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जैन धर्म,

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जैन धर्म

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‘‘कर्मारातीन् जयतीति जिन:’’ जो कर्मरूपी शत्रुओं को जीत लेता है वह ‘‘जिन’’ है। और ‘‘जिनो देवता अस्येति जैन:’’ जिन हैं देवता जिसके वह ‘‘जैन’’ कहलाता है। ‘‘संसार दु:खत: सत्वान् यो उत्तमे सुखे धरतीति धर्म:’’ जो संसार के दु:ख से जीवों को निकाल कर उत्तम सुख में पहुँचता है वह धर्म है। इस प्रकार से जिन देव के अनुयायी का धर्म ‘‘जैन धर्म’’ है। अथवा जिनदेव द्वारा कथित धर्म ‘‘जैन धर्म’’ है। यह धर्म प्राणी मात्र का कल्याण करने वाला है अत: इसे ‘‘ सार्वधर्म’’ या सर्वोदय तीर्थ’’ भी कहते हैं। यह सम्पूर्ण चराचर विश्व अनादिनिधन है और इसमें परिभ्रमण करने वाले जीव भी अनादिनिधन हैं । जब कोई जीव संसार के दु:खों से घबरा जाता है। तब वह धर्म की छत्र छाया में आकर सुखी होना चाहता है। उसके लिये यह जैनधर्म कल्पवृक्ष के समान है। जितने भी सांसारिक सुख हैं वे भी इस धर्म के प्रसाद से ही मिलते हैं और मोक्ष सुख भी इस धर्म से ही मिलता है। यहाँ कालपरिवर्तन से लेकर आत्मा को परमात्मा बनने के उपाय तक अति संक्षेप में जैन धर्म की कुछ मूल—मूल बातों को बताया गया है।

प्रथमानुयोग—

षट्काल परिवर्तन— जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के आर्यखण्ड में अवसर्पिणी—उत्सर्पिणी काल के दो विभाग होते हैं। दश कोड़ाकोड़ी सागर की अवसर्पिणी और इतनी ही बड़ी उत्सर्पिणी है। जिसमें मनुष्यों एवं तिर्यंचों की आयु, शरीर की ऊँचाई, वैभव, सुख आदि घटते जाते हैं वह अवसर्पिणी एवं जिनमें बढ़ते जाते हैं वह उत्सर्पिणी कहलाती है। इन दोनों को मिलाकर बीस कोड़ाकोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है।[१]अवसर्पिणी के छह भेद हैं— सुषमासुषमा, सुषमा, सुषमदु:षमा, दु:षमा और अतिदु:षमा। उत्सर्पिणी के भी अन्तिम से लेकर ये ही छह भेद हैं। इनमें प्रथम सुषमसुषमा काल चार कोड़ाकोड़ी सागर का है, दूसरा तीन कोड़ाकोड़ी का, तीसरा दो कोड़ाकोड़ी का, चौथा ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी का, पाँचवां इक्कीस हजार वर्ष का और छठा इक्कीस हजारा वर्ष का है। ऐसे ही उत्सर्पिणी में अन्त में लेना चाहिए।

सुषम—सुषमाकाल—

इस काल में पृथ्वी रज, धूम, अग्नि, हिम, कंटक आदि से रहित एवं बिच्छू, शंख, मक्खी आदि विकलत्रय जीवों से रहित होती है। इस काल में दश प्रकार के कल्पवृक्ष होते हैं जो कि पृथ्वीकायिक हैं। इनसे वहाँ के लोग भोग—उपभोग सामग्री प्राप्त करते हैं। पानांग, तूर्यांग, भूषणांग, वस्त्रांग, भोजनांग, आलयांग, दीपांग, भाजनांग, मालांग और तेजांग ये दश प्रकार के कल्पवृक्ष हैं। ये अपने नाम के अनुसार ही वस्तुओं को देते रहते हैं। यथा पानांग दूध, जल आदि पेय द्रव्य, तूर्यांग वीणा आदि वादित्र, भूषणांग कंकण, मुकुट आदि आभूषण, वस्त्रांग नाना प्रकार के वस्त्र, भोजनांग अनेक प्रकार के भोजन, आलयांग अनेक प्रकार के मकान, दीपांग दीपक, भाजनांग बर्तन और मालांग जाति के कल्पवृक्ष मालायें देते हैं तथा तेजांग कल्पवृक्ष सूर्य—चन्द्र से भी अधिक कांति विस्तारते हैं।

उस समय वहाँ पर जन्म लेने वाले मनुष्य युगल ही उत्पन्न होते हैं । उनके जन्म लेते ही पिता छींक आने से और माता जंभाई लेकर के मरण को प्राप्त हो जाते हैं। पुन: ये युगल शय्या पर सोते हुये अंगूठा चूस कर तीन दिन निकाल देते हैं। पुन: बैंठना, अस्थिर गमन, स्थिर गमन, कलागुणों की प्राप्ति, तारुण्य और सम्यग्दर्शन की योग्यता ये छहों बातें क्रमश: तीन—तीन दिन में पूर्ण हो जाती हैं। तब ये युगल तरुण होकर इच्छानुसार कल्पवृक्षों से भोगादि सामग्री मांगकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं । इस प्रथम काल में मनुष्यों की आयु तीन पल्य और शरीर की ऊँचाई तीन कोश की कही है। सो इस काल के अंत में घटते—घटते आयु दो पल्य की व उँचाई दो कोष की हो जाती है।

सुषमाकाल—

इस काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की आयु दो पल्य की और ऊँचाई दो कोश की रहती है। पश्चात् घटते—घटते आयु एक पल्य की व ऊँचाई एक कोश की रह जाती है। इस काल में मनुष्य युगल अंगूठा चूसना, बैठना आदि में ५—५ दन लेते हैं ।

सुषमदु:षमाकाल—

इस तृतीय काल में प्रारम्भ में मनुष्यों की आयु एक पल्य की एवं उँचाई एक कोश की रहती है। इसमें मनुष्य युगल अंगूठा चूसना, बैठना आदि क्रियाओं में ७—७ ाqदन ग्रहण करते हैं। इन तीनों कालों में क्रम से उत्तम भोगभूमि, मध्यम भोगभूमि और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था मानी गई है।

कुलकरों की उत्पत्ति—

इस तृतीय काल में जब कुछ कम पल्य का आठवां भाग काल शेष रह गया था तब प्रथम कुलकर उत्पन्न हुये थे उनका नाम ‘‘ प्रतिश्रुति’’ था। इनके शरीर की ऊँचाई एक हजार आठ सौ धनुष, आयु पल्य के दशवें भाग प्रमाण थी। और इनकी भार्या का नाम स्वयंप्रभा था। उस समय आषाढ़ सुदी पूर्णिमा के दिन आकाश में सूर्य—चंद्र मण्डलों को देखकर सभी भोगभूमिज मनुष्य व्याकुल हो उठे। तब प्रतिश्रुति ने कहा—

‘‘डरो मत! कालवश तेजांग जाति के कल्पवृक्ष मंद हो जाने से आकाश में ये ज्यातिषी देवों के विमान सूर्य मण्डल, चन्द्र मण्डल दिखाई दे रहे हैं । ये पहले भी थे किंतु तेजांग कल्पवृक्ष के तेज से दिखते नहीं थे अत: डरने की कोई बात नहीं है। इतना सुनकर सभी लोग निर्भय होकर इन प्रतिश्रुति को अपना कुलकर स्वीकार कर उनकी पूजा—स्तूति करने लगे। अनंतर इन कुलकर की मृत्यु के बहुत दिन दूसरे कुलकर उत्पन्न हुये जिनका नाम सन्मति था। ऐसे ही क्रम से क्षेमंकर, क्षेमंधर, सीमंकर, सीमंधर, विमलवाहन, चक्षुष्मान, यशस्वी, अभिचंद्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित् और नाभिराय उत्पन्न हुये हैं। प्रतिश्रुति में लेकर नाभिराय पर्यन्त ये चौदह कुलकर माने गये हैं । क्रम—क्रम से इनकी आयु और शरीर की उँचाई घटती चली आई है। इन कुलकरों ने क्रम से चन्द्र—सूर्योदय से भय मिटाना, अंधकार व तारागण से भय हटाना, व्याघ्रादि हिंसक जन्तुओं की संगति त्याग कराना, सिंहादि से रक्षा के उपाय बताना, कल्पवृक्षों की सीमा करना, तरु गुच्छादि चिन्हों से सीमा करना, हाथी आदि की सवारी का उपदेश, बालक का मुख देखना, बालक का नामकरण करना, बालकों का रोना दूर करना, ठंडी आदि से रक्षा करना, नाव आदि द्वारा नदी आदि पार करना, बालकों का रोना दूर करना, ठंडी आदि से रक्षा करना, नाव आदि द्वारा नदी आदि पार करना, बालकों के जरायुपटल दूर करना और नाभि की नाल काटना कार्य प्रजा को सिखाये हैं। इसीलिये इन्हें कुलकर , कुलधर और मनु आदि नामों से पुकारा गया है। अंतिम कुलकर नाभिराय की आयु एक पूर्व कोटि[२] वर्ष और शरीर की ऊँचाई पांच सौ पच्चीस धनुष थी।

