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जैन दर्शन में अनेकान्त और स्याद्वाद

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जैन दर्शन में अनेकान्त और स्याद्वाद

    मध्य प्रदेश संस्कृत अकादेमी, भोपाल द्वारा चातुर्मास सेवा समिति, इन्दौर के सहयोग से अ. भा. अनेकान्त संगोष्ठी, इन्दौर में १६—१७ नवम्बर ९६ को आयोजित की गई थी। यह आलेख इसी संगोष्ठी के प्रसंग पर मूर्घन्य जैन विद्वान पं. नाथूराम ‘डोंगरीय’ जैन द्वारा लिखा गया था। विचारशील मनीषियों द्वारा अनादिकाल से ही सत्य की खोज की जाती रही है। यह विश्व क्या है ? कब से हैं? इसके अनंत पदार्थों और उनके स्वभावों में भी क्या—क्या विशेषताएँ हैं ? यह सब कृत्रिम है या अकृत्रिम ? इनका सृष्टा कौन है ? आत्माएँ सुखी—दुखी क्यों होती हैं ? इनको सुख—दुख कौन देता है ? क्या ये सुखमयी संसार से कभी मुक्त हो सकती हैं ? ये जिज्ञासाएँ विचारशील मानव के मन में सदा से ही जन्म लेती रही है।

    यद्यपि इनके समाधान करने के प्रयास भी विज्ञ मनीषियों द्वारा अपनी अपनी समझ और शक्ति के अनुसार समय—समय पर किए जाते रहे हैं, किन्तु सीमित ज्ञान और एकांगी अनुभवों द्वारा किये गए प्रयास और निष्कर्ष पूर्ण सत्य की खोज में अपूर्ण रहने तथा उन्हें ही पूर्ण सत्य मानने और निरूपण करने के कारण वे सर्वमान्य नहीं बन सके, फलस्वरूप विश्व में नये—नये मत—मतांतरों की सृष्टि ही होती रही। जिससे सांप्रदायिकता ने जन्म लेते हुए मानव समाज को विभाजित कर उनको अनेक कठघरों में बद भी कर दिया। यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जावे तो मत और पंथ निर्माताओं ने अल्पज्ञ होते हुए भी स्वयं को सर्वज्ञ मान अपनी प्रभावशाली वत्तृत्व कला से समाज को मोहित ओर आकृष्ट कर अपने एकांगी तथा काल्पनिक विचारों एवं मान्यताओं को ही पूर्ण सत्य घोषित कर नवीन मतों और पंथों की स्थापना की है। जिससे एकांगी और परस्पर विरोधी उनके सिद्धांतों तथा मान्यताओं में कितनी विसंगति हुई, यह विचारणीय विषय हो जाता है।

    इस संदर्भ में भगवान महावीर ने १२ वर्ष पर्यंत अनवरत तपस्या करते हुए तत्व चिंतन में निरत रहकर एक महान दार्शनिक जीवन जिया और आत्म साधना के बल पर अपने ज्ञान को उत्कर्ष की चरम सीमा पर पहुँचाकर महात्मा बुद्ध की मान्यतानुसार सर्वज्ञता को प्राप्त किया। तत्पश्चात् अनेकांतात्मक वैज्ञानिक सत्य को वीतराग भाव से स्याद्वाद की मौलिक प्रणाली द्वारा प्रकट किया साथ ही विश्व के समस्त प्राणियों के हित में विश्वधर्म का शुभ संदेश भी प्रदान किया।

    उन्होंने सर्वप्रथम विश्वधर्म की व्याख्या की तथा संसार के सभी प्राणियों के प्रति बिना किसी भेद भाव के समदृष्टि रखकर उनके दु:ख दूर करने हेतु उन्हें समदृष्टि बनने का उपदेश दिया। साथ ही यह बताया कि उनके दु:ख का प्रमुख कारण उनकी भ्रम बुद्धि (मिथ्यादर्शन) अज्ञान (मिथ्याज्ञान) और असंयम (मिथ्याचारित्र) है। समदृष्टि बनने के लिये वस्तु—स्वरूप का यथार्थ ज्ञान (तत्वज्ञान) आवश्यक है। तत्वज्ञान की प्राप्ति हेतु जिज्ञासु मात्र होने से काम नहीं होगा। बल्कि तत्त्वों (पदार्थों) एवं उनके साथ आत्मा के परस्पर संबंधों को जानना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। तत्वज्ञानी मोह माया से निवृत्त हो दुराचरण का त्याग कर सदाचार पालन करते हुए यदि आत्मनिष्ठ हो जावे तो वह पूर्ण सुखी (परमात्मा) बन सकता है।

    इस विश्व के सभी पदार्थ अविनश्वर हैं न तो वे कभी अभावरूप में रहकर उत्पन्न हुए थे और न कभी समूल नष्ट ही होंगे। उन्हें किसी ने नहीं बनाया और न कोई उनका सर्वथा नाश ही कर सकता है वे सदा कायम रहते हुए भी अपने परिणमन शील स्वभाव के कारण परिवर्तित भी होते रहते हैं, अर्थात् अपने पर्यायों (दशाओं) को निरन्तर बदलते भी रहते हैं। प्रत्येक पदार्थ अपने अनेक गुणों (शक्तियों) का अखंड पिंड होता है जो उसमें वे सदा सहभावी होते हैं तथा उसकी पर्यायें क्रमभावी होती हैं जो एक के बाद एक उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं फिर भी पदार्थ कायम रहते हैं।

