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ढ़ाई द्वीप विधान

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ढाई द्वीप विधान -मंगलाचरण- अर्हन्तो मंगलं कुर्यु:, सिद्धा: कुर्युश्च मंगलम्। आचार्या: पाठकाश्चापि, साधवो मम मंगलम्।।१।। मंगलं जिनधर्म: स्यात्, जिनवाणी च मंगलम्। जिनार्चा जिनगेहाश्च, कुर्वन्तु मम मंगलम्।।२।। कृत्रिमाकृत्रिमा: सर्वे, नरलोके जिनालया:। कृताकृता जिनार्चाश्च, ते ता: कुर्वन्तु मंगलम्।।३।। चतुर्विंशतितीर्थेशा, भरतैरावतोद्भवा:। विदेहक्षेत्रजा: सर्वे, ते मे कुर्वन्तु मंगलम।।४।। त्रैलोक्यशिखराग्रे या, भाति सिद्धशिला शुभा। अनंतानंत-सिद्धेभ्यो, भृता कुर्यात् सुमंगलम्।।५।। अथ जिनयज्ञप्रतिज्ञापनाय मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -चौबोल छंद- इन ढाईद्वीप में जितने भी, तीर्थंकर गणधर औ यतिगण। वर्तमान केवलि श्रुतकेवलि, ऋषिगण आदिक उन्हें नमन।। पंचकल्याणक भूमि तथा अतिशययुत क्षेत्र सभी प्रणमूँ। कृत्रिम अकृत्रिम जिन प्रतिमा, जिनगृह को मैं नित्य नमूँ।।१।। पंच भरत पंचैरावत में, चौबिस जिनवर को प्रणमन। एक सौ साठ विदेहों के भी, सभी तीर्थकर को वंदन।। त्रिभुवन के मस्तक पर सिद्ध-शिला पर सिद्ध अनंतानंत। नमूँ नमूँ मैं सब सिद्धों को, पा जाऊँ मैं सौख्य अनंत।।२।। -दोहा- तीन शतक अट्ठानवे, जिनगृह शाश्वत नित्य। ढाईद्वीप के नित नमूँ, पाऊँ निजसुख नित्य।।३।। त्रैकालिक नवदेवता, कहे अनंतानंत। ढाईद्वीप के नमत ही, हों नवलब्धि अनंत।।४।। ढाईद्वीप से ही हुये, सिद्ध अनंतानंत। इक सौ सत्तर कर्मभू, यहीं हुए भगवंत।।५।। इन सबको नित भक्ति से, नमूँ अनंतों बार। जिन भक्ति ही एकली, करे भवोदधि पार।।६।। ढाईद्वीप विधान को, करो करावो भव्य। नवदेवों की भक्ति से, पावो निजसुख नव्य।।७।। अथ जिनयज्ञप्रतिज्ञापनाय मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। ढाईद्वीप पूजा (समुच्चय पूजा) -अथ स्थापना-शंभु छंद- अरिहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय सर्वसाधु परमेष्ठी हैं। जिनधर्म जिनागम जिनप्रतिमा जिनमंदिर सब जग पूजित हैं।। इन ढाईद्वीप में इक सौ सत्तर कर्मभूमि में ही ये हैं। इस ही प्रमाण है सिद्धशिला यहाँ से ही मुक्ती पाते हैं।।१।। -दोहा- पंचकल्याणक तीर्थ भी, ढाई द्वीप में मान्य। नमूँ नमूँ मैं भक्तियुत, पाऊँ निज सुख साम्य।।२।। ॐ ह्रीं सार्धद्व्यद्वीपसंंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरणपंचकल्याणकतीर्थसर्वसिद्धसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीसार्धद्व्यद्वीपसंंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरणपंचकल्याणकतीर्थसर्वसिद्धसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं श्रीसार्धद्व्यद्वीपसंंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरणपंचकल्याणकतीर्थसर्वसिद्धसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथ अष्टवंâ-शंभु छंद गंगा नदि का शुचि जल लेकर, प्रभु चरण चढ़ाने आये हैं। भव भव का कलिमल धोने को, श्रद्धा से अति हरषाये हैं।। ढाईद्वीपों के नव देवों को, नमें कल्याणकतीर्थ नमें। अकृत्रिम कृत्रिम जिनप्रतिमा, को सिद्धो को हम कोटि नमें।।१।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरणपंचकल्याणकतीर्थसर्वसिद्धेभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। हरिचंदन वुंâकुम गंध लिये, जिनचरण चढ़ाने आये हैं। मोहारिताप संतप्त हृदय, प्रभु शीतल करने आये हैं।।ढाई..।।२।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरण-पंचकल्याणकतीर्थ-सर्वसिद्धेभ्य: संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। क्षीराम्बुधि पेâन सदृश उज्ज्वल, अक्षत धोकर ले आये हैं। क्षय विरहित अक्षय सुख हेतु, प्रभु पुंज चढ़ाने आये हैं।।ढाई..।।३।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरण-पंचकल्याणकतीर्थ-सर्वसिद्धेभ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। बेला चंपक अरविंद कुमुद, सुरभित पुष्पों को लाये हैं। मदनारिजयी तव चरणों में, हम अर्पण करने आये हैं।।ढाई..।।४।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरण-पंचकल्याणकतीर्थ-सर्वसिद्धेभ्य: कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। पूरणपोली खाजा गूझा, मोदक आदिक बहु लाये हैं। निज आतम अनुभव अमृत हित, नैवेद्य चढ़ाने आये हैं।।ढाई..।।५।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरण-पंचकल्याणकतीर्थ-सर्वसिद्धेभ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। मणिमय दीपक में ज्योति जले, सब अंधकार क्षण में नाशे। दीपक से पूजा करते ही, सज्ज्ञान ज्योति निज में भासे।।ढाई..।।६।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरण-पंचकल्याणकतीर्थ-सर्वसिद्धेभ्य: मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। दशगंध विमिश्रित धूप सुरभि, धूपायन में खेते क्षण ही। कटु कर्म दहन हो जाते हैं, मिलता समरस सुख तत्क्षण ही।। ढाईद्वीपों के नव देवों, को नमें कल्याणकतीर्थ नमें। अकृत्रिम कृत्रिम जिनप्रतिमा, को सिद्धो को हम कोटि नमें।।७।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरण-पंचकल्याणकतीर्थ-सर्वसिद्धेभ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। एला केला अंगूरों के, गुच्छे अतिसरस मधुर लाये। परमानंदामृत चखने हित, फल से पूजन कर हर्षाये।।ढाई..।।८।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरण-पंचकल्याणकतीर्थ-सर्वसिद्धेभ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल चंदन अक्षत पुष्प चरु, वर दीप धूप फल लाये हैं। निजगुण अनंत की प्राप्ति हेतु, प्रभु अघ्र्य चढ़ाने आये हैं।।ढाई..।।९।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालय-तीर्थंकरसमवसरण-पंचकल्याणकतीर्थ-सर्वसिद्धेभ्य: अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -उपेन्द्रवङ्काा छंद- त्रैलोक्य शांतीकर शांतिधारा, श्री तीर्थंकरों के पदवंâज धारा। निज स्वांत शांतीहित शांतिधारा, करते मिले हैं भवदधि किनारा।।१०।।

शांतये शांतिधारा।

सुरकल्पतरु के वर पुष्प लाऊँ, पुष्पांजलि कर निज सौख्य पाऊँ। संपूर्ण व्याधी भय को भगाऊँ, शोकादि हरके सब सिद्धि पाऊँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य - ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंबंधि-त्रैकालिकनवदेवताभ्यो नम:।

जयमाला जय ढाईद्वीप के अर्हत्प्रभु, जय सिद्ध आदि नवदेवों की। जय जय जिनधर्म जिनागम की, जय जिनप्रतिमा जिनमंदिर की।। जय स्वयं सिद्ध शाश्वत जिनगृह, चिंतामणि चिंतित फलदाता। जय कामधेनु सुर कल्पवृक्ष, पारसमणि वांछित फलदाता।।१।। जय पांच मेरू वक्षारगिरी, गजदन्त कुलाचल के मंदिर। विजयारध, जम्बू शालमली, तरु के इष्वाकृति के मंदिर।। मनुजोत्तर पर्वत तक ये त्रयशत, अट्ठानवे जिनालय हैं। इन सबमें इक सौ आठ, एक सौ आठ जैन प्रतिमाएँ हैं।।२।। स्वात्मानन्दैक परम अमृत, झरने से झरते समरस को। जो पीते रहते हैं मुनिगण, वे भी उत्कण्ठित दर्शन को।। वे ध्यान धुरंधर ध्यान मूर्ति, यतियों को ध्यान सिखाती हैं। भव्यों को अतिशय पुण्यमयी, अनवधि पीयूष पिलाती हैं।।३।। मेरु के त्रिभुवनतिलक नाम, जिनमंदिर में सुर जाते हैं। इक सहस आठ घट क्षीरजलधि, पय से अभिषेक रचाते हैं।। भावनपति दस व्यंतरें आठ, ज्योतिषपति दो कल्पामर के। बारह सुरपति मिल इंद्र सभी, बत्तीस जजें जिन रुचि धरके।।४।। इस ढाईद्वीप के पाँच भरत, पंचैरावत में आर्यखंड। इनमें चौथे कालों में ही, चौबिस चौबिस तीर्थेश वंद्य।। ये सर्व अनंतानंतों ही, त्रयकालिक तीर्थंकर मानें। मैं इनको वंदूँ शीश झुका, ये मेरे जन्म मरण हानें।।५।। पांचों विदेह के सीमंधर, युगमंधर आदि बीस जिनवर। ये सतत विहार करें वहाँ पर, मैं नमूँ नमूँ नित अंजलिकर।। सब इक सौ साठ विदेह, भरत, ऐरावत मिल इक सौ सत्तर। इन कर्मभूमि में अधिक-अधिक, हो सकते इतने तीर्थंकर।।६।। इन तीर्थंकर को नित्य नमूं, निज आत्म सुखामृत पा जाऊँ। इन कर्मभूमि में ही अर्हंत, सिद्ध होते उनको ध्याऊं।। आचार्य उपाध्याय साधूगण, इन कर्मभूमि में होते हैं। जिनधर्म जिनागम यहीं रहें, इन वंदन अघमल धोते हैं।।७।। इन कर्मभूमि में ही मानव, जिनबिंब जिनालय बनवाते। तीर्थंकर पंच परमगुरु की, प्रतिमा बनवाकर पधराते।। नवदेव बिंब भी बनवाते, जिनयक्ष यक्षिणी बनवाते। दिक्पाल क्षेत्रपालों से युत, जिनमंदिर अति शोभा पाते।।८।। सब कत्रिम जिनमंदिर प्रणमूँ, जिनप्रतिमाओं को नित्य नमूं। हीरा माणिक रत्नादि घटित, पाषाण आदि जिनबिंब नमूँ।। अर्हंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय, साधु पंच परमेष्ठीr को। मैं नित्य नमूँ जिनधर्म जिनागम, जिनमंदिर जिनमूर्ती को।।९।। ढाई द्वीपों के मंदिर तक, मानव विद्याधर जाते हैं। आकाश गमन ऋद्धीधारी, ऋषिगण भी दर्शन पाते हैं।। आवो आवो हम भी पूजें, ध्यावें वंदे गुणगान करें। भव-भव के संचित कर्मपुुंज, सब नष्ट करें शिव प्राप्त करें।।१०।। त्रिभुवन चूड़ामणि सिद्धशिला, पैंतालिस लाख सुयोजन की। त्रयकालिक सिद्ध अनंतानंत, इसी पर तिष्ठें नित्य सभी।। इस सिद्धशिला को नित्य नमूँ, सब सिद्धों की वंदना करूँ। निज ‘ज्ञानमती’ ज्योतिर्माला, पहनूँ फिर मुक्त्यंगना वरूँ।।११।। ॐ ह्रीं सार्धद्वयद्वीपसंंबंधि-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म-जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयपंचकल्याणकतीर्थसर्वसिद्धेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नरसुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१) सिद्ध पूजा अथ स्थापना—शंभु छन्द: (चाल—श्रीपति जिनवर) सिद्धी के स्वामी सिद्धचक्र, सब जन को सिद्धी देते हैं। साधक आराधक भव्यों के, भव-भव के दु:ख हर लेते हैं।। निज शुद्धात्मा के अनुरागी, साधूजन उनको ध्याते हैं। स्वात्मैक सहज आनंद मगन, होकर वे शिव सुख पाते हैं।।१।। —दोहा— सिद्धों का नित वास है, लोक शिखर शुचि धाम। नमूं नमूं सब सिद्ध को, सिद्ध करो मम काम ।।२।। मनुज लोक भव सिद्धगण, त्रैकालिक सुखदान। आह्वानन कर मैं जजूं, यहां विराजो आन ।।३।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंबंधिसकलसिद्धसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंबंधिसकलसिद्धसमूह! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंबंधिसकलसिद्धसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सिन्नधीकरणं। —अथाष्टवंâ—गीता छंद— क्षीरांबुधी का सलिल उज्ज्वल, स्वर्णझारी में भरूँ। निज कर्म मल प्रक्षालने को, जिन चरण धारा करूँ।। कर सप्त प्रकृती घात क्षायिक, शुद्ध समकितवान जो। नरलोक भव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।१।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। कर्पूर चंदन गंध सुरभित, स्वर्णद्रव सम लायके। भव ताप शीतल हेतु जिनवर, पाद चर्चूं आयके।। त्रिभुवन प्रकाशी ज्ञान केवल, सूर्य रश्मीवान जो। नरलोकभव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो ।।२।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। शशि रश्मि सम उज्ज्वल अखंडित, शुद्ध अक्षत लाय के। अक्षय सुपद के हेतु जिनवर, अग्र पुंज चढ़ाय के ।। जगदर्शि केवल दरश संयुत, सिद्ध महिमावान जो। नरलोक भव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो ।।३।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। मल्ली चमेली वकुल आदिक, पुष्प सुन्दर लाय के। भवमल्ल विजयी जिन चरण में, हर्ष युक्त चढ़ाय के ।। जिनराज वीर्य अनंत से युत, कर्म अन्तिम हान जो। नरलोक भव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो ।।४।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। मिष्ठान्न पूरणपोलिका, लाडू इमरती लाय के। भव भव क्षुधा से दूर जिनवर, पाद अग्र चढ़ाय के।। सूक्ष्मत्व गुण संयुक्त फिर भी, सब जगत का भान जो। नरलोक भव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो ।।५।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। कर्पूर दीपक ज्योति जगमग, रत्नदीपक में दिपे। जिन आरती से निज हृदय में, ज्ञान की ज्योती दिपे।। अवगाहना गुणयुत तथा, दें सर्व को स्थान जो। नरलोक भव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो ।।६।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। दश गंध धूप सुगंध लेकर, अगनि में खेऊँ अबे। सब अष्ट कर्म प्रजाल हेतू, सिद्ध गुण सेवूँ सबे।। गुण अगुरुलघु से युक्त भी, लोकाग्र पे नित थान जो। नरलोक भव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।७।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। अंगूर अमृत फल श्रीफल, सरस अमृत सम लिया। प्रभु मोक्षफल के हेतु तुम पद, अग्र में अर्पण किया।। सुख पूर्ण अव्याबाध युत, अतिशय अतीन्द्रियवान जो। नरलोक भव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।८।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंध अक्षत पुष्प नेवज, दीप धूप फलादि ले। अनुपम अनंतानंत गुणयुत, सिद्ध को अर्चूं भले।। हैं सिद्धचक्र अनादि अनिधन, परम ब्रह्म प्रधान जो। नरलोक भव सब सिद्ध, त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो ।।९।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —दोहा— अचिन्त्य महिमा के धनी, परमानंद स्वरूप। शांतीधारा करत ही, मिले शांति सुखरूप ।।१०।। शांतये शांतिधारा। कमल केतकी मल्लिका, पुष्प सुगन्धित लाय। तुम पद पुष्पांजलि करूँ, सुखसंपति अधिकाय ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नम:। जयमाला —दोहा— सकल सिद्ध परमात्मा, निकल अमल चिद्रूप। गाऊँ तुम जयमालिका, सिद्धचक्र शिव भूप ।।१।। चाल (हे दीन बंधु श्रीपति........) जै सिद्धचक्र मध्यलोक से भये सभी। जै सिद्धचक्र तीन काल के कहे सभी।। जै जै त्रिलोक अग्रभाग पे विराजते। जै जै अनादि औ अनंत सिद्ध सासते।।१।। जो जंबूद्वीप से अनंत सिद्ध हुए हैं। क्षारोदधी१ से भी अनंत सिद्ध हुए हैं।। जो धातकी सुद्वीप से भी सिद्ध अनंता। कालोदधि से पुष्करार्ध से भी अनंता।।२।। इन ढाई द्वीप से हुए जो भूतकाल में। जो हो रहे हैैं और होंगे भाविकाल में।। इस विध अनंतानंत जीव सिद्ध हुए हैं। जो भव्य को समस्त सिद्धि अर्थ हुए हैं।।३।। जो घात मोहनीय को सम्यक्त्व लहे हैं। ज्ञानावरण को घात पूर्ण ज्ञान लहे हैं।। कर दर्शनावरण विनाश सर्व दर्शिता। त्रैलोक्य औ अलोक एक साथ झलकता।।४।। होते कभी न श्रांत चूंकि वीर्य अनंता। ये सिद्ध सभी अंतराय कर्म के हंता।। आयू करम को नाश गुण अवगाहना धरें। जो सर्व सिद्ध के लिए अवगाहना करें।।५।। अवकाश दान में समर्थ सिद्ध कहाये। अतएव एक में अनंतानंत समाये।। फिर भी निजी अस्तित्व लिये सिद्ध सभी हैं। पर के स्वरूप में विलीन हो न कभी हैं।।६।। कर नाम कर्म नाश वे सूक्ष्मत्व गुण धरें। अर गोत्र कर्म नाश अगुरुलघू गुण वरें।। वे वेदनी विनाश पूर्ण सौख्य भरे हैं। निर्बाध अव्याबाध नित्यानंद धरे हैं।।७।। वे आठ कर्म नाश आठ गुण को धारते। फिर भी अनंत गुण समुद्र नाम धारते।। चैतन्य चमत्कार चिदानंद स्वरूपी। चिंतामणी चिन्मात्र चैत्यरूप अरूपी।।८।। सौ इंद्र वंद्य हैं त्रिलोक शिखामणी हैं। सम्पूर्ण विश्व के अपूर्व विभामणी हैं।। वे जन्म मृत्यु शून्य शुद्ध बुद्ध कहाते। निर्मुक्त निरंजन सु निराकार कहाते।।९।। जो सिद्धचक्र की सदा आराधना करें। संसार चक्र नाश वे शिवसाधना करें।। मैं भी अनंत चक्र भ्रमण से उदास हूँ। हो ‘‘ज्ञानमती’’ पूर्ण नाथ आप पास हूँ।।१०।। —घत्ता— जय सिद्ध अनंता, शिवतिय वंâता। भव दुख हन्ता तुम ध्याऊँ।। जय जय सुख वंâदन, नित्य निरंजन। पूजत ही निज सुख पाऊँ।।११।। ॐ ह्रीं साद्र्धद्वयद्वीपसंबंधिसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नरसुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.२) सुदर्शनमेरु जिनालय पूजा अथ स्थापना-गीता छंद त्रिभुवन भवन के मध्य सर्वोत्तम सुदर्शन मेरु है। यह प्रथम जंबूद्वीप में, सर्वोच्च मेरु सुमेरु है।। सोलह जिनालय में जिनेश्वर, मूर्तियाँ हैं सासती। थापूँ यहाँ उनको जजूँ, वे सर्व दुख संहारती।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथ अष्टवंâ-अडिल्ल छंद गंगानदि को प्रासुक जल घट में भरूँ। जल से पूजा करते सब कलिमल हरूँ।। मेरु सुदर्शन के सोलह जिनगेह को। पूजूँ जिनवर बिंब सभी धर नेह को।।१।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। गंध सुगंधित अष्ट गंध कर में लिया। जिन पद चर्चत चाह दाह का क्षय किया।।मेरु.।।२।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। मुक्ता फलसम तंदुल धवल अखंड हैं। पुंज धरत जिन आगे होत अनंद है।।मेरु.।।३।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। सुरपादप के सुरभित सुमन मंगायके। कामजयी जिनपाद जजूँ शिर नाय के।। मेरु सुदर्शन के सोलह जिनगेह को। पूजूँ जिनवर बिंब सभी धर नेह को।।४।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। मोदक बरफी पुआ सरस चरु ले लिया। क्षुधाव्याधि हर तुम पद में अर्पण किया।।मेरु.।।५।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। घृत भर दीपक ज्योति सहित आरति करूँ। मोह ध्वांत हर जिन अर्चूं भ्रम तम हरूँ।।मेरु.।।६।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कृष्णागरु वर धूप अग्नि में खेवते। दुष्ट कर्म अरि दग्ध हुये तुम सेवते।।मेरु.।।७।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: धूप निर्वपामीति स्वाहा। पिस्ता काजू द्राक्ष फलों को लाय के। सरस मोक्ष फल हेतु जजूँ हरषाय के।।मेरु.।।८।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंधादिक अष्ट द्रव्य भर थाल में। पूजूं अर्घ चढ़ाऊँ नाऊँ भाल मैं।।मेरु.।।९।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपस्थसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- परम शांति के हेतु, शांतिधारा मैं करूँ। सकल जगत मेें शांति, सकल संघ में हो सदा।।१०।। शांतये शांतिधारा। चंपक हर सिंगार, पुष्प सुगंधित अर्पिते। होवे सुख अमलान, दुख दारिद्र पलायते।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- सर्वश्रेष्ठ गिरिराज हैं, मेरु सुदर्शन नाम। चारों वन के जिनभवन, नितप्रति करूँ प्रणाम।।१।। इति मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -चौबोल छंद- मेरु सुदर्शन के पृथ्वी पर, भद्रसाल वन रम्य महान। पूर्व दिशा में जिन मंदिर है, त्रिभुवन तिलक अतुल सुखदान।। जल फल आदिक अघ्र्य सजाकर, पूजूँ जिनप्रतिमा गुणखान। रोग शोक भय संकट हर कर, पाऊँ अविचल सौख्य निधान।।१।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। प्रथम सुराचल भद्रसाल मेें, दक्षिण दिश जिनमंदिर जान। सुर नर किन्नर यक्ष यक्षिणी, विद्याधर गण पूजें आन।।जल.।।२।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयसर्व-जिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। प्रथम देवगिरि भद्रसाल में, पश्चिमदिश जिन भवन अनूप। रत्नत्रय निधि के इच्छुक जन, पूजन करत लहें सुखरूप।।जल.।।३।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयसर्वजिन-िंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। प्रथम मेरु के भद्रसाल में, उत्तर दिश जिनराज निकेत। भव भय दु:ख हरण हेतू भवि, नित प्रति पूजें भक्ति समेत।। जल फल आदिक अघ्र्य सजाकर, पूजूँ जिनप्रतिमा गुणखान। रोग शोक भय संकट हर कर, पाऊँ अविचल सौख्य निधान।।४।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थितउत्तरदिक्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -रोला छंद- मेरु सुदर्शन विषैं, सुभग नंदन वन जानो। सुरनरगण से पूज्य, पूर्व दिक् जिनगृह मानो।। जल गंधादि मिलाय, अघ्र्य ले पूजों भाई। रोग शोक मिट जाय, मिले निज संपति आई।।५।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिनंदनवनस्थितपूर्वदिग्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नंदन वन के मांहि, जिनालय दक्षिण दिश हैं। नित्य महोत्सव साज, देवगण पूजनरत हैं।।जल.।।६।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिनंदनवनस्थितदक्षिणदिग्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम दिश जिननिलय, मनोहर नंदनवन में। सुर विद्याधर रहें, सतत भक्तीरत जिन में।।जल.।।७।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिनंदनवनस्थितपश्चिमदिग्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नंदनवन के उत्तर, जिन मंदिर सुखकारी। उसमें जिनवर बिंब, दुरितहर मंगलकारी।।जल.।।८।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिनंदनवनस्थितदक्षिणदिग्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-दोहा- वन सौमनस महान है, मेरु सुदर्शन माहिं। पूरब दिश में जिन भवन, पूजूँ अघ्र्य चढ़ाहिं।।९।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वन सौमनस जिनेश गृह, दक्षिण दिशा मंझार। वसु विधि अघ्र्य संजोय के, पूजों हो भव पार।।१०।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयसर्वजिन-िंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम दिश सौमनस के, स्वर्णमयी जिनधाम। भक्तिभाव से अघ्र्य ले, पूजों जिनवर धाम।।११।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयसर्वजिन-िंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तरदिश सौमनस में, श्री जिनभवन महान्। त्रिभुवनतिलक प्रसिद्ध है, जजूँ अघ्र्य ले आन।।१२।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितउत्तरदिक्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -शंभु छंद- मेरू पर चौथा पांडुकवन, उसके पूरब दिश सुंदर है। रत्नों की मूर्ति से संयुत, मणिकनकमयी जिनमंदिर हैं।। जल गंधादिक वसु द्रव्य लिये, नित पूजा कर अघ्र्य करूँ। संसार जलधि से तिरने को, जिन भक्ती नौका प्राप्त करूँ।।१३।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिपाण्डुकवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पांडुकवन में दक्षिण दिश का, जिन भवन अनूपम कहलाता। जो दर्शन वंदन करते हैं, उनको यह अनुपम फलदाता।।जल.।।१४।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिपाण्डुकवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयसर्वजिन-िंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पांडुकवन के पश्चिम दिश में, जिन चैत्यालय महिमाशाली। सुरनर विद्याधर से पूजित, सब ताप हरे गुणमणिमाली।। जल गंधादिक वसु द्रव्य लिये, नित पूजा कर अघ्र्य करूँ। संसार जलधि से तिरने को, जिन भक्ती नौका प्राप्त करूँ।।१५।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिपाण्डुकवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पांडुकवन के उत्तरदिश में, शुभ त्रिभुवनतिलक जिनालय है। नामोच्चारण से पाप दहे, भक्तों के लिए सुखालय है।।जल.।।१६।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिपाण्डुकवनस्थितउत्तरदिक्जिनालयसर्वजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-अडिल्ल छंद प्रथम मेरु के सोलह जिनगृह नित जजूँ। पूरण अघ्र्य चढ़ाय पूर्ण सुख को भजूँ।। काम विजेता जिनवरबिंब मनोज्ञ हैं। पूजत ही निष्काम बनूँ अतियोग्य मैं।।१।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सोलह जिनगृह में जिनप्रतिमा जानिये। सत्रह सौ अट्ठाइस संख्य बखानिये।। प्रतिजिनगृह में इक सौ आठ प्रमाण हैं। पूजूँ मैं रूचिधार मुझे सुखखान है।।२।। ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयमध्यविराजमानएकसहस्रसप्त-शत-अष्टािंवशतिजिनप्रतिमाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पांडुकवन के विदिक् में, शिला चार अभिराम। पूजँ अर्घ चढ़ाय के, मिले स्वात्म विश्राम।।३।। ॐ ह्रीं पांडुकादिशिलाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य-ॐ ह्रीं त्रिलोक्यशाश्वतजिनालयजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- सर्वोत्तम सर्वोच्च हैं, प्रथम मेरु गिरिराज। उसकी यह जयमालिका, हर्षित गाऊँ आज।।१।। -शंभु छंद- जय मेरु सुदर्शन है अनुपम, सोलह चैत्यालय से सोहे। अध्यात्म शिरोमणि योगीजन, उनका भी अतिशय मन मोहे।। उपवन वापी से वूâटों से, परकोटों से सुर भवनों से। मंडित रमणीक महासुन्दर, कांचन मणिमय शुभरत्नों से।।२।। पृथ्वी पर भद्रसाल वन है, चंपक तरु आदिक से भाता। है पांचशतक योजन ऊपर, नदंनवन अतिशय सुखदाता।। इससे साढ़े बांसठ हजार, योजन ऊपर सौमनस वनी। छत्तीस हजार महायोजन, ऊपर पांडुकवन सौख्यघनी।।३।। चारों वन के चारों दिश में, अकृत्रिम चैत्यालय मानो। प्रति मंदिर इक सौ आठ कही, जिन प्रतिमा अतिशययुत जानो।। इनके दर्शन से घोर महा, मिथ्यात्व तिमिर भी नश जाता। सम्यग्दर्शन की ज्योति जगे, आत्मा आत्मा को लख पाता।।४।। भव भव से संचित पाप राशि, इक क्षण में भस्म हुआ करती। जिनराज चरण की भक्ती ही, भवि के भव भव दु:ख को हरती।। पांडुकवन की विदिशाओं में, पांडुक आदिक हैं चार शिला। तीर्थंकर के अभिषव जल से, वे पूज्य हुर्इं सुरवंद्य तुला।।५।। जय भद्रसाल के जिनमंदिर, जय नंदनवन के जिनगेहा। जय सौमनसं पांडुकवन के, जिनभवन जजूँ मैं धरनेहा।। ये मूर्ति अचेतन होकर भी, चेतन को वांछित फल देतीं। जो पूजें ध्यावें भक्ति करें, उनके सब संकट हर लेतीं।।६।। -दोहा- मेरुसुदर्शन की भविक, पूजा करो पुनीत। मेरुसदृश उत्तुंग फल, लहो शीघ्र ही मीत।।७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयसर्वजिनिंबबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.३) सुदर्शनमेरु संबंधी षट् कुलाचल जिनालय पूजा —अथ स्थापना—शंभु छंद— छह कुल पर्वत हिमवन आदिक, उनमें छह जिनवर मंदिर हैं। यमराज व्यथा निरवारणहित, नित पूजा करत पुरंदर हैं।। गणधर मुनिगण नितप्रति ध्याते, परमानंदामृत पीते हैं। वे मोहराज यमराज महामृत्यू राजा भी जीते हैं।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितजिनालयस्थसर्वजिन-बिम्बसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट्। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितजिनालयस्थसर्वजिन-बिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितजिनालयस्थसर्वजिन-बिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अडिल्ल छंद— हिमवन द्रह को नीर लाय प्रासुक किया। कर्म कालिमा क्षालन हित धारा दिया।। हिमवन् आदी छह कुल पर्वत मणिमया। तापर जिनगृह प्रतिमा पूजों सुख भया।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। चंदन में कर्पूर मिलाय सुवासिया। जिनपद पूजों भव्य सकल अघ नाशिया।।हिमवन्.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। उज्ज्वल अक्षत धोय लिये मन भावने। पुंज चढ़ाऊँ जिन सन्मुख सुख पावने।। ाqहमवन् आदी छह कुल पर्वत मणिमया। तापर जिनगृह प्रतिमा पूजों सुख भया।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। कमल केतकी चंप चमेली लाइया। मन प्रपुâल्ल कर पुâल्ल चढ़ा हित चाहिया।।हिमवन्.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। बालूसाही रसगुल्ला मोदक लिया। क्षुधापिशाची नाशो, प्रभु अर्पण किया।।हिमवन्. ।।५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपक में कर्पूर जला आरति करूँ। मोह ध्वांत निरवार सकल आरत हरूँ।।हिमवन्.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप धूपदह में खेऊँ सुरभित भली। दश दिश महक उठी, तुरतहि आये अली।।हिमवन्.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। आम्र सेवफल आडू, लीची संतरा। सरस मधुर फल लाय, पूजहूँ जिनवरा।।हिमवन् ।।८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। वसु विध अघ्र्य बनाय, थाल भर के लिया। जिन गुणगाय बजाय, अघ्र्य अर्पण किया।। ाqहमवन् आदी छह कुल पर्वत मणिमया। तापर जिनगृह प्रतिमा पूजों सुख भया।।९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थिताqसद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— पद्म सरोवर नीर, सुवरण झारी में भरूँ। जिनपद धारा देय, भववारिधि से उत्तरूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। सुवरण पुष्प मंगाय, प्रभु चरणन अर्पण करूँ। वर्ण गंध रस फास, विरहित जिन पद को वरूँं।।११। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य —सोरठा— जम्बूद्वीप सुमेरु, दक्षिण उत्तर कुलगिरी। इनके छह जिनगेह, नितप्रति वंदूँ भाव से।।१।। इति सुमेरुपर्वतस्य दक्षिणोत्तरकुलगिरिस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —सुगीतिका छंद— ‘हिमवान’ पर्वत कनकद्युतिमय द्वय तरफ बहुवर्ण का। वर वूâट ग्यारह में कहा, इक सिद्धवूâट जिनिंद का।। जिनराज बिंब सुरत्नमय पूजा करूँ अति चाव से। संसार खार अपार सागर, तिरूँ भक्ती नाव से।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिहिमवन्पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पर्वत ‘महाहिमवान्’ चांदी वर्ण का सुन्दर दिखे। द्वय पाश्र्व नाना मणि खचित पे एक जिनमंदिर दिखे।। जिनराज बिंब सुरत्नमय पूजा करूँ अति चाव से। संसार खार अपार सागर, तिरूँ भक्ती नाव से।।२।। ॐ ह्रींश्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिमहाहिमवन्पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पवर्त ‘निषध’ है तप्त स्वर्णिम वर्ण बहुद्वय पाश्र्व है। हृद वेदिका वन वूâट नव में एक जिन आवास है।। जिनराज बिंब सुरत्नमय पूजा करूँ अति चाव से। संसार खार अपार सागर, तिरूँ भक्ती नाव से।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिनिषधपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘नीलगिरि’ वैडूर्य वर्णी द्वय तरफ पंचरंगिमा। नव वूâट में इक जिनभवन, सुर इंद्र पूजे चन्द्रमा।। जिनराज बिंब सुरत्नमय पूजा करूँ अति चाव से। संसार खार अपार सागर, तिरूँ भक्ती नाव से।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिनीलपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रुक्मी’ अचल रूपामयी, वर वूâट आठों से भरा। इक वूâट मेंं जिनराज गृह, बस दर्श से पातक टरा।। जिनराज बिंब सुरत्नमय पूजा करूँ अति चाव से। संसार खार अपार सागर, तिरूँ भक्ती नाव से।।५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिरूक्मिपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्व- जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शिखरी’ अचल सोने सदृश शुभ वूâट ग्यारह नित्य हैं। वर सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूजतें सब भव्य हैं।। जिनराज बिंब सुरत्नमय पूजा करूँ अति चाव से। संसार खार अपार सागर, तिरूँ भक्ती नाव से।।६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिशिखरिपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्व जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य— कुल अद्रि छह पे छह सरोवर, कमल भूमय खिल रहे। क्रम से श्री ह्री धृती कीर्ती, बुद्धि लक्ष्मी महल हैं।। छह द्रह१ से गंगा आदि चौदह, आपगा२ निकली भई। इन अद्रि३ पे जिनभवन पूजों, दुरित कीचड़ बह गई।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य परि पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला —दोहा— षट् कुल पर्वत के कहे, षट् मंदिर सुविशाल। सुर नर खगपति नित जजें, मैं गाऊँ गुणमाल।।१।। —पद्धड़ी छंद— जय जय कुल पर्वत के जिनेश, तुम हरो सभी मेरे कलेश। जय मेरु के दक्षिण प्रधान, हिमवन पर्वत शोभे महान।।२।। जय ताके पूरब दिशा मािंह, जय सिद्धवूâट जिन सद्म पािंह। नग बीच पद्म सरवर कहात, ता मध्य कमल मणिमय रहात।।३।। तामें श्रीदेवी को निवास, उन कमलों पर परिवार वास। इक लाख और चालिस हजार, इक सौ पंद्रह हैं कमल सार।।४।। सब पृथ्वीकायिक सुरभिमान, उन सबमें जिनमंदिर महान। द्रह से त्रय नदियों का निकास, तल में गंगादिक वुंâड खास।।५।। गंगा देवी के महल शीश, राजें जिनप्रतिमा महल शीश। अभिषेक करत इव नदीधार, ऊपर से पड़ती गंगधार।।६।। इस विधि ही सब पर्वत मंझार, बहुविध अनुपम रचना अपार। सबमें जिनबिंब विराजमान, नासाग्र दृष्टि मुख सौम्य जान।।७।। जय सिंहासन छवि कांतिमान, सुर ढोरें चौंसठ चमर आन। जय भामंडल द्युति रवि लजािंह, जय छत्र तीन शशि द्युति लजािंह।।८।। जय जय तुम मंगलकरण देव, जय जय सुख संगम करण देव। मैं वंदूँ तुमको बार बार, प्रभु जन्म मरण मेरो निवार।।९।। —घत्ता— जय मुक्ति निशाना, जिनवर धामा, आनन्द मन जयमाल भणे। सो मंगल पावे नित हरषावे, पेâरि न आवे भव वन में ।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्व जिनबिम्बेभ्यो: जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य परिपुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.४) सुदर्शनमेरु संबंधी चार गजदंत जिनालय पूजा अथ स्थापना—गीताछंद जगबीच जंबूद्वीप उत्तम, कनक पर्वत मध्य है। तिस विदिश चारों में कहे, पर्वत सुभग गजदंत हैंं।। उन चार पर हैं चार जिनगृह, यहाँ उनकी अर्चना। मैं करूँ निर्मल भाव से जिन, भक्ति पूजा वंदना।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचर्तुिवदिशायां चतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचर्तुिवदिशायां चतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचर्तुिवदिशायां चतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। अथ अष्टवंâ-गीताछंद जल पद्मद्रह का लाय उज्ज्वल कनक झारी में भरा। दे धार जिन पदपद्म को, आनंद रस मन में भरा।। मुझ चार गति के दु:खनाशन हेतु चारों मंदिरा। निज ज्ञान दर्शन सौख्यवीरज दे चतुष्टय इंदिरा१।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा। गोशीर चंदन घिस सुगंधित, भर कटोरी में लिया। जिन पादपद्म चढ़ाय श्रद्धा भाव से अर्चन किया।।मुझ.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। अति धवल तंदुल चंद्र की कांती सदृश भर थाल में। जिन चन्द्र सन्मुख पुंज धर, नाऊं खुशी से भाल मैं।। मुझ चार गति के दु:खनाशन हेतु चारों मंदिरा। निज ज्ञान दर्शन सौख्यवीरज दे चतुष्टय इंदिरा।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। मचवुंâद चंपक औ कदंबक, पुष्प निज कर से चुने। जिनराज पद अरिंवद को, जजते सभी दु:ख को धुने।।मुझ.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। गोक्षीर तंदुल शर्वâरायुत, पेâनि शतछिद्रा१ बनी। निज क्षुधारोग विनाश हेतू, पूजहूँ त्रिभुवन धनी।।मुझ.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: ्नौवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर कनक दीपक सुरभि घृत, कार्पास बाती जगमगे। सब दिशा हों उद्योत उससे, जजों जिनपद सुख जगे।।मुझ.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। वर धूपदह में धूप दहते, धूम उड़ता दशदिशा। वसु कर्म जरते देख कर, मोहारि भगता सब दिशा।।मुझ.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फल आम्र अमरख सेव केला, और एला थाल भर। जिनराज सन्मुख भेंट कर, सिद्धिप्रिया तत्काल वर।।मुझ.८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। वर नीर गंधाक्षत सुमन, चरु दीप धूप फलौघ ले। शुभ अर्घ सों जिनचरण पूजत, पाप अरि सेना टले।। मुझ चार गति के दु:खनाशन हेतु चारों मंदिरा। निज ज्ञान दर्शन सौख्यवीरज दे चतुष्टय इंदिरा।।९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य:अर्घं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— क्षीरोदधि उनहार, उज्ज्वल जल ले भृंग में। श्रीजिनचरण सरोज, धारा देते भव मिटे।।१०।। शांतये शांतिधारा। सुरतरु के सुम लेय, प्रभुपद में अर्पण करुँ। कामदेव मद नाश, पाऊँ आनंद धाम मैं।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:।। अथ प्रत्येक अघ्र्य -सोरठा— मेरु सुदर्शन लग्न, विदिशा में गजदंत हैं। पृथक् पृथक् तिन पूज, जिनगृह अघ्र्य चढ़ायके।।१।। इति सुदर्शनमेर्रोिवदिशायां गजदंतस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत् । —दोहा— मेरू के आग्नेय दिश, ‘महासौमनस’ नाम। रजतमयी गजदंत यह, सातवूâट युत जान।। मेरु निकट जिनराज गृह, सिद्धवूâट पर सिद्ध। मन वच तन से पूजकर, करूँ काल अरि विद्ध।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: आग्नेयविदिशिमहासौमनसगजदन्तसम्बन्धिसिद्धवूâट- जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मेरू के नैऋत्यदिश ‘विद्युत्प्रभ’ गजदन्त। वर्ण तपाये स्वर्णसम, नव वूâटहिं शोभंत।। मेरु निकट जिनराज गृह, सिद्धवूâट पर सिद्ध। मन वच तन से पूजकर, करूँ काल अरि विद्ध।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: नैऋत्यविदिशिविद्युत्प्रभगजदन्तसम्बन्धिसिद्धवूâट जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गन्धमादनाचल’ कहा, मेरू के वायव्य। सातवूâटयुत स्वर्णसम, पूजे सुर नर भव्य।।मेरुनिकट.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: वायव्यविदिशिगन्धमादनगजदन्तसम्बन्धिसिद्ध-वूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘माल्यवान गजदन्त’ है, मेरू के ईशान। वर्ण रुचिर वैडूर्यमणि, नववूâटोें युत मान।।मेरुनिकट.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: ईशानविदिशिमाल्यवानगजदन्तसम्बन्धि-सिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य—सोरठा— चार कहे गजदंत, इनके चारों जिनभवन। इनमें जो जिनबिंब, उन सबकी पूजा करूँ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: चतुर्विदिशायां चतुर्गजदन्तसम्बन्धिचतु:सिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य परिपुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला गजदंतों पर जिनभवन, शाश्वत बने विशाल। जिनपद पंकज भ्रमर जन, पढ़ते तिन जयमाल।।१।। तोटकछंद—(चाल-जयकेवलभानु......) जय मेरु सुदर्शन शैल महा, जय ता विदिशा गजदंत कहा। जय हस्तिन दंत समान कहे, निषधाचल नील सुपर्श रहे।। शत पंच सुयोजन तुंग कहे, ढिंग मेरु तने परमाण यहे। निषधाचल नील तने चउ सौ, वर योजन मान सुतुंग कह्यो।।२।। विस्तार सुयोजन पांच शते, निषधाचल मेरु तने लंबे। उत नील सुमेरु तके पैâले, नदि सीत सितोद गुफा धर ले।।३।। जिनमंदिर में जिन की प्रतिमा, जय जय जय सिद्धन की उपमा। जय इंद्र सदा चामर ढुरते, जय तीन सुछत्र सदा फिरते।।४।। जय आसन रत्न जड़ा प्रभु का, द्युतमंडल शोभ रहा प्रभु का। जय देवरमा मिल नृत्य करें, जय वाद्य मृदंग धुनी विकरें।।५।। मुनिध्यान धरें समभाव लिये, वसु कर्म कलंक निमूल किये। सुर खेचर आवत भक्ति भरे, जल गंध फलादिक पूज करें।।६।। जय जन्म सुधन्य गिने निज के, भव अल्प करें जिन भक्ति थके। बस आज मिले तव भक्ति प्रभो, मुझ केवल ‘ज्ञानमती’ वर दो।।७।। —घत्ता— जय जय गुणकारी, सुख संचारी, विपति विदारी यश करणा। जय मंगलकारी, अधम उधारी, करुणाधारी तुम शरणा।।८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्योे जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य परिपुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.५) सुदर्शनमेरु संबंधी जंबूवृक्ष शाल्मलिवृक्ष जिनालय पूजा अथ स्थापना—गीताछन्द गिरि मेरु के उत्तर दिशी उत्तरकुरू शोभे अहा। उसमें सुदिक् ईशान के जंबूतरू राजे महा।। दक्षिण दिशा में देवकुरु नैऋत्य कोण सुहावनी। तरु शाल्मलि शुभरत्नमय, सुन्दर दिखे शाखा घनी।।१।। —दोहा— दोनों तरु की शाख पर, दो श्री जिनवर गेह। आह्वानन कर मैं जजूूँ, सदा हृदय धर नेह ।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: ईशाननैऋत्यकोणयो: जम्बूशाल्मलिवृक्षसम्बन्धि- जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: ईशाननैऋत्यकोणयो: जम्बूशाल्मलिवृक्षसम्बन्धि- जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: ईशाननैऋत्यकोणयो: जम्बूशाल्मलिवृक्षसम्बन्धि- जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्।

