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जैन संस्कृति स्वरूप, समस्या और समाधान

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जैन संस्कृति स्वरूप, समस्या और समाधान

प्रमुख रूप से भारतवर्ष में तथा विरल रूप में विश्व के अनेक देशों में जैन समाज निवास करता है। इस समाज की आस्था के प्रमुख केन्द्र जिन अर्थात् जितेन्द्रिय तीर्थंकर एवं अन्य सिद्ध भगवान् हैं। जिन को मानने वाले, जिन के समान बनने की चाह वाले और जिन के समान ही न्यूनाधिक आचरण करने वाले जैन कहलाते हैं। यही जैन समाज के रूप में संगठित होने के कारण जैन समाज के रूप में जाने जाते हैं। जैन समाज की विरासत में जो संस्कृति मिली है वह धर्ममूलक, चिन्तनपरक, अनेकान्तात्मक एवं सहअस्तित्व की संसूचक है। यहाँ ईश्वर जगत का कत्र्ता नहीं है, आत्मा भी स्वतंत्र है और किसी की दयादृष्टि पर निर्भर नहीं हैं। जो इस आत्मा का परिष्कार करता है वह आतमा ही परमात्मा बन जाती है। यहाँ सदाचार और सद्भाव सहज है, स्वभावगम्य है। यहाँ सामाजिक, नैतिकता की दीवार अभेद तो नहीं किन्तु इतनी मजबूत है कि इसका उल्लंघन जल्दी करने की कोई नहीं सोचता। धर्मग्रंथों के वचन और तदनुसार साधु—संतों, विद्वानों के प्रवचन भी इस नैतिकता को बनाए और बचाए रखने में अपना सम्यक् योगदान देते हैं। कहा जाता है कि पूर्व में जैन सत्यवादिता के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि यदि कोर्ट में किसी पक्ष में जैन गवाही दे देते थे तो जज उस पक्ष के पक्ष में निर्णय सुना देते थे। वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में भी उन्हें न्यायप्रिय, सदाचारी एवं सादगी पसन्द व्यक्तियों के रूप में सम्मान प्राप्त था।

जैन समाज जैन धर्म के सिद्धान्तों—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य से अभिप्रेरित है। स्याद्वाद, अनेकान्त, सप्तभंगीवाद जैसे सिद्धान्त या शैलियाँ हमारी वैचारिक दृष्टि—सरणि को संतुलित बनाते हैं और मानसिक एवं वाचनिक अहिंसाको मजबूत करते हैं। हमारी धार्मिक श्रद्धा हृदय की गहन गहराईयों में प्रतिष्ठित है। इस श्रद्धा के मूल में है जिनेन्द्रदेव, जिनप्रणीत शास्त्र और जिनवरवेशी दिगम्बर गुरु। जो सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्नत्रय के संवाहक कहलाते हैं।

जैनधर्म की विशेषता है कि हमें अपने पूज्यों से चाहे वे अरहन्त भगवान ही क्यों ने हों प्रश्न पूछने, अन्वेषण करने, कल्पना करने, नए विचार, नयी टीका करने की छूट है। कहा जाता है अकेले श्रेणिक ने तीर्थंकर सर्वज्ञ महावीर से आत्मा के विषय में ६०,००० प्रश्न पूछे और भगवान ने उनके उत्तर भी दिए। इसलिए हमारे समाज में संतों, विद्वानों, समाज के अन्य बौद्धिकजनों को नए विचारों के उद्भावन की व्यवस्था है किन्तु वे कितने ही मौलिक हों किन्तु उनका समावेश मूल सिद्धान्तों में ही हो जाता है ठीक वैसे ही जैसे नदियाँ कहीं से भी प्रवाहित हों किन्तु अन्त में वे समुद्र में ही जाकर मिलती हैं।

आधुनिक युग जिसे हम २१वीं सदी कहते हैं उसमें जैनधर्म नए युग का धर्म बनने की ओर अग्रसर है क्योंकि आज का समाज परीक्षण के बिना कुछ भी मानने के लिए तैयार नहीं। उसे जो भी चाहिए वह सारभूत, सर्वाधिक सार्थक और सत्य से संपृक्त होना चाहिए। जैन धर्म के लिए अंतर में विद्यमान आत्मसत्य ही परमसत्य है। यह किसी भी जीव को आलोकित कर सकता है। आत्मसाक्षात्कार आत्मा को स्वयं करना होता है। इसके जो कारण हैं वे हैं साधना, चित्त—शुद्धि और आत्मावलोकन। हमारा धर्म श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र प्रधान है। जैन समाज का मूल धार्मिक आधार तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित जैनधर्म एवं दर्शन है। यह धर्म एवं दर्शन सार्वभौमिक सहअस्तित्व पर विश्वास रखता है। यह लोक के भले के लिए है किसी तंत्र विशेष के लिए नहीं। वह ‘मत’ के आधार पर विभाजित या विलोपित नहीं किया जा सकता। यहाँ सत्य का आग्रह है किन्तु दुराग्रह नहीं। विजय अर्थात् जीतने के लिए आत्मा है किन्तु प्राणियों से शत्रुता नहीं। यदि शत्रु भी कोई हैं तो वे विभाव हैं, राग—द्वेष हैं। यह स्वयं को जीतने का दर्शन है। यदि आप अपने कल्याण के पक्षधर हैं तो बने रहें; कहीं कोई आपत्ति नहीं, किन्तु ध्यान रहे दूसरों का अहित आपसे न हो; इस बात का ख्याल रहे। यह अन्त:बाह्य स्वरूप में एकत्व चाहता है। वरना तो स्थिति यह है कि— बड़ी भूल की चित्रों को व्यक्तित्व समझ बैठे। हम विज्ञापन को भ्रम से वस्तु तत्त्व समझ बैठे।। (श्री निवास शुक्ल) माना समाज को संस्कारित करने के तीन क्षेत्र हैं— १. आचार,

२. विचार,

३. व्यवहार।

इनके मर्यादित होने से आत्मविकास होता है। समाज चलता है। व्यक्ति का बचाव होता है। अत: हमें इन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सद्विचार से सद्कर्म से सौभाग्य बनता है। आज भी जैन समाज इस पर विश्वास रखता है।

जैन संस्कृति'

जैन संस्कृति अध्यात्म की संस्कृति है। इसे आर्हत् संस्कृति एवं व्रात्य संस्कृति भी कहा जाता है। यह संस्कृति हमारे महान् तीर्थंकरों के द्वारा प्रतिपादित है इसलिए इसे जिन संस्कृति भी कहा जाता है। मानव जीवन का लक्ष्य मुक्ति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होता है। धर्म—अर्थ–काम और मोक्ष पुरुषार्थ भी इसी ओर इंगित करते हैं। जैनधर्म के अनुसार मानव दिगम्बर वीतरागी अवस्था को प्राप्त कर केवलज्ञान प्राप्ति के उपरान्त ध्यान की पूर्णता कर मोक्ष को प्राप्त करता है। यह साधना एवं लक्ष्य प्राप्ति श्रमण चर्या से ही संभव होती है। अत: इसे श्रमण संस्कृति भी कहा जाता है। जो मनुष्य अपने मन में श्रमणचर्या के प्रति आदर रखते हुए क्रमश: अणुव्रत रूप में अपनी गृहस्थावस्था में रहते हुए गुणों का विकास करते हैं वे श्रावक कहलाते हैं। अत: श्रावकों की दृष्टि से जैन संस्कृति श्रावक संस्कृति भी कही जाती है। इसके लिए जो संस्कृति निर्धारित की गयी है वह इस प्रकार है— १. जैन अष्टमूलगुणों का पालक होता है अर्थात् मद्य, मांस, मधु और पंच उदुम्बर फलों का त्यागी होता है।

२. सप्त व्यसन का त्यागी होता है।

३. पंच अणुव्रतों का पालक होता है।

४. प्रतिदिन देव दर्शन करने वाला, जलगालन करने वाला तथा रात्रि भोजन का त्यागी होता है।

५. स्वदार संतोषव्रत का पालक होता है।

६. जैनधर्म और धर्मायतनों की रक्षा करता है। जैनधर्म की प्रभावना करता है।

७. न्यायोपात्त धन का विश्वासी और दान, पूजा, शील और उपवास रूप चारों कर्मों का प्रतिदिन कत्र्ता होता है।

८. वह श्रमणों के प्रति आदर रखने वाला, अतिथिसंविभाग व्रत का पालन करते हुए उन्हें आहार देने वाला, उनकी वैयावृत्ति करने वाला होता है।

९. वह सहअस्तित्व में विश्वास रखता हुआ प्राणी मात्र के प्रति मित्रता, गुणीजनों के प्रति प्रमोद भाव, दु:खी जीवों के प्रति करुणा भाव रखने वाला तथा विरोधिजनों के प्रति माध्यस्थ भाव रखने वाला होता है।

इन गुणों के पालन से जो संस्कृति विकसित हुई वह जैन श्रावक संस्कृति है। संस्कृति का संबंध ही संस्कारों से है, भावों के परिष्करण से है। सुसंस्कृत समाज की संरचना से है। जैसे भूख लगना प्रकृति है, छीनकर भोजन करना विकृति है किन्तु मिल बांटकर भोजन करना संस्कृति है। यदि मनुष्य संस्कृति सम्पन्न नहीं है तो उसे पशु तुल्य माना गया है। रॉबर्ट वीरस्टीड के अनुसार—‘संस्कृति वह सम्पूर्ण जटिलता है जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं।......इसके अन्तर्गत हम जीवन जीने, कार्य करने एवं विचार करने के उन सभी तरीकों को सम्मिलित करते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते हैं और समाज के अंग बन चुके हैं।’’ लैण्डिस के अनुसार—‘‘संस्कृति वह संसार है जिसमें एक व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक निवास करता है, चलता फिरता है और अपने अस्तित्व को बनाए रखता है।’’

