Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


डिप्लोमा इन जैनोलोजी के फॉर्म भरने की अंतिम तारीख ३१ जनवरी २०१८ है |

जैन कानून

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जैन कानून

कानून अपने—आप में एक महत्त्वपूर्ण शब्द है। जब संसार में केवल एक ही व्यक्ति हो, तो उसके लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन जब एक से अधिक व्यक्ति हों, तब उन सब के बीच रहने, खाने—पीने, व्यवहार करने के लिए कुछ नियम आवश्यक हो जाते हैं। जैसे—जैसे समाज आगे बढ़ता है और मनुष्यों का तथा अन्य जीवों का समावेश होता जाता है, तब कुछ कानूनों की आवश्यकता पड़ती है। किसी राज्य के लिए कानूनों की व्यवस्था एक महत्वपूर्ण प्रश्न होता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायर्मूित बी. आर. कृष्ण अय्यर ने १९८० में दिए गये एक निर्णय में कहा था कि कानून शब्द का अर्थ ऐसे सिद्धान्त और कमाण्ड स्थापित करना है, जिससे समाज के अन्दर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—को स्पष्ट रूप से निर्देशित किया जाता है, और उनका क्रियान्वयन करने के लिए भी एक पद्धति होनी चाहिए। इसलिए विश्व के देशों में लगभग २०० वर्ष पूर्व कानूनों का निर्माण किया गया, जो कोडीफिकेशन के रूप में सामने आया। जहाँ तक जैन कानून का प्रश्न है, यह हमारे शास्त्रों में र्विणत—नीति—गत ग्रंथों में उपलब्ध है।

जैन कानून को लिखित रूप में किसी पुस्तिका का स्वरूप नहीं दिया जा सकता। वैसे तो कानूनों को प्राचीन—शास्त्र—स्मरण और संस्मरण, नीतिगत व्यवहार परम्पराएँ, रीति रिवाज सब मिलकर प्रभावित करते हैं, किन्तु विभिन्न कानूनों में कमोवेश उन्हें समाहित करते हुए विभिन्न धाराओं, नियमों, उप—नियमों में बनाया जाता है। चूँकि जैन कानून नाम से कोई पुस्तक प्रभावी रूप से बन ही नहीं पायी, इसलिए अनेक अवसरों पर प्रीवी कौंसिल जैसे सर्वोच्च न्यायिक अदालतों में उन्हें कहना पड़ा कि जैन धर्म के बारे में यदि कोई लिखित कानून होता, तो बहुत अच्छा होता। जब सन् १९२१ में डॉ. गौड़ का हिन्दू कोड प्रकाशित हुआ और उन्होंने उसमें जैनियों को धर्म—विमुख—हिन्दू जैसे शब्दों सं सम्बोधित किया। तब जैन समाज ने उसका विरोध किया और जैन लॉ कमेटी के नाम से अंग्रेजी भाषाविद् वकीलों, शास्त्रज्ञ पंडितों और अनुभवी विद्वानों की एक समिति स्थापित हुई, जिसने प्रारम्भ में बहुत अच्छा काम किया, परन्तु अन्तत: अनेक कारण, जैसे—सुदूर देशों की यात्रा के कारण इस कमेटी का सपना पूरा नहीं हो सका। कुछ ऐसी स्थितियाँ बनी थीं, जिनके कारण जैनियों को विवश होना पड़ा था कि वे अपने कानून के बारे में सोचें। जिसमें १८६७ में कलकत्ता हाईकोर्ट ने जैन लोगों पर हिन्दु लॉ इसलिये लागू कर दिया क्योंकि जैनों का कोई अलग कानून ही नहीं है।

जैन कानून के सम्बन्ध में प्रेरक एवं सराहनीय कार्य स्व. बैरिस्टर चम्पतराय जी ने आज से लगभग ९० वर्ष पूर्व प्रारम्भ किया और लन्दन में उन्होंने वर्ष १९२५ में ‘जैन कानून’ नामक पुस्तक तैयार की तथा उसकी भूमिका २६-६-१९२६ को अंग्रेजी में लिखी गयी। इस प्रकार जैन लॉ की आधारभूत इस समय केवल निम्नलिखित पुस्तके हैं—