अष्टवंâ-अडिल्लछंद

सुरगंगा को नीर सुरभि प्रासुक किया। जिनपद धारा देय, सकल मल क्षय किया।। जंबू शाल्मलि वृक्ष तने जिनधाम को। जो पूजें धर प्रीति, लहे शिवधाम को।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयागिरि घनसार सुवुंâकुम गंध ले। सिद्धनि के प्रतिबिंब, चरण को चर्च ले।। जंबू शाल्मलि वृक्ष तने जिनधाम को। जो पूजे धर प्रीति, लहे शिव धाम को।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। जल से धौत सुअक्षत मुुक्ताफल समा। पुंज धरूँ जिनसन्मुख भक्ती अनुपमा।।जंबू.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। जुही चमेली कमल केवड़ा पूâल ले। प्रभु के चरण चढ़ाऊँ भव के दुख टले।।जंबूू.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। सद्यजात१ घेवर बावर मोदक घने। चरु की पूजा नित्य क्षुधा व्याधी हने।।जंबू.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। रत्नदीप की ज्योति दशों दिश तम हरे। अंतर भेद विज्ञान प्रगट हो भ्रम टरे।।जंबू.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप अगनि में खेय धूम दशदिश उड़े। कर्म पुंज प्रज्वले सतत आनंद बढ़े।।जंबू.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। सुरतरु के परिपक्व सरस फल लाय के। प्रभु की पूजा करूँ हरष गुण गाय के।। जंबू शाल्मलि वृक्ष तने जिनधाम को। जो पूजें धर प्रीति, लहे शिवधाम को।।८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। वारि सुचंदन अक्षत पूâल चरू मिले। दीप धूप शुचि उत्तम फल युत अघ्र्य ले।।जंबू.।।९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजम्बूशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— यमुना सरिता नीर, वंâचन झारी में भरा। जिनपद धारा देत, शांति करो सब लोक में ।।१०।। शांतये शांतिधारा। वकुल कमल अरविंद, सुरभित पूâलों को चुने। जिनपद पंकज अघ्र्य, यश सौरभ चहुँदिश भ्रमें।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -सोरठा— जंबू शाल्मलि वृक्ष, तिनके जिनगृह को जजूँ। पुष्पांजलि कर नित्य, जो पूजें सो शिव लहें।।१।। इति जम्बूवृक्षशाल्मलिवृक्षस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —गीता छन्द— ‘जम्बूतरू’ की उत्तरी शाखा विषे जिनधाम है। सब देव देवी करें अर्चा, मैं जजूँ इह थान है।। वर नीर चंदन आदि वसुविध द्रव्य थाली में लिया। संसार रोग निवार स्वामी अघ्र्य से पूजन किया।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजंबूवृक्षस्य उत्तरशाखायां जिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘द्रुम शाल्मलि’ की दक्षिणी, शाखा उपरि जिनगेह है। योगी सदा ध्याते उन्हें, हम भी जजें धर नेह है।। वर नीर चंदन आदि वसुविध द्रव्य थाली में लिया। संसार रोग निवार स्वामी अघ्र्य से पूजन किया।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिशाल्मलिवृक्षस्य दक्षिणशाखायां जिनालय-स्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य—दोहा— जंबू शाल्मलि वृक्ष पर, दो जिनमंदिर सिद्ध। पूर्ण अघ्र्य ले मैं जजूँ, पाऊँ सौख्य समृद्ध।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिजंबूशाल्मलिवृक्षस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य परिपुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला —सोरठा— तरु की शाखा मांहि, रत्नमयी जिनबिंब हैं। तिनकी यह जयमाल, भक्ति भाव से मैं पढ़ूँ।।१।। —नरेन्द्र छंद— जंबूतरु का स्वर्णिम स्थल, पांच शतक योजन है। इस थल का परकोटा कांचन-मयी मनो मोहन है।। पीठ आठ योजन का ऊँचा, मध्य माहिं चांदी का। इस पर जम्बूवृक्ष अकृत्रिम, पृथ्वीमय रत्नों का।।२।। यह तरु तुंग आठ योजन है, वङ्कामयी जड़ जानो। मणिमय तना हरित मोटाई, एक कोश परमानो।। तरु की चार दिशाओें में हैं, चार महाशाखायें। छह योजन की लंबी इतने, अंतर से लहरायें।।३।। मरकत कर्वेâतन मूँगा, वंâचन के पत्ते उत्तम। पांच वर्ण रत्नों के अंकुर, फल अरु पुष्प अनूपम।। इसमें फल जामुन सदृश हैं, कोमल चिकने दिखते। रत्नमयी हैं फिर भी अद्भुत पवन लगत ही हिलते।।४।। उत्तर शाखा पर जिनमंदिर, सुरगृह त्रय शाखा पे। सम्यक्त्वी आदर व अनादर, व्यंतर रहते उन पे।। तरु को चारों तरफ घेर कर, बारह पद्म वेदियाँ। उनके अंतराल में तरु की, परिकर वृक्ष पंक्तियां ।।५।। एक लाख चालीस हजार इक सौ उन्नीस कहाएं। इन जंबू परिवार वृक्ष पर, सुर परिवार रहायें।। मेरु की ईशान दिशा में नीलाचल के दाएं। माल्यवन्त के पश्चिम में, सीता के पूर्व कहाएं।।६।। तरु स्थल के चारों तरपेâ, त्रय वन खंड कहाते। फल पूâलों युत सुरमहलों युत, जल वापी युत भाते।। इस द्रुम के जिनगृह में इक सौ-आठ जिनेश्वर प्रतिमा। इसी तरह शाल्मली वृक्ष की जानो सारी रचना ।।७।। शाल्मलि तरु के अधिपति व्यंतर, वेणु वेणुधारी हैं। ये सुर सम्यक्त्वी जिनमत के, प्रेमी गुणधारी हैंं।। जितने जंबू शाल्मलि तरु हैं, उतने जिनमंदिर हैंं। क्योंकि सभी पर सुर रहते हैंं सबमें जिनमंदिर हैं।।८।। दो चैत्यालय मुख्य अकृत्रिम, हैं स्वतन्त्र दो तरु के। उनकी अरु सब जिनप्रतिमा की, करूँ वंदना रुचि से।। सुर किन्नरियां नित गुण गातीं वीणा की लहरों से। दर्शन करके नर्तन कीर्तन करतीं भक्ति स्वरों से ।।९।। —घत्ता— जय जय जिनप्रतिमा अद्भुत महिमा पढ़े सुने जो जयमाला। जय ‘ंज्ञानमती’ श्री सिद्धिवधू प्रिय सो नर पावे खुशहाला ।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिजंबूशाल्मलिवृक्षस्थितसिद्बवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य परिपुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.६) सुदर्शनमेरु संबंधी सोलह वक्षारगिरि जिनालय पूजा —अथ स्थापना—शम्भुछन्द— मेरु सुदर्शन के पूरब दिश, गिरि वक्षार बखाने हैं। सीता नदि के उत्तर-दक्षिण चार-चार ये माने हैं।। मेरू के पश्चिम विदेह में, आठ अचल वक्षार कहे। सीतोदा के दक्षिण-उत्तर, चार-चार हैं शोभ रहे।।१।। —दोहा— सोलह गिरि वक्षार के, सोलह जिनगृह सिद्ध। यहाँ थापना विधि करूँ, पूज वरूँ सुख सिद्ध।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबन्धिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबन्धिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरâसंबन्धिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्।