संस्कृति मनुष्य का सीखा हुआ व्यवहार है जो उसे माता—पिता एवं गुरुजनों से प्राप्त होता है। इसे विभिन्न कथायें, प्रथायें और पम्परायें पुष्ट करती हुई एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को उपहार में देती है। प्रत्येक समाज की एक संस्कृति होती है। जिसे वह जीने की कला कहता है। जैनों की संस्कृति जियो और जीने दो की संस्कृति है। जिसमें स्वपरहित की भावना निहित है।

जैनों की संस्कृति का आधार तीर्थंकरों के द्वारा प्रतिपादित सद्विचार हैं। उनका अनेकान्तवाद का सिद्धान्त विरोधी विचारों में भी समन्वय का मार्ग प्रशस्त करता है। भगवान् ऋषभदेव ने कर्ममूलों संस्कृति का प्रतिपादन किया और असि, मसि, कृषि, शिल्प, विद्या और वाणिज्य इन छ: कर्मों को करने की प्रेरणा दी। जैनों की संस्कृति का आधार आचार में अिंहसा, विचारों में अनेकान्त और समाज में अपरिग्रह है। इसी आधार पर डॉ. हर्मन जैकोबी ने जैनधर्म को पूर्णत: मौलिक तथा स्वतंत्र धर्म एवं संस्कृति माना है। श्री वाचस्पति गैरोला ने लिखा है कि—‘‘श्रमण संस्कृति का प्रवर्तक जैनधर्म प्रागैतिहासिक धर्म है। मोहनजोदड़ों से उपलब्ध ध्यानस्थ योगियों की र्मूितयों की प्राप्ति से जैनधर्म की प्राचीनता निर्विवाद सिद्ध होती है। वैदिक युग में व्रात्यों और श्रमण ज्ञानियों की परम्परा का प्रतिनिधित्व भी जैनधर्म ने ही किया है। धर्म—दर्शन, संस्कृति और कला की दृष्टि से भारतीय इतिहास में जैनों का विशेष योग रहा है।’’

संस्कृति को जीवन मूल्य निर्धारित करते हैं, आगे बढ़ाते हैं। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार—‘‘संस्कृति मनुष्य के भूत, वर्तमान और भावी जीवन का सर्वांग पूर्ण प्रकार है। हमारे जीवन का ढंग हमारी संस्कृति है। संस्कृति हवा में नहीं रहती, उसका र्मूितमान रूप होता है। जीवन के नानाविध रूपों का समुदाय ही संस्कृति है।’’

कौन सा चरित्र संस्कृति से समन्वित है यह समाज तय करती है लेकिन धार्मिक संस्कृति का निर्धारण आगम से होता है। तीर्थंकरों के द्वारा प्रतिपादित संस्कृति जैनसंस्कृति का उत्स हमें आगम में मिलता है। अत: यह संस्कृति अपनी निरन्तरता को लिये हुए है और यही वह आधार है जो इसे औरों से अलग करता है, महान् बनाता है। कर्म में आस्था और धर्म पर विश्वास इसका स्वरूप है। आज भले ही इस जैन संस्कृति के आधार को लेकर प्रश्न उठने लगे हो लेकिन आदर की दृष्टि से इसी को देखा जाता है और लोगों के लिए यह आकर्षण का विषय भी है। आज जैन साधु, जैन गृहस्थ, जैन व्यापार और जैन भोजन आदर का विषय हैं। हमें इसमें आने वाली समस्याओं का निराकरण करते हुए इस संस्कृति का सम्पोषण करना चाहिए। इसी में प्राणीमात्र का हित निहित है।

जैन संस्कृति के प्रतीक तीन कार्य—

मनुष्य के रूप में जन्म लेने वाले व्यक्ति को यदि जैन कुल मिल जाये तो यह इस दृष्टि से महत संयोग है कि यदि वह जैन संस्कारों का पालन करेगा तो वह अपने मनुष्य जीवन को पतन से बचा सकता है और अपने मनुष्य भव को सार्थक करते हुये उत्थान की उस पराकाष्ठा को प्राप्त कर सकता है जिसे अध्यात्म की भाषा में मोक्ष कहते हैं। मनुष्य भव पाना दुर्लभ था सो पूर्व जन्म में किये अल्पआरंभ, अल्पपरिग्रह और स्वभावगत मृदुता के परिणाम स्वरूप प्राप्त हो गया—‘‘अल्पारम्भपरिग्रहत्वम् मानुषस्य’’ (तत्त्वार्थ सूत्र—६/१७), ‘‘स्वभावमार्दवं च’’ (तत्त्वार्थ सूत्र—६/१८)। जैन कुल पाना दुर्लभ था सो वह भीअहिंसक आचरण और उच्च गोत्र की प्राप्ति में सहायक परप्रशंसा, आत्मनिन्दा, सद्गुणों का उद्भावन और असद्गुणों का उच्छादन तथा नम्रवृत्ति और अनुत्सेक (निरभिमानता), (तत्त्वार्थ सूत्र—६/२६) को अपनाने के कारण हो गया। अब यह आवश्यक है कि आप और हम जिस स्थिति में बैठे हैं–जैनत्व के साथ, वहाँ से हम पतित न हो सके। इसलिये जरूरी है कि हम जैनोचित इन तीन कार्यों को दैनंदिन जीवन में आवश्यक रूप से अपनायें— १ जिनेन्द्र देव दर्शन

२, जलगालन

३. रात्रि भोजन त्याग।

जिनेन्द्र देव दर्शन—

संसार के सभी मनुष्य प्रात: उठकर सर्वप्रथम अपने इष्टदेव का स्मरण करते हैं, जिन्हें वे परमपिता परमेश्वर ब्रह्मा या ईश्वर कहते हैं। भारतवर्ष में मनुष्य अध्यात्म को जीवन का एक अनिवार्य कर्म मानता है। धर्म उसकी आत्मा में बसता है और क्रियाओं में दिखता है। वह उतना कानून से नहीं डरता जितना कि धर्म से डरता है। पुण्य में संलग्न मनुष्य पाप—कार्यों से निवृत्ति चाहता है। जैनधर्म में परमात्मा को ‘जिन’ संज्ञा प्राप्त है, क्योंकि इन्द्रियों को जीते बिना जिन संज्ञा प्राप्त नहीं होती। जिनबिम्ब दर्शन प्रत्येक जैनी का प्रमुख कत्र्तव्य माना गया है। समाज में ऐसा व्यक्ति प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार के अनुसार—

आप्तेनोच्छिन्नदोषेण, सर्वज्ञेनागमेशिना।

भवितव्यं नियोगेन, नान्यथा हाप्तता भवेत्।।(५)।।

अर्थात् नियम से वीतराग, सर्वज्ञ और आगम का ईश ही आप्त होता है, निश्चय करके किसी अन्य प्रकार आप्तपना नहीं हो सकता। यह आप्त ही जिनेन्द्रदेव है। जो करोड़ों सूर्यों के भी अधिक तेज से देदीप्यमान होता है वह देव है, जैसे—अरहन्त परमेष्ठी। अथवा, जो धर्मयुक्त व्यवहार का विधाता है वह देव है। अथवा जो लोक—अलोक को जानता है वह देव है जैसे—सिद्ध परमेष्ठी। अथवा, जो अपने आत्म स्वरूप का स्तवन करता है वह देव है जैसे—आचार्य, उपाध्याय, साधु। जैनधर्म में नवदेवता माने गये हैं—

अरहंतसिद्धसाहूतिदयं जिणधम्मवयण पडिमाहू।

जिणणिलया इदिराए णवदेवता िंदतु मे बोहि।।

अर्थात् पंचपरमेष्ठी (अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु), जिनधर्म, जिनवचन, जिनप्रतिमा और जैन मन्दिर ये नव देवता मुझे बोधि प्रदान करें।

एक सच्चे जैन को चाहिए कि इन राग—द्वेष से परे, इन्द्रियजयी, हितोपदेशी, वीतरागी अरहन्त (सर्वज्ञ) भगवान की प्रशान्त मुद्रा युक्त छवि उसके मन—मस्तिष्क में सदैव विद्यमान रहे। यही कारण है कि संसार में सुख की चाह जिन्हें है वे प्रात:काल उठकर जिनदेवदर्शन करते हैं। आचार्य सकलर्कीित ने पाश्र्वनाथ चरित में लिखा है कि—‘‘जिनेन्द्र भगवान के उत्तम बिम्ब आदि का दर्शन करने वाले धर्माभिलाषी भव्य जीवों के परिणाम तत्काल शुभ व श्रेष्ठ हो जाते हैं। जिनेन्द्र भगवान का सादृश्य रखने वाली महाप्रतिमाओं के दर्शन से साक्षात् जिनेन्द्र भगवान् का स्मरण होता है, निरन्तर उनका साक्षात् ध्यान होता है और उसके फलस्वरूप पापों का निरोध होता है। जिनबिम्ब में समता आदि गुण व र्कीित, कान्ति व शान्ति तथा मुक्ति का साधनभूत स्थिर वङ्काासन और नासाग्रदृष्टि देखी जाती है। इसी प्रकार धर्म के प्रवर्तक जिनेन्द्र भगवान में ये सब गुण विद्यमान हैं। तीर्थंकर प्रतिमाओं के लक्षण देखने से उनकी भक्ति करने वाले पुरुषों को तीर्थंकर भगवान का परम निश्चय होता है इसलिये उन जैसे परिणाम होने से, उनका ध्यान व स्मरण आने से तथा उनका निश्चय होने से धर्मात्मा जनों को महान् पुण्य होता है। जिस प्रकार अचेतन मणि, मंत्र, औषधि आदि विष तथा रोगादिक को नष्ट करते हैं, उसी प्रकार अचेतन प्रतिमाएँ भी पूजा—भक्ति करने वाले पुरुषों के विष तथा रोगादिक (जन्म—मरण के रोग), को नष्ट करती हैं। ऐसी महनीय प्रभावशाली जिनभक्ति कही गयी है। लोक मर्यादा है कि—

