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जैन साहित्य एवं दर्शन में भारतीय संविधान के मूल तत्व

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जैन साहित्य एवं दर्शन में भारतीय संविधान के मूल तत्व

डा. प्रेमचन्द जैन

गंज बासौदा सम्प्रति बेंगलोर (कर्नाटक)

संविधान क्या है :- प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ ब्राइस के अनुसार ' संविधान ऐसे सुरथापित नियमों का समूह है जो सरकार के संचालन से संबंधित हों और उसे निर्देश देते हैं ।"[१] गिलकाइस्ट ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा है - 'संविधान के नियमों द्वारा सरकार का गठन. सरकार की शक्तियों का विभिन्न अंगों में वितरण और इन शक्तियों के प्रयोग के सामान्य सिद्धान्त निश्चित किये जाते हैं ।"[२] संक्षेप में संविधान से तात्पर्य है राज्य में व्यक्ति विशेष का शासन न होकर 'विधि का शासन' होना चाहिए ताकि प्रजा-जन स्वतंत्रता पूर्वक सुख शांति से जी सकें । संविधान के नियमों में शासन-राज्य और व्यक्ति के मध्य पारस्परिक संबंधो. व्यक्तियों के मध्य पारस्परिक संबंधों, एवं शासन के विभिन्न अंगों में पारस्परिक संबंधों का उल्लेख रहता है । बूल्ले ने इसे स्पष्ट करते हुआ लिखा है - संविधान में शासन की शक्तियों, शासितों के अधिकार और दोनों के बीच मै संबंधों का 'समायोजन किया जाता है ।"[३]

सभी राज्यों के अपने-अपने राज्य और शासन के संचालन के नियम होते हैं, इस दृष्टि से संविधान का संबंध एक राजनीतिक समाज से होता है । सी.एफ स्ट्रांग ने लिखा भी है, 'राजनीतिक रूप से संगठित समाज ही राज्य है ।"[४] यदि समग्र दृष्टि से चिन्तन किया जाय तो राज्य के संचालन के नियम (संविधान) नैतिकता से परे नहीं हो सकते, भले ही नियमों को संविधानिक कानूनों का जामा पहना दिया जाए । इस संबंध में महान जर्मनी विचारक हीगेल का मत दृष्टव्य है । हीगेल ने राज्य को एक नैतिक दृष्टिकोण की उपलब्धि का माध्यम माना है ।"[५] वस्तुत: आधुनिक राज्य -के -यूर्व धर्म और नैतिकता के नियम ही लोगों को सामाजिकता की डोर में बांधे रहते थे । दूसरे शब्दों में, धर्म, अध्यात्म और नैतिकता ने राज्य की उत्पत्ति एवं विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है प्रसिद्ध राजनितिक शास्त्री गेटेल ने लिखा है, "मानव इतिहास में दीर्घकाल तक राज्य को ईश्वरक्रृत या दैवी समझा जाता था और सरकार का स्वरूप धार्मिक था"[६]

भारतीय संविधान

संविधान सभा द्वारा निर्मित भारत का संविधान भारत के लोगों ने अंगीकृत, अधिनियमित एवं आत्मार्पित किया है।[७] भारत मुख्य रूप से धर्म एवं अध्यात्म-प्रधान देश रहा है जिसमें सभी मतावलवियों को स्वतंत्रता पूर्वक अपने धर्म और धार्मिक विश्वास के पालन को मान्य किया गया हैं । राज्य और शासन के नियम कभी भी धर्मविरोधी नहीं रहे हैं । वस्तुत: कानून बुद्धि का ? कियात्मक या प्रयोगात्मक रूप है (Law is applied common sense) और सदबुद्धि नैतिकता की ही अभिव्यक्ति है । अत: भारतीय संविधान के मूल में लगभग सभी नैतिक आचरण के नियम आत्मसात कर लिये गये हैं. कुछ ' नियम तात्कालिक सामाजिक. राजनीतिक आदि परिस्थितियों के अनुरूप हो सकते हैं पर वे भी नैतिकता/धार्मिक विश्वास के प्रतिकूल नहीं हैं । संविधान निर्माताओं ने बडी कुशलता से विपरीत विचारप्याराओं विश्वास, आस्थाओं प्रचलित परस्पर विपरीत शासन प्रणालियों में सामजस्य स्थापित किया है । प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ० अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था - "हमारे संविधान में यदि कोई नवीन बात हो सकती है, तो यही कि उसमें पुराने प्रचलित संविधानों की गल्लियों को दूर कर दिया जाय और देश की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला जाय । उधार लेने में किसी तरह की साहित्यिक चोरी नहीं है । शासन और विधान के बुनियादी सिद्धातों के बारे में किसी का कोई अधिकार नहीं होता है[८]

भारत के संविधान की प्रस्तावना

यद्यपि भारतका संविधान एक भारी-भरकम संविधान है जिसमे अभी 442 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियाँ हैं और एक-एक अनुच्छेद में अनेक उपधाराएँ हैं । किन्तु उसका प्राण है-उसकी प्रस्तावना । प्रस्तावना में संविधान के सभी अनुच्छेदों का सार है, निचोड़ है । वस्तुत:, प्रस्तावना के उद्देश्यों की प्राप्ती के उपाय एवं प्रावधान ही भारतीय संविधान है । सुसेक्स फीरेज ने सुंदर शब्दों में प्रस्तावना का वर्णन किया है - "It (preamble) is a key to open the minds of the makers of the act and the mischiefs they intended to redress"

"यह (संविधान की प्रस्तावना) संविधान निर्माताओं के मस्तिष्क को और उन शरारतों को जिन्हें वे दूर करना चाहते थे, को खोलने वाली चाबी है।"

१ सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्यन्यायाधीश महाजन के शब्दों में "it is the declaration that makes our constitution sublime"

"यह (प्रस्तावना) वह घोषणा है जिसमें हमारा संविधान लोकोत्तर बन गया है" पं ठाकुर प्रसाद भार्गव ने प्रस्तावना की प्रशंसा में कहा है, The preamble is the most precious part of the constitution; it is the soul of the constitution' it is a key to the constitution' it is super prose and poem ..... "संविधान की प्रस्तावना इसका अत्यन्त मूल्यवान भाग है, यह सविधान की आत्मा है. यह संविधान की चाबी है, यह संविधान में जड़ा नगीना है. यह उच्चस्तरीय गद्य और पद्य है ।"

अत: हमारे विषय के स्पष्टीकरण के लिए भारत के संविधान की प्रस्तावना को उद्धृत करना आवश्यक है, जो इस प्रकार है :-

"हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये तथा उसके समस्त नागरिकों को -

सामप्तजेक आर्थिक और राजनीतिक न्याय

विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, की स्वतंत्रता

प्रतिष्ठा और अवसर की समानता

प्राप्त कराने के लिये तथा उन सबमें

र्व्याक्ते की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित

करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिये

दृढ़ संकल्पित होकर इस संविधान सभा में आज तारीख 26.11.1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत दो हजार छ: विकमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं ।"[९]

प्रस्तावना में उल्लिखित सविधानके मूल क्ल या प्रमुख उद्देश्य निम्नानुसार है :-

1. भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राज्य है ।

2. यहासमाजवादी व्यवस्था मान्य है ।

3. भारत एक्? लोकतंत्रात्मक गणराज्य है अर्थात् किसी विशेष दल, व्यक्ति या राजा का राज्य नहीं है ।

4. भारत एक पंथ या धर्म निरपेक्ष राज्य है ।

5. यहाँ प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय उपलब्ध. है ।

6. यहाँ विचार अभिव्यक्ति. विश्वास धर्म और उपासना की स्वंतत्रता है ।

7. यहाँ प्रत्येक नागरिक को प्रतिष्ठा व अवसर की समानता उपलब्ध है ।

8. संविधान का उद्देश्य ऐसी बंधुता प्रोत्साहित करना है जिससे व्यक्ति की गरिमा व राष्ट्र की एकता व अखडता सुनिश्चित रहती हो ।

जैन दर्शन/ साहित्य में संविधान के मूल तत्व/ उद्देश्य

जैन दर्शन साहित्य में संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित सभी उद्देश्य एवं तत्व विद्यमान हैं, यद्यपि प्रसंग भिन्न हैं । जैनदर्शन मूलत: वैराग्यपरक है अत: उक्त उद्देश्यों का कथन पारलौकिकपरक है, आत्मा के उत्थान के लिये है, सांसरिक परिभ्रमण को कम .करने या उसे समूल नष्ट करने का हेतु है, जबकि संविधानिक उद्देश्यों का कथन राजनीतिक. सामाजिक. आर्थिक आदि व्यवस्था बनाए रखने के लिये है. फिर भी जैन दर्शन एवं उसके इतिहास में प्रसंगवश राज्यव्यवस्था, राज्य में जनता की स्थिति एवं अधिकार, राज्य की संप्रभुता सुनिश्चित करने आदि के वर्णन प्रचुर मात्रा में मिलते हैं । मुख्यत: जैनदर्शन धर्म के मूलसिद्धान्त निम्न है : 1. अहिंसा

2. अपरिग्रह

3. जीव की स्वतंत्रता

4. स्याद्वाद या अनेकान्त दर्शन अर्थात् विचारसाम्यता

5. संयम की साधना

6. आचरण की पवित्रता

7. समता की उपासना

8. पारलौकिक दृष्टि आदि ।

जैनधर्म के उक्त मूल सिद्धान्तों की विवेचना एवं उसके इतिहास में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित सभी ज्य विद्यमान है ।

इनका क्रमवार विवेचन निम्नानुसार है :

१. भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्वासम्पन्न राज्य है

निःसंदेह भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्चसम्पन्न राज्य है जो किसी अन्य बड़ी शक्तिका वशवर्ती नहीं हैं जैसा कि स्वतंत्रता के पूर्व था । भारत को अपनी शासन पद्धति एवं शासन का स्वरूप स्वय निर्धारित करने का एकछत्र अधिकार है । प्रभुत्व-सम्पन्नता का अर्थ है अपने बारे में. स्वयं निर्णय करने का अधिकार और किसी बाहरी शक्ति का इसमें अनहस्तक्षेप ।

जैन इतिहास में राज्य सम्प्रभुता : इतिहास सिद्ध विशेषता

जैन दर्शन, साहित्य एवं इतिहास में अपने राज्य की सम्प्रभुता-रक्षण का बहुत सटीक उदाहरण मिलता है । प्रथम तीर्थकर भगवान आदिनाथ के समय का यह प्रसंग है जो आज से करोडों-करोड़ वर्ष पूर्व हुए हैं । भगवान आदिनाथ के ज्येष्ठ पुत्र चकवर्ती भरत और उनकी दूसरी रानी सुनंदा से उत्पन्न भगवान बाहूबली थे । भरत चकवर्ती ने षट्खंड पृथ्वी को जीत कर वहाँ के शासकों को अपना वशवर्ती बना लिया. आज्ञाकारी बना लिया । अपनी दिग्विजय यात्रा से राजधानी अयोध्या आने पर उनके चकरत्न ने नगरी में प्रवेश नहीं किया, रूक गया । ज्ञात हुआ अभी भी कुछ राज्यों को जीतना शेष है तभी चकरत्न अयोध्या में प्रविष्ट नहीं हो पा रहा है । मंत्रियों ने भरत महाराज से कहा कि आपके सहोदर 99 भाई एवं आपकी दूसरी मात्ताजी से उत्पन्न बाहुबली ने अभी तक. आपका वशवर्ती होकर आपको प्रणाम नहीं किया है । तुरंत दूतों के माध्यम से सभी भाईयों को संदेश भिजवाया गया कि वे सब अभी भरत महाराज के चरणों में प्रणाम निवेदित करें । पूज्य जिनसेनाचार्यजी ने महापुराण में भरत महाराज के सैदेश का वर्णन इस प्रकार किया है :

अकरा भोस्तुमिच्छन्ति गुरूदलामिमान्तके

तत्किं भटावलेपेन भुक्ति ते श्रावयन्तु मे ।। 63 ।।
प्रतिस्थ्यानिपातेन भुक्ति ते साधयन्तु वा
शितास्त्रकण्टोत्सङ्गपतिताङ्गा रणाक्द्दात ' ।। 64 ।।[१०] -

अर्थात् वे लोग पूज्य पिताजी द्वारा दी गई पृथ्वी को बिना कर दिये हो भोगना चाहते है, परंतु केवल योद्धापने के अहंकारसे क्या होता है? अब या तो वे लोगों को सुनाए कि भरत ही इस पृथ्वी का उपभोग करने वाला है हम सब उसके अधीन है या युद्ध में तीक्षा शस्त्र रूपी कांटों के उपर जिसका शरीर पडा हुआ है, ऐसे वह भाई प्रतिशैथ्या-दूसरी शैथ्या अर्थात् रणशैथ्या पर पड़कर उसका उपभोग प्राप्त करें । (अर्थात उन्हें इस पृथ्वी का उपभोग प्राप्त नहीं हो सकता ।)

भरत चक्रवर्ती के सभी भाईयों के बीच उनके पूज्य पिता महाराज आदिनाथ ने ही दीक्षा लेने के पूर्व राज्यों का बटवारा किया था और वे सभी बल और पराकम में लगभग समान थे । जब भरत चकवर्ती का उक्त धमकी भरा -संदेश उन्होंने सुना तो उनके 99 सहोदरों ने तो विरक्त होकर सन्यास धारण कर लिया किन्तु स्वाभिमानी बाहूबली ने सम्राट भरत की अधीनता स्वीकार नहीं की. भले ही वे उन्हें बड़े भाई के रूप में प्रणाम करने तैयार थे सम्राट भरत को नहीं । अपने राज्य कीर संप्रभुता की रक्षा हेतु वे भरत चक्रवर्ती की विशाल अक्षोहणी सेना जिसमें असंख्यात रथ. हाथी, घोडे और पैदल सेना थी' का सामना करने तैयार हो गये । पू आचार्य जिनसेनजी ने बाहूबली के प्रति-संदेश का बहुत सुंदर चित्रण किया है, जो राज्य की संप्रभुता का अनुपम उदाहरण है :

'चयसाधिक इत्येव न श्लाध्यो भरताघिप: ।'

जरन्नपि गज: कक्षा गाहते किं हरे: शिशो:" ।।105।।[११]

अर्थात् भरतेश्वर उम्र में बड़े है इतने से ही वे प्रशंसनीय नहीं कहे जा सकते, क्योंकि हाथी बूढ़ा होने पर भी क्या सिंह के बच्चे की बराबरी कर सकता है?

ज्येष्ठ: प्रणम्य इत्येतत्काममक्लन्यदा सदा ।

मूधर्न्यारोपित् खड्गस्य प्रणाम इति क कुम:।।107।।[१२]

अर्थात् बड़ा भाई नमस्कार करने के योग्य है, यह बात अन्य समय में अच्छी तरह हमेशा हो सकती है, पर जिसने मस्तक पर तलवार रख छोड़ी है, उसको प्रणाम करना, यह कौन सी रीति है?