१. भद्रबाहु संहिता—जो श्री भद्रबाहु स्वामी श्रुतकेवली के समय का (जिन्हें लगभग २३०० वर्ष हुए) न होकर बहुत काल—पश्चात् का संग्रह किया हुआ ग्रंथ जान पड़ता है, जिस पर भी यह कई शताब्दियों पुराना है। इसकी रचना और प्रकाश सम्भवत: विक्रम संवत् १६५७-१६६५ अथवा १६०१-१६०९ ई. के अन्तर में होना प्रतीत होता है। यह पुस्तक उपासकाध्ययन के ऊपर निर्भर की गयी है। इसके रचयिता का नाम विदित नहीं है।

२. अर्हन्नीति—यह श्वेताम्बर ग्रंथ है, इसके सम्पादक का नाम और समय इसमें नहीं दिया गया, किन्तु यह कुछ अधिक—कालीन ज्ञात नहीं होता है। परन्तु इसके अन्तिम श्लोक में सम्पादक ने स्वयं यह माना है कि जैसा सुना है, वैसा लिपिबद्ध किया।

३. वर्धमान—नीति—इसका समपादन श्री अमितगति आचार्य ने लगभग संवत् १०६८ वि. या १०११ ई. में किया है। ये राजा भोज के समय में हुए थे। इसके और भद्रबाहु संहिता के कुछ श्लोक सर्वथा एक ही हैं। जैसे ३०—३४ जो भद्रबाहु संहिता में क्र. संख्या ५५-५६ पर उल्लिखित हैं।

इससे विदित होता है कि दोनों पुस्तकों के रचने में किसी प्राचीन ग्रंथ की सहायता ली गई है। इससे इस बात का भी पता चलता है कि भद्रबाहु—संहिता यद्यपि वह लगभग ३२५ वर्ष की लिखी है, तो भी वह एक अधिक प्राचीन ग्रंथ के आधार पर लिखी गयी है, जो सम्भवत: ईस्वी सन् के कई शताब्दि पूर्व के सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु स्वामी भद्रबाहु के समय में लिखी गयी होगी, जैसा इसके नाम से विदित होता है, क्योंकि इतने बड़े ग्रंथ में वद्र्धमान नीति जैसे छोटी—सी पुस्तक की प्रतिलिपि किया जाना समुचित प्रतीत नहीं होता है।

४. इन्द्रनन्दी—जिन—संहिता—इसके रचयिता वसुनन्दि इन्द्रनन्दि स्वामी है। यह पुस्तक भी उपासकाध्ययन अंग पर निर्भर है। विदित रहे कि उपासकाध्ययन अंग का लोप हो गया है और अब केवल इसके कुछ उपांग अवशेष हैं।

५. त्रिवर्णाचार—संवत् १६६७ वि. के मुताबिक १६११ ई. की बनी हुई पुस्तक है। इसके रचयिता भट्टारक सोमसेन स्वामी है, जो मूलसंघ की शाखा पुष्कर गच्छ के पट्टाधीश थे। इनका ठीक स्थान विदित नहीं है।

६. श्री आदिपुराण—यह ग्रंथ भगवत्जिनसेनाचार्यकृत है, जो ईस्वी सन् की नवीं शताब्दी में हुए हैं, वर्तमान काल में इतने ग्रंथों का पता चला है, जिनमें नीति का मुख्यत: वर्णन है। परन्तु इनमें से किसी में भी सम्पूर्ण कानून का वर्णन नहीं मिलता है, तो भी यदि जो कुछ अंग उपासकाध्ययन का लोप होने से बच रहा है, वह सब कानून की कुछ आवश्यकीय बातों के लिये यथेष्ट हो सकता है। चाहे उसका भाव समझने में प्रथम कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़े।