अथाष्टवंâ-त्रिभंगीछंद

(चाल-तीर्थंकर की धुनि गणधर....) सीतानदि का जल, सुरभित उज्ज्वल, अमल भाव से मैं लाया। भरि वंâचन कलशा, जिनपद परसा, मन अति हरषा गुण गाया।। वक्षार गिरी पर, सोलह जिन घर, जिनवर प्रतिमा चरण जजों। प्रभु करुणासागर, सुख रत्नाकर, शरणागत तुअ शरण भजों।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। घनसार सुचंदन, षटपद गुंजन, दाह निकन्दन ले आया। जिनवर पदवन्दन, समरस स्यंदन१,भव आक्रन्दन छुटवाया।। वक्षार गिरी पर, सोलह जिन घर, जिनवर प्रतिमा चरण जजों। प्रभु करुणासागर, सुख रत्नाकर, शरणागत तुअ शरण भजों।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। जल से प्रक्षालित तंदुल सुरभित, शशिकर सदृश भरि लीना। जिनवर पद सन्निध, पुंज समर्पित, धवल सौख्य हित मैं कीना।।वक्षार.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। चम्पादिक सुमना, सुमनस प्रियना, सुरभी करना में लाया। मधुकर गुंजारे, काम विडारे, जिनपद धारे हरषाया।।वक्षार.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। पायस घृत पूआ, पेâनी खोवा, ताजे साजे थाल भरे। जन घ्राण नयन मन, तर्पित व्यंजन, जिनवर सन्निध भेट करें।।वक्षार.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। ले दीपक आला, गोघृत डाला, बत्ती ज्वाला ज्योति धरे। जिनवर की आरति, नित अवतारत, आरत वारत ज्योति करे।।वक्षार.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। ले धूप सुगंधित, पाप विखंडित, धूपायन में खेय दिया। दश दिश महकाते, धूम उड़ाते, कर्म जलाते देख लिया।।वक्षार.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। दाडिम नारंगी, फल मोसम्बी, अनन्नास भी मैंं लाया। जन मन को प्रियकर, मधुर सरस फल, प्रभु ढिग धर कर सुख पाया।। वक्षार गिरी पर, सोलह जिन घर, जिनवर प्रतिमा चरण जजों। प्रभु करुणासागर, सुख रत्नाकर, शरणागत तुअ शरण भजों।।८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल चंदन तंदुल, पुष्प चरूवर, दीप धूप फल ले लीना। प्रभु अघ्र्य चढ़ाकर, पुण्य बढ़ाकर, पाप नशाकर सुख लीना।।वक्षार.।।९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— सीता नदी सुनीर, जिनपद पंकज धार दे। वेग हरूँ भवपीर, शांतीधारा शांतिकर।।१०।। शांतये शांतिधारा। बेला कमल गुलाब, चंप चमेली ले घने। जिनवर पद अरविंद, पूजत ही सुख सम्पदा।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:।। अथ प्रत्येक अघ्र्य —दोहा— प्रथम मेरु पूरब अपर, सोलहगिरि वक्षार। पुष्पांजलि कर पूजते, नाशे विघ्न हजार।।१।। इति षोडशवक्षारस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -सवैया छन्द— सीता नदि के उत्तर तट पर, भद्रसाल वेदी के पास। ‘चित्रवूâट’ वक्षार स्वर्णमय, चार वूâट से मंडित खास।। नदी तरफ के सिद्धवूâट पर, श्री जिनमंदिर बना विशाल। जल फल आदिक अघ्र्य बनाकर, पूजन करूँ मिटे जग जाल।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे चित्रवूâटवक्षार-पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्यो अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतानदि के उत्तर तट पर क्रम से ‘पद्मवूâट’ वक्षार। स्वर्णवर्णमय चार वूâट युत, देव देवियाँ करें विहार ।। नदी तरफ के सिद्धवूâट पर श्री, जिनमंदिर बना विशाल। जल फल आदिक अघ्र्य बनाकर, पूजन करूँ मिटे जग जाल।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे पद्मवूâटवक्षार-पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिन वूâट’ पर जैन भवन में, विद्याधर गण करें विहार। श्री जिनमूर्ती निरख-निरख कर, तृप्त हुए मन हरष अपार।।नदी.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे नलिनवूâट-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘एकशैल’ वक्षार मनोहर सुर वनितायें करें विनोद। जिनगृह की मुनि करें वंदना, समरसमय मन भरें प्रमोद।।नदी.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे एकशैलवूâट-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतानदि के दक्षिण तट पर, देवारण्य वेदिका पास। अचल ‘त्रिवूâट’ चार वूâटों युत, जिनगृह युत वक्षार सनाथ।।नदी.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे त्रिवूâट-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। क्रम से फिर ‘वैश्रवण’ वूâट है, देव देवियों से भरपूर। वापी वन उद्यान मनोहर, मुनिगण करें पाप को दूर।।नदी.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे वैश्रवणनाम- वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अंजनात्मा’ नाम धराता, गिरि वक्षार सदा शुभकार। सुर विद्याधर गगन गमनचर, ऋषिगण को भी है सुखकार।।नदी.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे अंजनात्मावक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभ ‘अंजन’ वक्षार आठवां, योगीजन करते नित ध्यान। निज आतम परमानंदामृत, अनुभव कर हो रहे महान।। नदी तरफ के सिद्धवूâट पर, श्री जिनमंदिर बना विशाल। जल फल आदिक अघ्र्य बनाकर, पूजन करूं मिटे जग जाल।।८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे अंजनवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —शम्भु छन्द— पश्चिम विदेह सीतोदा के, दक्षिण में भद्रसाल वेदी। उस सन्निध ‘श्रद्धावान’ कहा, वक्षार कनकमय पर्वत ही।। नदि के सन्निध है सिद्धवूâट, उसमें शाश्वत चैत्यालय है। जल गंधादिक से पूजूँ मैं, मेरे हित सौख्य सुधालय है।।९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानदीदक्षिणतटे श्रद्धावाननाम-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतोदा के दक्षिण तट पर, गिरि ‘विजटावान्’ कहाता है। वक्षार सदा चउ वूâटों युत, सुर नर सबके मन भाता है।।नदि के.।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानदीदक्षिणतटे विजटावान-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आशीविष’ है वक्षार कहा, इनपे रत्नों की वेदी है। परकोटे उपवन वापी से, जिनगृह से कर्मन भेदी है।।नदि के.११।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानदीदक्षिणतटे आशीविष-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वक्षार ‘सुखावह’ अति सुन्दर, सुरललना की क्रीड़ा भूमी। यतिगण के विहरण से पावन, सबको आनंदकारी भूमी।।नदि के.।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानदीदक्षिणतटे सुखा-वहवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतोदा के उत्तर तट पर शुभ देवारण्य बनी वेदी। तसु सन्निध ‘चन्द्रमाल’ पर्वत, जन मन का मोह तिमिर भेदी।। नदि के सन्निध है सिद्धवूâट, उसमें शाश्वत चैत्यालय है। जल गंधादिक से पूजूँ मैं, मेरे हित सौख्य सुधालय है।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानदीउत्तरतटे चंद्रमाल-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वक्षार मनोहर ‘सूर्यमाल’, रत्नों के भवन सुहाते हैं। सुरललनाओें की वीणा के तारों से जिनगुण गाते हैं।।नदि के.।।१४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानदीउत्तरतटे सूर्यमाल-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘नागमाल’ वक्षार अचल, अनुपम कांती छिटकाता है। जिनवर के दर्शन करते ही, सबके अघपुंज नशाता है।।नदि के.।।१५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानदीउत्तरतटेनागमाल-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वक्षार सोलवां ‘देवमाल’, रत्नों की कांति लजाता है। जिनदेवदेव के गृह में नित, देवों का नृत्य कराता है।।नदि के.१६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानदीउत्तरतटे देवमाल-वक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-मद-अवलिप्तकपोलछन्द सोलह गिरि वक्षार उन्हों पर सोलह मन्दिर। वर सामग्री लाय सतत ही जजें पुरंदर।। मैं इह पूजूँ भक्ति भाव से अघ्र्य चढ़ाऊँ। आधि व्याधि भय शोक नाश निज सम्पति पाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला —गीताछन्द— वक्षार कांचन वर्ण शुभ प्रत्येक पर चउ वूâट हैं। प्रत्येक में जिनभवन अनुपम, शेष त्रय पे सुर रहें।। ये अचल विस्तृत पांच सौ योजन उदधि तक लम्ब हैं। कुल अद्रि तक चउ शतक योजन नदि निकट शतपंच हैं।।१।। —स्रग्विणी छन्द— जै महामेरु के सोल वक्षार ते। जै अनादि अनन्ते सदा राजते।। जै उन्हों पे विराजे जिनेशालया। जै वहां जैनमूर्ती सुसौख्यालया।।२।। एक सौ आठ मूर्ती सुप्रत्येक में। सर्वदा पूजते देव देवी उन्हें।। कोई तीर्थेश की कीर्ति गाते वहाँ। कोई धर्मी गुणों को गिनाते वहाँ।।३।। रत्नमूर्ती मनो मोहनी सोहनी। सर्व कर्मारिसेना हनी सो घनी।। देव पूजें बड़ी भक्ति से आय के। द्रव्य अर्पें सदा स्वर्ग से लाय के।।४।। जो तुम्हें नाथ पूजें स्व पूजा लहें। जो तुम्हें माथ नावें नमें सब उन्हें।। जो तुम्हारे गुणों को सदा गावते। कीर्ति उनकी सदा देवगण गावते।।५।। जो तुम्हारे निकट नृत्यते भाव से। इन्द्र ताकी सभा में नचें चाव से।। जो तुम्हें चंवर ढोरे बड़े चाव से। इन्द्र ढोरे सदा चामरे तास के।।६।। जो धरे शीश पे छत्र थारे प्रभो। इन्द्र धारें सदा छत्र तापे विभो।। जो बजावें मृदंगी धुनी झिल्लरी। इन्द्र बाजे बजावें सदा ता घरी।।७।। मैं बड़े पुण्य से नाथ पायो तुम्हें। धन्य है धन्य है या घड़ी धन्य मैं।। पूजता हूं बड़ी भक्ति श्रद्धा धरे। केवलज्ञान की नाथ आशा धरे।।८।। —दोहा— कनकवर्ण वक्षार की, पूजा रची रसाल। शाश्वत श्री जिनबिंब को, नितप्रति नाऊँ भाल।।९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.७) सुदर्शनमेरु संबंधी चौंतीस विजयार्ध जिनालय पूजा —अथ स्थापना—दोहा— मेरु सुदर्शन पूर्व में, पूर्व विदेह बखान। उसके ही पश्चिम तरफ, अपर विदेह महान।।१।। दो विदेह में देश सब, सोलह-सोलह जान। तामध विजयारध लसें, शुभ बत्तीस प्रमाण।।२।। भरतैरावत क्षेत्र के, दो भूभृत् विजयार्ध। इन सबमें चौंतीस हैं, श्री जिनभवन महार्घ।।३।। —सोरठा— जिनगृह के जिनराज, सबका आह्वानन करूँ। सफल होय मम काज, आधि व्याधि विनसे सभी ।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: पूर्वापरविदेहभरतैरावतसंबंधिचतुस्त्रिंशत्विजयार्धपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: पूर्वापरविदेहभरतैरावतसंबंधिचतुस्त्रिंशत्विजयार्धपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरो: पूर्वापरविदेहभरतैरावतसंबंधिचतुस्त्रिंशत्-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। अथाष्टकं—चाल छन्द क्षीरोदधि उज्ज्वल नीर, सुवरण कलश भरा। जिनवर पद पद्म चढ़ाय, मेटो जन्म जरा।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चंदन केसर घिस लाय, दाह हरे सारी। पूजों श्री जिनवर पाय, आनंद हो भारी।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। शशि किरणों सम अवदात, अक्षत लाता हूँ। प्रभु सन्निध पुंज चढ़ाय, जिन गुण गाता हूँ।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। वर चंपक वंâज कदंब, सुमन सुमन प्यारे। पैâले दशदिश सौगन्ध, पूजूँ पद थारे।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। पेड़ा बरफी पकवान, हलुआ थाल भरे। निज क्षुधा नाशने हेतु, चरु से पूज करें।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। मणिमय दीपक उद्योत, जगमग ज्योति जले। आरति करते निज मोह-मय सब ध्वांत टले।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कृष्णागरु धूप सुगंध, अग्नी संग जरे। कर कर्म पुंज को भस्म, दशदिश धूम भरे।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। बादाम, चिरौंजी दाख, नींबू आम लिये। जिनपद के निकट चढ़ाय, मन आनंद किये।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंध प्रभृति सब लेय, अर्घ बनाया है। जिन चरणों देत चढ़ाय, पुण्य बढ़ाया है।। पूर्वापर क्षेत्र विदेह, भरतैरावत सो। चौंतिस विजयारध मािंह जिनवरपद परसों।।९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— गंगानदी को नीर, वंâचन झारी में भरा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूं।।१०।। शांतये शांतिधारा। कमल केतकी पूâल, हर्षित मन से लायके। जिनवर चरण चढ़ाय, सर्व सौख्य संपति बढ़े।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य —दोहा— प्रथम मेरु पूरब अपर, दक्षिण उत्तर जान। चौंतिस रूपाचल उपरि, जिनगृह पूजूँ आन।।१।। इति प्रथममेरुसंबंधिचतुस्त्रिंशत्विजयार्धस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —नरेन्द्र छन्द— सीतानदि के उत्तर तट में, भद्रसालवन पासे। ‘कच्छा देश’ विदेह बीच में, विजयारध गिर भासे।। नववूâटों में सिद्ध वूâट पर, जिनवर भवन महाना। ऋषिगण वंदन करने जाते, मैं पूजूँ इह थाना।।१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे कच्छादेशमध्यस्थित-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मेरु के पश्चिम उस तट पर, देश ‘सुकच्छा’ सोहै। तामध रजताचल अतिसुन्दर, सुर किन्नर मन मोहै।।नव.२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे सुकच्छादेशमध्य-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महाकच्छा’ कहलाता, रूपाचल ता मध्ये। विद्याधर ललना किन्नरियां, जिनगुण गातीं तथ्ये।।नव.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे महाकच्छादेशमध्य-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘कच्छकावती’ सुमध्ये रूपाचल सुखकारी। सुर ललना के वीणा स्वर से, जन जन का मनहारी।।नव.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे कच्छकावतीदेशमध्य-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश कहा ‘आवर्ता’ सुन्दर रूपाचल तसु बीचे। रक्ता-रक्तोदा नदियों से, छह खंड होते नीके।। नववूâटों में सिद्धवूâट पर जिनवर भवन महाना। ऋषिगण वंदन करने जाते, मैं पूजूँ भवहाना।।५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे आवर्तादेशमध्यविजयार्ध-पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश कहा ‘लांगल आवर्ता’ ता मध रूपाचल है। तीनों कटनी पे वनवेदी वापी जल निर्मल है।।नव.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे लांगलावर्तादेशमध्य-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुन्दर देश ‘पुष्कला’ के मधि रूपाचल मन भावे। उभय तरफ पचपन-पचपन, खग नगरी मन ललचावे।।नव.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे पुष्कलादेशमध्य-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कलावती’ सुहाता, उसमें रजत गिरी है। विद्याधर की कर्म भूमियाँ, मुक्ती मार्ग पुरी हैं।।नव.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानद्युत्तरतटे पुष्कलावतीदेशमध्य-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —नरेन्द्र छन्द— पूर्व विदेह विषैं सीता के, दक्षिण तट में माना। देवारण्य वेदिका सन्निध, ‘वत्सादेश’ बखाना।। मध्य रजतगिरि सिद्धवूâट पर, जिनमंदिर अभिरामा। जिनवर चरण कमल हम पूजें, मिले सर्वसुख धामा।।९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे वत्सादेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतानदि के दक्षिण तट पर, देश ‘सुवत्सा’ सोहे। तीर्थंकर चक्री प्रतिचक्री, हलधर वहँ नित होवें।। मध्य रजतगिरि सिद्धवूâट पर, जिनमंदिर अभिरामा। जिनवर चरण कमल हम पूजें, मिले सर्वसुख धामा।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे सुवत्सादेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। क्रम से देश ‘महावत्सा’ में रजताचल है जानो। गंगा सिन्धू नदियों से भी, छह खंड होते मानो।।मध्य.११।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे महावत्सादेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘वत्सकावती’ वहां नित, कर्मभूमि मन भावे। भव्य जीवगण कर्म अरी हन, मुक्तिरमा सुख पावें।।मध्य.।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे वत्सकावतीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रम्यादेश’ आर्यखंड में, असि मषि आदि क्रिया हैंं। क्षत्रिय वैश्य शूद्र त्रयवर्णी, होते सदा जहाँ हैंं।।मध्य.।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे रम्यादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुरम्या’ शुभविदेह में, देह नाश कर प्राणी। हो जाते हैं वे विदेह इस, हेतू सार्थक नामी।।मध्य.।।१४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे सुरम्यादेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रमणीया’ शुभदेश वहाँ पर तीर्थंकर नित होते। समवशरण में भव्य जीवगण जिनधुनि सुन मल धोते।।मध्य.।।१५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे रमणीयादेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘मंगलावती’ जहां पर, मुनिगण नित्य विचरते। चिच्चैतन्य चमत्कारी निज, शुद्धातम में रमते।। मध्य रजतगिरि सिद्धवूâट पर, जिनमंदिर अभिरामा। जिनवर चरण कमल हम पूजें, मिले सर्वसुख धामा।।१६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे मंगलावतीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —अडिल्ल छंद— अपर विदेह सीतोदिंह इधर में। भद्रसाल वन पास, जु ‘पद्मा’ नगरि में।। मध्य रजतगिरि तापे श्री जिनगेह हैं। जिनगुण संपत्ति हेतु, जजो धर नेह है।।१७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे पद्मादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अपर विदेह सुमािंह, नदी के अवर में। ‘देश सुपद्मा’ मध्य आरज खंड में।।मध्य.।।१८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे सुपद्मादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महापद्मा’ छहखंडों युत सही। असि मषि आदिक् छह किरिया वहां नित कहीं।।मध्य.।।१९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे महापद्मादेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पद्मकावती’ मनोहर जानिये। जिन चैत्यालय ठौर ठौर पर मानिये।।मध्य.।।२०।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे पद्मकावतीदेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शंखा’ देशविषैं जिनधर्महि एक है। अन्य धर्म का नाम जहाँ निंह लेश है।।मध्य.।।२१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे शंखादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिनी ’ देश विदेह, कर्मभूमी सदा। मुनिवर आतम ध्याय कर्म से हों जुदा।। मध्य रजतगिरि तापे श्री जिनगेह हैं। जिनगुण संपत्ति हेतु, जजो धर नेह है।।२२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे नलिनीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। ‘कुमुद’ देश के मािंह जिनेश्वर नित रहें। समवसरण में भविक, धर्म अमृत लहें।।मध्य.।।२३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे कुमुददेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। ‘सरित’ देश में सदा मुमुक्षूजन बसें। मोक्ष प्राप्ति की आश धरे तन को कसें।।मध्य.।।२४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतानदीदक्षिणतटे सरितदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। —लोलतरोल छंद— सीतोदा के उत्तर दिक् में, देवारण्य निकट ‘वप्रा’ में। बीचोंबीच रूप्यगिरि सोहे, तापर जिनगृह मुनि मन मोहे।।२५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानद्युत्तरतटे वप्रादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुवप्रा’ आरज खंड में, ईति भीति दुर्भिक्ष न उनमें। बीचोंबीच रूप्यगिरि सोहे, तापर जिनगृह मुनि मन मोहे।।२६।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानद्युत्तरतटे सुवप्रादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महावप्रा’ सुखदाता, स्वर्ग मोक्ष का सही विधाता। बीचोंबीच रूप्यगिरि सोहे, तापर जिनगृह मुनि मन मोहे।।२७।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानद्युत्तरतटे महावप्रादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। देश ‘वप्रकावती’ सुहाता, सुर नर किन्नर के मन भाता। बीचोंबीच रूप्यगिरि सोहे, तापर जिनगृह मुनि मन मोहे।।२८।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानद्युत्तरतटे वप्रकावतीदेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधादेश’ विषैं जिनगेहा, उन्हें जजें सुर नर धर नेहा। बीचोंबीच रूप्यगिरि सोहे, तापर जिनगृह मुनि मन मोहे।।२९।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानद्युत्तरतटे गंधादेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुगन्धा’ मुक्ति प्रदानी, मुनि तप करें वरें शिवरानी। बीचोंबीच रूप्यगिरि सोहे, तापर जिनगृह मुनि मन मोहे।।३०।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानद्युत्तरतटे सुगन्धादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। देश ‘गंधिला’ में जो जन्मे, पूर्वकोटि आयूवर उनमें। बीचोंबीच रूप्यगिरि सोहे, तापर जिनगृह मुनि मन मोहे।।३१।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानद्युत्तरतटे गंधिलादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधमालिनी’ में होते जो, तनु ऊँचे वर धनुष पांच सौ। बीचों बीच रूप्यगिरि सोहे, तापर जिनगृह मुनि मन मोहे।।३२।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसीतोदानद्युत्तरतटे गंधमालिनीदेश-स्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। —चौपाई छंद— ‘भरत क्षेत्र’ में हैं छह खंड, विजयाद्रि इस आरज खंड। सिद्धवूâट पर श्री जिनधाम, जिनपद पूजूँ करूँ प्रणाम।।३३।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिभरतक्षेत्रस्थविजयार्धपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। ‘ऐरावत’ मधि रजतगिरीश, तापर सिद्धवूâट जिन ईश। जल गंधादिक अघ्र्य मिलाय, पूजन करूँ मुदित गुण गाय।।३४।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थविजयार्धपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं fिनर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य-शम्भु छंद— कनकाचल के पूर्वापर में, बत्तीस रजतगिरि माने हैं। इक भरत एक ऐरावत के, दो रूप्याचल परधाने हैं।। इन चौंतिस के सब सिद्धवूâट, मणिमय जिनबिंब विराजे हैं। जल गंधादिक ले पूजत ही, मेरे सब पातक भाजे हैं।।३५।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला —शम्भु छन्द— जय बत्तिस देश विदेहों के, सब रजतमयी विजयार्ध कहें। जय भरतैरावत के दो हैं, सब तीन कटनियों सहित रहें।। इक सौ दश नगरी खेचर की, शाश्वत उन सब पर बनी हुर्इं। जय नववूâटोें युत उन सबमें, इक सिद्धवूâट जिनभवन मयी।।१।। —स्रग्विणी छन्द— (चाल-नाथ तेरे कभी.....) देव त्रैलोक्य के पूर्ण चंदा तुम्हें। मैं नमूँ मैं नमूँ हे जिनन्दा तुम्हें।। नाथ! मेरी हरो जन्म व्याधी व्यथा। मैं सुनाऊँ तुम्हें संसरण की कथा।।२।। मैं निगोदी रहा काल आनन्त्य ना। एक इन्द्रीय भू अग्नि वायू बना।। नाथ! मेरी हरो जन्म व्याधी व्यथा। मैं सुनाऊँ तुम्हें संसरण की कथा।।३।। वंâ वनस्पत्य हूआ सहा दु:ख हा। सूक्ष्म तनधार जन्मा मरा नाथ! हा।। नाथ! मेरी हरो जन्म व्याधी व्यथा। मैं सुनाऊँ तुम्हें संसरण की कथा।।४।। केंचुआ श्ांख चींटी ततैया हुआ। जन्म धर धर मुआ जन्म धर धर मुआ।। नाथ! मेरी हरो जन्म व्याधी व्यथा। मैं सुनाऊँ तुम्हें संसरण की कथा।।५।। मैं पशू योनि में जो महा दुख सहा। नाथ! वैâसे कहूूँ आप जानो हहा।। नाथ! मेरी हरो जन्म व्याधी व्यथा। मैं सुनाऊँ तुम्हें संसरण की कथा।।६।। देवयोनी मनुजयोनि में भी दुखी। नारकी जो हुआ तो दुखी ही दुखी।। नाथ! मेरी हरो जन्म व्याधी व्यथा। मैं सुनाऊँ तुम्हें संसरण की कथा।।७।। मैं कहूं क्या प्रभो आप हो केवली। मोह शत्रू मुझे ये भ्रमावे बली।। नाथ! मेरी हरो जन्म व्याधी व्यथा। मैं सुनाऊँ तुम्हें संसरण की कथा।।८।। मोह को नाश मैं आपके पास में। नाथ आना चहूँ है यही आस में।। नाथ! मेरी हरो जन्म व्याधी व्यथा। मैं सुनाऊँ तुम्हें संसरण की कथा।।९।। —घत्ता छंद— रूपाचल जिनभवन तनी जिनराज कहे हैं। देव इन्द्र धरणेन्द्र सभी से वन्द्य कहे हैं।। मन वच काय लगाय सदा उनके गुण गाऊँ। पूजन अर्चन नमन, करूँ भव से छुट जाऊँ।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीसुदर्शनमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालय-स्थसर्वजिनबिंबेभ्य: जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.८) जम्बूद्वीप भरतक्षेत्र वर्तमान तीर्थंकर पूजा स्थापना-गीता छंद वृषभादि चौबिस तीर्थकर इस भरत के विख्यात हैं। जो प्रथित जंबूद्वीप के संप्रति जिनेश्वर ख्यात हैं।। इन तीर्थंकर के तीर्थ में सम्यक्त्व निधि को पायके। थापूँ यहाँ पूजन निमित अति चित्त में हरषाय के।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-स्रग्विणी छंद देवगंगा सलिल स्वर्ण झारी भरूँ। नाथ पादाब्ज में तीन धारा करूँ।। श्री वृषभ आदि चौबीस जिनराज को। पूजते ही लहूँ स्वात्म साम्राज्य को।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। गंध केशर घिसा के कटोरी भरूँ। आपके पाद पंकज समर्चन करूँ।।श्री वृषभ.।।२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो चंदनं निर्वपामीतिस्वाहा। चँद्र की चांदनी सम धवल शालि हैं। जो जजें पुंज से वे सुकृत शालि हैं।।श्री वृषभ.।।३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। वुँâद मचवुंâद बेला चमेली लिये। कामहर नाथ पद में समर्पित किये।।श्री वृषभ.।।४।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। पूरिका लड्डुओं से भरूँ थाल मैं। पूजहूँ आपको क्षुध् व्यथा नाशने।।श्री वृषभ.।।५।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीप कर्पूर की ज्योति से पूजते। ज्ञान उद्योत हो मोह अरि छूटते।।श्री वृषभ.।।६।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप दशगंध ले अग्नि में खेवते। आत्म सौरभ उठे नाथ पद सेवते।।श्री वृषभ.।।७।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा। आम अंगूर केला अनंनास ले। नाथ पद पूजते मुक्ति संपति मिले।।श्री वृषभ.।।८।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा। तोय गँधादि वसु द्रव्य ले थाल में। अघ्र्य अर्पण करूँ नायके भाल मैं।।श्री वृषभ.।।९।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुंजग शांती कर सदा। चउसंघशांती हेतु, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- शुद्ध बुद्ध परमात्मा, पाया ज्ञान प्रभात। परमानंद निजात्म में, मग्न रहें दिन रात।।१।। इति मंडलोस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। नरेन्द्र छंद-चाल-परं परंज्योति कोटि चंद्रादित्य......... ‘वृषभ देव’ के चरण कमल को, नित शत इंद्र जजें हैं। कर्मकालिमा दूर भगा कर, स्वातम तत्त्व भजे हैं।। मैं भी दृढ़ भक्ती से पूजूँ, कर्म शृंखला टूटे। प्रभु मुक्ती होने तक मेरा, सम्यक् रत्न न छूटे।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। कर्म शत्रु को जीत, ‘अजित’ जिन, जग में ख्यात हुये हैं। नाथ आपका आश्रय लेकर बहुजन पार हुये हैं।।मैं.।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। दृढ़ पुरुषार्थ सफल कर तुमने, भवभय नाश किया है। इसीलिये इंद्रों ने सार्थक, ‘संभव’ नाम दिया है।।मैं.।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सब जग को आनंदित करने, ‘अभिनंदन’ भगवंता। जो धन ध्यावें हृदय कमल में, भवभय व्याधि हरंता।।मैं.।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअभिनंदननाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। कुमति त्याग कर सुमतिवरण कर, ‘सुमति’ नाम प्रभु पाया। मुझको भी सुमती दीजे अब, मैं जग से अकुलाया।।मैं.।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुमतिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मुक्तीपद्मा से आलिंगित, ‘पद्मप्रभु’ जग नामी। जो जन पादपद्म तुम सेते, होते शिवश्री स्वामी।।मैं.।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘सुपाश्र्व’ के पास आय के, मिटे सकल जग फिरना। प्रभो आप वच नाव पाय के, होय भवोदधि तिरना।।मैं.।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘चन्द्रनाथ’ तुम आस्य चंद्र से, वचनामृत झरता है। कर्णपुटों से पीते ही तो, हर्षाम्बुधि बढ़ता है।।मैं.।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीचंद्रप्रभनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। गणधर गण भी प्रभु गुण पाकर, पार नहीं पाते हैं। ‘पुष्पदंत’ तुम नाम मात्र से, निज आनंद पाते हैं।।मैं.।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपुष्पदंतनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मोह अग्नि से झुलस रहा जग, ‘शीतल’ शीतल करिये। नाथ! शीघ्र ही भाक्तिक जन की, सकल भरम बुधि हरिये।।मैं.।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशीतलनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘श्रेयांस’ जगत में सबको, श्रेयस्कर हितकारी। इंद्र नरेन्द्र सभी मिल पूजें, गुण गावें रुचि धारी।।मैं.।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीश्रेयोजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘वासुपूज्य’ वासवगण पूजित, वसुगुण मुख्य धरे हैं। सुर किन्नरियाँ वीणा लेके, प्रभु गुणगान करे हैं।।मैं.।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवासुपूज्यनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। भावकर्ममल द्रव्य कर्ममल, धोकर ‘विमल’ हुये हैं। विमल धाम हेतु मुनिगण भी, तुम पदलीन हुये हैं।।मैं.।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविमलनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। भव ‘अनंत’ को सर्वनाश कर, नाथ अनंत सुखी हैं। तुम पद पंकज जो भवि पूजे, होते पूर्ण सुखी हैं।।मैं.।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। धर्म चक्रधर ‘धर्म’ जिनेश्वर, दशविध धर्म प्रदाता। मुनिगण सुरगण विद्याधर गण, वंदत पावें साता।। मैं भी दृढ़ भक्ती से पूजूँ, कर्म शृंखला टूटे। प्रभु मुक्ती होने तक मेरा, सम्यक् रत्न न छूटे।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शांतिनाथ’ तुम पद आश्रय ले, भविजन शांती पाते। इसी हेतु जग से अकुला कर, तुम शरणागत आते।।मैं.।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। चिच्चैतन्य सुधारस दाता, ‘वुंâथुनाथ’ भगवंता। जो तुम वंदे भवदुख खंडे, चित्सुख आस धरंता।।मैं.।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवुंâथुनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अरजिनवर’ का वंदन करके, सुरनर पुण्य कमाते। निज कर में निजगुण संपति ले, सब दुख दोष गंवाते।।मैं.।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। काम मल्ल औ मोह मल्ल को, मृत्यु मल्ल को चूरा। ‘मल्लिनाथ’ ने भक्तजनों के, मनवांछित को पूरा।।मैं.।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘मुनिसुव्रत’ भगवान् स्वयं में, मुनिव्रत धर भवजीता। उनके पद चिन्हों पर चलके, अगणित ने यम जीता।।मैं.।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। रत्नत्रय निधि के स्वामी हैं, ‘नमि’ तीर्थंकर जग में। फिर भी सर्व परिग्रह विरहित, मुद्रा नग्न प्रगट में।।मैं.।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नेमिनाथ’ ने राजमती तज, मुक्तिवल्लभा चाही। सरस्वती माता ने उनकी, अनुपम कीर्ती गाई।।मैं.।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

कमठ दैत्य के उपसर्गों से, परम सहिष्णु कहाये। ‘पारस’ नाम मंत्र मन धारें, सहन शक्ति वे पायें।।मैं.।।२३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘वर्धमान’ अतिवीर वीर प्रभु, सन्मति नाम तुम्हारे। महावीर प्रभु को जो वंदे, सकल अमंगल टारें।।मैं.।।२४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्र्य- वृषभदेव को आदि ले, महावीर पर्यन्त। श्री चौबीस जिनेश को, पूजत हो भव अंत।।२५।।