राज्य की संप्रभुता की रक्षा हेतु दृढ़ संकल्पित बाहूबली पुन: कहते है :

पराइग़ेपहतां लक्ष्मीं यो वोञछेत् पार्थिवोदुपि सन् ।

सोदुपार्थयति तामुक्तिं सर्पोक्तिमिव डुण्डुखभ- ।। 113 ।।[१३]

अर्थात जिस प्रकार पनया सांप सर्प' इस शब्द को व्यर्थ ही धारण करता है, उसी प्रकार जो मनुष्य राजा हौकर दूसरे की आज्ञा से अपहत हुई लक्ष्मी को धारण करता है, वह राजा' इस शब्द को व्यर्थ ही धारण करता है ।

आगे और भरत के दूत से कहते है :

परावमानसलिनां भूति धत्ने नृपोदुपि यः ।

नृपशोस्तरच नन्वेष भारो राज्यपरिच्छद ।। 114 ।।[१४]

अथोत् जो राजा होकर भी दूसरे के अपमान से मलिन हुई विभूति को धारण करता है निश्चय से उस मनुष्य रूपी पशु के लिए यह राज्य की समस्त सामग्री भार के समान है । चकवर्ती की अधीनता अस्वीकार करते हुए वह कहते है :

वरं वनाधिवासोऽपि वरं प्राणविसर्जनम ।

कुलाभिमानिन पुंसो न पराज्ञाविधेयता ।। 118 ।।[१५]

अर्थात् वन में निवास करना अच्छा है और प्राणों को छोड़ देना भी अच्छा है किंतु अपने कुल का अभिमान रखने वाले पुरूष को दूसरे की आज्ञा के अधीन रहना अच्छा नहीं है । कुल की स्वभिमानता एवं राज्यसंप्रभुता रक्षण का संकल्प बाहूबली इस प्रकार प्रकट करते हैं :

देयमन्यत् स्वतन्त्रेण यथाकामं जिगीषुणा ।

मुक्ला कुलकलत्र च क्ष्मातलं च भुजार्जितमू ।। 135 ।।[१६]

अर्थात जो मनुष्य स्वतंत्र है और इच्छानुसार शत्रुओं को जीतने की इच्छा रखते हैं वे अपने कुल की स्त्रियों औएर भुजाओं से कमाई हुई पृथ्वी को छोड्कर बाकी सब स्थ दे सकते हैं ।

राज्यकी संप्रभुता तभी संभव है जब उसके नागरिक उसकी आज्ञा, उसके कानूनों का स्वभावत: पालन करें तथा अन्य संप्रभु राज्य उसकी संप्रभुता में हस्तक्षेप न करें. अत: अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिये कभी-कभी शस्त्र ग्रहण करने पड़ते हैं जिसमें हिंसा अवश्यंभावी है और जैन धर्म अहिसाप्रधान धर्म है । ऐसी परिस्थिति में जैन श्रावक को या जैन राजा को शस्त्र ग्रहण कर शत्रुका सामना करने का विधान जैनदर्शन में है । राजकुमार बारांग पू वरदस्त केवली का उपदेश श्रवण कर अहिंसा व्रत अंगीकार करते है । किन्तु राज्य रक्षा हेतु होने वाली हिंसा की छूट लेते हैं -

'मदोद्धतौ: क्षत्रियपुङ्गवैस्तै परस्पराघातनिमित्तजातम् ।

विहाय तद्युतमुखं तदेकं मुने परप्राणिदया ममाशु ।।38 ।।[१७]

अर्थात् महत्वाकाँक्षी श्रेष्ठ क्षत्रिय पराकम के अभिमान से उद्दंड हो जाते हैं, फलत: अपनी प्रभुता बढ़ाने के लिए आपस में आकमण करते हैं जिसके निमित्त से पर्याप्त हिंसा होती है । अतएव मर्यादा रक्षा के लिए किए गये युद्ध की एक हिंसा को छोड्कर हे मुनिराज! शेष सब प्राणियों पर मेरा दयामय भाव हो गया है ।

जैनदर्शन के अनुसार हिंसा चार प्रकार की होती है-सकल्पी हिंसा, जैसे शिकार करना मछली पकड़ना. मच्छर. खटमल मारना आदि. आरभी हिंसा जैसे अपने दैनिक नित्यकर्म क्रियाओं में होने वाली हिंसा, जैसे - झाडू-पोंछा लगाना, वस्त्रादि धोना आदि. उद्युाएगी हिंसा, जैसे खेती करना, कारखाने में काम करना आदि, विरोधी हिंसा. जैसे अपने धर्म, धर्म के आयतन अपने देश, राष्ट्र आदि के संरक्षण हेतु होने वाली हिंसा क्योंकि बिना प्रतिकार किये इनका संरक्षण संभव नहीं है ।

गुरूवर सोमदेव आचार्य ने यशस्तिलकचंपू नामक गन्थ में इस प्रकार प्रकाश डाला है :-

'यः शस्त्रवृस्ति: समरे रिपु: स्याद्य: या कण्टको वा निजमण्डलस्य ।

अस्त्रापि तत्रैव नृपा: क्षिपन्ति न दीन-कानीन-शुमाशयेषु ।।[१८]

अथात् नरेश उन पर प्रहार करते हैं जो शस्त्र लेकर युद्ध में मुकाबला करता है अथवा जो अपने मंडल का कण्टक होता है. वह दीन, दुर्बल, अथवा सद्भावना वाले व्यक्तियों पर शस्त्र प्रहार नहीं करता । इस उदाहरणों से सिद्ध है कि जैन साहित्य एवं दर्शन में अपने राज्य के संरक्षण अर्थात् राज्य -संप्रभुता का सिद्धान्त विद्यमान है ।

भारत एक समाजवादी राज्य है

संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथ निरपेक्ष राज्य' शब्दावली संविधान के 42वे संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोडी गयी है । वैसे तो समाजवाद एक बहुअर्थी शब्द है. जो जैसा चाहे इसका अर्थ लगा सकता है । स्वयं संविधान सशोधनकर्ताओं ने इस शब्द को स्पष्ट नहीं किया है। अत: सामान्यतया समाजवाद का नकारात्मक दृष्टिकोण है - राज्य और आर्थिक संसाधनों पर व्यक्तिगत नियंत्रण नहीं होना तथा सकारात्मक रूप से उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर राज्य या समाज का नियंत्रण, सबकी समानता, समान वितरण या इनका एक स्थान पर केन्द्रीकरण नहीं होना। रेम्बे मैक्डोनल के शब्दों में

"No better definition of socialism can be given in general terms than it aims at the organization of the material economic forces of society and their control by the human forces."[१९]

'समाजवाद का उद्देश्य समाज की भौतिक, आर्थिक शक्तियों का सैगठन और उन पर मानवशक्तियों द्वारा नियंत्रण है ।

महान विचारक न्वट्रेन्द्व रसल के अनुसार भूमि और संपत्ति का सामुदायिक स्वामित्व' ही समाजवाद है"[२०]

"Communal ownership of land property is socialism"

'सबका कल्याण सर्वाङ्गीण अम्युदय' सर्वोदय' 'लोककल्याणकारी राज्य', सबको समान अवसर' जैसे शब्द भी समाजवाद के परिचायक हैं ।

इस तरह समाजवाद राजनीतिक कम, आर्थिक अधिक है जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में आर्थिक समानता और - सामाजिक व्यवस्था में समानता लाना है । ऊँच-नीच, गरीब-अमीर के भेदभाव को यथा-शक्ति यथासंभव दूर कर पारस्परिक सद्भाव, स्नेह और मिल-जुल कर देश व समाज की समस्याएँ हल करने में अपना सहयोग देना है । ताकि व्यक्ति की आर्थिक विपन्नता से उसमें हीनता के भाव न आने पाए और वह अपना जीवन सम्मान पूर्वक निर्वाह कर सके ।

अपरिग्रहवाद जैन दर्शन का उत्कष्ट समाजवाद

राज्य समाजवाद संविधानिक एवं कानूनी प्रावधान द्वारा प्राप्त करना चाहता है जबकि जैन धर्म के सिद्धान्त इस समाजवादको रू_य परिवर्तनके माध्यमसे प्राप्त करते हैं । समाजवादका विरोधी भाव है आर्थिक शक्ति-संसाधनों का केन्द्रीकरण । जब संपत्ति का कुछ व्यक्तियों के हांथों में केन्द्रीकरण रूक जाए तभी वह संपत्ति अन्य अभावग्रस्तों तक पहुँच पाएगी । पू क्षुल्लक गणेशप्रसादवर्णीजी ने कहा था जिस प्रकार यदि शरीर में रक्त एक स्थान पर रूक जाय, उसका संचरण पूरे शरीर में नहीं हो तो शरीर रोगग्रस्त हो जायगा उसी प्रकार आर्थिक संसाधन यदि एक स्थान या कुछ स्थानों पर रुक जावें तो समाज का संतुलन रोगग्रस्त हो जाएगा । वस्तुत:. राज्य व समाज में संसाधन इतने पर्याप्त है कि जिनसे प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है किन्तु उन्हें प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचना चाहिये, हो यह रहा है कि कुछ के पास विपुलता है. तो कहीं सर्वथा अभाव है । समाजवाद इसीविषमता को दूर करता है ।

जैनधर्म का अपरिग्रह का सिद्धांत समाजवाद या आर्थिक समानता का ही परिचायक है। अपरिग्रह का सीधा सादा अर्थ है आवश्यकता से अधिक वस्तुओं, धन-दौलत, भोग उपभोग सामग्री का सैचय नहीं करना । मन, वचन, काय से उनमें ममत्व-बुद्धि नहीं रखना । अपरिग्रह जहाँ एक्? ओर भोग-उपभोग की सामग्री का सैचय रोककर उसे अन्यों तक पहुँचाने का कार्य करता है तो दूसरी ओर अपरिग्रहव्रती को अनेक पापों के संचय से बचाता है क्योंकि परिग्रह संचय में सभी पाप समाहित है -

संगनिमिल मारइ भणइ अलीय करेइ चोरिक्क ।

सेवइ मेहुण मुच्छं. अप्परिमाणं कुणइ जीवो [२१]

अर्थात् जीव परिग्रह के निमित्त हिंसा करता है. असत्य बोलता चोरी करता है. मैथुन का सेवन करता है और अत्यधिक मूर्च्छा करता है ।

परिग्रह को दुख का हेतु बताते हुए कहा गया है -

'चित्त-मंत-मचिन्तं वार परिगिच्छ किसामवि ।

अण्णं वा अणुजाणाइ एवं दुक्सा ण मुच्वई । । [२२]

अथात् सजीव या निर्जीव वस्तु का जो परिग्रह रखता है अथवा दूसरों को अनुला अनुमोदन करता है, वह दुःख से मुक्त नहीं होता ।

जैनधर्म में श्रावक के परिग्रह-परिमाण व्रत एवं भोग-उपभोग परिमाण व्रत कार विधान किया जाता है जिसका अर्थ है परिग्रह साम्रगी ( धन, भूमि. अन्त वस्त्र, आभूषण. चांदी. सोना, सेवक आदि) का जीवन भर के लिए परिमाण लेना उससे अधिकका न तो संचय और ना ही उपभोग करना । काम. कोध मोह. लोभ आदि प्रवृजियाँ भी आतरिक परिग्रह में सम्मिलित की गई हैं । इन प्रवृत्तियों पर अकुंश लगाकर अपना परलोक सुधारने का प्रयास हो । जैन मान्यता के अनुसार परलोक में सद्गति और दुर्गति व्यक्ति के इस जीवन में अच्छे-बुरे कार्यो एवं परिणामों (विचारो) पर निर्भर है । तत्त्वार्थ सूत्रकार उमा-स्वामी आचार्य ने परिग्रह संचय के दुथरिणामु बताते हुए ' बह्मारंभ परिग्रहत्व नाराकस्यायुष[२३] (अर्थात् बहुत आरंभ और परिग्रह के कारण नरक गति का बंध होता है, यह सूत्र दिया है तथा इन् अल्पारम्मपरिग्रहत्व मानुषस्य[२४] (अर्थात् अल्प आरम्भ-परिग्रह मनुष्य का हेतु है) मनुष्य के बंध का कारण बताया है ।

उपरोक्तनुसार यदि आरंभ (लोगों के नैत्यिक कार्यो में होने वाली हिंसा) एवं परिग्रह कम होंगे तो उनसे बची सामग्री अन्य लोगों को प्राप्त हो सकेगी, जो वस्तुओं के सामान वितरण के लक्ष्य में सहायक होगी क्योंकि उत्पादन के साधनों में आरंभ समाहित है, तथा 'परिग्रहमें उपभोग सामग्री । इस प्रकार परिग्रह परिमाण- व्रत एवं भोग-उपभोग परिमाणव्रतों से उत्पादन के साधन एवं उपभोग की जाने वाली वस्तुओं के समान वितरण की दिशा में प्रगति होगी. और यही समाजवाद है । समाजवादी राज्य की मान्यता है कि सम्पत्ति समाज की समस्त शक्तियों की उपज है, जिसमें वैयक्तिक श्रम और सामाजिक अवदान दोनों सम्मिलित है । अत: उसके उपभोग की सुविधा भी यथासंभव सभी को प्राप्त होना चाहिए । निःसंदेह. जैनधर्म का अपरिग्रह का सिद्धान्त इस दिशा में बहुत कार्यकारी है । समाजवाद कानून से नहीं, मनुष्य के हद्य परिवर्तन एवं उसकी प्रवृजि पर अधिक निर्भर है. क्योंकि कानून से बचने के तो बहुत रास्ते हैं किन्तु अंतःकरण शुद्ध करने का मार्ग एकमात्र धर्म और उसके सिद्धान्त ही हैं

3. भारत एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य है :-

लोकतंत्रात्मक गणराज्य से तात्पर्य है राज्य व शासन के संचालन में जनता की इच्छा का सम्मान तथा उसकी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में भागीदारी । सरकार का स्वरूप प्रतिनिधित्वपूर्ण तथा उत्तरदायी होना जरूरी है । लोकतंत्र में राज्याध्यक्ष वंशपरंपरागत न होकर जनता द्वारा निर्वाचित होता है तथा एक निश्चित कार्यकाल के लिए होता है ।

जैन राज्यों में लोकतंत्रात्मक गणराज्य : मनमानापन है त्याज्य

जैन साहित्य एवं इतिहास में यद्यपि जनता द्वारा निर्वाचित शासकों का उल्लेख नहीं है कारण उस समय देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था. जहाँ प्राय: वंशपरंपरागत राजा होते थे, किन्तु उनके परामर्श के लिए मंत्रीपरिषद होती थी । 'पौर जनपदके रूप में प्रजातांत्रिक संस्थाएँ भी थीं जिनमें सभी वर्गो के प्रतिनिधि रहते थे जो राज्य-कार्यो राज्य की विधियों आदि में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते थे । कतिपय जैन राज्यों में गणराज्य व्यवस्था भी थी । गणराज्य प्रजातांत्रिक ही होते हैं ।


ईपू छठी शताब्दी में श्रमणोपासक जैनों का सबसे प्रसिद्ध गणतंत्र वृज्जिगण राज्य था जो आठ राज्यों (कुलों)का संघ था जिसमें वैशाली के लिच्छवि, विदेह और इग़तृक (नाथ वंश),वृज्जिकौरव आदि विशेष महत्वपूर्ण थे । यह सभी उत्तरी बिहार में अवस्थित थे । भगवान महावीर का जन्म वैशाली के लिच्छवि राजवंश में ही हुआ था । वृज्जिसंघ में गणतांत्रिक शासन-प्रणाली थी. जिसकी राजधानी वैशाली थी । वृज्जिशासनमें प्रत्येक ग्राम का प्रमुख राजा कहलाता था. और राज्यकार्य एक परिषद द्वारा होता था जहां सभी निर्णय सामूहिक रूप से लिये जाते थे । प्रत्येक ग्रामप्रमुख (राजा) इस परिषद के सदस्य होते थे । वृज्जिसंघ अन्य गणतंत्रों में सबसे अधिक शक्तिशाली था । विदेह राज्य का राजतंत्र भी क्रांति के फलस्वरूप एक गणराज्य के रूप में वृज्जिसंघ में सम्मिलित हो गया था । इस संघ में सात हजार सात सौ राजा या सदस्य थे जो ग्राम के प्राय: अनुभवी व्यक्ति ही होते थे । इनकी अनेक सभाएं थी जिनके अधिवेशन प्राय: हुआ करते थे । वे परस्पर मिलजुल कर राज्यकार्य करते थे बैठकें करते थे । सात हजार सात सौ गणपति (राजा) के अतिरिक्त इतने ही उपराजा. इतने ही सेनापति और इतने ही भाण्डागारिक थे । इन सभी संस्थाओं के सदस्यों में उच्च मध्यम, वृद्ध, ज्येष्ठ आदि का भेदभाव नहीं था । प्रत्येक सदस्य अपने को राजा मानता था । संस्थागार में इन सदस्यों की बैठकें हुआ करती थीं । कौटिल्य एवं पाणिइन ने भी वृज्जिसंघ का उल्लेख किया है ।[२५] निःसंदेह यह व्यवस्था गणतंत्रात्मक थी जहां कोई वशपरम्परागत राजा नहीं होता था, और ना ही वह आजीवन अपने पद पर रहता था । यह एक संघात्मक -व्यवस्था भी थी अर्थात् 8 राज्यों. कुलों का एक्? संघ भी था । इसका स्वरूप प्रतिनिध्यात्मक भी था ।

श्रीसत्यकेतु विद्यालंकार ने अपनी पुस्तक ' प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था और राज्य शास्त्र में 'महावीर निबाणसुता' नामक सूत्रग्रंथको उद्धृत कर वृज्जिसंघ की गणतंत्रात्मक पद्धति का उल्लेख किया है -

अजात शत्रु ने वृज्जिसंघ पर आकमण करने के संबंध में सलाह हेतु वर्षकार को बुद्ध के पास भेजा । तब बुद्ध ने आनंद से कहा - आनंद क्या तुमने सुना है कि वृज्जि एकसाथ एकत्रित होकर बहुधा सभाएं करते हैं ?