जब अंग्रेज आये, तो जैनियों ने अपने शास्त्रों को छिपाया व सरकार न्यायालयों में पेश करने का विरोध किया। एक सीमा तक उनका यह कृत्य उचित था, क्योंकि न्यायालयों में किसी धर्म के भी शास्त्रों का कोई मुख्य सम्मान नहीं होता। कभी—कभी न्यायाधीश ओर अन्य कर्मचारी प्राय: शास्त्रों के पृष्ठों के पलटने में मुँह का थूक लगाते हैं, जिससे प्रत्येक र्धािमक के हृदय को दु:ख होता है; परन्तु इस दु:ख का उपाय यह नहीं है कि शास्त्र पेश न किये जावें; क्योंकि प्रत्येक कार्य समय के परिवर्तनों का विचार करते हुए अर्थात् अर्थात् जैन सिद्धान्त की भाषा में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से हाना चाहिए।

जैन कानून के अन्तर्गत बैरिस्टर श्री चम्पतराय जी ने वर्ष १९२५ में मुख्यत: निम्नलिखित विषयों को शामिल किया था :

१. दत्तक विधि और पुत्र विभाग

२. विवाह

३. सम्पत्ति

४. उत्तराधिकार

५. स्त्री—धन

६. भरण—पोषण

७. संरक्षण

८. रिवाज

प्रमुखतया:

जैन लोगों में यह विशेष—विषय हैं जिन पर प्राचीन शास्त्रों में नीतिगत उल्लेख मिलते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि जैनों को अपने लिए पृथक् से कानून की क्या आवश्यकता है ? तब एक ही उदाहरण से इस बात को स्पष्ट किया जा सकता है कि स्वतन्त्रता से पूर्व की न्यायिक व्यवस्था में अनेक ऐसे लेख मिलते हैं, जहाँ ब्रिटिश न्यायाधीशों ने जैनों के किसी कानून के न होने का उल्लेख किया है और यह कहा है कि जैनों के लिए कानून अलग से होना चाहिए। इसका महत्व इस बात से भी लगाया जा सकता है कि हिन्द लॉ में महिला का स्थान पुत्र के अधीन माना गया है अर्थात् पिता की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति पुत्रों को प्राप्त होती है, किन्तु जैन कानून के अन्तर्गत पुत्र को माँ के अधीन माना गया है तथा माँ के अधिकार पहले माने गये हैं। इसका परिणाम यह है कि यदि सम्पत्ति माँ को प्राप्त होती है, तो पुत्र उसके साथ दुव्र्यवहार नहीं कर सकेगे और माँ को पुत्र के ऊपर बेसहारा रहकर नहीं जीना पड़ेगा। ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जो जैन कानून के अन्तर्गत समाविष्ट होते हैं। उपर्युक्त लिखे हुए विषयों में अब हम एक—एक की चर्चा करते हैं—

