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जैन धर्म और पर्यावरण संरक्षण

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जैन धर्म और पर्यावरण संरक्षण

सुनील "संचय"
जैन दर्शनाचार्य, बी—३/८०, भदैनी, वाराणसी—२२१००१ (उ. प्र.)
सारांश
भयावह प्राकृतिक आपदा ‘सुनामी लहर’ (२६ दिसम्बर २००४) के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत आलेख में प्राकृतिक आपदाओं का कारण प्रकृति के साथ छेड—छाड— नरूपित किया है। जैन जीवन पद्धति की विस्तार से विवेचना करते हुए यह प्रतिपादित किया है कि यह प्रकृति हितैषी एवं पर्यावरण संरक्षण के पूर्णत: अनुकूल है।
सम्पादक

आज जहाँ देखो वहाँ पर्यावरण संरक्षण की चर्चा चल रही हैं। पर्यावरण की सुरक्षा, संवद्र्धन ही मानव को सभ्य जीवन जीने की प्रेरणा देता है। आज हमारा देश ही क्या, समूचा विश्व पर्यावरणीय असंतुलन की स्थिति से आहत व चितित है। पर्यावरण अपने भौतिक, जैविक एवं सांस्कृतिक पहलुओं द्वारा मानव की नियति का निर्धारण करता है। जल, वायु, जमीन और आकृति के समावेश से भौतिक वातावरण जीवन के अस्तित्व को विभिन्न प्रकार से बनाये रखता है। जैविक वातावरण में वनस्पति एवं जीव—जन्तु शामिल हैं, जो जीवित प्राणियों के लिये भोजन एवं आहार के अन्य साधन उपलब्ध कराते हैं। मानव ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये प्रकृति का इतना दोहन कर लिया है कि उसे संवारने हेतु एक बहुत लम्बा समय लग जायेगा। जलवायु, शोर एवं जनसंख्या इन सबकी विशुद्धता एवं संतुलन ही पर्यावरण की सुरक्षा करता है। जल, वायु और जनसंख्या को यदि हम स्थूल दृष्टि से देखें तो इन सबका सीधा सम्बन्ध मनुष्य से हुआ करता है। मनुष्य का प्रवृत्ति के साथ उदार सम्बन्ध रहा है परन्तु आज वह दूर—दूर तक नजर नहीं आता, मनुष्य का प्रकृति से उदार सम्बन्ध ही प्रदूषण को नियंत्रित कर सकता है। प्रकृति के निर्मम शोषण एवं दोहन के लिये मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है। कहना चाहिये ऐसा कर वह स्वयं अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार रहा है। पर्यावरण सुरक्षा का अभियान हम पूरे विश्व में अनेक प्रकार से मनाते हैं। ‘पर्यावरण’ यह शब्द आज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं के साथ जाना पहचाना जाता है। हमारे देश में समय—समय पर ‘पर्यावरण सुरक्षा दिवस’, ‘वृक्ष लगाओ अभियान’ तथा अनेक राष्ट्रीय संगोष्ठियों चलती रहती हैं फिर भी इन सबका परिणाम शून्य रहा है। क्योंकि पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर केवल चर्चा ही होती नजर आती हैं। आज के समय यदि कोई र्चिचत शब्द है तो वह है ‘पर्यावरण’। देश की संसद से लेकर उच्चतम न्यायालय तक में इस शब्द की गूँज हो रही है। आज समय चीख—चीख कर कह रहा है कि अपने भूत और भविष्य की समीक्षा करो पर सुनता कौन किसकी है ? पर्यावरण विनाश को यदि रोकना है तो जैन सिद्धान्तों का विश्व को अनुकरण करना ही होगा। केवल एकमात्र जैन धर्म ही संसार का वह पहला और अब तक का आखिरी धर्म है जिसने धर्म का मूलाधार पर्यावरण सुरक्षा को मान्य किया है। काश! जैन पर्यावरणीय सुरक्षा को अपनाया होता तो ‘सुनामी लहरों’ में लाखों प्राणियों को अपनी जान—माल से हाथ न धोना पड़ता। २६ दिसम्बर २००४ की वह काली रात लाखों लोगों को बर्बाद कर गयी। चारों ओर से सुनामी त्रासदी से पीड़ित लोगों तक राहत सामग्री पहुँचाई जा रही है, यह मानवता का प्रतीक है। पर अब भी क्या लोग सचेत और जाग्रत होंगे ऐसी ही किसी भयानक त्रासदी के झेलने के प्रति ? सुनामी लहरों ने जो कहर ढ़ाया है उसे प्राकृतिक आपदा की संज्ञा दी गई है। यदि आज भी जागरूक न हुए तो सुनामी जैसी अनेक घटनाएँ हमें देखना पड़ेंगी और हो सकता है कल हम भी इसके शिकार बन जायें। ऐसी प्राकृतिक विपदाओं का कारण स्पष्ट है प्रकृति का मनुष्य द्वारा दोहन। जैन दर्शन ने जिस सूक्ष्म दृष्टि से पर्यावरण संरक्षण का उल्लेख किया है यदि उसका परिपालन विश्व करे तो निश्चित ही सुनामी लहरों जैसे वीभत्स दिल दहलाने वाली घटनाओं पर लगाम लग सकती है। जैन धर्म और पर्यावरण सुरक्षा पर निम्न प्रकार से विचार लिख रहा हूँ।