तीर्थंकर ऋषभदेव—

जब कल्पवृक्षों का अभाव हो गया तब नाभिराय और मरुदेवी से अलंकृत स्थान में उनके पुण्य से इन्द्र ने आकर वहाँ पर अयोध्या नगरी की रचना कर दी। पुन: कुछ दिन बाद इन्द्र ने अवधिज्ञान से जान लिया कि ‘‘छह महीने बाद प्रथम तीर्थंकर इनके यहाँ स्वर्ग से अवतीर्ण होंगे।’’ अत: आदर से नाभिराय के आंगन में रत्नों की वर्षा करना शुरु करा दी। किसी दिन महारानी मरुदेवी ने पिछली रात्रि में सोलह स्वप्न देखे, उसी दिन इन्द्र ने असंख्य देव — देवियों के साथ आकर माता—ाqपता की पूजरर करके गर्भ कल्याणक महोत्सव मनाया । इस अवसर्पिणी के तृतीय काल में जब चौरासी लाख पूर्व तीन वर्ष आठ मास और एक पक्ष बाकी रह गया था तब आषाढ़ कृष्णा द्वितीया के दिन सर्वार्थसिद्धि से च्युत होकर अहमिंद्र का जीव माता मरुदेवी के गर्भ में आ गया। इसके छह माह पूर्व से ही श्री आदि देवियाँ माता की सेवा में तत्पर थीं। नव महीने बाद चैत्र कृष्णा नवमी के दिन माता मरुदेवी ने पुत्ररत्न को जन्म दिया । इन्द्रादि देवों ने आकर तीर्थंकर शिशु को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर जन्माभिषेक किया पुन: ‘‘ ऋषभदेव’’ यह नाम रखकर वापस लाकर माता—ाqपता को सौंप दिया। इन्द्र के द्वारा भेजे गये देव बालकों के साथ क्रीड़ा करते हुये तीर्थंकर ऋषभदेव का बाल्यकाल व्यतीत हो गया। युवावस्था में महाराजा नाभिराय ने तीर्थंकर ऋषभदेव का विवाह यशस्वती और सुनंदा के साथ सम्पन्न कर दिया। रानी यशस्वती ने क्रम से भरत, वृषभसेन आदि सौ पुत्र और ब्रह्मी पुत्री को जन्म दिया तथा रानी सुनंदा ने बाहुबली पुत्र और सुन्दरी पुत्री को जन्म दिया। क्रम—क्रम से सभी पुत्र—पुत्री किशोरावस्था को प्राप्त हो गये। एक समय प्रभु ऋषभदेव ने ब्राह्मी को ‘‘अ आ इ ई’’ आदि वर्णमाला और सुन्दरी को १,२ आदि अंक विद्या सिखाई । तथा दोनों कन्याओं को व्याकरण, छंद आदि सर्व विद्या और कलाओं में निष्णात कर दिया। पुन: भरत, बाहुबली आदि पुत्रों को भी सम्पूर्ण विद्या और कक्षाओं में प्रवीण कर दिया । इस बीच एक दिन प्रजा के कुछ प्रमुख लोग भगवान् की शरण में आये और बोले— ‘‘ भगवन् ! कल्पवृक्ष के नष्ट हो जाने से हम लोग भूख— प्यास से व्याकुल हो रहे हैं । अत: आप हमें अब जीवन का उपाय बतलाइये।’’ प्रजा के दीन वचन सुनकर प्रभु ऋषभदेव का हृदय करुणा से आद्र्र हो गया । और मन में सोचने लगे। ‘‘पूर्व—पश्चिम विदेह क्षेत्र में जो स्थिति वर्तमान में है वही स्थिति आज यहाँ प्रवृत्त करने योग्य है उसी से यह प्रजा जीवित रह सकती है। वहाँ जिस प्रकार असि, मषि आदि छह कर्म हैं, जैसी क्षत्रिय आदि वर्णों की स्थिति है और जैसी ग्राम, घर आदि की पृथक्—पृथक् रचना है उसी प्रकार यहाँ पर भी होना चाहिए।’’[३] प्रभु के स्मरण मात्र से उसी क्षण सौधर्म इंद्र आ गये और उन्होंने प्रभु की आज्ञानुसार देश, नगर, ग्राम, घर आदि की व्यवस्था बना दी। पुन: प्रभु ने स्वयं प्रजा के लिये असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मों का उपदेश दिया। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन प्रकार के वर्ण की व्यवस्था बनाई और भोजन बनाने से लेकर विवाह विधि तक सम्पूर्ण गृहस्थाश्रम की क्रियाओं का उपदेश दिया। चूँकि उस समय प्रभु सरागी थे, गृहस्थाश्रम में महाराजा थे वीतरागी नहीं थे। कितने ही समय बाद इन्द्र सहित देवों ने आकर श्री ऋषभदेव का सम्राट पद पर अभिषेक कर दिया। ‘‘इसके बाद भी ऋषभदेव सम्राट ने हरि, अकंपन, काश्यप और सोमप्रभ इन चार क्षत्रियों को बुलाकर उनका राज्याभिषेक कराकर उन्हें महामण्डलीक राजा बना दिया। ये राजा चार हजार अन्य छोटे—छोटे राजाओं के अधिपति थे। सोमप्रभ, सम्राटप्रभु से ‘‘कुरुराज’’ नाम पाकर कुरुदेश के राजा हुये। हरि, प्रभु से ‘‘हरिकांत’’ नाम को पाकर हरिवंश को अलंकृत करने लगे। ‘‘अकंपन’’ भी प्रभु से ‘‘श्रीधर’’ नाम पाकर नाथवंयश के नायक हुये और ‘‘काश्यप’’ भी जगदगुरु से ‘‘मधवा’’ नाम पाकर उग्रवंश के तिलक हुये हैं।’’[४] किसी समय इन्द्र ने सभा में नृत्य, संगीत आदि का आयोजन किया था। नीलांजना नाम की अप्सरा नृत्य कर रही थी, मध्य में हीी उसकी आयु पूर्ण हो जाने से वह विलीन हो गई और उसी क्षण इन्द्र ने दूसरी अप्सरा खड़ी कर दी, नृत्य ज्यों का त्यों चालू रहा, कोई भी सभासद इस रहस्य को जान नहीं सके किंतु अवधिज्ञानीप्रभु ऋषभदेव ने जान लिया। तत्क्षण ही उन्हें वैराग्य हो गया। तब लौकांतिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की, तत्पश्चात् इन्द्रादि देवों ने आकर प्रभु को ‘‘सुदर्शन’’ नाम की पालकी पर विराजमान किया। प्रभु ने ‘सिद्धर्थक’ नामक वन में जाकर संपूर्ण वस्त्राभरणों का त्याग कर पंचमुष्टि केशलोच किया। और ‘‘उँ नम: सिद्धभ्य:’’ इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए सिद्धों की साक्षी पूर्वक जैनेश्वरी दीक्षा ले ली। इन्द्र ने प्रभु का तपकल्याणक महोत्सव मनाया पुन: स्व—स्व स्थान चले गये।

तीर्थंकर ऋषभदेव छह महीने का योग लेकर ध्यान में निश्चल खड़े हो गये। उस समय प्रभु की देखा देखी बिना कुछ समझे—बूझे ही मात्र उनकी भक्ति से प्रेरित हो काच्छ, महाकच्छ आदिचार हजार राजाओं ने भी नग्न वेष बना लिया और वहीं ध्यान में खड़े हो गये। किन्तु कुछ ही दिन बाद वे सब राजा (साधु) भूख—प्यास से व्याकुल हो वन में घूमने लगे। वन के फल आदि खाकर निर्झर का जल पीने लगे। तभी वन देवता ने कहा— ‘‘ इस अर्हंत मुद्रा में तुम लोगों को अपने हाथ से इस प्रकार फल, जलादि ग्रहण करना उचित नहीं है।’’ तब वे लोग डर गये और नग्नवेष में वैसा न कर नाना वेष बना लिये । किसी ने बल्कल पहना, किसी ने लंगोटी पहन ली, किसी ने जटायें बढ़ा ली। तो किसी ने भस्म लपेट ली और वे सब नाना प्रकार से चेष्टा करते हुये वहीं वन में रहने लगे। श्री ऋषभदेव के बड़े पुत्र सम्राट् भरत, उनका एक पुत्र मरीचिकुमार था वह भी दीक्षित हो गया था सो वह उन सब भ्रष्ट तापसियों में अगुआ बन गया।