शांतये शांतिधारा।दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य-ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- चिन्मय चिंतामणि रतन, तीन भुवन के ईश। गाऊँ तुम जयमालिका, नमूँ नमूँ नत शीश।।१।। -पृथ्वी छंद- जिनेन्द्र! तुम शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अविकार हो। जिनेन्द्र! तुम वर्णहीन बिनमूर्ति साकार हो।। निराभरण हो तथापि जग के अलंकार हो। अनंतगुण पुंजभूत फिर भी निराकार हो।।१।। अनंत शुचिदर्श से सकल लोक अवलोकते। अनंत वर ज्ञान से सकल भव्य संबोधते।। अनंत निज शक्ति से श्रम न हो कदाचित् तुम्हें। अनंत वर सौख्य से अमित काल तृप्ती तुम्हें।।२।। न चक्षु न हि कर्ण घ्राण न हि स्पर्शनेंद्रिय तुम्हें। न जीभ अतएव जिन अतीन्द्रिय स्वमुख तुम्हें।। न शब्द रस गंध वर्ण विषयादि स्पर्श ना। न क्रोध मद छद्म लोभ रति द्वेष संघर्ष ना।।३।। न कर्म नोकर्म नाथ न हि भाव कर्मादि हैं। न बंध न हि आस्रवादि नहि शल्य बाधादि हैं।। न रोग शोकादि नाथ न हि जन्म मरणादि हैं। न क्लेश न हि इष्ट निष्ट वीयोग योगादि हैं।।४।। स्वयं परम तृप्त नाथ परमैक परामातमा। स्वयं स्वयंभू स्वत: सुख स्वरूप सिद्धातमा।। अमूर्तिक विभो तथापि चिनमूर्ति चिंतामणी। अपूर्व तुम कल्पवृक्ष त्रैलोक्य चूड़ामणी।।५।। अनंत भव सिंधु से तुरत नाथ! तारो मुझे। अनंत दु:ख अब्धि से जिनपते! उबारो मुझे।। प्रभो मुझ समस्त दोष अब तो क्षमा कीजिये। स्व ‘ज्ञानमति’ नाथ शीघ्र करके कृपा दीजिये।।६।। -घत्ता- वृषभादि जिनेश्वर, मुक्तिवधूवर, सुखसंपतिकर तुमहिं नमूँ। निज आतम शुचिकर, सम्यक् निधिधर, पेâर न भव वन बीच भ्रमूँ।।७।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्य वर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.९) जम्बूद्वीप ऐरावत क्षेत्र वर्तमान तीर्थंकर पूजा स्थापना-अडिल्ल छंद ऐरावत के वर्तमान जिनराज हैं। भव वारिधि से तारण तरण जिहाज हैं।। भक्ति भाव से करूँ यहाँ उन थापना। पूजूँ भक्ति बढ़ाय करूँ हित आपना।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-रोला छंद सुरगंगा को नीर, वंâचनकलश भराऊँ। जिनवर चरण सरोज, पूजत कर्म नशाऊँ।। चौबीसों जिनराज, तुम पदपद्म जजूँ मैं। आतम अनुभव पाय, परमानंद भजूँ मैं।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयागिरि घनसार, केशर संग घिसाऊँ। तीर्थंकर पदवंâज, पूजत दाह मिटाऊँ।।चौबीसों.।।२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनंं निर्वपामीति स्वाहा। क्षीरोदधि के पेâन, सम उज्ज्वल तंदुल हैं। परम पुरुष को पूज, होता सुख मंजुल है।। चौबीसों जिनराज, तुम पदपद्म जजूँ मैं। आतम अनुभव पाय, परमानंद भजूँ मैं।।३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। कल्पवृक्ष के पुष्प, सुरभित वरण वरण के। कामजयी परमेश, चरण जजॅूं रुचि धरके।।चौबीसों.।।४।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। मधुर सरस पकवान, भर भर थाल लिया मैं। क्षुधा रोग हर नाथ, पूजत सौख्य लिया मैं।।चौबीसों.।।५।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। घृत दीपक की ज्योति, बाहर तिमिर हरे है। तुम पद पूजत शीघ्र, मन का मोह टरे है।।चौबीसों.।।६।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कृष्णागरु वर धूप, अग्नी संग जलाऊँ। कर्म कलंक विदूर, आतम शुद्ध बनाऊँ।।चौबीसों.।।७।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। पिस्ता पूग बदाम, फल अखरोट चढ़ाऊँ। फल से जिनवर पूज, सर्वोत्तम फल पाऊँ।।चौबीसों.।।८।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंधादिक द्रव्य, लेकर अघ्र्य बनाऊँ। भवविजयी जिनपाद, पूजत पाप नशाऊँ।।चौबीसों.।।९।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुँजग शांतीकर सदा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- कर्म मलीमस आत्मा, प्रभु तुम भक्ति प्रसाद। शुद्ध बुद्ध होवे तुरत, अत: नमूँ तुम पाद।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -पद्धड़ी छंद- जिन ‘बालचन्द्र’ त्रैलोक्यनाथ, गणईस भजें नित नमित माथ। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीबालचन्द्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। प्रभु ‘सुव्रत’ तीर्थंकर महेश, तुमको ध्यावें मुनिगण अशेष। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुव्रतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘अग्निसेन’ जिनदेव आप, भविजन के हरते सकल ताप। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअग्निसेनजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘नंदिसेन’ के पाद वंâज, योगी गण वंदत कर्म भंज। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनन्दिसेनजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनवर ‘श्रीदत्त’ पदारविंद, जजते ही मिटता सकल द्वंद्व। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीदत्तजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनवर ‘व्रतधर’ हो श्रेष्ठ चंद्र, भविमन आल्हादक श्रेष्ठ मंत्र। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीव्रतधरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘सोमचन्द्र’ अद्भतु दिनेश, अज्ञान तिमिर को हरें शेष। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसोमचन्द्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्रीमन ‘धृतिदीर्घ’ अपूर्व तेज, जनमन का तत्क्षण हरें खेद। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीधृतिदीर्घजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिन ‘शतायुष्य’ सब कर्मचूर, भक्तों के संकट करें दूर। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशतायुष्यजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनवर ‘विवसित’ अद्भुत महान्, सुरकिन्नर गावें कीर्तिगान। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविवसितजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘श्रेयान’ जिनेश्वर मुक्तिकांत, वंदन से हरते मोहध्वांत। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीश्रेयोजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिन ‘विश्रुतजल’ भवजलधिनाव, जो ध्यावें पावें शुद्धभाव। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविश्रुतजलजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिन ‘सिंहसेन’ तीर्थेश आप, भाक्तिकजन के सब हरो पाप। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसिंहसेनजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘उपशांत’ जिनेश्वर सुनो टेर, हरिये भव भव का सकल पेâर। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीउपशांतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। हे नाथ! ‘गुप्तशासन’ जिनेश, मेरे हरिये सब रोग द्वेष। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीगुप्तशासनजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनवर ‘अनंतवीरज’ महान्, गुणमणिरत्नों की अतुल खान। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअनंतवीर्यजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘पाश्र्व’ जिनेश्वर देवदेव, भवसंकट करिये तुरत छेव। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपाश्र्वजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनवर ‘अभिधान’ सुबोध पुंज, इंद्रादि नमें धर रत्नपुंज। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअभिधानजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘मरुदेव’ तीर्थकर सूर्य तुल्य, भविजनमनपंकज करें पुâल्ल। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमरुदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनवर ‘श्रीधर’ त्रैलोक्यदेव, शिवलक्ष्मी संयुत परमदेव। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्री-श्रीधरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिन ‘शामवंâठ’ की दिव्यवाणि, भव वल्ली काटन को कृपाणि। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशामवंâठजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ाqजन ‘अग्निप्रभ’ भवदाहदूर, भविजन भव अग्नी शमन पूर। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअग्निप्रभजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘अग्निदत्त’ जिनदेवदेव, शिवकांता इच्छुक करें सेव। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।२३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअग्निदत्तजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘वीरसेन’ भगवान् आप, निज स्वात्मसुधा पीकर अपाप। शिवपद के विघ्न विनाश हेत, मैं जजूूं सदा श्रद्धा समेत।।२४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवीरसेनजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्र्य- श्री चौबीस जिनेश, सकल अमंगल को हरें। पूरे सौख्य हमेश, पूूजूँ परण अघ्र्य ले।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीबालचन्द्रादिवीरसेनपर्यंततचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- तीनलोक की संपदा, करें हस्तगत भव्य। तुम गुण माला गाय के, पूरें सब कर्तव्य।।१।। चाल-हे दीनन्धु...... जैवंत मुक्तिवंâत देवदेव हमारे। जैवंत भक्त जंतु भवोदधि से उबारे।। हे नाथ! आप जन्म के छह मास ही पहले। धनराज रत्नवृष्टि करें मातु के महलें।।१।। माता की सेव करतीं श्री आदि देवियाँ। अद्भुत अपूर्व भाव धरें सर्व देवियां।। जब आप मात गर्भ में अवतार धारते। तब इंद्र सपरिवार आय भक्ति भार से।।२।। प्रभु गर्भ कल्याणक महाउत्सव विधि करें। माता पिता की भक्ति से पूजन विधि करें।। हे नाथ! आप जन्मते सुरलोक हिल उठे। इंद्रासनों के वंâप के आश्चर्य हो उठे।।३।। इंद्रों के मुकुट आप से ही आप झुके हैं। सुरकल्पवृक्ष हर्ष से ही पूâल उठे हैं।। वे सुरतरु स्वयमेव सुमन वृष्टि करे हैं। तब इंद्र आप जन्म जान हर्ष भरे हैं।।४।। तत्काल इंद्र िंसहपीठ से उतर पड़ें। प्रभु को प्रणाम करके बार बार पग पड़े।। भेरी करा सब देव का आह्वानन करे हैं। जन्माभिषेक करने का उत्साह भरे हैं।।५।। सुरराज आ जिनराज को सुरशैल ले जाते। सुरगण असंख्य मिलके महोत्सव को मनाते। जब आप हो विरक्त देव सर्व आवते। दीक्षा विधी उत्सव महामुद से मनावते।।६।। जब घातिया को घात ज्ञानसंपदा भरें। तब इंद्र आ अद्भुत समवसरण विभव करें।। तुम दिव्य वच पियूष को पीते असंख्यजन। क्रम से करें वे मुक्ति वल्लभा का अलिंगन।।७।। जब आप मृत्यु जीत मुक्ति धाम में बसे। सिद्ध्यंगना के साथ परमानंद सुख चखें।। सब इंद्र आ निर्वाण महोत्सव मनावते। प्रभु पंचकल्याणक पती को शीश नावते।।८।। हे नाथ! आप कीर्ति कोटि ग्रंथ गा रहे। इस हेतु से ही भव्य आप शरण आ रहे।।। मैं आप शरण पायके सचमुच कृतार्थ हूँ। बस ‘ज्ञानमती’ पूर्ण होने तक ही दास हूँ।।९।। -दोहा- पंचमगति के हेतु मैं, नमन करूँ पंचांग। परमानंद अमृत अतुल, सौख्य भरो सर्वांग।।१०।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१०) जम्बूद्वीप विहरमाण तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-गीता छंद इस प्रथम जंबूद्वीप बीचे पूर्व अपर विदेह हैं। इस मध्य बत्तिस देश में शुभ कर्मभूमि सदैव हैं।। भगवान सीमंधर व युगमंधर व बाहु सुबाहुजी। ये श्रीविहार करें वहाँ आह्वानन कर मैं जजूँ जी।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहुचतु-स्तीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहुचतु-स्तीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहुचतु-स्तीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-चाल नंदीश्वर पूजा सीतानदि शीतल नीर, प्रभुपद धार करूँ। मिट जाये भव भव पीर, आतम शुद्ध करूँ।। श्री विहरमाण जिनराज, मेरी अर्ज सुनो। दे दीजे मुझ साम्राज, मैं तुम चरण नमो।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयागिरि गंध सुगंध, प्रभु चरणों चर्चूं। मिल जावे आत्म सुगंध, स्वारथवश अर्चूं।।श्री.।।२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। कौमुदी शालि के पुंज, नाथ! चढ़ाऊँ मैं। जिन आत्म सौख्य अखंड, अर्चत पाऊँ मैं।। श्री विहरमाण जिनराज, मेरी अर्ज सुनो। दे दीजे मुझ साम्राज, मैं तुम चरण नमो।।३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। वरमौलसिरी व गुलाब, पुष्प चढ़ाऊँ मैं। प्रभु मिले आत्मगुण लाभ, आप रिझाऊँ मैं।।श्री.।।४।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। लाडू पेड़ा पकवान, नाथ! चढ़ाऊँ मैं। कर क्षुधा वेदनी हान, निजसुख पाऊँ मैं।।श्री.।।५।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपक की ज्योति अखंड, आरति करते ही। मिल जावे ज्योति अमंद, निजगुण चमवेंâ ही।।श्री.।।६।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। वर धूप अग्नि में खेय, सुरभि उड़ाऊँ मैं। प्रभु पद पंकज को सेय, समसुख पाऊँ मैं।।श्री.।।७।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: धूप निर्वपामीति स्वाहा। केला एला बादाम, फल से पूजूँ मैं। पाऊँ निज में विश्राम, भव से छूटूँ मैं।।श्री.।।८।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। वसु अर्घ रजत के पुष्प, थाल भराय लिया। रत्नत्रय से मन तुष्ट, आप चढ़ाय दिया।।श्री.।।९।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपस्थपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितसीमंधरयुगमंधरबाहुसुबाहु-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- नाथ! पाद पंकेज, जल से त्रयधारा करूँ। अतिशय शांती हेत, शांतीधारा विश्व में।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार गुलाब, पुष्पांजलि अर्पण करूँ। मिले आत्मसुखलाभ, जिनपद पंकज पूजते।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अर्घ -दोहा- जंबूद्वीप विदेह में, विहरमाण जिनराज। पुष्पांजलि कर पूजते, सरें सर्व जिनकाज।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -शंभु छंद- श्री मेरु सुदर्शन के पूरब विदेह सीता के ऊपर तट। है पुंडरीकिणी पुरी पिता, श्रेयांस सती माता विश्रुत।। वृष चिन्ह सहित श्री सीमंधर, भगवान अभी भी राजे हैं। मैं उनको अर्घ चढ़ाकर के, पूजूँ आतम सुख भासे हैं।।१।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहक्षेत्रस्थपुण्डरीकिणीपुरीमध्यसमवसरण-स्थित-सीमंधरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री मेरु सुदर्शन के पूरब, विदेह सीता नदि दक्षिण में। दृढ़रथ पितु मात सुतारा से, जन्में प्रभु विजयानगरी में।। गज चिन्ह सहित श्री ‘युगमंधर’ तीर्थंकर समवसरण में हैं। हम पूजें बहुविध भक्ति लिये, सबके ही लिय शरण ये हैं।।२।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहक्षेत्रस्थविजयनगरीमध्यसमवसरणस्थित-युगमंधरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस जम्बूद्वीप अपर विदेह, सीतोदा नदि के दक्षिण मेंं। शुभ पुरी सुसीमा के राजा, उन रानी से भगवन् जन्में।। मृगचिंह सहित ‘श्रीबाहु’ आप, विहरण कर भविजन हरसाते। हम पूजें अर्घ चढ़ा करके, प्रभु धर्मामृत तुम बरसाते।।३।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहक्षेत्रस्थसुसीमानगरीrमध्यसमवसरण-स्थित-श्रीबाहुजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस जंबूद्वीप अपर विदेह, सीतोदा नदि के उत्तर में। हैं पुरी अयोध्या के नरपति, उनकी रानी से प्रभु जन्में।। तीर्थेश ‘सुबाहु’ शतइंद्रों, वंदित कपि चिन्ह सहित राजें। हम पूजें अर्घ चढ़ा करके, सब रोग शोक दारिद भाजें।।४।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहक्षेत्रस्थअयोध्यापुरीमध्यसमवसरण-स्थित-श्रीसुबाहुजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्र्य-चौपाई- पूर्वापर बत्तीस विदेह, चार तीर्थंकर नित विहरेय। पूजूँ पूरण अर्घ चढ़ाय, सब दुख संकट जांय पलाय।।१।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसम्बन्धिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसीमंधरादिचतुस्तीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामिति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला अनंगशेखर छंद नमो नमो जिनेंद्रदेव! आप सौख्यरूप हो, अनंत दिव्य ज्ञान से समस्त लोक भासते। नमो नमो जिनेन्द्रदेव आप चित्स्वरूप हो, अनंत दिव्य चक्षु से समस्त विश्व लोकते।।१।। नमो जिनेन्द्र देव आप सर्व शक्तिमान हो, अनंत वस्तु देखते तथापि श्रांत हों नहीं, नमो जिनेन्द्रदेव! आपमें अनंत गुण भरे, गणीन्द्र भी गिने तथापि पार पावते नहीं।।२।। प्रभो असंख्य भव्य जीव आपकी शरण गहें, अनादि के अनंत दु:ख वार्धि से स्वयं तिरें। असंख्य जीव मन वश न आप पास आवते, स्वयं हि वे अपार भव अरण्य में सदा फिरें।।३।। अनेक जीव दृष्टि रत्न पाय के निहाल हों, अनेक जीव तीनरत्न पाय मालामाल हों। अनेक जीव आप भक्ति में विभोर हो रहे, अनेक जीव मृत्यु को पछाड़ पुण्यशालि हो रहे।।४।। मुनींद्रवृंद हाथ जोड़ शीश नाय नायके, पुन:पुन: नमें तथापि तृप्ति ना लहें कभी। सुरेंद्रवृंद अष्ट द्रव्य लाय अर्चना करें, सुदिव्य रत्न को चढ़ाय तृप्ति ना लहें कभी।।५।। नरेन्द्रवृंद भक्ति में विभोर नृत्य भी करें, सुरांगना जिनेन्द्र भक्ति गीत गा रहीं वहाँ। खगेन्द्रवृंद गीत गा संगीत वाद्य को बजा, खगांगना के साथ नाथ! अर्चना करें वहाँ।।६।। जिनेन्द्र! आपकी सभा असंख्य भव्य से भरी, तथापि क्लेश ना किसी को ये प्रभाव आपका। निरक्षरी ध्वनी खिरे सभी के कर्ण में पड़े, सभी समझ रहें स्वयं प्रभो! प्रभाव आपका।।७।। सुभव्य जीव ही सुनें गुनें निजात्म तत्त्व को, अपूर्व तेज आपका न कोई पार पा सवेंâ। जयो जयो जयो प्रभो! अनंत ऋद्धिपूर्ण हो, करो मुझे निहाल नाथ! आप भक्त जान के।।८।। -दोहा- सीमंधर युगमंधरा, बाहु सुबाहु जिनेश। नमूँ ‘ज्ञानमति’ हेतु मैं, हरो सर्व भव क्लेश।।९।। ॐ ह्रीं जम्बूद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसीमंधरादिचतुस्तीर्थंकरेभ्य: जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.११) जम्बूद्वीपस्थ नवदेवता पूजा अथ स्थापना-गीता छंद इस प्रथम जंबूद्वीप में सब कर्मभू चौंतीस हैं। अर्हंत सिद्धाचार्य पाठक साधु यहाँ जगदीश हैं।। जिनधर्म जिनआगम जिनेश्वर बिंब जिनमंदिर यहाँ। पूजूँ इन्हें आह्वानन कर त्रयरत्न निधि मिलती यहाँ।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ- नरेन्द्र छंद सरयू नदि का शीतल जल ले जिनपद धार करूँ मैं। साम्य सुधारस शीतल पीकर भव भव त्रास हरूँ मैं।। कर्मभूमि के नवदेवों को पूजत निज सुख पाऊँ। इष्ट वियोग अनिष्ट योग के सब दुख शीघ्र नशाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्व-साधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। काश्मीरी केशर चंदन घिस जिनपद में चर्चूं मैं। मानस आगंतुक त्रयविध ताप हरो अर्चूं मैं।।कर्म.।।२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। मोती सम उज्जवल अक्षत के प्रभु नवपुंज चढ़ाऊँ। जिनगुण मणि को प्रगटित करके पेâर न भव में आऊँ।। कर्मभूमि के नवदेवों को पूजत निज सुख पाऊँ। इष्ट वियोग अनिष्ट योग के सब दुख शीघ्र नशाऊँ।।३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्व-साधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। जुही मोगरा सेवंती वासंती पुष्प चढ़ाऊँ। कामदेव को भस्मसात् कर आतम सौख्य बढ़ाऊँ।।कर्म.।।४।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्व-साधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। घेवर पेâनी लड्डू पेड़ा रसगुल्ला भर थाली। तुम्हें चढ़ाऊँ क्षुधा नाश हो भरें मनोरथ खाली।।कर्म.।।५।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्व-साधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। स्वर्ण दीप में ज्योति जलाऊँ करूँ आरती रुचि से। मोह अंधेरा दूर भगे सब ज्ञान भारती प्रगटे।।कर्म.।।६।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्व-साधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप दशांगी अग्निपात्र में खेवत उठे सुगंधी। कर्म जले सब सौख्य प्रगट हो पैâले सुयश सुगंधी।।कर्म.।।७।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्व-साधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। आडू लीची सेव संतरा आम अनार चढ़ाऊँ। सरस मधुर फल पाने हेतू शत शत शीश झुकाऊँ।।कर्म.।।८।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्व-साधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंधादिक अर्घ बनाकर सुवरण पुष्प मिलाऊँ। भक्ति भाव से गीत नृत्य कर प्रभु को अर्घ चढ़ाऊँ।।कर्म.।।९।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्व-साधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- यमुना सरिता नीर, प्रभु चरणों धारा करूँ। मिले निजात्म समीर, शांतीधारा शं करे।।१०।। शांतये शांतिधारा। सुरभित खिले सरोज, जिन चरणों अर्पण करूँ। निर्मद करूँ मनोज, पाऊँ जिनगुण संपदा।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- पहले जंबूद्वीप में, कर्मभूमि चहुँदिक्क। नवदेवों को नित जजूँ, पुष्पांजलि कर नित्त।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -शंभु छंद- मेरू पर्वत के पूरब में, वन भद्रशाल की वेदी है। उस निकट देश ‘कच्छा’ विदेह, नदि पर्वत से छह भेदी है।। मधि आर्य खंड में तीर्थंकर, मुनिगण नित विहरण करते हैं। नव देव वहाँ पर नित्य रहें, पूजत ही नव निधि भरते हैं।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहकच्छादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर देश ‘सुकच्छा’ छह खंड में, शुभ आर्यखंड सुर मन मोहे। वहाँ जिनवर मुनिगण नित विहरें, जिनधर्म जिनागम नित होहैं।। नरपति मानव जिनवर मूर्ती, जिनमंदिर नित बनवाते हैं। हम पूजें इन नव देवों को, ये नवनिधि रिद्धि दिलाते हैं।।२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहसुकच्छादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वहाँ देश ‘महाकच्छा’ छह खंड, उसमें आरज खंड शोभ रहा। जिनवर के समवसरण दिखते, साधूगण से मन मोह रहा।। जिनधर्म प्रवर्ते जिनवाणी, जिनमंदिर जिन प्रतिमायें हैं। हम पूजें अर्घ चढ़ा करके, ये निज संपत्ति दिलाये हैं।।३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहमहाकच्छादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वहाँ देश ‘कच्छावती’ दिपे, आरज खंड में तीर्थंकर हों। श्री पंच परमगुरु पूज्य वहाँ, जिनधर्म जिनागम हितकर हों।। जिनचैत्य जिनालय रत्नों के, सुर नर बनवातें रहते हैं। हम पूजें अर्घ चढ़ा करके, ये निज संपत्ति दिलाये हैं।।४।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहकच्छकावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। है ‘आवर्ता’ देश अधिक सुन्दर, वहाँ शाश्वत कर्मभूमि रहती। वर आर्य खंड में तीर्थंकर, मुनिगण से पूज्य दु:ख हरती।। जिनचैत्य जिनालय अति सुन्दर, सुर नर बनवाते रहते हैं। हम पूजें अर्घ चढ़ा करके, ये साम्य सुधारस भरते हैं।।५।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहआवर्तादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। है देश ‘लांगलावर्ता’ शुभ, उस मध्य आर्य खंड शोभे है। वहाँ पर केवलि श्रुतकेवलि मुनि, जिनधर्म जिनागम शोभे हैं।।जिनचैत्य.।।६।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहलांगलावर्तादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वहाँ देश ‘पुष्कला’ छह खंडों में, आर्यखंड अति प्यारा है। तीर्थंकर आदि महापुरुषों से, पूज्य सतत सुखकारा है।।जिनचैत्य.।।७।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहपुष्पकलादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वहाँ देश ‘पुष्कलावती’ सुखद, उस आर्यखंड में धर्म दिपे। तीर्थंकर केवलि विहरण नित करते रहते निज कर्म खिपें।।जिनचैत्य.।।८।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहपुष्कलावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीता नदि के दक्षिण दिश में ‘वस्सा’ विदेह कहलाता है। इसके मधि आर्यखंड सुंदर नित धर्मसुधा बरसाता है।।जिनचैत्य.।।९।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहवत्सादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। यहाँ देश ‘सुवत्सा’ पूरब में, छह खंड मध्य आरजखंड है। तीर्थकर केवलि मुनि विहरें, जिनधर्म जिनागम संतत हैं।।जिनचैत्य.।।१०।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहसुवत्सादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। यहाँ देश ‘महावत्सा’ विदेह, चौथा ही काल सतत वर्तें। तीर्थंकर विहरें रिद्धिधारि, मुनिगण हैं भवि जिनवर अर्चें।।जिनचैत्य.।।११।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहमहावत्सादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। यहाँ देश ‘वत्सकावती’ मध्य, शुभ आर्यखंड जन मन मोहे। जिनवर गणधर मुनिगण विहरें, दर्शन से पाप खंड होहैं।।जिनचैत्य.।।१२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहवत्सकावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। है ‘रम्या’ देश विदेह रम्य, छह खंड में आर्य खंड सुंदर। केवलि चारणऋद्धी मुनिगण, नित विहरें भक्ति करों सुर नर।।जिनचैत्य.।।१३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहरम्यादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वरदेश ‘सुरम्या’ पूरब में, इक आर्य खंड में कर्मभूमि। तीर्थंकर मुनिगण नित होते, भवि प्राप्त करें नित मुक्ति भूमि।। जिनचैत्य जिनालय अति सुन्दर, सुर नर बनवाते रहते हैं। हम पूजें अर्घ चढ़ा करके, ये साम्य सुधारस भरते हैं।।१४।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहसुरम्यादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रमणीया’ देश विदेह वहाँ, शाश्वत, ही कर्मभूमि रहती। तीर्थंकर साधूगण होते, नहिं ईति भीति वहाँ हो सकती।।जिनचैत्य.।।१५।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहरमणीयादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वीदेह ‘मंगलावती’ देश, वहाँ पूर्वकोटि उत्तम आयु। जिनवर मुनिगण से पावन भू, पणशतक धनू ऊँची कायु१।।जिनचैत्य.।।१६।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपूर्वविदेहमंगलावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। चाल-शेर पश्चिमविदेह भद्रसाल वेदि के निकट। ‘पद्मा’ विदेहदेश आर्य खंड से प्रगट।। तीर्थेश आदि पंचगुरु नित्य वहाँ हैं। जिनबिंब जिनालय जजूँ जितने भि वहाँ।।१७।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहपद्मादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम विदेह देश ‘सुपद्मा’ सुमान्य है। इस आर्य खंड में जिनेश विद्यमान हैं।।तीर्थेश.।।१८।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहसुपद्मादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वीदेह ‘महापद्मा’ के आर्य खंड में। नवदेव देव रहते मुनिवंद्य विश्व में।।तीर्थेश.।।१९।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहमहापद्मादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘पद्मकावती’ विदेह आर्यखंड में। सुरवृंद से भि पूज्य पुण्य नर वहाँ जन्मे।।तीर्थेश.।।२०।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहपद्मकावीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शंखा’ विदेह देश में सम्यक्त्व का झरना। जिनदेव देव की वहाँ लेते सभी शरना।।तीर्थेश.।।२१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहशंखादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिना’ विदेह देश में पाखंड ना दिखे। भविजन सदा जिनदेव देव रूप को निरखें।।तीर्थेश.।।२२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहनलिनादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘कुमुदा’ विदेह देश में श्रावक सदा रहें। पूजा व दान शील व उपवास रत रहें।।तीर्थेश.।।२३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहकुमुदादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम विदेह ‘सरित’ देश खंड छह वहाँ। मधि आर्यखंड में भविक जिनभक्त हैं वहाँ।।तीर्थेश.।।२४।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहसरितदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘वप्रा’ विदेह देश में जिनअर्चना सदा। सुरगण भी वहाँ आय के उत्सव करें मुदा।।तीर्थेश.।।२५।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहवप्रादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो- पाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामिति स्वाहा। पश्चिम विदेह देश ‘सुवप्रा’ सुशोभता। छह खंड मध्य आर्यखंड चित्त मोहता।। तीर्थेश आदि पंचगुरु नित्य वहाँ हैं। जिनबिंब जिनालय जजूँ जितने भि वहाँ हैं।।२६।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहसुवप्रादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विदेह ‘महावप्रा’ के आर्य खंड में। नित जैनधर्म वर्ते भवि कर्म को हने।।तीर्थेश.।।२७।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहमहावप्रादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘वप्रकावती’ विदेह आर्य खण्ड में। मिथ्यात्व वेषधारी नहिं एक भी उनमें।।तीर्थेश.।।२८।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहवप्रकावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधा’ विदेह देश में छह खंड शोभते। नित आर्य खंड में वहाँ मुनि कर्म धोवते।।तीर्थेश.।।२९।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहगंधादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम विदेह देश ‘सुगंधा’ महान है। इस मध्य आर्य खंड सर्व सौख्य खान है।।तीर्थेश.।।३०।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहसुगंधादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विदेह ‘गंधिला’ विषे छह खंड बने हैं। इस आर्य खण्ड में मुनीन्द्र धर्म भणे हैं।।तीर्थेश.।।३१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहगंधिलादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘गंधमालिनी’ विदेह देश सुहाना। छह खंड मध्य एक आर्य खंड बखाना।।तीर्थेश.।।३२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिपश्चिमविदेहगंधमालिनीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -गीता छंद- इस प्रथम जंबूद्वीप में दक्षिण दिशी वर ‘भरत’ है। छह खंड में इक आर्य खंड यहं काल छह वर्तन्त हैं।। चौथे सुयुग में तीर्थंकर केवलि ऋषीगण विहरते। युग पांचवे तक धर्म जिनवरधाम प्रतिमा भवि जजें।।३३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिदक्षिणदिग्भरतक्षेत्रस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस द्वीप में उत्तर दिशी है क्षेत्र ऐरावत कहा। छह खंड आरज खंड में जब काल चौथा हो वहाँ।। तीर्थेश चारणमुनि तभी विहरें जगत् कलिमल हरें। युग पांचवे तक धर्म जिनगृह बिंब पूजत सुख भरें।।३४।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिउत्तरदिग्ऐरावतक्षेत्रस्थितआर्यखंडेअर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्र्य- अर्हंत सिद्धाचार्य पाठक साधु पण परमेष्ठि हैं। जिनधर्म जिन आगम जिनेश्वर बिंब जिनगृह इष्ट हैं।। नव देवता ये मान्य जग में हम सदा पूजें इन्हें। नवनिद्धि रिद्धि समृद्ध दाता नित्यप्रति वंदूँ इन्हें।।१।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितत्रैकालिक-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्याय-सर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। कच्छा सुकच्छा आदि में नित आर्यिकायें विहरतीं। इस भरत आरजखंड में बाह्य यादि साध्वी हो चुकीं।। तबसे व पंचमकाल अंतिम तक श्रमणियां होयेंगी। ऐरावतारज खंड की साध्वी जजत अघ धोयेंगी।।२।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितत्रैकालिक-आर्यिकाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस द्वीप में तीर्थंकरों के पंच कल्याणक सदा। भू पर्वतादी पूज्य पावन तीर्थ होते शर्मदा।। गणधर मुनीश्वर के यहाँ ज्ञान मुक्ति स्थल हुये। इन क्षेत्र को मैं नित्य पूजूं नित्य मंगल परिणये।।३।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थिततीर्थंकरगणधरमुनिगण-पंचकल्याणकादितीर्थक्षेत्रेभ्य:पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -नरेन्द्र छंद- जय जय श्री अरहंतदेव जय सिद्ध प्रभू सुखकारी। जय जय सूरी पाठक साधू भव भव दुख परिहारी।। जय जिनधर्म जिनेश्वर वाणी जय जिनबिंब जिनालय। नव देवों को नित्य नमूँ मैं ये हैं सर्वसुखालय।।१।। जंबूद्वीप का भरत क्षेत्र है पणशत छब्बिस योजन। छह खंडों में आर्य खंड इक यहाँ काल परिवर्तन।। चौथे युग में अर्हंतादिक नवों देव रहते हैं। पंचम युग में आचार्यादिक सात देव रहते हैं।।२।। ऐरावत में भरतक्षेत्र सम सर्व व्यवस्था मानी। बत्तीस क्षेत्र विदेहों में नित वर्ते जिनवर वाणी।। कच्छादेश विदेह दो सहस दो सौ बारह योजन। भरतक्षेत्र से चतुर्गुणाधिक सब विदेह हैं उत्तम।।३।। चौंतिस आर्यखंड में इक-इक उपसागर हैं मानें। यहाँ भरत के उपसागर उपनदियाँ बहुत बखानें।। कर्मभूमि में मनुज धर्म कर स्वर्ग मुक्ति पद पाते। रत्नत्रय से निजनिधि पाकर शाश्वत सुख पा जाते।।४।। शुभ से पुण्यास्रव पापास्रव अशुभ भाव से होता। इससे आठ कर्म बंध जाते फल पाते दुख होता।। कोई ज्ञान प्रशंसा करते उसमें ईष्र्या होती। जानबूझ कर ज्ञान छिपावेें तब निन्हव का दोषी।।५।। नहीं बताना ज्ञान अन्य को यह मात्सर्य दुखारी। ज्ञानध्यान में विघ्न डालना अन्तराय है भारी।। अन्य प्रकाशित ज्ञान रोककर आसादन कर देना। सत्यवान में दोष लगा उपघात दोष कर देना।।६।। ज्ञान विषय में इन कार्यों से ज्ञानावरण बंधे हैं। दर्शन विषयक इन कार्यों से दर्शनराज चिपके हैं।। हे! प्रभु मुझ पर कर्मशत्रु ये प्रतिक्षण आते रहते। रुक जाते फिर समय पायकर ज्ञान दरस हैं ढकते।।७।। नाथ! इन्हीं से मैं अज्ञानी पूर्ण ज्ञान नहिं प्रगटे। प्रभो! युक्ति ऐसी दे दीजे ‘ज्ञानमती’ बन चमवेंâ।। केवलज्ञान स्वभावी आत्मा केवलदर्श स्वभावी। नाथ! आपकी कृपा प्राप्त कर बनूँ निजात्म स्वभावी।।८।। -दोहा- इंद्र वंद्य नवदेवता, कर्मभूमि में सिद्ध। अन्य जगह बस दो रहें, जिनगृह जिनवरबिंब।।९।। ॐ ह्रीं जंबूद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधु-जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१२) धातकीखण्ड द्वीप इष्वाकार जिनालय पूजा —अथ स्थापना—शंभुछंद— वर द्वीप धातकी के दक्षिण, उत्तर में इष्वाकार कहे। ये द्वीप धातकी को पूरब, पश्चिम दो खंड में बांट रहे।। इन पर्वत पर दो जिनमंदिर, जिनप्रतिमा का आह्वान करूँ। सुरपति खगपति चक्री पूजित, जिनप्रतिमा का गुणगान करूँ।।१।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधिदक्षिणोत्तरद्वयइष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधिदक्षिणोत्तरद्वयइष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधिदक्षिणोत्तरद्वयइष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ— क्षीरोदधि का पयसम१ जल ले, वंâचन कलशा भर लाया हूँ। निज आत्म करम मल धोने को, प्रभु धारा देने आया हॅूं।। इष्वाकाराचल के दो हैं, जिनमंदिर अतिशय गुणधारी। इनको पूजत ही परमानंद, आतम अनुभव हो सुखकारी।।१।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयज चंदन केशर घिस के, तुम चरण चढ़ाने आया हूँ। आत्यंतिक शांति हेतू मैं, भवज्वाल बुझाने आया हूँ।। इष्वाकाराचल के दो हैं, जिनमंदिर अतिशय गुणधारी। इनको पूजत ही परमानंद, आतम अनुभव हो सुखकारी।।२।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। कामोद श्यामजीरी तंदुल, कलमों को धोकर लाया हूँ। अक्षय सुखमय शुद्धात्म हेतु, प्रभुपुंज चढ़ाने आया हूँ।।इष्वा.।।३।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। सुरतरु के सुरभित विविध सुमन, सुमनस मनहर मैं लाया हूँ। प्रभु काम बाण विध्वंस हेतु, तुम चरण चढ़ाने आया हूँ।।इष्वा.।।४।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। पूरणपोली पूरी खाजे, नुकती लड्डू मैं लाता हूँ। निजक्षुधा व्याधि के नाश हेतु, चरणों के निकट चढ़ाता हूँ।।इष्वा.।।५।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। गोघृत भर वंâचन दीपशिखा, दश दिश अंधेर भगा देती। दीपक ज्योती से यजते ही, अज्ञान अंधेर मिटा देती।।इष्वा.।।६।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कृष्णागरु धूप सुगंधित ले, अग्नी में खेने आया हूँ। कर्मों को जला जला करके, दश दिश में धूम उड़ाया हूँ।।इष्वा.।।७।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। एला केला अंगूर आम, पिस्ता किसमिस बादाम लिया। शिवफल की आशा से जिनवर, तुम सन्मुख में फल चढ़ा दिया।। इष्वाकाराचल के दो हैं, जिनमंदिर अतिशय गुणधारी। इनको पूजत ही परमानंद, आतम अनुभव हो सुखकारी।।८।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल चंदन अक्षत पुष्प चरू, वरदीप धूप फल लाता हूँ। वर हेमपात्र में अघ्र्य सजा, प्रभु निकट चढ़ाने आता हूँ।।इष्वा.।।९।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —दोहा— कनक भृंग में मिष्ट जल, सुरगंगा समश्वेत। जिनपद धारा देत ही, भव भव को जल देत।।१०।। शांतये शांतिधारा। वकुल सरोरुह मालती, पुष्प सुगंधित लाय। पुष्पांजलि अर्पण करूँ, सुख संपति अधिकाय।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—सोरठा— दुतिय धातकी द्वीप, दक्षिण उत्तरदिश विषें। इष्वाकृति नग दोय, ताके जिनगृह पूजहूँ।।१।। इति धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-इष्वाकारनगस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —शम्भु छंद— वर द्वीप धातकी के दक्षिण, लवणोदधि कालोदधि छूता। नग इष्वाकार सहस योजन, विस्तृत अरु चार शतक ऊँचा।। यह लंबा चार लाख योजन, कनकाभ१ वूâट चउ इस पे हैं। इस सिद्धवूâट में जिनमंदिर, हम अघ्र्य चढ़ाकर जजते हैं।।१।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-दक्षिणदिग्-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनिंबबेभ्यो अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर द्वीप धातकी उत्तर में, लवणोदधि कालोदधि छूता। गिरि इष्वाकृति योजन हजार, विस्तृत अरु चार शतक ऊँचा।। यह चार लाख योजन लंबा, स्वर्णाभ चार वूâटों युत है। इक सिद्धवूâट में जिनमंदिर, हम अघ्र्य चढ़ाकर पूजत हैं।।२।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-उत्तरदिग्-इष्वाकारपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनिंबबेभ्यो अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य—दोहा— द्वीप धातकी खंड में, दक्षिण उत्तर माहिं। इष्वाकृति गिरि के युगल, जिनगृह पूज रचािंह।।१।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-दक्षिणोत्तरदिग्संस्थित-इष्वाकारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनिंबबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला —सोरठा— इष्वाकार गिरीन्द्र, इन पे जिनगृह शाश्वते। तिनमें श्री जिनबिंब, मैं गाऊँ गुणमालिका।।१।। जय जय श्री जिन सिद्धायतनं, भविजन को सिद्धि प्रदाता हो। जय स्वयं सिद्ध शाश्वत भगवन्, मुनिजन के मुक्ति विधाता हो।। जय जय गुणरत्नाकर स्वामी, जो तुमको नित प्रति ध्याते हैं। वे तुम भक्ती नौका चढ़कर, भववारिधि से तिर जाते हैं।।२।। इष्वाकृतिनग पर सिद्धवूâट, उनमें जिनप्रतिमा राजे हैं। जो उनकी पूजा भक्ति करें, वे भववल्ली को काटे हैं।। पर्वत के दोनों भागों मेें, तट वेदी वन पंक्ती शोभें। धनु पांच शतक विस्तृत स्वर्णिम, ऊँची दो कोस बहुत शोभें।।३।। इन भित्ति सदृश वेदी के द्वय, भागों में वनखंड शोभ रहे। जो तोरण पुष्करिणी वापी-युत जिनभवनों से रम्य कहें।। वन खंडों में सुरमहल बने, तोरण रत्नोें से शोभित हैं। ऐसे ही पर्वत के ऊपर, तट वेदी औ वन पंक्ती हैं।।४।। ये पर्वत अतिशय रम्य कहे, सुवरण कांती से चमके हैं। इन पर जो चार वूâट माने, त्रय मेें व्यंतर सुर बसते हैं।। इक सिद्धवूâट में जिनमंदिर, जो अकृत्रिम कहलाता है। कांचन मणि रत्नों से निर्मित ध्वज पंक्ती को लहराता है।।५।। ाqजनगृह को घेरे परकोटे, हैं तीन कनकमय रत्न जड़े। उनके अंतर में दशविध ध्वज, अरु कल्पतरू रमणीय बड़े।। वर मानस्तम्भ रतन निर्मित, सिद्धों की प्रतिमा वंद्य वहाँ। मानस्तम्भों के दर्शन से, सच मान गलित हो जाय वहाँ।।६।। ये जिनमंदिर शिवललना के, शृंगार विलाससदन१माने। भविजन हेतू कल्याण भवन, पुण्यांकुर सिंचन घन२ माने।। इनमें हैं इक सौ आठ कहीं, जिनप्रतिमा रतनमयी जानो। मुझ ‘ज्ञानमती’ को रत्नत्रय, सम्पत्ति देवें यह सरधानो।।७।। —घत्ता— जय जय जिनचंदा, सुख के वंâदा, शिवतियवंâता नाथ तुम्हीं। जय तुम गुण गाऊँ, दुरित नशाऊँ, पेâर न आऊँ चहुंगति ही।।८।। ॐ ह्रीं धातकीखण्डद्वीपसंबंधि-दक्षिणोत्तरदिक्स्थितेष्वाकारपर्वतस्थित-सिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनिंबबेभ्य: जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१३) विजयमेरु पूजा अथ स्थापना-दोहा पूर्व धातकी खंड में, विजयमेरु अभिराम। तिसमें सोलह जिनभवन, हैं शाश्वत गुणधाम।।१।। जिनवर प्रतिमा मणिमयी, शिवसुखफल दातार। आह्वानन विधि से यहाँ, पूजूँ अष्ट प्रकार।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबब-समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबब-समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबब-समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ- चामर छंद क्षीरिंसधु नीर लाय स्वर्णभृंग में भरूँ। श्री जिनेन्द्र पद में चढ़ाय कर्म मल हरूँ।। मेरुविजय के जिनेन्द्र गेह को यहाँ जजूँ। स्वात्मसिद्धि हेतु मैं जिनेन्द्र बिंब को भजूँ।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। अष्टगंध अतिसुगंध हेमपात्र में लिये। नाथ पाद अर्च के समस्त दाह नाशिये।।मेरु.।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। चंद्रकांति के समान श्वेत शालि लाइया। नाथ पाद के समीप पुंज को चढ़ाइया।। मेरुविजय के जिनेन्द्र गेह को यहाँ जजूँ। स्वात्मसिद्धि हेतु मैं जिनेन्द्र बिंब को भजूँ।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। पारिजात मोगरा जुही गुलाब लाइया। कामनाश हेतु आप पाद में चढ़ाइया।।मेरु.।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। मालपूप खज्जिकादि शर्वâरा विमिश्र ले। भूख व्याधि नाशहेतु आपको समर्पित ले।।मेरु.।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। स्वर्णपात्र में संजोय दीप आरती करूँ। भेदज्ञान को प्रकाश ज्ञान भारती वरूँ।।मेरु.।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अग्निपात्र में सदा सुगंध धूप खेवते। पापपुंज को जलाय स्वात्मसौख्य सेवते।।मेरु.।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। सेव आम और अनार लाय थाल में भरे। मोक्षफल निमित्त आज आप अर्चना करें।।मेरु.।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। नीरगंध अक्षतादि लेय अघ्र्य थाल में। तीन रत्न प्राप्ति हेतु पूजहूँ त्रिकाल में।।मेरु.।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- परमशांति के हेतु, शांतीधारा मैं करूँ। सकल विश्व में शांति, सकल संघ में हो सदा।।१०।। शांतये शांतिधारा। चंपक हरसिंगार, पुष्प सुगंधित अर्पते। होवे सुख अमलान, दुख दारिद्र पलायते।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:।। अथ प्रत्येक अर्घ -सोरठा- शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध, जिनवर प्रतिमा मैं जजूँ। निज आतम कर शुद्ध, पाऊँ परमानंद मैं।।१।। इति मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -नरेन्द्र छंद- विजय मेरु के पृथ्वी तल पर, भद्रशाल वन सोहे। उसमें पूरबदिशि जिनमंदिर, सुरनरगण मन मोहे।। जल फल आदिक अघ्र्य सजाकर, अर्चूं जिनगुण गाके। नरसुर के सुख भोग अंत में, बसूँ मोक्षपुर जाके।।१।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिभद्रशालवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु के भद्रशाल में, दक्षिणदिश जिनधाम। शाश्वत जिनवर बिंब मनोहर, अतुल अमल अभिरामा।।जल फल.।।२।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिभद्रशालवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। दुतिय मेरु के भद्रशाल में, पश्चिम दिश जिनगेहा। जिनप्रतिमा को सुरपति नरपति, वंदे भक्ति सनेहा।। जल फल आदिक अघ्र्य सजाकर, अर्चूं जिनगुण गाके। नरसुर के सुख भोग अंत में, बसूँ मोक्षपुर जाके।।३।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिभद्रशालवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजय सुराचल भद्रशाल में, उत्तरदिश जिनधामा। भवविजयी की प्रतिमा उनमें, जजत लहें शिवधामा।।जल फल.।।४।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिभद्रशालवनस्थितउत्तरदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। चाल छंद-नन्दीश्वर पूजा श्री विजय मेरुवरशैल, जजतें अघ नाशें। नंदनवन पूरब जैन, मंदिर अति भासे।। यतिगण जिन ध्यान लगाय, आतम शुद्ध करें। मैं जजूँ सर्व जिनबिंब, कर्म कलंक हरें।।५।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिनंदनवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस मेरू दक्षिण माहिं, नंदन वन प्यारा। जिनभवन अनूपम ताहिं, सब जग में न्यारा।।यतिगण.।।६।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिनंदनवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नंदनवन पश्चिम माँहिं, जिन मंदिर भावे। इस ही मेरू पर इंद्र, परिकर सह आवें।।यतिगण.।।७।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिनंदनवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तर दिश नंदन रम्य, जिनवर आलय है। इस विजय मेरु के मध्य, धर्म सुधालय है।।यतिगण.।।८।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिनंदनवनस्थितउत्तरदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -कुसुमलता छंद- विजयमेरु नंदनवन ऊपर, वन सौमनस कहा सुखकार। अकृत्रिम जिनभवन पूर्वदिश, सुर किन्नर मन हरत अपार।। मैं पूजूँ जिनबिंब मनोहर, मन वच तन कर अघ्र्य चढ़ाय। रोग शोक भय आधि उपाधी, सब भव व्याधी शीघ्र पलाय।।९।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिसौमनसवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु सौमनस वनी के, दक्षिण दिश जिन भवन विशाल। गर्भालय में मणिमय प्रतिमा, भविजन पूजन करत त्रिकाल।।मैं पूजूँ.।।१०।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिसौमनसवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम दिश सौमनस वनी में, जिनवर सदन मदन मद हार। मृत्युंजय१ की प्रतिमा उनमें, मुनिगण वंदत मुद मनधार।।मैं पूजूँ.।।११।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिसौमनसवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु सौमनस रम्यवन, उसमें उत्तर दिश मंझार। श्रीजिनमंदिर में जिनप्रतिमा, नितप्रति वंदूं बारम्बार।।मैं पूजूँ.।।१२।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिसौमनसवनस्थितउत्तरदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -चौपाई छंद- विजयमेरु पांडुकवन जानो, पूरब दिश जिनभवन बखानो। सुरपति खगपति नित्य जजें हैं, हम भी अघ्र्य चढ़ाय भजे हैं।।१३।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिपाण्डुकानस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस पांडुकवन दक्षिण जानो, शाश्वत श्री जिनभवन महानो। सुरललना जिनवर गुण गावें, हम भी पूजेें जिनपद ध्यावें।।१४।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिपांडुकानस्थितदक्षिणदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस वन में पश्चिम दिश माहीं, जिनगृह सम उत्तम कुछ नाहीं। किन्नरियाँ वीणा स्वर साजें, हम भी पूजें सब अघ भाजें।।१५।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिपांडुकानस्थितपश्चिमदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु पांडुकवन साहे, जिनवर भवन सबन मन मोहें। देव देवियाँ जिनपद पूजें, हम भी यहाँ तुम्हें नित पूजें।।१६।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसम्बन्धिपांडुकानस्थितउत्तरदिक्जिनालयजिनिंबबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-दोहा सोलह जिनवर भवन हैं, विजयमेरु के नित्य। अर्चूं पूरण अघ्र्य ले, पूर्ण सौख्य हो नित्य।।१।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनगृह के जिनबिंब को, नमूँ भक्ति मन लाय। सत्रह सौ अठबीस हैं, पूूजूँ अर्घ चढ़ाय।।२।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयमध्यविराजमानएकसहस्रसप्त-शताष्टािंवशति-जिनप्रतिमाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मेरु पांडुकवन विदिक्, पांडुकशिलादि चार। नमूँ नमूँ जिनवर न्हवन, पूत शिला सुखकार।।३।। ॐ ह्रीं विजयमेरुसंबंधिपांडुकवनविदिक्पांडुकादिशिलाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -शंभु छंद- यह विजयमेरु चौरासि सहस, योजन उत्तुुंग कहाता है। वन भद्रसाल से पंचशतक, योजन पर नंदन आता है।। योजन साढ़े पचपन हजार, ऊपर सौमनस सुहाता है। योजन अट्ठाइस सहस जाय, पांडुकवन सबको भाता है।।१।। -दोहा- इसमें सोलह जिनभवन, त्रिभुवनतिलक महान। उनमें जिनप्रतिमा विमल, नमूँ नमूँ गुण खान।।२।। चाल-हे दीनबंधु.......... देवाधिदेव श्री जिनेन्द्रदेव हो तुम्हीं। अनादि औ अनंत स्वयंसिद्ध हो तुम्हीं।। हे नाथ! तुम्हें पाय मैं महान हो गया। सम्यक्त्व निधि पाय, मैं धनवान हो गया।।३।। रस गंध फरस रूप से मैं शून्य ही कहा। इस मोह से ही मेरा संबंध ना रहा।।हे नाथ.।।४।। ये द्रव्यकर्म आत्मा से बद्ध नहीं है। ये भावकर्म तो मुझे छूते भी नहीं हैं।।हे नाथ.।।५।। मैं एकला हूं शुद्ध, ज्ञान दरश स्वरूपी। चैतन्य चमत्कार, ज्योति पुंज अरूपी।।हे नाथ.।।६।। मैं नित्य हूँ, अखंड हूँ, आनंद धाम हूूँ। शुद्धात्म हूँ, परमात्म हूँ, त्रिभुवन ललाम हूँ।।हे नाथ.।।७।। मैं पूर्ण विमल ज्ञान, दर्श वीर्य स्वभावी। निज आत्मा से जन्य, परम सौख्य प्रभावी।।हे नाथ.।।८।। परमार्थ नय से मैं तो सदा शुद्ध कहाता। ये भावना ही एक सर्वसिद्धि प्रदाता।।हे नाथ.।।९।। व्यवहारनय से यद्यपी, अशुद्ध हो रहा। संसार पारावार में ही, डूबता रहा।।हे नाथ.।।१०।। फिर भी तो मुझे आज मिले आप खिवैया। निज हाथ का अवलम्ब दे, भव पार करैया।।हे नाथ.।।११।। मैं आश यही लेके नाथ पास में आया। अब वेग हरो जन्म व्याधि, खूब सताया।।हे नाथ.।।१२।। हे दीन बंधू शीघ्र ही निज पास लीजिये। भव सिंधु से निकाल, मुक्तिवास दीजिये।।हे नाथ.।।१३।। -घत्ता छंद- जय जय सुखवंâदा, अमल अखंडा, त्रिभुवन वंâदा तुमहि नमूँ। जय ‘ज्ञानमतिय’ मम, शिवतिय अनुपम, तुरत मिलावो नित प्रणमूँ।।१४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपस्थविजयमेरुसंबंधिषोडशजिनालयसर्वजिनबिंबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१४) विजयमेरु संबंधी षट्कुलाचल जिनालय पूजा —अथ स्थापना—गीता छंद— श्री विजयमेरु दक्षिणोत्तर, षट् कुलाचल जानिये। तिन पूर्व दिश में षट् जिनालय, जैनप्रतिमा मानिये।। सम्यक्त्व निर्मल हेतु मैं, प्रभु आपको थापूँ यहाँ। हे नाथ! भक्तों पर कृपा, करके तुरत आवो यहाँ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टकं—अडिल्ल छंद— सुरगंगा को उज्ज्वल नीर भराइये। आप पूज जन्मादिक ताप मिटाइये।। षट् कुलपर्वत के जिनगृह जिनबिंब को। रत्नत्रय निधि हेतु जजों जगवंद्य को।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। अष्ट गंध वर गंध सुगंधित लाइये। आप पूज शोकादिक ताप मिटाइये।।षट्.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। अमल अखंडित सुरभित तंदुल लाइये। पाप पुंज क्षय हेतू, पुंज चढ़ाइये।। षट् कुलपर्वत के जिनगृह जिनबिंब को। रत्नत्रय निधि हेतु जजों जगवंद्य को।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। वकुल केतकी कमल पुष्प बहु लाइये। भवहर जिनपद पूज, कामशर दाहिये।।षट्.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। मालपुआ सोहाल गिंदोड़ा लाइये। आप चरण को पूज, स्वात्मसुख पाइये।।षट्.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। स्वर्णदीप तम हारि वर्तिका ज्वालिये। मोहध्वांत नश जाय दीप अवतारिये।।षट्.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। सित चंदन मिल धूप, हुताशन में जले। आप निकट ही दुष्ट, कर्म शत्रू जलें।।षट्.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। आम बिजौरा श्रीफल पिस्ता थाल में। फल तुम चरण चढ़ाकर नाऊँ भाल मैं।।षट्.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल चंदन अक्षत सुम चरु दीपक सजे। धूप फलों में रत्न मिला तुम पद जजें।। षट् कुलपर्वत के जिनगृह जिनबिंब को। रत्नत्रय निधि हेतु जजों जगवंद्य को।।९।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— पद्म सरोवर नीर वंâचन झारी में भरूँ। जिनपद धारा देय, भव वारिधि से उत्तरूं।।१०।। शांतये शांतिधारा। सुवरण पुष्प मंगाय, प्रभु चरणन अर्पण करूँ। वर्ण गंध रस फास, विरहित निजपद को वरूँ ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—दोहा— द्वीप धातकी पूर्व में, षट् कुलगिरि जिनधाम। पूजन हेतू मैं करूं, पुष्पांजलि इत ठाम।।१।। इति श्रीविजयमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —नरेन्द्र छंद— द्वीपधातकी में ‘हिमवन गिरि’ कांचन कांती धारे। बीच सरोवर पद्म तास में, कमल मणीमय सारे।। मध्य कमल पर ‘श्रीदेवी’ हैं, नग पर वूâट सुग्यारे। पूर्व दिशागत सिद्धवूâट पर, जिनपद पूजों सारे।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधि-हिमवत्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु दक्षिण ‘महहिमवन’ रजत वर्ण तामें हैं। महापद्मद्रह मध्य कमल में, ‘ह्रीदेवी’ यामें हैं।। नग पर आठ वूâट में इक पर, चैत्यालय सुखकारी। अघ्र्य चढ़ाकर जिनपद पूजें, गुण गावे नर नारी ।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधि-महाहिमवत्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु दक्षिण ‘निषधाचल’, तप्त स्वर्ण छवि मोहे। द्रह तिगिञ्छ तामध्य कमल में, ‘धृतिदेवी’ अति सोहे।। गिरि पर हैं नववूâट एक के, सिद्धवूâट मंदिर में। मृत्युजयी श्री जिनप्रतिमा को, पूजत ही सुख क्षण में।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधि-निषधकुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु उत्तर ‘नीलाचल’, छवि वैडूर्यमणी है। बीच केसरी द्रह कमलों में, मध्य ‘कीर्तिदेवी’ है।। नववूâटों में सिद्धवूâट पर, जिनगृह में जिनप्रतिमा। अघ्र्य चढ़ाकर जजूँ निरन्तर, भवविजयी जिनप्रतिमा।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधि-नीलकुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु उत्तर ‘रुक्मीगिरि’, रजतवर्ण छवि छाजे। पुण्डरीक द्रह मध्य कमल में, ‘बुद्धीदेवी’ राजे।। वूâट आठ में सिद्धवूâट पर जिनमंदिर मन भावे। कामजयी जिनप्रतिमा पूजे, इन्द्र देवगण आवें।।५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधि-रुक्मिकुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु के उत्तर ‘शिखरी’, पर्वत कांचन छवि है। महापुण्डरीकहिं हृद कमलों, में ‘लक्ष्मी’ निवसत हैं।। ग्यारह वूâट उन्हों में इक पर, जिनवरनिलय बखानो। अघ्र्य चढ़ाकर भक्ति भाव से, पूजूँ मैं दु:ख हानो।।६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधि-शिखरिपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य— षट् कुलगिरि के जिनभवन, रत्नमयी जिनबिंब। पूर्ण अघ्र्य ले पूजिये, हरो करम अरिदंभ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिन-बिंबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबभ्यो नम:। जयमाला —त्रिभंगी छंद— षट्कुलगिरि मनहर, सबमें सरवर, सरवर में बहु कमल खिले। कमलनि में सुरगृह, उनमें जिनगृह, पूजत ही मन कमल खिले।। जय जय जिनप्रतिमा, अंतक हरना, पाप पुंज अंधेर टले। पाई मैं साता, मेटि असाता, हुआ पुण्य बहु ढेर भले।।१।। —नाराच छंद— नमो नमो जिनेश तो पदारविंद भक्ति तें। मुनीन्द्रवृन्द तोहि ध्याय कर्म कालिमा हने।। अनाथनाथ! भक्त की सदा सहाय कीजिये। प्रभो मुझे भवाब्धि तें अबे निकाल लीजिये।।२।। अनंत ज्ञान दर्श वीर्य सौख्य से सनाथ हो। अनादि हो अनंत हो प्रसिद्धि सिद्धि नाथ हो।।अनाथ.।।३।। अनादि मोह वृक्ष के लिये तुम्हीं कुठार हो। प्रधान राग द्वेष शत्रु के लिये प्रहार हो।।अनाथ.।।४।। महान रोग शोक कष्ट को महौषधी तुम्हीं। अनिष्ट योग इष्ट का वियोग दुख हरो तुम्हीं।।अनाथ.।।५।। तुम्हीं अनेक व्याधि हेतु सर्व श्रेष्ठ वैद्य हो। तुम्हीं विषापहार मन्त्र हो मणी विशेष हो।। अनाथनाथ! भक्त की सदा सहाय कीजिये। प्रभो मुझे भवाब्धि तें अबे निकाल लीजिये।।६।। महान तेज पुुंज हो अनंत सौख्य धाम हो। असंख्य जीव सौख्य हेतु एक ही प्रधान हो।।अनाथ.।।७।। हुआ जु कष्ट भक्त पे तबे सहाय तूँ करी। प्रभो! अबेर क्यों अबे, बताइये इसी घरी।।अनाथ.।।८।। मुनीश मानतुंग ने जिनेश! भक्ति तें किया। तुम्हीं तो नाथ! यतिपती कि काट दीनि बेड़ियाँ।।अनाथ.।।९।। तुम्हें हि ध्याय अग्नि कुण्ड में गिरी थी जानकी। हुआ अपार नीर औ खिले सरोज भी तभी।।अनाथ.।।१०।। तुम्हें सुध्याय लाख गेह माहिं पांडवा सभी। सुरंग मार्ग से बचे न अग्नि भी जला सकी।।अनाथ.।।११।। मनोवती जु आप ध्याय आप दर्श पा लिया। तुम्हें ही ध्याय द्रौपदी ने शील रत्न राखिया।।अनाथ.।।१२।। मनोरमा ने आप ध्याय वङ्का द्वार खोलिया। तुम्हें हि ध्याय अंजना ने सर्व कष्ट धो लिया।।अनाथ.।।१३।। गिनाऊँ मैं कहाँ तके अनन्त जीव राशि को। सु आपके प्रताप वे तिरे भवाम्बु राशि को।।अनाथ.।।१४।। अनंत तीर्थ आप पाद के तले कहें मुनी। इसी निमित्त आप की सहाय चाहते मुनी।।अनाथ.।।१५।। सुज्ञानमती मो करो निजैक संपदा भरो। अनंत दु:ख सिंधु से निकाल मुक्ति में धरो।। अनाथ.।।१६।। —घत्ता— अकृत्रिम जिननाथ तनी यह वर जयमाला। मन वच काय लगाय पढ़ें जो भव्य त्रिकाला।। ऋद्धि सिद्धि भरपूर रहे ताके घर माहीं। ‘ज्ञानमती’ वर बुद्धि भरें नव निद्धि सदा ही।।७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिंबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१५) विजयमेरु संबंधी चार गजदंत जिनालय पूजा —दोहा— ाqवजयमेरु विदिशा विषै, कहें चार गजदंत। तिनमें चारों जिननिलय, कहे अनादि अनंत।।१।। तिनके श्री जिनबिंब जे, सर्व द्वंद्व हरतार। मैं विधिवत पूजन करूँ, त्रिजगवंद्य भरतार।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह!अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ—चामरछन्द— (चाल—पाश्र्वनाथ देव सेव.....) दुग्धसिंधु के समान, स्वच्छ नीर लाइये। पूजते जिनेन्द्रपाद, दाह को मिटाइये।। चार गजदंत के, जिनेन्द्र सद्म मैं जजूँ। सर्व ऋद्धि सिद्धिदायि, जैनबिंब मैं जजूूँ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। वुंâकुमादि गंध से जिनेन्द्र पाद पूजिये। सर्व मोहताप नाश, शान्त चित्त हूजिये।।चार.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। सोमरश्मि के समान, अक्षतों को लाइये। अक्षयी अनंददायि, पुंज को चढ़ाइये।। चार गजदंत के, जिनेन्द्र सद्म मैं जजूँ। सर्व ऋद्धि सिद्धिदायि, जैनबिंब मैं जजूूँ।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। पारिजात मालती, गुलाब पुष्प लाइये। मार मल्लहारि देव, पूज सौख्य पाइये।।चार.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। व्यंजनादि ओदनादि सर्पि से मिलाइये। आप पूजते क्षुधादि रोग को मिटाइये।।चार.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। स्वर्णदीप में कपूर, ज्योति को जलाइये। आरती करेय मोह, ध्वांत को भगाइये।। चार.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप ले दशांग अग्नि, संग में जराइये। अष्ट कर्म भस्म धूम, शीघ्र ही उड़ाइये।।चार.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। सेव आम्र निंबुकादि, थाल में भराइये। आप चर्ण को चढ़ाय, सर्व सौख्य पाइये।।चार.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। अंबु गंध अक्षतादि, दिव्य अघ्र्य लीजिये। चर्ण में चढ़ाय के, अनघ्र्य राज्य कीजिये।। चार गजदंत के, जिनेन्द्र सद्म मैं जजूँ। सर्व ऋद्धि सिद्धिदायि, जैनबिंब मैं जजूूँ।।९।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— क्षीरोदधि उनहार, उज्ज्वल जल ले भृंग में। श्रीजिन चरण सरोज, धारा देते भव मिटे।।१०।।शांतये शांतिधारा। सुरतरु के सुम लेय, प्रभुपद में अर्पण करूँ। कामदेव मदनाश, पाऊं आनंद धाम मैं।।११।।दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—दोहा— विजयमेरु चारों विदिश, चार कहे गजदंत। तिनके जिनमंदिर जजूँ पुष्पांजली करंत।।१।। इति श्रीविजयमेरुसंबंधिगजदंतस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —नरेन्द्र छंद— विजयमेरु आग्नेय कोण में, ‘सौमनस्य’ गजदंता। रौप्यमयी वह सातवूâट में, सिद्धवूâट अघहंता।। जिनमंदिर में श्रीजिनप्रतिमा, भानु समान विभासें। अर्घ लेय मैं जजूँ मुदित मन, ज्ञान भानु परकासे।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिसौमनसगजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु नैऋत्य कोण में, ‘विद्युतप्रभ’ गजदंता। तप्तकनक छवि नववूâटों में, सिद्धवूâट चमवंâता।।जिन.२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिविद्युत्प्रभगजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु वायव्य कोण में ‘गंधमादनी’ सोेहे। कांचन समद्युति सात वूâट युत, सिद्धवूâट मन मोहे।। जिनमंदिर में श्रीजिनप्रतिमा, भानु समान विभासें। अर्घ लेय मैं जजूँ मुदित मन, ज्ञान भानु परकासे।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिगंधमादनगजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु ईशान कोण में, ‘माल्यवान’ गजदंता। नववूâटों युत सिद्धवूâट धर, नीलम छवि छलवंâता।।जिन.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिमाल्यवानगजदंतस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —नरेन्द्र छंद— दुतियमेरु के चारों विदिशा, गजदंतनि जिनधामा। इन्द्र चक्रि धरणीन्द्र मुनीन्द्रा, वंदत हैं शिवकामा।।जिन.।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिविदिशायां चतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वत जिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला —सोरठा— गजदंताचल चार, तिनके श्रीजिनभवन में। जिनवर बिंब महान, तिनकी गुणमाला कहूँ।।१।। —पद्धड़ी छन्द— हे नाथ आप त्रैलोक्य वंद्य, त्रिभुवन के स्वामी इन्द्रवंद्य। तुम ज्योतिरूप मंगल स्वरूप, तुम निर्विकार परमात्म रूप।।२।। भविजनमन कुमुद विकास चन्द्र, हे नाथ तुम्हीं भुवनैकचन्द्र। मुनिगण हृदयाम्बुज सूर्यनाथ, शिवरमणी को कीयो सनाथ।।३।। तुम दरस ज्ञान सुख वीर्यवान, तुम अतुल अमल अनुपम निधान। तुम हो अनंत गुण पुंज ईश, गणधर गुणधर तुम नाय शीश।।।४।। तुम गुणरत्नाकर देवदेव, तुम करुणा सागर देवदेव। तुम जन्म मृत्यु अरि जीत लीन, सब रोग शोक बाधा विहीन।।५।। सब क्षुधा तृषादिक दु:ख खान, तुम कर्म शत्रु जीते महान। तुम मूर्ति रहित भी मूर्तिमान, तुम देहरहित भी कांतिमान।।६।। तुम शुद्ध बुद्ध ज्ञायक अखंड, भवसिंधु भव्य तारन तरंड। तुम अविचल आनंद वंâद धाम, मेरी भव बाधा हरो आन।।७।। तुम बिंब अचेतन रत्नसार, फिर भी वांछित फल दे अपार। उपदेश नहीं देवे कदापि, शिवमार्ग प्रकट करती तथापि।।८।। ये आदि अन्त से शून्य जान, भविजन को शिव सुख हेतु भानु। सब वीतराग छविमान बिंब, सब सौम्य मूर्ति द्युतिमान बिंब।।९।। जिनप्रतिमा वंदों बारबार, सब सिद्धों को नित नमस्कार। हे नाथ! हरो मेरे कलेश, मुझ को निजपद देवो महेश।।१०।। —घत्ता— जय गजदंताचल, जिनगृह निरमल, जय जय हे त्रैलोक्यपती। जय मंगलकारी, कर्मविदारी, जय तुम ध्यावें ‘ज्ञानमती’।।११।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरो: गजदन्ताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्य: जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१६) विजयमेरु संबंधि धातकी शाल्मलिवृक्ष जिनालय पूजा —अथ स्थापना—नरेन्द्र छंद— विजयमेरु के उत्तरकुरु में, वृक्ष धातकी सोहे। इसी मेरु के देवकुरू में, शाल्मलि तहँ मन मोहे।। इनकी एक एक शाखा पर, जिनमंदिर सुखकारी। इन दो मंदिर की जिनप्रतिमा, पूजो अघतमहारी।।१।। —दोहा— तरु के सब जिनराज की, आह्वानन विधि ठान। आवो आवो नाथ! अब, करो सकल दु:ख हान।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षसंबंधीद्वयजिनालयस्थ सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षसंबंधीद्वयजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षसंबंधीद्वयजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टकं—नाराच छंद— हिमाद्रि गंगनीर लाय, स्वर्ण भृंग में भरूँ। जिनेश पादपद्म धार, देत ही तृषा हरूँ।। तरु तने जिनेन्द्र को, सुरेन्द्र पूजते वहाँ। महान भक्ति भाव धार, मैं जजूँ उन्हें यहाँ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। सुगंध अष्टगंध लेय, हर्ष भाव ठानिये। जिनेश पादपद्म चर्च, मोह ताप हानिये।। तरू तने जिनेन्द्र को सुरेन्द्र पूजते वहां। महान भक्ति भाव धार मैं जजूं उन्हें यहाँ।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। कमोद जीरिका अखंड, शालि धान्य लाइये। सुपुंज आप पास दे, अखंड सौख्य पाइये।।तरू तने.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। गुलाब कुन्द पारिजात पुष्प अंजली लिये। जिनेश पाद पूज कामदेव को हनीजिये।।तरू तने.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। सुमिष्ट पेâनि लाडु व्यंजनादि भांति भांति के। जिनेशपाद पूजते, भगे क्षुधा पिशाचि के।।तरू तने.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: ्नौवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। अखंड ज्योतिवान दीप स्वर्ण पात्र में जले। जिनेन्द्र पाद पूजते हि, मोहध्वांत भी टले।।तरू तने.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। दशांग धूप लेय अग्नि पात्र में सुखेइये। जिनेश सन्निधी तुरंत कर्म भस्म देखिये।।तरू तने.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: धूपंं निर्वपामीति स्वाहा। इलायची लवंग दाख औ बदाम लाइये। जिनेश को चढ़ाय मुक्तिवल्लभा को पाइये।। तरू तने जिनेन्द्र को सुरेन्द्र पूजते वहां। महान भक्ति भाव धार मैं जजूं उन्हें यहाँ।।८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जलादि अष्ट द्रव्य लेय अघ्र्य को बनाइये। अनघ्र्य सौख्य हेतु नित्य नाथ को चढ़ाइये।।तरू तने.।९।।

 ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षाqस्थतजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

—सोरठा— यमुना सरिता नीर वंâचन झारी में भरा। जिनपद धार देय, शांति करो सब लोक में।।१०।।शांतये शांतिधारा। वकुल कमल अरविंद, सुरभित पूâलों को चुने। जिनपद पंकज अप्र्य, यश सौरभ चहुुुंदिश भ्रमे।।११।दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—दोहा— वृक्ष धातकी शाल्मली,पूर्वधातकी मािंह। उनके जिनगृह नित जजूँ, पुष्पांजली चढ़ाहिं।।१।। इति विजयमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —नरेन्द्र छन्द— विजयमेरु ईशान कोण में, वृक्ष आंवले जैसा। तरु की उत्तर गत शाखा पर, जिनगृह अनुपम वैसा।। यतिपति वंदित जिनवर प्रतिमा, कलिमल नाश करे हैं। पूुजन करते भविजन मिलकर, यम का पाश हरे हैं।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिधातकीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। विजयमेरु नैऋत्य कोण मेें, शाल्मली द्रुम भारी। इसकी दक्षिणगत शाखा पे, जिन मंदिर भवहारी।। गणधर भी नित ध्याते रहते, मन में उन प्रतिमा को। जनम जनम अघ नाशन हेतू, हम भी पूजे उनको।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिशाल्माqलवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य दोहा— पूर्वधातकी खंड में धातकी शाल्मलि वृक्ष। इनके श्री जिनभवन को, पूजूँ कर मन स्वच्छ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिंबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला —नरेन्द्र छंद— विजयमेरु ईशानदिशा मेें वृक्ष धातकी सोहे। नैऋत दिश में वृक्ष शाल्मलि सुरगण का मन मोहे।। इक इक के परिवार तरू दो, लाख सहस अस्सी हैं। दो सौ अड़तिस इतने सबमें, प्रतिमा शाश्वतकी हैं।।१।। —नाराच छंद— जिनेश बिंब एक सौ सुआठ सर्व वृक्ष में। प्रमुख्यता धरे महान एक ही तरु इमेें।। नमो नमो जिनेश तोहि धर्म के स्वरूप हो। कलंक पंक क्षालने सदा सुतीर्थ रूप हो।।२।। अनादि हो अनन्त हो प्रसिद्ध सिद्ध रूप हो। दयाल धर्मपाल तीन काल एक रूप हो।। नमो नमो जिनेश तोहि धर्म के स्वरूप हो। कलंक पंक क्षालने सदा सुतीर्थ रूप हो।।३।। अलोक लोक में प्रधान तीन लोक नाथ हो। अनेक रिद्धि के धनी सुभक्ति के सनाथ हो।। नमो नमो जिनेश तोहि धर्म के स्वरूप हो। कलंक पंक क्षालने सदा सुतीर्थ रूप हो।।४।। महान दीप्तिमान मोहशत्रु को कृपान हो। प्रसन्न सौम्य आस्य१ हो पवित्र हो पुमान हो ।। नमो नमो जिनेश तोहि धर्म के स्वरूप हो। कलंक पंक क्षालने सदा सुतीर्थ रूप हो।।५।। दिनेश२ तें विशेष तेज की महान राशि हो। कुमोदनी भवीक हेतु वें सुधानिवास३ हो।। नमो नमो जिनेश तोहि धर्म के स्वरूप हो। कलंक पंक क्षालने सदा सुतीर्थ रूप हो।।६।। भवाब्धि डूबते तिन्हें तुम्हीं सुकर्णधार हो। गुणौघ४ रत्न के समुद्र सार में सु सार हो।। नमो नमो जिनेश तोहि धर्म के स्वरूप हो। कलंक पंक क्षालने सदा सुतीर्थ रूप हो।।७।। दोहा— तुम गुण गण मणि अगम हैं, को गण पावे पार। जो गुण लव वंâठहिं धरे, सो उतरे भव पार।।८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थ-जिनबिंबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१७) विजयमेरु के सोलह वक्षार पर्वत जिनालय पूजा —अथ स्थापना—गीता छंद— श्रीविजयमेरू पूर्व पश्चिम, पूर्व अपर-विदेह हैं। इनमें कहे वक्षार सोलह, तास में जिनगेह हैं।। उनमें सुरासुर वंद्य प्रतिमा, भविक कल्मष परिहरें। थापूँ उन्हें इत आय तिष्ठो, भक्ति से पूजन करें।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थितषोडशवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थितषोडशवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थितषोडशवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ—सखी छंद— (चाल—सुनिये जिन अरज.....) बहु युग से तृषा सतायो, इस हेतू जल ले आयो। वक्षाराचल जिन प्रतिमा, पूूजूँ उन अद्भुत महिमा।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मुझको भवताप तपायो, इस कारण गंध घिसायो। वक्षारगिरी जिन पूजें, सब कर्म शत्रु दल धूजें।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। मोतीसम तंदुल लाये, प्रभु आगे पुंज चढ़ाये। वक्षार अचल जिनप्रतिमा, पूजूँ सिद्धन की उपमा।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। सौगंधित सुमन१ लिये हैं, जिनवर पद यजन किये हैं। वक्षार नगन२ जिन सोहें, पूजूँ मैं सब सुख हो हैं।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। घृत मिश्रीयुत पकवाना, जिनपद पूजन अघ हाना। वक्षार अचल जिनगेहा, पूजन से हो गतदेहा।।५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। गोघृत दीपक में भरके, जिन पूजूँ आरति करके। वक्षार गिरी जिन देवा, पूजत भ्रम तम हर लेवा।।६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। दश गंध अगनि में डालें, सब व्रूâर करम भी हालें। वक्षार नगों पे प्रतिमा, पूजत होवे फल सुषमा।।७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। पिस्ता बादाम चिरोंजी, फल ले प्रभु पूज करो जी। वक्षार अचल जिन मूर्ती, पूजत ही शिवफल पूर्ती।।८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंधादिक बहु लाये, सुवरण के थाल भराये। वक्षार अचल जिनप्रतिमा, पूजत सुख होय अनुपमा।।९।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— सीतानदी सुनीर जिनपद पंकज धार दे। वेग हरूँ भव पीर, शांतीधारा शांतिकर।।१०।। शांतये शांतिधारा। बेला कमल गुलाब, चंप चमेली ले घने। जिनवर पद अरविंद, पूजत ही सुखसंपदा।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—दोहा— पूर्व धातकी खंड में, पूरब अपर विदेह। सोलह गिरि वक्षार के, जिनगृह जजूँ सनेह।।१।। इति श्रीविजयमेरुसंबंधिषोडशवक्षारस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजिंल क्षिपेत्। छन्द जोगीरासा—(चाल—इह विध राज करे नरनायक....) पूर्व विदेह नदी सीता के, उत्तरतट वक्षारा। भद्रसाल वेदी सन्निध में, ‘चित्रवूâट’ सुखकारा।। उस पर जिनमंदिर है सुन्दर, जजत पुरंदर देवा। मैं भी जिनप्रतिमा को पूजूँ, होवे भव दु:ख छेवा।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थचित्रवूâटवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। क्रम से ‘पद्मवूâट’ नामक है, गिरि वक्षार सुहाना। मुनिगण उस पर ध्यान धरत हैं, पावत सौख्य महाना।। उस पर जिनमंदिर है सुन्दर, जजत पुरंदर देवा। मैं भी जिनप्रतिमा को पूजूँ, होवे भव दु:ख छेवा।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थपद्मवूâटवक्षारपर्वताqस्थतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिनवूâट’ वक्षार तीसरा, सब जन मन को प्यारा। इस पर चार वूâट उनमें से,सिद्धवूâट अघ हारा।। उस पर जिनमंदिर है सुन्दर, जजत पुरंदर देवा। मैं भी जिनप्रतिमा को पूजूँ, होवे भव दु:ख छेवा।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थनलिनवूâटवक्षारपर्वताqस्थतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘एकशैल’ वक्षार बगीचे बावड़ियों से सोहे। देव देवियाँ खेचर खेचरनी किन्नर मन मोहे।। उस पर जिनमंदिर है सुन्दर, जजत पुरंदर देवा। मैं भी जिनप्रतिमा को पूजूँ, होवे भव दु:ख छेवा।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थएकशैलवक्षारपर्वताqस्थतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —चौपाई— सीता नदि के दक्षिण तास, देवारण्य वेदिका पास।