रिक्तर्पािणर्न पश्येत् राजानं देवतां गुरुम्।

नैमित्तिकविशेषेण फलेन फलमादिशेत्।।

अर्थात् राजा, गुरु और देव के समक्ष खाली हाथ कभी नहीं जाना चाहिये। निमित्त—नैमित्तिक तथा द्रव्य की विशेषता से फल में भी विशेषता आती है। हमारे यहाँ जिनदेव के समक्ष चढ़ाये जाने वाले द्रव्यों में भी संसार मुक्ति की कामना समाहित है। द्रव्य चढ़ाते समय व्यक्ति/पूजक यही भावना भाता है। जल चढ़ाते समय जन्म—जरा—मृत्यु के नाश, चंदन चढ़ाते समय संसार के ताप के नाश, अक्षत (चावल) चढ़ाते समय अक्षय पद (मोक्ष) प्राप्ति, पुष्प चढ़ाते समय काम भावना के नाश, नैवेद्य चढ़ाते समय क्षुधा नाश, दीप चढ़ाते समय अज्ञान नाश, धूप चढ़ाते समय अष्ट कर्मों के नाश और फल चढ़ाते समय मोक्ष फल प्राप्ति की भावना रखते हुए साधक/दर्शन करने वाला/पूजक मोक्षपद प्राप्ति की कामना करता है। जो सही साधक है, पूजक है उसे संसार—स्वर्ग के सुख नहीं, बल्कि मोक्ष सुख की ही प्रबल और एकमात्र चाह रहती है। उसकी सब क्रियाएँ, भावनाएँ आत्मा से आत्मा के लिये होती हैं, शरीर को तो वह मात्र साधक मानता है।

देवदर्शन का फल देवदर्शन की प्रक्रिया से ही प्रारम्भ हो जाता है। आचार्य रविषेण ने पद्मपुराण में लिखा है कि ‘‘जो मनुष्य जिनप्रतिमा के दर्शन का चिन्तवन करता है वह बेला का, जो उद्यम का अभिलाषी होता है वह तेला का, जो जाना प्रारम्भ करता है वह चौला का, जो जाने लगता है वह पाँच उपवास का, जो कुछ दूर पहुँच जाता है वह बारह उपवास का, जो बीच में पहुँच जाता है वह पन्द्रह उपवास का, जो मन्दिर के दर्शन करता है वह मासोपवास का, जो मन्दिर के आँगन में प्रवेश करता है वह छह मासोपवास का, जो द्वार में प्रवेश करता है वह वर्षोपवास का, जो प्रदक्षिणा देता है वह शत वर्षोपवास का, जो जिनेन्द्र देव के मुख का दर्शन करता है वह सहस्र वर्षोपवास का और जो स्वभाव से स्तुति करता है वह अनन्त उपवास का फल प्राप्त करता है। वास्तव में जिनेन्द्रभक्ति से बढ़कर उत्तम पुण्य नहीं है। जिनभक्ति से कर्मक्षय को प्राप्त हो जाते हैं और जिसके कर्म क्षीण हो जाते हैं वह अनुपम सुख से सम्पन्न परम—पद को प्राप्त होता है।’’ जब हम जिनबिम्ब का दर्शन करते हैं तब हमें रागी और वीतरागी, शरीर और आत्मा का भेद ज्ञात होता है। कवि कहता है कि भक्त और भगवान में बस यही तो अन्तर है कि हम संसार में दु:खी हैं और वे शरीर छोड़कर परमात्म पद को प्राप्त हो चुके हैं।

हे राजन् ! यद्यपि जिनप्रतिमा अचेतन है तथापि उसे वेदन शून्य नहीं मानना चाहिए। संसार में निश्चित रूप से परिणाम ही पुण्य पाप का कारण होता है। जिस प्रकार वङ्काभित्ति पर कन्दुक पटकने पर उसके सम्मुख यह फट जाती है, उसी प्राकर दु:ख—सुख कारक निन्दा एवं स्तुति परक वचनों के प्रभाव से यद्यपि प्रतिमा भग्न नहीं होती तथापि उससे शुभाशुभ कर्म तुरन्त लग जाते हैं। धार्मिक कर्मों को स्वर्ग का कारण कहा गया है। यह जानकर शुद्ध भावनापूर्वक जिन भगवान का चिन्तन करो और उनकी प्रतिमा का अर्हिनश ध्यान करो। ‘दर्शन पाठ’ अनुसार—

दर्शनं देव देवस्य, दर्शनं पापनाशनं।

दर्शनं स्वर्गसोपानं, दर्शनं मोक्षसाधनं।।

अर्थात् जिनेन्द्र देव के दर्शन करने से पापों का नाश होता है। जिनेन्द्र देव का दर्शन स्वर्ग के लिए सीढ़ियों के समान है। जिनेन्द्र देव का दर्शन मोक्ष का साधन (उपाय) है।

हे जिनेन्द्र भगवान ! आज आपके चरण कमल के देखने से हमारे दोनों नेत्र सफल हो गये हैं। आज तीन लोक तिलक स्वरूप भगवान के दर्शन करने से हमारा संसार समुद्र अंजुली के समान रह गया है। यह दिन हमारे जीवन में बार—बार आये; ऐसी मंगल कामना करता हूँ। जैन समाज आर्षमार्गी समाज कहलाती है तथा अपने आप को मूलाम्नायी या कुन्दकुन्दान्वयी कहती और मानती है जिसमें जिनेन्द्र देव की पूज्यता को सर्वोपरि रखा गया है। हम जैन मन्दिरों एवं जैन तीर्थों को वीतरागता से सम्पन्न करें और वीतरागी अर्हन्त देव को ही एकमात्र पूज्य मानें।

जलगालन

जल को संसार में जीवन कहा गया है, क्योंकि यह प्राणियों की अनिवार्य आवश्यकता है। चाहे वे मनुष्य हों या पशु—पक्षी। चूँकि जल में हर चीज घुल जाती है, अत: इसमें अशुद्धि की संभावना बनी रहती है। इस अशुद्धि में धूल, मिट्टी, लवण, खनिज एवं अनेक सूक्ष्म जीव मिले होते हैं। जलचर जीवों की बहुलता भी जल को निरन्तर अशुद्ध बनाये रखती है। वायुमंडल में ऑक्सीजन, कार्ब्नाडाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन, नाइट्रोजन डाइ आक्साइड, सल्फर डाइ आक्साइड आदि गैसें पाई जाती हैं जो जल में घुलकर उसे दूषित कर देती हैं। विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के दूषित पदार्थों के नदियों में छोड़े जाने से भी जल प्रदूषित हो जाता है।

‘‘विकास के तमाम दावों के बावजूद विश्व की लगभग १ अरब आबादी को पीने का साफ पानी भी मयस्सर नहीं होता। एक अनुमान के अनुसार लगभग २ हजार लोग प्रतिदिन दुनिया में गंदे जल के सेवन की वजह से अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।’’ जल प्रकृति का अक्षय और सर्वश्रेष्ठ वरदान है। विज्ञान की दृष्टि में जल को णपर्लीशीरिश्र डेश्रींशपीं माना गया है, क्योंकि इसमें अन्य पदार्थों को स्वयं में विलय करने की शक्ति होती है। जल में शीतलता का स्वाभाविक गुण पाया जाता है जिसको स्वच्छ बनाये रखना हम सबका परम कर्तव्य है। पेयजल निरन्तर कम होता जा रहा है। एक ओर उद्योगों के विषैले रासायनिक पदार्थ हैं तो दूसरी ओर शहरों की सीवर लाइन्स सीधे नदियों से जोड़ दी गयी हैं। आज कच्चे तेल आयात—निर्यात का कार्य समुद्री मार्ग से ही बहुतायत में होता है। तेल के जहाजों से करोड़ों टन तेल समुद्री जल में रिस जाता है फलत: एक ओर समुद्री जीव—जन्तुओं को मौत के मुँह में जाना पड़ता है तथा जल में तैलीय तत्व की अधिकता हो जाती है। इस तरह मानवीय जरूरतों की कीमत मानवों को ही नहीं बल्कि अन्य जीव—जन्तुओं को भी देनी पड़ती है। धर्मात्मा पुरुषों को मद्य, मांस, मधु आदि की भाँति राग और जीवहिंसा से बचने के लिए रात्रि भोजन का त्याग करना चाहिए। जो दोष रात्रि भोजन में लगते हैं, वही दोष अगलित पेय पदार्थों में लगते हैं। यह जानकर बिना छने जल, दूध, घी, तेल आदि द्रव्यों के सेवन का त्याग करना चाहिए। इस प्रकार जलगालन का प्रयोजन बाह्य अशुद्धियों से छुटकारा, जल में विद्यमान जीवों की रक्षा तथा स्वयं को स्वस्थ बनाये रखना होता है।