आनंद - हों, भगवन्! सुना है ।

बुद्ध - आनंद जबतक वृज्जि एक स्थान पर एकत्रित होकर बहुधा सभाएं करते रहेंगे तब तक आनंद! वृज्जियों की वृद्धि ही समझना, हानि नहीं होगी।

जब तक वे जो अपने राज्यों में विहित है उसका उल्लंघन नहीं करेंगे जो विहित नहीं है उसका अनुसरण नहीं करेंगे । पुराने समय से चले आ रहे नियमों का पालन करेंगे, तब तक उनकी अभिवृद्धि ही समझना................. ।

वृज्जियों में जो वृद्ध ( महल्लक) नेता है उनका वह सत्कार करेगें, उन्हें बड़ा समझकर उनकी पूजा करते रहेंगें, उनकी बात को सुनने तथा ध्यान देने योग्य समझते रहेगें. तबतक उनकी वृद्वि समझना हानि नहीं......................... ।

उक्त विवरण से स्पष्ट है कि वृज्जिसंघ में गणतंत्रामक पद्धति थी जिसमें लोकतांत्रिक प्रणाली पर्याप्त मात्रा में थी ।

जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि भारत के प्राचीन राज्यों में प्राय: वशपरम्परागत राजा होते थे । किन्तु वह मात्र राजा के ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते या राजा के पसंद के पुत्र होने के कारण राज्यरोहण के योग्य नहीं बन जाते थे ।

जब कभी कोई राजा वृद्ध होने पर अपने किसी भी पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने की सोचता था तो वह अपने अमात्यों. पुरोहितों मंत्री परिषद के अन्य सदस्यों, विभिन्न श्रेणियों के मुखिया और पौर-जनपद के सदस्यों से विचार-विमर्श करता था और उनकी सहमति से ही अपने पुत्रों में से (सामान्यत: ज्येष्ठ पुत्र) किसी को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर राज्याभिषेक की आइग़ देता था ।

इससे स्पष्ट है कि राजा के चयन में भले ही जनता एवं उसके प्रतिनिधियों की प्रत्यक्ष रूप में कोई भूमिका न हो किन्तु परामर्श किए बिना उनकी सहमति के बिना किसी को राजपद देना निरापद नहीं था ।

भगवान महावीर के समवशरण में प्रमुख श्रोता के रूप में उपस्थित महाराज श्रेणिक बिविसार के राज्यारोहण का एक प्रसंग राजा के चयन में जनता की भूमिका को स्पष्ट करता है ।

महाराज श्रेणिक के पिता उप श्रेणिक महाराज एक बार एक भील कन्या पर आसक्त हो गए थे । उसके पिता से विवाह का प्रस्ताव रखा । पिता ने विवाह की शर्त रखी कि उसकी पुत्री के पुत्र को ही उत्तराधिकारी बनाया जाए, तब ही वह अपनी कन्या का विवाह उनसे कर' सकता है । कामासक्त उपश्रेणिक ने यह शर्त मान ली । कालान्तर में भील कन्या से चलाती नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ । किन्तु ज्येष्ठ पुत्र श्रेणिक थे. जो बल, बुद्धि, शौर्य आदि में राजा बनने के पूर्णत: योग्य थे. किन्तु वचनवद्ध राजा उपश्रेणिक ने किसी बहाने से श्रेणिक को देश से निकलवा दिया ताकि चलाती का राजा बनने का मार्ग प्रशस्त रहे । परिणामस्वरूप उपश्रेणिक के मरणोपरांत चलाती को पूरा राज्य मिल गया । चलाती राजनीति रो अनभिज्ञ लालची एवं व्यसनी था । वह जनता से अकारण ही धन छीनने लगा, प्रजा पर अत्याचार करने लगा, तब जनता ने 7 मंत्रियों ने दुखी होकर श्रेणिक को ही राज्य देना तय किया ।

आचार्य शुभचन्द्रजी ने इस प्रसंग का वर्णन इस प्रकार किया हैं :

"अथराज्यं शुभप्राज्यं पालयाकास तत्सुत:

सामंतामात्य पौरैश्च सेव्य मानोदुति दुष्टदृाईा ।।56।।
अन्यायेन बिना वित्त परकीय समाहरत्
सेवकानां नृपोवृजि र्विलुलोप स लोभयुक ।।57।।
नर यथाकथचिच्च दृष्टवाहति च पापधी
आचारानैक्य संत्यक्तोध्नाभिज्ञा क्षितिपालने ।।58।।
अन्यायवत्तमवृजित्व तस्य यत्वा च मत्रिण: ।
इत्यालोचं व्यधुश्चित्ते राज्यरक्षण सिद्धये ।।59।।
कथं रक्षति सद्राज्यं लोपयन्तभर वृजिकं ।।
श्रेणिकोध्त समाकार्यो मगधस्थिति हेतवे ।।"6०।।[२६]

अर्थात् इस तरह उपश्रेणिक के मरणोपरांत चलाती को पूरा राज्य मिल गया किन्तु राजनीति से सर्वथा अनभिज्ञ राजा चलाती ने सामंत, मंत्रीजनों से भली प्रकार सेवित होने पर भी राज्य में अनेक प्रकार के उपद्रव प्रारंभ कर दिए । कभी तो वह बिना अपराध के सैनिकों का धन जप्त करने लगा, कभी प्रजा को अन्य प्रकार से कष्ट पहुँचाने लगा । जिसके आधार पर राज्य चल रहा था उन राज्य सेवकों की अज़ीविका भी उसने बंद कर दी । राज्य में इस प्रकार भयंकर अन्याय देक्कर पुरवासी एवं देशवासी मनुष्य त्रस्त होने लगे और खुले मैदान मुख से ही यह शब्द सुनने में आने लगे-राजा चलाती बडा भारी पापी है. अन्यायी है और राज्य पालन करने में सर्वथा असमर्थ है । अत: राज्य के मंत्रियों ने राज्य संभालने के और अन्य उपाय सोचे और बाद में कुमार श्रेणिक को बुलाने का ही निश्चय किया ।

उक्त उद्धृत सूत्रों से स्पष्ट है कि राजा यदि अत्याचारी हो तो उसे प्रजा और मंत्रीगण पा-युत कर सकते थे । कुमार श्रेणिक के मगध देश पहुंचने पर सामंतों एवं अन्य प्रजाओं की क्या प्रतिकिया थी, यह निम्न श्लोकों से स्पष्ट है ।

"आगत ते परिज्ञाया जग्मु: सम्मुखमुन्नत: ।

सर्वे सामंतमंत्रद्या मुक्लवा तं न्याय वर्जिते ।।79।।
वीताश्च दतिनो रम्या वीतर्संख्या स्फुरतभ: ।
रथ: पदातयो संख्या परिचेलुसादा नृप ।।8०।।
तदानक महाध्वानै: स्थाययामासु रूस्तम ।
राज्ये ते श्रेणिक धीरं ज्युस्तत्पद पंकज ।।81।।
तत: कमेण सप्रापद्राजगह समीपता ।
नृपोध्मात्य सुसामंत पस्थ्यिं सुशासन: ।।82।।[२७]

अर्थात् कुमार श्रेणिक मगघदेश आगये, यह समाचार सारे देशमें फैल गया । समस्त सामना एवं अन्यान्य देशवासी बडे विनय भावसे श्रेणिकके पास आए और भक्तिपूर्वक नमस्कार किया ............... कुमार के आगमन के उत्सव में सारा देश बाजों की आवाज से गज उठा एवं कुछ दिन चल कर कुमार राजगृह नगर के निकट पहुँच गये ।

जब राजा चलातीको प्रजाके विद्रोह एवं कुमार श्रेणिकके आनेका पता लगा तो स्वयं भयभीत होकर किलेमें जा छिपा ।

"मात्रादिक प्रणम्यायु रेजे राजालिमंडीग:।

राजा राजितधामाध्सौ विनष्टप्रभ शात्रव: ।।11०।।
इतिवृषुपरिपाकातू प्राप्त राज्यदि भूति
र्निखिलजन सुमान्यो मासितानेक वृद्धा.................. ।"[२८]


अर्थात् राजमंदिर में प्रवेश कर कुमार ने अपनी माता आदि को भक्ति पूर्वक नमस्कार किया । अन्य परिचित लोगों से यथायोग्य मिले । कुछ दिन 'बाद मंत्रियों की अनुमति पूर्वक कुमार का राज्याभिषेक किया गया । कुमार श्रेणिक अब महाराज श्रेणिक कहे जाने लगे ।

उक्त विवरण से स्पष्ट है जैन क्षत्रियों के राजा यद्यपि बहुधः वशपरम्परागत होते थे. पर वे मनमाने ढंग से प्रजा के प्रति अत्याचार नहीं करते थे । मत्रियोसामंतों एवं साधारण प्रजा से सम्मानपूर्वक व्यवहार कर उनसे विचार-विमर्ष कर राज्य संचालन करते थे । राजा के चयन में भी प्रजा सहभागी रहती थी ।

एक अन्य उद्धरण से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि जैन राजाओं के चयन में प्रजा के प्रतिनिधियों की भूमिका को अधिक महत्त्व दिया जाता था और नये राजा का राज्याभिषेक करने का प्रथम अधिकार उन्हीं का था. बाद में अन्य सामंत, मंत्री और अमात्य राज्याभिषेक करते थे :-

"अष्टादश श्रेणिगणप्रधाना, बहुप्रकारैर्मणिरत्न मिश्रै ।

गन्धोदेकैश्चन्दनवारिभिश्च, पादाभिषेकं प्रथमं प्रचक्रु : ।।63।।
सामन्तभूमिश्वरभोजमुख्या आमात्यसांवत्सरमंत्रिणश्च
ते रत्न कुम्मैर्वरवारिपूणैंमूर्धारिभिषेकं मुदिता: प्रचक्रु : ।।64"।।[२९]

अर्थात् सबसे पहले शिल्पी, व्यवसायी आदि अठारह श्रेणियों के मुखियों ने वरांग चरणों का अभिषेक सुगन्धित उत्तम जल से किया था, उस जल में चंदन घुला हुआ था तथा विविध प्रकार के मणि और रत्न भी छोड़ दिये थे ।

इसके उपरान्त सामन्त, राजाओं, श्रेष्ठ अतियों युक्तियों के अधिपतियों, अमात्यों, मंत्रियों. संबतसरों (ज्योतिषी. पुरोहित आदि) ने आनंद के साथ रत्नों के कलशो को उठा कर कुमार का मस्तकाभिषेक किया था । उनके रत्न कुम्भों में भी पवित्र तीर्थोदक भरा हुआ था ।

इस तरह यह सिद्ध है किं श्रमणोपासक राज्यों में जनता की राज-कार्यो में मत्त्वपूर्ण भूमिका रही है जो लोकतंत्रात्मक शासन पद्धति के निकट है ।

4. भारत एक पंथ निरपेक्ष/ धर्मनिरपेक्ष राज्य हैं :-

धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ धर्मविरोध या अधार्मिक होना नहीं है जैसा कि संविधान सभा में श्री एच० व्ही० कामथ ने कहा था-

"when O say that a state should not identify itself with any particular religion, I do not mean to say that a state should be antireligious or irreligious. We have certainly declared India to be a secular state, but to my mind a secular stat is neither a Godless state nor an irreligious nor antireligios state."[३०]

धर्म स्वतंत्रता के संबंध में भारत के संविधान में स्पष्ट प्रावधान है -

"सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों कों अतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को आजादी से मानने, पालन करने तथा प्रचार करनेका समान अधिकार होगा"।[३१]

संविधान के उक्त प्रावधान से यही ध्वनित होता है । कि राज्य का कोई विशेष राजधर्म नहीं होगा, वह सभी धर्मो एवं धर्मानुयायियों से समान व्यवहार करेगा, किसी से रोग-द्वेष नहीं होगा और न पक्षपात करेगा ।

'धर्म निरपेक्षता मूलत: एक नकारात्मक अवधारणा है, यद्यपि सकारात्मक दृष्टि से यह सभी धर्मानुयाइयों, धार्मिक स्थानों, संस्थाओं आदि के प्रति समान व्यवहार कीअपेक्षा करती है और उन्हें पूजा अर्चना, विश्वास. धार्मिक संस्थाओं के प्रबंध आदि के क्षेत्र में स्वतंत्रता प्रदान करती है। नकारात्मक रूप से यह राज्य को धार्मिक मामलों में सकिय भाग लेने अथवा उनमें हस्तक्षेप करने से वर्जित करती है । तथा उसे व्यक्ति-व्यक्ति के बीच धर्म, जाति. नस्ल, मूलवंश, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव करने से रोकती है[३२]

राजनीति के क्षेत्र में धर्म निरपेक्षता यूरोप में एकल एकीकृत ईसाई संघ के किया कलापों के विरूद्ध प्रतिकूल प्रतिक्रिया थी-एक नई अग़र्थिक व्यवस्था जन्म ले रही थी जिसकी सफलता धर्मनिरपेक्षता पर ही निर्भर थी । लास्की के शब्दों में:

"एक शब्द में नई आर्थिक व्यवस्था को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की आवश्यकता थी और यदि राजनीति को धर्मविज्ञान की एक शाखा से अधिक होना था तो एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को अधिक उदारवादी सिद्धांतों की जरूरत थी"।[३३]

धर्म निरपेक्षता: जैन धर्म की उदारता (धर्म निरपेक्षता की से)

जैन धर्म पर्याप्त उदार है वस्तुत: जैन कोई जाति नहीं, जिन (जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है) के अनुयायी जैन हैं । और धर्म वही है जो लोगों को दुख से निकाल कर सुख में स्थित करा दे- "जो प्राणियों का उद्धारक हो उसे धर्म कहते हैं । इसलिए धर्म का व्यापक, सार्थ या उदार होना आवश्यक है जहाँ संकुचित दृष्टि से स्वपर का पक्षपात है, शारीरिक अच्छाई-बुराई के कारण आन्तरिक नीच-ऊँचपने का भेदभाव है, वहाँ धर्म नहीं हो सकता" ।[३४]

जैन धर्म के प्रसिद्ध आचार्य स्वामी समन्तभद्राचार्य जी ने रत्नकरण्डश्रावकाचार नामक ग्रन्ध का प्रारंभ ही निम्न सूत्र से किया है-

"देशयामि समीचीन धर्म कर्मनिबर्हणम् ।

संसारदु:खत: सत्त्वान् यो धरत्युत्तमे सुखे ।। 2 ।।" [३५]

अर्थात् - मैं कर्मो का विनाश करने वाले उस श्रेष्ठ धर्म को कहता हूँ जो जीवों को संसार के दुखों से निकाल कर स्वर्ग मोक्षादि उत्तम सुख में धारण कराता है - पहुँचा देता है ।

जैन साहित्य. जैन कथाकोषों एवं पुराणों में जैन धर्म की उदारता के उदाहरण भरें पडे हैं । बिना किसी जातिगत वंशगत भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति को अपना कल्याण करने के अधिकार को जैन धर्म मान्यता देता है । पापी से पापी, दुराचारी, व्यसनी व्यक्ति भी धर्म के सिद्धांतों, अहिंसा. सत्य, अस्तेय. ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह को अपने आचरण में उतार कर अपना उद्धार कर सकता है ।

जैन धर्म की मान्यता है :

"न विप्राविप्रयोरस्ति सर्वथा शुद्धशीलता ।

कालेननादिना गोत्रे स्थलनं क्व न जायते ।।
ऊ' संयमो नियम: शील तपो दानं दमो दया ।
विद्यन्ते तात्विका यस्यां सा जातिर्महती मता" ।।[३६]

अर्थात् ब्राह्मण और अब्राह्ममण की सर्वथा शुद्धि का दावा नहीं किया जा सकता क्योंकि इस अनादिकाल से न जाने किसके कुल या गोत्र में कब पतन हो गया हो । अत: वास्तव में उच्च जाति तो वही है जिसमें वर्तमान में संयम, नियम. शील, तप, दान इन्द्रिय दमन और दया पाई जाती है । और देखिये -

"शूद्रोध्न्दुपस्वाराचारवपु: शुद्धयास्ति तादृश: ।

जात्या हीनोउपि कालादि - लब्धौह्यात्मास्ति धर्मभाक्" ।।[३७]

अर्थात् कोई शूद्र भी है यदि उसका रहन सहन स्वच्छ है, जो मद्यादिक का सेवन नहीं करता और जो शरीर की शुद्धि पूर्वक भोजन करता है. वह वर्णहीन शूद्र भी धर्मश्रवण का अधिकारी है क्योंकि उसका आत्मा यद्यपि जाति से हीन है तथापि काल लब्धि आदि के प्राप्त होने पर वह भी धर्मधारक हो सकता है । तात्पर्य यह है कि बादय शुद्धि भी अन्तरंग शुद्धि में कारण है । विन्सेन्ट स्मिथ ने हिस्ट्री ऑफ इंडिया में लिखा है :-

"Jain ethics are meant for men of all positions for king, warriors, traders, artisans, agriculturist & indeed for men ans women in every walk of life. Do your and do it as humanly as you can. This, in brief is the principle of Jainism.[३८]

अर्थात् जैन नैतिक (धार्मिक) मान्यताएँ सभी हैसियत के लोगों के लिये है - राजाओं. योद्धाओं, व्यापारियों, शिल्पियों, किसानों और वास्तव में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम करने वाले स्त्री पुरूषों के लिये है । अपना कर्त्तव्य पालन करो और उसे भरसक मानवीय ढंग से सम्पादित करो । संक्षेप में यही जैन धम का प्राथमिक सिद्धांत है ।

जैन धर्म धर्मान्धता को कभी प्रश्रय नहीं देता । इतिहास गवाह है अन्य धर्मावलंबियों ने उनसे अन्य धर्मानुयायियों को हेय दृष्टि से देखा ही नहीं, उन पर बर्वरता पूर्यक अत्याचार किया है । जैनधर्मावलवी भी इसके शिकार हुए हैं । जैन इतिहास में दो भाईयों अकलंक और निकलक का ऐतिहासिक कथानक मिलता है । दोनों जैन धर्मानुयायी थे । वे विद्या अध्ययन के लिए बौद्ध मठ में गये । बौद्धमठ गुरू मात्र बौद्ध धर्मानुयायी को ही शिक्षित करते थे । विद्या उपार्जन की ललक के कारण दोनों भाई नख्स नाम से बौद्ध मठ में प्रवेश लेकर विद्या अध्ययन करने लगे । संकट के समय अपने इष्ट का स्मरण करने पर ३. पकड़े गये । बड़े भाई. अकलंक तो किसी प्रकार जान बचा कर वहाँ से भागने में सफल हुए किन्तु छोटे भाई निकलक भागते हुए पकड़े गये और बौद्धानुयायियों के शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त हुए । दक्षिण-भारत में मध्ययुग में शैव और लिंगायतों ने हजारों जैनियों का विनाश कर रक्त को वैतरणी बहायी । जर्मन विद्वान डी. वान ग्लेपनेस ने अपने ग्रन्थ Jainism में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया।[३९]

योरोप में केथोलिक धर्मानुयायियों ने प्रोटेस्टेन्ट धर्मानुयायियों पर अनेक लोमहर्षक अत्याचार किये हैं, उन्हें जिन्दा आग में जलाया गया है । ब्रिटेन की कैथोलिक रानी मेरी ने उन पर और भी अधिक अत्याचार कर उनके बध के अनेक तरीके निकाले थे, इसीलिये इतिहास में उसे प्लंडी-मेरी' अर्थात् 'खूनी मेरी' के नाम से जाना जाता है ।

