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जैन धर्मग्रंथों का भारत के क्षेत्रीय इतिहास लेखन में योगदान

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जैन धर्मग्रंथों का भारत के क्षेत्रीय इतिहास लेखन में योगदान

भारत के घुर पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में थार के मरूस्थल के मध्य जैसलमेर नगर स्थित है। भारत के गणराज्य बनने तक यह भू—भाग जैसलमेर राज्य के नाम से जाना जाता था। अत्यन्त ही दुर्गम पर्यावरण एवं भौगोलिक स्थिति में होने के कारण यह प्रदेश सदैव भारतीय इतिहासकारों की नजरों में उपेक्षित रहा। यही कारण है, कि राजस्थान के अन्य राज्यों का इतिहास जहाँ हमें विपुलता में दृष्टिगोचर होता है, वहीं जैसलमेर राज्य के इतिहास के बारे में अल्प जानकारियाँ ही प्राप्त होती है। किन्तु जैसलमेर स्थित जैन ज्ञान भण्डार में पिछले ८०० वर्षों से सजों कर रखे गये जैन धर्मग्रंथों (अधिकांश श्वेताम्बर परम्परा के) व इतर साहित्य को यदि क्रमवार रखकर अध्ययन किया जावे तो हम पाते हैं कि जैन आचार्यों एवं धर्मावलम्बियों द्वारा समय—समय पर वहाँ विविध साहित्य की रचना की गई थी, व उसमें जाने—अनजाने में कई ऐसी ऐतिहासिक जानकारियाँ लिख गये हैं, जो न केवल इस क्षेत्र के इतिहास निर्माण में महत्वपूर्ण है, बल्कि कई ऐतिहासिक गुत्थियों को भी बहुत आसानी से सुलझाने में सहायक हैं

जैसलमेर राज्य की स्थापना इतिहास पुरुष कृष्ण के वंशज यदुवंशी भाटी नरेश रावल जैसल द्वारा वि. स. १२३४ अर्थात् ११७८ ई. में यहाँ त्रिकूट नामक पहाड़ी पर दुर्ग निर्माण कर की गई थी। इससे पूर्व इन भाटी शासकों की राजधानियाँ भटनेर, देरावर, मूमणवाहण, विक्रमपुर, मरोठ, तणोट व लोद्रवपुरपाटण में रही थी। उल्लेखनीय है, कि इन समस्त नगरों का उल्लेख हमें श्वेताम्बर परम्परा की खरतरगच्छ गुर्वावलियों में कई बार प्राप्त होता है। जैनाचार्य जब दिल्ली से मुलतान की ओर प्रवास करते थे तो इन्हीं रेगिस्तानी नगरों में अपने शिष्यों सहित पड़ाव करते थे, व जैनाधर्मवलम्बियों को धर्मोपदेशों में लाभान्वित करते रहे थे। कई बार चातुर्मास हेतु इन नगरों में रुक भी जाते थे व अपने र्अिजतज्ञान को ताड़पत्रों, तथा काष्ठ पट्टियों पर एवं कालान्तर में हस्तर्नििमत कागज पर भी लिखकर भविष्य हेतु सुरक्षित कर देते थे। ये ही समस्त ग्रंथ कालान्तर में मुस्लिम आक्रान्ताओं से सुरक्षा की दृष्टि से जैसलमेर दुर्ग में बने मंदिरों में स्थानान्तरित कर दिये गये थे। जैसलमेर जैसे दुर्गम स्थल में दुर्ग निर्माण हो जाने पर प्राचीन भाटियों की राजधानियों में श्री भी उतनी सम्पन्न अवस्था में न रह सकी फलत: जैन वणिक जन भी जैसलमेर जैसे सुरक्षित स्थल पर आकर बस गये। इस नई बसाहट के कारण अब जैनाचार्य भी यहाँ आने लगे व चातुर्मास के दौरान साहित्य सृजन कर सदियों तक जैसलमेर के ज्ञान भण्डार को यथाशक्ति बढ़ाते रहे।

उल्लेखनीय है, कि भाटी शासक सदैव से नाथ सम्प्रदाय के पालक व शक्ति के पूजक रहे। युद्ध व हिंसा ही उनकी जीवकोपार्जन का मुख्य साधन था, किन्तु धारी जैनधर्म उनके राज्य में सदैव पल्लवित होता रहा। इस धर्म को भाटियों के राज्य में सतत् १३०० वर्षों से राज्याश्रय में सुरक्षित बने रहने का व र्धािमक सहिष्णुता को मूर्तरूप प्रदान करने का अवसर मिला। ऐसा अप्रतिम उदाहरण अन्यत्र कम ही दृष्टिगोचर होता है।