जलगालन के उपाय :

जल की शुद्धि अर्थात् जल को जीवरहित करने के निम्न उपाय है :

१. वस्त्र से जल छानकर जिवाणी यथास्थान विर्सिजत करना।

२. प्लास्टिक की छन्नी, थैली आदि से जल छानना।

३. सौर ऊर्जा द्वारा जल को जीव रहित करना।

इनमें से प्रथम उपाय ही श्रेयस्कर एवं उपादेय है क्योंकि इसमें एक ओर जल शुद्ध होगा, साथ ही जीवों की रक्षा भी होगी। दूसरे एवं तीसरे उपाय में जल भले ही छन जाये किन्तु जीव रक्षा संभव नहीं है बल्कि मृत जीवों का मिला रहना भी संभव है। अत: जल वस्त्र से ही छानें।

शास्त्रों में हाथी जैसे जानवर द्वारा गालित जल पीने के उदाहरण मिलते हैं तो फिर हम तो मनुष्य हैं ? क्यों ना हम भी जलगालन कर जल का सेवन करे ताकि हम भी स्वस्थ रहें और जीवों की भी रक्षा हो। आज जो डिब्बा या शीशी बंद पेय एवं भोज्य पदार्थ मिल रहे हैं वह जलगालन की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। अनेक बार इनमें जीव—जन्तु यहाँ तक कि केचुए तथा साँप आदि भी देखे गये हैं। अत: इनका भूल कर भी सेवन नहीं करना चाहिए। यही आपका हितैषी डॉक्टर कहता है और यही हजारों वर्षों से जैनाचार्य कहते आ रहे हैं। बस हमें इस सिद्धान्त के पालन की आवश्यकता है।

रात्रि भोजन त्याग :

भोजन प्राणी मात्र की आवश्यकता है जिसे वह स्वशक्ति एवं स्वविवेक के अनुसार निजपुरुषार्थ से प्राप्त करता है। जहाँ अन्य प्राणियों में विवेक की कमी है वहीं मनुष्य को प्राणी जगत में सबसे अधिक विवेकी माना गया है अत: उसके भोजन को सात्विक होना अपेक्षित है। ऐसा हमारे धर्मग्रंथ, धर्माचार्य, नीतिनिर्धारक और अनुभवी जन बताते हैं। आज चिकित्साशास्त्रियों का भी यह स्पष्ट मत है कि चूँकि मनुष्य की शारीरिक संरचना विशेष रूप से उसका पेट,आँत, जबड़े, मुँह, दाँत, जीभ, तालु आदि पशुओं से भिन्न अत: उसके लिए ऐसा भोजन उपयुक्त है जो सात्विक भी हो और समयानुकूल भी इसीलिए जहाँ मनुष्य के लिए शाकाहार को श्रेष्ठ आहार बताया गया वहीं दिन में ही भोजन करने के लिए बताया। अत: स्पष्ट है कि रात्रि भोजन मनुष्य के लिए इष्ट नहीं है। आचार्य समन्तभद्र के अनुसार—

अन्नं पानं खाद्यं लेह्यं नाश्नाति यो विभावर्याम्।

स च रात्रिभुक्ति विरत: सत्वेष्वनुकम्पमानमना:।।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार— १४२)

अर्थात् जो जीवों पर दयायुक्त चित्तवाला होता हुआ रात्रि में अन्न, जल, लडडू आदि खाद्य और रबड़ी आदि लेह्य पदार्थों को नहीं खाता है वह रात्रि भुक्ति त्याग नामक प्रतिमाधारी है। अर्थात् जीवों पर दयाकर रात्रि में अन्न, पान, खाद्य और लेह्य इन चारों प्रकार के आहार का त्याग करना रात्रिभोजन विरमण नामक छठा अणुव्रत है। ‘र्काितकेयानुप्रेक्षा (३८३) के अनुसार—

जोणिसि भुत्तिं वज्जदि, सो उववासं करेदि छम्मासं।

संवच्छरस्य मज्झे आरंभं मुयदि रयणीये।।

अर्थात् जो पुरुष रात्रिभोजन को छोड़ता है वह एक वर्ष में छह महीने का उपवास करता है। रात्रिभोजन का त्याग करने के कारण वह भोजन व व्यापार आदि से सम्बन्धित सम्पूर्ण आरंभ भी रात्रि को नहीं करता। अर्थात् आरंभी हिंसा से बच जाता है।

रात्रि में भोजन करने वालों की थालियों में डाँस, मच्छर, पतंगे आदि छोटे—छोटे जीव आ पड़ते हैं। यदि दीपक न जलाया जाय तो स्थूल जीव भी दिखाई नहीं पड़ते और यदि दीपक जला लिया जाय तो उसके प्रकाश से थाली आदि में और अनेक जीव आ जाते हैं। भोजन पकते समय भी उस अन्न की वायु (गंध), चारों ओर फैलती है इसलिए उस वायु के कारण अनेक पात्रों में अनन्त जीव आ—आ कर पड़ते हैं। पापों से डरने वालों को ऊपर लिखित अनेक दोषों से भरे हुए रात्रि भोजन को विष मिले अन्न के समान सदा के लिए अवश्य त्याग कर देना चाहिए। चतुर पुरुषों, को लड्डू, पेड़ा, बर्फी आदि खाने की चीजें या नारियल का दूध, फल आदि कोई भी पदार्थ ग्रहण नहीं करना चाहिए। जो पुरुष रात्रि में स्वाद्य पदार्थों को खाते हैं—अन्न के पदार्थ नहीं खाते वे भी पापी हैं क्योंकि अन्न वा स्वाद्य पदार्थों में कोई भेद नहीं है। चतुर पुरुषों को रात्रि में सुपारी, जावित्री, तांबूल आदि भी नहीं खाने चाहिए क्योंकि इनमें अनेक कीड़ों की संभावना रहती है अत: इनका खाना भी महापापोत्पादक है। धीर वीरों को दया धर्म पालनार्थ प्यास लगने पर भी अनेक सूक्ष्म जीवों से भरे जल को भी रात्रि में कभी नहीं पीना चाहिए। जो विद्वान रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग कर देते हैं उन्हें प्रत्येक मास में पन्द्रह दिन उपवास करने का फल प्राप्त होता है।

लाटी संहिता (४७-४९) के अनुसार—रात्रि भोजन का त्याग करना कुलक्रिया है और उसके बिना दर्शन प्रतिमा या मूलगुण हो ही नहीं सकते। दूसरी बात यह है कि यदि रात्रि भोजन त्याग रूप कुलक्रिया का पालन न किया जायेगा तो फिर सर्वज्ञ देव की आज्ञा का लोप करना समझा जायेगा। वास्तव में सर्वज्ञ देव के अनुसार जो क्रियावान् है—कुलक्रिया का पालन करता है। वही श्रावक माना जाता है, अत: रात्रि भोजन का त्याग अवश्य करना चाहिए।

रात्रि भोजन करने में और भी दोष हैं जो इस प्रकार हैं—

१. रात्रि में दीपक या बिजली के प्रकाश के सहारे पतंगा एवं अन्य कीड़े आ जाते हैं, क्योंकि विद्युत के तीव्र प्रकाश के कारण अनेक जीव उसकी ओर आर्किषत होते हैं, और जो गमनागमन के कारण या दूसरे जीवों से टकराने के कारण जरा सी देर में मरण को प्राप्त कर भोजन में मिल जाते हैं। कभी—कभी तो जीवित जीव—जन्तु भी भोजन में मिल जाते हैं।

२. रात्रि में भोजन करने में योग्य और अयोग्य का विचार नहीं रहता, क्योंकि सूक्ष्म दृष्टि रखने पर भी कुछ जीव दिखाई नहीं देते।

३. रात्रि भोजन संयम का घातक है।

४. रात्रि में बनने वाला भोजन, भोजन बनते समय अनेक जीवों का विघातक होता है तथा दूसरे दिन खाने पर उसके रूप, रस, गंध एवं स्वाद में भी बदलाव आ जाता है। अत: रात्रि भोजन त्यागी को रात्रि में बना भोजन भी इष्ट नहीं है।

५. जैन लोग कुलक्रमागत रीति से रात्रि भोजी नहीं है।

६. रात्रि भोजन करने से बर्तनों में पड़ी जूठन को खाने के लोभ में अनेक जीव उनमें गिर कर मर जाते हैं जिसका पाप रूप दोष रात्रि में भोजन करने वालों को ही लगता है।

७. भोजन शयन के एक प्रहर पूर्व कर लेने से स्वास्थ्य के लिये लाभदायक होता है ऐसा चिकित्सकों का मत है। ऐसा करने पर अजीर्ण नहीं होता। इस दृष्टि से भी रात्रि भोजन करना इष्ट नहीं है।

८. स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक प्रकाश की उपलब्धता के कारण सूर्यास्त से पूर्व भोजन करना परमहितकारी है, क्योंकि रात्रि के प्रथम और द्वितीय प्रहर में जितनी अच्छी तरह भोजन पचता है वैसा रात्रि के तीसरे और चौथे प्रहर में नहीं पचता।

