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टेंशन का उपचार मेडीसिन नहीं मेडीटेशन है

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टेंशन का उपचार मेडीसिन नहीं मेडीटेशन है

—आचार्य विनम्रसागर जी महाराज

वर्तमान युग में जितने ज्यादा साधन सुविधाएँ उपलब्ध हुई उतना जीवन स्तर का विकास तो हुआ लेकिन आदमी आलसी और कमजोर होता गया। इस कमजोरी का एक लक्षण टेंशन भी है। साहसी और धैर्यवान प्राणी मुसीबतों में घबराते नहीं है उनसे डटकर मुकाबला करते हैं और कमजोर आदमी टेंशन कर बैठता है जिससे बी. पी. हाई और हार्ट अटैक जैसी घटनाएँ जीवन में घटित हो जाती हैं। कई लोग इसका उपचार कराते हुए कई प्रकार की दवाईयाँ खाते हैं लेकिन वे दवाईयाँ मन को बेहोश करने की होती हैं, मन को विस्तृत करने की नहीं होती। टेंशन का उपचार तभी होगा जब मन विशाल होगा, मन की विशालता धर्म के माहौल में होगी। खोज करें तो पाएँगे कि सबसे बड़ा विशाल मन कोई धर्मी का ही हुआ है और भविष्य में भी एक पक्षपात रहित धर्मी का ही होगा। मन में यदि सीमित वस्तुएँ समाती हैं तो मन विशाल नहीं होता और जब मन असीमित के लिए दौड़ लगाता है तो मन चेतन के साथ मिलकर अनंत के महल को छूने लगता है। टेंशन तभी होता है जब असीमित की चाह में सीमित हाथ लगे अथवा हम ज्यादा की आकांक्षा रखें और उपलब्ध कम हो सके टेंशन की मूल जड़ है हम जैसा चाहते हैं वैसा न होना अथवा अपेक्षा की उपेक्षा होना। इसे केवल आत्मध्यान के बल से ही मिटाया जा सकता है, कोई दवाईयों से नहीं।

आज तक जितने भी प्राणियों को टेंशन हुआ है वो हमेशा बाहरी वस्तुओं के कारण ही हुआ हैं, परिग्रह के कारण हुआ है। और जब भी आदमी टेंशन हुआ है तो आत्म ध्यान के बल से ही हुआ है पाश्चात्य देशों में और विदेशों में भोगों को अधिक महत्व दिया जाता है। वे हमेशा आत्मध्यान की तलाश में रहते हैं धर्म का सही तथ्य न समझ पाने के कारण थोड़ा सा योग लगाने पर शांति को ही वो ध्यान समझने लगते हैं। आत्मध्यान परमात्मा के नजदीक ले जाते हैं पर पदार्थ पराधीनता उत्पन्न करते हुए टेंशन बढ़ाते हैं। परम ध्यानादि से स्वाधीनता पैदा होती है। टेंशन के उपचार हेतु हम दवाएँ लेते हैं उन दवाओं का पदार्थ हमारी जागृत अवस्था को मारता है और हमारी सोचने की शक्ति को कमजोर करता है जबकि ध्यान जागृत भी करता है और ज्ञान भी बढ़ाता है।

टेंशन से हमारी धड़कन बढ़ जाती है और धड़कन के बढ़ने पर हमारी आयु कम हो जाती है। भय के कारण क्रोध, मान के कारण बीमारी और भोग के कारण हमारी धड़कान दुगनी तेज हो जाती हैं ऐसी अवस्था में हमारी उम्र कम हो जाती हैं। टेंशन हमें कभी—कभी अकाल मौत की ओर भी ले जाता है और अकाल मौत हमें दुर्गति की ओर ले जाती है। टेंशन से बचने के लिए धर्म ही एक अचूक दवा है लेकिन धर्म सर्व प्रथम यह कहता है कि आप धर्मी बनिये। पहले आप अपने जीवन को सदाचार और सज्जनता से भरपूर करिये उसके बाद धर्म का अनुभव हो सकेगा। जब तक हमारे मन की लगाम बाहर की वस्तुओं से जुड़ी रहेगी तभ तक टेंशन होना नामुमकिन है। इसलिए धर्म का उपचार आयुर्वेदिक है जिसमें रोग जड़मूल से नष्ट किया जाता है। आयुर्वेदिक में पथ्य भी होता है और उपचार भी होता है और मेडीसिन में पथ्य नहीं उपचार होता है जो भविष्य में फिर हो जाता है। अत: ध्यान के द्वारा ही हम सभी टेंशनों से मुक्त होकर स्वाभाविक अनुभव कर सकते हैं, यही जीवन का उपचार है।

‘[हकीकत का पैगाम’ से ]