    इस प्रकार अनेक गुणों और पर्यायमय (गुण धर्मों वाली) प्रत्येक वस्तु स्वभावत: अनेकांतात्मक (गुण धर्मात्मक) है जिसका ज्ञान प्रमाण एवं नयों के द्वारा होता है। वस्तु के सर्वांगीण ज्ञान को प्रमाण तथा एकांगी ज्ञान को नय कहते हैं। ये एकांगी ज्ञान भी प्रमाण के अंश हैं परन्तु इन्हें परस्पर सापेक्ष होना चाहिये, क्योंकि वस्तु के अंश भी अपनी परस्पर एकता को लिये हुए हैं।

    इस प्रकार ढाई हजार वर्ष पूर्व दिये हुए महावीर के तथ्य और सत्य पर आधारित वैज्ञानिक उपदेशों एवं मान्यताओं को सिद्धांत मर्मज्ञ स्वामी समन्तभद्राचार्य ने तत्कालीन विद्यमान मतमतांतरों की अन्वीक्षा कर भगवान की स्तुति करते हुए अपने एक ग्रंथ में लिखा कि—

दया दम त्याग समाधि निष्ठं नय प्रमाण प्रकृतार्थ सार्मथ्
अघृष्यमन्मैरखिलै: प्रवादै जिनं त्वदीयं मतमद्वितीयम्।

    अर्थात् हे भगवान् ! आपका मत (सिद्धांत) अद्वितीय है, क्योंकि वह जीवदया से परिपूर्ण है, दम (आत्म नियंत्रण) और त्याग की गरिमा से मंडित होता हुआ समाधि (सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र मयी) धर्म—निष्ठ है। तथा नयों और प्रमाणों द्वारा अनेकांतात्मक यथार्थ वस्तु स्वरूप का प्रतिपादक होकर सत्य ज्ञान की ठोस नींव पर प्रतिष्ठित है व समस्त दोषों से रहित (निष्कलंगक) है। इस प्रकार वह सचमुच ही अद्वितीय सिद्ध होता है।

    यों तो भगवान महावीर ने धर्म—अधर्म, पुण्य—पाप, जीव—अजीव आदि सभी तत्वों एवं विद्याओं का उपदेश देकर सत्य अहिंसा आदि सिद्धांतों का विशद विवेचन किया ही था, किन्तु वस्तु विज्ञान की पूर्णता एवं यथार्थता की चरम सीमा तक पहुँचने की (वस्तु के अनेकांतात्मक स्वभाव के कारण) जानकारी हेतु स्याद्वाद द्वारा जो अनुपम विधान किया था वह आज भी समझदार मनीषियों द्वारा सराहा जाता है। फिर आधुनिक भौतिक विज्ञान के मनीषियों का तो अनेकांत सिद्धांत प्रमुख रूप से श्रद्धेय और उपादेय भी बन चुका है, क्योंकि प्रत्येक वस्तु में व्यक्त गुणों और विशेषताओं के अतिरिक्त अव्यक्त अनंत शक्तियों की अनेक संभावनाओं को प्रकट होने, स्वीकार किये बिना उनके आविष्कार करने के प्रयत्न करने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसी अनेकांत सिद्धांत की विशेषता एवं क्षमताओं पर मुग्ध होकर पुरुषार्थसिद्धमुपाय ग्रंथ में मंगलाचरण के रूप में उसे नमन करते हुए परम आध्यात्मिक संत आचार्य अमृतचन्द लिखते हैं—

परमागमस्य जीवं निषिद्ध जात्यंध सिन्धुरविधानम्।
सकलनय विलसितानं विरोधमधनं नमाम्यनेकांतम्।।

    अर्थात् जो परमागम (जिनवाणी) का प्राण है तथा जन्मांध मनुष्यों के एकांगी भ्रमपूर्ण हस्ति विज्ञान के कथन का निषेधक है—जो कि केवल पूँछ, सूंड आदि हाथी के एक अंश को ही हाथी मानकर कथन कर रहे हैं जिससे सम्पूर्ण अर्थात् परस्पर विरोधी कथन करने वाली वस्तु स्वरूप संबंधी दृष्टियाँ मैत्रीभाव पूर्वक क्रीड़ा करती हैं तथा जो उनके विरोधी मतों का समन्वयात्मक मार्ग प्रशस्त करता है उस मंगलमय अनेकांत को मैं नमन करता हूँ।

    उल्लिखित मंगलाचरण में अनेकांत की विशेषताओं एवं क्षमताओं का समावेश कर उसके स्वरूप का बोध कराया गया है। जिसका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है— प्रत्येक वस्तु अपने द्रव्य गुण एवं पर्यायों से सदा सम्पन्न रहा करती है। यही उसकी अनेक धर्मात्मकता दूसरे शब्दों में अनेकांतात्मकता है तब ही वह नयों और प्रमाणों द्वारा अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान करा सकेगी। जबकि वस्तु को एकांगी प्रतिपादन और उसके ही पूर्ण सत्य होने की घोषणा सत्य से परे हो जाने के कारण पाठक को भ्रमित ही करती है। अत: सत्यस्वरूप—वस्तु के प्रतिपादक अनेकांत को आगम का प्राण कहा गया है।

    अनेकांत का दूसरा विशेषण जन्मांधों के एकांगी हस्तिविज्ञान के पूर्ण सत्य होने की मान्यता का निषेधक होना दर्शाता है। यद्यपि हाथी की पूँछ उसका एक अंग अवश्य है किन्तु पूँछ ही हाथी नहीं हैं जिसे अंधों ने हाथी मान लिया। इसी प्रकार विश्व के जो मत मतांतर वस्तु में केवल एक धर्म/विशेषता के सिवाय अन्य गुणधर्मों का निषेध करते हैं, उन्हें वस्तु का सर्वांगीण प्रतिपादन कर अनेकांत यथार्थ ज्ञान प्रदान कर उनके भ्रम को समाप्त करने की उदार दृष्टि प्रदान करता है।