९. सायंकालीन भोजन के पश्चात् भ्रमण करने से भोजन शीघ्र पचता है और वायुजन्य विकार भी उत्पन्न नहीं होते हैं, कब्ज भी नहीं बनता है। यदि रात्रि में भोजन किया गया तो भ्रमण के लिये अवसर ही कहाँ मिलता है ? यदि समय से भोजन नहीं पचता है तो अनिद्रा, अपच, सिरदर्द, कफ, कब्ज, मूर्छा, आदि तकलीफे बढ़ जाती है।

१०. रात्रि भोजन हैजा आदि संक्रमक रोगों का जनक माना गया है। क्योंकि इस भोजन को अन्य जीवों द्वारा जूठा किया जाता है। ११. रात्रि में भोजन बनाने हेतु जलाई जाने वाली अग्नि में अनेक वायुमण्डल में रात्रि के कारण उन्मुक्त विचरण कर रहें जीव—जन्तुओं का जल कर मरना तय हो जाता है। अत: ऐसा करना उचित नहीं है। हमारी परम्परा रही है कि हम लोग रसोई घर में चूल्हे के ऊपर मोटे कपड़े का चँदोवा बांधकर रखते हैं ताकि कोई जीव—जन्तु उसमें गिर कर जल न सके।

१२. यदि हम किसी को जीवन दे नहीं सकते तो किसी का जीवन लेने का हमारा क्या अधिकार है ? क्या कोई बता सकता है कि रात्रि भोजन में जीवहिंसा नहीं होती ? सामूहिक रात्रि भोजों में अनेक बार साँप, मकड़ी, छपकली, चूहा, चींटी आदि के मिल जाने से भोजन विषाक्त होने के कारण अनेक लोगों के बीमार हो जाने, उल्टी—दस्त होने और मर जाने तक के अनेक उदाहरण आये दिन हम पत्र—पत्रिकाओं में पढ़ते रहते हैं। पद्मपुराण में कथन है कि जिस समय लक्ष्मण जी जाने लगे तो उनकी नव विवाहित वधू वनमाला ने कहा कि—‘हे प्राणनाथ, मुझ अकेली को छोड़कर जो आप जाने का विचार करते हो तो मुझ विरहिणी का क्या हाल होगा ?’’ लक्ष्मण जी उत्तर देते हैं कि—

स्ववधूं लक्ष्मण: प्राह मुंच मां वनमालिके।

कार्ये त्वां लातुमेष्यामि देवादिशपथोऽस्तु मे।।
पुनरूचे तयेतीश: कथमप्यप्रतीतया।
ब्रूहि चैन्नैमि लिप्येऽहं रात्रिभुत्तेरघैस्तदा।।

अर्थात् हे वनमाले मुझे जाने दो, अभीष्ट कार्य के हो जाने पर मैं तुम्हें लेने के लिए अवश्य आऊँगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अगर मैं अपने वचनों को पूरा न करूँ तो जो दोषहिंसादि के करने से लगता है उसी दोष का मैं भागी होऊँ।

सुनकर वनमाला लक्ष्मण जी से बोली—मुझे आपके आने में फिर भी संदेह है इसलिए आप यह प्रतिज्ञा करें कि—‘‘यदि मैं न आऊँ तो रात्रि भोजन के पाप का भोगने वाला होऊँ।’’

इस तरह पुराण ग्रंथों में भी रात्रि भोजन त्याग की महत्ता बताई गई है। हमें भी अपने स्वास्थ्य, धर्म और कुलरीति की रक्षा के लिए रात्रि भोजन त्याग अवश्य करना चाहिए।

श्रुत की दशा और दिशा

जैन समाज को धार्मिक एवं सामाजिक बनाने का श्रेय जैन श्रुत को जाता है। जिसका स्वाध्याय करके वे अपने जीवन को मर्यादित एवं पवित्र बनाते हैं। अत: श्रुत का संरक्षण एवं स्वाध्याय अवश्य होना चाहिए। श्रुत संरक्षण की दिशा में अपेक्षित है कि—

क. प्राचीन पाण्डुलपियिों के संरक्षण की उत्तम व्यवस्था हो।

ख. संपूर्ण देश के किसी एक स्थान पर नेशनल लायब्रेरी कोलकाता जैसी कोई एक विशाल लायब्रेरी या संदर्भ ग्रंथालय की स्थापना हो जहाँ जैनधर्म संबंधी प्रत्येक पुस्तक उपलब्ध हो।

ग. शास्त्र प्रकाशन के लिए योग्य संपादकों की नियुक्ति तथा प्रकाशन की व्यवस्था हो।

घ. शास्त्र स्वाध्याय के लिए वचनिका, गोष्ठी एवं अनिवार्य प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना हो।

दिगम्बर जैन साधु : दशा और दिशा :

दिगम्बर जैन समाज की आस्था के केन्द्र तो दिगम्बर जैन आचार्य, उपाध्याय, साधु (मुनि), आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक हैं ही किन्तु दिगम्बर मुनि से जैन समाज की पहचान होती है अत: उनका संरक्षण होना आवश्यक है। एक नीतिकार ने श्री गुरु के लिए नमस्कार करते हुए लिखा कि—

शंकया भक्षितं सर्वं, त्रैलाक्यं सचराचरम्।

सा शंका भक्षिता येन, तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अर्थात् तीनों लोकों के सभी चराचर को शंका ने भक्षित किया है। उस शंका को जिसने भक्षित किया है उन श्री गुरु के लिए नमस्कार हो। जहाँ २०वीं सदी के प्रारंभ में मुनि दुर्लभ थे वहीं २१वीं सदी में वे सर्वजन सुलभ हैं। वर्तमान में लगभग १३०० साधु—साध्वियाँ हैं। इस स्थिति पर हम सरसरी तौर पर गर्व कर सकते हैं किन्तु जब हम क्वान्टिटी के स्थान क्वालिटी पर ध्यान देते हैं और मूलाचार, भगवती आराधना या अनगार धर्मामृत को इस क्वालिटी की कसौटी मानकर देखते हैं तथा हमें उतनी प्रसन्नता नहीं होती जितनी होनी चाहिए। इस दशा को सुधारने के लिए समाज को इस दिशा में बढ़ना होगा—

क. समाज साधु के लिए पीछी, कमण्डलु और शास्त्र के अतिरिक्त कुछ भी ना दे। उनके द्वारा याचना करने पर उन्हें बताये, समझाये कि वे वीतरागी हैं और अयाचक है तथा उन्हें याद दिलाये कि जब उन्होंने दीक्षा ली थी तब उन्होंने क्या—क्या ग्रहण करने का संकल्प लिया था।

ख. साधु के आवास, आहार एवं विहार की अनिवार्य व्यवस्था करें। आज समाज की उदासीनता के कारण ही विहार में अकेले पड़ जाने के कारण जानबूझकर साधुओं /आर्यिकाओं को दुर्घटना का शिकार बनाया जा रहा है। समाज का कत्र्तव्य है कि वह साधु को अपने स्थान से दूसरे गाँव तक स्वयं भेजने जाए।

ग. साधु वैयावृत्ति समाज को अवश्य करनी चाहिए।

घ. वृद्ध साधुओं के आवास, स्वास्थ्य, आहार की व्यवस्था एकाधिक तीर्थक्षेत्रों पर स्थायी रूप से होना चाहिए।

जैन तीर्थ क्षेत्रों की दशा एवं दिशा :

जैन समाज की प्रमुख देन मूर्तियाँ, तीर्थक्षेत्र एवं वास्तुकला के विशिष्ट प्रतिमान हैं। जिनका वह सदैव से संरक्षण करता आया है। आज नवीन तीर्थ बन रहे हैं किन्तु पुराने तीर्थों की उपेक्षा हो रही है।

क. प्राचीन सिद्ध एवं अतिशय क्षेत्रों के जीर्णोद्धार एवं संरक्षण को प्राथमिकता देना चाहिए।

ख. तीर्थक्षेत्रों का विकास या संरक्षण वैयक्तिक मान्यताओं के आधार पर नहांr होना चाहिए। जन्मभूमियों एवं निर्वाणभूमियों की वास्तविकता का ध्यान रखना चाहिए।

ग. विभिन्न तीर्थक्षेत्रों पर जैन समाज को स्थायी रूप से बसाने की योजना बनाना चाहिए तथा वहाँ कॉलेज, चिकित्सालय एवं अन्य औद्योगिक इकाईयाँ स्थापित कर जैनों को सेवा का अवसर देना चाहिए। ताकि वे तीर्थ संरक्षण में प्रत्यक्ष—अप्रत्यक्ष सहभागी बन सके।

जैन समाज की संख्यात्मक दशा एवं दिशा :

भारत सरकार द्वारा पूर्व में करायी गयी जनगणना के अनुसार जैन समाज की कुल जनसंख्या लगभग ४२ लाख आंकी गयी थी। जैन समाज इससे कुछ अधिक भी हो सकती है क्योंकि समाज की सभी उपजातियों के द्वारा अनिवार्य रूप से जैन न लिखे जाने और उपजाति सूचक उपनाम जोड़ने के कारण सही जनगणना नहीं हो पाती। हमारी समाज संख्या की दृष्टि से निरन्तर घट रही है। इसके मूल में परिवार नियोजन की स्थिति और कन्याओं को जन्म न देने की प्रवृत्ति (?) भी कारण हो सकते हैं। अत: हमें अपने जैन समाज की संख्यात्मक स्थिति सुधारने की जरूरत है। इस दिशा में निम्नलिखित उपाय करने चाहिए—