१. दत्तक एवं पुत्र विभाग—

जैन कानून में केवल दो प्रकार के पुत्र ही माने गये हैं जिसमें पुत्र उसे माना गया, जो अपनी विवाहिता स्त्री से पैदा हुआ हो। दत्तक उसे माना गया, जिसे दत्तक विधि के अनुसार प्राप्त किया गया हो। यदि अपना पुत्र जीवित न हो, तो पुरुष अपने निमित्त विधि के अनुसार प्राप्त किया गया हो। यदि अपना पुत्र जीवित न हो, तो पुरुष अपने निमित्त गोद ले सकता है और यदि अपना पुत्र दुराचरण के कारण निकालकर उससे पुत्रत्व का रिश्ता समाप्त कर दिया हो, तो भी गोद लिया जा सकता है। इसी प्रकार यदि पति की मृत्यु हो गयी हो, तो विधवा स्त्री भी गोद ले सकती है। जैन कानून में प्रथम पुत्र को गोद नहीं देना चाहिए ? ऐसे उल्लेख मिलते हैं। गोद लेने की विधि में कहा गया है कि प्रात:काल दत्तक देने वाला पिता मन्दिर में जाकर भगवान की पूजा करे तथा परिवारीजन एवं समाज के लोगों को एकत्रित उनके समक्ष पुत्र जन्म का उत्सव मनाये ओर रिवाज के अनुसार पुत्र जन्म का उत्सव मनाये ओर रिवाज के अनुसार पुत्र को माता–पिता गोद लेने वाले अगर स्त्री—पुरुष दोनों हैं, तो उनकी गोद में बच्चे को दें ओर उसके उपरान्त आतिथ्य आदि की व्यवस्था की जावे, तब गोद सम्पन्न मानी जाती है। दत्तक लेने का परिणाम यह होता है कि दत्तक पुत्र भी अपनी पत्नी से पैदा पुत्र के समकक्ष ही माना जाता है और उसे भी वही अधिकार प्राप्त होते हैं, जो एक पुत्र को प्राप्त होते हैं। पिता की मृत्यु के बाद पगड़ी बांधने का उत्तरायित्व पुत्र को प्राप्त होता है, चाहे वह दत्तक पुत्र ही क्यों न हो।

२. विवाह—

जैन कानून के अन्तर्गत ऐसी कन्या से विवाह करना चाहिए, जो वर के गोत्र की न हो, परन्तु उसकी जाति की हो, आरोग्य, विद्यावती, शीलवती और उत्तम गुणों से सम्पन्न हो, रूपवती हो। वर से डील—डौल में न्यून हो, परन्तु यह आवश्यक नियम है। बुआ की लड़की, मामा की लड़की और साली के साथ विवाह करने का दोष नहीं माना गया है, किन्तु मौसी की लड़की, सासु की बहिन, गुरु की पुत्री से विवाह करना अनुचित माना गया है। यदि विवाह के पूर्व कन्या का स्वर्गवास हो जाये, तो खर्चा काटकर वह सब वापिस कर देना चाहिए, जो उसके माता—पिता से प्राप्त हुआ था। विवाह को ब्राह्य—विवाह, दैव—विवाह, आर्ष—विवाह, प्राज्ञापत्य—विवाह, ये चार धर्मविवाह कहलाते हैं और आसुर, गान्र्धव, राक्षस और पैशाच विवाह आदि चार अधर्मविवाह कहलाते हैं।

बुद्धिमान वर को अपने घर पर बुलाकर बहुमूल्य आभूषणों आदि सहित कन्या देना ब्राह्य—विवाह है। श्री जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करने वाले सहधर्मी प्रतिष्ठाचार्य को पूजा की समाप्ति पर पूजा कराने वाला अपनी कन्या दे दे, तो वह दैव विवाह है। यही दोनों उत्तम प्रकार के विवाह माने गये हैं, क्योंकि इनमें वर से शादी के बदले में कुछ लिया नहीं जाता। कन्या के वस्त्र या कोई ऐसी ही मामूली दामों की वस्तु वर से लेकर धर्मानुकूल विवाह कर देना आर्ष विवाह है।

विवाह की विधि में सप्तपदी का भी उल्लेख गया है। विवाह सम्पन्न होने के उपरान्त तीर्थ—क्षेत्र की यात्रा करने का भी उल्लेख किया गया है। ये सारी क्रियाएँ संस्कृति और संस्कार को संरक्षित रखने के उद्देश्य से बतायी गयी हैं।

३. सम्पत्ति

जैन लॉ के अनुसार सम्पत्ति के स्थावर और जंगम दो भेद हैं। जो पदार्थ अपनी जगह पर स्थिर है और हलचल नहीं कर सकता, वह स्थावर है, जैसे गृह, बाग इत्यादि और जो पदार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान में सुगमतापूर्वक आ जा सकता है, वह जंगम है। दोनों प्रकार की सम्पत्ति विभाजित हो सकती है, परन्तु ऐसी सलाह दी गई है कि स्थावर द्रव्य अविभाजित रखे जाएँ, क्योंकि इसके कारण प्रतिष्ठा और स्वामित्व बने रहते हैं।