छह माह का योग समाप्त कर जब महायोगी

ऋषभदेव आहार के लिये निकले तब किसी का भी दिगंबर मुनि का आहार देने की विधि मालूम न होने से पुन: उन्हें छह महीने का उपवास हो गया। अनंतर वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन हस्तिनापुर के राजकुमार श्रेयांस को जातिस्मरण द्वारा आहार विधि का ज्ञान हो जाने से उन्होंने महामुनि ऋषभदेव का पड़गाहन कर विधिवत् उन्हें इक्षुरस का आहार दिया। उसी दिन से वह तिथि ‘‘अक्षयतृतीया’’ के नाम से प्रसिद्ध हो गई है। तत्पश्चात् एक हजार वर्ष के तपश्चरण के फलस्वरूप प्रभु को केवलज्ञान प्रगट हो गया। जिससे उन्होंने अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा असंख्य भव्यों को धर्मोंपदेश दिया। अंत में सर्व कर्मों का नाश कर वैलाश पर्वत से निर्वाण पद को प्राप्त किया है। ऐसे ये ऋषभदेव इस युग की आदि में गृहसथधर्म और मुनिधर्म के विधाता होने से ‘‘ आदिब्रह्मा’’ कहलाये हैं। जब चतुर्थकाल के प्रारंभ होने में तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष शेष रहा था तभी भगवान् ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया था। यह हुंडावसर्पिणी काल के दोष का ही प्रभाव है कि जो पहले तीर्थंकर तृतीय काल में ही होकर मोक्ष चले गये हैं।

सम्राट् भरत—

भगवान् ऋषभदेव ने दीक्षा के पहले अपने बड़े पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाया था और शेष सौ पुत्रों को यथायोग्य राज्य बाँट दिया था। जब भगवान् को केवलज्ञान हुआ उसी दिन भरत के आयुधगृह में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ था। उससे भरत ने सम्पूर्ण छहखण्ड पर विजय प्राप्त कर चक्रवर्ती पद प्राप्त किया। कालांतर में उन्होंने ब्राह्मण वर्ण की उत्पत्ति की थी तथा प्रजा में अनुशासन व दण्ड के अनेक प्रकार सथापित करते हुये राज्य संचालन किया था। आज उन्हीं सम्राट् भरत के नाम से यह देश ‘‘भारतवर्ष’’ कहलाता है।

दु:षमसुषमाकाल—

इस चतुर्थ काल में कर्मभूमि की व्यवस्था रहती है। मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक कोटिपूर्व वर्ष और शरीर की ऊँचाई ५२५ धनुष प्रमाण रहती है। पुन: घटते—घटते अंत में आयु १२० वर्ष एवं शरीर की ऊँचाई ७ हाथ मात्र की रह जाती है। श्री ऋषभदेव के मोक्ष जाने के बाद पचास लाख करोड़ सागरों के बीत जाने पर श्री अजितनाथ तीर्थंकर हुये हैं। इसी तरह इस ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर के चतुर्थ काल में क्रम—क्रम से अजितनाथ आदि महावीर पर्यंत तेईस तीर्थंकर हुये हैं। भारत आदि बारह चक्रवर्ती, नव बलभद्र, नव बलभद्र, नव नारायण, नव प्रतिनारायण और चौबीस तीर्थंकर ये त्रेसठ शलाका पुरुष माने गये हैं जो कि प्रत्येक चतुर्थकाल में होते हैं। जब पंचम काल प्रवेश होने में तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष काल शेष रह गया था तभी श्री महावीर स्वामी कार्तिक कृष्णा अमावस्या के प्रभात में पावापुरी से मोक्ष पधारे थे।

तीर्थंकरों के शरीर की अवगाहना—

श्री ऋषभदेव के शरीर की उँâचाई ५०० धनुष प्रमाण थी। अजितनाथ की ४५०, संभवनाथ की ४००, अभिनंदन नाथ की ३५०, सुमितनाथ की ३००, पद्मप्रभ की २५०, सुपार्श्वनाथ की २००, चन्द्रप्रभ की १५०, पुष्पदंत की १००, शीतलनाथ की ९०, श्रेयांसनाथ की ८०, वासुपूज्य की ७०, विमलनाथ की ६०, अनन्तनाथ की ५०, धर्मनाथ की ४५, शांतिनाथ की ४०, कुंथुनाथ की ३५, अरनाथ की ३०, मल्लिनाथ की २५, मुनिसुव्रत की २०, नमिनाथ की १५ और नेमिनाथ की १० धनुष प्रमाण थी। पार्श्वनाथ के शरीर की ऊँचाई ९ हाथ एवं महावीर स्वामी के शरीर की उँचाई ७ हाथ प्रमाण थी। इसी प्रकार से इस अवसर्पिणी के चतुर्थ काल में आयु, शरीर की उँचाई आदि घटते रहते हैं।

दुषमाकाल— इस पंचम काल में प्रथम प्रवेश में मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक सौ बीस वर्ष और ऊँचाई सात हाथ होती है। यह काल इक्कीस हजार वर्ष का है। इसमें आयु, ऊँचाई आदि घटते—घटते अंत में आयु मात्र बीस वर्ष की और शरीर की ऊँचाई आदि रहती है। चतुर्थ काल के जन्में हुये कुछ महापुरुष इस काल में निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं जैसे कि गौतम स्वामी, जंबूस्वामी आदि। किन्तु पंचम काल के जन्में हुये कोई भी मनुष्य पंचम काल में मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकते हैं । आज यहाँ भरत क्षेत्र के आर्य खण्ड में यह दु:षमा नाम का पंचम काल ही चल रहा है, जिसको लगभग २५०० वर्ष ही हुये हैं।

भगवान् महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के बाद

गौतम स्वामी से लेकर क्रम से अंग, पूर्व और मात्र आचारांग के धारी महामुनि ६८३ वर्ष तक होते रहे हैं। पुन: श्री गुणधराचार्य, श्री धरसेनाचार्य, श्री कुन्दकुन्दचार्य, श्री यतिवृषभाचार्य, श्री उमा स्वामी आचार्य, श्री समंतभद्र, श्री अकलंकदेव, श्री पूज्यपाद आदि महान् — महान् आचार्य धर्म की परंपरा को और श्रुत की परंपरा का अक्षुण्ण रखने में समर्थ होते रहें हैं। विक्रम की इस बीसवीं शताब्दी में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महामुनि, श्री वीरसागराचार्य, आदि महान् धुरंधर आचार्य हुये हैं। वर्तमान में श्री धर्मसागर जी, श्री देशभूषण जी, श्री विमलसागर जी आदि आचार्य चतुर्विध संघ का संरक्षण करते हुये विचरण कर रहे हैं।

श्री यतिवृषभाचार्य ने कहा है कि — ‘‘ गौतमस्वामी से लेकर आचारंग धारी तक का काल ६८३ वर्ष है। इसके आगे जो श्रुततीर्थ धर्मतीर्थ प्रवर्तन का कारण है, वह बीस हजार तीन सौ सत्रह वर्षों में काल दोष से व्युच्छेद को प्राप्त हो जायेगा। अर्थात् ६८३±२०३१७·२१००० वर्ष तक धर्मतीर्थ चलता रहेगा। यहाँ स्पष्ट अर्थ है कि भगवान् महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के बाद २१ हजार वर्ष प्रमाण इस पंचमद काल में बराबर धर्मतीर्थ चलता रहेगा। धर्मतीर्थ से मतलब है कि चातुर्वण्र्य मुनि, आर्यिका, श्रावक,श्राविका रूप चतुर्विध संघ जन्म लेता रहेगा।

इस पंचम काल के अन्त में वीरांगज नामक एक मुनि, सर्वश्री नाम की आर्यिका,अग्निदत्त श्रावक और पंगुश्री श्राविका होंगे। अंतिम कल्की राजा की आज्ञा से मंत्री द्वारा मुनिराज के हाथ का प्रथम ग्रास शुल्क रूप में मांगे जाने पर मुनिराज अंतराय मानकर आहार छोड़कर चले आयेंगे और आर्यिका तथा श्रावक—श्राविका को बुलाकर आदेश देंगे, कि ‘‘ अब पंचम काल का अंत आ चुका है हमारी और तुम्हारी आयु भी मात्र तीन दिन की शेष है और यह अन्तिम कल्की राजा हुआ है अत: अब सल्लेखना ग्रहण करना है।’’ इतना कहकर वे चारों जन चतुराहार का जीवन पर्यन्त त्याग कर विधिवत् सल्लेखना ग्रहण कर लेंगे। और वे कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन प्रात: शरीर छोड़कर सौधर्म स्वर्ग में देव उत्पन्न हो जावेंगे। उसी दिन मध्यान्ह काल को क्रोध को प्राप्त हुआ कोई असुरकुमार जाति का देव कल्की राजा को भार डालेगा और सूर्यास्त के समय अग्नि नष्ट हो जावेगी।[५]