(क) समाज अपनी स्थिति के अनुरूप बच्चों की संख्या तय करें।

(ख) कन्याओं का जन्म ना हो; ऐसी भावना ना रखें।

(ग) दहेज प्रथा पर कानूनी रोक तो है ही किन्तु सामाजिक रोक भी हो। जो दहेज लेता हो उसे सामाजिक पदों से वंचित रखा जाए, उसके द्वारा दिया गया दान, भोज आदि स्वीकार न किया जाए।

(घ) अभावग्रस्त कन्याओं एवं बालकों के समुचित संरक्षण, शिक्षा (छात्रवृत्ति), विवाह आदि की व्यवस्था समाज करे।

उच्च शिक्षा की दशा और दिशा :

आज के युग की नई पीढ़ी की प्रमुख समस्या यह है कि अधिक शिक्षा कैसे मिले ? कहाँ से मिले ? जैन दर्शन कहता है कि आत्मा में अनन्त ज्ञान है। लेकिन ज्ञानावरणी कर्म का जब तक आस्रव है तब तक सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं किन्तु जो निरन्तर श्रुत का अभ्यास करता है उसे उच्च शिक्षा या ज्ञान की प्राप्ति होती है। आज गुरुओं के प्रति सम्मान एवं सेवा का भाव नहीं है। जबकि शिक्षा के लिए यह जरूरी है। हमें अपने आचार्यों, उपाध्यायों (शिक्षकों), का उचित सम्मान एवं सेवा करना चाहिए। ज्ञान के प्रति विनय भी आवश्यक है। ज्ञान प्राप्ति के लिए सतत अभ्यास और सही शिक्षा आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति होना चाहिए आजीविका नहीं। आजीविका के लिए ज्ञान सहकारी होता ही है। जैन समाज शैक्षणिक स्थिति में बेहतर है। यदि अभावग्रस्त विद्र्यािथयों को क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जाय तो और भी बेहतर शैक्षणिक स्थिति बन सकती है।

अर्थ की दशा और दिशा :

वर्तमान युग अर्थ प्रधान है। अत: सभी के मन में एक ही चाह है कि व्यक्तिगत या देश के स्तर पर अर्थ में वृद्धि कैसे हो ? अर्थ पुरुषार्थ से प्राप्त होता है। किन्तु वह न्यायोर्पािजत हो तो ही सुख देता है जिस आर्थिक समृद्धि की हम बात करते हैं वह बढ़ी है। आँकड़े भी यही बताते हैं। किन्तु अर्थ का मतलब ही तो सुख नहीं है। सुख में अर्थ भी कारण है किन्तु यदि अर्थ से सुख न मिले तो वह व्यर्थ है। आज स्थिति यह है कि लोग ‘‘अदत्तादानं स्तेयम्’’ अर्थात् बिना दिये हुए पदार्थ का ग्रहण करना स्तेय (चोरी) है और इससे कोई बचना नहीं चाहता। आज तो स्थिति यह है कि—

भले ही तुमने पढ़ा हो कि

दो दूनी चार होते हैं/ किन्तु
यह तबकी बात है, जब तुम बहुत छोटे थे
अब तो दुनिया सिखाती है कि तुम
दो के आगे दो लिखो
और बाईस करो
ताकि बड़े बनो और सफल दिखो। (स्वरचित—डॉ. सुरेन्द्र जैन)

जैन समाज की पूर्व में औद्योगिक/आर्थिक स्थिति अच्छी थी। आज वह मात्र आत्मसंतोष के लायक है। संसार के सर्वाधिक धनी ५०—१०० व्यक्तियों में हमारा कोई स्थान नहीं। भारत के अरबपतियों में घोषित २० में हमारा स्थान २०वाँ है। हो सकता है आँकड़े इधर—उधर हों किन्तु स्थिति तुलनात्मक दृष्टि से बेहतर नहीं है। भले ही हम कुल आयकर का २४ प्रतिशत जमा करते हों। हमें अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए यह कार्य करना चाहिए—

(क) जैन अहिंसाबैंक की स्थापना करना चाहिए तथा प्रत्येक राज्य में जहाँ जैन रहते हों उसकी शाखायें खोलना चाहिए।

(ख) उक्त बैंक में ही अनिवार्य रूप से जैन मन्दिरों, समितियों, ट्रस्टों का धन जमा करवाना चाहिए।

(ग) शेयर प्रणाली के आधार पर बड़ी औद्योगिक इकाईयाँ स्थापित करना चाहिए।

(घ) हमें नि:संकोच होकर लघु कुटीर उद्योग समाज में चलाना चाहिए।

(ङ) हमें तीर्थंकर आदिनाथ द्वारा प्रतिपादित असि, मसि, कृषि, शिल्प, विद्या और वाणिज्य इन सभी छह कर्मों को अपनाना चाहिए।

संसाधनों की दशा और दिशा :

आज चहुँ ओर अर्थ और भौतिकता की समृद्धि को ही समृद्धि माना जा रहा है मानो यही सब कुछ है। जबकि हमें आर्थिक सम्पन्नता और भौतिक समृद्धि के भाव से उबरकर जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए। बैंजामिन डिजरैली के अनुसार—‘‘हम परिस्थितियों की देन नहीं हैं, हम उनके जनक हैं, हम भी परिस्थितियों की रचना करते हैं।’’ अत: हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम संभलकर चलें और उन परिस्थितियों को उत्पन्न होने से रोके जो समस्यायें उत्पन्न करती हैं, चाहे वे वैचारिक प्रदूषण की हों या पर्यावरणीय प्रदूषण की। हमारी जिम्मेदारी ऐसी न हो कि—

हरेक काम सलीके से बाँट रखा है,

ये लोग आग लगायेंगे, ये हवा देंगे।। (डॉ. अख्तर नज्मी)

आज के दौर की स्थिति यह है कि पूर्व पर्यावरण मंत्री—भारत सरकार श्री जयराम रमेश कहते हैं कि—र्इंधन की बेतहाशा खपत करने वाली लक्झरी श्रेणी की सभी बड़ी कारों को देश की सड़कों से हटा देना चाहिए। उन्होंने देश में इन खर्चीली गाड़ियों के इस्तेमाल को एक तरह का अपराध करार देते हुए एक ऐसी वित्तीय नीति व्यवस्था बनाए रखने की वकालत की है जो ऐसी लक्झरी कारों की खरीद को हतोत्साहित करती हो। आज का मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल, जमीन, वायु, आकाश आदि एवं इनके सहयोग से बनने वाले आवास, बिजली एवं संचार के साधनों पर एकाधिकार चाहता है। जो चाहने तक तो ठीक है किन्तु ऐसा होना संभव नहीं है। यदि हम उनका अस्तित्व ही मिटाना चाहें तो हमें स्वयं मिटना होगा। अत: प्राप्त प्राकृतिक एवं कृत्रिम संसाधनों का अहिंसक एवं परस्परोपग्रह नीति से इस्तेमाल करना सीखें।

वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन की दशा एवं दिशा :

आज व्यक्ति अनेक वैयक्तिक समस्याओं से घिरा हुआ है। इन वैयक्तिक समस्याओं का एक बहुत बड़ा कारण आज पारिवारिक संबंधों में आया बिखराव है। युवा अपने माता—पिता से अलग रहना चाहते हैं। पति—पत्नी में रोज घमासान मचा रहता है। बच्चे स्कूली बोा\डग में पड़े रहते हैं। सबका एक दूसरे के प्रति अविश्वास चरम पर है। सहअस्तित्व की भावना नहीं है। कर्म पर, भाग्य पर विश्वास नहीं है। आदर और स्नेह के भाव तिरोहित हैं। ऐसे में अशान्ति, कुंठा, तनाव तो जन्मेंगे ही। हम अपने लिए ही सर्वोपरि और सब कुछ मान लें तो अशांति तो होगी ही। हमारे लिए धर्म कर्म और अन्योन्याश्रित संबंधों को मान्यता देना भी आवश्यक है। हमें पारिवारिक एवं सामाजिक जन बनकर अपनी वैयक्तिक समस्याओं का हल खोजना चाहिए अकेलेपन का सुख मात्र साधु बनने में है। संसारी तो संसारीजनों में ही सुखी रह सकता। हमें अपनी सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए सामाजिक संसद या सामाजिक पंचायत बनाकर उसके निर्णयों को स्वीकार करना चाहिए।

पारिवारिक सम्बन्धों की दशा एवं दिशा :

जैन समाज की पारिवारिक स्थिति अत्यन्त मजबूत रही है और है भी किन्तु इसको बनाये रखने की जिम्मेदारी भी हमारी है। आज सामाजिक जनों के सामने दो प्रश्न हैं कि १. वह व्यक्तिगत जीवन जीये, या २. परस्पर /समष्टिगत जीवन। हम परस्परोपग्रह युक्त जीवन के पक्षपाती हैं। तत्त्वार्थसूत्र में सूत्र आया है—‘‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’’ अर्थात् जीव परस्पर उपकार करते हैं। आज सामंजस्य सहअस्तित्व और सद्भावना की कमी ने व्यापार, शिक्षा धर्म और संस्कृति के अनेक क्षेत्रों को प्रदूषित किया है। आधुनिक परिवारों का टूटना, बिखरना, पति—पत्नी में संबंध विच्छेद, माता—पिता को अकेला छोड़ना या वृद्धाश्रमों में भेजा जाना, पिता—पुत्र का अलगाव आदि का समाधान मात्र ‘‘परस्परोपग्रह’’ में ही संभव है। आज स्थिति इतनी विषम है कि हर कोई अकेलेपन से ग्रस्त है और भावना भाता है कि—