जनंसख्या वृद्धि और पर्यावरण

हमारा देश आज दिन प्रतिदिन हो रही जनसंख्या वृद्धि से चितित है तथा उसे रोकने हेतु अनेक प्रयास जारी हैं परन्तु कुछ भी सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। जैन धर्म में वर्तमान चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव लाखों करोड़ों वर्ष पूर्व हुए हैं, वे तभी इसकी रोकथाम के लिये संविधान निर्धारित कर गये थे। उन्होंने असि, मसि, कृषि आदि का उपदेश पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से ही दिया। भगवान आदिनाथ ने नारी के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदलने का कार्य किया। समस्त स्त्री जाति को भोग्या समझने वाले समाज को विवाह का ज्ञान (विवेक) देकर जनसंख्या नियोजन का सूत्रपात किया। विवाह प्रथा कायम होने से नारी भोग पर बंधन लग गया। विवाह जैसे पवित्र बंधन को न समझने वाले देश आज एड्स जैसी भयावह, भयानक बीमारी से ग्रस्त हैं। एड्स पूरे विश्व की समस्या बन गया है, परन्तु जब तक आदिनाथ द्वारा प्रर्वितत मार्ग का अनुकरण नहीं होगा तब तक इससे निजात पाना संभव नहीं है। यदि आज का समाज संयम, ब्रह्मचर्य सिद्धान्त का पालन करता है, संयम से रहता है तो इस महामारी से सुरक्षा प्राप्त की जा सकती है एवं पर्यावरण को विनाश से बचाया जा सकता है। आज विवाह शादी में परिर्वितत हो रहे हैं जो जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण है। पहले प्रेम फिर शादी आज की इस नवीन प्रवृत्ति से देश को बचाना होगा।