            	    नाम ‘त्रिवूâट’ कहा वक्षार, तापर जिनगृह पूजूँ सार।।५।।

ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थत्रिवूâटवक्षारपर्वताqस्थतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। है ‘वैश्रवण’ दुतिय वक्षार, तापर सिद्धवूâट मनहार। तामें जिनगृह में जिनबिंब, अघ्र्य चढ़ाय जजूँ तज डिंभ।।६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थवैश्रवणनामवक्षारपर्वताqस्थत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अंजन’ है तीजा वक्षार, वन वेदी सुर महल अपार। तापर जिनगृह में जिनराज, अघ्र्य चढ़ाय लहूँ शिवराज।।७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थअंजनवक्षारपर्वताqस्थतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अञ्जनात्मा’ है वक्षार, तापर मुनिगण करत विहार। इस पर जिनमंदिर अभिराम, जिनमूरति को करूँ प्रणाम।।८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थांजनात्मावक्षारपर्वताqस्थतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —जोगीरासा— द्वीप धातकी अपरविदेहा, सीतोदा तट दायें। भद्रसाल सन्निध वक्षारा, ‘श्रद्धावान’ कहाये।। उस पर सिद्धवूâट में जिनगृह, जिनप्रतिमा मनहारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाकर मैं नित, रोग शोक भयहारी।।९।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थश्रद्धावानवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘विजटावान’ दुतिय वक्षारा, सुर किन्नर चितहारी। ऋषिगण विचरण करते रहते, परमानंद विहारी।। उस पर सिद्धवूâट में जिनगृह, जिनप्रतिमा मनहारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाकर मैं नित, रोग शोक भयहारी।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थविजटावानवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आशीविष’ वक्षार तीसरा, तापर उपवन वेदी। सुर गण के प्रासाद मनोहर, मुधर पवन श्रमछेदी।। उस पर सिद्धवूâट में जिनगृह, जिनप्रतिमा मनहारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाकर मैं नित, रोग शोक भयहारी।।११।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थआशीविषवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभ वक्षार‘सुखावह’ चौथा, अतिरमणीय सुहाता। चार वूâट हैं मन को भाते, त्रय सुरगृह सुखदाता।। उस पर सिद्धवूâट में जिनगृह, जिनप्रतिमा मनहारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाकर मैं नित, रोग शोक भयहारी।।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसुखावहवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —चौपाई— द्वीप धातकी अपर विदेह, सीतोदा उत्तर तट येह। देवारण्य निकट वक्षार, ‘चंद्रमाल’ पर जिनगृह सार।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थचंद्रमालवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘सूर्यमाल’ दूूजा वक्षार, तापर जिनवर गृह सुखकार। तामें सुरनर नत जिनबिंब, मैं पूजूँ सिद्धन प्रतिबिंब।।१४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसूर्यमालवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नागमाल’ तीजा वक्षार, सुर खग मुनिगण करत विहार। भवविजयी श्री जिनवर धाम, पूजन करूँ लहूँ शिवधाम।।१५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थनागमालवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘देवमाल’ चौथा वक्षार, दर्शनीय उत्तम गिरि सार। तापर मदनजयी जिनगेह, जिनप्रतिमा को जजूँ सनेह।।१६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थदेवमालवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य—विष्णुपद छंद— दीप धातकी में हैं सोलह, पर्वत वक्षारा। स्वर्णमयी सब चार वूâट, युत अनुपम भंडारा।। तीन वूâट पर देव देवियाँ, रहते सुख पाते। नदी निकट वूâटों पर जिनगृह, यजते अघ जाते ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिंबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम: । जयमाला —दोहा— विजयमेरु पूरब अपर, सोलह गिरि वक्षार। जयमाला जिनगेह की, पढ़ूँ हरष उर धार।।१।। रोला छंद— जय जय गिरि वक्षार, क्षेत्र विदेहनि माहीं। सब सुवरण द्युतिमान, चउ चउ वूâट कहाहीं।। जय जय श्री सिद्धवूâट, सब पे शोभ रहे हैं। तामें श्री जिनेगह, अनुपम दीप रहे हैं।।२।। जय जय शाश्वत बिंब, इक सौ आठ सभी में। जय जय वे उत्तुंग, कर१ दो सहस सभी में।। सुर युगलों की मूर्ति, चौंसठ हैं जिनपासी। चंवर लिये कर माहिं, मानों चंवर ढुरासी।।३।। तीन छत्र शोभंत, भामंडल छवि भारी। खर नर नारी आय, जिन पूजें सुखकारी।। घंटा की ध्वनि होत, घन घन घन प्रिय लागे। बहु पूâलन की माल, लटवेंâ दिश महका के।।४।। भृंग कलश आदर्श२, चमर ध्वजा व्यजना३ है। छत्र तथा सुप्रतिष्ठ४, मंगल द्रव्य गिना है।। मंगल द्रव्य सुआठ, मंगलकारी मानो। प्रत्येक इक सौ आठ, इक इक प्रभु को जानो।।५।। श्रीदेवी श्रुतदेवि, ये तो रत्नमयी हैं। वर सर्वाण्ह सुयक्ष, सनत्कुमार सही हैंं।। ये चारों इक एक, मूर्ती पासे तिष्ठें। शाश्वत रचना येह, उस श्रद्धा धर नीके।।६।। जिनमंदिर के मािंह, सुवरण की मालायें। झारी दर्पण चक्र, चामर आदि बतायें।। मुख्य द्वार द्वय भाग, रत्नन की मालायें। चार हजार प्रमाण, जिन आगम यह गायें।।७।। इनके बीच अनादि, सुवरण की मालायें। बारह सहस प्रमाण, श्री यतिवृषभ१ बतायें।। रत्न खचित बत्तीस, सहस सु पूरण कलशे। चौबिस सहस प्रमाण, धूप सुघट सुवरण से।।८।। लघु द्वय द्वारे मािंह रत्नन सुवरण माला। धूप घटोें में धूप, खेते सुरगण आला।। इत्यादिक रमणीय, रचना बहुत कही है। जिनपद पूजें इन्द्र, चक्री आदि सही है।।९।। हम भी जिनपद पूज, अतिशय पुण्य कमावें। जन्म-जन्म के पाप, इक क्षण माहिं गमावें।। सुरपद वांछा नाहिं, नहिं कुछ फल की वांछा। निज पद दीजे मोहि, एक यही मुझ याञ्चा।।१०।। —घता— जय जय जिनदेवा, करमन छेवा, पढ़े सुने तुम जयमाला। सो ज्ञानमती धर, हो शिवतिय वर, सुख पावे शाश्वत काला।।११।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिंबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।।

(पूजा नं.१८) विजयमेरु संबंधी चौंतीस विजयार्ध जिनालय पूजा —अथ स्थापना—जोगीरासा छंद— विजयमेरु के पूर्व अपर में, बत्तिस क्षेत्र विदेहा। तिनके मध्य रजतगिरि सोहें, तिनपे श्रीजिनगेहा।। भरतैरावत में जिनगृहयुत, रजत गिरी सरधाना। चौंतिस रजताचल जिनप्रतिमा, मैं थापूँ इह थाना।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ—चाल-नंदीश्वर पूजा— गंगा जल शीतल स्वच्छ वंâचन भृंग भरों। जिनवर पद सरसिज पूज, तृष्णा दाह हरों।। चौंतिस रजताचल माहिं, जिनगृह मनहारी। सब रिद्धि सिद्धि सुख देत, पूजों अघ हारी।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। वर अष्ट गंध घिस लाय, सुरभित भृंग नचें। मम मोह ताप हर हेतु जिनवर पद चरचें।।चौंतिस.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। अति उत्तम उज्ज्वल शालि, तंदुल थाल भरे। अक्षय अनुपम सुख हेतु, प्रभु ढिग पुंंज करें।। चौंतिस रजताचल मािंह, जिनगृह मनहारी। सब रिद्धि सिद्धि सुख देत, पूजों अघ हारी।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। मचवुंâद कदंब गुलाब, नाना वर्ण धरें। पूजत ही जिनपद पद्म, काम कलंक हरें।।चौतिस.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। खाजे ताजे पकवान, मालपुआ लाये। जिनपद कमलों को पूज, रोगक्षुधा जाये।।चौंतिस.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। घृत दीप कपूर जलाय जगमग ज्योति जले। अज्ञान महातम नाथ, तुम पद पूज टले।।चौंतिस.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। वरधूप हुताशन संग जलते धूम करे। जिनवर पद सन्निध पाय, बहुविध कर्म जरें।।चौंतिस.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। पिस्ता किसमिस अंगूर, आम अनार लिये। जिनपद पूजत ही नित्य, अनुपम सुफल किये।।चौंतिस.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल फल वसु द्रव्य सजाय, रत्न मिलाय लिया। जिनवर पद पूजत आय, सौख्य अनघ्र्य लिया।। चौंतिस रजताचल मािंह, जिनगृह मनहारी। सब रिद्धि सिद्धि सुख देत, पूजों अघ हारी।।९।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— गंगनदी को नीर, तुम पद धारा मैं करूँ। जिनपद धारा देत, शांति करो सब लोक में।।१०।। शांतये शांतिधारा। वकुल कमल अरविंद, सुरभित पूâलों को चुने। जिनपद पंकज अप्र्य, यश सौरभ चहुंदिश भ्रमें।।११।। परिपुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य —दोहा— विजयमेरु के चार दिश, चौंतिस गिरि विजयार्ध। उनके चौंतिस जिनभवन, पूजूँ नित्य कृतार्थ।।१।। इति श्रीविजयमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। चौबोल छंद (चाल—मेरी भावना) ‘कच्छा’ देश विदेह कहाता, उसके मधि रूपाद्रि रहे। रक्ता रक्तोदा नदियों से, कच्छा के छहखंड कहे।। आर्यखंड मधि ‘क्षेमा’ नगरी जिसमें तीर्थंकर रहते। रजतगिरी १ के जिनमंदिर को, अर्घ चढ़ाकर हम यजते।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थकच्छादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुकच्छा’ आर्य ख्ांड में, ‘क्षेमपुरी’ है श्रेष्ठ मही। तीर्थंकर चक्री आदिक से, जिनमंदिर से शोभ रही।। देश मध्य के रजतगिरी पर, जिन चैत्यालय धर्म मही। उसमें सब प्रतिमा को पूजूँ अघ्र्य चढ़ाकर भक्ति सही।।२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसुकच्छादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महाकच्छा’ में रूपाचल नववूâटों सहित कहा। उसके सिद्धवूâट में जिनगृह, प्रतिमा यजते पाप दहा।। इस विदेह के आर्य खंड के, मध्य ‘अरिष्टापुरी’ महा। नितप्रति केवलि श्रुतकेवलि मुनि, ऋषिगण विचरण करे वहाँ।।३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थमहाकच्छादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘कच्छकावती’ मध्य में, विजयारधगिरि रजत समा। तीन कटनियों से खग नगरी, इक सौ दश से श्रेष्ठतमा।। इस विदेह के आर्य खंड में, कही ‘अरिष्टपुरी’ सुखदा। विजयारध के सिद्धवूâट को, पूजत निंह हो दु:ख कदा।।४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थकच्छकावतीदेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश रम्य ‘आवर्ता’ उसमें, रजतगिरी अतिशय महिमा। उसके सिद्धवूâट पर जिनगृह, इक सौ आठ जैन प्रतिमा।। आर्य खंड ‘खड्गा’ नगरी के, मुनिगण भी वहाँ दर्श करें। हम भी अघ्र्य चढ़ाकर पूजें, गर्भवास के दु:ख हरें।।५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थावर्तादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘लांगलावर्ता’ उसमें, रजताचल शुभ राज रहा। इस पर सिद्धवूâट मंदिर है, सुर असुरों से पूज्य कहा।। आर्यखंड ‘मंजूषा’ नगरी, ताके नर नारी रुचि से। अकृत्रिम जिनप्रतिमा पूजें, जिनवर गुण गाते मुद से।।६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थलांगलावर्तादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कला’ में रूपाचल, उस पर शुभ नव वूâट कहे। सिद्धवूâट पर जिनमंदिर में, अनुपम प्रतिमा शुद्ध रहे।। आर्यखंड ‘औषधि’ नगरी के, सब जग भक्ति सहित भजते। हम सब अघ्र्य चढ़ाकर जिनपद, पूजा कर सब दु:ख तजते।।७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थपुष्कलादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कलावती’ मध्य में, रजतगिरी जन मन हरती। उसके सिद्धवूâट जिनगृह की, सुर ललना कीर्तन करती।। ‘पुंडरीकिणी’ नगरी जन भी, विद्याबल से गमन करें। हम भी यहीं अघ्र्य अर्पण कर, श्रद्धा से नित नमन करें।।८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थपुष्कलावतीदेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —जोगीरासा छन्द— ‘वत्सादेश’ विदेह कहाता, तामधि विजयारध है। उसपे सिद्धवूâट चैत्यालय, जिनवरबिंब अनघ१हैं।। इस विदेह में पुरी ‘सुसीमा’, आर्यखंड मधि मानी। वहँ के जन पूजें जिनवर को, मैं भी पूजन ठानी।।९।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थवत्सादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुवत्सा’ के मधि सुन्दर, रजतगिरी शाश्वत है। सिद्धवूâट जिनमंदिर उस पर, मुनिगण नित ध्यावत हैं।। इस विदेह में पुरी ‘वुंâडला’ आर्यखंड मधि मानी। वहँ के जन पूजें जिनवर को, मैं भी पूजन ठानी।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसुवत्सादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महावत्सा’ मधि सुन्दर, रूपाचल नव वूâटा। सिद्धवूâट में श्री जिनमंदिर, पूजत ही अघ छूटा।। इस विदेह में ‘अपराजितपुरि’ आर्यखंड में मानी। वहँ के जन पूजें जिनवर को, मैं भी पूजन ठानी।।११।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थमहावत्सादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘वत्सकावती’ मध्य में, रजताचल मन भावें। सिद्धवूâट में जिनचैत्यालय, पूजन कर सुख पावे।। इस विदेह में ‘प्रभंकरापुरि’ आर्यखंड में मानी। वहँ के जन पूजें जिनवर को, मैं भी पूजन ठानी।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थवत्सकावतीदेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रम्यादेश’ विदेह तास मधि, रजतगिरी अति सोहे। सिद्धवूâट में जिनप्रतिमा को पूजत ही सुख होहे।। ‘अंकावति’ नगरी विदेह में, आर्यखंड में मानी। वहँ के जन पूजें जिनवर को, मैं भी पूजन ठानी।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थरम्यादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुरम्या’ तामधि उज्ज्वल’ रूपाचल मन भाना। सिद्धवूâट में जिनबिंबों को, जजते पातक हाना।। ‘पद्मावती’ पुरी क्षेत्तर में, आर्यखंड मधि मानी ।। वहँ के जन पूजें जिनवर को, मैं भी पूजन ठानी।।।।१४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसुरम्यादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश कहा ‘रमणीया’ सुन्दर, तामधि रजतगिरी है। सिद्धवूâट की जिनवर प्रतिमा, जजते दु:ख हरी हैं।। इस विदेह में ‘शुभापुरी’ है, आर्यखंड में मानी। वहँ के जन पूजें जिनवर को, मैं भी पूजन ठानी।।१५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थरमणीयादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘मंगलावती’ अनूपम, रजताचल तामें है। सिद्धवूâट जिनदेव सदा ही, दुख दरिद्र हाने हैं।। इस विदेह पुरि ‘रत्नसंचया’ आर्यखंड में मानी। वहँ के जन पूजें जिनवर को, मैं भी पूजन ठानी।।१६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थमंगलावतीदेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। काव्य छंद—(चाल—अहो जगत गुरुदेव.....) ‘पद्मादेश’ विदेह, तामधि रजत गिरी है। उस पर श्रीजिनगेह, पूजत पाप हरी है।। पद्मा आरजखंड, ‘अश्वपुरी’ नगरी है। ताके जन से वंद्य, जिनपद पूज करी है।।१७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थपद्मादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुपद्मा’ माहिं, रजताचल मन भाना। उस पर जिनवर धाम, पूजत पाप पलाना।। आरजखंड सुमध्य, ‘सिंहपुरी’ नगरी है। ताके जन से वंद्य, जिनपद पूज करी है ।।१८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसुपद्मादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘महापद्मा है देश, रूपाचल ता माहीं। उसके श्रीजिनबिंब, जजते पाप नशाहीं।। आरजखंड सुमध्य, ‘महापुरी’ नगरी हैंं।। ताके जन से वंद्य, जिनपद पूज करी है।।१९।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थमहापद्मादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पद्मकावति’, रूपाचल अभिरामा। सिद्धवूâट के माहिं, पूजत हूँ जिनधामा।। आरजखंड सुमध्य, ‘विजयापुरि’ नगरी है।। ताके जन से वंद्य, जिनपद पूज करी है।।२०।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थपद्मकावतीदेशमध्यविजया-र्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शंखादेश‘ विदेह, विजयारध गिरि माना। सिद्धवूâट जिनगेह, पूजत ही सुख दाना।। आरजखंड सुमध्य, शुभ ‘अरजा’ नगरी है।। ताके जन से वंद्य, जिनपद पूज करी है।।२१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थशंखादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिनादेश’ विदेह, रूपाचल मन भावे। तापर जिनवरगेह, पूजत शोक नशावे।। आरजखंड सुमध्य, शुभ ‘विरजा’ नगरी है।। ताके जन से वंद्य, जिनपद पूज करी है।।२२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थनलिनादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘कुमुदादेश’ महान, रूपाचल अति सोहे। तापर श्रीजिनधाम, पूजत ही सुख होवे।। आरजखंड सुमध्य कही ‘अशोकपुरी’ है। ताके जन से वंद्य, जिनपद पूज करी है।।२३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थकुमुदादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘सरिता’ देश महान, रूपाचल वर जानो। ताके जिनगृह माहिं, जिनपद पूजन ठानो।। आरजखंड सुमध्य, ‘वीतशोक’ नगरी है।। ताके जन से वंद्य, जिनपद पूज करी है।।२४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसरितादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —गीता छंद— ‘वप्रा’ विदेह सुमाहिं सुन्दर, रजतगिरि मनभावना। नववूâट में इक वूâट पर है, जिनभवन अति पावना।। इस देश आरजखंड में, ‘विजयापुरी’ अति सोहनी। ताके जनों से पूज्य जिनवर, मूर्ति पूजूँ मोहनी।।२५।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थवप्रादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुविदेह ‘सूवप्रा’ मधी है, रजतगिरि उत्तम कहा। तापे जिनालय में रतनमय, बिंब का अतिशय महा।। इस देश आरजखंड में, पुरि ‘वैजयंती’’ सोहनी।। ताके जनों से पूज्य जिनवर, मूर्ति पूजूँ मोहनी।।२६।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसुवप्रादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभ देश ‘महवप्रा’ सुहाता, तास में विजयार्ध है। उसपे जिनेश्वर मूर्तियों को, महामुनिगण ध्यात हैं।। इस देश आरजखंड में नगरी ‘जयंती’ सोहनी। ताके जनों से पूज्य, जिनवर मूर्ति पूजूँ मोहनी।।२७।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थमहावप्रादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभ देश ‘वप्रीकावती’ में, रूप्यगिरि सुन्दर कहा। ऋषिगण विचरते हैं सदा, जिनवर सदन मनहर रहा।। इस देश आरजखंड में, ‘अपराजिता’ पुरि सोहनी।। ताके जनों से पूज्य जिनवर, मूर्ति पूजूँ मोहनी।।२८।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थवप्रकावतीदेशमध्यविजया-र्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वरदेश ‘गंधा’ बीच में, विजयार्ध अनुपम शासता। किन्नरगणों के गीत से, जिनवर भवन नित भासता।। इस देश आरजखंड में, ‘चक्रापुरी’ अति सोहनी।। ताके जनों से पूज्य जिनवर, मूर्ति पूजूँ मोहनी।।२९।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थगंधादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभ देश ‘सूगंधा’ मधी है, रजतगिरि रूपामयी। विद्याधरों की पंक्तियाँ, जिनवर भवन पूजें सही।। इस देश आरजखंड में, ‘खड्गापुरी’ है सोहनी।। ताके जनों से पूज्य जिनवर, मूर्ति पूजूँ मोहनी।।३०।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसुगंधादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभ देश ‘गंधीला’ मधी है, रजतगिरि अति सोहना। गंधर्व सुरगण पूजते हैं, जिनभवन मन मोहना।। इस देश आरजखंड में, नगरी ‘अयोध्या’ सोहनी।। ताके जनों से पूज्य जिनवर, मूर्ति पूजूँ मोहनी।।३१। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थगंधिलादेशमध्यविजयार्धपर्वत- स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभ ‘गंधमालिनि’ देश में, विजयार्ध गिरि सुन्दर कहा। उस पर जिनेश्वर बिंब को, नित जजें सुर किन्नर अहा।। इस देश आरजखंड में, नगरी ‘अवध्या’ सोहनी। ताके जनों से पूज्य जिनवर, मूर्ति पूजूँ मोहनी।।३२।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थगंधमालिनीदेशमध्य-विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —नरेन्द्रछंद— ‘भरतक्षेत्र’ में हिमगिरि से गंगा सिन्धू उदगमतीं। रूपाचल की गुफा तले से बाहर होेकर बहतीं।। आर्यखंड के मध्य ‘अयोध्या’ तीर्थंकर जिन होते। रजताचल के जिनगृह जिनवर, बिंब जजतसुख होते।।३३।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिभरतक्षेत्रस्थविजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शिखरी से रक्ता रक्तोदा, नदियाँ निकलें जानो। विजयारध की गुफा तले से, बाहर आती मानों।। आर्यखंड के मध्य ‘अयोध्या’, पुरुष शलाका होते । विजयारध के जिनमंदिर को, पूजत ही मल धोते ।।३४।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थविजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य— पूरब पश्चिम कहे विदेहा, तिनके बत्तिस जानो। दक्षिण उत्तर भरतैरावत के, दो रजताचल मानो।। इन चौंतिस के चौंतिस जिनगृह, रत्नमयी जिनप्रतिमा। पूरण अघ्र्य चढ़ाकर पूजूँ, इनकी अतिशय महिमा।।१।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला —सोरठा— जय जय गिरि विजयार्ध, जय जिनचैत्यालय नमूूँ। जय जय श्री जिनबिंब, नमूूँ सदा भव दु:ख हरो।।१।। —शम्भु छंद— श्री विजयमेरु पूर्वापर में, बत्तिस शुभ क्षेत्र बखाने हैं। उन सबमें शाश्वत रचना है, नित करमभूमि ही माने हैं।। इक क्षेत्र में कोटी छ्यानवें हैं, पुर ग्राम रतनगृहयुत माने। हैं नगर पछत्तर सहस रम्य, सोलह सु हजार खेट माने।।२।। कर्वट चौंतीस हजार कहे, और चार हजार मटंब कहे। पत्तन अड़तालिस सहस तथा, निन्यानवे सहस द्रोणमुख हैं।। संवाहन चौंतिस सहस दुर्ग-अटवी अट्ठाइस सहस कहीं। हैं छप्पन अंतरद्वीप सात सौ, कुक्षिनिवास प्रसिद्ध सही।।३।। रत्नाकर छब्बिस सहस सदा, रत्नों की खान बखाने हैं। नानाविध उपवन खंड तथा, वापी पुष्करिणी माने हैं।। त्रयवर्णी क्षत्रिय वैश्य शूद्र, वहाँ सतत जनमते रहते हैं। ईती भीती दुर्भिक्ष महामारी आदिक नहिं कहते हैं।।४।। अतिवृष्टि अनावृष्टी नहिं है, वहाँ सुखकर मेघ बरसते हैं। ब्रह्मा विष्णू चंडी मुंडी शिव के मंदिर नहिं दिखते हैं।। धर्माभासी मिथ्यादृष्टी, पाखंडी वहँ नहिं होते हैं। कोई कोई जन वहँ पर भी, बस भाव मिथ्यात्वी होते हैं।।५।। नर नारी की उत्कृष्ट आयु, इक पूर्व कोटि बरसों तक है। है आयु जघन अंतर्मुहूर्त, मध्यम में बहुविध भेद रहें।। तन ऊँचाई कर दो हजार, वे कर्मभूमि के वासी हैं। कोई दीक्षा ले कर्मकाट, होते शिवपुर के वासी हैं।।६।। कच्छा आदिक सब क्षेत्रों में, बस यही व्यवस्था मानी है। हैं सभी क्षेत्र में रजतगिरी, दो दो नदियाँ परधानी हैं।। इन सबमें छह-छह ख्ांड हुए, हैं पाँच खंड नर म्लेच्छों के। हों आर्यखंड में तीर्थंकर, चक्री हलधर१ आदिक होते।।७।। रजताचल पर खेचर२ नगरी, पचपन-पचपन द्वय बाजू में। खेचर खेचरनी विद्या से, नित गमन करे दिश दासू३ में।। सब रूपाचल हैं रजतमयी, त्रयकटनी औ नव वूâट कहें। इक सिद्धवूâट नदि के सन्निध, उसमें शाश्वत जिनधाम रहें।।८।। श्री विजयमेरु के दक्षिण में, है भरत क्षेत्र शुभ नाम धरे। इसमें रजताचल पूर्व सदृश, इक सिद्धवूâट जिनधाम खरे।। छह खंड बीच आरजखंड में, षट्काल परावर्तन होते। तीर्थंकर आदिक महापुरुष, त्रेसठ चौथे युग में होते।।९।। श्री विजयमेरु उत्तरदिश में, ऐरावत क्षेत्र कहा जाता। इसके मधि रजताचल ऊपर, इक शाश्वत जिनगृह सुखदाता।। इसमें भी काल परावर्तन, बस चौथे में तीर्थंकर हों। चक्री आदिक त्रेसठ जन सब, चौथे युग में जगमान अहो।।१०।। —घत्ता— जय जय रूपागिरि, चौंतिस मंदिर, जय जिनवर तुम जयमाला। जो पढ़े पढ़ावे सो जन पावे, ‘ज्ञानमती’ श्री गुणमाला।।११।। ॐ ह्रीं श्रीविजयमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्रजताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ- सर्वजिनबिंबेभ्य: जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.१९) पूर्व धातकीखण्ड भरतक्षेत्र वर्तमान तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-्नारेन्द्र छंद पूर्वधातकी भरतक्षेत्र में, वर्तमान जिनदेवा। विजयमेरु के दक्षिणदिश में, सुरनरकृत पद सेवा।। इन चौबीसों तीर्थंकर को, भक्ति भाव से ध्याऊँ। आह्वाननविधि पूजा करके, निजआतम सुख पाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर- समूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर- समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर- समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-स्रग्विणी छंद सिंधु को नीर ले स्वर्ण झारी भरूँ। नाथ के पाद में तीन धारा करूँ।। इंद्रशतवंद्य तीर्थेश को नित जजूँ। रत्न सम्यक्त्व पा भव भ्रमण से बचूँ।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। गंध सौगंध्य चंदन घिसाऊँ सही। नाथपद पूजते पूर्ण साता लही।।इंद्रशत.।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। शालि सुंदर शशीकांति सम लायके। पुंंज धर पूजहूँ नाथ गण गाय के।।इंद्रशत.।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। वुंâद मंदार मल्ली सुमन लाइया। कामजेता प्रभू अर्च सुख पाइया।। इंद्रशतवंद्य तीर्थेश को नित जजूँ। रत्न सम्यक्त्व पा भव भ्रमण से बचूँ।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। मुद्ग लड्डू इमरती भरे थाल में। भूख व्याधी रहित नाथ पूजूँ तुम्हें।।इंद्रशत.।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीप की लौ बहिध्र्वांत नाशे सदा। आपको पूजते भेदविज्ञानदा।।इंद्रशत.।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप ले अग्नि में नित्य खेऊं सही। आत्मशुद्धी करूँ पाउं निज की मही।।इंद्रशत.।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। आम्र अंगूर अखरोट काजू लिये। नाथ को पूजते सौख्य संपत् लिये।।इंद्रशत.।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। नीर गंधादि वसु द्रव्य थाली भरे। अघ्र्य से अर्चते सर्वव्याधी टरे।।इंद्रशत.।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुँजग शांतीकर सदा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- धर्मचक्र के अधिपती, त्रिभुवन पति जिनराज। सुमन चढ़ाकर पूजहूँ, नमूं नमूं नतमाथ।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -रोला छंद- नाथ ‘युगादीदेव’, सब देवन के देवा। त्रिभुवन के तुम देव, भव्य करें नित सेवा।। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, प्रभुपद शीश नमाऊँ। सर्व मनोरथ त्याग, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीयुगादिदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘सिद्धांतजिनेन्द्र’, अंतक को चकचूरा। जो जन पूजें नित्य, पावें सुख भरपूरा।।पूजूँ.।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसिद्धांतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘महाईश’ के नाथ, कामजयी बलधरी। तुम पद पूजें नित्य, वे निजपद अधिकारी।।पूजूँ.।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमहेशनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘परमार्थ’ जिनेश, परम पुरुष तुम ध्याते। भविजन भक्ति समेत, पूजत कर्म नाशते।।पूजूँ.।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपरमार्थनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाथ ‘समुद्धर’ देव, जग उद्धार किया है। जिनने पूजा आप, सौख्य अपार लिया है।। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, प्रभुपद शीश नमाऊँ। सर्व मनोरथ त्याग, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसमुद्धरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘भूधरनाथ’ जिनेश, सब जीवन हितकारी। वाणी मधुर पियूष, पीकर हो सुखकारी।।पूजूँ.।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीभूधरनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘उद्योत’ जिनेंद्र, केवल सूर्य तुम्हीं हो। मुनिमन के प्रद्योत, करते नित्य तुम्हीं हो।।पूजूँ.।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीउद्योतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आर्जव’ जिनवर आप, ऊध्र्वगती को पाई। किन्नर गण तुम कीर्ति, गाते हैं सुखदाई।।पूजूँ.।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीआर्जवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अभयनाथ’ भगवान्, अभयदान दें सबको। सब जीवन प्रतिपाल, नमूँ नमूँ चरणन को।।पूजूँ.।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअभयनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अप्रवंâप’ तीर्थेश, जब तुम जन्म लिया है। इंद्रासन तत्काल कम्पित हो गया है।।पूजूँ.।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअप्रवंâपजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पद्मनाथ’ भगवान्, तुम पद बसती पद्मा। जो पूजें धर प्रीत, पावें अनुपम सद्मा।।पूजूँ.।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपद्मनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पद्मनंदि’ जिनदेव, तुम पदपद्म जजें जो। मृत्यु मल्ल को मार, निज शिवसद्म भजें सो।।पूजूँ.।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपद्मनंदिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाथ ‘प्रियवंâर’ आप, वाणी प्रियहित करणी। कर्म पुटों से भव्य, पीते भव दु:खहरणी।।पूजूँ.।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रियवंâरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘सुकृतनाथ’ जिनेंद्र, अतुल पुण्य निधि तुम हो। जो जन तुम पद भक्त, उनके भ्रम का क्षय हो।।पूजूँ.।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुकृतनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘भद्रनाथ’ जिनदेव, कर्मबली के जेता। हित उपदेशी आप, विश्व तत्त्व के वेत्ता।।पूजूँ.।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीभद्रनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मुनीचंद्र’ भगवान्, मुनिगण तुम गुण गावें। निज आतम का ध्यान, करके शिवपुर जावें।।पूजूँ.।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमुनिचन्द्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पंचमुष्टि’ जिनराज, मोह मल्ल को जीता। पंच परावृत नाश, हुये भविकजन मीता।।पूजूँ.।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपंचमुष्टिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाथ ‘त्रिमुष्टि’ जिनेश, जन्मजरा मृति नाशा। केवल रवि को पाय, लोकालोक प्रकाशा।।पूजूँ.।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीत्रिमुष्टिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘गांगिक’ जिननाथ, शीतल गंगनदीसम। जो करते तुम सेव, पावें सौख्य अनूपम।।पूजूँ.।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीगांगिकनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘गणनाथ’ प्रधान, गणधर वंदन करते। कर्मअरी को हान, निजपद मंडन करते।।पूजूँ.।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीगणनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘सर्वांग जिनेश’, तुम सम रूप न जग में। इंद्र सहस कर नेत्र, फिर भी तृप्त न मन में।।पूजूँ.।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसर्वांगदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘ब्रह्मेन्द्र’ अधीश, आतम गुण में राचें। ब्रह्मानंद पियूष, पीकर भवदु:ख नाशे।।पूजूँ.।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीब्रह्मेन्द्रनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘इंद्रदत्त’ भगवान, इंद्र करें तुम भक्ती। जो तुम आश्रय लेय, पावें अनुपम शक्ती।।पूजूँ.।।२३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीइंद्रदत्तजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘श्री नायक’ जिननाथ, करुणािंसधु तम्हीं हो। करो कृपा मुझनाथ, भवरुज वैद्य तुम्हीं हो।।पूजूँ.।।२४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनायकनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-दोहा धर्मनाथ के नाथ तुम, धर्मचक्रधर धीर। पूरण अघ्र्य चढ़ायके, पाऊँ मैं भवतीर।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीयुगादिदेवादिनायकनाथपर्यंतचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -शंभु छंद- जय जय तुम वाणी कल्याणी, गंगाजल से भी शीतल है। जय जय शमगर्भित अमृतमय, हिमकण से भी अतिशीतल है।। चंदन औ मोती हार चंद्रकिरणों से भी शीतलदायी। स्याद्वादमयी प्रभु दिव्यध्वनी, मुनिगण को अतिशय सुखदायी।।१।। वस्तू में धर्म अनंत कहे, उन एक एक धर्मों को जो। यह सप्तभंगि अद्भुत कथनी, कहती है सात तरह से जो।। प्रत्येक वस्तु में विधि निषेध, दो धर्म प्रधान गौण मुख से। वे सात तरह से हों वर्णित, नहिं भेद अधिक अब हो सकते।।२।। प्रत्येक वस्तु है अस्ति रूप, औ नास्ति रूप भी है वो ही। दो ही है उभय रूप समझो, फिर अवक्तव्य है भी वो ही।। वो अस्तिरूप और अवक्तव्य फिर नास्ति अवक्तव भंग धरे। फिर अस्ति नास्ति और अवक्क्तव्य, ये सात भंग हैं खरे खरे।।३।। स्वद्रव्य क्षेत्र औ काल भव, इन चारों से वस्तु अस्तिमयी। परद्रव्य क्षेत्र कालादि से, वो ही वस्तू नास्तित्व कही।। दोनों का क्रम से कहना हो, तब अस्तिनास्ति यह भंग कहा। दोनों का युगपत कहने से, हो अवक्तव्य यह तुर्य कहा।।४।। अस्ती औ अवक्तव्य क्रम से, यह पंचम भंग कहा जाता। नास्ती औ अवक्तव्य छट्ठा, यह भी है क्रम से बन जाता।। क्रम से कहने से अस्ति नास्ति, और युगपत अवक्तव्य मिलके। यह सप्तम भंग कहा जाता, बस कम या अधिक न हो सकते।।५।। इस सप्तभंगमय सिन्धू में, जो नित अवगाहन करते हैं। वे मोह रागद्वेषादिरूप, सब कर्म कालिमा हरते हैं।। वे अनेकांतमय वाक्य सुधा, पीकर आतमरस चखते हैं फिर परमानंद परमज्ञानी, होकर शाश्वत सुख भजते हैं।।६।। मैं निज अस्तित्व लिये हूँ नित, मेरा पर में अस्तित्व नहीं। मैं चिच्चैतन्य स्वरूपी हूँ, पुद्गल से मुझ नास्तित्व सही।। इस विधि निज को निज के द्वारा, निज में ही पाकर रम जाऊँ। निश्चय नय से सब भेद मिटा, सब कुछ व्यवहार हटा पाऊँ।।७।। भगवन्! कब ऐसी शक्ति मिले, श्रुुतदृग से निज को अवलोवूँâ। फिर स्वसंवेद्य निज आतम को, निज अनुभव द्वारा मैं खोजूूँ।। संकल्प विकल्प सभी तज के, बस निर्विकल्प मैं बन जाऊँ। फिर केवल ‘ज्ञानमती’ से ही, निज को अवलोवूँâ सुख पाऊँ।।८।। -दोहा- वर्तमान चौबीस जिन, नमूँ आप पदपद्म। हरो अमंगल विघ्नघन, हो मुझ अपुनर्जन्म।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखण्डद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थं-करेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.२०) पूर्वधातकीखण्डद्वीप ऐरावतक्षेत्र वर्तमानकालीन तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-गीता छंद वर पूर्वधातकि द्वीप में, शुभ क्षेत्र ऐरावत कहा। तीर्थेश संप्रति काल के, मैं पूजहूँ नितप्रति यहाँ।। समता रसिक योगीश गण, नित वंदना उनकी करें। आह्वानना विधि से सतत, हम अर्चना उनकी करें।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-नाराच छंद सिंधु नीर से जिनेन्द्र पाद पद्म पूजिये। स्वात्म कर्मपंक धोय पूर्ण शुद्ध हूजिये।। वर्तमान तीर्थनाथ वंदना सदा करूँ। धर्मशुक्ल ध्यान हेतु अर्चना मुदा करूँ।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। निर्वपामीति चंदनादि गंध से जिनेश चर्ण चर्चिये। मोहताप ध्वंस के अपूर्व शांति अर्जिये।।वर्तमान.।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