    तीसरी विशेषता अनेकांत का सर्व नयों (दृष्टियों) की क्रीड़ा भूमि का होना है। एक नय वस्तु के एक अंश को ही जानता और उसका प्रतिपादन करता है जबकि अन्य नय वस्तु में विद्यमान अन्य अनेक विशेषताओं को जानते और प्रतिपादन भी करते हैं। अन्य वस्तु के एकांश का प्रतिपादन करने से सभी नयों में सत्यांश विद्यमान है। और इस कारण अनेकांत दर्शन सभी परस्पर सापेक्ष नयों की क्रीड़ा भूमि सिद्ध हो जाता है। एक ही वस्तु में अस्तित्व, नास्तित्व, नित्यत्व, अनित्यत्वादि परस्पर विरोधीधर्म सहज भाव से विराजते हैं जैसे जीव में स्वरूप से (अनेक द्रव्य क्षेत्र काल भाव अपेक्षा) अस्तित्व है तो उसी में अन्य अजीव द्रव्य का उसी समय नास्तित्व भी है। इसीलिये उसे जीवत्व की दृष्टि से अस्ति और अजीवत्व की दृष्टि से नास्ति स्वरूप जाना जाता है। दोनों की दृष्टियाँ सत्य है और परस्पर सापेक्ष रहकर जीव का यथार्थ ज्ञान कराती है। दूसरे शब्दों में जीवजीव है और वह अजीव नहीं है—यह बतलाती है। सो ठीक ही है। इस संदर्भ में आचार्य समंतभद्रस्वामी का कथन बड़ा ही महत्वपूर्ण है। वे अपने आप्तमीमांसा नामक ग्रंथ में लिखते हैं–

सदैव सर्व को नेच्छेत् स्वरूपादि चतुष्टयात् ।
असदैव विपर्यासान्न चेन्न व्यवतिष्ठते।।

    अर्थात् ऐसा कौन मनीषी है जो वस्तु को स्वरूप से सत् और पररूप से असत् स्वीकार न करेगा जबकि प्रत्येक वस्तु अपने द्रव्य वस्तुओं के द्रव्य गुण पर्यायों (काल भावादि) से भिन्नता भी बनाए हुए है। जैसे सोना सोना है, चाँदी नहीं है—अर्थात् सोने में चाँदी आदि भिन्न पदार्थों का नास्तित्व भी अवश्य है, अन्यथा वह सोना, चाँदी भी, पीतल भी तथा अन्य द्रव्य भी हो जावेगा—जो संभव नहीं है और जो वस्तु की व्यवस्था के विपरीत है। इसी प्रकार चाँदी, चाँदी है—सोना नहीं है। यही प्रत्यक्ष सिद्ध व्यवस्था है। इसी से अनेकांत परस्पर सापेक्ष सभी नयों की क्रीड़ा भूमि सिद्ध है।

    विरोध मंथन की शक्ति अनेकांत की चौथी विशेषता है—जिसका अभिप्राय सभी मतमतांतरों के परस्पर विरोधी ऐकान्तिक मान्यताओं की खींच—तान को समन्वय के राजमार्ग द्वारा समाप्त कर उन्हें एकता के सूत्र में पिरोने एवं एकांगी साम्प्रदायिक दृष्टि के साथ अन्य अन्य दृष्टियों में विद्यमान सत्य को उदारतापूर्वक स्वीकार कराने से संबंधित है।

    उदाहरण के लिये जैसे सांख्य दर्शन वस्तुओं में सर्वथा कूटस्थ नित्यता का प्रतिपादन कर अपने मत को ही पूर्ण सत्य मानता है और बौद्ध दर्शन क्षणिक वाद का आश्रय लेकर सभी वस्तुओं को सर्वथा क्षणिक मानकर उनमें नित्यतमा को किसी भी प्रकार से स्वीकार नहीं करता है—तब वही अनेकांत दर्शन अपनी विशाल और सर्वधर्म समभाव की उदार दृष्टि द्वारा सर्वथा नित्य और सर्वथा क्षणिक सिद्धांतों का समन्वय कर यह दर्शा देता है कि वस्तु का वस्तुत्व कभी नष्ट नहीं होता है। इस दृष्टि से तो कथंचित् नित्य है, किन्तु प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील भी है अर्थात् अपनी पर्यायों (दशाओं) द्वारा वह प्रतिक्षण परिवर्तित भी होती रहती है अत: वह कथंचित अनित्य भी है। जैसे आत्मा (जीव) का अस्तित्व अनादि होने से वह नित्य है, किन्तु वही आत्मा कभी मनुष्य, कभी देव, नारकी आदि रूपों को धारण करता रहता है अत: वह पर्याय दृष्टि से अनित्य भी है। क्योंकि जब जीव मनुष्य पर्याय का परित्याग कर देव नारकी का रूप धारण करता है तब वह मनुष्य न रहकर देव ही होता है या नारकी बनकर नारकी। इस प्रकार पर्याय दृष्टि से उसमें अनित्यता भी स्वयं सिद्ध है।

    उल्लिखित विवेचन से स्पष्ट है कि अनेकांत सिद्धांत सांख्य और बौद्ध दर्शनों की एकांगी नित्यता एवं अनित्यता की मान्यताओं में दिखने वाले विरोध को अपनी समन्वय की निर्दोष और सत्यान्वेषण की न्यायोचित प्रणाली द्वारा दूर कर उन्हें एकता के सूत्र में निबद्ध कर सकता है, यदि दोनों उदारता पूर्वक अपर पक्ष की दृष्टि से भी वस्तु स्वरूप पर विचार करें। नित्यता के साथ अनित्यता का रहना यद्यपि परस्पर विरोधी कथन जान पड़ता है, किन्तु वस्तु में जब नित्यता के साथ अनित्यता मैत्रीभाव से अविरोध रूप में स्वयं ही रह रही हो तो हमें उनके मानने में आपत्ति क्यों होना चाहिये ? एक आचार्य के शब्दों में—

यदीदं स्वयमर्थेभ्यो रोचते तत्र के वयम् ?

