी,
तप करके शिवालय पाया यहाँ से।।
तीर्थ पुराना है, श्रेष्ठ खजाना है, सबको तिराता है संसार से।
तीरथ की कीरत अमर, कर सकता इंसान है।
गिरिवरों में श्रेष्ठ है, आदि सिद्धक्षेत्र है, मधुवन परम धाम है।२।।
जिनधर्म निधि को पाकर के उसका,
सच्चा सदुपयोग करना है हमको।
आपस में मैत्री, दीनों पे करुणा,
का भाव जग में सिखाना है सबको।।
स्वार्थ त्याग करके, शीघ्र जाग करके, जैनत्व की सब रक्षा करो।
तीरथ की रज ‘‘चन्दनामति’’ मस्तक का परिधान है।

गिरिवरों में श्रेष्ठ है, आदि सिद्धक्षेत्र है, मधुवन परम धाम है।।३।।
Bal-Vikas Part-2

Lesson-4

बारह भावना

Lesson-4 (Part-1)

    Religious Brothers, Sisters and Dear Children!
    Today you will learn the fourth lesson of Bal Vikas Part-2. The name of this lesson is-Twelve Holy Emotions, which are also called as Baarah Bhaavanas.
अनित्य भावना-

                                
राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार।
मरना सबको एक दिन, अपनी अपनी बार।।१।।

    I have written these twelve Anuprekshas in English with the feeling that O Jinenderdev! Now I want to leave all the activities which give sorrow.
As a matter of fact, all of us are wandering in eighty four lacs Yonis of the Universe without right knowledge, now we have got human birth, so we should think about own Soul and recite these twelve Anuprekshas daily, such as I am reciting here the English Baarah Bhaavanas.
    I'm praying to you Jinavar deva!
    I'm praying to you
    Praying to you, I'm saying to you-2
    I'm praying to you Jinvar deva.
    I did not know about my soul,
    I could not think about myself.
    So tell me that path deva.......I'm praying to you........
1. Anitya Bhaavna
    All things are momentary in world,
    Everybody doing the birth and death.
    It is also nature of Universe......I'm praying to you.........1
    Now, Listen Anitya Bhaavna.
    You should know about Anitya Bhaavna that everygthing is subject to change or is transitory.
As you was a small child firstly, then you grew up, later you will become a teenager, then you will become a youth and gradually you will become old like your grand parents, so you should know that any thing in this world does not remain the same always.

अशरण भावना-

                                
दलबल देवी देवता, मात पिता परिवार।
मरती विरियाँ जीव को, कोई न राखनहार।।२।।

    Now you listen Asharan Bhaavna in English.
2. Asharan Bhaavna
    Unprotected are the souls of creatures
    They are feeling fruition of Karmas.
    Any body doesn't help here.......I'm praying to you.........2
    It means that the Soul is unprotected from the fruition of Karmas.
    Lovely Children! You should know that all the living beings in this universe are drowning in the painful Ocean of birth, death, sufferings etc. There is no escape from these. Only religion is the escape for all living beings. To think like this repeatedly is called Asharan Bhaavna.

संसार भावना-

                                
दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णावश धनवान।
कहूँ न सुख संसार में, सब जग देख्यौ छान।।३।।

    I have written in this Anupreksha.
3. Sansar Bhaavna
     Soul moves in Universe from eternal,
     And could not attain true happiness.
     Now I want ending sorrow......I'm praying to you........3
     It means that Soul is transmigrating in the world since eternal and cannot attain true happiness till he is out of it.
     In other words, I can tell you that transmigration is the attainment of another birth in the four destinities by ripening of Karmas. The living beings have no association with any one or anything. What we consider as pleasure is also the cause of pain. To think like this repeatedly is Samsar Bhaavna.

एकत्व भावना-

                                
आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय।
यों कबहूँ या जीव को, साथी सगा न कोय।।४।।

     Now you listen Ekatva Bhaavna in English.
4. Ekatva Bhaavna
    I came alone and will go alone too,
    There is neither any friend nor enemy.
    None takes my manifold sufferings......I'm praying to you.....4
    It means that when you took birth, you came alone and when one dies he goes alone, all the relatives and possessions are left here only.
    In other words, I can say that each living being is the enjoyer of his own pleasures and pains, merits and demerits. He alone is the cause of his own emancipation by annihilating his own karmas. There is no one else who can do this for him. To think like this repeatedly is called Ekatva Bhaavna.