दु:षमदु:षमा काल—

उपर्युक्त पंचक काल के तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष काल के व्यतीत हो जाने पर यह छठा काल प्रवेश करेगा। उस समय मनुष्यों की आयु बीस वर्ष और शरीर की उँâचाई साढ़े तीन हाथ प्रमाण रहेगी। यह काल भी इक्कीस हजार वर्ष का होगा। इस काल में अग्नि के अभाव में लोग मत्स्य आदि का कच्चा ही मांस खा जायेंगे। उस समय मकान, वस्त्र आदि नहीं होंगे। सभी मनुष्य व्रूâर, अन्धे, बहरे, गूँगे आदि दु:खी होंगे। दिन पर दिन मनुष्यों की ऊँचाई शक्ति आदि घटते रहेंगे। उनंचास दिन कम इक्कीस हजार वर्षों के बीत जाने पर घोर प्रलय होगा। उस समय महाभयंकर संवर्तक वायु चलेगी, जो सात दिन तक सम्पूर्ण वृक्ष, पत्थर, पर्वतों को चूर्ण कर डालेगी। तब मनुष्य और तिर्यंच में से संख्यात जीव राशि को उन सुरक्षित प्रदेशों में ले जाकर रख देंगे। इसके बाद आकाश में मेघों द्वारा सात—सात दिन तक क्रम से शीतजल, क्षारजल, विष, धुआँ, धूलि, वङ्का और अग्नि की वर्षा होती रहेगी। जिससे यह भरत क्षेत्र की आर्यखण्ड की ऊपर स्थित, वृद्धिंगत एक योजन पर्यंत भूमि जलकर खाक हो जावेगी। उस छठे काल के अन्त में मनुष्यों की आयु १६ या १५ वर्ष की तथा शरीर की ऊँचाई एक हाथ मात्र की रह जाती है। इस प्रकार महाप्रलय के बाद यह अवसर्पिणी समाप्त हो जावेगी।

उत्सर्पिणी के छह काल—

पुन: उत्सर्पिणी के छहों काल क्रम—क्रम से आवेंगे। इसमें सर्वप्रथम दु:षमदु:षमा नाम वाला छठा काल आयेगा। उस काल के प्रारम्भ से उसे पहला कहेंगे। दु:षमदुषमाकाल— उत्सर्पिणी के प्रारम्भ में पुष्कर मेघ सात दिन तक अच्छा जल बरसाते हैं, जिससे वङ्का और अग्नि से जली हुई सम्पूर्ण पृथ्वी शीतल हो जाती है। पुन: मेघों द्वारा क्षीर, अमृत और दिव्यरस की वर्षा होती है। तब पृथ्वी पर लता, गुल्म, घास आदि उगने लगती हैं। पृथ्वी की अच्छी सुगन्धि पाकर विजयार्थ की गुफा आदि में सुरक्षित रहे मनुष्य और तिर्यंच बाहा आ जाते हैं। पुनरपि उन्हीं से सृष्टि चलती है। इस काल की सारी व्यवस्था अवसर्पिणी के छठे काल के समान रहती है। यह काल भी इक्कीस हजार वर्ष प्रमाण है।

दु:षमाकाल—

यह दु:षमा नाम का द्वितीय काल प्रवेश करता है। उसके प्रारम्भ में मनुष्यों की आयु बीस वर्ष और शरीर की उँâचाई तीन साढ़े तीन हाथ प्रमाण रहती है। यह काल भी इक्कीस हजार वर्ष प्रमाण है। इस काल में एक हजार वर्ष शेष रहने पर क्रम से चौदह कुलकर उत्पन्न होंगे। पहले कुलकर का नाम कनक और अन्तिम का पद्मपुंगव होगा। इस काल में भी आयु, उँचाई आदि बढ़ते—बढ़ते अंत में अंतिम कुलकर की ऊँचाई सात हाथ प्रमाण हो जायेगी। ये कुलकर अग्नि उत्पन्न करके भोजन बनाना आदि सिखाते हैं तथा विवाह परम्परा आदि का उपदेश देते हैं।

दु:षमसुषमकाल—

इस तीसरे काल में प्रवेश में मनुष्य की आयु एक सौ बीस वर्ष और उँâचाई सात हाथ प्रमाण हो जाती है। इस काल में चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नव बलभद्र, नव नारायण और नव प्रतिनारायण ये त्रेसठ शलाका पुरुष उत्पन्न होते हैं। इनमें से प्रथम तीर्थंकर की आयु ११६ वर्ष और शरीर की उँचाई ७ हाथ प्रमाण होगी। पुन: इस काल में बढ़ते—बढ़ते अन्तिम तीर्थंकर अनंतवीर्य की आयु एक पूर्व कोटि वर्ष और ऊँचाई ५०० धनुष प्रमाण होगी यह काल ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है।

सुषमदु:षमकाल—

इसके बाद चतुर्थ काल प्रवेश करता है । इसके प्रारम्भ में मनुष्यों की आयु पूर्व कोटि वर्ष ऊँचाई ५०० धनुष की रहती है। पुन:बढ़ते—बढ़ते अंत में आयु एक पल्य की और ऊँचाई एक कोश प्रमाण हो जाती है। इस काल में दश प्रकार के कल्पवृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था हो जाती है यह काल दो कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है।

सुषमाकाल—

इस पाँचवें काल के प्रवेश में चतुर्थ काल के अन्त जैसी व्यवस्था है पुन: आयु बढ़ते हुए दो पल्य और शरीर की ऊँचाई दो कोश हो जाती है। यहाँ पर मध्यम भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। यह काल तीन कोड़ाकोडी सागर का है।

सुषमसुषमाकाल—

इसे छठे काल के प्रारम्भ में पाँचवें के अन्त जैसी व्यवस्था रहती है पुन: बढ़ते—बढ़ते मनुष्यों की ऊँचाई तीन कोश और आयु तीन पल्य प्रमाण हो जाती है। यहाँ पर उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। यह काल भी चार कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। इस प्रकार से उत्सर्पिणी के षट्कालों का परिवर्तन पूर्ण होकर पुन: अवसर्पिणी काल आ जाता है।

हुंडावसर्पिणी—

असंख्यात अवसर्पिणी—उत्सर्पिणी काल की शलाकाओं के बीत जाने पर प्रसिद्ध एक हुंडावसर्पिणी आती है। इसमें कुछ अघटित बातें हो जाया करती हैं वर्तमान में यह अवसर्पिणी काल हुंडावसर्पिणी ही चल रहा है। इस हुंडावसर्पिणी काल में तृतीय काल में कुछ काल अवशिष्ट रहने पर ही वर्षा का होना, विकलेंद्रिय जीवों की उत्पत्ति का होना , कल्पवृक्षों का अभाव होकर कर्मभूमि का प्रारम्भ हो जाना, इसी काल में प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का हो जाना आदि हो गये हैं। तथा प्रथम चक्रवर्ती का विजय भंग, उनके द्वारा ब्राह्मण वर्ण की उत्पत्ति, मध्य के सात तीर्थों में धर्म का व्युच्छेद आदि हुये हैं। ग्यारह रुद्र और कलह प्रिय नव नारद हुये हैं तथा सातवें, तेईसवें और अंतिम तीर्थंकर पर उपसर्ग भी हुआ है। विविध प्रकार के दुष्ट, पापिष्ठ, कुदेव और कुलिंगी भी इसी की देन है। चांडाल, शवर, किरात, श्वपच आदि निकृष्ट जातियाँ व कल्की, उपकल्की भी इसी में होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि भूकम्प, वङ्कााग्नि का गिरना आदि नाना दोष इसी काल की देन हैं । इस प्रकार भरत और ऐरावत क्षेत्र में रहट घटिका के समान अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल अनन्तानंत होते हैं। ये भरत—ऐरावत क्षेत्र कहाँ—कहाँ हैं सो ही बताते हैं।

