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जैनों का भविष्य-दृष्टि पत्र-२०१५-२०२५

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जैनों का भविष्य-दृष्टि पत्र-२०१५-२०२५

किसी भी व्यक्ति या समाज के लिए एक ‘विजन’ (Vision) यानी भविष्य—दृष्टि या भविष्य—दर्शन का होना उतना ही जरूरी है जितना किसी यात्री के लिए गन्तव्य स्थान (मंजिल) तक पहुँचने के लिए यात्रा के विभिन्न पड़ावों और यात्रा के कार्यक्रम की जानकारी। जीवन एक यात्रा है, कभी न समाप्त होने वाली यात्रा। कारवां में कभी—कभी कुछ यात्रियों का साथ छूट जाता है और कुछ नए यात्री साथ जुड़ते जाते हैं पर कारवां तो चलता ही रहता है।

‘विजन’ को हम भविष्य का लक्ष्य (Target) उद्देश्य (Purpose) या पूर्वाभास भी कह सकते हैं जो हमें कार्य क्षेत्र में उतरने की उमंग और प्रेरणा प्रदान करता है। वह एक प्रकाश—स्तम्भ (लाइट—हाउस) की तरह होता है जो जीवन के महा—समुद्र में हमारा मार्ग—दर्शन करता है और राह में आने वाले विभिन्न खतरों से हमें सावधान भी करता है। यदि मनुष्य ने चांद पर पहुँचने का सपना न देखा होता और उस सपने को साकार करने के लिए निरन्तर प्रयत्न न किए होते तो क्या वह कभी चाँद तक पहुँच सकता था ?

‘विजन’ एक ऋण (कर्ज) भी है जो हमें चुकाना है। किसी व्यक्ति को वृद्धावस्था में आम का पेड़ लगाते देख राहगीर ने कहा कि ‘क्यों बेकार मेहनत कर रहे हो ? इसके फल तो तुम नहीं खा पाओगे।’ जिस पर उस वृद्ध ने कहा—‘तो क्या हुआ अगर मैं इसके फल नहीं खा पाऊँगा। मेरे माँ—बाप ने मेरे लिए जो पेड़ लगाए थे, उनके फल मैंने खूब खाए और मेरे लगाए पेड़ों के फल जब लोग खाएँगे तो मुझे याद करेंगे।’ १० वर्ष बाद सन् २०२५ में हम कहाँ और कैसे होंगे ? यही इस दृष्टि पत्र (विजन—डाक्यूमेन्ट) का विचारणीय विषय है।

१. किसी भी जाति, वर्ग या समूह के समुचित विकास के लिए प्रथम आवश्यकता है—उच्च कोटि की शैक्षणिक संस्थाओं का विकास। हमें जैन—समुदाय के लिए नए स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय खोलने के लिए सरकार से नई सुविधाएँ प्राप्त करनी हैं और ऐसी शिक्षण—संस्थाओं का विकास करना है जो विश्वस्तर की हों। इन संस्थाओं के द्वारा पुरातन की खोज, वर्तमान के विवेचन—विश्लेषण और भविष्य के अनुसन्धानों के लिए सरकार से विशेष अनुदान राशियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।

२. विभिन्न समुदायों में विचारों के आदान—प्रदान और सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन के लिए एक ऐसे अत्याधुनिक (State of the Art) सभागार—‘आडिटोरियम’ की आवश्यकता है जिसमें कम से कम एक हजार लोगों के बैठने की सुविधा हो। इसी सभागार में जैन विरासत से सम्बन्धित एक दृश्य श्रव्य केन्द्र (Audio Video Centre) की स्थापना भी की जा सकती है।

३. जैन समुदाय ने विभिन्न र्धािमक स्थलों के रूप में एक महान् सांस्कृतिक परम्परा विरासत में पाई है जैसे झारखंड में शिखर जी, कर्नाटक में श्रवण बेलगोला, बिहार में पावापुरी, वैशाली, नालन्दा और राजगीर, गुजरात में गिरनार जी, राजस्थान में महावीर जी इत्यादि। इन सभी पर्यटन—स्थलों को जोड़ने वाली ऐसी ‘टूरिस्ट ट्रेनों’ के विकास की आवश्यकता है जिसका देसी और विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में लाभ उठा सके।