स्थावर जीव और पर्यावरण

‘पृथिव्यप्तेजोवायु वनस्पतय: स्थावरा:’ पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक ये पाँच स्थावर (एक इन्द्रिय) जीव हैं। ज्ञातव्य है कि जैनधर्म ने ही सबसे पहले पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतियों को जीव कहा है। विज्ञान इसे मानने को तैयार नहीं परन्तु इनमें से वनस्पतियों को उसने जीव मानना प्रारम्भ कर दिया है क्योंकि डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने यह सिद्ध कर दुनिया को बता दिया था कि वृक्षों, फूलों, पत्तियों में भी जान है। उन्होंने कहा है कि एक बूंद अनछने जल में ३६४५० जीव होते हैं परन्तु जैन धर्म इसमें अनंत जीवराशि मानता है। जिसे हमारे जैनाचार्य हजारों वर्ष पहले अपनी गहन साधना के बल पर जीव बता गये हैं, उन्हें देर—सबेर वैज्ञानिकों को भी जीव स्वीकारना ही होगा। आज वृक्षों की निरन्तर हो रही कटाई से हमारा पर्यावरण असुरक्षित है, जंगल वीरान हो गये हैं, जैनाचार्यों ने वृक्षों को काटना बताया है, पाप बताया है। क्योंकि वृक्ष में भी जीव होता है। श्रावक और मुनि में दो भेद जैन दर्शन ने जीवन जीने के लिये किये हैं। उनमें जो श्रावक होता है वह त्रसकाय जीवों कीहिंसा का त्यागी होता है तथा स्थावरकाय जीवों का नहीं, परन्तु आवश्यकता के विपरीत यदि एक पत्ता या एक पंखुडी भी श्रावक तोड़ता है तो वह पाप का भागीदार होगा। फिर जो जंगल साफ करने में लगे हैं वे महापापी नहीं तो और क्या हैं ? ‘मिट्टी पानी और बयार, जिन्दा रहने के ये आधार’। पानी की बात आती है तो जैनाचार्यों ने कहा है कि जिस प्रकार हम तेल को शरीर में लगाते हैं उसी प्रकार पानी का भी हमें उपयोग करना चाहिये। व्यर्थ में पानी का ढोलना पाप है,हिंसा है। आज जल प्रदूषण से सारा संसार आक्रान्त है। पीने का पानी भी आज शुद्ध नहीं है क्योंकि आज के स्वार्थी मानवों ने उसे गंदा कर दिया है परन्तु उसे पता नहीं इसके भयानक परिणाम मानव को ही झेलना पड़ेंगे। भयानक बीमारियाँ इसी की वजह से हैं। आज देश की गंगा, यमुना जैसी बड़ी—बड़ी नदियाँ जल प्रदूषण से ग्रसित हैं, उन्हें गंदा और किसी ने नहीं उन्हीं के भक्तों ने किया है। जितने भी अभियान चलाये जा रहे हैं वह समय का तकाजा देखते हुए खास पहल करने वाले या सार्थक परिणाम देने वाले नहीं हैं, ऐसे में जैन धर्म में र्विणत जल सुरक्षा, उसकी उपयोगी विधि जल प्रदूषण मुक्ति के लिये रामबाण सिद्ध होगी। अग्नि, वायु और पृथ्वी की सुरक्षा व उसका सही उपयोग आज नहीं हो पा रहा है। भूकम्प जैसी भयानक विपदा से आखिर हमें क्यों जूझना पड़ता है ? मात्र पृथ्वी पर हो रहे अत्याचार के कारण। जिस प्रकार से द्रुत गति से पृथ्वी का क्षरण चालू है उसे देखकर लगता है कि मानव विनाश का समय आने वाला है। जैन दर्शन की दृष्टि में यदि पृथ्वी की थोड़ी सी भी मिट्टी बिना प्रयोजन खोदी गई तो वह पाप की श्रेणी में आयेगा। यदि विश्व को भूमि के कोपभाजन के भयावह ज्वालामुखी से बचना है तो जैनाचार्यों के कथन को आचरण में लाना होगा। वायु प्रदूषण, अग्नि प्रदूषण घातक रूप लेता जा रहा है इसका मुकाबला जैन सिद्धान्त करने में पूर्ण समर्थ हैं।