करणानुयोग—

सामान्यलोक— अलोकाकाश के मध्य में पुरुषाकार लोकाकाश है। यह १४ राजू३ ऊँचा और ७ राजू मोटा है। इसकी चौड़ाई नीचे ७ राजू है। पुन: घटते हुए मध्य में १ राजू, पुन: ऊपर बढ़ते हुए ब्रह्मस्वर्ग के पास ५ राजू एवं आगे पुन: घटते हुए लोक के अंत में १ राजू रह गई है। इसके बीचों—बीच एक राजू चौड़ी और इतनी ही मोटी त्रसनाली है जिसमें ही त्रस जीव रहते हैं बाकी सर्वत्र लोक में स्थावर जीव हैं। एक राजू प्रमाण चौड़े मध्य लोक के नीचे ७ राजू तक अधोलोक है। जिसमें ७ नरक भूमियाँ हैं और बिल्कुल नीचे निगोद स्थान है। मध्य लोक के ऊपर १६ स्वर्ग, नवग्रैवेयक, नव अनुदिश और पाँच अनुत्तर हैं । उसके ऊपर सिद्ध शिला है। उसके भी ऊपर लोक के अग्रभाग में सिद्ध जीवों का निवास है। मध्यलोक— मध्यलोक १ राजू विस्तृत और १ लाख ४० लाख योजन ऊँचा है। इसके ठीक बीच में सबसे पहला जम्बूद्वीप है जो कि एक लाख योजन विस्तृत गोलाकार है। इसको चारों ओर से वेष्टित कर दो लाख योजन विस्तृत लवण समुद्र है। इसे वेष्टित कर धातकी खण्ड द्वीप है। इसे वेष्टित कर कालोदसमुद्र है। इसे वेष्टित कर पुष्कर द्वीप है। इसी प्रकार एक द्वीप और एक समुद्र ऐसे असंख्यात द्वीप समुद्र हैं जो कि एक दूसरे को वेष्टित किये हुए हैं। तथा प्रमाण में अगले—अगले द्वीप—समुद्र पूर्व—पूर्व से दूने—दूने प्रमाण वाले होते गये हैं। अन्त के द्वीप का नाम स्वयंभूरमण द्वीप और समुद्र का भी नाम स्वयंभूरमण समुद्र है।

जम्बूद्वीप—

इसके बीचों—बीच में १० हजार योजन विस्तृत और एक लाख ४० योजन ऊँचा सुदर्शनमेरु पर्वत है। इसकी नींव पृथ्वीं में एक हजार योजन है तथा चूलिका ४० योजन की है। यह पर्वत घटते हुए अग्रभाग में ४ योजन मात्र रह गया है। इसमें पृथ्वी पर भद्रसाल वन है। इसके ऊपर नंदन, सौमनस और पांडुक वन हैं। प्रत्येक वन की चारों दिशाओं में एक—एक जिनमन्दिर होने से १६ जिनमन्दिर हैं। पांडुक वन की विदिशाओं में पांडुक आदि शिलायें हैं जिन पर तीर्थंकर बालक का जन्माभिषेक होता है। इस जम्बूद्वीप में दक्षिण से लेकर पूर्व—पश्चिम लम्बे ऐसे छह पर्वत हैं जिनके नाम हिमववान, महाहिमवान, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी हैं। इन छह पर्वतोें से विभाजित सात क्षेत्र हैं जिनके नाम भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत हैं। छह पर्वतों पर क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिन्छ, केसरी, महापुंडरीक और पुण्डरीक ऐसे छह सरोवर हैं। उनसे गंगा—ाqसन्धु, रोहित—रोहितास्या, हरित—हरिकांता, सीत—सीतोदा, नारी—नरकांता, सुवर्ण—कूला—रूप्यकूला और रक्ता—रक्तोदा ये चौदह नदियाँ निकली हैं जो कि दो—दो मिलकर सात क्षेत्रों में बहती हैं।

भरत क्षेत्र—

भरत क्षेत्र के बीचों—बीच में विजयार्थ पर्वत है । तथा हिमवान पर्वत से गंगा—सिन्धु नदी निकल कर नीचे गिरकर बहती हुई विजयार्ध पर्वत की गुफा से बाहर निकलकर आगे क्षेत्र में बहकर लवणसमुद्र में प्रवेश कर जाती हैं। इस निमित्त से इस भरत क्षेत्र के छह खण्ड हो गये हैं। इनमें से दक्षिण के मध्य का आर्यखण्ड है शेष पाँच मलेच्छ खण्ड हैं। इसी प्रकार से ऐरावत क्षेत्र में भी छह खण्ड हैं। इन भरत—ऐरावत के आर्यखण्डों में ही पूर्व में कथित षट्काल परिवर्तन होता रहता है।

भोगभूमि—

हैमवत, हरि, विदेह के अन्तर्गत मेरु के दक्षिण में देवकुरु और उत्तर में उत्तर कुरु, रम्यक तथा हैरण्यवत इन छहों क्षेत्रों में भोगभूमि की व्यवस्था है जो सदा काल एक सदृश रहती है। शाश्वत कर्म भूमि— विदेह में मेरु के निमित्त से पूर्व—पश्चिम ऐसे दो भेद हो गये हैं। उनमें भी १६ वक्षार पर्वत और १२ विभंगा नदियों के निमित्त से ३२ विदेह हो गये हैं। प्रत्येक विदेह में भी छह खण्ड हैं उनमें से आर्यखण्ड में कर्म भूमि की व्यवस्था है। जैसे यहाँ भरत क्षेत्र में चतुर्थकाल के प्रारम्भ में व्यवस्था थी वैसे ही वहाँ सतत बनी रहती है। अथवा यों कहिये कि श्री ऋषभदेव ने अपने अवधिज्ञान से वहीं की वर्णव्यवस्था, ग्राम, नगर व्यवस्था आदि को जानकर युग की आदि में यहाँ पर वैसी व्यवस्था बनाई थी। इस प्रकार इस जम्बूद्वीप में भरत—ऐरावत क्षेत्र के सिवाय अन्यत्र कहीं भी षट्काल परिवर्तन नहीं है ऐसा समझना।

लवण समुद्र—

इस जम्बूद्वीप के चारों ओर दो लाख योजन विस्तृत लवण समुद्र है। इसका जल ११००० योजन ऊचाँ शिखाऊ ढेर के समान है और वह शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को १६००० योजन ऊँचा हो जाता है। इसके अनदर टापू के समान गौतम द्वीप, हंस द्वीप, लंका द्वीप आदि अनेकों द्वीप हैं। रावण की लंका इसी समुद्र के लंका द्वीप में थी। धातकी खण्ड द्वीप— लवण समुद्र को वेष्टित कर चार लाख योजन विस्तृत धातकी खण्ड द्वीप है। इसके दक्षिण—उत्तर में एक—एक लम्बे इष्वाकार पर्वत हैं। उनके निमित्त से इस द्वीप के पूर्व धातकी खण्ड और पश्चिम धातकी खण्ड ऐसे दो हो गये हैं। पूर्व धातकी खण्ड के ठीक बीच में ‘‘विजय’’ नाम का मेरु है और पश्चिम धातकी खण्ड में ‘‘अचल’’ नाम का मेरु पर्वत है । दोनों तरफ भरत, हैमवत आदि सात क्षेत्र, हिमवान् आदि छह पर्वत, पद्म आदि सरोवर और गंगा आदि नदियाँ हैं। अत: धातकीखण्ड में दो भरत, दो ऐरावत हैं। अन्तर इतना ही है कि वहाँ के क्षेत्र आरे के समान आकार वाले हैं। इस द्वीप को वेष्टित कर आठ लाख योजन विस्तृत कालोद समुद्र है।

पुष्करार्धद्वीप—

कालोद समुद्र को वेष्टित कर १६ लाख योजन विस्तृत पुष्करवर द्वीप है। इसके बीच में चूड़ी के समान आकार वाला मानुषोत्तर पर्वत है। इस पर्वत के इधर ही दक्षिण—उत्तर में इष्वाकार पर्वत हैं इनके निमित्त से वहाँ भी पूर्व पुष्करार्ध और पश्चिम पुष्करार्ध ऐसे दो भेद हो जाते हैं। यहाँ पूर्व में ‘‘मंदर’’ नाम का मेरु है और पश्चिम में ‘‘विद्युन्माली’’ नाम का मेरु है । दोनों तरफ ही भरत आदि क्षेत्र, हिमवान् आदि पर्वत हैं। यहाँ पर भी भरत, दो ऐरावत हैं। षट्काल परिवर्तन कहाँ—कहाँ— जम्बूद्वीप का एक भरत, एक ऐरावत, धातकी खण्ड के २ भरत, २ ऐरावत, पुष्करार्ध द्वीप के २ भरत, २ ऐरावत ऐसे ५ भरत और ५ ऐरावत के आर्यखण्डों में ही सदा सुषमासुषमा आदि षट्काल का परिवर्तन होता रहता है।

ढाई द्वीप—

एक जम्बूद्वीप, दूसरा धातकी खण्ड और पुष्कर का आधा हिस्सा पुष्करार्ध ये ढाई द्वीप हैं। इनमें हैमवत आदि क्षेत्रों की व्यवस्था ज्यों की त्यों रहती है वहाँ काल परिवर्तन नहीं है। ‘‘ताभ्यामपराभूमयोवसिथता:’’१ इस सूत्र के अनुसार भरत—ऐरावत के अतिरिक्त सभी भूमियाँ अवस्थित हैं। मनुष्य कहाँ तक हैं— मानुषोत्तर पर्वत के इधर ही मनुष्य रहते हैं। इस पर्वत से उधर असंख्यातों द्वीपों में मात्र त्रियंच युगल रहते हैं उन सबमें जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था है। अंतिम स्वयंभूरमण द्वीप में भी बीच में चूड़ी के समान आकार वाला एक स्वयंप्रभ पर्वत है। उससे परे उस आधे द्वीप में और स्वयंभूरमण समुद्र में कर्मभूमियाँ तिर्यंच हैं। नंदीश्वर द्वीप— ढाई द्वीप से परे आठवां नंदीश्वर द्वीप है वहाँ बावन जिन मन्दिर हैं। जिनकी आष्टान्हिक पर्व में पूजा की जाती है। ऐसे ही ग्यारहवें और तेरहवें द्वीप में भी चार—चार जिन मन्दिर हैं। इस प्रकार तेरह द्वीपों तक अकृत्रिम जिन मन्दिर हैं, जो कि सब ४५८ हैं उनको मेरा नमस्कार होवें।