४. नई दिल्ली स्थित ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ (नेशनल म्यूजियम) में जैनों का एक पृथक संभाग है। मथुरा, महावीर जी, भोपाल, नालन्दा, शिखर जी, श्रवण बेलगोला आदि अनेकानेक स्थानों पर भी ऐसे जैन संग्रहालय हैं जिनका हमें समुचित विकास करना है। जैन तीर्थंकरों की र्मूितयों और अन्य प्राचीन स्मृति—चिन्हों की सुरक्षा के लिए भी अत्याधुनिक उपायों को क्रियान्वित करने की आवश्यकता है।

५. अनेक राष्ट्रीय समारोह के कार्यक्रमों में सर्वधर्म–प्रार्थना—सभा के अन्तर्गत जैन प्रार्थना—पद्धति के महान ‘णमोकार मंत्र’ को भी सम्मिलित किए जाने के लिए प्रयत्न करना है।

६. एक या दो सुविख्यात जैन कार्यकत्र्ताओं को राज्य सभा के लिए मनोनीत किया जाना चाहिए जो जैन समुदाय के अभ्युत्थान के लिए कार्य कर सके। कुछ लब्ध—प्रतिष्ठित विशिष्ट प्रतिभा—सम्पन्न जैन विद्वानों, समाज सेवकों, लेखकों, कलाकारों आदि को ‘पद्मश्री’ के लिए नामांकित किया जाना चाहिए।

७. शाकाहार और सात्त्विक जैन—आहार के प्रचार—प्रसार के लिए विशेष प्रयत्नों की आवश्यकता है, जैसे कुछ हवाई—यात्राओं में ‘जैन वैजिटेरियन फूड’ की व्यवस्था होती है। आज विश्व के हर देश में भारतीय युवा वर्ग बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। उन सभी स्थानों पर ‘जैन फूड’ को सुलभ और लोकप्रिय बनाने की जरूरत है।

८. ‘क्षमावाणी दिवस’ की परिकल्पना(Concept) जैन संस्कृति की निजी विशेषता है जो विश्व शान्ति की स्थापना और परस्पर सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जाने—अनजाने में हो गए अपराधों के लिए क्षमा—प्रार्थना की शास्त्रोक्त पद्धति (Ritual) औपचारिकता (Formality) मात्र नहीं है उसमें र्हािदक भावनाओं का सम्मिलित होना अनिवार्य है क्योंकि सच्चे हृदय से निकली हुई बात ही दूसरों के दिलों को प्रभावित कर सकती है। यह हर्ष का विषय है कि चारों जैन समाजों ने यह निर्णय लिया है कि अगले वर्ष से वे ‘अनन्त चौदस’ के अगले इतवार को परस्पर मिलकर सम्पूर्ण भारत में क्षमावाणी दिवस मनाएंगे।

९. पुरानी कहावत है कि संगठन और एकता में बल है। आज समय की आवश्यकता है कि चारों जैन समाजों के प्रवक्ता आपस के मतभेदों को भुलाकर एक ही स्वर और भावना के साथ जैन समाज की प्रगति और उत्थान के लिए अपनी बात राष्ट्र और सरकार के सामने रखें। किसी भी प्रकार के अन्र्तिवरोध का आभास नहीं दिया जाना चाहिए। (one-up-manship) यानी ‘नहले पर दहला’ की भावना से दूर रहना ही जैन समाज के लिए लाभप्रद है। जैसे वृक्ष की विभिन्न शाखाएँ उसे सन्तुलन (Balance) प्रदान करती हैं, उसे हरा—भरा और मजबूत बनाती हैं वैसे ही हमारे धर्म की विभिन्न धाराएँ मूल वृक्ष की समृद्धि और उत्थान में सहायक बननी चाहिए।