इन हस्तलिखित ग्रंथों में जैन धर्म से संबंधित ग्रंथ प्रमुख रूप से देखने को मिलते हैं, किन्तु कई ग्रंथ ऐसे भी हैं जो जैनेतर विषयों एवं अन्य विधाओं से संबंधित हैं। इन ग्रंथों में धर्म, न्याय, सांख्य, योग, अर्थ, ज्योतिष शास्त्र, खगोलशास्त्र, रसायन शास्त्र, संगीत, शृंगार, नाट्य, औषधिशास्त्र, कामशास्त्र, चित्रकला, वास्तुकला, राजनीतिशास्त्र, व्याकरण, कोश, मीमांषा आदि के साथ—साथ लोक साहित्य से संबंधित साहित्य भी है, उदाहरणार्थ ढोलामरवण व जैसलमेर स्तवन इत्यादि।

ये समस्त ग्रंथ इस क्षेत्र की शुष्क भौगोलिक स्थिति के कारण अच्छी अवस्था में है। जैनेतर व्यक्तियों में इनका सर्वप्रथम अवलोकन, जर्मन विद्वान, बुल्हर एवं याकोबी ने बीसवीं सदी के प्रारम्भ में किया, फिर भी भण्डारकर ने स्वयं यहाँ आकर, इनका अवलोकन किया, तदुपरान्त बाबू पूर्णचन्द्र जी नाहर ने इनको शेष विश्व के सामने लाने के लिये प्रयास किया। इस प्रकार आज कई विद्वान मनीषियों के सहयोग व शासन की देख—देख में इन्हें सुरक्षित कर क्रमबद्ध आयोजित किया गया हैं वर्तमान में जैसलमेर स्थित ज्ञान भण्डारों में कुल मिलाकर २६९७ ग्रंथ सहेज कर रखे गये हैं जो निम्न प्रकार हैं।

जिनभद्र जी का संग्रह—ताड़पत्र पर लिखित ग्रंथ ४०३ जिनभद्र जी का संग्रह—कागज पर लिखित ग्रंथ १३३० तपागच्छ संग्रह—ताड़पत्र पर लिखित ग्रंथ ८ लोंकागच्छ संग्रह—ताड़पत्र पर लिखित ग्रंथ ४ थारूशाह—संग्रह—कागज पर लिखित ग्रंथ २ बड़े उपासरा का संग्रह—कागज पर लिखित ग्रंथ ९२७ पनकाजी का संग्रह—ताड़पत्र पर लिखित ग्रंथ २३

इन ग्रंथों में सर्वाधिक पुराना ताड़पत्र पर लिखित ग्रंथ वि. सं. १११७ का है व हस्तर्निमित कागज पर लिखित ग्रंथ वि. सं. १२७९ का है। एक अनुमानानुसार यह हस्तर्निमित कागज पर लिखी गई भारत में विद्यमान सर्वाधिक प्राचीन कुछ पुस्तकों में से एक है। जैसलमेर ज्ञान भण्डार में स्थित ग्रंथ भण्डार के ग्रंथों से क्षेत्रीय इतिहास की विवेचना किस प्रकार संभव होती है इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से है—

१. ‘‘कल्प सूत्र संदेह विषौषधि वृति’’ जो, कि वि. स. १७९७ में लिखी गई थी के अन्त में वाक्य है ‘श्री जैसलमेरु महादुर्गे श्री वैरिसिंह भूभृति राज्य प्रतिपालयति........इससे स्पष्ट है, कि १४४० ई. के लगभग जैसलमेर का शासक वैरिसिंह था।

२. ‘‘जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति उपांगसूत्र’’ नामक ग्रंथ के अन्त में लिखित है कि ‘श्री जैसलमेरू पुरे सं. १६४६ श्री भीम भूप राज्य .........’ अर्थात् १५८९ के लगभग यहाँ भीम नामक शासक राज्यासीन था।

३. ‘‘कालकाचार्य कथा’ के अनुसार वि. स. १६५९ में जैसलमेर नगर व शासक का नाम ‘‘श्री जैसलमेर’’ व पाश्र्वचैत्ये महीपति श्री भीमसेन राज्ये का उल्लेख है, कदाचित यह भीमसेन पूर्व र्विणत शासक ही था।