कोई तो आता, दो बात करता, कोई तो कहता हैलो ।

घर ना बुलाता, पर यह तो कहता, कुछ दूर संग, साथ चलो।।

हिन्दी कवि श्री जयशंकर प्रसाद जी ठीक ही कहते हैं—

औंरो को हँसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ।

अपने सुख को विस्तृत करलो, सबको सुखी बनाओ।।

हम मेरी भावना में पढ़ते है कि—मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे तो क्या यह हमारा कत्र्तव्य नहीं है कि हम अपने परिवार की एकता बनाये रखें इस हेतु हमें बुजुर्गों के सम्मान की भावना बनानी होगी।

आज जैन समाज में विभिन्न उपजातियों में बँटवारा होने के कारण विवाह की समस्या उत्पन्न हो गयी है। उपजातियाँ अपना मोह छोड़ नहीं पाती और अपनी घटती संख्या से भी अंजान बनी हुई हैं। ऐसे में उनके सामने वर —वधू के चुनाव की समस्या है। दूसरी ओर शिक्षा और र्सिवस की अनिवार्यता ने लड़कियों के सामने अन्य जाति के लड़कों से जो उसी के अनुरूप शिक्षित और र्सिवसरत हैं; उनसे विवाह का रास्ता खोल दिया है। समाज की परवाह किसे है ? अत: हमें वृहत् जैन समाज की स्थापना करना चाहिए तथा जैन वैवाहिक संस्था/संस्कार को मजबूत करना चाहिए।

खानपान की दशा एवं दिशा :

जैसे हम चाहते हैं कि हमारा शरीर नीरोगी रहे किन्तु भोजन करते समय यह विचार किया कि जो हम खा रहे हैं उसका शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? याद रहे जिह्वा का चटोरापन इंसान की सेहत का सबसे बड़ा दुश्मन है। कहते हैं हर रोग का रास्ता पेट से होकर जाता है और हम हैं कि पेट का फुलाने में ही सेहत की सुरक्षा मान रहे हैं। जो मिलता है उसे खा लेते हैं। हम ये विचार ही नहीं करते कि इसका शरीर एवं मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? अत: स्वस्थ शरीर के लिए खान—पान का विवेक एवं संयम आवश्यक है।

स्वस्थ तन के लिए स्वस्थ मन होना आवश्यक है। मन चंचल है, अशान्त है लेकिन उसे सद्विचार देकर शान्त किया जा सकता है। मन के लिए सक्रिय बनाये रखनो भी आवश्यक है दिल की तरह। लेकिन जिस तरह दिल के लिए सरलता से रक्त प्रवाह जारी रहना आवश्यक है उसी तरह मन के लिए सद्विचार आवश्यक हैं।

आज लोग उच्च—निम्न रक्तचाप, मधुमेह, अनिद्रा, भूख न लगना आदि बीमारियों के कारण तनावग्रस्त है। इसका भी कारण दिनचर्या की अनियमितता है। पहले दिन जगने के लिए होता था और रात सोने के लिए। अब दिन रात का फर्क ही जैसे मिट गया है। बाह्य आपाधापी ही जैसे जीवन है और इसके मूल में हैं अधिक धन, अधिक भोग और अधिक यश की कामना। इनकी सीमा तय किए बिना सुख नहीं मिल सकता। हमें खानपान की स्थिति में सुधार के लिए निम्नलिखित उपाय करने होंगे—

(क) खानपान कीअहिंसक वस्तुओं का निर्माण एवं वितरण (विक्रय)।

(ख)अहिंसक उत्पादों का प्रचार एवं प्रसार।

(ग)अहिंसक खेती

जीव दया दशा एवं दिशा :

आज स्थिति यह है कि मांसाहार ने करुणा को, लोभ ने ईमान को, व्यभिचार ने सम्बन्ध को, खुलेपन ने लज्जा को, स्वार्थ ने साधुता को और व्यापार ने शुचिता या शुभता को खा लिया है। इससे बचाव बहुत जरूरी है। इस पर भी तुर्रा यह है कि हम अकेले क्या कर सकते हैं ? कुलेन हाईटावर ने कहा है कि ‘‘हम हवा को निर्देशित नहीं कर सकते किन्तु नाव की पाल को तो समायोजित कर सकते हैं।’’ हम मनुष्य हैं अहिंसक और जैन हैं तो हमारा आचरण भी वैसा ही होना चाहिए। यदि विपरीत स्थिति हुई तो हमें कहेंगे—

औरों में और मुझमें, कुछ तो फर्क होना चाहिए।

अफसोस तो ये है कि मैं भी औरों जैसा निकला।।

आज यदि दूध एवं घी तथा गोबर की खाद आदि समस्याओं का समाधान अपेक्षित हैं तो तभी संभव है जबकि बूचड़खाने बंद हो। इस देश से बूचड़खाने कभी बंद नहीं हो सकते, मांस का व्यापार भी बंद नहीं हो सकता। इस कारण दुग्ध के अभाव की समस्या भी बनी रहेगी। ऐसे में जैन समाज का यह कत्र्तव्य बनता है कि वह पशुपालन को अपने जीवन का अंग बनाये और ऐसी पारर्मािथक गौशालायें स्थापित करे जिनमें दूध नहीं दे रही गायें अथवा अन्य जानवर रखे जा सके।

दान : दशा एवं दिशा :

नीतिकार एवं विज्ञजन कहते हैं कि ‘‘अर्थमनर्थं भावय नित्यं’’ अर्थात् अर्थ की अनर्थता का विचार नित्य करना चाहिए। आज जिनके पास अथाह सम्पत्ति है वे उससे व्यथित हैं। यही कारण है कि वे अब अर्थ के पारर्मािथक उपयोग की बात कर रहे हैं।

आचार्य श्री उमास्वामी ने सातावेदनीय के आस्रव के कारणों में दान को माना है। अपनी वस्तु का पर के अनुग्रह के लिए त्याग करना दान है। आज स्थिति दान के लिए अनुकूल बनती जा रही है क्योंकि लोगों के पास आय के साधन बढ़े हैं, आय बढ़ी है और यह आय भी इतनी कि दोनों हाथों से लुटाकर खर्च करने पर भी कम नहीं हो रही है। दूसरी और इसके दुष्परिणाम यह आ रहे हैं कि यह बढ़ा हुआ धन व्यसन, भोग—विलास औरहिंसा का साधन बन रहा है जिससे आये दिन परिवार, समाज एवं राष्ट्र में खतरे बढ़ रहे हैं। वैयक्तिक सुख ही सब कुछ हो गया है। सामाजिक मान—मर्यादा के लिए स्थान ही नहीं है। एक धनपति ने तो इतना तक कहा है कि यदि आप अपने बच्चों को िंहसक, आलसी और निकम्मा नहीं बनाना चाहते हैं, उनके चरित्र की रक्षा करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी पूरी संपदा मत सौंपिए बल्कि अपनी सम्पत्ति का बहुभाग परमार्थ में लगायें। अपने बच्चों को खुद खाने—कमाने के अवसर दीजिए।

हमारे देश में दान की परम्परा और संस्कार दोनों है। जैनों के लिए तो यह एक आवश्यक कत्र्तव्य है। सबको ज्ञात है कि जब महाराणाप्रताप संकट में थे और घास की रोटी खा रहे थे तब भामाशाह (जैन) ने उन्हें प्रभूत मात्रा में धनदान देकर देश रक्षा के लिए कार्य किया था। पूर्व में और भी हमारे समाज के दानवीरों ने धनदान द्वारा धर्म, शिक्षा, चिकित्सा के अनेक संस्थान स्थापित किए और धर्मशालाएँ, कुएँ, तालाब, बावड़ियाँ, सड़के आदि बनवायीं ताकि आमजन सुखी रह सके।

अभी हाल ही में फेस बुक के संस्थापक २६ वर्षीय मार्क जुकर बर्ग ने अपने एक बयान में लिखा है कि—‘‘दान और समाज सेवा की शुरूआत लोग अपने करियर में काफी देर से करते हैं लेकिन, अगर आपके पास देने के लिए कुछ है और इतना कुछ करने की चुनौती सामने हैं तो अभी से शुरुआत करने में क्या हर्ज है ?’’ लोगों को खुलकर सबके सामने दान करना चाहिए क्योंकि लोगों को जब ये पता चलता है कि और लोग भी दान दे रहे हैं तो वे भी दान करने के लिए प्रेरित होते हैं। धन के विषय में कहा है कि—

दानं भोगो नाशस्तिस्तो गतयोर्भवन्ति वित्तस्य।

यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्यतृतीयागतिर्भवति।।

अर्थात् धन की तीन गतियाँ होती हैं–दान, भोग और नाश। जो धन न देता है, न भोगता है उसकी तीसरी गति अर्थात् नाश होता है। अत: धन आया है तो उससे अपने प्रयोजन सिद्ध करो और उसका पुण्यमय नियोजन करो। पुण्यमय नियोजन का तात्पर्य दान से है। बिना दान के धन की सद्गति नहीं होती, धनवान की भी नहीं। आज इस मर्म को जैन समाज के बड़े—बड़े उद्योगपतियों को समझना चाहिए और ‘चैरिटी’ (पारर्मािथक कार्योें) के लिए दान देना चाहिए। यह एक शुभ सामाजिक लक्षण होगा।