धौत स्वच्छ श्वेत शालि पुंज को रचाइये। स्वात्म सौख्य ले अखंड पाप को नशाइये।। वर्तमान तीर्थनाथ वंदना सदा करूँ। धर्मशुक्ल ध्यान हेतु अर्चना मुदा करूँ।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। मोगरा जूही गुलाब वर्ण वर्ण के लिये। कामदेव के जयी जिनेश चर्ण में दिये।।वर्तमान.।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। गूझिया इमरतियां बनाय थाल में भरें। पूर्ण तृप्त आपको चढ़ाय व्याधियों हरें।।वर्तमान.।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपवर्तिका जले समस्त ध्वांत को हरे। पूजते तुम्हें प्रभो अपूर्व ज्योति को करे।।वर्तमान.।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप गंध युक्त अग्निपात्र में जलाय हूँ। पाप कर्म को जलाय पुण्यराशि पाय हूँ।।वर्तमान.।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। संतरा अनार सेव औ बदाम भी लिये। मोक्ष सौख्य हेतु नाथ! आपको चढ़ा दिये।।वर्तमान.।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। तोय गंध शालि पुष्प आदि अष्ट द्रव्य ले। तीन रत्न हेतु अघ्र्य से जजूँ भले।।वर्तमान.।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुँजग शांतीकर सदा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- ज्ञान दरश सुखवीर्यमय, गुण अनंत विलसंत। सुमन चढ़ाकर पूजहूँ, हरूँ सकल जगपंâद।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -दोहा- नाथ! ‘अपश्चिम’ आपको, जो पूजें धर प्रीत। परमानंद स्वरूप को, लहें बने शिवमीत।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअपश्चिमजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पुष्पदंत जिनराज का, अद्भुत रूप प्रसिद्ध। इंद्र सहस दृग कर निरख, तृप्ति न पावे नित्त।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपुष्पदंतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अर्ह’ जिनेश्वर आपने, मोह अरी का अंत। पहुँचे झट शिवधाम में, मैं पूजूँ भगवंत।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअर्हजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। रत्नत्रय को पूर्ण कर, ‘श्रीचरित्र’ जिनराज। मुक्तिरमा के पति हुये, पूज लहूँ शिवराज।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीचरित्रनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘सिद्धानंद’ जिनेन्द्र को, वंदे त्रिभुवन भव्य। जजूूँ सिद्धि के हेतु मैं, पूरें मुझ कत्र्तव्य।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसिद्धानंदजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सप्त परमस्थान को, पाया ‘नंदगदेव’। परमानंद प्रकाश हित, करूँ आप पद सेव।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनंदगजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पद्मवूâप’ जिनदेव हैं, पद्मालिंगित देह। जो जन पूजें भक्ति से, होते शीघ्र विदेह।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपद्ममवूâपजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘उदयनाभि’ जिनराज ने, जीव समास समस्त। बतलाकर रक्षा करी, पूजूं उन्हें प्रशस्त।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीउदयनाभिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रूक्मेंदु’ जिनराज हैं, षट् पर्याप्ति विहीन। चिन्मूरति विनमूर्ति को, नमूँ करें दुख क्षीण।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीरूक्मेंदुजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘कृपाल’ तीर्थेश का, तीर्थ तीर्थ उनहार। जो नितप्रति अर्चा करें, उतरें भव दधि पार।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीकृपालुजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री प्रौष्ठिल जिनदेव ने, प्रबल कर्म अरिघात। भविजन को संबोधिया, पूज भरूँ सुख सात।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रौष्ठिलजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘सिद्धेश्वर’ भव्यजन, सिद्धी में सुनिमित्त। अघ्र्य चढ़ाकर मैं जजूँ, लहूँ स्वात्मसुख नित्त।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसिद्धेश्वरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अमृतेंदु’ जिन आपके, वचनामृत सुखकार। परमौषधि हैं जन्मरुज, हरें जजूँ पद सार।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअमृतेंदुजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘स्वामिनाथ’ तीर्थेश की, भक्ति कल्पतरु सिद्ध। मैं पूजूं नित भाव से, पाऊं सौख्य समृद्ध।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीस्वामिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘भुवनलिंग’ जिनवर तुम्हें, पूजें त्रिभुवन भव्य। त्रिभुवनमस्तक पर पहुँच, हो जाते कृतकृत्य।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीभुवनलिंगजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तीर्थंकर श्री ‘सर्वरथ’, परमारथ सुखदेत। श्रद्धा से मैं नित जजूँ, सर्वसिद्ध सुखहेत।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसर्वरथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘मेघनंद’ जिनराज हैं, परमामृत के मेघ। मैं पूजूँ नित चाव से, अजर अमर पद हेत।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमेघनंदजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नंदिकेश आनंदघन, गणधर गण सुख हेत। मैं पूजूँ आनंद से, अनुपम आनंद हेत।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनंदिकेशजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तीर्थकर ‘हरिनाथ’ के, गुण अनंत श्रुतमान्य। पूजूँ मैं निज सौख्य हित, सकल विश्व सन्मान्य।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीहरिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘अधिष्ठ’ जिनराज का, केवलज्ञान महान। दर्पणवत् उसमें सतत, झलके सकल जहान।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअधिष्ठजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शांतिकदेव’ जिनेन्द्र ने, किये स्वदोष प्रशांत। पूर्णशांति के हेतु मैं, जजूँ मुक्ति के कांत।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशांतिकदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नंदीस्वामिन’! जो तुम्हें, नित पूजे धर प्रीत। अनुपम निज आनंदमय, पावें धाम पुनीत।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनंदीस्वामिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘वुंâदपाश्र्व’ जिनदेव ने, पूर्ण सुयश विस्तार। भविजन को शिवपथ कहा, जजूँ सार में सार।।२३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवुंâदपाश्र्वजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाथ ‘विरोचन’ विश्व में, पूजित परम जिनेश। मैं पूजूँ शुद्धात्म हित, त्रिकरणशुद्धि समेत।।२४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविरोचनजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्र्य-दोहा- सप्तपरमस्थान गत, चौबीसों जिनराज। पूजूँ पूरण अघ्र्य ले, लहूँ पूर्ण साम्राज।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअपश्चिमादिविरोचनपर्यन्तचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- ध्यानामृत पीकर भये, मृत्युंजय प्रभु आप। गाऊँ तुम जयमालिका, हरो सकल संताप।।१।। -शंभु छंद- जय जय तीर्थंकर शिवसुख कर, जय जय अनवधि गुणसार हो। जय जय सुखज्ञान अतींद्रियधर, जय जय अनुपम रत्नाकर हो।।

तुमने मृत्युंजय बनने का, सबको सुखकर उपदेश कहा। जिसने तुम आज्ञा को पाला, उसने मृत्यु का क्लेश दहा।।२।। संन्यास विधी के तीन भेद, जो पंडित मरण कहे जाते। प्रायोपगमन इंगिनीमरण औ भक्तप्रतिज्ञा कहलाते।। जिसमें निज से पर के विंâचित्, उपकार नहीं वह पहला है। जिसमें निज से वैयावृत्ती, पर से नहिं हो वह मंझला है।।३।। जो श्रेष्ठ संहनन के धारी, वे ही इनको कर सकते हैं। हैं आज हीन संहनन तीन, इसलिये नहीं बन सकते हैं।। बस भक्तप्रतिज्ञा का आश्रय, इस युग के मुनिगण लेते हैं। बारह वर्षों की उच्च अवधि, लेकर ही विधिवत् सेते हैं।।४।। अड़तालिस मुनि परिचर्या रत, निर्यापक बन सेवा करते। वह क्षपक मुनि संन्यास निरत, होेकर जिनवचनों से वरतें।। क्रम क्रम से भोजन त्याग करे, वह अंत समय जल भी छोड़े। तन से बिल्कुल निर्मम होकर, आतम से ही नाता जोड़े।।५।। सबसे ही क्षमा कराकर पुन, स्वयमेव क्षमा परिणाम धरे। संपूर्ण कषायों को तजकर, उत्तम संन्यास अपूर्व करे।। इस विध कषाय औ काय उभय, को कृश करते तन को छोड़े। वह सात आठ भव से ज्यादा, नहिं ले यम की फांसी तोड़े।।६।। भगवन्! तुम भक्ती से ऐसी, शक्ती मुझ में भी आ जावे। संन्यासविधी से मरण करूँ, बस पुनर्जनम सब नश जावे।। मैं मृत्यु को उत्सव समझूँ, समतारस अमृत को पीऊं। क्षुध आदि व्याधि से खेद न हो, अपने में अनुभव रस पीऊं।।७।। बचपन से लेकर अब तक जो, मैंने पुण्यार्जित किया सही। उन सबका फल एकत्रित हो, प्रभु मुझे मिले सब एक यही।। जब प्राण प्रयाण करें मेरे, मम वंâठ अंकुठित बना रहे। तुम नाम मंत्र अंतिम क्षण तक, मेरी जिह्वा पर चढ़ा रहे।।८।। -दोहा- प्रभु मैं याचूं आज, जब तक मुक्ति नहीं मिले। भव-भव में संन्यास, सम्यग्ज्ञानमती सहित।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थं-करेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.२१) पूर्वधातकीखण्डद्वीप विहरमाण तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-गीता छंद वरद्वीपधातकीखण्ड में जो पूर्व अपर विदेह हैं। उनमें सदा विहरें जिनेश्वर चार शिव परमेश हैं।। उन कर्म भूमी में सदा जिनधर्म अमृत वरसता। मैं पूजहूँ आह्वानन कर निज आत्म अनुभव छलकता।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकस्वयंप्रभ-ऋषभानन-अनंतवीर्यतीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकस्वयंप्रभ-ऋषभानन-अनंतवीर्यतीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकस्वयंप्रभ-ऋषभानन-अनंतवीर्यतीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-चाल शेर हे नाथ! आप पाद में त्रयधार मैं करूँ। निज चित्त ताप शांति हेतु आश मैं धरूँ।। तीर्थंकरों के पादकमल चित्त में धरूँ। अनिष्ट के संयोग जन्म दु:ख को हरूँ।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। हे नाथ! आप चर्ण में चंदन विलेपते। संपूर्ण ताप नष्ट हो निजतत्त्व लोकते।।तीर्थं.।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वपरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

हे नाथ! आप अग्र शालि पुंज चढ़ाऊँ। अक्षय अखंड सौख्य हेतु आश लगाऊँ।। तीर्थंकरों के पादकमल चित्त में धरूँ। अनिष्ट के संयोग जन्म दु:ख को हरूँ।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वपरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। हे नाथ! आप चर्ण पुष्पमाल चढ़ाऊँ। सम्पूर्ण सौख्य पाय देह कांति बढ़ाऊँ।।तीर्थं.।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वपरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। हे नाथ! आप सामने नैवेद्य चढ़ाऊँ। उदराग्नि को प्रशमित करूँ निज शक्ति बढ़ाऊँ।।तीर्थं.।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वपरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। हे नाथ! दीप लेय आप आरती करूँ। अज्ञान तिमिर नाश ज्ञान भारती भरूँ।।तीर्थं.।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वपरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। वर धूपघट में धूप खेय कर्म जलाऊँ। हे नाथ! आप भक्ति से सम्यक्त्व को पाऊँ।।तीर्थं.।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वपरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। हे नाथ! श्रेष्ठ फल चढ़ाय अर्चना करूँ। चारित्र लब्धि पाय दु:ख रंच ना भरूँ।।तीर्थं.।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वपरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। हे नाथ! अर्घ लेय रजत पुष्प मिलाऊँ। निजात्म तत्त्व प्राप्ति हेतु अर्घ चढ़ाऊँ।।तीर्थं.।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वपरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादि-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- नाथ! पाद पंकेज, जल से त्रयधारा करूँ। अतिशय शांती हेत, शांतीधारा शं करे।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार गुलाब, पुष्पांजलि अर्पण करूँ। मिल आत्म सुखलाभ, जिनपद पंकज पूजते।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- समवसरण मेें राजते, तीर्थंकर परमेश। पुष्पांजलि कर पूजते, नशें सर्व मन क्लेश।।१।। -शम्भु छंद- धातकी खंड पूरब विदेह, सीतानदि के उत्तर तट पे। अलकापुरि में पितु देवसेन, प्रभु हुये देवसेना माँ से।। रविचिन्ह सहित श्री ‘संजातक’, तीर्थंकर विहरण करते हैं। उनको हम पूजें भक्ती से, वे सबके पातक हरते हैं।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थअलकापुरीमध्यसमव-सरणस्थित-श्रीसंजातकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री विजयमेरु पूरब विदेह, सीतानदि के दक्षिण तट में। विजया नगरी पितु मित्रभूति, जननी सुमंगला से जन्मे।। शशिचिन्ह धरें जग उद्योती, तीर्थेश ‘स्वयंप्रभ’ शिवभर्ता। वे गणधर मुनिगण से वंदित, उनका अर्चन भव दुखहर्ता।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थविजयानगरीमध्यसमव-सरणस्थितश्रीस्वयंप्रभजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। धातकीद्वीप पश्चिम विदेह, सीतोदा के दक्षिण जानो। है पुरी सुसीमा नृपकीर्ति पितु, मात वीरसेना मानो।। है सिंह चिन्ह श्री ‘ऋषभानन’ तीर्थंकर अनुपम सुखधारी। निज परमानंद सौख्य हेतू, मैं पूजूँ त्रिभुवन गुणधारी।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसुसीमापुरीrमध्य-समवसरण-स्थितश्रीऋषभाननजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री विजयमेरु पश्चिम विदेह, सीतोदा के उत्तर तट में। है नगरि अयोध्या पिता मेघरथ, प्रसू सुमंगला से जन्मे।। तीर्थेश ‘अनंतवीर्य’ भगवन्, गजचिन्ह सहित केवलज्ञानी। जो पूजें ध्यावें गुण गावें, वे होवें धर्म शुक्लध्यानी।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थअयोध्यानगरीमध्य-समवसरण-स्थितश्रीअनंतवीर्यजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्र्य दोहा- संजातक अरु स्वयंप्रभ, ऋषभानन जिनराज। जिनवर अनंतवीर्य को, जजत सरें सब काज।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसम्बन्धिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसंजातकादिविहरमाण-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- वैभव अतुल अनंतयुत, समवसरण अभिराम। रत्नत्रय निधि हेतु मैं, शतशत करूँ प्रणाम।।१।। चाल-शेर........ हे नाथ! आप तीन लोक में महान हो। हे नाथ! आप सर्व सौख्य के निधान हो।। मैं बार-बार आप चरण वंदना करूँ। सम्यक्त्व रत्न हेतु नाथ अर्चना करूँ।।२।। हे नाथ! आप भक्ति से सम्पूर्ण दुख टरें। हे नाथ! आप भक्ति रोग शोक को हरे।। हे नाथ! आप भक्ति से सब आपदा टलें। हे नाथ! आप भक्त को सब संपदा मिलें।।३।। तुम भक्त को कभी भी इष्ट का वियोग ना। तुम भक्त को कभी अनिष्ट का संयोग ना।। तुम भक्त के संपूर्ण अमंगल विनश्यते। तुम भक्त को सर्पादि जंतु डस नहीं सवेंâ।।४।। गज सिंह व्याघ्र व्रूâर जंतु शांतचित बने। तुम भक्ति के प्रभाव शत्रु मित्र सम बने।। तुम भक्ति के प्रभाव ईति भीतियाँ टलें। तुम भक्ति से व्यंतर पिशाच भूत भी टलें।।५।। हे नाथ! आप पाय मैं निहाल हो गया। सम्यक्त्व रत्न से ही मालामाल हो गया।। मैं आप सदृश सिद्ध हूँ चिन्मूर्ति आतमा। बस आप भक्ति से ही बना अंतरातमा।।६।। परमात्मा बन जाऊँ नाथ! शक्ति दीजिये। चारित्र लब्धि पूर्ण करूँ युक्ति दीजिये।। अपने ही चरण में प्रभो स्थान दीजिये। ‘सज्ज्ञानमती’ संपदा का दान दीजिये।।७।। -दोहा- नाथ! आपकी भक्ति से, भक्त बनें भगवान। पुन: अनंतों काल तक, रहें पूर्ण धनवान।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थश्रीसंजातकस्वयंप्रभ-ऋषभानन-अनंतवीर्यनामविहरमाणचतुस्तीर्थंकरेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.२२) पूर्व धातकीखण्डद्वीप नवदेवता पूजा अथ स्थापना-नरेन्द्र छंद पूर्वधातकीखंडद्वीप में कर्मभूमि चौंतीस हैं। इनमें अर्हंत् सिद्ध सूरि पाठक साधु मुनिगण हैं।। जिनवरधर्म जिनागम जिनवर प्रतिमा जिनगृह सोहें। आह्वानन कर पूजूँ मैं नित ये मुझ अघमल धो हैं।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-द्रुतविलंबित छंद गगन गंग नदी जल लाइया। जिनपदांबुज धार कराइया। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। सुरभि चंदन गंध घिसाइया। जिन पदाम्बुज अग्र चढ़ाइया। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