दाय भाग की अपेक्षा सप्रतिबन्ध और अप्रतिबन्ध दो प्रकार की सम्पत्ति मानी गई है। पहले प्रकार की सम्पत्ति वह है, जो स्वामी के मरण पश्चात् उसके बेटे, पोतों को सन्तान की सीधी रेखा में पहुँचती है। दूसरी वह है, जो सीधी रेखा में न पहुँचे, वरन् चाचा, ताऊ इत्यादि कुटुम्ब—सम्बन्धियों से मिले।

निम्न प्रकार की सम्पत्ति विभाजन योग्य नहीं है—

१. जिसे पिता ने अपने निजी मुख्य गुणों या पराक्रम द्वारा प्राप्त किया हो, जैसे राज्य।

२. पैतृक सम्पत्ति की सहायता बिना जो द्रव्य किसी ने विद्या आदि गुणों द्वारा उपार्जन किया हो, जैसे विद्या—ज्ञान द्वारा आय।

३. जो सम्पत्ति किसी ने अपने मित्रों अथवा अपनी स्त्री के बन्धुजनों से प्राप्त की हो।

४. जो खानों में गड़ी हुई उपलब्ध हो जावें अर्थात् दफीना आदि।

५. जो युद्ध अथवा सेवा—कार्य से प्राप्त हुई हो।

६. जो साधारण आभूषणादिक पिता ने अपनी जीवनावस्था में अपने पुत्रों व उनकी स्त्रियों को स्वयं दे दिया हो।

७. स्त्री—धन।

८. पिता के समय डूबी हुई सम्पत्ति, जिसको किसी भाई ने अविभाजित सम्पत्ति की सहायता बिना प्राप्त की हो, परन्तु स्थावर—सम्पत्ति की दशा में वह पुरुष जो उसे प्राप्त करे, केवल अपने सामान्य भाग से चतुर्थ अंश अधिक पाएगा।

जैन कानून के मुताबिक सम्पत्ति को विभाजन—योग्य भी माना गया है और पारिवारिक सुख व शान्ति के लिए विभाजन को औचित्यपूर्ण कहा गया है। पति की मृत्यु के पश्चात् सम्पत्ति को बांटे जाने का उल्लेख है। उत्तराधिकार में कुछ अयोग्यताएँ भी बतायी गयी हैं :

१. पैदायशी नपुंसकता या ऐसे रोगों का रोगी जो चिकित्सा करने से निरोग नहीं हो सकता।

२. जो सब प्रकार से सदाचार का विरोधी हो।

३. उन्मत्त, लंगड़ा, अन्धा, रजली (क्षुद्र—नीच), कुब्जा।

४. जातिच्युत, अपाहिज, माता—पिता का घोर विरोधी, मृत्युनिकट, गूँगा, बहरा, अति—क्रोधी, अंगहीन।

ऐसे व्यक्ति केवल गुजारे के अधिकारी हैं, भाग के नहीं। परन्तु यदि उनका रोग शान्त हो गया है तो वह अपने भाग के अधिकारी हो जाएँगे। नहीं तो उनका भाग उनकी पत्नियों या पुत्रों को यदि वे योग्य हो, पहुँचेगा या पुत्री के पुत्र को मिलेगा। दायभाग की अयोग्यता का यह भाव नहीं है कि मनुष्य अपनी निजी सम्पत्ति से भी वंचित कर दिया जाए।

साधु का भाग—यदि कोई पुरुष विभाजित होने से पूर्व साधु होकर चला गया हो, तो स्त्री धन को छोड़कर सम्पत्ति के भाग उसी प्रकार लगाने चाहिए जैसे उसकी उपस्थिति में होते और उसका भाग उसकी पत्नी को दे देना चाहिए। यदि उसके एक पुत्र ही है, तो वह स्वभावत: अपने पिता के स्थान को ग्रहण करेगा। यदि कोई व्यक्ति अविवाहित मर जाए अथवा साधु हो जाए, तो उसका भाग उसके भाई—भतीजों को यथा—योग्य मिलेगा।