    अर्थात् नित्यता के साथ अनित्यता, अस्तित्व के साथ नास्तित्व, इन परस्पर विरोधी धर्मों को यदि पदार्थ स्वयं ही अंगीकार किये हुए हैं तो हम क्या करें, और उन्हें स्वीकार न करने वाले भी हम कौन होते हैं ?

    नित्यता के साथ अनित्यता की मान्यता में विरोध तब आता है जब जिस दृष्टि से वस्तु को नित्य कहा या माना जाता है। उसी दृष्टि से अनित्य भी कहा जाता। किन्तु वस्तु में द्रव्य दृष्टि से नित्यता ही निश्चित रूप से मान्य की गई है और उसी प्रकार उसमें परिणमनशीलता के होने से उसकी पर्यायों में परिवर्तन होने के कारण अनित्यता सी निश्चित मानी गयी है। ये दोनों धर्म (नित्यता और अनित्यता) कल्पित नहीं है, और न वस्तु पर ऊपर से लादे जा रहे हैं। वे वस्तु में स्वयं स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं अत: उनका कथन भी परस्पर सापेक्षिक (अनेकान्तात्मक) होना चाहिये।

    इसी प्रकार अन्य परस्पर विरोधी दिखने वाले गुण धर्मों के भी जो कि उसी वस्तु में विद्यमान है कथन को स्वीकार करते हुए अनेकांत अनेकता में एकता स्थापित कर साम्प्रदायिक वैर विरोधों को दूर करता हुआ वस्तु का सम्यक् ज्ञान कराने में एक गुरु एवं न्यायाधीश का स्थान भी ग्रहण कर लेता है।

    यहाँ प्रश्न हो सकता है कि एक ही वस्तु में एक समय में नित्यता और अनित्यता की कथनी क्या जिज्ञासु को संशय के भ्रम जाल में नहीं फसायेगी और वस्तु स्वरूप के विषय में अनिश्चिय की भावना को जन्म नहीं देगी ? समाधान यह है कि वस्तु में उसके गुण पर्यायात्मक स्वरूप को विचार किये बिना नित्यता और अनित्यता का अनिश्चय तो संशय में अवश्य डालेगा, किन्तु अनेकांतवाद में संशय और अनिश्चतता का कोई स्थान ही है; क्योंकि वस्तु स्वयं ही नित्यानित्यात्मक है—वह द्रव्य दृष्टि से निश्चित रूप में नित्य ही है और पर्याय परिवर्तन की दृष्टि से वही वस्तु अनित्य भी। क्योंकि वस्तु की पर्याय उससे भिन्न न होकर तादात्म्य संबंध से अभिन्न ही होती है। जैसे स्वर्ण कुण्डल कंकण आदि पर्यायों में व्याप्त रहकर भी स्वर्ण स्वर्णपने का परित्याग न कर अपनी स्वर्णमयी नित्यता को धारण किये रहता है, किन्तु जब वह कुण्डल से कंकण या मुद्रिका का रूप धारण किये रहता है, किन्तु जब वह कुण्डल से कंकण या मुद्रिक का रूप धारण किये रहता है जब कुंडल न रहकर वह कंकण या मुद्रिका का रूप धारण करता है तब कुंडल न रहकर वह कंकण या मुद्रिका बन जाता है तब वहीं स्वर्ण कुंडल कंकणादि रूप पर्यायों को धारण करने के कारण पर्याय संबंधी अनित्यता में भी समाविष्ट (समाहित) हो जाता है, अत: उसी स्वर्ण को अपनी अभिन्न पर्यायों में परिवर्तित होने से उसकी अनित्यता भी स्वयं सिद्ध हो जाती है। इसमें संशय या अनिश्चितता की कहाँ गुंजाइश है जबकि स्वर्ण द्रव्य और उसकी कुंडल कंकण पर्याय दोनों ही वास्तविकता को लिये है।

    इसी प्रकार सोना अपने गुणपर्यायों को आत्मसात् किये हुए जैसे अपनी सत्ता के रूप में सद् रूप है, उसमें चाँदी आदि पर द्रव्यों के न होने की दृष्टि से उसी समय असद् रूप भी है। दूसरे शब्दों में सोना, सोना है चाँदी आदि नहीं। इसमें भी संशय करने का या अनिश्चय की कोटि में जाने की गुंजाइश कहाँ है ?