दिगम्बर मुनि और पर्यावरण

‘मूच्र्छा परिग्रह:’२ पदार्थों में ममत्व ही परिग्रह है। अपरिग्रही वृत्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण जैन साधुओं की दिगम्बर मुद्रा है। दिशायें ही जिसकी अम्बर हो, धरती ही जिसका बिछौना हो, आकाश ही जिसका ओढ़ना हो, पिच्छी (मूयर पिच्छी) से स्थल बुहारकर जो उठता, बैठता हो, ईर्यापथ से विहार हो, भाषा समिति और वचन गुप्ति का पालन करते हुए जो हित—मित प्रिय वचन बोलते हों, दिन में एक बार शुद्ध सात्विक करपात्र में भोजन ग्रहण करते हों, ऐसे निश्छल, निसर्ग दिगम्बर मुनि का कोई भी आचरण कैसे पर्यावरण प्रदूषित करेगा ? पर्यावरण सुरक्षा कैसे की जाये इसके लिये दिगम्बर जैन साधु जीता जागता, चलता—फिरता उदाहरण है। आज परिवारों में वैचारिक प्रदूषण से अनेक परिवार बिखर रहे हैं, परन्तु जैन दर्शन कहता है कि हित—मित प्रिय वचन बोलो तो यह नौबत ही नहीं आयेगी।

जिओ और जीने दो, अहिंसा परमोधर्म :

भगवान महावीर स्वामी ने कहा था कि ‘जिओ और जीने दो’ जो कि जैन धर्म का प्रमुख सूत्र भी है। इस जिाओ और जीने दो के सूत्र में पर्यावरण के जीव तत्व के प्रति आदर का भाव निहित है और पर्यावरण की जैन अवधारणा शामिल है। एक इन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक सभी प्राणी जीना चाहते हैं, किसी को भी मरना पसन्द नहीं, चाहे वह नाली का कीड़ा ही क्यों न हो ? ‘स्पर्शनरसनघ्राणचक्षु: श्रोत्राणि’ ये पाँच इन्द्रियाँ हैं। जैन दृष्टि में केवल मनुष्य का प्राणघात करना ही हिंसा नहीं बल्कि राग—द्बेष को भीहिंसा माना गया है।

अप्रादुर्भाव: खलु रागादीनां भवत्यिंहसेति।

तेषाभेवोत्पत्ति: हिंसेति जिनागमस्य संक्षेप:।

अर्थात् राग—द्वेषादि का उत्पन्न नहीं होना अहिंसा है और उन्हीं राग—द्वेषादि की उत्पत्ति हिंसा है, यह जिनागम का सार है। जैन धर्म में ‘अहिंसा परमोधर्म:’ अिंहसा ही परम धर्म है। वर्तमान दौर युद्ध, आतंकवाद का है। विभिन्न राष्ट्रों के पास अस्त्र—शस्त्र, परमाणु बम, हाइड्रोजन बम आदि नहीं होते तो विश्व समाज को पर्यावरण का इतना खौफनाक मञ्जर नहीं देखना पड़ता।

परास्परोपग्रहो जीवानाम्

परास्परोपग्रहो जीवनाम्५ परस्पर एक दूसरे जीव का उपकार करना जीव का कत्र्तव्य है। यह उपकार दया का प्रतीक है। उपरोक्त सूत्र पर यदि दुनिया चलने लगे तो फिर पारिवारिक या अन्य पर्यावरणीय प्रदूषण जैसा असंतुलन ही नहीं होगा। सुनामी लहरों के कहर के बीच उपरोक्त सूत्र के अनुरूप आचरण का अच्छा उदाहरण देखने को मिला। ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ सूत्र भाई चारे का सूत्रपात कर विश्व में पारिवारिक प्रदूषण से मुक्ति दिलाता है।