पं. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में रोमन ईसाई संघ के अत्याचारों का विशद वर्णन किया है । पादरियों के भ्रष्टाचार व विलासप्रियता की आलोचना करने पर आर्नोल्ड को फांसी दी गयी [४०] 'इनक्विजीशन' अदालत कायम कर हिंसा का राज कायम किया गया । पादरियों से मत विभिन्नता रखने पर लोगों को जिन्दा आग में जलाया गया पोप ने रसायन के खिलाफ फतवा देकर उसे शैतानी हुनर करार दिया और लोगों को इस विश्वास से जिन्दा जलाया गया कि वे उनकी आत्माओं को पापों से बचा रहे थे ।. .............. ईश्वर के नाम पर इन्होंने लोगों को मारा है और हत्याएं की हैं और 'अमर आत्मा को बचाने की बात करते हुए उन्होंने नाशवान शरीर को जला कर राख कर देने में संकोच नहीं किया है ।[४१]

आगे नेहरू लिखते हैं, ' सारा इतिहास मजहबी अत्याचारों और मजहबी युद्धों से भरा पड़ा है और मजहब व ईश्वर के नाम पर जितना खून बहा है उतना शायद ही किसी दूसरे नाम पर बहा होगा ।"[४२]

अमेरिका विचारक राष्ट्रपति जेफरसन ने बड़े मार्मिक ढंग से लिखा है - जबसे ईसाइयत प्रारंभ हुई है, लाखों निर्दोष मनुष्यों महिलाओं एवं बालकों को जलाया और उत्पीड़ित किया गया उन पर जुर्माना किया गया और जेलों में अं दिया गया किन्तु फिर भी एकरूपता की ओर एक इंच भी नहीं खिसके । जबरदस्ती का क्या प्रभाव हुआ? सम्पूर्ण पृथ्वी पर सर्वत्र धोखेबाजी और भ्रान्तियों में सहयोग करने हेतु आधी दुनिया को मूर्ख और शेष आधी पाखच्छी बना दी गई ।"[४३]


यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जैन धर्मानुयायियों ने कभी भी धर्मान्ध होकर अन्य धर्माविलबियो पर अत्याचार तो दूर की बात उन्हें बहला-फुसलाकर जैन बनाने का प्रयास भी नहीं किया । वस्तुत: जैन धर्म तो विश्वधर्म है क्योंकि अहिंसा धर्म को ही जैनधर्म कहते हैं । जैन धर्म में व्यक्तिमात्र तो क्या प्राणीमात्र (इतर प्राणी) से जबरदस्ती करना वर्जित है किसी पर दबाब डालना, उसकी इच्छा के विरूद्ध काम करवाना सूक्ष्म हिंसा में आता है इसीलिये जैन धर्म में धर्मान्धता को कोई प्रश्रय नहीं । जन्म से जैन धर्मानुयायियों को भी यह विधान है कि वे धर्म के सिद्धान्तों को ठोक बजाकर माने, उन्हें प्रमाण और 'नय' की कसौटी पर जाँचे तभी अनुकरण करें । पं. सुमैरचंद्र जैन दिवाकर जी ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक 'रिलीजन एंड पीस में धर्मान्धता के बारे में लिखा है -

Fanaticism Kills religion-as matter of fact,fanaticism is the real devil, which destroys all the good points and the best in religion ..........therefore we are not in the grip of that cruel and merciless attitude so as to think of the destruction of the cotories of other creeds. It is this inhuman persecution and bigotry which has created disgust in the minds of modern thinkers........ [४४]

अर्थात् धर्मान्धता धर्म की विनाशक है । - सही कहें तो धर्मान्धता वास्तविक शैतान है जो धर्म के श्रेष्ठ बिन्दुओं एवं धर्म में सन्निहित सर्वोत्तम तत्वों को नष्ट कर देती है ......... अतएव हम (जैन) उस जालिम और निर्दयी वृत्ति की पकड़ से परे हैं जो हम अन्य धर्मावलंबियों के विनाश की सोचें । यही वह अमानवीय उत्पीडन और कट्टर धर्मान्धता है जिसने आधुनिक विचारकों के मस्तिष्क में मृणा और विरक्ति (धर्म के प्रति) पैदा की है । नागपुर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. एमवी. नियोगी ने जैनधर्म की धर्मनिरपेक्षता को इन शब्दों में व्यक्त किया है -

"It is a tribute to the jain thinkers that they never daimed monopoly of truth of their own teachings, under the guise of revelation. They thereby kept away the evils of dogmatism and fanaticism which are responsible for the sharp conflict and blood shed, which disfigure the history of man."[४५]

अर्थात् जैन विचारकों की वृत्ति अभिनंदनीय है कि उन्होंने ईश्वरीय आलोक (revelation) के नाम पर अपने उपदेशों में ही सत्य का एकाधिकार नहीं बताया, इसके फलस्वरूप उन्होंने साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता के दुर्गुणों को दूर कर दिया, जिनके कारण मानव-इतिहास भयंकर द्वन्द और रक्तचाप के द्वारा कलंकित हुआ है ।

जैन धर्म तो प्राणिमात्र के प्रति प्रेम और मैत्री. भाव रखने की शिक्षा देता है, बैर किसी से नहीं -

"सत्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोद

क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम् ।
माध्यस्थभावं विपरीतवृजौ,
सदा ममात्मा विद्घातु देव" । ।[४६]

अथार्त :-

प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणी जनों में हर्ष प्रभो ।

करूणाभाव रहे दुखियों पर दुर्जन में मध्यस्थ विभो ।।

'इस प्रकार सही धर्मनिरपेक्षता वही है जिसमें धर्म के आधार पर किसी से पक्षपात नहीं हो. सभी का समान आदर हो । सभी अपने-अपने विश्वास और आस्था के अधीन धर्म का पालन करे सभी जीवो से पक्षपात रहित रहकर व्यवहार करने का जैन-दर्शन का निम्न कथन दृष्टव्य है -

"पक्षपातो न वीरे न द्वेषा: कपिलादिपु ।

युक्तिमद्वचनं यस्य तरस कार्य: परिग्रह:" ।।

"बन्धुर्न न: स भगवान रिपवोऽपिनान्ये साक्षान्नदृष्टचरएकतमोऽपिचैषाम् ।

श्रुत्वा बच: सुचरितं च प्रथग विशेष वीरंगुणातिशयलोलतयाश्रिता:रम: । ।"[४७]

अर्थात् महावीर के प्रति मेरा कोई दुराग्रह नहीं है और न ही कपिल आदि के प्रति कोई दुर्भाव उन्हीं का अनुसरण करना अभीष्ट है जिनके उपदेश तर्कसंगत और विवेक संगत हों ।ये भगवान महावीर मेरे कोई कन्धु नहीं हैं, और अन्य देव मेरे शत्रु नहीं है । मैने तो उनमें से किसी की साक्षात देखा भी नहीं है परन्तु उनके वचनों को सुनकर और उनमें अलग ही विशेषता देख कर गुणातिशयता की लाभ भावना से वीर भगवान का आश्रय लिया है ।

जैन राजा अपने राज्यों में धामिक सहिष्णुता बनाए रखने के प्रति विशेष सतर्क रहे । कर्नाटक प्रान्त म् पोयरल वंश के जैन राजाओं ने जिस धर्म-सहिष्णुता, और धर्म समन्वय का परिचय दिया है वह एक् ऐतिहासिक सत्य है जो अन्य धर्मावलंबी राज्यों में दुर्लभ है । पोयरलवंश का राज्य कर्नाटक में 11वीं शताब्दी के अंतिम दशक से 12वीं शताब्दी तक रहा है । महाराजा विनयादित्य. उनके पुत्र एरेयंगप्रभु उनके पुत्र बल्लाल और उनके अवसान के बाद उनके अनुज विर्दृदेव जो बाद में विष्णुवर्धन कें नाम रे विख्यात हुए के शासनकाल में धर्मसमन्वय अद्व्तीय उदहारण मिलते हैं [४८] पोय्सल राज्य कर्नाटक में बेलापुरी (वेलूर) वेलुगोल (श्रवणवेलुगोल), शिवगगा(कोडुगच्छसव) सोसेउरू (अंगाडी). दोरसमुद्र (हलेवीडू यादवपुरी (तोण्गूरू).यदुगिरि(मेलुकोटे),बलिपुर(वल्लिगावेवेलगाँव),कोवलालपुर(कोलार) कीढपुर(कैदाल) पुलिगेरे (लक्ष्मेश्वर), बंकापुर हानुगन्न आदि क्षेत्र तक विस्तृत था । पोयनल राज्य के सभी राज जैन-धर्मावलंबी थे किन्तु सभी धर्मो के प्रति सहिष्णु थे और उदारता पूर्वक उनके मंदिर निर्माण सक्रिय तन. मन. धन से सहयोग करते थे । विष्णुवर्धन (पूर्व विदृदिव) की धर्मपत्नी प्रसिद्ध ऐतिहासिक् महिला शातला थी । उरस्के पिता शुद्ध शैव, माता परम जिन भक्त, स्वय भी माता की भॉाइत् जिनभक्तनिष्ठ पति भी पहले जिनभक्त बाद में परिस्थितिवश[४९] मतांतर के बाद विष्णुभक्त, किन्तु तट भी राज्य में धर्मसमरसता बेनी रही । पट्टमहादेवी शातला ने पति द्वारा मतांतर (धर्म परिवर्तन) कर लेन् पर भी स्वयं धर्मपरिवर्तन नहीं किया। अपने मत जैन धर्म पर दृढ रही । वचनबद्ध होने पर राजा विटइऋादेट (विष्णु वर्धन) ने अन्य 3-4 विष्णु भक्त वैष्णव शैव कन्याओं से विवाह किये जिसकी स्वीकृति स्वय शातला ने दी । यद्यपि वैष्णव रानियाँ पट्टमहादेवी शातला से ईष्या-द्वेष रखती थी, उसके विरूद्ध षडयंत्रों में भी सहयोग देती थी, किन्तु पट्टमहादेवी शातला ने अपनी ओर से समरसता बनाए रखी । शांतला साधारण महिला नहीं थी, शिल्पकला. नृत्यकला, ज्योतिष विइग़न, जैन दर्शन आदि में निष्णात थी । स्वंय जैन धर्म में अडिग रहने पर भी उसने पदृमहादेवी के रूप में अनेक विष्णुमंदिर और शैव मंदिरों का निर्माण कराया ।यादवपुरी का लक्षमीनारायण मंदिर, वेलापुरी (बेलूर) का प्रसिद्ध चन्नकेशव सोम्यनायकी मंदिर दोरसमुदू (हलेविद्वे के युगल शिवमंदिर (पोयरलेश्वर एवं शान्तलेश्वर) ग्लकाडु का कीर्तिनारायण मंदिर. वेलापुरी का विजयनारायण मंदिर, यदुगिरी का चेलुबनारायण मंदिर आदि का रचय पं. महादेवी शातला के मार्गनिर्देशन में बने हैं जो एक ऐतिहासिक तथ्य है । वेलूर के चन्नकेशव मंदिर का निर्माण पोम्मल राज्य की कलाकृति का बेजोड़ नमूना बने. और मंदिर निर्माण कार्य निर्विध्न चलता रहे. इसके लिए पट्टमहादेवी शांतला ने अपनी काय शुद्धि के लिये ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था और नित्य प्रतिदिन स्वयं निर्माण कार्य की प्रगति का ब्यौरा लेकर आवश्यक सुझाव देती थी ।[५०] दूसरी ओर, विष्णुभक्त वैष्णव राजा विट्टीदेव ने (जन्म से जैन) पट्टमहादेवी के गुरूवर्य प्रभाचन्द्रसिद्धान्तदेव के पादों का प्रक्षालन कर उन्हें गन्धवारणवसदि (चन्द्रगिरि श्रवणवेलुगोल पर निर्मित शांतिनाथ जिनालय) के लिए कल्कणि-प्रदेश मोदृएनविले नामक गाँव को सर्वमान्य के रूप में दान कर दिया ।[५१]

पट्टमहादेवी शातला के सम्बन्ध में लेखक ने महाराजा विष्णुवर्धन के मुख से कहलवाया है-

"राष्ट्रहित में व्यक्तिवाद वाधक न बने । हमारे प्रधान जी जैन है, हमारे दामाद जैन हैं, जैन, शैव और वैष्णव कन्याओं से हमारा पाणिग्रहण हुआ है। हमारे दण्डनायकों में शैव, वैष्णव. जैन सभी हैं, 'विविधता में एकता' को हमारे उस राष्ट्र ने चरितार्थ किया है । '[५२]

पोयाल राज्य की पंथनिरपेक्षता निन्न प्रकार रही है -

"एक शताब्दी तक सिंहासन पर बैठने वाले सभी महाराज जिनधर्मी ही रहे । फिर भी वही लोग सर्वश्रेष्ठ है - अन्य मत कम हैं - ऐसी भावना नहीं रखते थे । अन्य मतों की निंदा नहीं की । इस बातको अच्छी तरह जानते थे कि सभी मत- धर्मों के लिये समान अवकाश देना राष्ट्रधर्म है । इसलिये सभी मतावलम्बियों को समान स्थान-मान देकर सभी मत-धर्मो पर विश्वास रखता आया है । [५३]

आज भी कर्नाटक में धर्मसमरसता के प्रतीक धर्मरथली के श्री वीरेन्द्र हैगडे जी हैं जिनके स्वामित्व की भूमि पर न केवल जैन मंदिरों अपितु शिव. विष्णु सहित लगभग सभी धर्मो के उपासना स्थल बने है जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों-हजारों व्यक्तियों को निःशुल्क भोजन की व्यवस्था है ।

(5) भारत में प्रत्येक नागरिक को सामाजिक. आर्थिक और राजनीतिक न्याय उपलब्ध है ।

सामाजिक न्याय से तात्पर्य है समाज में ऊँच-नीच. धनी-निर्धन. अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक. स्त्री-पुरूष आदि के भेद-भाव बिना सभी को निर्भयता पूर्वक जीने का अधिकार । आर्थिक न्याय के अन्तर्गत श्रम का उचित पारिश्रमिक. सभी को जीवननिर्वाह के आवश्यक साधनों की उपलखि रोजगार की गारंटी, समान कार्य के लिए समान वेतन, शोषण का उन्मूलन आदि आते हैं राजनीतिक न्याय उच्च से उच्च सर्वोच्च पद तक (योग्यतानुसार) प्राप्त करने के अधिकार का द्योतक है । सभी को सरलता से न्याय उपलव्य हो कानून के सामने समानता और कानून का समान संरक्षण (Equality before law and edual protection of law) उपलब्ध कराना ही, राजनीतिक न्याय है ।

जैन दर्शन इतिहास ' साहित्य में सामाजिक, आर्थिक एवं सामाजिक-न्याय

जैन दर्शन में सामाजिक न्यायाचार : सबसे समता-मूलक व्यवहार -

जैन दर्शन प्रत्येक व्यक्ति तो क्या प्रत्येक प्राणी के मध्य एक्य स्थापित - करने पर बल देता है । प्रत्येक प्राणी की आत्मा क्रो अपनी आत्मा के समान मानने का उपदेश देता हैऊँच-नीच जाति- कुल, लिंग आदि के भेद-भाव को जैन दर्शन मान्यता नहीं देता । वस्तुत: सामाजिक भेद-भाव उच्च-नीच वर्ण, कुल तथा अत्यधिक धनसंचय के कारण होता है । अत: जैन दर्शन कानून के द्वारा नहीं, धार्मिक आचरण द्वारा व्यक्ति की राग-द्वेष-कषाय की मनोवृजि पर अंकुश लगाता है, ताकि व्यक्ति-व्यक्ति के बीच भेद-भाव-जन्य खाई न बने । ऊपर समाजवादी व्यवस्था के प्रसंग में परिग्रह-परिमाण व्रत पर प्रकाश डाला गया है । यह व्रत आवश्यकता से अधिक धन-परिग्रह भोगोपभोग की वस्तुओं के संचय पर रोक लगाता है, जिससे व्रती व्यक्ति में धन-मद नहीं आ पाता, वह अन्य व्यक्तियों के प्रति सहिष्णु बनता है । आचार्य अमितगति द्वारा रचित सामायिक पाठ का पहला पद सत्वेषु मैत्री ............. विदप्स देव[५४] सभी जीवों के प्रति मैत्री और प्रमोद भाव का बढावा देता है । भोगोपभ,प्तो के प्रति जितनी तृष्णा होगी, उतनी तृप्ति नहीं. अशांति और अतृप्ति रह कर असंतोष ही रहेगा, मद व्याज में । स्वामी २ामन्तभद्र रचम्पूस्तोत्र में भगवान क्यु-थुनाथ की स्तुति करते हुए कहते हैं :-

"तृष्णार्चिष: परिदहन्ति न शातिरासा

मिष्टेन्द्रियार्थविभैव: परिवृद्धिरेव ।
स्थित्यैव कामपरितापहर निमित्त -
मित्यात्मवान्विषयसौख्यपराड्मुखोउभूतं" ।।[५५]

अर्थात् तृष्णाग्नि जीवों को सदा जलाती है । इन्द्रियों के प्रिय भोगों के द्वारा इन ज्वालाओं की शांति न होकर वृद्धि होती है । यह बात कुसुनाथस्वामी ने अनुभव द्वारा निश्चित की. तब उन्होंने शरीर के संताप का निवारण करने में निभिस्त रूप विषय सुखों के प्रति विमुखवृजि अंगीकार की, कारण वे आत्मावान थे ।