स्याद्वाद

    जैन दर्शन में प्रत्येक वस्तु की सत्ता को इस प्रकार अनेकांतात्मक, स्वतंत्र एवं अनादिनिधन स्वीकार किया गया है। यही वस्तु का वस्तुत्व भी है। जब वस्तु विज्ञानी वक्ता किसी वस्तु के स्वरूप को शब्दों द्वारा व्यक्त करना चाहता है तब वह वस्तु के सब गुण—धर्मों को जानते हुए भी उनमें से एक को मुख्य और शेष को गौण कर ही शब्दों द्वारा व्यक्त कर पाता है, क्योंकि किसी भी शब्द में एक साथ अनेक गुण धर्मों को व्यक्त करने की क्षमता नहीं है। अत: एक धर्म को मुख्य और शेष को गौण करते हुए भी वक्ता का यह कथन स्याद्वाद कहलाता है। इस प्रकार अनेकांतमयी वस्तु वाच्य और स्याद्वाद उसका वाचक है।

    स्यात् शब्द के अनेक अर्थ है, उनमें से यहाँ कथंचित् अर्थात् एक प्रकार या एक दृष्टि प्रधान कहने की मुख्यता ही अपेक्षित है। वाद शब्द का अर्थ कथन करना है। जब वक्ता वस्तु के नित्यता गुण को प्रधान कर कथन करता है तब वह अनित्यता को गौण कर कथंचित् वस्तु नित्य है अर्थात् द्रव्य दृष्टि से तो नित्य है, किन्तु पर्याय दृष्टि से अनित्य भी है, जिसे वह अपने अभिप्राय में जानते हुए भी गौण किये हुए है और अभी उसे कहने की इच्छा नहीं है, फिर भी उसे स्वीकार अवश्य किये हुए है, जिसकी स्यात् पद लगाकर उसकी स्वीकारता प्रकट करता है इस प्रकार उसका एक धर्म प्रधान कथन स्याद्वाद कहा गया है।

    वक्ता स्यात् शब्द का अपने कथन में नित्यता के साथ प्रयोग नहीं करते हुए अपने अभिप्राय को ‘भी’ लगाकर भी व्यक्त करता है। अर्थात् वस्तु नित्य ‘‘भी’’ है। यदि ‘स्यात्’, ‘कथंचित’ या ‘भी’ जोडकर कथन न भी करें और अभिप्राय में नित्यता के साथ—साथ अनित्यता को भी स्वीकार किये रहे और यह कहे कि वस्तु नित्य है तो भी कोई दोष नहीं है, किन्तु वह यदि अनित्यता का निषेध करते हुए जब यह कथन करने लगे कि ‘वस्तु तो नित्य ही है’ तब उसका कथन एकांतवाद कहलावेगा जो वस्तु के एकांगी या एकांशी कथन को ही पूर्ण सत्य कहकर अन्य अंशों का निषेध करता हुआ मिथ्यात्व की कोटि में चला जायेगा।

    लौकिक व्यवहार में भी यही प्रक्रिया निर्दोष लागू होती है। जैसे एक व्यक्ति ने आम को देखा, चखा, सूँघा और स्पर्श किया है और वह आम कैसा है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहता है आम मीठा है तो उसका यह कथन आम के स्वाद की मुख्यता से मीठा बताते हुए भी उसे पीला या सुंगधित व कोमल स्पर्श वाला अंतरंग में स्वीकार किये हुए मिठास की दृष्टि की मुख्यता से मीठा कह कर यथार्थ ही कह रहा है; किन्तु यदि वह रूप, गंध, स्पर्शादि गुणों को गौण न कर उनका निषेध करने लगे और यह कहने लगे कि आम तो मीठा ‘‘ही’’ है तो उसका कथन आम की अन्य विशेषताओं को नकारने के कारण एकांगी और मताग्राही होकर सत्य से परे हो जायेगा।

    इसी प्रकार एक व्यक्ति किसी का (पुत्र का) पिता और अपने पिता का पुत्र है तथा बहिन का भाई और भाभी का देवर है, किन्तु यदि पुत्र उसे सबका पिता ही मानने और कथन करते हुए अन्य रिश्तों का निषेध करने लगे तो वह भी मिथ्याभाषी और मूर्ख ही कहलायेगा। सच तो यह है कि अनेकांत के सिद्धांत का आश्रय न लेकर उसका स्याद्वाद द्वारा कथन किये बिना लोक व्यवहार भी निरापद नहीं चल सकता। इस सर्वोदयी अनेकांत की मुद्रा प्रत्येक वस्तु पर लगी हुई है, जिसे स्वीकार किये बिना न तो वस्तु की यथार्थता का ज्ञान हो सकता है और न ही लोक व्यवहार की भलीभाँति संपादित हो सकता। आचार्य सिद्धसेन दिवाकर का इस संबंध में यही कथन बड़ा ही महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं—

जेण विणा स्सवि व्यवहारो सस्व हाणत णिव्वाहइ।
तस्स भुवनैक गुरुणो णमो अगेगौत वायस्स।।

    अर्थात् अनेकांत विश्व तत्व प्रतिपादक एक मात्र सब का गुरु है जिसके बिना लोक का समस्त व्यवहार सर्वथा ही निर्वाह को प्राप्त नहीं होता। मैं उक्त अनेकांतमयी वाणी को नमस्कार करता हूँ। भगवान महावीर के इस अनेकांत सिद्धांत की निष्पक्षता और असांप्रदायिकता की प्रशंसा करते हुए आचार्य हेमचन्द्र स्याद्वादमंजरी नामक ग्रंथ में लिखते हैं—

अन्योन्य पक्ष प्रतिपक्ष भावात्, यथा परे मत्सरिण: प्रवादा:।
नयानशेषानविशेषमिच्छन् न पक्षपाती समयस्तथा ते।।

    अर्थात् हे भगवान् ! आपका अनेकांत सिद्धांत निष्पक्ष है क्योंकि वह वस्तु में विद्यमान सभी गुण धर्मों को स्वीकार कर उसका स्याद्वाद द्वारा बिना किसी का पक्ष लिये प्रतिपादन करता हैं वह उन मताग्रही जनों के समान नहीं है जो पक्ष—विपक्ष का आश्रय लेकर एक—दूसरे से मात्सर्य रखते हुए विसंवादी बने हुए हैं। आचार्य समंतभद्र युक्त्यानुशासन में उन्हीं महावीर के इस अनेकांत शासन की प्रशंसा में लिखते हैं।