पाँच व्रत

जैन धर्म में जो पाँच व्रत प्रतिपादित किये गये हैं वे पर्यावरण सुरक्षा में महत्त्वूपर्ण स्थान रखते हैं। ‘हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिव्रतम्’६ अर्थात् हिंसा, असत्य, चोरी अब्रह्म और परिग्रह से निवृत्त होना व्रत है। अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत एवं अपरिग्रहाणुव्रत ये पाँच अणुव्रत हैं। अहिंसा का प्रतिपादन जितनी सूक्ष्म दृष्टि से जैन धर्म, दर्शन में मिलता है वह अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। यदि अहिंसा का पालन विश्व करे तो देश में जो कत्लखानों, मांस उत्पादनों से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है वह समाप्त हो जायेगा। कत्लखानों के खून से आज वातावरण दिन प्रतिदिन गंदा होता जा रहा है, विशेष तौर पर जल। जैन धर्म की ‘अहिंसा’ के इस रामबाण सूत्र से देश को वधगृहों से मुक्त किया जा सकता है, जो पर्यावरण प्रदूषण का प्रमुख स्तम्भ कारण है।

जैन श्रावक की दिनचर्या व पर्यावरण

जैन श्रावक को पालनीय १२ व्रत बतलाये गये हैं। पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत् जैनाचार्यों ने श्रावक की दिनचर्या का जो संविधान बनाया है वह निश्चित रूप से पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से बनाया गया लगता है। रात्रि भोजन त्याग, जलगालन विधि, सामायिक पाठ, सप्त व्यसनों का त्याग, अष्ट मूलगुणों का पालन आदि ये सभी आचरण पर्यावरण रक्षा की दिशा में जैन धर्म का महत्त्वपूर्ण कदम है। जैन श्रावक की दैनिक चर्या पर्यावरण को साथ लेकर हुआ करती हैं। उसकी चर्या ही ‘पर्यावरण सुरक्षा का अमर संदेश देती है। जैन श्रावक पूजन के समय नित्य प्रति शान्तिपाठ में निम्न पंक्तियों में सुखमय एवं संतुलित पर्यावरण की कामना करता है—

होवे सारी प्रजा को सुख, बलयुत हो धर्मधारी नरेशा।

होवे वर्षा समय पै तिल भर न रहे व्याधियों का अंदेशा।।
होवे चोरी न मारी, सुखमय वरतै हो न दुष्काल भारी।
सारे ही देश धारैं जिनवर वृष को, जो सदा सौख्यकारी।।

नित्य स्तुति, मेरी भावना, पूजनपाठ, आलोचना पाठ, शान्तिपाठ, प्रतिक्रमण, सामायिक पाठ आदि की प्रत्येक पंक्ति पर्यावरण रक्षा का अमर संदेश देती है। मेरी भावना की निम्न पंक्तियाँ मानवीय पर्यावरण को साफ, स्वच्छ रखने में अहम् भूमिका निभाती है—

मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे,

दीन दुखी जीवों पर मेरे, उर से करूणा स्रोत बहे।
दुर्जन व्रूर वूमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे,
साम्य भाव रखूँ में उन पर ऐसी परिणति हो जाये।।

तथा

ईति भीति व्यापै नहीं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे,

धर्मनिष्ठ होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे।
रोग मरी र्दुिभक्ष न फैले, प्रजा शांति से जिया करे,
परम आहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्व हित किया करे।।

श्रावक की दिनचर्या प्रमाद रहित होनी चाहिये। यदि प्रमाद होता है तो भले ही किसी जीव की हानि न हो फिर भी पाप लगता है। ‘प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोहण हिंसा’९ सूत्र में पूज्य उमास्वामी ने यही कहा है। प्रमाद रहित होने पर हुई हिंसा का पाप नहीं लगता है फिर भी ऐसी अवस्था में जैन श्रावक अपने प्रमाद के प्रति दुखी होता है। अपराधी श्रावक खुले हृदय से प्रकृति के विभिन्न अवयवों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति के प्रति किये गये अपने अपराधों की क्षमा मांगता है। पर्यावरण रक्षा का ऐसा पश्चाताप, प्रायश्चित स्तुत्य है, अनुकरणीय है। आलोचना पाठ में जैन श्रावक बोलता है—