श्रर्वोदय' में सामाजिक न्याय सन्निहित है । स्वामी समन्तभद्र ने लगभग 1760 वर्ष पूर्व भगवान महावीर के अहिंसात्मक शासन को 'सर्वोदय तीर्थ' नाम दिया था, जो समाज की सर्व विपत्तियों का विनाशक है -

"सवापदामन्तकर निरन्त सर्वोदय तीर्थमिदं तवैव"।।[५६]

अथात् (भगवान महावीर का) सर्वोदय तीर्थ समस्त आपदाओं का निवारण करता है । परस्पर सद्भावना, सहानभूत, सच्चा प्रेम, और सहिष्णुता का निर्झर, अहिंसा के माध्यम से ही संभव जैनदर्शन को सारभूत तत्व है । यदि जीवों में संसार में रह कर भी संसारें से विरक्ति के भाव आ जाएँ तो संसार की सारी समस्याओं का हल स्वयुमेवु ही निकल आयेगा । सामाजिक अन्याय सहित सारी समस्याएँ मनुष्यकृत हैं और मनुष्य ही उसका समाधान निकाल सकते है । हजरत मसीह ने कहा था This world is a bridge, pass thou over it but build not upon it" यह जगत एक पुल के सदृश्य है उस पर होकर उस पार पहुँच जाओ पर उस पर मकान मत बनाओ । यहॉ जैन धर्म का उपदेश है ।

जैनदर्शन में आर्थिक न्याय _ संयम ही उपाय -

जैन धर्म के संयम और इच्छा निरोध के सिद्धान्तों द्वारा आर्थिक न्याय की स्थापना सहज ही संभव है । आर्थिक न्याय प्रत्येक व्यक्ति को इसलिये सुलभ नहीं है क्योंकि आर्थिक शक्ति का केन्द्रीकरण है, -यदि आर्थिक संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण हो और लोग इच्छांओ के प्रति अति महत्वाकांक्षी न हों तो कोई समस्या ही नहीं रहेगी प्रसिद्र अर्थशास्त्री फेडरिक वेन्धम जैनों के इच्छा-निरोध सिद्धान्त से बहुत प्रभावित था । उसने अपनी 'अर्थशास्त्र' नामक पुस्तक में लिखा है -

"But it is quite impossible to provide everybody with as many consumers goods, that is as high standard of living as he would like. If all persons were like jain members of as jndian sect, who try to subdue and extinguish there physical desires, it might be done. If consumer's good descended frequently and in abundance from heaven, it might be done, As things are, it cannot be done."[५७]

जैन इतिहास में राजनीतिक न्याय : प्राप्ति के सही उपाय

पूरा जैन दर्शन न्याय के सिद्धान्तों पर ही टिका है । अहिंसा में सभी प्रकार का न्याय गर्भित हैं । जैन दर्शन में लौकिक पदों की वांछा उपादेय नहीं मानी गयी है । सर्वोच्च पद जिसके सम्मुख सभी पद नगण्य है, को प्रधानता दी गयी है, अर्थात् ऐसा पद जिसके बाद कुछ चाहने को शेष नहीं रह जाता ।वह चिरन्तन पद है केवली भगवान का, सिद्धत्व मोक्ष या अनन्त ज्ञान अनन्त. दर्शन, अनन्त वीर्य और अनन्त सुख सहित आवागमन के चक से सदा-सदा के लिये मुक्ति । जैन दर्शन के अनुसार यह पद उन्हीं को मिलता है जो संसार के सभी परिग्रहों से निःशेष हो जाते हैं, साधना एवं संयम के मार्ग पर चल पडते हैं और समस्त कर्मो के क्षय प्रयत्नशील रहते है पू० भर्तृहरी ने वैराग्य शतक में लिखा है

"एकाकी निस्पृहो शांत: पाणिपात्रो दिगम्बर:।

कदाध्हं संभविष्यामि कर्मनिमूलन क्षमा:" ।।[५८]

अथात् हे भगवन्! मैं कब एकाकी बांछारहित शात दिगम्बर वेष धारण करूंगा, जब मेरे हाथ ही मेरे पात्र होंगे और मुझमें समस्त कर्मो के क्षय करनेकी शक्ति प्राप्त होगी ।

सार्वभौम और सार्वकालिक सुख वस्तुओं, पदों या राज्य के स्वामित्व में नहीं हैं क्योंकि वह स्थायी नहीं है, एक न एक दिन स्मप्त हुारएने वाली है । इस तथ्य क्रो एमर्सन ने भूमि के स्वामित्व को प्रतीक बनाकर बड़े सुंदर जा से व्यक्त किया है । विशालु-भूमि का स्वामी गर्व से कहता है यह उपुजाउ भूमि का स्वामी मैं हूँ. तब भूमि कहती है -

"They call me theirs

Who so controlled me;
Wished to stay and are gone,
How am I theirs'
If they cannot hold me,
But I hold them"[५९]

अर्थात् वो लोग मुझे अपनी स्वामित्व की कहते हैं जिनके द्वारा मैं नियंत्रित रही हूँ किन्तु उन प्रत्येक ने यहीं रहने की वांछा की किन्तु चले गये । तब मैं उनकी कैसे हो सकती हूँ जो मुझे अपनी पकड में नहीं रख सके, किन्तु मैंने उन्हें पकड़े रखा है । '

अन्याय तभी होता है जब व्यक्ति निपट स्वार्थवश प्रवृता हो किन्तु जैन दर्शन भावों की निर्मलता पर बल देता है । यदि हमारे गुयिग़म्निर्मलू होगे तो किसी के प्रति भी अन्याय नहीं होगा । जैन दर्शन में प्रत्येक भव्य जीव को मोक्ष का अधिकारी स्वीकार किया गया है, यहाँ तक कि शूद्र का भी धर्माचरण का अधिकार मान्य किया गया है -

"आचारानवद्यत्व शुचिरूवरकर: शारीरी च विशुद्धि:

"करोति शुद्रमपि देवद्विजतपस्विपरिकर्मसु योग्यम । ।"[६०]

अर्थात् सदाचार का निर्दोष पालन अर्थात् श्वपान और मांस भक्षण आदि को छोड्कर अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रहमुचर्य और परिग्रहपरिमाण इन व्रतों का एकदेश पालन करना, गह के वर्तन और वस्त्र आदि को साफ-सुथरा रखना और शारीरिक शुद्धि अर्थात अहिंसा आदि व्रत धारण स्वरूप प्रायश्चित विधि से व स्नान आदि से शरीर को निर्मल रखना. ये सद्गुण शूद्र को भी ईश्वर भक्ति तथा बाह्मण और तपस्वियों की पूजा परिचर्या के योग्य बना देते है ।

जैन धर्म के अनुसार इतर प्राणी एक मेंढक भी भगवान भक्ति द्वारा स्वर्ग में देव पद का अधिकारी हो जाता है, यथा :

"यदर्चा-भावेन प्रमुदित मना दर्दुर इह.

क्षणादासील्मर्गी गुण-गण-समृद्ध: सुख निधि: ।
लभन्ते सद्भक्ता: शिव सुख-समाज किमु तदा ।।
महावीर स्वामी नयन पथ-गामी भवतु में ।।4 ।।[६१]

अर्थात् जिसकी पूजा करने के भाव से हर्षित चित्त वाला मेंढक क्षणभर में ही अणिमा. महिमा आदि गुणों के समूह से युक्त, सुख से भरपूर स्वर्ग में देव हो गया तब जो सद्भक्त है वे अपनी भक्ति से मोक्ष सुख को प्राप्त करते है इसमें आश्चर्य की क्या बात है? ऐसे महावीर स्वामी हमारे नयनों में हमेशा निवास करते रहें ।

सारांश यह है कि प्रत्येक प्राणी, व्यक्ति या तिर्यन्व सभी को जैनधर्म उच्च पद प्राप्त करने का अधिकारी स्वीकार करता है । यही प्रशस्त न्याय है जो चिरन्तन और चिरस्थायी है, राजनीतिक पद तो सदैव अस्थिर रहते हैं ।

जैनो का दंड विधान : है तर्क युक्त और सप्रमाण :-

जहाँ तक दंडविधान और व्यक्ति- व्यक्ति के बीच विवादों के निपटने का प्रश्न है, जैन दर्शन, साहित्य और इतिहास में इसके उदाहरण क्यिमान हैं ।

करोड़ों वर्ष पूर्व जब लोग इस युग के आदिमकाल में ठीक से खेती और व्यापार करना भी नहीं जानते थे तब प्रथम तीर्थकर भगवान ?षभ देव के पूर्व हुए कुलकरों ने (मदु समयानुकूल दंड व्यवस्था का विधान किया था । उस समय अपराध मामूली थे अत: दंड भी अति साधारण था । आदि के पांच कुलकर अपराधी को डा' अर्थात हाय तुमने यह बुरा किया. मात्र इतना ही दण्ड देते थे । आगे के पांच डा-मा अर्थात् हाय तुमने यह बुरा किया अब नहीं करना तथा शेष कुलकर न्हा-मा-धिक' अर्थात् हाय तुमने यह बुरा किया, अब नहीं करना, धिक्कार है. इस प्रकार दण्ड देते थें"[६२] । ज्यों-ज्यों अपराध बडे दंडनीति को महत्त्व दिया जाने लगा । सोमदेव आचार्य लिखते हैं -

"श्रचिकित्सागम इव दोषविशुद्धिहेतुर्दण्ड:" ।। 1 ।।[६३]

अर्थात् प्रजा के दोषों को नष्ट करने में या दूर करने में दण्डनीति उसी प्रकार समर्थ है जिस प्रकार आयुर्वेदशास्त्र के अनुकूल औषधि का सेवन रोगी के समस्त वात, पित्त व कफ की विकृति को नष्ट करने में या दूर करने में समर्थ होता है । आगे लिखते है :-

"यथादोष दण्डप्रणयन दण्डनीति" ।। 2 ।।[६४]

अर्थात् अपराधी के लिये अपराध की न्यूनाधिकता के अनुसार ही दण्ड विधान दण्ड- नीति है । उक्त उदाहरण से सिद्ध है कि जैन आचार्य भी दण्डनीति की आवश्यक्ता अनुभव करते थे और अपराध की न्यूनाधिकता के अनुरूप दंड निश्चित करने को प्रमुखता देते थे ।

न्याय का यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि भले ही 1०० अपराधी छूट जाँए पर एक भी निरपराधी को दंडित नहीं होना चाहिये । जैन राज्यों में इस नियम का बहुत ही अच्छे ढंग से पालन किया जाता था । पूर्व में जैन धर्मावलंबी वृज्जिसंघ गणतंत्र (वैशाली) का उल्लेख किया गया है । इस गणतंत्र में प्रचलित न्याय पद्धति देखिये-

"वृज्जिसंघ अपनी विशिष्ट न्याय प्रणाली के लिये प्रसिद्ध था । परम्परा से चला आया 'वज्जिधर्म' यह था कि वज्जि के शासक यह चोर है, "अपराधी है" न कह कर व्यक्ति को ?.विनिश्चय महामात्य के हाथ में सौंप देते थे । वह विचार करता. अपराधी न होने पर छोड देता और अपराधी सिद्ध होने पर वह उसे व्यावहारिक (न्यायाध्यक्ष) को दे देता । वह भी अपराधी जानने पर सूत्रधार' को दे देता. सूत्रधार निरपराध होने पर छोड़ देता और अपराधी होने पर अष्टकुलिक को सुपुर्द कर देता । अष्टकुलिक सेनापति को, सेनापति उपराज को और चपराजम राजा को दे देता (जब सभी उपरोक्त अधिकारी व्यक्ति को दोषी माने, अन्यथा ये उसे छोड देते) राजा विचार करता, यदि अपराधी न हो तो उसे छोड देता और अपराधी होने पर 'प्रवेणि-पुस्तक (दण्ड विधान) के अनुसार दण्ड व्यवस्था करता था । इस प्रकार वैशाली गणतंत्र राज्य की न्याय व्यवस्था अत्यन्त दृढ़ और व्यवस्थित थी ।[६५]


अपील के इतने माध्यम तो आज भी नहीं है और मुख्य बात यह कि अपील अपराधी नहीं करता था. स्वयं न्यायाधीश उसे आगे के सक्षम न्यायालय में भेज देता था ।

(6) भारतमेंविचारअभिव्यक्तिउऊविश्वासूधर्मऔर उपासना की स्वतंत्रता है :-

"Freedom is the positive power ............. of doing or enjoying something worth doing or enjoying"[६६]

स्वतंत्रता उन कार्यो को करने अथवा उन वस्तुओं का उपभोग करने की शक्ति है जो करने अथवा उपभोग करने योग्य है ।

जर्मनी विचारक हीगेल कहते है कि आत्मा का सार स्वतंत्रता है, विश्व इतिहास रचतंत्रता की चेतना की प्रगति के सिवाय कुछ नहीं है

(The history of the world is none other than the progress of the consciousness of freedom.)

स्वतंत्रता व्यक्ति और समाज की प्रगति के लिए अनिवार्य है । भारतीय संविधान में विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक को दी है । विचार अभिव्यक्ति शब्दों द्वारा, लेखन, प्रकाशन और अभिनय द्वारा, चित्रों द्वारा, किसी भी विधि से हो सकती है । स्वतंत्रता पर कुछ तर्क सहित प्रतिबंध है ताकि समाज और राष्ट्र की अखंडता, सौहार्दता आदि सुनिश्चित रहे ।

स्वतंत्रताविचारअभिव्यक्तिउकी सत्यान्वेषण की कसौटी

विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध मे 'जॉन स्टुअर्ट मिल के विचार महत्त्वपूर्ण है वे लिखते है :-

"If all mankind minus one were of one opinion, mankind would be no more justified in silencing that one person than he, if he had the power, would be justified in silencing mankind."[६७]

अर्थात यदि एक व्यक्ति को छोड्कर सम्पूर्ण मानवजाति का एक ही विचार हो तो भी उस मानव जाति को उस एक व्यक्ति को चुप कर देने का इससे अधिक अधिकार नहीं हो सकता जितना उस व्यक्ति को, यदि उसमें ऐसा करने की शक्ति प्राप्त हो सम्पूर्ण मानव जाति को चुप करने का अधिकार न्याय संगत है । वैचारिक विभिन्नता प्रकट होने पर वास्तविक सत्य उद्घारित होता है । मिल आगे कहते है :-

"Nine out of ten cracks may be harmless idiots, but the tenth may be useful to mankind than most of the normal men put together."[६८]

अर्थात् दस सनकी लोगों में से नौ हानिरहित मूर्ख हो सकते हैं किन्तु दसवां सम्पूर्ण मानवजाति से भी अधिक उपयोगी हो सकता है।

जैन दर्शन में स्वतंत्रता :उच्चस्तरीयसमता -

जैन दर्शन में अत्यन्त उच्चस्तर की स्वतंत्रता स्वीकार की गयी है जहॉ प्राणीमात्र अर्थात् जीव द्रव्य न केवल अन्य सभी द्रव्यों से सर्वथा स्वतंत्र है, बल्कि प्रत्येक द्रव्य अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र हैं । पराधीनता का अर्थ है पर-पदार्थो का संयोग जहाँ जीव के साथ पर-पदार्थ-परिग्रह आदि जुडे वहीं वह परतंत्र हो गया । व्यक्ति को किसी ने पराधीन नहीं किया है बल्कि वह स्वयं इन्द्रियों का दास बन कर रह गया है, तभी प्रसिद्ध फांसीसी विचारक रूसो ने कहा था कि व्यक्ति स्वतंत्र पैदा होता है पर जन्म के बाद सर्वत्र बंधनों में जकड़ा हुआ है । अर्थात् अपनी इच्छाओं का स्वयं ही दास बन गया है ।

र्प्रासेद्ध विद्वान पं फूलचंद शास्त्री द्वारा लिखित फैन तत्वमीमांसा' की भूमिका में डॉ अशोक कुमार जी ने लिखा है -

"Pandit Ji considered the freedom of individual and self reliance the two wheels of Jainism. The freedom of individual here encompasses both the living and nonliving entities"[६९]

इसी पुस्तक के लेखक ने 'आत्मनिवेदन' शीर्षक में लिखा है - ' 'जैन दर्शन की समस्त तत्व प्ररूपणा व्यक्ति स्वातन्त्रय और स्थावलंबन के आधार पर हुई है । उसके निश्चय और व्यवहार नय तथा उसके यथासंभव उत्तर भेदोंकी लक्षण मीमांसा भी इसी आधार पर की गयी है ।[७०]

जीव सहित प्रत्येक द्रव्य की स्वतंत्रता का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं -

"परमार्थ से दो द्रव्यों और उनके गुण पर्यायों में किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है, चाहे वह निमित्त-नैमित्तिक संबंध हो या इाएय-इाायक संबंध आदि कोई भी संबंध क्यों नूर हो । सभी द्रव्य और उनके गुण-पर्याय अपने-अपने स्वरूप में निमग्न और स्वतंत्र हैं । विश्व में यह :एंकेंमोत्र ऐसा दर्शन है जो परमार्थ से ऐसी वस्तुव्यवस्था के आधार से सभी की. वास्तविक स्वतंत्रता का उद्घोष करता है ।[७१] अपने कथन की पुष्टि में आध्यात्मिक मथ 'समयसार' को उद्धृत करते हैं -

"नास्ति सर्वोऽपि सम्बन्ध: परद्रव्यात्यमतत्व यो: ।

कर्त्त -कर्मत्वसम्बच्यावे, तत्कर्तृता कुत: ।।[७२]

अर्थातु परद्रव्य और आत्मद्रव्य में किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है, तब फिर उनमें परस्पर कर्त्ता-कर्म सम्बन्ध भी नहीं बनता, इसलिए आत्मा परद्रव्य का कर्ता कैसे हो सकता है?