माता के अधिकार—यदि पिता की मृत्यु पश्चात् बाँट हो, तो माता को पुत्र के समान भाग मिलता है। वास्तव में उल्लेख तो यह है कि उसे पुत्रों से कुछ अधिक मिलना चाहिए, जिससे वह परिवार और कुटुम्ब की स्थिति को बनाये रखे। इस प्रकार यदि पुत्र और एक विधवा जीवित है, तो मृतक की सम्पति के ५ समान भाग किये जाएँगे, जिनमें से एक माता को और शेष चार में से एक—एक प्रत्येक भाई को मिलेगा। माता को कितना अधिक दिया जाये इसकी सीमा नियत नहीं है। परन्तु अर्हन्नीति में इस प्रकार का उल्लेख है कि पिता के मरण के पश्चात् यदि बांट हो, तो प्रत्येक भाई अपने–अपने भाग में से आधा—आधा माता को देवे।

इस प्रकार यदि चार भाई हैं, तो प्रत्येक भाई चार आना हिस्सा पाएगा और माता का भाग चार आने के अद्र्धभाग का चौगुना होगा अर्थात् २ ² ४ · ८ आना होगा। पिता की जीवनावस्था में माता को एक भाग बांट में मिलना चाहिए। पुत्रोत्पत्ति होने से माता एक भाग की अधिकारिणी हो जाती है। माता का वह भाग उसके मरण पश्चात् सब—भाई परस्पर समानता से बांट लें।

बहिनों का अधिकार—विभाजित होने के पश्चात् जो सम्पत्ति पिता ने छोड़ी है उसमें भाई और कुंवारी बहिन को समान भाग पाने का अधिकार है। यदि दो भाई और एक बहिन है, तो सम्पत्ति तीन समान भागों में बँटेगी। बड़ा भाई छोटी बहिन का, छोटे भाई की भाँति पालन करें और उचित दान देकर उसका विवाह करे। यदि ऐसी सम्पत्ति बचे। जो बांटने योग्य न हो, तो उसे बड़ा भाई ले लेवे। यह अनुमान होता है कि बहिन का भाग केवल विवाह एवं गुजारे निमित्त रखा गया है, अन्यथा भाई की उपस्थिति में बहिन का कोई अधिकार नहीं हो सकता। यदि विभक्त होने के पश्चात् कोई भाई मर जाय, तो उसकी सम्पत्ति को उसके भाई और बहिन समान बांट लें। ऐसा उसी दशा में होगा, जब मृतक ने कोई विधवा या पुत्र न छोड़ा हो यहाँ भी बहिन का अर्थ कुंवारी बहिन का है, जिसके विवाह और गुजारे का भार पैतृक सम्पत्ति पर पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसका यह दायित्व सप्रतिबन्ध दाय—भाग की दशा में मान्य नहीं हो सकता अर्थात् उस सम्पत्ति से लागू नहीं हो सकता, जो चाचा—ताऊ से मिली हो।

विधवा भावज का अधिकार—विधवा भावज अपने पति के भाग को पाती है और उसको अपने पति के जीवित भाईयों से अपना भाग पृथक कर लेने का अधिकार है। यदि वह कोई पुत्र गोद लेना चाहे, तो ले सकती है परन्तु ऐसे भाई की विधवा का, जो पहले ही अलग हो चुका हो, विभाग के समय कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई भाई साधु होकर अथवा संन्यास लेकर चला गया हैै, तो उसका भाग विभाग के समय उसकी स्त्री पाएगी। इस प्रकार जैन कानून में बंटवारा होने के बाद भी पुन: एक होने का उल्लेख किया गया है। यदि अन्य वर्णों की स्त्रियाँ हैं, तो उनसे सम्पन्न सन्तान के भागों का भी उल्लेख किया गया है। बँटवारा की जो विधि बतायी गयी है, उसके अनुसार कुछ प्रतिष्ठित मनुष्यों के समक्ष अविभाजित सम्पत्ति का मूल्यांकन कर लेना चाहिए और फिर उसके विभाग किये जाने चाहिए, ताकि मूल्यांकन की दृष्टि से सभी को उतना अंश मिल सके, जिसके वे अधिकारी हैं।