सर्वांतवत् तद्गुण मुख्य कल्पं सर्वाति शून्यं च मिथोऽनपेक्षम्।
सर्वापदामंतकरं निरंतम् सर्वोदयीतीर्थमिदं तवैव।।

    अर्थात् हे भगवान् ! आपका अनेकांत मयी शासन सर्वोदयी तीर्थ है, जो अनेकांतात्मक वस्तु के सभी गुणों को स्वीकार करते हुए उनमें एक को मुख्य और शेष को गौण कर स्याद्वाद द्वारा सापेक्ष कथन करता हुआ वस्तु की यथार्थता को स्वीकार किये हुए है जबकि वस्तु में विद्यमान अन्य गुण धर्मों की सर्वथा उपेक्षा या निषेध करने वाला कथन सत्य से परे सर्वांश शून्य हो जाता है। आपकी तीर्थ स्वरूप वाणी सम्पूर्ण आपत्तियों को भी निरस्त कर देती है जो मताग्रहियों के एकांत कथन से विवाद के रूप में उत्पन्न होती है। वास्तव में आपके स्याद्वादी कथन में वस्तु में विद्यमान अनन्त गुण धर्म एवं शक्तियों के व्यस्त होने की संभावनाएँ छिपी रहती है। अत: उनको स्वीकार किये रहने के कारण आपका अनेकांत शासन ही सर्वोदयी है। यदि गंभीरता से विचार किया जावे तो प्रामाणिक रूप से अनेक गुणधर्मी वस्तु को परस्पर सापेक्ष सभी दृष्टियों (नयों) से देखना ही सत्य की खोज का वैज्ञानिक स्रोत या प्रणाली कही जा सकती है, जिसका अनेकांत सिद्धांत के रूप में आविष्कार कर भगवान् ने हमें एक मौथ्लक दृष्टि प्रदान की है जो सार्वभौमिक और सार्वकालिक सत्य के रूप में सदा ही जयवंत होती रहेगी।

स्याद्वाद का सप्तभंगी प्रयोग

    वस्तु की एक विशेषता को मुख्य कर विधिरूप में कथन करने पर विद्यमान अन्य गौण धर्म प्रतिषिद्ध जैसे हो जाते हैं, किन्तु उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता। अत: जब कोई व्यक्ति एक धर्म के विषय में अपना अभिप्राय व्यक्त कर रहा हो तब उससे कोई भी प्रश्नकर्ता अन्य गुण धर्मों के विषय में भी प्रश्न कर सकता है। उसका समाधान सात भंगों द्वारा हो सकता है इसी प्रक्रिया को ‘सप्तभंगी’ के नाम से कहा गया है।

    प्रश्नवशात् एकस्मिन वस्तुनि अविरोधेन विधि प्रतिषेध कल्पना सप्तभंगी।

अर्थात् एक ही वस्तु में उसकी एक विशेषता के कथन करने पर उसकी अन्य विशेषता को जो सत् स्वरूप है स्वीकार करते हुए अविरोध रूप से कल्पना करना सप्तभंगी है जैसे—

किसी प्रश्नकर्ता ने प्रश्न किया १.—यह क्या है ?

उत्तर मिला—यह (जीवतत्व दृष्टि से) जीव है।

फिर प्रश्न किया २.—और ?

उत्तर मिला—यह अजीव नहीं है।

फिर प्रश्न किया ३. क्या कहाँ ?

उत्तर मिला—यह जीव है, अजीव नहीं है।

फिर प्रश्न किया ४.—जीव में अन्य विशेषताएँ भी है क्या ?

उत्तर मिला—अनंत है जो एक साथ किसी शब्द द्वारा व्यक्त नहीं हो सकती, अत: वह अवक्तव्य (अनिर्वचनीय) भी है।

फिर प्रश्न किया ५.—इस विषय में कुछ और भी कहना है क्या ?

उत्तर मिला—वह जीव होने के साथ ही अवक्तव्य है।

फिर प्रश्न किया ६.—और  ?

उत्तर मिला—वह अजीव नहीं है, साथ ही अवक्तव्य भी है।

फिर प्रश्न किया ७.—बस ?

उत्तर मिला—यह जीव है, अजीव नहीं है, साथ ही अवक्तव्य भी है।

    चूँकि सत्य एवं निष्पक्ष वक्ता का अभिप्राय वस्तु के विषय में किसी एक विशेषता को मुख्य तथा शेष को गौण कर कथन करने का होता है, किन्तु जब सब विशेषताओं का कथन एक साथ करना चाहता है तब न कर सकने से वक्तव्य मौन हो जाता है। यही अनिर्वचनीयता है किन्तु जब वस्तु की एक ही विशेषता को स्वीकार कर उसके ही पूर्ण सत्य के रूप में मानने और कथन करने लगता है तथा अन्य विद्यमान विशेषताओं की ओर से आँखे बंद कर उनका निषेध करने या उन्हें झुठलाने लगता है तब वह सत्य से बहुत दूर चला जाता है और उसकी वह मान्यता एवं कथन एकांत मिथ्यात्व की कोटि में चली जाती है। अत: सत्य अनेकांतात्मक है।