स्वतंत्रता-परतंत्रता की व्याख्या करते हुए पं. जी लिखते हैं -

"निश्चय से आत्माका पक्के साथ कारकपने का सबंध नहीं है जिससे कि यह जीव शुद्धात्म स्वभाव की प्रप्ति के लिए बादय सामग्री को ढूँढने की व्यग्रता से परतंत्र होते है ।[७३]

विचार अभिव्यक्ति की छूट : जैन दर्शन में है अटूट :-

व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य विचार विभिन्नता स्वाभाविक है क्योंकि विचार देशकाल परिस्थिति के अनुसार निर्मित होते हैं । अपनी-अपनी बौद्धिक क्षमता की इसमें मक्लपूर्ण भूमिका रहती है, अत: विचार समन्वय जरूरी है नहीं तो समाज में मतभेद के कारण अनेक विसंगतियाँ और पक्षपातपूर्ण व्यवहार आ जाता है और समाज विघटन की कगार पर पहुँच जाता है जैन धर्म / दर्शन में इस समस्या का सटीक, सर्वकालिक एवं सर्वस्वीकार निदान स्याद्वाद पद्धति है स्यात का हैं कथात्रचत अर्थात किसी अन्य दृष्टि से अर्थ अन्य है । पौद' का अर्थ है कथन । इस प्रकार स्यादवाद से तात्पर्य है वस्तु किसी दृष्टि से इस प्रकार है और अन्य दृष्टि से दूसरी प्रकार है । इस तरह किसी गुण विशेष को प्रमुख बनाकर कथन करना और उस समय वस्तु के अन्य गुणों को गौण करना, स्यादvाद पद्धति से वस्तु का निरूपण है -

एक उदाहरण से यह स्पष्ट है

"पिउ-पुत्त-णतु भबय-भाऊणं, एग-पुरिस-संबंधो ।

ण य सो एगस्स पिय त्ति सेसयाणं पिया होइ । ।"[७४]

अर्थात् एक ही पुरूष में पिता, पुत्र, पौत्र. भानेज भाई आदि अनेक संबंध होते है । एक समय में वह अपने पिता का पुत्र और अपने पुत्र का पिता होता है । अत: एक का पिता होने से वह सबका पिता नहीं होता ( यही स्थिति सब वस्तुओं की है) अर्थात् वस्तु 'अनेकान्तमय है, अनेकप्यर्मी है, और अपने-अपने स्थान पर सब सही हैं । इस सुत्र से विचार समन्वय बनता है और विवाद-राग-द्वेष, मतविभिन्नता को भी किसी दृष्टि से स्वीकार कर लिया जाता है - प्रत्येक के विचार स्वातच्छ को मान्यता दी जाती है ।

एक अन्य उदाहरण से यह और भी स्पष्ट हो जाता है ।

"एकेनाकर्षन्ती श्लथयन्ती वस्तुत्स्लमितरेण ।

अन्तेन जयति जैनी नीतिर्कथाननेत्रमिव -गोपी" ।। [७५]

अर्थात् जिस प्रकार ग्वालिन दही मन्धन करते समय अपने एक हाथ से रस्सी अपने एक तरफ खींचती है और उसी समय दूसरे हाथ को शिथिल कर देती है पर उसे छोड़ती नही हैं । दूसरी बार दूसरे हाथ की रस्सी का छोर अपनी ओर खींचती है और पहले हाथ की रस्सी ढीली कर देती है । इस प्रकार करते-करते सार वस्तु मक्सन(घी) को प्राप्त कर लेती है, उसी प्रकार स्यादवाद में एक दृष्टि को मुख्य किया जाता है. उस समय दूसरी को गौण और इस प्रकिया में क्लज्ञान का अमृत प्राप्त हो जाता है । इस पद्धति में विचार-वैषम्य या वाद-विवाद. विसंगति आदि कहाँ है? यह जैन धर्म का सबसे बड़ा सिद्धान्त विचारसमन्वय या विचार स्वातञ्ज है जो सभी उल-जलूल विवादों का एक मात्र हल है ।

जर्मन विद्वान प्रो. हर्मन जेकोबी ने लिखा है - "जैन धर्म के सिद्धान्त प्राचीन भारतीय तत्वज्ञान और धार्मिक पद्धतियों के अभ्यासियों के लिए बहुत मरूचपूर्ण है । इस स्याद्वादसे सर्वसत्य" का द्वारा खुल जाता है ।[७६] इस संबंधमें इंडिया आफिस लंदन के पूर्व प्रधान पुस्तकालयाध्यक्ष डी. थामसके उद्गार महत्वपूर्ण है -

"न्यायशास्त्र में जैन न्यायका स्थान बहुत ऊँचा है । स्याद्वाद का स्थान बड़ा गभीर है । वह वस्तुओं की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों पर अच्छा प्रकाश डालता है ।"[७७]

इस प्रकार सिद्ध है कि क्याद्वाद के द्वारा विचार-स्वातन्त्र्य या विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुत अधिक व्यापक बनाया जा सकता है ।

इस पंक्तियों के लेखक ने मार्च 1980 में 'जैन मित्र' में प्रकाशित एक लेख में लिखा था-

"आज शीतयुद्ध के काल में स्याद्वाद ही शाँति का एक अमोध अस्त्र है । संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र में कहा गया है कि युद्ध का जन्म मानव मस्तिष्क में होता है और वह होता है उसके एकांगी विचारों के कारण । पूरे विश्व में राजनीतिक तनाव का जो भयावह वातावरण दिखाई देता है उसका मूल कारण आर्थिक अथवा सैनिक सम्पन्नता या विपन्नता उतनी नहीं है जितनी वैचारिकविभिन्नता अथवा परस्पर विरोधी विचारधाराओं में दृढ एकांगी अन्ध भक्ति है ।

ऐसी स्थिति में सहिष्णुता की बहुत आवश्यकता है । मैं अपनी स्थितिमें सही हूँ इस विचार के साथ-साथ कम से कम यह भी स्वीकार किये जानेकी आवश्यकता है कि विशेष स्थितियोंमें अन्य भी सही हो सकते हैं । । 'मैं ही सही हूँ ' यह विचार ही सबसे अधिक खतरनाक है । यदि दुर्भाग्य से कभी तीसरा मुहायुद्ध हुआ तो वह इसी भूल के कारण होगा । अत: स्याद्वाद के द्वारा युद्ध रोका जा सकता है[७८]

स्वतंत्रता विश्वास, धर्म और उपासना की जरूरत है अहिंसा आराधना की

जैन धर्म और दर्शन में अहिंसा और जीव दया को ही धर्म माना है वही विश्वास है और वही सच्ची उपासना है ।

आचार्य सोमदेव सूरि लिखते हैं

"एका जीवदयैकत्र परत्र सकला: किया: ।

वरं फलं पूर्वत्र कृषेश्चिन्तामणेरिव । ।"[७९]

अर्थात् अकेली जीव दया एक ओर है और बाकी की समस्त कियाएँ दूसरी ओर हैं, अर्थात् अन्य समस्त धार्मिक क्रियाओ (दान. पूजा, तीर्थयात्रा आदि) का फल खेती करने सरीखा है (भविष्य कालीन-अन्न, पैदा हो, न भी हो) और जीव दयाका फल चिन्तामणि रत्न की तरह है अर्थात् चाही हुई चिन्तित वस्तु तत्काल देता है ।

इसी प्रकार का अन्य उदाहरण -

"दुयानदी महातीरे सर्वेधर्मास्तृणाङ्करा: ।

तस्यां शोषमुपेताया कियन्नन्दन्ति ते चिरम । ।[८०]

अर्थात् संसार में जितने भी दान, शील जप, तप आदि पुण्य काय हैं उन सब में समता खाहिंसा-प्राणी रक्षा) का स्थान सर्व श्रेष्ठ है, क्योंकि दयारूपी नदीके किनारे अन्य सवधर्म ( दया. शील आदि) तृण और घास की तरह उत्पन्न होते हैं, अत: उसके (प्राणी रक्षा रूपी नदी) सूख जाने पर अन्य धर्म किस प्रकार सुरक्षित रह सकते हैं?

इस प्रकार सच्ची व फलदायी पूजा, उपासना, विश्वास एवं धर्म सभी जीवदया अहिंसा में गर्भित है जिसके लिये किसी स्वतंत्रता का कानूनी प्रावधान आवश्यक नहीं है सभी प्राणी स्वतंत्रता पूर्वक उसे अपना कर अपना कल्याण कर सकते हैं । वैसे सभी धर्मो ने अहिंसा के महत्त्व को स्वीकार किया है । अपने-अपने विवेक से प्रत्येक व्यक्ति 7 प्राणी, जीव इसे अपनी अपनी सामर्थ्यानुसार अपना सकता है । कहा भी है -

"धर्म न बाड़ी नीयजे, धर्म न हाट विकाय ।

धर्म विवेकी नीयजे, जे समझे ते थाय । ।[८१]

जैसा कि पूर्व में भगवत् भक्ति करने पर मेढक क्षणमें प्राण त्याग कर स्वर्गमें देवता बन गया था, का उल्लेख किया है इससे सिद्ध है कि जीव मात्र को जिनेन्द्र भगवान भी पूजा भक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है

जैन आराधना कथा में एक धीवर 'मच्छीमार' की कन्या काणा की कथा आती है जो 'जैनधर्म' का उपदेश श्रवणकर 'क्षुल्लिका' व्रत अंगीकार कर और तपस्या कर स्वर्ग गई ।[८२]

आराधना कथा कोष की एक अन्य कथा मृगध्वज की है जो भैसों तक का मांस खा जाता था - बाद में मुनिदता नामक मुनिजी से जिन दीक्षा लेकर तप क्रिया तथा समस्त कर्मो का नाश कर सिद्धपरमात्मा बन गया जिसे सभी जैनी श्रद्धा से शीश झुकाते है। [८३]

जैन इतिहास में ऐसे सैकडों उदाहरण उपलब्ध है जहाँ तथाकथित नीच व्यक्तियों, महिलाओं, यहाँ तक कि पशुओं ने जैन धर्म के सिद्धान्त अपना कर अपना कल्याण किया है जिससे सिद्ध है कि जैनधर्म में पूजा विश्वास एवं उपासना की पूर्ण स्वतंत्रता है ।

जैन दर्शन में सभी स्तर के लोगों को अपनी-अपनी सामर्थ्यानुसार धर्माचरण करने की स्वतंत्रता है । जैनधर्म में तीन प्रकार के श्रावक बतलाए गये है, पाक्षिक. नैष्ठिक एवं साधक । पाक्षिक श्रप्तवक वह है जो कम से कम कुलाचार का पालन करते हुए नित्यदेवदर्शन रात्रिभोजन त्याग, एवं पानी छानकर पीना. हिंसा आदि पांच पापों का स्थूल रूप में त्याग करता है व देव, शास्त्र, गुरू पर श्रद्धा रखता है तथा मद्य, मांस आदि का त्याग करता है । जो उक्त आचरण नहीं करता वह जाति से जैन होते हुए भी सच्चा जैन नहीं है । नैष्ठिक श्रावक वह है जो श्रावक के 12 व्रतों का (अहिसादि पांच. 3 गुणव्रत. चार शिक्षाव्रत) निरतिचार पालन केरता है, तथा कम से प्रतिमाओं के आचरण स्वीकार करता है । साधक श्रावक- जब नैष्ठिक श्रावक 11 वीं प्रतिमा के आचरण का पालन करने लगता है, उसे साधक श्रावक कहते है । वह अपने जीवन के अंतिम समय में सल्लेखना पूर्वक मरण करता है</ref>विस्तार के लिये देखिये -अमृताचन्द्राचार्य द्वारा प्रणयित ग्रंथ पुरतषार्थसिद्धयुपाय</ref> इन्हें क्षुल्लक. एलक के नाम से भी जाना जाता है । उत्कृष्ट श्रावक ( क्षुल्लक-ऐलक) के पश्चात महाव्रती मुनि आते है जो अपने पास तिल-तुष भी परिग्रह नही रखते हैं । समस्त आरंभ, परिग्रह और ओवषयाभिलाषा से सर्वथा दूर रहते हैं । यह सब उल्लेख करने का तात्पर्य यह है कि जैनधर्म अपने अनुयायियों को धर्माचरण में पूरी स्वतंत्रता प्रदान करता है. वह चाहे तो धर्माचरण के उक्त वर्णित सिद्धान्तों को कमश: अपना सकता है या येंदि सामर्थ्य है तो सीधे मुनि भी बन सकता हैं । जैनधर्म का द्वार भी सभी के लिए खुला है. यदि वह भावों एवं आचरण की परिशुद्धता के साथ यहीं प्रवेश करता है । जैनधर्म में उपासना पद्धति में भी पर्याप्त स्वतंत्रता है । स्वयं जैनों में तेरहपंथ बीसपंथ निश्चयमार्गी व्यवहारमार्गी, तारणपथी श्वेताम्बर जैनों में मूर्तिमार्गी शारत्रमार्गी स्थानकवासी, गुजरात के कच्छी, राजस्थान के ओसवाल आदि में अनेक उपासना पद्धतियाँ प्रचलित हैं जिनके अनुसार उपासना करने की सभीको पूर्ण स्वतंत्रता हैं. इस पर भी जैन होने के नाते वे सभी एक हैं । तीर्थकरों को अपना इष्ट मानते है तथा मुख्य जैनपर्वों में एक साथ भाग लेते हैं, जैसे 'महावीर जयंती' आदि सभी पंथ एक साथ मिलकर मनाते है । अनेक स्थानों पर 'सकल जैन समाज' संगठन भी बने हुए है । इससे सिद्ध है कि 'विभिन्नताओं में एकता' यहीं विद्यमान है ।

भारत में प्रत्येक नागरिक को प्रतिष्ठा व अवसर की समानता उपलब्ध है:

राजनीतिक दृष्टिसे समानता का अर्थ है राज्य द्वारा व्यक्ति-व्यक्ति के बीच जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान, गरीब-अमीर आदि के आधार पर भेद-भाव नहीं करना अर्थात् विशेषाधिकारों का अन्त तथा प्रत्येक व्यक्ति को विकास करने के पर्याप्त अवसर उपलव्य कराना । इस तरह समानता के दो रूप हैं -नकारात्मक और सकारात्मक । नकारात्मक का अर्थ है विशेषाधिकारों का अन्त । सकारात्मक का अर्थ है सभी व्यक्तियों को विकास के पर्याप्त समान अवसर प्रदान करना ।

प्रतिष्ठा की समानता : जैन दर्शन की महानता :-

जैन धर्म का यह अमिट सिद्धान्त है कि 'अपने समान सभी को समझो' देखिए -

"जह ते न पिय दुक्खं, जाणिय एमेव सबजीवाणं ।

सैबायरमुकचचो अन्तोवम्मेण कुणसु दयं । ।"[८४]

अर्थ के लिए आचार्य विबासागर जी का निम्न पद्यानुवाद सटीक है -

"जैसा तुम्हें दुख कदापि नहीं सुहाता,

वैसा अभीष्ट पर को दुख हो न पाता ।
जानो उन्हें निज समान दया दिखाओ
सम्मान मान उनको मन से दिलाओ । ।"[८५]

प्रतिष्ठा की समानता की पुष्टि करते हुए स्वामी समंतभद्र लिखते है

"सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातq:गदेहजम् ।

देवा देवं विदुर्भस्मगूढागारान्तरौजसम् । ।[८६]

अर्थात् चाण्डाल कुल में उत्पन्न होने पर भी यदि कोई पुरूष सम्यदर्शन से सम्पन्न है तो उसे गणधरादिक देव आदर योग्य कहते हैं क्योंकि जिसका मन सदा धर्म में लगा रहता है उसे देव भी नमस्कार करते हैं । ऐसा पुरूष का तेज भस्म से आच्छादित अङ्गार के भीतरी तेज के समान होता है । यहाँ कुल, जाति, ऐश्वर्य आदि की सम्पन्नता से व्यक्ति की प्रतिष्ठा नहीं. अपितु सम्यग्ज्ञानादि गुशों से ही होती है

श्री रविषणाचार्य भी पद्मपुराण में कहते है -

"चातुर्वर्ण्य यथान्यच्च चाण्डालादिविशेषणम्

सर्वमाचारभेदेन प्रसिद्ध भुवने गतम् । ।"[८७]

अर्थात् ब्राह्ममण क्षत्रिय, वैश्य शूद या चाण्डालादि का तमाम विभाग आचरण के भेद से ही लोक में प्रसिद्ध हुआ है ।

संत तागा स्वामी ने भी अपने "खातिका विशेष ग्रन्थ" में ऊँच-नीच के भेद-भाव का खंडन कर समानता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है

"ऊँच-नीच दृश्यते तद् निगोद खांडे दृश्यते ।[८८]

अर्थात् जो मनुष्य अभिमान के वशीभूत होकर दूसरों को नीचा और अपने को ऊँचा समझता है वह निगोद में जन्म लेता है ।

