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जैन धर्म के सिद्धांतों के परिपालन द्वारा महिलाओं की सुरक्षा

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जैन धर्म के सिद्धांतों के परिपालन द्वारा महिलाओं की सुरक्षा

भारतवर्ष, जिसे संसार के आध्यात्मिक गुरु होने का महत्वपूर्ण गौरव प्राप्त है वह वस्तुत: धर्मप्रधान होने के कारण है। यहाँ की संस्कृति और सभ्यता के कण-कण में धर्म समाया हुआ है। यदि किसी भारतीय विचारक के सामने कोई प्रस्ताव अथवा योजना रखी जाए तो वह धर्म से संबंधित होने पर ही उसे स्वीकृत करेगा। जिसमें भारतीय महिलाएँ तो सर्वाधिक धार्मिक प्रवृत्तियों को मानने वाली होती हैं। जैन धर्म के सिद्धांतों को अंगीकार करने वाली महिलाएँ आज के युग में दुराचार से दूर रहकर चहुँमुखी प्रगति कर सकती है। धर्म के सिद्धांतों, सद् गुणों, स्वभावों तथा स्वकर्तव्यों का पालन करने से जीवन सदा विकसित होगा।

भारतीय संस्कृति की गंभीरवाणी हजारों वर्षों से गूँजती आ रही है और संदेश देती आ रही है कि मानव ! तुझे जो यह अनमोल जीवन मिला है वह भौतिक-जगत् की अँधेरी गलियों में भटकने के लिए नहीं है, भोग-विलास की गंदी नालियों में कीड़ों की तरह कुलबुलाने के लिए नहीं है, पुत्रैषणा, वित्तैषण और लोकैषणा की भूली-भटकी टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर चक्कर काटने के लिए नहीं है, वासनाओं, विकारों तथा कुविचारों का गुलाम बनकर जीवन बर्बाद करने कि लिए नहीं है अपितु इस जीवन का उद्देश्य विकारों और वासनाओं पर विजय-वैजयंती फहराना, त्याग वैराग्य की निर्मल ज्योति जगाना, नियम-संयम की सरस सरिता में अवगाहन करने के लिए है। जो महान आत्मा जीवन के सही उद्देश्य को समझ लेता है वह एक ज्योतिपुंज के रूप में मानव-जाति को नि:श्रेयस् की ओर अग्रसर होने के लिए मार्गदर्शन देता रहता है। भारतीय दार्शनिकों ने तथ्य की भाषा में कहा-

‘‘मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्ष्यो: ।’’

अर्थात् मन मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्तों अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह की कसौटी पर मानव जीवन निखर जाता है। जैन धर्म की सुस्पष्ट उद्घोषणा है- ‘पन्ना समिक्खए धम्मं’ मनुष्य अपने बुद्धि-वैभव का कितना भी अभिमान करे, परंतु वास्तव में उसका दायरा अत्यंत संकीर्ण है। जगत के बुद्धिगम्य तत्वों को तर्क से विचार करना चाहिए। भगवान महावीर, अरिष्टनेमि, भीष्म पितामह, सती-सीता, अजंना, सावित्री, द्रोपदी के उज्जवल आदर्श आज भारत में हो रहे दुराचरण के लिए जीते-जागते उदाहरण हैं। जीवन में चरित्र के सिद्धांत का महत्व सर्वोपरि है। भोग-विलास की ज्वालाओं में जनता बुरी तरह झुलसती जा रही है। चलचित्रों ने सारे युवक-युवतियों के अंदर एक शिष्टाचार व लज्जा की सीमा को लाँघ दिया है। उन्हें यह स्मरण करना चाहिए कि भोग के तूफान में जवानी बर्बाद करने के लिए नहीं है। जीवन की लालिमा संयम, विवेक तथा सुसंस्कारों से ही सर्वत्र फैली रहती है।

जैन धर्म में ब्रह्मचर्य की विराट् साधना का परिचय प्राप्त होता है। दीर्घकाल व्यतीत हो जाने पर भी सीमा का जीवन आज भी जगमगा रहा है। आप क्या परिचित नहीं कि सती सोमा के पास कौन-सी अद्भूत शक्ति थी ? क्या उनके पास तोप, तलवार, बंदूक थी ? नहीं उसके पास था ब्रह्मचर्य का महान तेज, जिसके सामने सभी तेज निस्तेज थे। यह जैन धर्म की शील व पवित्रता नारी की शक्ति को जाग्रत करती है। हमें सती व महान नारियों से यह शिक्षा लेनी चाहिए कि विकट परिस्थितियों में अपने धर्म के पथ से हिलना नहीं चाहिए, अडिग रहकर सदाचार की बिजली चमकानी चाहिए। संसार की समस्त शक्तियाँ, ब्रह्मचर्य की विराट साधना के सामने नतमस्तक होती है। ब्रह्मचर्य के महान तेज के बल पर कुरुक्षेत्र में महाभारत के वीर नायक भीष्म पितामह अपनी प्रतिज्ञा पर प्रतिबद्ध रहे। देवराज इन्द्र भी उनके चरणों में नमस्कार करते हैं। ‘नमो बंभयारिस्स।’ जैन साहित्य के जगमगाते नक्षत्र विजय कुंवर और विजया कुमारी की बात इतिहास का अलंकार और गर्वोशक्ति है। जिनका जीवन विशालसागर के समतुल्य है। इन जीवन गाथाओं का उदाहरण हमारे लिए अनुकरणीय है।