पृथ्वी बहु खोद कराई, महलादिक जाँगा चिनाई।

पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो, पंखाते पवन बिलाल्यो।
हा हा परमाद बसाई, बिन देखे अग्नि जलाई।
तामधि जीव जे आये ते हूँ परलोक सिधाये।
जल मल मोरिन गिरवायो, कृमिकुल बहुघात करायो।
नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव मराये।।

अंत में मंगलकामना इसी पाठ में करते हैं कि–

दोष रहित जिनदेवजी, निजपद दीजे मोय।

सब जीवन के सुख बढ़ें, आनन्द मंगल होय।।

राष्ट्र की मंगलकामना और भाईचारे की प्रतीक सामायिक पाठ की निम्न पंक्तियाँ प्रेरणास्पद हैं—

सत्तवेषु मैत्री गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम्।

माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ, सदा ममात्मा विदधातु देव।।

अर्थात् प्राणी मात्र के प्रति मैत्रीभाव, गुणीजनों के प्रति प्रमोदभाव, दुखी और क्लेष युक्त जीवों के प्रति करूणा (कृपा) भाव तथा प्रतिकूल विचार वालों के प्रति मध्यस्थ भाव रखें। हे देव! मेरी भावना सदा ऐसे भाव धारण करे। उपरोक्त सभी उदाहरण तो एक बानगी है, जैन दर्शन इससे भरा पड़ा है।

अनेकान्तवाद और पर्यावरण

जैन दर्शन का अनेकान्तवाद वास्तव में वैचारिकहिंसा को रोकने के लिये सफल औषधि है। एक ही व्यक्ति में अनेक गुण विद्यमान होते हैं परन्तु यदि हम उसमें एक ही एकांत दृष्टि को लेकर बैठ जायें तो निश्चित ही झगड़ा होगा। जैन दर्शन ‘ही’ को छोड़ने तथा ‘भी’ को अपनाने की प्रेरणा देता है। जहाँ ‘ही’ है वहाँ विवाद है और जहाँ ‘भी’ है वहाँ शान्ति है। आज जो घर—घर में वैचारिक पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है उसके निवारण का उपाय जैन दर्शन का स्याद्वाद, अनेकान्त है। ‘स्याद्वाद से तो सर्व सत्य विचारों का द्वार खुल जाता है।’ स्याद्वाद की परिभाषा आचार्य समन्तभद्र इस प्रकार करते हैं—


स्याद्वाद: सर्वथैकान्तव्यागात् किवृतचिद्विधि:।

सप्तभंगनापेक्षो हेयादेय विशेषक:।।१०४।।’’

अर्थात् सर्वथा एकान्त का त्याग करके कथंचित्विधान करने का नाम स्याद्वाद है। वह सात अंगों और नयों की अपेक्षा रखता है तथा हेय और उपादेय भी बतलाता है। स्याद् यानि कथंचित् वाद यानि कथन। कथंचित् कथन पद्धति का नाम स्याद्वाद है। यदि जैन धर्म की इस विचार दृष्टि को विश्व अपना ले तो वैचारिक मतभेद कोसों दूर भाग जायेगी और वैचारिक पर्यावरण शुद्ध हो जायेगा। सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों ही दृष्टियों से जैन धर्म पर्यावरण की रक्षा के प्रति अत्यधिक सजग है। जैन धर्म केवल भौतिक पर्यावरण की शुद्धि के लिए ही जागरूक व प्रयत्नशील नहीं है बल्कि अन्त: पर्यावरण की विशुद्धि को भी एक अभिन्न अंग मानता है। जब तक आत्मा शुद्ध नहीं होगी, अन्तरंग परिणाम शुद्ध नहीं होंगे, तब तक पर्यावरण सुरक्षा संभव नहीं है। पर्यावरण की सच्ची सुरक्षा तभी मानी जावेगी जब भौतिक व आध्यात्मिक पर्यावरण का ध्यान रखा जावे।