अवसर की समानता : प्रचुर मात्रा में उपलब्धता -

जैन धर्म की मान्यता है कि प्रत्येक भव्य जीव में अनन्त शक्तियों का वास है, यहाँ तक कि उसमें भगवान बनने की शक्ति है । जब साधना के बल पर सभी को भगवान बनने के समान अवसर उपलव्य हैं तो छोटे-मोटे पदों की क्या विसात? ऊपर विरत्तार पूर्वक उदाहरण सहित वर्णन किया गया है कि चांडाल, चोर. धीवर, आदि को उनके परिणामों की निर्मलता के आधार पर प्रतिष्ठित किया गया है ।

जैन दर्शन खुले आम घोषणा करता है -

"जीवहँ तिहुयण- संठीयहँ मुढ भेउ करति

केवल-णाणिं णाणि फुडु रनयलु वि एक्कु मुणंति ।।96।।[८९]

अर्थात् तीन लोक में रहने वाले जीवों का अज्ञानी भेद करते हैं । जीवपने से कोई कम-बढ़ नहीं है । कर्म के उदय से शरीर भेद है परन्तु द्रव्यकर सव समान हैं । जैसे सोने में वान भेद है (विभिन्न वस्त्रों में लपेटने पर) वैसे ही पर के संयोग से भेद मालूम होता है, तो भी स्वर्णपने से सब समान है ।

आगे और लिखते हैं :-

बुज्यंतहँ परात्यु जिय गुरू लहु अत्थि ण कोइ ।

जीवा सयल वि बंभु परू जेण वियाणइ सोइ ।।94।।[९०]

अर्थात् जो परमार्थ को नहीं कता वह परिग्रह से गुरूता समझता है और परिग्रह न होने से लघुपन जानता है । यही भूल है । यद्यपि गुरूता-लघुता कर्म के आवरण से जीवों में पाई जाती है तो भी शुद्ध नय से सब समान हैं ब्रह्म अर्थात् सिद्ध परमेष्ठी केवलज्ञान से सबको देखते हैं, उसी प्रकार निश्चय नय से सम्यग्दृष्टि सब जीवों को शुद्धरूप ही देखता है ।

जैन दर्शन लक्षण की दृष्टि से व्यक्ति-व्यक्ति में भेद नहीं करता. सबको प्रगति करने का अवसर प्रदान करता है, यथा-

"जीवहँ लक्सणु जिणवरहि भासिउ दंसण-णाणु ।

तेण ण किज्जइ भेउ तहँ जइ मणि जाउ विहाणु ।।98।।[९१]

अर्थात् जीवों का लक्षण जिनेन्द्र देव ने दर्शन और इगन कहा है इसलिए उन जीवों में भेद मत कर, अगर तेरे मन में ज्ञान रूपी सूर्य का उदय हो गया है अर्थात् हे शिष्य तू सबको समान जान ।

इसी ग्रन्थ में आगे कहा गया है

"राय-दोस बे परिहरिवि जे सम जीव णियति ।

ते सम-भावि परिडिया लहु णिबाणु लहति ।।100।।[९२]

अर्थात् जो रागद्वेष को दूर कर सब जीवों को समान जानते हैं वे साधु समभाव में विराजमान शीघ्र ही मोक्ष को पाते हैं ।

अवसर की समानता इससे बढ़कर क्या होगी जो प्रत्येक जीव को मोक्ष का अधिकारी मानता है ।

ग्रन्थकार अपने-आप को सम्बोधित करते हुए कहते हैं -

एक्क करे मण बिण्णि करि मै करि वण्ण-विसेसु ।

इक्कइँ देवइँ जें वराह तिहुयणु एहु असेसु ।।1०7।।[९३]

अर्थात् - हे आत्मन्! तू जाति की अपेक्षा सब जीवों को एक जान इसलिये राग और द्वेष मत कर ( वर्ण विशेष) । मनुष्य जाति की अपेक्षा ब्रादमणादि वर्ण भेद भी मत कर । अभेद नय से शुद्ध आत्मा के समान ये सब तीन लोक में रहने वाली जीव राशि ठहरी हुई है (वसति) ।

इसी ग्रन्ध 'परमात्मा-प्रकाश की भूमिका में प्रसिद्ध विद्वान ए.एन.उपाध्ये लिखते है -

"Souls should not be differentiated from each other; all of them are embodiment's of knowledge; all of them really free birth and death so far as their spatial extension is concerned, and all of them are characterized by Darshana and Jnana"[९४]

अर्थात् आत्माएँ एक दूसरे से भिन्न नहीं मानी जानी चाहिए । वे सब प्रत्येक इग़न के मूर्त रूप हैं और उनके आकाशीय प्रदेशों के विस्तार के मान से वे वास्तव में जन्म और मृत्यु से परे हैं और दर्शन-ज्ञान उन सभी की विशेषता है ।

इस प्रकार जैन दर्शन में प्राणीमात्र को समान अवसर प्राप्त हैं । वह चाहें तो अपने आचरण और भावों की शुद्धि के बल पर परमपद प्राप्त कर सकता है।

व्यक्ति की गरिमा व राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिशिचत करने वाली बंधुता

जैन दर्शन की गुण- ग्राहकता : विश्व-व्यापी बंधुता

जैन दर्शन का अमर वाक्य 'परस्परोपग्रहो जीवानाम'[९५] बंधुता को सुनिश्चित करता है । जीव परस्पर उपकार कुरते हैं, अर्थात् एक दूसरे पर उपकार कर बंधुता को बढावा देते हैं । जैनदर्शन में बंधुता को बढाने.' वाले अनेक सूत्र हैं । उदाहरणस्वरूप, यदि व्यक्ति को नीच गोत्र से बचना है तो उसे परस्पर बंधुताको नष्ट करने वाली दूसरोंकी निंदा करना छोड़नी होगी -

'परात्मनिदाप्रशसे सदसद्गुणोच्छानोद्भावने च

नीचैर्गोत्रस्य' ।।25।।[९६]

अर्थात् दूसरों की निंदा और अपनी प्रशंसा करना, दूसरों के मौजूद गुणों को ढांकना और अपने झूठे गुणों को प्रकट करना, नीच गोत्रकर्म के आश्रव है। उक्त प्रवृजि से परस्पर मनोमालिन्य होता है जो बंयुतामें बाधक है ।

इसी प्रकार दान की प्रवृजि को बढ़ावा देने वाले सूत्र है -

'अनुग्रहार्थ स्वस्यातिसर्गो दानम्' ।।[९७]

अथात् अपने और पर के उपकार के लिये (स्वस्थ) धनादिक का त्याग करना दान है । विपत्ति के समय दान देना बंधुता की वृद्धि का कारण है।

बंधुता को बढाने वाली निम्न चार भावनाओं का निरन्तर चिन्तन करते रहने का उपदेश है-

'मैत्री प्रमोदकारूण्यमाध्यस्थयानि सत्वगुणाधिकक्लिस्श्यमानधिवनयेबु ' ।।[९८]

अर्थात् सामान्य से सभी प्राणियों व्यक्तियों के प्रति मैत्री भाव. अपने से अधिक गुणी के प्रति प्रमोद भाव, दुखी जीवों के प्रति करूणाभाव और विपरीत बुद्धि वालों के प्रति मध्यस्थ भाव होना चाहिये । इसी प्रकार के विचार आचार्य सोमदेव ने भी व्यक्त किये हैं ।

मैत्रीप्रमोदकारूण्यमाध्यस्थानि यथाक्रमम् ।

क्ले गुणाधिके क्लिष्टे निर्गुणोऽपि च भावयेत[९९]

जैनधर्म में तीर्थकर प्रकृति के बंध की हेतु सोलहकारण भावनाओं में एक भावना वात्सल्य भावना है। इसी प्रकार सम्यक्ल के आठ गुणों में एक अंग .वात्सल्य अंग है । वात्सल्य अंग का वर्णन करते हुए पं. दौलतराम जी लिखते है -

"धर्मी सो गउ-वच्छ-प्रीति सम, कर जिनधर्म दिपावै ।"[१००]

अर्थात् श्रावक को धर्मी से गौ-वच्छ सम प्रीति होनी चाहिए । जैसे गाय बछड़े से स्नेह रखती है । किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि जो धर्माचरण नहीं करते उनसे द्वेष हो - उनके प्रति नीतिकारो ने माध्यस्थ भाव बताया है क्योंकि जैनदर्शन ने सर्वाधिक महत्त्व क्षमाधर्म को दिया है । यथा -

"खम्मामि सबजीवाणं, सबे जीवा खमंतु में

मित्ती मे सबभूदेसु, वेरं मच्छ ण केण वि" ।[१०१]

अर्थात् मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ । सारे जीव मुझे क्षमा करें सम्पूर्ण जगतके प्रति मेरा मैत्रीभाव है, मेरा किसी से बैर नहीं है ।

इस प्रकार मैत्री, प्रमोद कारूण्य क्षमा, माध्यरयभाव, दान. परोपकार आदि भावों से पुष्ट जैनधर्मानुयायी से जगत के समस्त जीवों के प्रति बंधुता रखना एवं व्यक्ति की गरिमा बनाए रखने की अपेक्षा की गयी है जिससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है ।

राष्ट्रीय एकता : जैनधर्म की विशेषता

जैनधर्म राष्ट्रीय एकता के प्रति सदैव सजग और सावधान रहा है । मूलत: अहिंसापरक धर्म होते हुए भी राष्ट्र रक्षा में उसे शस्त्र उठाने की आज्ञा दी हुई है ।

सर्वधर्म समभाव, धर्मनिरपेक्षता, जाति, वर्ण आदि के भेद-भाव के बिना समस्त जीवों के प्रति मैत्रीभाव. पशु. तिर्यत्र्च चाण्डाल, शूद्र आदि तक को धर्माचरण करने की स्वतंत्रता आदिका वर्णन पूर्व में विरतार पूर्वक उदाहरण सहित दिया गया है जिससे स्कृँव सिद्ध है कि व्यी_क्त की गरिमा व प्रतिष्ठा जैन धर्म में पूर्ण रूपेण सुरक्षित है । सभी जीवों के प्रति समता भाव बनाए रुखने से राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित रहती है । देश की अखंडता बनाए रखने के संबंध में जैन राजाओं द्वारा अपने राज्यों की संप्रभुता बनाए? रखने की दृढ़ इच्छाशक्ति का पूर्व में सोदाहरण वर्णन किया गया है ।

आचार्य सोमदेव ने राष्ट्रीयता की रक्षा हेतु सूत्र दिया है -

"समस्तपक्षपातेषु स्वदेशपक्षपातो महान"।। 6 ।।[१०२]

राष्ट्र की अखंडता और रक्षाके लिए सोमदेव राजाको उपदेश देते है -

"भूम्यर्थ नृपाणां नयो विकमश्च न भूमित्यागाय"।[१०३]

अर्थात् राजा की समस्त नीति और पराकम की सार्थकता अपनी भूमिकी रक्षा और वृद्धि के लिए होती है. न कि भूमि के परित्याग के लिये । राष्ट्र हित में राष्ट्र में सदैव शांति बनी रहे ताकि विघटनकारी शक्तियाँ सिर न उठावें इसके लिए प्रार्थना की गयी है -

"संपूजकानां प्रतिपालकानां यतीन्द्र सामान्य तपोधनानामू ।

देहस्य राष्ट्ररच पुरस्य राहा: करोतु शांति भगवज्जिनेन्द्र:।।[१०४]

अर्थात् पूजा करने वालों को, प्रजा के रक्षकों को, मुनीन्द्रों को, और सामान्य तपस्वियों को तथा देश, राष्ट्र नगर, और राजा को भगवान जिनेन्द्र शांति प्रदान करें ।

जैन धर्म में श्रावक और साधक (मुनिगण) दोनों के लिए समान रूप से यथाशक्ति दश धर्म पालन करने का उपदेश है

"उन्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपरूयागाकिअच्न्य ब्रह्मचर्याणि धर्म:।।[१०५]

अर्थात् उत्तम क्षमा, मार्दव, उत्तम आर्जव उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम. उत्तम तप उत्तम त्याग, आकिचन एवं उत्तम ब्रह्मचर्य ये दश धर्म हैं ।

ये सब इतने मानवीय श्रेष्ठतम गुण हैं जिन्हें अपनाकर जिनका मन, वचन, काय से पालन कर व्यक्ति देवता की श्रेणी में पहुँच जाता है । ऐसे दैवीय गुण से सम्पन्न व्यक्ति में सहिष्णुता. सदाशयता, सदाचार, समन्वयपरकता आदि गुण अनायास ही आ जाते हैं । ऐसा व्यक्ति अन्य दूसरे व्यक्तियों की गरिमा तथा प्रतिष्ठा को अपने समान मानकर अक्षुण्ण बनाने का प्रयास करता है, कभी किसी की निंदा नहीं करेगा. सबसे सहयोग करेगा इस प्रकार राष्ट्रीय हित का संबर्द्धन करेगा ।

तीर्थंकर का समवशरण : समता व एकता का अद्भुत मिश्रण

तीर्थकर भगवान की धर्म देशना के लिए कुबेर द्वारा समवशरण की दृचना की जाती है, जहाँ सभी प्राणी बैठकर भगवान की दिव्य देशना सुनते हैं । समवशरण का अर्थ है समस्शरण अर्थात् जहाँ सबको समानरूप से शरण प्राप्त हो वह समवशरण है । इसमें बारह कक्ष होते हैं । जिनमें कमश मुनि, कल्पवासिनी देवियाँ, आर्यिकाएँ महारानियाँ एवं अन्य महिलाएँ, ज्योतिषी देवो की देवियाँ, व्यंतरों की देवियाँ. भवनवासी देवों की देवियाँ. भवनवासी देव. व्यंतर देव, ज्योतिषी देव. कल्पवासी देव और सम्राट सहित सभी पुरूष वर्ग तथा अन्तिम कक्ष में मृग, मृगेन्द्रादि सभी पशु, पक्षी। तीर्थकर का यह समवशरण राष्ट्रीय एकता का ज्वलन्त उदाहरण है । 11 वें नम्बर के एक ही कक्ष में सम्राट चकवर्ती, सामन्त, मंत्री, अन्य-अन्य प्रजाजन, सामान्य से सामान्य पुरूष सभी एक साथ बैठते हैं - सम्राट का पृथक से सिंहासन नहीं होता । इसी प्रकार तीसरे नम्बर के कक्ष में महारानी सहित २२भी साधारण महिलाएँ बैठती हैं - यहाँ छोटे-बड़े का भेदभाव समाप्त हो जाता है । सभी अन्तर्विरोध समाप्त हो जाते है। पशुपक्षी भी अपना जातिगत भेद-भाव छोड्कर मृग-मृगेन्द्र सर्प-गरूड़ सिंह-बकरी, मार्जार-मूषक आदि सब एक साथ बैठकर तीर्थकर का धर्मोपदेश श्रवण करते है । समानता' स्वतंत्रता, व्यक्ति की प्रतिष्ठा, गरिमा, सामख्तू, समन्वय, सहिष्णुता. सद्भाव, राष्ट्रीय ही क्या सम्पूर्ण विश्ववासियों में एकता, अखंडता का ऐसा उदाहरण अन्यत्र कहाँ मिलेगा? समवशरण में अवस्थित मानरत्तंभ देखकर ही बड़े-बड़े मानियो का मान गलित हो जाता है । समस्त पारस्परिक बैर-भाव तिरोहित हो जाते हैं । भगवान की वाणी 'अर्ध मागधी' भाषा में खिरती है जो तत्कालीन बोल-चाल की भाषा थी । इसके साथ-साथ 18 मुख्य भाषाएँ एवं ?०० स्थानीय क्षेत्रीय भाषाओं में भी तीर्थंकर के धर्मोपदेश सुनाई देते हैं । इस तरह भाषा की दृष्टि से भी राष्ट्रीय एकता व अखंडता की पुष्टि होती है । राष्ट्रीय 'एकता व अखंडता को सबसे बड़ा खतरा प्राँतवाद क्षेत्रवाद, भाषा. जाति-वर्ण-मद ऊँच-नीच का भाव शिक्षित-अशिक्षित आदि विघठनकारी तत्वों के कारण होता है और तीर्थकर भगवान के समवशरण में इन सबका सर्वथा अभाव रहता है । यह समवशरण आत्मानुशासन का प्रतीक होता है । सब-जीव अपने-अपने नियत कक्ष में स्वमैंमव बैठ जाते हैं, किसी को व्यवस्था बनाए रखने हेतु नियत नहीं किया जाता और न कोई धक्का-मुक्की और न अगली सीट पर आगे निकल जाने की व्यग्रता व आकुलता, कोई कहीं भी बैठे सबको तीर्थकर भगवान समान रूप से दृष्टिगोचर होते है और सबको समान रूप से अपनी-अपनी भाषा में धर्मोपदेश समझ में आते हैं । यही सच्ची एकता है ।

श्री जुगलकिशोरजी ने 'मेरी भावना' का उपसंहार राष्ट्रीय एकता व उसकी उन्नति का आहान्य करते हुए इस पद से किया है-

"फैले प्रेम परस्पर जग में. मोह दूर ही रहा करे

अप्रिय-कटुक कठोर शब्द नहीं, कोई मुख से कहा करे ।
बनकर सब युगवीर' हदय से देशोन्नति रत रहा करें ।
वस्तु स्वरूप विचार खुशी से सब दुख संकट सहा करें ।।[१०६]

तीर्थकर महावीर की धर्मदेशना में जो समाज व्यवस्था बताई गयी थी उसकी उपयोगिता राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के लिये आज भी उपयोगी है -