आज दान के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा हो रही है। बोली के नाम पर धार्मिक क्षेत्र में छल हो रहा है जिससे दानदाता/दान आदि के अपेक्षित परिणाम नहीं निकल रहे हैं। अत: हमें आचार्य श्री उमास्वामी की भावनानुसार—‘‘विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेष:’’ को ध्यान में रखना चाहिए। यहाँ याद रखा कि दे वहाँ जहाँ जरूरत हो। हमारे यहाँ देना भी सिखाया और लेना भी। गृहस्थ हो तो देना सीखो। देना स्वेच्छा है। साधु हो तो लेना सीखो। लेना बंधनकारी है। आत्मसम्मान पूर्वक लो। छीना झपटी चोरी है। हमें बोलियों का विकल्प ढूँढना होगा ताकि धन का साम्राज्य स्थापित न हो सके।

राजनैतिक दशा एवं दिशा :

पूर्व में जहाँ जैन समाज म. प्र., गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों में राजनैतिक भूमिका में प्रभावी था तथा अनेक विधायक एवं सांसद जैन हुआ करते थे वहीं आज जैन बाहुल्य वाले विधानसभा क्षेत्रों में उन्हें राजनैतिक उम्मीदवारी नहीं मिल रही है, चुने जाने के बाद भी उन्हें उनकी योग्यतानुसार मंत्री पद नहीं दिये जा रहे हैं इसका प्रमुख कारण हमारी राजनैतिक उपेक्षा नहीं अपितु हमें राजनीति से क्या लेना देना, यह प्रवृत्ति है। अत: इस प्रवृत्ति से मुक्त होकर हमें राजनीति की मुख्यधारा से जुड़ना चाहिए और प्रत्यक्ष राजनीति—चुनाव में भाग लेना चाहिए।

जैन धार्मिक संस्थाओं, संगठनों एवं नेतृत्व की दशा एवं दिशा :

जैन समाज की विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएँ हैं जिनमें भारत वर्षीय दिगम्बर जैन महासभा, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासमिति, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन परिषद्, दक्षिण भारत जैन सभा, भारतीय जैन मिलन, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी, श्री अखिल भारतवर्षाीय दिगम्बर जैन विद्वत्वपरिषद् श्री अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद् तथा अनेक जातीय, उपजातीय संगठन हैं। सबके अपने—अपने नेता हैं, पदाधिकारी हैं किन्तु कोई एक प्रभावी नेतृत्व न होने या संयुक्त प्रभावी नेतृत्व न होने के कारण हमारी आवाज औरों तक तो क्या अपनों तक भी नहीं पहुँच पाती है। इसी का दुष्परिणाम है कि गिरनार संकट में हैं, ऋषभदेव केसरिया जी संकट में है और हमारी सामाजिक एवं धार्मिक अस्मिता संकट में हैं। यहाँ तक कि पिछले दिनों जैन साधुओं के लिए अनिवार्य पीछी तक पर रोक की स्थिति बन गयी थी। ऐसे में जरूरी है कि प्रभावी नेतृत्व बने और जैन समाज हित में कार्य करे। बार—बार नेतृत्व का बदलना भी उचित नहीं और निकम्मा सुदीर्घ नेतृत्व भी उचित नहीं है। यहाँ ध्यान रखें कि— हम इस पर लड़ रहे हैं कि सरदार कौन होगा। पहले यह तो सोचो कि कबीला बचे कैसे ? हमें ऐसा नेतृत्व चाहिए— A Leader is one who knows the way, goes the way and shows the way. अर्थात् एक नेता—जो खुद रास्ता जानता हो, स्वयं उस रास्ते पर चलता हो, तथा समाज को रास्ता बताता भी हो। वह जब भी कुछ करे तो अपने आप से पूछे कि इसमें मेरे लिये क्या है और उसके लिए क्या है ? जो स्वपरहितैषी होता है वही सच्चा नेता होता है। और जो स्वयं रास्ता खोज सके या बना सके—

कमी नहीं हैं मंजिलों की, राहों की भरमार है।

मंजिल वो ही पाता है, जो चलने को तैयार है।।

धार्मिक अपव्यय दशा और दिशा :

जैन समाज के अब प्राय: सभी आयोजन इतने महंगे होते जा रहे हैं कि वे अपव्यय की श्रेणी में आ गये हैं। पंचकल्याणक प्रतिष्ठायें, महंगे पोस्टर, टी. वी. पर कार्यक्रमों का प्रसारण, अवतरण (जन्म) महोत्सव, विधान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, धार्मिक स्थलों का पर्यटकीय उपयोग आदि ऐसे अनेक कार्य हैं जिनमें समाज के धन का अत्यन्त दुरुपयोग हो रहा है। यदि एक वर्ष के लिए मात्र मर्यादित कार्यक्रम हो जायें तो समाज के एक लाख बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। यदि एक वर्ष के लिए पंचकल्याणक प्रतिष्ठायें रोक दी जायें तो ५० तीर्थों का जीर्णोद्धार हो सकता है। यदि एक वर्ष के लिए मंहगे ग्लेज्ड पोस्टरों पर प्रतिबंध लगा दिया जाये तो सम्पूर्ण जैन समाज के बच्चों को माध्यमिक शिक्षा तक कापी किताबें उपलब्ध करवायी जा सकती हैं। क्या कोई इस पर विचार करेगा?

जैन समाज की अन्य समस्या और समाधान : दशा एवं दिशा :

मनुष्य के जीवन में सात कारणों से समस्याएँ आती हैं— १. तन के कारण

२. मन के कारण

३. धन के कारण

४. परिवार के कारण

५. यश के कारण

६. लोभ के कारण (पद, प्रतिष्ठा, जमीन आदि)

७. सुरक्षा को लेकर चिन्ता के कारण

जैन समाज को चाहिए कि इन समस्याओं के समाधान के लिए वह इन उपायों को अपनाये :

१. तन संबंधी समस्या के समाधान के लिए वह भोग पर अंकुश लगाये, योग साधना करे, जीवन में ब्रह्मचर्य को स्थान दे और निज द्रव्य से स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना करें।

२. मन संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए वह समाज में मित्रवत रहे और संवाद कायम करे।

३. धन संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए वह संतोष वृत्ति को अपनाये और न्यायोपार्जन पर बल दे। यदि वह नौकरी करता है तो नियोक्ता के साथ ईमानदारी से कार्य करे और यदि व्यापारी हो तो सुनिश्चित लाभ के साथ एक भाव का व्यापार करे। इस संदर्भ में पंडित बंशीधर जी व्याकरणाचार्य जी हमारे अनुकरणीय हो सकते हैं जिन्होंने बीना (म. प्र.) में एक ही भाव से प्रसिद्ध दुकानदारी की।

४. परिवार संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए जरूरी है कि वह संयुक्त परिवार को अपनाये किन्तु एकल परिवार के रूप में ही रहना पड़े तो परिवार के अन्य सदस्यों के मध्य प्रगाढ़ पारस्परिक सहयोग की उदात्त भावना रखे।

५. यश संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए जरूरी है कि हम कार्य करते समय सम्मान की इच्छा ना रखें और यदि सम्मान मिले तो उसे सिर झुकाकर विनम्र भाव से स्वीकार करें।

६. लोभ (पद, प्रतिष्ठा, जमीन आदि) संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए जरूरी है कि जब पद के योग्य निर्वाह की क्षमता हो तो ही पद ग्रहण करें। प्रतिष्ठा के लिए कार्य नहीं अपितु प्रतिष्ठापूर्ण कार्य के लिए अपना जीवन व्यतीत करें। जमीन को आवश्यकता से अधिक न रखें।

७. सुरक्षा संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए जरूरी है हम धर्म और सतकर्म पर विश्वास रखें। समाज के लिए कार्य करते हुए समाज में ही रहें और निरन्तर स्वपरहित का चिन्तन करें। जो दूसरों की चिन्ता करता है उसकी सुरक्षा स्वयमेव हो जाती है। हमारे यहाँ तो धर्मोरक्षति रक्षित: कहा गया है।

और भी जो समस्यायें आती हैं उनका समाधान भी सही चिन्तन और सही दिशा में कार्य करने से संभव होगा। किसी कवि ने ठीक ही कहा है—

देख यूँ वक्त की दहलीज से टकराके न गिर।

रास्ते बंद नहीं, सोचने वालों के लिए।।

आज समाज को आवश्यकता है कि— १. वह अपने मानस को मतांधता से मुक्त करे।

२. शास्त्र कसौटी पर अपनी विवेक बुद्धि को कसे।

३. आत्मपरीक्षण करना सीखे।

४. अर्थ का अनर्थ न करे।

५. फिजूलखर्ची से बचे।

६. संस्कार एवं शिक्षा को प्राथमिकता दे।

७. अपने जैनत्व को बचाये रखे और शान से कहे—

जैनम् जयतु शासनम्।

कर्मयोगी डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन—महामंत्री—श्री अ. भा. दि. जैन. विद्वत्वपरिषद