अनेकांत और स्याद्वाद के संबंध में कुछ आधुनिक मनीषियों के उद्गार

    जिन आधुनिक मनीषियों ने अनेकांत और स्याद्वाद प्रणाली पर मनन कर उनके संबंध में निष्पक्ष भाव से उनकी यथार्थता, उपयोगिता तथा महत्व पर जो अपने उद्गार समय—समय पर प्रकट किये है उनमें से कुछ का संकलन उन्हीं के शब्दों में निम्नलिखित है—

    गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज बनारस के भूतपूर्व प्रिंसिपल श्री मंगलदेवजी शास्त्री ने लिखा है कि—

    ‘भारतीय दर्शन के इतिहास में जैन दर्शन की एक अनोखी देन (अनेकान्त) है। यह स्पष्ट है कि किसी तत्व के विषय में कोई भी तात्विक दृष्टि एकान्तिक नहीं हो सकती, प्रत्येक तत्व में अनेकरूपता स्वाभाविक होनी चाहिये और कोई भी दृष्टि उन सबका एक साथ तात्विक प्रतिपादन नहीं कर सकती। इसी सिद्धांत को जैन दर्शन की परिभाषा में अनेकांत दर्शन कहा गया है। जैनदर्शन का तो यह आधार स्तम्भ है ही, वास्तव में इसे प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा के लिये भी आवश्यक मानना चाहिये।

    बौद्धिक स्तर पर इस सिद्धांत के मान लेने पर मनुष्य के नैतिक और बौद्धिक व्यवहार में भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आ जाता है। चरित्र ही मानव जीवन का सार है। चरित्र के लिये मौलिक आवश्यकता इस बात की है कि एक ओर तो मनुष्य अभिमान से अपने को पृथक् रखे साथ ही हीनभावना से भी अपने को बचाये। स्पष्टत: यह मार्ग कठिन है। वास्तविक अर्थों में जो अपने स्वरूप को या मान्यताओं को समझकर आत्मसम्मान करता है और साथ ही दूसरे व्यक्तित्व को भी उतना ही सम्मान देता है #वही उपर्युक्त दुष्कर मार्ग का अनुगामी बन सकता है। इसी से सारे नैतिक समुत्थान में व्यक्तित्व का समादर एक मौलिक महत्व रखता है। जैनदर्शन के उपर्युक्त अनेकांत दर्शन का महत्व इसी सिद्धांत के आधार पर है कि उसमें एक व्यक्ति का उसके विचारों या अभिप्रायों का सम्मान निहित है।

    जहाँ व्यक्ति का समादर होता है वहाँ स्वभावत: साम्प्रदायिक संकीर्णता संघर्ष या किसी भी छल, जाति, वितंडा जैसे असदुपाय आदि से पराजय की प्रवृत्ति बनी रह सकती। व्यवहारिक जीवन में भी खण्डन पर समन्वयात्मक निर्माण की प्रवृत्ति ही वहाँ रहती है। साध्य ही पवित्रता के साथ—साथ साधन की पवित्रता का महान् आदर्श भी उक्त सिद्धांत के साथ ही रह सकता है। इस प्रकार अनेकांत दर्शन नैतिक उत्थान के साथ—साथ व्यवहार शुद्धि के लिये भी जैन दर्शन की एक महान देन है।

    ‘विचार जगत का अनेकांत दर्शन ही नैतिक जगत में आकर अहिंसा के व्यापक सिद्धांत का रूप धारण कर लेता है। इसीलिये जहाँ अन्य दर्शनों में परमत खण्डन पर बल दिया गया है वहाँ जैन दर्शन का मुख्य ध्येय अनेकांत सिद्धान्त के आधार पर वस्तु स्थिति मूलक विभिन्न मतों का समन्वय रहा है। वर्तमान जगत की विचारधारा की दृष्टि से जैनदर्शन के अहिंसा मूलक सिद्धांत का अत्यन्त महत्त्व है आजकल के जगत की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि अपने परम्परागत वैशिष्टय को रखते हुए भी विभिन्न मनुष्य जातियाँ एक दूसरे के समीप आवें और उनमें एक व्यापक मानवता की दृष्टि का विकास हो। अनेकांत दर्शन (समन्वय दृष्टि) से ही यह संभव हो सकता है।’ इसमें संदेह नहीं कि न केवल भारतीय दर्शन के विकास का अनुगमन करने के लिये, अपितु भारतीय संस्कृति के स्वरूप के उत्तरोत्तर विकास को समझने के लिये भी जैन दर्शन का अत्यन्त महत्व है। भारतीय विचारधारा में अहिंसा वाद के रूप में अथवा समन्वयात्मक भावना के रूप में जैन दर्शन और विचारधारा की यह देन है इसको समझे बिना वास्तव में भारतीय संस्कृति के विकास को नहीं समझा जा सकता है।

    प्रोफेसर आनंदशंकर बाबूभाई ध्रुव स्याद्वाद के संबंध में लिखते हैं कि—

    ‘स्याद्वाद को कितने ही लोग संशयवाद कहते हैं—इसे मैं नहीं मानता। स्याद्वाद संशयवाद नहीं है, किन्तु वह एक दृष्टि बिन्दु हम को उपलब्ध करा देता है। विश्व का किस रीति से हमें अवलोकन करना चाहिये—यह हमें सिखाता है। यह निश्चित है कि विभिन्न दृष्टि बिन्दुओं द्वारा निरीक्षण किये बिना कोई भी वस्तु अपने संपूर्ण स्वरूप में नहीं आ सकती। अत: स्याद्वाद पर आक्षेप करना अनुचित है।’

    सत्य संप्रदायाचार्य महामहोपाध्याय स्वामी श्रीराम मिश्र शास्त्री ने अपने व्याख्यान में जैन धर्म—दर्शन के विषय में जो कहा था उसके कुछ अंश इस प्रकार है—