५. उत्तराधिकारी—जैन कानून के अनुसार उत्तराधिकार का क्रम निम्न प्रकार है :

१. विधवा,

२. पुत्र,

३. भ्राता,

४. भतीजा,

५. सात पीढ़ियों में सबसे निकट सपिण्ड,

६. पुत्री,

७. पुत्री का पुत्र,

८. निकटवर्ती बन्धु,

९. निकटवर्ती गोत्रज (१४ पीढ़ियों तक का),

१०. ज्ञात्या,

११. राजा।

राजा का कत्र्तव्य

यदि किसी मनुष्य का उत्तराधिकारी ज्ञात न हो तो राजा को तीन वर्ष पर्यन्त उसकी सम्पत्ति सुरक्षित रखनी चाहिए और यदि इस बीच में कोई व्यक्ति उसको आकर न मांगे, तो उसे स्वयं ले लेना चाहिए, किन्तु उस द्रव्य को र्धािमक कार्यों में खर्च कर देना चाहिए। इन्द्रनन्दि जिन संहिता में यह नियम ब्राह्मणीय सम्पत्ति के सम्बन्ध में उल्लिखित है, क्योंकि ब्राह्मण की सम्पत्ति राजा ग्रहण नहीं कर सकता है; परन्तु वर्धमान नीति में यह नियम सर्व वर्णों की सम्पत्ति के सम्बन्ध में है कि राजा को ऐसा धन धर्म—कार्यों में लगा देना उचित है। तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण की सम्पत्ति को उसकी विधवा या अन्य दामादों के अभाव में कोई ब्राह्मण ही ग्रहण कर सकेगा।

६. स्त्री—धन—जैन कानून में निम्न प्रकार के पाँच स्त्रीधन बताये गये हैं—

(क) अध्यग्निजो कुछ अग्नि और ब्राह्मणों की साक्षी में लड़की को दिया जाता है अर्थात् वह आभूषण इत्यादि जो पुत्री को उसकी माता—पिता विवाह के समय देते हैं।

(ख) अध्याह्वनिक—(लाया हुआ) जो द्रव्य वधु अपने पिता के घर से अपने पिता और भाईयों के सम्मुख लावे।

(ग) प्रीति—दानजो सम्पत्ति श्वसुर और सासु वधु को विवाह के समय देते हैं।

(घ) औदयिक (सौदयिक)—जो सम्पत्ति विवाह के पश्चात् माता-पिता या पति से मिले।

(ङ) अन्वाध्येय—जो वस्तुएँ विवाह के समय अपनी या पति के कुटुम्ब की स्त्रियों ने दी हो। संक्षेपत: वधू को जो कुछ विवाह के समय मिलता है, वह सब उसका स्त्री—धन है।

(च) भरण—पोषण—जैन कानून के अनुसार निम्न मनुष्य भरण—पोषण पाने के अधिकारी हैं :

१. जीवित तथा मृतक बालक, अर्थात् जीवित बालक और मृतक पुत्रों की सन्तान तथा विधवाएँ यदि कोई हो ;

२. वह मनुष्य जो भागाधिकार पाने के अयोग्य हो;

३. सबसे बड़े पुत्र के सम्पत्ति पाने की अवस्था में अन्य परिवार ;

४. अविवाहित पुत्रियाँ और बहिनें ;