१०. जैनों का ध्वज एक है, णमोकार मंत्र एक है, मंगलाचरण एक है, तत्त्वार्थ—सूत्र एक है, तीन लोकों की कल्पना एक है अत: सम्पूर्ण भारत के चारों जैन समाजों को मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर कोई एक जैन–स्मारक या (Heritage) विरासत की स्थापना करनी चाहिए जो चारों समाजों को श्रद्धापूर्वक स्वीकार्य हो। भगवान महावीर के २५०० वें जन्म समारोह के अवसर पर यह विचार सर्व—सम्मति से स्वीकार किया गया था पर अभी तक क्रियान्वित नहीं किया गया।

११. तस्करों द्वारा भारतीय मन्दिरों से चोरी करके या लूटकर जो जैन र्मूितयां, जैन ग्रंथ और जैन विरासत की अन्य बहुमूल्य सामग्रियाँ विदेशी संग्रहालयों (museuns) में पहुँचा दी गई हैं, उन्हें वापस लाने की जरूरत है। इसके लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का सहारा लेकर एक प्रभावशाली कार्य–योजना (Plan of Action) बनाने की आवश्यकता है जैसे—

१. भारत में विदेशी दूतावासों से सम्पर्क।

२. विदेशों में प्रवासी जैन भारतीयों से सम्पर्क करके उनका सहयोग लेने का प्रयत्न।

इंगलैंड, अमेरिका, फ्रांस, इटली, जर्मनी और विशेषकर बेल्जियम में इस प्रकार की जैन धरोहर की मूल्यवान वस्तुओं के होने के सुबूत हैं।

१२. पिछले २५ वर्षों में विदेशों में जैन विषयों पर अनुसंधान सम्बन्धी प्रकाशन—पुस्तके, लेख इत्यादि बहुत तेजी से बढ़े हैं। उनमें बहुत से लेख जैनों के अत्यधिक विरोध में भी लिखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए—(Hinduisation of jainism', `Jains are loosing their Identity',)‘‘ परिग्रही जैनी’ आदि। इस प्रकार के विचारों का भारत में संज्ञान (Notice) लेते हुए उनका निराकरण किया जाना चाहिए। जैन विद्वानों और विचारकों की यह र्धािमक और व्यावसायिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वे इन बातों का तर्कसंगत उत्तर दें जिससे जैनों के बारे में विदेशों में जो भ्रांन्तियां फैल रही हैं, उन्हें रोका जा सके इसके लिए इन्टरनेट (Internet) और अन्य आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग भी किया जाना चाहिए।

१३. इस लेख के दोनों लेखकों का पिछले ४० वर्षो से जैन युवा वर्ग के साथ सम्पर्क रहा है और अपने अनुभव के आधार पर हम नि:संदेह यह कह सकते हैं कि यदि समय रहते जैनों की दो बहुमूल्य धरोहरों—१. सात्त्विक जैन आहार और २. मदिरापान न करना—की सुरक्षा के लिए कदम नहीं उठाए गए तो जैन युवा—वर्ग का शाकाहारी और नॉन—शाकाहारी वर्गों में विभाजन हो जाएगा जो दिगम्बर और श्वेताम्बर विभाजन से भी अधिक भयावह होगा।

आमदनी बढ़ने के साथ—साथ हमारे समाज में जैन मूल्यों का स्थान मूल्यांकन ने ले लिया है—(Valuation has taken over values) कुछ लोग ‘शेम्पेन राज’ को एक बहुत बड़ी ची़ज समझने लगे हैं। इस भ्रम को दूर करने की जरूरत है। गर्व इस बात का होना चाहिए कि ‘मैं शाकाहारी हूँ’ या ‘मैंने मांस और मदिरा का त्याग किया हुआ है’ न कि इस बात का कि मैं मांसाहारी हूँ, जैनों के उच्च जीवन स्तर को मापने का आधार ‘सात्त्विक आहार और सरल जीवन शैली’ होना चाहिए न कि उनकी आकाश को छूती आमदनी।