"उनकी समाज व्यवस्था कर्मकाण्ड. लिग जाति, वर्ग आदि भेदों से मुका थी। इनकी समाज व्यवस्था का आधार अध्यात्म अहिंसा, नैतिक नियम और ऐसे धार्मिक नियम थे जिनका संबंध किसी भी जाति वर्ग या सम्प्रदाय से नहीं था । महावीर का सिद्धान्त है कि विश्व के समस्त प्राणियों के साथ आत्मीयता बंधुता और एकता का अनुभव किया जाय । अहिंसा द्वारा सबके कल्याण और उन्नति की भावना उत्पन्न होती है ।........... एकता की भावना अहिंसा का ही रूप है । कलह, फूट. द्वन्द और संघर्ष हिंसा है । ये हिंसक भावनाएँ सामाजिक जीवन में एकता और पारस्परिक विश्वास उत्पन्न नहीं कर सकती हैं ।

........................समस्त सामाजिक सदस्यों को एकता के सूत्र में अहिंसा के रूप, प्रेम. सहानुभूति, नम्रता, सत्यता आदि आबद्ध करते हैं । नम्रता और सहानुभूति को कमजोरी, कायरता और दुरभिमान नहीं माना जा सकता । इन गुणों का अर्थ हीनता नहीं, किन्तु आत्मिक समानता है । भौतिक बड़प्पन, वर्ग श्रेष्ठता, कुलीनता. धन और पदवियों का महत्त्व आध्यात्मिक दृष्टि से कुछ भी नहीं है । अतएव समाज को अहिसात्मक शक्तियों के द्वारा ही नियन्त्रित किया जा सकता है । [१०७]

उक्त विवरण से यह स्वयं सिद्ध है कि जैनधर्म जैनदर्शन व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने के प्रति सदैव सजग रहा है । तथा भारतीय संविधान में अन्तनिर्हित सभी मूल तत्व जैन दर्शन में युगों से समाहित रहें है ।

टिप्पणी

  1. ब्राइस, पीआरभाटिया द्वारा तुलनात्मक सरकारें -सिद्धान्त एवँ व्यचहार में उद्धृत,पृ. १०२
  2. गिल काइस्ट पूर्वोक्त पुस्तक, पृ. १०२
  3. बूल्लेतथैव
  4. सी.एफस्ट्रांग, देवीप्रसाद शुक्ल तथा वृजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव द्वारा. आधुनिक संविधानों के सिद्धान्त और व्यवहार का तुलनात्मक अध्ययन. में उद्धृत, पृ. २
  5. तथैव पृ. १
  6. बाबूलाल फडिया, राजनीति विइग़न के मूल सिद्धान्त, प्रथम संस्करण में उद्धृत, पृ. १४४
  7. भारत के संविधान की प्रस्तावना
  8. डॉ. बाबूलाल फाडिया एवं श्रीपाल जैन, भारतीय संघ व्यवस्था, ग्वालियर,. कैलाश पुस्तक सदन, 1982, पृ. 41 में उद्धृत
  9. भारत के संविधान की प्रस्तावना
  10. जिनसेनाचार्य महापुराण, द्वितीयभाग, चतुस्त्रिशतामं पर्व पृ. 156
  11. तथैव पअ_चत्रिशन्तमं पर्व, पृ. 182
  12. तथैव पृ. 182
  13. तथैव, पृ. 183
  14. तथैव पृ. 183
  15. तथैव पृ. 183
  16. तथैव, पृ. 185
  17. आचार्य जयसिंहनदि वरांग चरित, एकादश सर्ग. । संपादक डॉ ए .एन. उपाध्ये-अनुवादक खुशालचंद गोरावाला, भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत परिषद, वाराणसी, पृ. 183
  18. सोमदेव आचार्य यशस्तिलक चंपू भारतवर्षीय अनेकान्त विहस्त परिषद वाराणसी 1989-9० पूछ 54- 55
  19. रणवीर सिंह जैन एव कु. अजिन्दर चौहान, राजनीति विइप्तन के विभिन्नवाद कमल प्रकाशन, इन्दौर, 1966 द्वारा उद्धृत पृ. 115
  20. तथैव, पृ. 116
  21. जिनेन्द्र वर्णी (संकलक), समणसुतां अपरिग्रह सूत्र(।) आगम प्रकाशन, 53?3 जैनपुरी, रेवाडी 1996, 43 पृ 43
  22. तथैव, पृ. 43
  23. पू उमास्वामी रचित तत्त्वार्थसूत्र 6' 15
  24. तथैव 617
  25. देखिए डॉ नेमीचन्द शास्त्री तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन परिषद, 1974 वाराणसी, पू० 64 एवं 8०-81
  26. श्री शुभचन्द्राचार्य श्रेणिकपुराणम पंचम सर्ग, अनेकान्त विद्वत् परिषद. अनुवादक पं. धर्मचन्द्र शास्त्री, पृ. 85-अ
  27. तथैव, पृ. 79-82
  28. तथैव, पृ. 92
  29. आचार्य जयसिंघ्नंदी, वरांग चरित पूर्व में उल्लिखित ग्रन्थ एकादश सर्ग, पृष्ठ 189
  30. एच न्ही कामथ संविधान सभा विचार विवरण, वात्थूमापृँ 825 तथा डॉ अम्बेडकर संसदीय विचार विमर्श विवरण 1951 वार्न्द्वीद्वितयि भाग? ४. ५3
  31. भारत का संविधान, अनुच्छेद 25
  32. डॉ. प्रेमचंद्र जैन, संसदीय पत्रिका. खंड 33. अंक 2, जून 1987 लोकसभा सचिवालय, दिल्ली 1987, में पकाशित 'नेहरू और उनकी धमईनिरपेक्षता? लेख पृ. 12
  33. हैराल्ड लारकी, राइज ऑफ लिबेलिज्म एनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइन्सेज वात्थूम 1 - 2 पृ. 1०4
  34. पं. परमेष्ठीदास जैन धर्म की उदारता, ललितपुर जैनेन्द्र साहित्य सदन, पंचम आवृत्ति 1976
  35. स्वामी संभतभद्राचार्य रत्नकरण्डश्रावकाचार (पांचवा संस्करण), सागर, श्रीमुनिसंघ साहित्य प्रकाशन समिति, १995 पृ.5
  36. पं. परमेष्ठी दास जैन. पूर्वोक्त पुस्तक पृ. 2। पर उद्धृत 1
  37. पं. आशाधर जी सागारधर्मामृत शं22 सरल जैन ग्रन्ध भंडार, जबलपुर, वीर निर्वाण सम्बत् 2482 पृ. 84
  38. एस. सी. दिवाकर. 'रिलीजन एण्ड पीस', शुभचिंतक प्रेस, जबलपुर. 1962 में उद्धृत पृ. 26-27
  39. पं. सुमेरचंद जैन दिवाकर, जैन शासन, प्राव्य श्रमणभारती मुजक्ष्म?रसगर, चतुर्थसंस्करण
  40. जवाहरलाल नेहरू, एन आटोबाइयोग्राफी बम्बई, एलाइड पब्लिसर्स. फइवेट लि. 1962, पृ. 321
  41. जवाहरलाल नेहरू. विश्व इतिहास की झलक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1982. खंड न. पृ. 323
  42. तथैव, पृ. 98
  43. एडवर्ड बम्बाल्ड द्वारा संपादित 'दि पालिटीकल राइटिंग्स ऑफ थामस जेफरसन, (फोरम बुक्स), न्यूयार्क, दि लिबरल ?ब्राणंग प्रेस, 1955, पृ. 37
  44. एससीदिवाकर पूर्वोक्त पुस्तक पृ. 3०-31
  45. डी. एमबी. नियोगी-पूर्व मुख्य न्यायाधीश नागपुर उच्चन्यायालय एवं पूर्व कुलपति नागपुर विश्वविद्यालय, पं. सुमेरचंद दिवाकर कृत जैन शासन की भूमिका पृ. 21
  46. पू अमितगति सूरि, सामायिक पाठन बृहत् सामायिक पाठ, मूलचंद किशनदास कापडिया सूरत, वीर संवत 2473 पृ. 174
  47. हरिभद्र सूरि, लोक तत्त्व निर्णय ब्र. हेमचंद जैन हम; सच्चे परीक्षाप्रधानी बनीं, (धर्ममंगल पत्रिका मै प्रकाशित लेख). मार्च 2००8, सागदिका व प्रकाशक सौ. लीलावती जैन. 57 रनानेवडिा, पुणे पृ. 23 -24 पर उद्धृत ।
  48. विस्तार के लिए देखिये - सी. के. नागराजराव पट्टमहादेवी शातला (चार भागों में) भारतीय ज्ञान पीठ. नई दिल्ली चौथा संस्करण, 2००4
  49. विदृईादेव ने जैन कुल मे जन्म लिया और जैन धर्म का पालन भी - किन्तु एक वार उनकी पुत्री गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गयी । सभी चिकित्सा निकल होने पर हताश, ऐसे में विष्णुभक्त गुरन रामानुजाचार्य की औषधि से राजकुमारी ठीक हो गयी-चमत्कार ही था-राजा ने वचन दिया था कि जो भी राजकुमारी की रूग्णता को ठीक कर देगा वह जो भी मागेगा देगें - रामानुजाचार्य ने राजा से मतांतर मांग कर वैष्णव र्म अपनाने को कहा जो राजा ने स्वीकार किया ।
  50. तदैव पट्ट महादेवी शांतला पूर्व उद्घात भाग ३ पृष्ठ २२५
  51. तदैव, भाग ४ पृष्ठ 230
  52. तथैव, पृ. 413-414
  53. तथैव भाग 3 पृ. 2०3
  54. पूर्व में उद्धत टीप क्र. 42
  55. आ. समन्तभद्राचाय, वृ.स्वयम्यूस्तोत्र -82
  56. आ. समन्तभद्रयुक्तनुशासनहS, नथ श्लोक संग्रह. संकलक, आर्यिका जिनदेवीजी जैन ऑफसेट प्रिन्टर्स, नई दिल्ली, 2००6, पृ. 386
  57. फेंडरिक बैथम. इकॉनामिकस पृ. 8 पं. सुमेरचंद जैन दिवाकर द्वारा अपने ग्रन्ध जैन शासन' में उदृधत पृ. 3? 1 (प्राच्य श्रमणभारतीमुजफफरनगर द्वारा चतुर्थवृत्ति के रूप में प्रकाशित) अर्थात् प्रत्येक को सभी उपभोक्ता वस्तुओं, की प्ररस्वईं उतनी मात्रा में हो सके जितनी वह अपनी इच्छानुसार उच्च जीवन स्तर बनाए रखना चाहता है तो वह संभव नहीं है, ही यदि सभी लोग भारत में रहने वाले जैन वर्ग सदृश्य हो जाय जो अपनी शारीरिक इच्छाओं को संयत एवं निरोध करते है तो यह संभव है (सभी को इच्छानुसार प्राप्ति). दूसरे उपाय के रूप में यदि सभी उपभोग वस्तुएँ विपुल मात्रा में निरन्तर स्वर्ग रवे आती रहें तो भी यह संभव है । किन्तु आज की वश्वग्स्थइति में ऐसा नहीं किया जा सकता (क्योंकि सभी सही जैन नहीं है और वस्तुएँ स्वर्ग से आ नहीं सकतीं)
  58. आ. भर्तृहरी वैराग्यशतक. 89, डी. आशालता मलैया, संस्कृत शतक परम्परा और आचार्य विद्यासागर के शतक, 19अ (संकलक), जबलपुर, अनिल मुद्रणालय, 1989 पृ. 118
  59. जैसा कि श्री सुमरेचन्द्र दिवाकर जी ने अपने नथ, रिलीजन एण्ड पीस में उद्धृत किया है पृ. 25 पूर्व टीप क्र. 36
  60. आ. सोमदेव सूरि, नीतिवाक्यामृतम अनुवादक श्री सुंदरलाल शास्त्री, श्री वर्द्धमान मुद्रणालय, वाराणसी, 1976 पृ. 56
  61. श्री पं. भागचन्द्र जी भागेडकृत महावीराष्टक 4 था पद, 1०8 मुनि समतासागर जी द्वारा संकलित 'स्तुति-निकुंज' से उदधृत, सिंघई आर्ट प्रिन्टर्स, जबलपुर. 1998 पृ. 46
  62. मुनि प्रशान्त सागर जी, संकलनकर्ता. जिन सरस्वती शिक्षण, भाग 2. धर्मोदय प्रकाशन क्लीमनावाद (कटनी), पृ. 25
  63. आचार्य सोमदेव सूरी, नीतिवाक्यामृतम पूर्व टीप क. 56 में उद्धृत पृ. 67
  64. तथैव पृ. 68
  65. डी. नेमिचन्द्र शास्त्री. तीर्थकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा', अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत्परिषद्, वाराणसी, 1974 पृ. 81
  66. डॉ बाबूलाल फडीया राजनीति के मूल सिद्धांत, कैलाश पुस्तकसदन, ग्वालियर पृष्ठ 371 पर उद्धृत
  67. इकबाल नारायण प्रतिनिधि राजनीतिक विचारक, शिवलाल अग्रवाल एंड कम्पनी, इन्दोर, 1981 पृष्ठ 340 पर उद्धृत
  68. J.S. Mill, utilitarianism, Liv\beny and Representative Govt, Mac-millan, New yosk p 15
  69. पं. फूलचंद शास्त्री. जैन त्ख्यमीमौसा सिद्धान्ताचार्य पं. फूलचंद्र शास्त्री का .फाउन्डेशन, रूड़की पेज XXI
  70. तथैव, पृ. XXi
  71. तथैव, पृ. XXVIII
  72. तथैव, पृ. 45
  73. तथैव, पृ. 198
  74. समणसुत्तं : जैन गीता, उद्धत कथ. पृ. 211
  75. आचार्य अमृतचंद्र, 7225
  76. डी. सुमेर चन्द जैन दिवाकर द्वारा लिखित चैन शासन' से उद्धृत पृ. 169 (पूर्व उद्धृत गन्थ)
  77. तथैव
  78. डी. प्रेमचन्द जैन, तीर्थकर महावीर : जीवन और उपदेशामृत, जैनमित्र सूरत, दि. 27 मार्च. 19४० पृ. 16।
  79. आ. सोमदेव, यशस्तिलकचंपू (उत्तरखंड), अनुवादक पं. सुंदरलाल शास्त्री, भारतवर्षीय अनेकान्त कित् परिषद 1989-9० यू. 312
  80. नीतिवाक्यामृतम पूर्व उद्धृत ग्रन्ध में पं. सुन्दरलाल जी शास्त्री द्वारा संग्रहीत श्लोक पृ. 3
  81. आचार्य धर्मभूषण जैन दर्शन सार (पहला भाग) दि. जैन मंदिर समिति, गजियाबाद पृ. 25
  82. आराधना कथा कोष कथा क्र. 4, हिन्दी अनुवाद श्री - उदयलाल जी कासलीबाल राहुल सिस्टम प्रा लि. करोलबाग, नई दिल्ली जैसा कि पं. परमेष्ठीदास जैन द्वारा लिखित 'जैनधर्म की उदारता' में उद्धृत है, पृ. 32
  83. तथैव, पृ. 33
  84. समणसुत्तम जैनगीता द्य में उद्धृत मथ, पृ. 45
  85. तथैव, पृ. 46
  86. स्वामी समन्तभदू आचार्य, रत्नकरण्डश्रावकाचार,श्लोक 28 (पूर्व उद्धृत) पृ. ६७
  87. पं. परमेष्ठीदास जी द्वारा 'जैन धर्म की उदारता' नामक पुस्तक से उद्धृत पृ।2
  88. तथैव, पृ. 75
  89. स्वामी योगिडदेव, परमात्म प्रकाश, परम श्रुत प्रकाशक मंडल, श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम, अगास 1988. पृ. 214
  90. तथैव, पृ. 215
  91. तथैव 216
  92. तथैव 218
  93. तथैव 224
  94. तथैव 38
  95. श्री आचार्य उमास्वामी-: तत्त्वार्थ सूत्र, 5721
  96. तथैव, 6/25
  97. तथैव, पृ. 7/38
  98. तथैव, पृ. 7/11
  99. आचार्य सोमदेव यशस्तिलकचम्पू आश्वास:सप्रम श्लोक 65(पूर्व उद्धृत मथ) तुलना कीजिए अमितगति आचार्य द्वारा रचित सामायिक पाठ पूर्व टीप पर क्र० 42
  100. पं. दौलतरामजी छहढाल' 3/13
  101. समणसुतं पूर्वाक्त उद्घत गन्थ, पृ. २७
  102. आचार्य सोमदेव. नीतिवाक्यामृतम् पृ. ' 1 (छ प्लश गन्ध)
  103. तथैव, पृ. 255
  104. डी. ए.एन. उपाध्ये एवं पं. फूलचंद सिद्धान्त शास्त्री (संपादक) ज्ञानपीठ पूजाजलि पृ. 85
  105. पू उमास्वामी, मोक्षशारत्र (तत्वार्थ सूत्र) 9/16
  106. श्री जुगलकिशोर मुखार. मेरी भावना/11
  107. डॉ. नेमिचन्द्र शा२त्री. तीर्थकर, महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, खण्ड 1 (पूर्व उद्धृत ग्रन्ध) पृ. 6०1-०2


पूर्व निदेशक, जवाहरलाल नेहरु स्मृति महाविद्यालय

गंज बासौदा म०प्र०