५. विभाग होने के पश्चात् उत्पन्न हुए भाई, जबकि पिता की सम्पत्ति पर्याप्त न हो, परन्तु ऐसी दशा में केवल विवाह करा देने तक का भार बड़े भाईयों पर होता है। विवाह में स्वभावत: कुमार—अवस्था का विद्याध्ययन और भरण—पोषण भी शामिल समझना चाहिए ;

६. विधवा बहुएँ उस अवस्था में जब वह सदाचारिणी और शीलवती हों ;

७. ऐसी विधवा माता, जिसको व्यभिचार के कारण दायभाग नहीं मिला हो ;

८. तीनों उच्च वर्णों के पुरुषों से जो शूद्र स्त्री के पुत्र हो ;

९. माता और पिता जब वह दायभाग के अयोग्य हो।

१०. दासीपुत्र।

१. संरक्षकता—जैन कानून में जो पुत्र और पुत्रियाँ वय प्राप्त नहीं हैं अर्थात् बालिग नहीं होते हैं, तो उनकी सरंक्षकता के लिए निम्नलिखित अधिकारी मनुष्य क्रमानुसार बताए गये हैं :

१. पिता,

२. पितामह,

३. भाई,

४. चाचा,

५. पिता का गोत्रज,

६. धर्मगुरु,

७. नाना,

८. मामा।

८. रिवाज—रिवाज कई प्रकार के होते हैं। साधारण व विशेष अर्थात् जातीय कोटुम्बिक और स्थानीय किन्तु जैन कानून के अनुसार रिवाज प्राचीन, निश्चित व्यावहारिक और उचित होने चाहिए, सदाचार के प्रतिकूल सरकारी कानून के विरोध और सामाजिक नीति के विरोधी रिवाज उचित नहीं माने गये हैं।

९. उपसंहार—यह प्रश्न उठ सकता है कि पृथक से जैन कानून बनाने की क्या आवश्यकता है?.... अभी हाल में ही सिक्ख विवाह कानून देखने में आया था और हमें हमारे शास्त्रों में जो रीति—नीति दी गयी है, उसके अनुसार अपने कानून का निर्माण करना चाहिए। स्व. बैरिस्टर चम्पतराय जैन ने वर्ष १९२५ में ब्रिटिश हुकूमत की इच्छा को देखते हुए शास्त्रों का अध्ययन किया और उसके आधार पर जैन कानून की रचना की। हमारे शास्त्रों में जो कानून दिये गये हैं, उनमें कुछ ऐसे विशेष प्रसंग हैं, जो अन्य कानूनों में नहीं मिलते हैं, जैस महिला को स्वयं परिपूर्ण उत्तराधिकार प्राप्त करना, इसके अतिरिक्त यदि पुत्रधर्म विरोधी आचरण करता हो या दुराचरण करता हों तो उसे परिवार से निकालकर उसका पुत्रत्व समाप्त कर अयोग्य घोषित कर देने का प्रावधान है। इसी प्रकार यदि दत्तक पुत्र भी दुराचरण का दोषी पाया जाये तो उसे भी निकाला जा सकता है। बैरिस्टर श्री चम्पतराय जी ने १९२५ में यह आकांक्षा व्यक्त की थी कि जैन लोगों में जो कानून के ज्ञाता है, अंग्रेजी भाषा का मन्थन करना चाहिए, जिनमें यह नीति दी गयी है और फिर उसके आधार पर अपना एक पूर्व जैन कानून जिसमें विभिन्न धाराएँ उप—धाराएँ इन सभी विषयों से सम्बन्धित हैं, समाविष्ट करते हुए तैयार करना चाहिए किन्तु ९० वर्ष व्यतीत हो जाने के उपरान्त भी अब तक इस दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं हो सका है। आवश्यकता इस बात की है कि कोई राष्ट्रीय संस्था इस मामले में पहले करे, ताकि यह कार्य सफल हो सके।


श्री अनूपचन्द्र जैन, एडवोकेट
जैन प्रचारक दिसम्बर २०१४