हमारी गुमराह और मिथ्यादृष्टि ने सभ्यता के विकास के नाम पर सारे पर्यावरण को तहस—नहस कर दिया है। संपूर्ण विश्व विनाश के कगार पर खड़ा है। हम पर्यावरण के स्वयं एक हिस्सा है, यह जानते हुए भी हम पर्यावरण सुरक्षा के प्रति संवेदनशील नहीं है। आज हमें समय की नजाकत देखते हुए सम्हलना होगा, वरना प्रकृति भी शान्त रहने वाली नहीं है। भूकम्प, तूफान, बाढ़, बिजली गिरना, सुनामी लहरें आदि आखिर क्या दर्शा रही है ? फिर भी यह पर्यावरण के प्रति लापरवाही बरत रहे हैं।

हाल ही में २६ दिसम्बर २००४ को आयी ‘सुनामी लहरों’ से हमें सबक लेने की जरूरत है जिसमें भारत, श्रीलंका, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड, मलेशिया, म्यांमार, मालदीव और बंगलादेश के लाखों लोगों को जान गंवानी पड़ी। अकेले श्रीलंका और इण्डोनेशिया में ढाई लाख से अधिक लोग मर चुके हैं। भारत में तमिलनाडु, केरल, अण्डमान निकोबार द्वीप, पांडिचेरी, आंध्रप्रदेश सबसे अधिक इस त्रासदी से प्रभावित हुए हैं। हजारों जाने गयी, हजारों बिछुड गये, जो जीवित बचे हैं वे मौत और जीवन के बीच संघर्ष कर रहे हैं। चारों और से उदारता से इस त्रासदी को झेल रहे लोगों के लिए सहायता पहुँची है, जैन समाज भी इसमें आगे रहा है। ‘सुनामी लहरों’ के बाद तरह—तरह से लोगों के, वैज्ञानिकों के विचार आने लगे, परन्तु जहाँ दृष्टि होना चाहिए वहाँ कोई दृष्टिपात नहीं कर रहा है कि आखिर यह ‘सुनामी लहरें’ क्यों आयी ? शायद जैन दर्शन से सीख लें।

विश्व यदि पर्यावरण विनाश के इस दमघोटू जंजाल से सस्ते में निपटना चाहता है तो उसे जैनधर्म दर्शन में र्विणत पर्यावरण सुरक्षा की बातों पर गहनता से विचार करना चाहिए। जैन दर्शन में र्विणत प्रत्येक बात पर्यावरण सुरक्षा की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। पर्यावरण है तो हम हैं अन्यथा कुछ भी नहीं है। पर्यावरण संरक्षण संवद्र्धन के प्रति हम सजग और जागरूक रहें। जैन धर्म की पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि विश्व के लिए अमूल्य धरोहर है।

सन्दर्भ—

१. मोक्षशास्त्र (उमास्वामी), द्वितीय अध्याय, सूत्र—१३

२. मोक्षशास्त्र (उमास्वामी), सप्तम अध्याय, सूत्र—१७

३. मोक्षशास्त्र (उमास्वामी), द्वितीय अध्याय, सूत्र—१९

४. आचार्य अमृतचन्द्र, पुरुषार्थ सिद्धियुपाय—४४

५. मोक्षशास्त्र (उमास्वामी), पञ्चम अध्याय, सूत्र—२१

६. मोक्षशास्त्र (उमास्वामी), सप्तम अध्याय, सूत्र—१

७. शान्तिपाठ (हिन्दी)

८. जुगलकिशोर मुख्तार—मेरी भावना

९. मोक्षशास्त्र (उमास्वामी), सप्तम अध्याय, सूत्र—१३

१०. आलोचना पाठ (हिन्दी)

११. अमितगति आचार्य—सामायिक पाठ

१२. जर्मन विद्वान डा. हर्मन जैकोबी का कथन

१३. आचार्य समन्तभद्र : आप्तमीमांसा, कारिका १०४, पृ. ३३०


अर्हत् वचन जनवरी—मार्च २००५