गति परिवर्तन—

भव से भवांतर को प्राप्त करना गति है। इसके चार भेद हैं— नरक गति, तिर्यंच गति, मनुष्य गति और देव गति। नरक गति— हिंसा आदि पाप करके जीव नरक में चले जाते हैं वहाँ पर असंख्य दु:खों को भोगते रहते हैं। ये नरक धरा मध्यलोक से नीचे है।

तिर्यंच गति— मायाचारी आदि के निमित्त से जीव तिर्यंच योनि में जन्म ले लेता है। इसमें वृक्ष, जल, वेंâचुआ, चींटी, भ्रमर, हाथी, घोड़ा आदि हो जाता है। दो इन्द्रिय आदि सभी तिर्यंच मध्यलोक में रहते हैं।

मनुष्य गति— सरल परिणामों से मनुष्य योनि मिलती है । ये सब मनुष्य मानुषोत्तर पर्वत से इधर में ही हैं।

देव गति— उत्तम पुण्य, दान, पूजन, तपश्चरण और अहिंसा पालन आदि से देवगति मिलती है। देवों के चार भेद हैं— भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी और वैमानिक। भवनववासी देवों के विमान इस मध्यलोक की चित्रा पृथ्वी से नीचे और नरक भूमियों से ऊपर बने हुये हैं। व्यंतर देव नीचे तथा मध्यलोक में सर्वत्र रहते हैं। वैमानिक देव ऊपर स्वर्गों में रहते हैं और ज्योतिषी देव मध्यलोक में हैं।

ज्योतिदेंव— इन देवों के ५ भेद हैं— सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र और तारे। इनके विमान चमकीले होने से इन्हें ज्योतिषीदेव कहते हैं। इस चित्रा पृथ्वी से ७९० योजन से ऊपर ९००योजन तक इनके विमान आकाश में अधर हैं। ये विमान सतत मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देते हुए घूमते रहते हैं। इन्हीं के भ्रमण से यहाँ पर दिन—रात्रि का विभाग होता है। इस प्रकार यह अति संक्षेप में तीन लोक का वर्णन हुआ है। इस चतुर्गतिरूप संसार में अनंतानन्त प्राणी जन्म मरण के दु:ख उठा रहे हैं। पुन: इस संसार के दु:खों से छूटने का क्या उपाय है सो ही बतलाते हैं।

चरणानुयोग—

मोक्ष की प्राप्ति के उपाय— ‘‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:’’ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों की एकता ही मोक्षमार्ग है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति का उपाय है। इनसे विपरीत मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र ये संसार में भ्रमण कराने के कारण हैं।

सम्यग्दर्शन—सच्चे देव, शास्त्र,गुरु का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। यह तीन मूढ़ता, आठ मदरहित और आठ अंग सहित होना चाहिए।

सच्चे देव— जो क्षुधा, तृषा आदि अठारह दोषों से रहित वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हैं वे ही सच्चे आप्त देव हैं।

सच्चे शास्त्र— सच्चे देव द्वारा कहा हुआ, प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणों से बाधा रहित, जीवादि तत्त्वों को कहने वाला शास्त्र ही सच्चा शास्त्र है।

सच्चे गुरु— जो विषयों की आशा से रहित, आरम्भ और परिग्रह से रहित दिगम्बर वेषधारी हैं, ज्ञान, ध्यान और तप में सदा लीन रहते हैं वे ही सच्चे गुरु हैं।

सम्यग्ज्ञान— संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय रहित पदार्थों को जैसा का जैसा जानना सम्यग्ज्ञान है। इसके ग्यारह अंग और चौदह पूर्वरूप से भेद माने गये हैं। अथवा प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग के भेद से चार भेद भी होते हैं। इन चारों अनुयोगों में सम्पूर्ण द्वादशांग का सार आ जाता है।

प्रथमानुयोग— मह्मपुरुषों के चरित्र, पुराण आदि ग्रन्थ प्रथमानुयोग हैं।

करणानुयोग— लोक—अलोक को, षट्काल परिवर्तन को और चारों गतियों को बतलाने वाले ग्रन्थ करणानुयोग हैं।

चरणानुयोग— गृहसथ और मुनियों के चरित्र को कहने वाला चरणानुयोग है।

द्रव्यानुयोग— जीव, पुद् गल आदि द्रव्यों को, पुण्य—पाप को तथा बंध—मोक्ष करे बतलाने वाला द्रव्यानुयोग है।

सम्यक्चारित्र— जिसका आचरण किया जाता है वह चारित्र है। अथवा हिंसा आदि पापों से विरक्त होना सम्यक्चारित्र है। इसके दो भेद हैं— सकल चारित्र और विकल चारित्र।

सकल चारित्र— जो हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाँचों पापों का सर्वथा त्याग कर देते हैं और सम्पूर्ण आरम्भ—परिग्रह छोड़कर निग्र्रन्थ मुनि हो जाते हैं, उन्हीं के यह सकल चारित्र होता है।

विकल चारित्र— इन पाँचों पापों का अनुरूप — एकदेश त्याग करना अणुव्रत रूप विकल चारित्र होता है। यह विकल चारित्र गृहस्थों के होता है।

अहिंसा अणुव्रत— जो मन, वचन, काय से और कृत, कारित, अनुमोदना से संकल्प पूर्वक त्रसजीवों का घात नहीं करना है वह अहिंसा अणुव्रत है। इस व्रत के पालन करने वालों के लिए श्री अमृतचन्द्रसूरि कहते हैं— ‘‘हिंसा त्याग के इच्छुक पुरुषों को सर्वप्रथम यत्नपूर्वक मद्य (शराब), माँस, मधु, (शहद) और ऊमर, कठूमर और पीपल, बड़, पाकर ये पाँचों उदुम्बर फल छोड़ देने चाहिए।’’[६]

इसी बात को और पुष्ट करते हुए कहते हैं कि — ये आठ पदार्थ अनिष्ट, दुस्तर और पाप के स्थान हैं अत: इनका त्याग करके ही निर्मल बुद्धि वाले पुरुष जिन धर्म के उपदेश के पात्र होते हैं।ref>अष्टावनिष्टदुस्तरदुरितायतनान्यमूनि पारिवज्र्य। जिनधर्मदेशनाया: भवन्ति पात्राणि शु्द्धधिय:।।७४।।</ref> आगे और भी कहते हैं— ‘‘चूँकि रात्रि में भोजन करने वालों के हिंसा अनिवारित है ही है इसीलिए हिंसा से विरत पुरुषों को रात्रि भोजन का त्याग कर ही देना चाहिए। ’’ इन्हीं सबको समाविष्ट करते हुए अन्यत्र ग्रन्थों में कहा है— ‘‘मद्य, माँस, मधु, रात्रि भोजन, पंचउदुम्बर फल इनका त्याग, पंचपरमेष्ठी को नमस्कार, जीवदयापालन और जलगालन— फानी छान कर पीना ये आठ मूलगूण हैं जो कि श्रावक को पालन करने जरुरी हैं।’’[७] गृहस्थ के दैनिक जीवन में यह श्रावक है— दयालु है, ऐसी पहचान के लिये देवदर्शन करना, रात्रि भोजन नहीं करा और पानी छानकर पीना, ये स्थूल बातें परम्परा से भी प्रसिद्ध हैं। उन सबको इस अष्ट मूलगुण में ले लिया गया है। अहिंसाणुव्रती गृहस्थ इन अष्ट मूलगुणों को सर्वप्रथम ही ग्रहण करके संकल्पी त्रस हिंसा का जीवन भर के लिये त्याग कर देता है।

सत्य अणुव्रत— जो स्थूल असत्य स्वयं नहीं बोलता है, न दूसरों से बुलवाता है और ऐसा सत्य भी नहीं बोलता है कि जो धर्म की हानि या पर की विपत्ति के लिए हो जावे, वह एक देश सत्य—सत्याणु व्रती है।

अचौर्य अणुव्रत— जो पर की कोई भी धन, सम्पत्ति या वस्तु रखी हुई हो, भूली हुई हो या गिर गई हो उसको उसके मालिक के बिना दिये नहीं ग्रहण करना वह अचौर्य अणुव्रत है।