भारतवर्ष की मूल पूँजी चरित्र-निर्माण है। भारत में बड़े-बड़े संतों, ऋषि-मुनियों, तत्वेत्ताओं और दार्शनिकों ने सर्वाधिक चरित्र निर्माण पर बल दिया है।

यदि आप चरित्र-निर्माण की बात को दिखावटी रूप में लेते हैं, तो अपनी आत्मा को धोका देते हैं और महामनीषियों के प्रति भी आप द्रोह ही करते हैं। अगर परमात्मा पर दृढ़ विश्वास रखते हो फिर अप्रामाणिक व्यवहार, आचरण का स्थान जीवन की किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिए। ईमानदारी तथा लोकाचार मानव जीवन की रक्षक है। जहाँ जीवन में प्रामाणिकता आ जाती है। वहाँ प्रभु के प्रति और विश्वात्माओं के प्रति प्रेम जाग जाता है। इस कारण उसका स्वास्थ्य भी निश्ंिचतता के कारण खराब नहीं होता, आत्मा भी स्वस्थ संदेश देती है, मन और शरीर हमेशा शुद्ध, निरोग तथा सहज रहते हैं।

आधुनिक युग प्रतिस्पर्धा का युग है। प्रत्येक नर-नारी अपने समुचित जीवन विकास हेतु भरसक प्रयत्नशीन करते हैं। नारी भी कंधे-से-कंधे मिलाकर अपने जीवन-साथी की कामयाबी के लिए स्वयं नौकरी करती हैं। कई बार उन्हें अपना सफर अकेले भी तय करना होता है। इसलिए ऑफिस, बस अथवा सुनसान स्थानों पर महिलाओं के साथ हो रहे दुष्कर्मों से बचने के लिए उन्हें सचेत सावधान रहना चाहिए। उन्हें जैन धर्म की पगडंडी पर कदम रखते हुए मानवीय कुविचारों से सर्वदा दूर रहना चाहिए। प्रलोभन (लालच) के बहकावे में न आकर किसी पर पुरुष के प्रति आकृष्ट होने के कुविचारों पर संयमित होना चाहिए।

उन्हें यह कदापि अविस्मरित न हो कि ‘नियंत्रित, संयमित और मर्यादित जीवन ही जीवन है। अपरिग्रह की दृष्टि में अपने पास जितना है, उतने में संतुष्ट और खुश रहकर जीवन निर्वाह करना चाहिए। बालिकाओं को अपने शीलव्रत का दृष्टव्य देने के लिए सती अंजना, सती सोमा प सती सीता जैसी महान नारियों की मूर्ति को अपने मन मंदिर में बनाए रखना चाहिए। प्यंग्य, लाने अथवा हँसी उड़ाने का कार्य नहीं होना चाहिए। अपना दृष्टिकोण हमेशा सुंदर, मधुर तथा उपादेय रखकर जीवन को सत्यं, शिवं और सुंदरम् की ओर ले जाना चाहिए। नारी में मानवता, सहानुभूति और आंतरिक सौंदर्य होना चाहिए जिसके बल पर अनैतिक आचरण को होने से रोक सकती है। जैन धर्म श्रद्धा, विवेक की पतवार से जीवन सँवारकर निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होकर मानव जीवन कल्यापणमय बनती है। यर्थाथ यह है कि नदी जैसे दोनों तटों के मध्य में संतुलित होकर प्रवाहमान रहने से ही अनेक प्राणियों के लिए, जीवनदायी बन सकता है। वैसे ही मनुष्य की जीवन सरिता तादात्मय और ताटस्थ इन दोनों तटों के मध्य रहकर जीवन वीणा की शब्द लहरियों से झंकृत हो जाती है। भगवान महावीर ने चार दुर्लभ बातों में मानवता सर्वप्रथम दुर्लभ कहकर जगत् के जीवों का उद्बुद्ध कर दिया है-

चत्तारि परमंगाणि दुल्लहाणीह जंतुगो ।

माणुसत्तं, सुई, सद्धा मानवता य वीरियं ।।

इसलिए मानव शरीर प्राप्त किया मानवता नहीं प्राप्त की, तो उसका कोई महत्व नहीं है। आज भौतिकवाद के प्रवाह से हटकर मानवता के धर्म रूपी सुंदर सदन में प्रवेश करने की आवश्यकता है। आपका जीवन धर्म के आँगन में सँवरेगा जहाँ गिरने की कोई संभावना नहीं, जहाँ फिसलने का कोई अनुमान नहीं।

प्रत्येक नारी को अपना जीवन धर्म संस्कारों के साए में बिताना चाहिए जिससे स्वयं आत्मकल्याण के मार्ग पर चलकर दूसरों को भी राह दिखा सके। आज की बालिका, कल का भावी परिवार है अत: वे स्वयं धार्मिक सुरक्षित होकर अपने परिवार को दिशावान तथा संस्कारवान बनाकर संपूर्ण समाज, देश का नाम उन्नत करने में पूर्ण सफल होगी। भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाकर इसके गौरव को अक्षुण्णं रखेगी।

विनीता जैन (म.प्र.)
सराक सोपान जनवरी २०१५