१४. पिछले दस वर्षों में चारों जैन समाजों में नव—दीक्षित मुनियों, साधुओं और र्आियकाओं की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी है किन्तु जिस दर से दीक्षाएँ दी जा रही हैं, उस दर से उनकी शिक्षा, शास्त्र ज्ञान और आगमज्ञान का प्रबन्ध बहुत शिथिल और नगण्य है। भारत का प्रबुद्ध और उच्च शिक्षा प्राप्त युवावर्ग अपने गुरुओं से यह अपेक्षा करता है कि उनके पास आवश्यक ज्ञान (Knowledge) तर्क संगत विचार (thoughts) और विवेकपूर्ण बौद्धिक चेतना (Intellectual conscience) हो। जैन संस्थाओं के कुल खर्च का कम से कम ६ज्ञ् खर्च जैन संतों और मुनियों की शिक्षा के लिए होना चाहिए जबकि एक अनुमान के अनुसार यह खर्च १ज्ञ् से भी कम है। आज वैश्वीकरण (Glabalisation) के युग में जैन साधु—साध्वियों को संस्कृत और प्राकृत आदि के ज्ञान के साथ—साथ अंग्रेजी भाषा की शिक्षा देने की भी आवश्यकता है।

१५.आज जैनों के अनेक टी.वी. चैनल चल रहे हैं जैसे ‘पारस चैनल’, ‘आस्था चैनल’, ‘जिनवाणी’ आदि। इनके संचालन में एक सर्व सम्मत ‘आचार संहिता’ (Code of Conduct) को अपनाने की जरूरत है। एक वर्ग दूसरे वर्ग के विरुद्ध कुछ न कहे, एक दूसरे के लिए अपशब्दों का प्रयोग नितान्त र्विजत होना चाहिए। तिरस्कार की बजाए परस्पर सहिष्णुता (tolerance) की नीति को अपनाने की आवश्यकता है। दूसरे की लकीर का कुछ हिस्सा मिटाकर अपनी लकीर को बड़ा दिखाने में कोई बुद्धिमता नहीं है। बुद्धिमता इस बात में है कि उसकी लकीर को छुए बिना हम अपनी लकीर को उससे बड़ी बनाएँ।

१६. पिछले कुछ वर्षों में जितनी तेजी से जैन मन्दिरों का निर्माण हुआ है, उसकी तुलना में परिन्दों या पक्षियों के अस्पतालों का निर्माण न के बराबर हुआ है। Birds Hospitals का निर्माण जैन धर्म और संस्कृति की बहुत बड़ी विशेषता है जिसको प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। हर शहर में कम से कम एक Birds Hospital तुरन्त बनाया जाना चाहिए। C.U. यानि (Intensive Care Units) हम मनुष्यों के अस्पतालों में ही नहीं, परिन्दों के अस्पतालों में भी बनाए जाने चाहिएं....। प्राणि मात्र के प्रति दया और आत्मीयता की भावना हमारे धर्म को एक विशेष उत्कर्ष प्रदान करती है।

‘सब हमारे अपने हैं, हमारे लिए कोई गैर नहीं,

हमारे फूलों से सारा जहाँ महकता है.......।’

आज हमारा देश एक संक्रान्ति युग से गुजर रहा है जिसमें बड़ी तीव्र गति से बड़े—बड़े परिवर्तन हो रहे हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि हम एक ऐसे युग के साक्षी हैं जिसमें ऐसे—ऐसे बदलाव आ रहे हैं जो पचास वर्ष पहले तक केवल कल्पना—लोक की वस्तु थे जैसे सेल फोन के २G, ३G और अब 4th Generation। समय के साथ हमारी युवा—पीढ़ी भी बड़ी तेजी से बदल रही है। समाज के मूल्य बदल रहे हैं जैसे १. संयुक्त परिवार का स्थान एकल परिवार लेते जा रहे हैं। २. अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। ३. जैन परिवारों की नवयुवतियाँ भी बड़ी संख्या में नौकरी और व्यवसाय के क्षेत्र उतर में रही है। ४. टी. वी., कम्प्यूटर और इन्टरनेट हमारी किशोर पीढ़ी को भी अत्यधिक प्रभावित कर रहे हैं। इन सब परिवर्तनों के कारण व्यक्ति, समाज और देश के सामने नई–नई चुनौतियाँ उपस्थित हो रही हैं जिनका हमें वीरता धैर्य, विवेक और साहस के साथ सामना करना है।


प्रो. एम. एल. जैन ९२१३९८५२७०
सेवानिवृत्त दिल्ली विश्वविद्यालय
जैन प्रचारक दिसम्बर २०१४