ब्रह्मचर्य अणुव्रत— जो पाप के भय से पर स्त्री का त्याग कर देता है अर्थात् अपने से छोटी को पुत्री बराबर और बड़ी को माता के समान समझता है अपनी विवाहित स्त्री में ही संतोष रखता है वह ब्रह्मचर्याणुव्रती है।

परिग्रह परिमाण अणुव्रत— धन, धान्य आदि परिग्रह का परिमाण करके उससे अधिक में इच्छा नहीं रखना परिग्रह परिमाण अणुव्रत है। ये पाँच अणुव्रत नियम से स्वर्ग को प्राप्त कराने वाले हैं। अर्थात् इस भव में नाना सुख, सम्पत्ति और यश को देकर परभव में स्वर्ग को देने वाले हैं। ‘‘क्योंकि अणुव्रत और महाव्रतों को धारण करने वाला जीव देवायु का ही बन्ध करता है। शेष तीन आयु के बंध हो जाने पर ये व्रत हो ही नहीं सकते हैं।[८] इन पाँच अणुव्रतों की रक्षा के लिए तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत भी गृहस्थों के लिए पालन करने योग्य हैं।

षट् आर्यकर्म—

गृहस्थों के छह आर्य कर्म होते हैं। इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम और तप। इज्या— अर्हंत भगवान् की पूजा का इज्या कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं— नित्यमह, चतुर्मुख, कल्पवृक्ष, आष्टान्हिक और ऐन्द्रध्वज।

नित्यमह— प्रतिदिन शक्ति के अनुसार अपने घर से गंध, पुष्प, अक्षत आदि अष्टद्रव्य सामग्री ले जाकर अर्हंत देव की पूजा करना, जिनमन्दिर, जिनप्रतिमा आदि का निर्माण करना और मुनियों की पूजा करना आदि नित्यमह है।

चतुर्मुख— मुकुटबद्ध राजाओं के द्वारा जो जिनेन्द्र देव की पूजा की जाती है वह चतुर्मुख है। इसे महाभद्र या सर्वतोभद्र भी कहते हैं।

कल्पवृक्ष— समस्त याचकों को किमिच्छक दान— क्या चाहिए ? ऐसा उनकी इच्छानुसार दान देते हुए जो चक्रवर्ती द्वारा जिनपूजा की जाती है वह कल्पवृक्ष पूजा है।

अष्टान्हिक — नंदीश्वर द्वीप में जाकर कार्तिक, फाल्गुन, आषाढ़ में इन्द्रों द्वारा होेने वाली पूजा आष्टान्हिक पूजा है।

ऐन्द्रध्वज— इन्द्र, प्रतीन्द्र आदि के द्वारा की गई पूजा ऐन्द्रध्वज है।

वार्ता— असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्या और शिल्प इन छह कार्यों में से किसी भी कार्य द्वारा आजीविका करके धन कमाना वार्ता है।

दत्ति— दान दान दत्ति है। इसके चार भेद हैं— दयादत्ति, पात्रदत्ति, समदत्ति और सकलदत्ति।

दयादत्ति — दु:खी प्राणियों को दया पूर्वक अभय आदि दान दयादत्ति है।

पात्रदत्ति— रत्नत्रय धारक मुनि, आर्यिका आदि को नवधा भक्ति पूर्वक आहार देना, ज्ञान,संयम आदि के उपकरण शास्त्र, पिच्छी, कमण्डलु आदि देनरा, औषधि तथा वस्तिका आदि देना पात्रदत्ति है।

समदत्ति— अपने समान गृहस्थों के लिए कन्या, भूमि, सुवर्ण आदि देना समदत्ति है।

अन्वयदत्ति— अपनी संतान परम्परा को कायम रखने के लिए अपने पुत्र को या दत्तकपुत्र को धन और धर्म समर्पण कर देना सकलदत्ति है। इसे अन्वयदत्ति भी कहते हैं।

स्वाध्याय— तत्त्वज्ञान को पढ़ना, पढ़ाना, स्मरण करना स्वाध्याय है।

संयम— पाँच अणुव्रतों से अपनी प्रवृत्ति करना संयम है।

तप— उपवास आदि बारह प्रकार का तपश्चरण करना तप है। आर्यों के इन षट्कर्म में तत्पर रहने वाले गृहस्थ होते हैं।

दशधर्म—

उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य। इन धर्मों का पूर्णतया तो पालन मुनि ही कर सकते हैं किन्तु गृहस्थ भी एक देशरूप से पालन करते हैं। यहाँ उत्तम शब्द सबके साथ लगाना चाहिए। क्रोध के कारण दूसरों के द्वारा निंदा आदि किये जाने पर भी क्रोध न कर क्षमा धारण करना उत्तम क्षमा है। जाति आदि मदों के आवेशवश अभिमान न करना उत्तम मार्दव है। मन—वचन—काय की कुटिलता न कर सरल परिणाम रखना उत्तम आर्जव है। प्रकर्ष प्राप्त लोभ का त्याग करना और मन को पवित्र रखना उत्तम शौच है। साधु—सज्जन पुरुषों के साथ साधु—उत्तम वचन बोलना उत्तम सत्य है। प्राणी की हिंसा और इन्द्रियों के विषयों का परिहार करना उत्तम संयम है। कर्म क्षय के लिए बारह प्रकार का तपश्चरण करना उत्तम तप है। संयत आदि के योग्य ज्ञानादि का दान करना उत्तम त्याग है। शरीर आदि के प्रति भी ‘‘यह मेरा है’’ इस ममकार का त्याग करना आकिंचन्य हैं। स्त्री मात्र का त्याग कर देना और स्वच्छंद वृत्ति का त्याग करने के लिए गुरुकुल में निवास करना उत्तम ब्रह्मचर्य है।

सोलह कारण भावनायें—

दर्शनविशुद्धि — विनयसपंन्नता आदि सोलहकारणभावनायें हैं। उनके नाम और लक्षण बताते हैं— १. दर्शनविशुद्धि— पच्चीस मल दोष रहित विशुद्ध सम्यग्दर्शन को धारण करना ।

२. विनयसंपन्नता— देव, शास्त्र, गुरु तथा रत्नत्रय का विनय करना।

३. शीलव्रतों में अनतिचार— व्रतों और शीलों में अतीचार नहीं लगाना।

४. अभीक्ष्णज्ञानोपयोग— सदा ज्ञान के अभ्यास में लगे रहना।

५. संवेग— धर्म और धर्म के फल में अनुराग होना।

६. शक्तिस्त्याग — अपनी शक्ति के अनुसार आहार, औषधि, अभय और शास्त्रदान देना।

७. शक्तितस्तप— अपनी शक्ति को न छिपाकर अंतरंग — बहिरंग तप करना।

८. साधु समाधि— साधुओं का उपसर्ग दूर करना या समाधि सहित वीर मरण करना।

९. वैयावृत्य करण— व्रती, त्यागी, साधर्मी की सेवा करना, वैयावृत्ति करना।

१०. अर्हद्भक्ति— अर्हंत भगवान् की भक्ति करना।

११. आचार्य भक्ति— आचार्य की भक्ति करना।

१२. बहुश्रुत भक्ति— उपाध्याय परमेष्ठी की भक्ति करना।

१३. प्रवचन भक्ति— जिनवाणी की भक्ति करना।

१४. आवश्यक आपरिहाणि— छह आवश्यक क्रियाओं का सावधानी से पालन करना।

१५. मार्ग प्रभावना— जैन धर्म का प्रभाव फैलाना।

१६. प्रवचन वत्सलत्व— साधर्मी जनों में अगाध प्रेम करना।

इन सोलह कारण भावनाओं में दर्शनविशुद्धि का होना बहुत जरूरी है फिर उसके साथ दो तीन आदि कितनी भी भावनाएँ हों या सभी हों तो तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो सकता है। अर्थात् कोई भी मनुष्य इन भावनाओं को अपने जीवन में उतारकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके मोक्षमार्ग का नेता तीर्थंकर भगवान् बन जाता है। पुन: इन्द्रों द्वारा पंचकल्याणक पूजा को प्राप्त कर और असंख्य भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देकर परमात्मपद को प्राप्त कर लेता है।