४. ‘‘भोजचरित्र पद्य’’ नामक ग्रंथ जोकि गोपाचल संस्थान में लिखा गया, में उल्लेख है, कि वि. स. १६३४ चैत्र वदी १० को अकबर बादशाह ने कुंभलगढ़ विजय किया।

५. ‘‘पुष्पमाला प्रकरण’’ में र्विणत है, कि इस ग्रंथ को जब लिखा गया तब वि. सं. १५९६ में श्री योद्धपुर (जोधपुर) पर मालदेव का शासन था।

६. ‘‘उत्तराध्ययन सूत्र दीपिका सह’’ के अन्त में जैसलमेर के शासक को ‘यादवान्वय मुकुट मणि राउल श्री हरिराज विजय राज्ये’ से स्पष्ट होता है, कि जैसलमेर के शासक यादव वंश के सर्वोच्च स्थिति वाले (कृष्ण के वंशज) थे व इनकी पदवी राजा के स्थान पर रावल थी, जैसा कि इतिहास में भी उल्लेख मिलता है।

७. ‘‘संघ पट्टक प्रकरण वृत्तिसह’’ नाम ग्रंथ में जैसलमेर के सीमावर्ती राज्य बीकानेर में वि. स. १५६४ में राजा लूणकर्ण का राज्य दर्शाया गया है। उल्लेखनीय है, कि इस ग्रंथ में वि. स. के साथ—साथ श्री वद्र्धमान जिन संवत २०३४ का भी प्रयोग किया गया है।

८. ‘‘अभिधान चितामणिमाला’’ जो वि. सं. १७२१ में रची गई थी जैसलमेर की पश्चिमी सीमावर्ती सिध देश का शासक हाजीखान नामक मुस्लिम शासक था, जिसके राज्य में उक्त रचना रचकर जैसलमेर के भण्डार में लाकर रखी गई थी।

९. ‘‘तर्क परिभाषा’’ नामक ग्रंथ की रचना वि. सं. १५४६ में श्रावणमास की त्रयोदशी, गुरुवार को पाश्र्वतीर्थ जैसलमेर के शासक देवकर्ण (देवीदास) के राज्य में हुई थी। उल्लेखनीय है कि अन्य स्रोतों से प्राप्त देवकर्ण के राज्य का उल्लेख वि. सं. १५३६ तक के ही प्राप्त होते हैं, इस दृष्टि से यह ग्रंथ महत्त्वपूर्ण है कि देवकर्ण का शासन वि. स. १५४६ तक तो था ही। देवकर्ण जैन धर्म का पोषक था, एक शिलालेखीय अभिलेख से ज्ञात होता है, कि वि. सं. १५३६ में देवकर्ण के सैनिक राज्याश्रय में एक संघ समस्त तीर्थों की यात्रा हेतु भेजा गया था।

१०. ‘‘अंगविज्जा’’ नामक ग्रंथ से जैसलमेर में १६६९ की जेठवदी—२ सोमवार तक भीम के शासन का उल्लेख तो मिलता है, साथ ही थाहरूदास नामक जैन श्रेष्ठि के द्वारा एक ग्रंथ भण्डार स्थापित कराने का भी उल्लेख मिलता है वह भणसाली गोत्र का था। इसकी पांच पीढ़ियों के नामों का भी उल्लेख इस ग्रंथ में प्राप्त होता है।

११. पुस्तकों की रक्षा हेतु चमड़े (?) के बस्तेनुमा कवर पर भी एक लेख थाहरूदास के भण्डार में है जिसके अनुसार वि. सं. १६३७ में जैसलमेर दुर्ग का शासक कल्यानदास था।

वर्तमान में उक्त ज्ञान भण्डार को वि. स. २००७ में एक स्थान पर एकत्र कर जैसलमेर दुर्ग में स्थित जैन मंदिर के विशाल तलघर में सुरक्षित रूपेण रख दिया है। इस प्रकार यह दृष्टिगोचर होता है कि जैन आचार्यों, उपाध्यायों व उनके शिष्यों तथा धर्मावलम्बियों के शास्त्र प्रेम ने भारतीय संस्कृति एवं इतिहास को सुरक्षित रखने में अप्रतिम योदान दिया है जिसका मूल्यांकन अभी भी शेष है।

एच. बी. माहेश्वरी ‘‘जैसल’’
जे. १७, चेतकपुरी, ग्वालियर—४७४ ००९
अर्हत् वचन अप्रैल ९६—पेज १७-२४