    ‘मैं आपको कहाँ तक कहूँ बड़े—बड़े आचार्यों ने जो अपने ग्रंथों में जैनमत का खण्डन किया है उसे सुन और देख कर हँसी आती है। स्याद्वाद, यह जैन धर्म का अभेद्य किला है, उसके अन्दर वादी प्रतिवादियों के माया मय गोले प्रवेश नहीं कर सकते। जैन धर्म के सिद्धान्त प्राचीन भारतीय तत्वज्ञान और धार्मिक पद्धति के अभ्यासियों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है, इसके स्याद्वाद से संपूर्ण सत्य विचारों के द्वार खुल जाते हैं।’

    हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के ही दर्शनशास्त्र (फिलासफी) के प्रोफेसर श्री फणिभूषण अधिकारी लिखते हैं—

    ‘जैन धर्म के स्याद्वाद सिद्धांत को जितना को जितना गलत समझा जाता है उतना किसी अन्य सिद्धांत को नहीं। यहाँ तक कि श्री शंकराचार्य भी इस दोष से मुक्त नहीं है। उन्होंने भी इस सिद्धांत के प्रति अन्याय किया। ऐसा जान पड़ता है कि उन्होंने इस धर्म के दर्शन शास्त्र के मूल ग्रंथों के अध्ययन करने की परवाह नहीं की।’

    सुप्रसिद्ध दार्शनिक विद्वान एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. सम्पूर्णानन्द लिखते हैं—

    ‘अनेकान्तवाद या सप्तभंगी न्याय जैन दर्शन का प्रमुख सिद्धांत है। प्रत्येक पदार्थ के जो सात अंग या स्वरूप शास्त्रों में कहे गये हैं उनको ठीक रूप से स्वीकार करने में आपत्ति हो सकती है। कुछ विद्वान भी सात में से कुछ को गौण मानते हैं। साधारण मनुष्य को वह समझने में कठिनाई होती है कि एक वस्तु के लिये एक ही समय में ‘‘है और नहीं है’’ दोनों बातें कैसे कहीं जा सकती है ? परन्तु कठिनाई के होते हुए भी वस्तु स्थिति तो ऐसी ही है।’

    नागपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एवं भूतपूर्व उपकुलपति डॉ. नियोगी लिखते हैं—

    ‘जैनाचार्यों की यह वृत्ति अभिनंदनीय है कि उन्होंने ईश्वरीय आलोक के नाम पर अपने उपदेशों में ही सत्य का एकाधिकार नहीं बनाया। इसके फलस्वरूप उन्होंने साम्प्रदायिकता और धर्मांधता के दुर्गुणों को दूर कर दिया। जिसके कारण मानव इतिहास भयंकर द्वंद और रक्तपात के द्वारा कलंकित हुआ। अनेकांतवाद और स्याद्वाद विश्व के दर्शनों में अद्वितीय है।

    स्याद्वाद सहिष्णुता और क्षमा का प्रतीक है। वह यह मानता है कि दूसरे व्यक्ति को भी कुछ कहना है।

सम्यग्दर्शन और स्याद्वाद के सिद्धांत औद्योगिक पद्धति द्वारा प्रस्तुत की गई जटिल समस्याओं को सुलझाने में अत्यधिक कार्यकारी सिद्ध होंगे।’९ आदि।

महात्मा गाँधी ने तो स्याद्वाद और अनेकांत को अपने जीवन में उतार कर अहिंसा के महत्व को उत्कर्ष की चोटी पर पहुँचा दिया था।

    इस प्रकार अनेकांतवाद और स्याद्वाद वस्तु के स्वरूप को यथार्थ ज्ञान कराने में सहायक तो होता ही है—साथ ही विश्व के एकांतवादी दर्शनों में व्याप्त संकीर्ण वृत्तियों का समन्वय कर उन्हें एकता के सूत्र में पिरोने की उदार पद्धति का अविष्कारक भी स्वयं सिद्ध हो जाता है। यदि विश्व के मतमतांतर अपनी संकुचित विचारधाराओं को उदार बनाकर अनेकांत की व्यापक और निष्पक्ष दृष्टि को अपना लें तो सांप्रदायिकता जन्य विद्वेषों और विवादों का अंत भी सहज संभव हो जाये जो विश्वशांति के लिये अनिवार्य है और आज जिसकी नितांत आवश्यकता है। यह अनेकान्त का सिद्धान्त अनेक वैज्ञानिक समस्याओं, उलझनों को समाप्त करने में भी सक्षम है। वर्तमान में वैज्ञानिक विसंगतियों को समझने में इसका प्रयोग होने लगा है, यह शुभ लक्षण है।

सन्दर्भ स्थल

१. समन्तभद्राचार्य, युक्तयुक्त्यानुशासन, ६

२. अमृतचन्द्राचार्य, पुरुषार्थसिद्धयुपाय,

३. समन्तभद्राचार्य, आप्त मीमांसा, १५

४. आ. धर्मकीर्ति, प्रमाण वार्तिक, २/१०

५. सिद्धसेन दिवाकर, सन्मति तर्वक, ३/८

६. हेमचन्द्र, स्याद्वादमंजरी

७. समन्तभद्राचार्य, युक्तयुक्त्यानुशासन, ६१

८. मंगलदेव शास्त्री, जैन दर्शन की भूमिका, प्राक्कथन, पृ. १४.

९. जैन शासन, पृ. २४—२५.


नाथूराम डोंगरीय जैन
५४९, सुदामा नगर, इन्दौर—४५२ ००९
अर्हत् वचन जनवरी १९९७ पेज नं. ७—१६