द्रव्यानुयोग—

छहद्रव्य—‘‘सद्द्रव्य लक्षणम्’’ द्रव्य का लक्षण सत् है। और ‘‘ उत्पादव्ययध्रौव्य युत्तंâ सत् ’’ इस लक्षण से जो उत्पाद, व्यय, ध्रोव्य लक्षण वाला है वह ‘‘सत्’’ है। द्रव्य में नवीन पर्याय की उत्पत्ति को उत्पाद कहते हैं जैसे जीव की देव—पर्याय का होना। पूर्व पर्याय के विनाश को व्यय कहते हैं। जैसे जीव की मनुष्य पर्याय का नष्ट होना। तथा पूर्व पर्याय का नाश और नवीन पर्याय का उत्पाद होने पर भी सदा बने रहने वाले मूल स्वभाव को ध्रोव्य कहते ळैं। जैसे — ङ्काीव की मनुष्य तथा देव दोनों पर्यायों में जीवत्व का रहना। ये तीनों अवस्थायें एक समय में होती हैं। द्रव्य का दूसरा लक्षण— ‘‘गुणपर्ययवद्द्रव्यम्’’ गुण और पर्यायों के समुदाय को द्रव्य कहते हैं जो द्रव्य के साथ रहें वे गुण कहलाते हैं। जैसे जीव का अस्तित्व या ज्ञानादि और पुद्गल के रूपरसादि। जो क्रम से हों वे पर्याय हैं। जैसे जीव की नर , नारकादिपर्यायें हैं। द्रव्य के ६ भेद हैं— जीव, पुद्गल, धर्म , अधर्म, आकाश और काल।

जीवद्रव्य—

उपयोगों लक्षणम्’’ जीव का लक्षण उपयोग है । उपयोग के ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग ऐसे दो भेद हैं। अथवा जो इंद्रिय, बल, आयु और श्वासोच्छ्वास इन बाह्य प्राणों से तथा चेतना (ज्ञान—दर्शन) लक्षण अंतरंग प्राणों से जीता है, जीता था और जीवित रहेगा वह जीव है। इस जीव के संसारी और मुक्त की अपेक्षा दो भेद हैं— जो संसार में भ्रमण करते हैं वे संसारी है और जो कर्मों के बंधन से छूट कर मुक्त हो गये हैं वे मुक्त हैं। संसारी जीव के भी त्रस—स्थावर ऐसे दो भेद हैं। दो इंद्रिय, तीन इंद्रीय, चार इंद्रिय और पंचेद्रिय जीव त्रस कहलाते हैं तथा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और वनस्पति ये एवेंâद्रिय जीव स्थावर कहलाते हैं।

पुद्गल द्रव्य— जो रूप, रस, गंध और स्पर्श से सहित हो वह पुद्गल है। अथवा जिसमें हमेशा पूरण—गलन होता रहे वह पुद्गल है। इसके दो भेद हैं —अणु (परमाणु) और स्वंâध। पुद्गल के सबसे छोटे अविभागी हिस्से को अणु या परमाणु कहते हैं। दो, तीन आदि से लेकर संख्यात, असंख्यात और अनंत परमाणुओं से बने हुए पुद्गल पिण्ड को स्कंध कहते हैं।

धर्मद्रव्य— जो जीव और पुद्गलों को चलने में सहकारी हो वह धर्मद्रव्य है । जैसे — मछली को चलने में जल सहकारी है।

अधर्मद्रव्य— जो जीव और पुद्गल के ठहरने में सहकारी हो वह अधर्मद्रव्य है। जैसे— चलते हुए पथिक को ठहरने में वृक्ष की छाया सहकारी है।

आकाशद्रव्य— जो समस्त द्रव्यों को आकाश— स्थान देता है वह आकाशद्रव्य है इसके दो भेद हैं— लोकाकाश और आलोकाकाश । जिसमें जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और कालद्रव्य पाये जाते हैं वह लोकाकाश है। उसके बाहर चारों तरफ अनन्तानन्त अलोकाकाश है।

कालद्रव्य— जो सभी द्रव्यों के परिणमन— परिवर्तन में सहायक हो वह कालद्रव्य है। इसके दो भेद हैं— ाqनश्चयकाल और व्यवहारकाल। वर्तना लक्षण वाला निश्चयकाल है और घड़ी, घण्टा, दिन, महिना आदि व्यवहारकाल है।

द्रव्यों के प्रदेशों की संख्या — एक जीव, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं। पुद्गल के एक से लेकर संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेश होते हैं। अलोकाकाश के अनन्त प्रदेश हैं और कालद्रव्य एक प्रदेशी है। अस्तिकाय— जो अस्ति— वद्यमान हो अर्थात् सत् लक्षण वाला हो उसे ‘‘अस्ति’’ कहते हैं और बहुप्रदेशी को काय कहते हैं। प्रारम्भ के पाँच द्रव्य अस्तिकाय हैं । कालद्रव्य अस्ति तो है किन्तु काय बहुप्रदेशी न होने से ‘‘अस्तिकाय’’ नहीं है अत: पाँच द्रव्य ही अस्तिकाय कहलाते हैं।

सात तत्त्व—

वस्तु के यर्थाथ स्वभाव को तत्त्व कहते हैं। इसके सात भेद हैं— जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष। चेतना लक्षण वाला जीव है। इससे भिन्न अजीव है। आत्मा में कर्मों का आना आस्रव है। आत्मा के प्रदेशों में कर्मों का एकमेक हो जाना बंध है। आते हुए कर्मों का रुक जाना संवर है। आत्मा से कर्मों का एक देश क्षय होना निर्जरा है और आत्मा से सम्पूर्ण कर्मों का छूट जाना मोक्ष है। इन्हीं सात तत्वों में पुण्य—पाप को मिला देने से नव पदार्थ हो जाते हैं जो आत्मा को पवित्र या सुखी करे वह पुण्य है और जिसके उदय से आत्मा को दु:खदायक सामग्री मिले वह पाप है। संसार और मोक्ष के कारण— इन सात तत्त्वों में से आस्रव और बंध तत्त्व संसार के कारण हैं तथा संवर और निर्जरा तत्त्व मोक्ष के कारण हैं। ऐसा समझकर संसार के कारणों से दूर हटकर मोक्ष कारणों को प्राप्त करना चाहिए।

आत्मा के तीन भेद—

आत्मा के तीन भेद हैं— बहिरातमा, अंतरात्मा और परमात्मा। शरीर को ही आत्मा समझने वाला बहिरात्मा है। यह जीव मिथ्यात्व परिणाम से सहित होकर कर्मों को बांधता रहता है और संसार में परिभ्रमण करता है । तत्त्वों पर श्रद्धान करने वाला सम्यग्दृष्टि जीव अन्तरात्मा है। यह जीव अपनी आत्मा को ज्ञान—दर्शनमय समझता है और शरीर को अचेतन तथा अपने से भिन्न समझता है। यह अन्तरात्मा सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र के बल से अपने आत्मा को परमात्मा बनाने के प्रयत्न में लगा रहता है। जब यही अन्तरात्मा घातिया कर्मों का नाश कर अर्हंत, केवली हो जाता है तब वह सकल परमात्मा कहलाता है पुन: अष्ट कर्मों से रहित नित्य, निरंजन, सिद्ध हो जाता है। तब वह निकल परमात्मा हो जाता है । ये परमात्मा पुन: कभी भी संसार में नहीं आते हैं। वहाँ लोक के अग्रभाग में विराजमान हुए अनंत काल तक अव्याबाध, अचिन्त्य सुख का अनुभव करते रहते हैं। इस जैन धर्म में प्रत्येक प्राणी को परमात्मा बनने का अधिकार प्राप्त है। चाहे जो भी क्यों न हो वह रत्नत्रय रूप पुरुषार्थ के बल से अपनी आत्मा को परमात्मा बनाकर संसार के दु:खों से सदा के लिए छूट कर अविनाशी सुख को प्राप्त कर सकता है।

टिप्पणी

  1. तिलोयपण्णति, अ० प० पृ० १८४।
  2. एक लाख वर्ष को चौरासी से गुणा करने पर पूर्वांग होता है। और पूर्वांग को चौरासी से गुणा करने पर एक पूर्व होता है। ऐसे एक करोड़ पूर्व वर्षों की आयु थी।
  3. पूर्वापरविदेहेषु या स्थिति: समवस्थिता:। साद्य प्रवर्तनीयात्र यतो जीवन्त्यमू: प्रजा:।।१४३।। षट्कर्माणि यथा तत्र यथा वर्णाश्रमस्थिति:। यथा ग्रामगृहादीनां संस्त्यायाश्च पृथकग्विधा:।।१४४।। आदि पु०, पर्व १६, पृष्ठ—३५९
  4. आदि पुराण, पर्व १६, पृष्ठ—३७०
  5. तिलोयपण्णति, अधिकार ४ पृ० ३४५।
  6. मद्यं मांसं क्षौद्रं पंचोदुम्बरफलानि यत्नेन। हिंसाव्युपरतिकामैर्मोक्तव्यानि प्रथममेव।।६०।।
  7. मद्यपलमधुनिशाशनपंचफली विरतपंचकाप्तनुति:।जीवदया जलगालनमिति च क्वचिदष्टाूलगुणा:।।
  8. अणुवदमहव्वदाइं ण लहइ देवाउगं मोत्तुं।। गोम्मटसार कर्मकाण्ड।।