धवल अक्षत पुंज चढ़ाइया। सुख अखंडित आश लगाइया।। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। कुसुम रंग बिरंग चढ़ाइया। अमल आतम कीर्ति बढ़ाइया। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। सरस मिष्ट चरू अर्पण करूँ। उदर व्याधि हरो अर्चन करूँ। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। अमल दीप शिखा आरति करूँ। हृदय मोह मिटे भारति भरूँ। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। सुरभि धूप अगनि में खेवते। अशुभ कर्म नशें तुम सेवते। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। मधुर आम अनार भले भले। फल चढ़ाय मनो कलिका खिले। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल फलादिक अर्घ चढ़ाय के। रतनत्रय की आश लगाय के। जजत हूँ नवदेव सुभक्ति से। निज सुधारस हो तुम भक्ति से।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- यमुना सरिता नीर, प्रभु चरणों धारा करूं। मिले निजात्म समीर, शांतिधारा शं करे।।१०।। शांतये शांतिधारा। सुरभित खिले सरोज, जिन चरणों अर्पण करूँ। निर्मद करूँ मनोज, पाऊँ जिन गुण संपदा।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- पूर्वधातकी खंड में, कर्मभूमि चौंतीस। पुष्पांजलि कर पूजहूं, नमूँ नमाकर शीश।।१।। इति मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -नरेन्द्र छंद- विजयमेरु के पूर्व दिशा में, भद्रशाल के पासे। ‘कच्छा’ देश विदेह कहाता, आर्यखंड नदि पासे।। अर्हत् सिद्धाचार्य उपाध्याय, साधु पंचगुरु नित हैं। धर्मजिनागम प्रतिमा जिनगृह, जजत मिले निज सुख है।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहकच्छादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचा-र्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुकच्छा’ उसमें छहखंड, आर्यखंड अतिसुंदर। शाश्वत कर्मभूमि वहां मानव, धर्म करें अति सुखकर।।अर्हंत्।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहसुकच्छादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचा-र्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महाकच्छा’ छहखंड में, आर्यखंड नदि पासे। मध्य राजधानी में जिनवर, विहरें मार्ग प्रकाशें।।अर्हत्।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहमहाकच्छादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सि-द्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘कच्छकावती’ वहाँ पर, मध्य रजतगिरि सोहे। रक्ता रक्तोदा से छह खंड, आर्यखंड मन मोहे।। अर्हत् सिद्धाचार्य उपाध्याय, साधु पंचगुरु नित हैं। धर्मजिनागम प्रतिमा जिनगृह, जजत मिले निज सुख है।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहकच्छाकावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आवर्ता’ पूरब विदेह में, आर्यखंड मनहारी। श्रावक गण जिनभक्ती करके, बने सर्वगुणधारी।।अर्हत्।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहआवर्तादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘लांगलावर्ता’ उसमें, आर्यखंड सुखकारी। गगन गमनचारी मुनि विहरें, गुरु वंदन दुख हारी।।अर्हत्।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहलांगलावर्तादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कला’ छह खंडों में, बंटा आर्यखंड उसमें। जिनवर पंचकल्याणक उत्सव, करते सुरगण मुद में।।अर्हत्।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहपुष्कलादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कलावती’ सुहाता, आर्यखंड की महिमा। तीर्थंकर चक्री हलधर हरि, इनसे बढ़ती गरिमा।।अर्हत्।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहपुष्कलावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देवारण्य वेदिका पासे, सीता के दक्षिण में। ‘वत्सा’ देश विदेह सुहाता, आर्यखंड इस मधि में।।अर्हंत्।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहवत्सादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुवत्सा’ पूरब में है, छह खंडों से सोहे। एक आर्य अरु पाँच म्लेच्छ, खंडों से सुर मन मोहे।।अर्हंत्।।१०।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहसुवत्सादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महावत्सा’ पूरब में, सुर किन्नर गुण गाते। तीर्थंकर का जन्म महोत्सव, सुरपति आय मनाते।।अर्हंत्।।११।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहमहावत्सादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘वत्सकावती’ सुहाना, मध्य रजतगिरि सोहे। विद्याधर विद्याधरियों से, सुरगण का मन मोहे।।अर्हंत्।।१२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहवत्सकावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रम्या’ देश विदेह पूर्व में, शाश्वत चौथा युग है। तीर्थंकर केवलि श्रुतकेवलि, विहरें वहाँ सतत हैं।।अर्हंत्।।१३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहरम्यादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुरम्या’ आर्यखंड में, कर्मभूमि शाश्वत है। मुनिगण कर्म काट शिव वरते, सुरनर मन भावन है।।अर्हंत्।।१४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहसुरम्यादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्वविदेह देश ‘रमणीया’, यथा नाम गुण वैसा। आर्यखंड में धर्मसुधारस, की करते मुनि वर्षा।। अर्हत् सिद्धाचार्य उपाध्याय, साधु पंचगुरु नित हैं। धर्मजिनागम प्रतिमा जिनगृह, जजत मिले निज सुख है।।१५।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहरमणीयादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘मंगलावती’ वहाँ पर, नित नव मंगल होते। आर्यखंड में ऋषिगण विहरण, कर्मकालिमा धोते।।अर्हंत्।।१६।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहमंगलावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -गीता छंद- मेरू विजय के अपर दिश, वनवेदिका के निकट में। ‘पद्मा’ विदेह सुदेश है, उस मध्य आरजखंड में।।अर्हंत्।।१७।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहपद्मादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर देश ‘सुपद्मा’ वहाँ पर, खंड छह में ख्यात है। तीर्थंकरों के जन्म से पावन धरा खंडार्य है।।अर्हंत्।।१८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहसुपद्मादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम विदेहे ‘महापद्मा’ खंड विख्यात हैं। उस मध्य आरजखंड में, सुरगण रमें दिनरात हैं।।अर्हंत्।।१९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहपद्मकावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘पद्मकावति’ देश में, छहखंड में इक आर्य है। जिन पंचकल्याणक महोत्सव, इंद्रगण से मान्य हैं।।अर्हंत्।।२०।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहपद्मकावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शंखा’ विदेह वहाँ सतत, तीर्थंकरों की अर्चना। चव्रेâश हलधर, खगपती, सुरपति करें जिनवंदना।।अर्हंत्।।२१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहशंखादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिना’ विदेह जिनेश्वरों के जन्म तप से वंद्य है। मुनिगण गगनचारी वहाँ, निज आत्मसुख में मग्न हैं।।अर्हंत्।।२२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहनलिनादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘कुमुदा’ विदेह सुअपरदिशि में, खंड छह अति शोभते। इक खंड आरज में जिनेश्वर, धर्म भवि अघ शोधते।।अर्हंत्।।२३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहकुमुदादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिमविदेह ‘सरित्’ में, छहखंड में इक आर्य है। उसमें जिनेश्वर अर्चना, करते भविक शिरधार्य हैं।।अर्हंत्।।२४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहसरितादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। दिश अपर भूतारण्य वेदी, निकट ‘वप्रा’ देश है। छहखंड में इक आर्य है, उसमें दिगंबर वेष हैं।।अर्हंत्।।२५।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहवप्रादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचा-र्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम ‘सुवप्रा’ देश में, छहखंड में रजताद्रि है। नदि पास आरजखंड में, सुरवंद्य जिनवर अंघ्रि हैं।। अर्हत् सिद्धाचार्य उपाध्याय, साधु पंचगुरु नित हैं। धर्मजिनागम प्रतिमा जिनगृह, जजत मिले निज सुख है।।२६।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहसुवप्रादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम ‘महावप्रा’ मधी, छहखंड में पण म्लेच्छ हैं। इक आर्यखंड नदी तरफ, उसमें दिगंबर भेष हैं।।अर्हंत्।।२७।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहमहावप्रादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘वप्रकावति’ देश में, आकाशगामी ऋषि रहें। नित आत्म अनुभव लीन हों, निज कर्ममल को धो रहे।।अर्हंत्।।२८।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहवप्रकावतीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधा’ विदेह सुहावना, छहखंड से शोभित सदा। इस मध्य आरजखंड में, मुनिराज विहरें शर्मदा।।अर्हंत्।।२९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहगंधादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम ‘सुगंधा’ देश में, नहिं ईति भीति कभी वहां। शाश्वत चतुर्थ सुकाल वर्ते, धर्मवृष्टी हो वहाँ।।अर्हंत्।।३०।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहसुगंधादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस ‘गंधिला’ वर देश में, हैं आर्य आरजखंड में। निज आत्म गुण की गंध को, पैâला रहे नभ खंड में।।अर्हंत्।।३१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहगंधिलादेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘गंधमालिनि’ देश में, गणधर मुनीगण नित दिखें। संसार के संताप से, भविवृंद को रक्षित रखें।।अर्हंत्।।३२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहगंधमालिनीदेशस्थितआर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -स्रग्विणी छंद- दक्षिणी दिक् भरत क्षेत्र शोभे वहाँ। खंड षट् मध्य इक खंड आरज वहाँ।। तीर्थंकर केवली साधुगण धर्म है। जैन प्रतिमा जिनालय जजत स्वर्ग है।।३३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिदक्षिणदिग्भरतक्षेत्रस्थितआर्यखंडे-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तरी दिव्â सु ऐरावता क्षेत्र है। खंड आरज वहाँ धर्म अभिप्रेत है।। तीर्थंकर केवली साधु जिनधाम हैं। पूजते भव्य पाते निजी धाम है।।३४।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिउत्तरदिगैरावतक्षेत्रस्थित-आर्यखंडे अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पूर्णाघ्र्य-चौपाई पूर्वधातकीखंड सुद्वीपा, चौंतिस कर्मभूमि सुख दीपा। जिनवर मुनिगण जिनवर धामा, पूजत मिले शीघ्र शिवधामा।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचा-र्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। कर्मभूमि में वर महिलायें, बनें आर्यिका निजसुख पायें। इन सबको वंदामि हमारा, मातृभक्ति से मिले सहारा।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितमहाव्रतपवित्र-सर्वार्यिकाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्वधातकी में तीर्थेशा, पंच कल्याणक क्षेत्र हमेशा। गणधर मुनिगण के शिवथाना, तीर्थक्षेत्र पूजूँ गुणखाना।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थिततीर्थंकरगणधरमुनि-गणपंचकल्याणकादितीर्थक्षेत्रेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला चाल-शेर जय जय श्री अरहंतदेव देवदेव हैं। जय जय अनंतसिद्धि प्रभो! सिद्ध हेतु हैं।। जय जय श्री आचार्यदेव रत्न प्रदाता। जय जय सुउपाध्याय गुरु धर्म के दाता।।१।। जय साधु आत्मसाधना में लीन हो रहे। जय जय जिनेन्द्र धर्मचक्र वर्तता रहे।। जय जय श्रीजिन भारती माँ पालती हमें। जय जय जिनेन्द्र बिंब जिनालय नमूं तुम्हें।२।। वर पूर्वधातकी अवर१ में भरत क्षेत्र है। योजन ये छह हजार छै सौ चौदा व्यास है।। इक्यासि सहस पाँच सौ सत्तत्तरा कहा। विदेह एक मान इतने योजनों रहा।।३।। जो दु:ख शोक और पश्चात्ताप का करना। रोना व पर को मारना विलाप का करना।। इनसे बंधे असाता जो दु:ख हेतु है। पुनरपि ये दु:ख शोक का कारणस्वरूप है।।४।। सब प्राणियों पे करुणाअनुवंâपा व्रती पे। चउविध को दान देना मुनिव्रत धरें शुभे।। शुभ योग ध्यान उत्तम शत्रू पे क्षमा हो। हो लोभ त्याग शौचभाव देशव्रत भि हों।।५।। परवश से कष्ट सह अकाम निर्जरा करना। मिथ्यात्व सहित बहुत विध के तप तपा करना। इन सबसे बंधे साता बहुत सौख्य प्रदाता। इंद्रिय जनित ये सुख भी भव में हि भ्रमाता।।६।। सम्यक्त्व सहित साता निर्वाण हेतु है। हे नाथ! आप भक्ती भविंसधु सेतु है। भगवन्! सभी असाता दुख दूर कीजिये। साता में संक्रमित कर सुख पूर्ण दीजिये।।७।। सम्यक्त्व लब्धि दीजे सज्ज्ञान दीजिये। चारित्र लब्धि देकर निज पास लीजिये।। हो ‘ज्ञानमती’ ज्योति अज्ञान नाशिये। हे नाथ! दिव्य ज्योति मुझ में प्रकाशिये।।८।। -दोहा- पूर्वधातकी द्वीप में, कर्मभूमि चौंतीस। नमूँ नमूँ नवदेव को, हाथ जोड़ नत शीश।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वधातकीखंडद्वीपसम्बन्धिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हत्सिद्धाचार्यो-पाध्याय-सर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.२३) पश्चिम धातकीखण्ड अचलमेरु पूजा अथ स्थापना-गीता छंद श्री अचलमेरु राजता है, अपर धातकि द्वीप में। सोलह जिनालय तास में, जिनबिंब है उन बीच में।। प्रत्यक्ष दर्शन हो नहीं, अतएव पूजूँ मैं यहाँ। आह्वानन विधि करके प्रभो, थापूँ तुम्हें आवो यहाँ।।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्ब- समूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्ब- समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्ब- समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-गीता छंद गंगानदी का स्वच्छ प्रासुक, नीर झारी में भरूँ। संसार के त्रयताप शांति, हेतु त्रयधारा करूँ।। श्री अचलमेरु के जिनालय, और जिनेश्वर बिंब को। मैं पूजहूूँ नितभक्ति से, नाशूँ सकल जगद्वंद्व को।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। कर्पूर चंदन गंध शीतल, भर कटोरी में लिया। जिनपाद पंकज पूजते भवतप्त मन शीतल किया।।श्री.।।२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। दुग्धाब्धि पेâन समान उज्ज्वल, धौत तंदुल थाल में। जिनचरण वारिज के निकट धर, पुंज नाऊँ भाल मैं।।श्री.।।३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। बेला चमेली मौलसिरि, सुरभित सुमन भर लाइया। वंâदर्प दर्प विनाशने को, नाथ चरण चढ़ाइया।। श्री अचलमेरु के जिनालय, और जिनेश्वर बिंब को। मैं पूजहूूँ नितभक्ति से, नाशूँ सकल जगद्वंद्व को।।४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। पकवान पेâनी मोदकादिक, सरस थाली में भरें। क्षुध रोग हर तुम पद कमल, पूजत क्षुधा डाकिनि हरें।।श्री.।।५।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। कर्पूर ज्योति जगमगे, अंधेर सब जग का हरे। तुम चरण पूजा दीप से, मन ध्वांत को क्षण में हरे।।श्री.।।६।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। दशगंध सुरभित धूप अग्नी पात्र में खेऊँ सदा। अंतर कलुष बाहर भगे नहिं स्वप्न में हो भ्रम कदा।।श्री.।।७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। अंगूर आम अनार फल, अखरोट आदिक लाइया। अक्षय सुखद फल हेतु जिनपद, पद्म निकट चढ़ाइया।।श्री.।।८।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंध अक्षत पुष्प नेवज, दीप धूप रु फल लिया। निज संपदा के हेतु भगवन्! अर्घ तव अर्पण किया।।श्री.।।९।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपस्थ-अचलमेरुसंबंधिषोडशजिनालय-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- परम शांति सुख हेतु, शांतीधारा मैं करूँ। सकल जगत में शांति, सकल संघ में हो सदा।।१०।। शांतये शांतिधारा। चंपक हर सिंगार, पुष्प सुगंधित अर्पिते। होवे सुख अमलान, दु:ख दारिद्र पलायते।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- अचल मेरु के जिनभवन, पूजूँ भक्ति समेत। पुष्पांजलि कर पूजते, जिनमंदिर भवसेतु।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -अडिल्ल छंद- अचलमेरु में भद्रशाल वन जानिये। तामें पूरब दिश जिनमंदिर मानिये।। अघ्र्य चढ़ाकर मैं पूजूँ नित भाव से। जिनगुण संपति हेतु भजूँ अति चाव से।।१।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिभद्रसालवनस्थितपूर्वदिक्चैत्यालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तृतीय मेरु के भद्रशाल में राजता। दक्षिणदिश जिनभवन अनूपम शासता।।अघ्र्य.।।२।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिभद्रसालवनस्थितदक्षिणदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के भद्रशाल में रम्य है। पश्चिमदिश जिनसदन सकलसुखपद्म है।।अघ्र्य.।।३।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिभद्रसालवनस्थितपश्चिमदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के भद्रशाल उत्तर दिशी। जिनमंदिर में जिनप्रतिमा अनुपमकृती।। अघ्र्य चढ़ाकर मैं पूजूँ नित भाव से। जिनगुण संपति हेतु भजूँ अति चाव से।।४।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिभद्रसालवनस्थितउत्तरदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -नरेन्द्र छंद- अचलमेरु के नंदनवन में, पूर्व दिशी जिन गेहा। निजआतम अनुभव रसस्वादी, मुनिगण नमत सनेहा।। नीरादिक वसुद्रव्य मिलाकर, अर्घ चढ़ाऊँ आके। निज आतम समरस जल पीकर, बसूँ मोक्षपुर जाके।।५।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिनंदनवनस्थितपूर्वदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु नंदनवन दक्षिण, सुरवंदित जिनधामा। इंद्रिय सुख त्यागी वैरागी, यति वंदे निष्कामा१।।नीरा.।।६।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिनंदनवनस्थितदक्षिणदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुद्धातम ध्यानी मुनि ज्ञानी, जिन का ध्यान धरे हैं। अचलमेरु नंदन पश्चिम दिश, जिनगृह पाप हरे हैं।।नीरा.।।७।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिनंदनवनस्थितपश्चिमदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के नंदनवन में, उत्तर दिश जिनगृह है। समरस निर्झर जल अवगाही, गणधर गण वंदत हैं।।नीरा.।।८।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिनंदनवनस्थितउत्तरदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-दोहा- अचलमेरु वन सौमनस, पूरब दिश जिनधाम। अघ्र्य चढ़ाकर मैं जजूूँ, सिद्ध करो सब काम।।९।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिसौमनसवनस्थितपूर्वदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु सौमनस के, दक्षिण दिश जिनगेह। अघ्र्य चढ़ाकर पूजहूँ, करो हमें गतदेह१।।१०।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिसौमनसवनस्थितदक्षिणदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु सौमनस के, पश्चिम जिनगृह सिद्ध। अघ्र्य चढ़ाकर मैं जजूूं, करूँ मोह अरि बिद्ध।।११।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिसौमनसवनस्थितपश्चिमदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु सौमनस के, उत्तर जिनगृह सार। अघ्र्य चढ़ाकर पूजहूँ, होऊँ भवदधि पार।।१२।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिसौमनसवनस्थितउत्तरदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -चौपाई-छंद- अचलमेरु पांडुकवन जान, पूरब दिश जिननिलय२ महान। अकृत्रिम जिनबिंब महान, अघ्र्य चढ़ाय करूँ गुणगान।।१३।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिपांडुकवनस्थितपूर्वदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु पांडुकवन नाम, दक्षिण दिशि अनुपम जिनधाम। अकृत्रिम जिनबिंब महान, अघ्र्य चढ़ाय करूँ गुणगान।।१४।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिपांडुकवनस्थितदक्षिणदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु पांडुकवन कहा, पश्चिम दिश जिनमंदिर रहा। अकृत्रिम जिनबिंब महान, अघ्र्य चढ़ाय करूँ गुणगान।।१५।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिपांडुकवनस्थितपश्चिमदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु पांडुकवन सही, उत्तर दिशि जिनगृह सुख मही। अकृत्रिम जिनबिंब महान, अघ्र्य चढ़ाय करूँ गुणगान।।१६।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिपांडुकवनस्थितपूर्वदिाqग्जनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-दोहा अचलमेरु चउवन विषै, चार चार जिनधाम। पूरण अघ्र्य संजोय के, जजूँ नित्य निष्काम।।१।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिषोडशाqजनालयजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सोलह जिनगृह में अतुल, जिनवर बिंब महान। सत्रहसौ अठबीस हैं, झुक झुक करूँ प्रणाम।।२।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिषोडशाqजनालयमध्यविराजमानएकसहस्र-सप्तअष्टा-िंवशतिजिनप्रतिमाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के विदिश में, पांडुकशिलादि वंद्य। पूजूँ अर्घ चढ़ाय के, नमूँ नमूँ सुखवंâद।।३।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिपांडुकवनविदिक्-स्थितपांडुकादिशिलाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- कल्पवृक्ष चिंतामणी, चिच्चेतन भगवान्। चिन्मूरति जिनमूर्ति को, नमूँ नमूँ धर ध्यान।।१।। -रोला छंद- जय जय अचल सुमेरु, शाश्वत सिद्ध महाना। जय जय पुण्य निकेत, अतिशय सौख्य खजाना।। जय जय श्री जिनगेह, सोलह स्वर्णमयी हैं। जय जय श्री जिनबिंब, नाना रत्नमयी है।।२।। मानस्तम्भ ध्वजादि, तोरण मणिमालये।ं तीन कोट सिद्धार्थ, चैत्यतरू बहु गायें।। वैभव अतुल असंख्य, सहजिक रहें वहाँ पर।। सुरपति नरपति नित्य, पूजन करें तहाँ पर।।३।। चारण ऋषिगण आय, आतम ध्यान धरे हैं।। कर्मकलंक नशाय, उत्तम सौख्य भरे हैं।। सम्यग्दर्शन पाय, भविजन तृप्त सु होते। आत्म स्वरूप विचार, भव भव का भय खोते।।४।। मैं नारक तिर्यंच, देव मनुष्य नहीं हूँ। पुरुष नपुंसक रूप, स्त्रीरूप नहीं हूँ।। सब पुद्गल पर्याय, उपज उपज कर विनशें। कर्मउदय से जीव, इनहीं में नित विलसें।।५।। निश्चय नय से नित्य, परमानंद स्वभावी। मैं अनंतगुण पुंज, केवलज्ञान प्रभावी।। मैं मुझमें थिर होय, निज में ही निज पाऊँ। प्रभु वह दिन कब होय, जब मैं ध्यान लगाऊँ।।६।। तुम भक्ती से नाथ, शक्ति प्रगट हो मेरी। करूँ कर्म का नाश, छूटे भव भव पेâरी।। जब तक मुक्ति न होय, तब तक भक्ति हृदय में। रहे आपकी देव! ‘‘ज्ञानमती’’ रुचि मन में।७।। -दोहा- जो पूजें जिनवर भवन, भक्ति भाव से नित्य। सो जिनगुण संपति लहें, अनुक्रम से भवभिद्य।।८।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसम्बन्धिषोडशाqजनालयजिनबिम्बेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.२४) अचलमेरु सम्बंधी षट्कुलाचल जिनालय पूजा —अथ स्थापना—गीताछंद— सुरगिरि अचल के दक्षिणोत्तर, में कुलाचल षट् कहे। हिमवन महाहिमवन निषध, नीलाद्रि रुक्मी शिखरि हैं।। इन भूभृतों के पूर्व दिश में, श्री जिनालय सोहने। थापूँ यहाँ उनके जिनेश्वर, बिंब को मन मोहने।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ— भागीरथी का मिष्ट शीतल, नीर झारी में भरूँ। निज आतमा की शुद्धि हेतू, नाथ पद धारा करूँ।। श्री अचलमेरू के कुलाचल, हिमवदादिक जानिये। षट् जैनमंदिर पूज के, निज आत्म सिद्धी मानिये।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। कर्पूर चंदन घिस सुगंधित, भर कटोरी लाइया। निज आत्म पद की सुरभि हेतू, नाथ पाद चढ़ाइया।।श्री.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। वर देवजीर कमोद शाली, धोय अक्षत ले लिये। निज आत्म गुण के पुंज हेतू, पुंज तुम सन्मुख दिये।। श्री अचलमेरू के कुलाचल, हिमवदादिक जानिये। षट् जैनमंदिर पूज के, निज आत्म सिद्धी मानिये।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। बेला चमेली केवड़ा, कुवलय सुगन्धित पुष्प ले। निज आत्म यश सद्गंध हेतू, नाथ पद अर्पूं भले।।श्री.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। सोहाल पूरण पोलिका, लड्डू अंदरसे लाय के। निज आत्म तुष्टी हेतु, जिनवर पाद पास चढ़ाय के।।श्री.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। कर्पूर बत्ती ज्वलत ज्योती, दीप कर में ले लिया। निज मोह ध्वांत समूह नाशन, हेतु जिनपद पूजिया।।श्री.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अतिश्वेत चन्दन लाल चंदन, सुरभि धूप मिलाय के। निजकर्म जालन हेतु प्रभु ढिग, अग्नि माहिं जलाय के।।श्री.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। श्रीफल सुपारी लौंग पिस्ता, नाशपाती सेब ले। निज आत्मा के मोक्ष हेतू, नाथ पद पूजूँ भले।।श्री.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंध अक्षत आदि लेकर, द्रव्य से थाली भरूँ। त्रैलोक्यपति जिनपाद पूजूँ, अर्घ को अर्पण करूँ।। श्री अचलमेरू के कुलाचल, हिमवदादिक जानिये। षट् जैनमंदिर पूज के, निज आत्म सिद्धी मानिये।।९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— पद्म सरोवर नीर, सुवरण झारी में भरूँ। जिनपद धारा देय, भव वारिधि से उत्तरूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा।। सुवरण पुष्प मंगाय, प्रभु चरणन अर्पण करूँ। वर्ण गंध रस फास, विरहित जिनपद को वरूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:।। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—सोरठा— अपर धातकी द्वीप, दक्षिण उत्तर तास के। षट् कुलपर्वत नित्य, तिन पे जिनगृह पूजहूँ।।१।। इति श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलपर्वतस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —नरेन्द्र छंद— अचलमेरु के दक्षिण दिश में, ‘हिमवन’ रजतमयी है। ग्यारह वूâट सहित पर्वत मधि, पदम सरोवर भी है।। द्रह बिच कमल कमल बिच देवी, ‘श्री’ का भवन बखाना। शाश्वत है इक सिद्धवूâट, जिनगेह जजूँ अघ हाना।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधि-हिमवत्पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। दुतिय ‘महाहिमवन’ कुलनग है, रजतमयी अठवूâटा। महापद्म द्रह के कमलों बिच, ‘ह्री सुरि’१ गेह अनूठा।। शाश्वत अनुपम सिद्धवूâट पर, श्री जिनभवन सुहावे। ऋषिगण नित वंदन करते हैं, हम भी अर्घ चढ़ावें।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिमहाहिमवत्पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘निषधगिरी’ वर तप्त कनक छवि, नव वूâटन सुर सेवी। मध्य तिगिंछ सरोवर के बिच, कमल मध्य ‘धृति’ देवी।। शाश्वत अनुपम सिद्धवूâट पर श्री जिनभवन सुहावे। ऋषिगण नित वंदन करते हैं, हम भी अर्घ चढ़ावें।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधि-निषधपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नीलाचल’१ वैडूर्यमणी द्युति, नव वूâटों से मनहर। केसरि द्रह में कमल बीच, ‘कीर्ती ’ देवी अति सुन्दर।। शाश्वत अनुपम सिद्धवूâट पर श्री जिनभवन सुहावे। ऋषिगण नित वंदन करते हैं, हम भी अर्घ चढ़ावें।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधि-नीलपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रूक्मी’ नग रूपा छवि वूâटों, आठ सहित मन मोहे। पुंडरीक द्रह मध्य कमल में, ‘बुद्धी’ देवी सोहे।। शाश्वत अनुपम सिद्धवूâट पर श्री जिनभवन सुहावे। ऋषिगण नित वंदन करते हैं, हम भी अर्घ चढ़ावें।।५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधि-रुक्मिपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शिखरी’ नग स्वर्णाभ बीच मह-पुंडरीक सरवर है। मध्य कमल बिच ‘लक्ष्मी’ देवी, ग्यारह वूâट उपरि है।। शाश्वत अनुपम सिद्धवूâट पर श्री जिनभवन सुहावे। ऋषिगण नित वंदन करते हैं, हम भी अर्घ चढ़ावें।।६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिशिखरिपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य— अपर धातकी मध्य अचल सुरगिरि के दक्षिण-उत्तर। षट् कुलपर्वत ऊपर जिनगृह, वे अनुपम लोकोत्तर।। मणिमय जिनप्रतिमा को ध्याते, योगीश्वर नित आके। मैं भी अघ्र्यं चढ़ाकर पूजूँ, जिन गुण मंगल गाके।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरो:दक्षिणोत्तरषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शातिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला —सोरठा— अकृत्रिम जिनबिंब, स्वयंसिद्ध उपमारहित। तिनकी यह जयमाल, गाऊँ अति उल्लास से।।१।। —स्रग्विणी छंद— जैन के वैश्म की लोक में श्रेष्ठता। इन्द्र पावे न गाके कभी पूर्णता।। गर्भ आलय महा देवछंदादि हैं। रत्नमय वेदिका तोरणों युक्त हैं।।२।। घंटिका िंककणी मणिमयी बाजती। धूप घट में जले धूम दिश व्यापती।। भृङ्ग दर्पण व्यजन, वुंâभ ध्वज चामरा। छत्र ठोना दरब मंगली अठ वरा।।३।। पूर्ण कलशे रतन भृृत रजत स्वर्ण के। रत्नमाला कुसुम मालिका लंबते।। रत्नदीपक धरें ज्योति से जगमगे। रत्न सिंहासनों से तिमिर सब भगे।।४।। रत्न के स्तूप हैं उच्चता को लिये। ाqसद्धमूर्ती सहित शाश्वता को लिये।। चैत्यद्रुम है अनादी निधन भूमयी। चार जिन चार सिद्धों की मूर्ती वहीं।।५।। वृक्ष सिद्धार्थ ये सिद्धि देवें सदा। जो नमें नित्य वे सिद्धि लेवें स्वता।। वेदियाँ तोरणों गोपुरों युत कहीं। मध्य में पीठ पे स्वर्ण खम्भे सही।।६।। स्वर्णमय खम्भ में शोभती महाध्वजा। रत्नमयि ये अनेकों वरण की ध्वजा।। महाध्वज अग्र में चार वापी भरी। जन्तु से हीन कल्हार कमलों भरी।।७।। ये जिनालय सभी तीन कोटों घिरे। मध्य में पंक्तियाँ ध्वजा की मनहरें।। कोट के मध्य में कल्पतरु शोभते। चार दिशि चार मानस्तम्भ शोभते।।८।। जैन चैत्यालयों की न तुलना कहीं। देव देवी सदा भक्ति करते वहीं।। एक सौ आठ जिनबिंब रत्नोंमयी। सर्व जिनगेह में राजते मणिमयी।।९।। मैं नमूूूं मैं नमूं मैं नमूं नित्य ही। मृत्यु को जीत के पाऊँ शिव की मही।। धन्य मैं धन्य मैं हो गया आज ही। धन्य मेरे नयन धन्य जीवन सही ।।१०।। नाथ! को पाय के तृप्त मैं हो गया। याचना एक भव भव मिले भक्ति या।। अन्य कुछ भी न मुझको रही चाहना। पूरिये नाथ! मेरी मनोकामना।।११।। —घत्ता— जय जय कुलपर्वत, जिनमंदिर युत, तुम जयमाला जो भणहीं। जय ‘ज्ञानमती’ युत, जिनगुणसंपत, सो जन तत्क्षण ही वरहीं।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिन-िंबबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.२५) अचलमेरु संबंधि गजदंत जिनालय पूजा —अथ स्थापना—शम्भु छंद— श्री अचलमेरु की विदिशा में, चारों गजदंत बखाने हैं। उन पर श्रीजिनमंदिर अनुपम, श्री जिनप्रतिमा युत माने हैं।। निज चिच्चैतन्य सुधारस के, आस्वादी उनको वंदे हैं। उन प्रतिमा का आह्वानन कर, हम नित पूजें आनंदे हैं।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ— सुर सरिता का उज्ज्वल जल ले, वंâचन झारी भर लाया हूँ। भव भव की तृषा बुझाने को, त्रय धारा देने आया हूँ।। श्री अचलमेरु गजदंताचल, जिनवर गृह मेें जिनप्रतिमा हैं। जो जन मन से पूजें ध्यावें वे पावें मुक्ति अनुपमा हैं।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। वर अष्टगंध सुरभित लेकर, तुम चरण चढ़ाने आया हूँ। भव भव संताप मिटाने औ, समतारस पीने आया हूँ।।श्री.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। शशि किरणों सम उज्ज्वल तंदुल, धोकर थाली भर लाया हूँ। निज आतम गुण के पुंज हेतु, यहँ पुंज चढ़ाने आया हूँ ।। श्री अचलमेरु गजदंताचल, जिनवर गृह मेें जिनप्रतिमा हैं। जो जन मन से पूजें ध्यावें, वे पावें मुक्ति अनुपमा हैं।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। कुवलय१ बेला वर मौलसिरी, मचवुंâद कमल ले आया हूँ। शृंगारहार कामारिजयी, जिनवरपद यजने आया हूँ।।श्री.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। मोदकपेâनी घेवर ताजे पकवान बनाकर लाया हूँ। निज आतम अनुभव चखने को, नैवेद्य चढ़ाने आया हूँ।।श्री.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपक ज्योती के जलते ही, अज्ञान अंधेरा भगता है। इस हेतू से दीपक पूजा, करते ही ज्ञान चमकता है।।श्री.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूपायन में वर धूप खेय, दशदिश में धूम उठे भारी। बहु जनम जनम के संचित भी, दुखकर सब कर्म जलें भारी।।श्री.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। वर आम्र बिजौरा नींबू औ, गन्ना मीठा ले आया हूं। शिवकांता सत्वर वरने की, बस आशा लेकर आया हूं।।श्री.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल चंदन अक्षत पूâल चरू, वर दीप धूप फल लाया हूँ। तुम चरणन अघ्र्य चढ़ाकर के, भव संकट हरने आया हूँ।। श्री अचलमेरु गजदंताचल, जिनवर गृह मेें जिनप्रतिमा हैं। जो जन मन से पूजें ध्यावें, वे पावें मुक्ति अनुपमा हैं।।९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरâसंबंधिचतुर्गजदंताचलसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— क्षीरोदधि उनहार, उज्ज्वल जल ले भृंग में। श्रीजिनचरण सरोज, धारा देते भव मिटे।।१०।। शांतये शांतिधारा। सुरतरु के सुम लेय, प्रभु पद में अर्पण करूँ। कामदेव मद नाश, पाऊँ आनंद धाम मैं।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:।। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—दोहा— अचलमेरु विदिशा विषे, कहे चार गजदंत। तिनके चारों जिनभवन, पूजन हेतु नमंत।।१।। इति श्रीअचलमेरुसंबंधिगजदंतस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। राग भरतरी (ते गुरु मेरे मन बसो) मैं नित पूजूँ भाव सो, अचलमेरु गजदंत। भव वारिधि नौका कहें, तिनपे श्री भगवंत।।टेक.।। मेरु दिशा आग्नेय में, सौमनस्य शुभ नाम। सात वूâट युत रौप्यमय, इक में श्री जिनधाम।।मैं नित.।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिआग्नेयदिक्सौमनसगजदन्तसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुर गिरि नैऋत्य कोण में, विद्युत्प्रभ शुभजान। इक जिनगृह नव वूâट में, तप्त कनक छवि मान।। मैं नित पूजूँ भाव सो, अचलमेरु गजदंत। भव वारिधि नौका कहें, तिन पे श्री भगवंत।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिनैऋत्यदिग्विद्युत्प्रभगजदन्तसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। गंध मादनाचल कहा, मेरु तने वायव्य। सात वूâटयुत कनकद्युति, जिनगृह पूजें भव्य।।मैं नित.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिवायव्यदिग्गंधमादनगजदन्तसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुर नग कोण ईशान में, माल्यवान नीलाभ। नव वूâटों में एक है, जिनमंदिर रत्नाभ ।।मैं नित.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधि-ईशानदिग्माल्यवंतगजदन्तसिद्धवूâटजिनालयस्थ जिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य— अचलमेरु के चार हैं, नागदंत अभिराम। चारों के जिनगेह को, मैं नित करूँ प्रणाम।।मैं नित.।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्वजिन-बिंबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला जय जय शाश्वत श्री सिद्धवूâट, गजदंताचल पर सुन्दर हैं। जय जय उन सबमें रत्नमयी, जिनप्रतिमा जजत पुरंदर हैं।। जय जय जन जिनका नाम मंत्र, लेकर भव वारिधि तिरते हैं। जय जय उन अकृत्रिम जिन की, अब हम जयमाला करते हैं।।१।। नग सौमनस अरु विद्युत्प्रभ, मेरू निषधाचल छूते हैं। तीजे चौथे गजदंत अचल, मेरू नीलाचल छूते हैं।। नग माल्यवान के बीच गुफा, उससे सीता नदि आती है। विद्युत्प्रभ गिरि की गुफा द्वार से, सीतोदा नदि जाती है।।२।। इन गिरि के तल औ ऊपर में, चउ तरफ कही तट वेदी हैं। प्रत्येक वूâट औ मंदिर के, चारों तरफी तट वेदी हैं।। तट वेदी में सुन्दर उपवन, बहुविध फल पूâल खिले उनमेें। पक्षीगण कल कलरव करते, बहु सुरभित पवन चले उनमें।।३।। बावड़ियां कमल सहित शोभें, बहु रत्नों के सुरभवन बने। सुर अप्सरियां खग खेचरनी, क्रीड़ा करतीं मन मुदित घने।। पर्वत पर चारण ऋषिगण भी, नित विहरण करते दीखे हैं। शुद्धातम ध्यानारूढ़ कहीं, समरसमय अमृत पीते हैं।।४।। वर्णादि सहित यह पुद्गल है, इससे सम्बन्ध नहीं मेरा। यह तन भी मुझसे पृथक् कहा, इससे संश्लेष नहीं मेरा।। इक मोहराज ही इस जग में, बहुविध के नाच नचाता है। जो पर से निज को पृथक् किये, उसका जग में क्या नाता है।।५।। इन मिथ्या भ्रांति अविद्या ने, मुझको इस तन में घेरा है। सम्यक् विद्या के होते ही, मिटता भव भव का पेâरा है।। रागादि भाव भी औपाधिक, वे भी जब मुझसे भिन्न कहे। फिर धन गृह सुत मित्रादिकजन, वे तो बिल्कुल ही पृथक् रहें।।६।। हे नाथ! आपकी भक्ती से, मुझमें वह शक्ती आ जावे। मैं पर से निज को भिन्न करूँ, यह सम्यक् युक्ती आ जावे।। चैतन्य चमत्कारी आत्मा िंचतामणि कल्पतरू निधि ही। मैं उसमें ही बस रम जाऊँ, समरस पीयूष पिऊँ नित ही।।७।। दुख इष्ट वियोग अनिष्ट योग, भय शोकादिक का भान न हो। केवल सुख दर्शन ज्ञानवीर्य धारी आत्मा का ध्यान रहो।। परमानंदामृत निर्झर में, स्नान करूँ मल धो डालूँ। अपने अनन्तगुण पुंजरूप, शिवपद साम्राज्य तुरत पालूँ।।८।। इतनी ही आशा लेकर मैं, हे नाथ! शरण में आया हूँ। अब विंâचित् भी ना देर करो, भव भव दुख से अकुलाया हूँ।। बहु जन्म अनंतों में संचित, अब संचय शीघ्र समाप्त करो। भगवन् ! ‘सुज्ञानमती’ लक्ष्मी, देकर अब मुझे कृतार्थ करो।।९।। —दोहा— सिद्ध सदृश निज को समझ, जो मन करे विशुद्ध। निश्चय को व्यवहार से, साध्य करें पुन शुद्ध।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थसर्वजिनबिबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. २६)

अचलमेरु सम्बंधि धातकी वृक्ष शाल्मली वृक्ष जिनालय पूजा

—अथ स्थापना—हरिगीतिका छंद— (चाल—सम्मेदगढ़ गिरनार....) वरद्वीप धातकि में अपरदिश, बीच सुरगिरि अचल है। ताके विदिश ईशान में, शुभ धातकी द्रुम अतुल है।। सुरगिरी के नैऋत्य शाश्वत, शाल्मली द्रुम सोहना। द्वय वृक्ष शाखा पर जिनालय, पूजहूँ मन मोहना ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीद्वयवृक्षस्थितजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीद्वयवृक्षस्थितजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीद्वयवृक्षस्थितजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ— जय अमल ले जिनपाद पूजूूूँ, कर्म मल धुल जायेगा। आत्मीक समता रस विमल, आनंद अनुभव आयेगा।। पृथ्वीमयी दो वृक्ष के, जिनगेह मणिमय मूर्तियाँ। जयवंत होवें नित्य ही, चिन्तामणी जिनमूर्तियाँ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। चंदन सुगंधित ले जिनेश्वर, पद जजूँ आनन्द से। स्वात्मानुभव आल्हाद पाकर, छूटहूँ जग द्वन्द से।। पृथ्वीमयी दो वृक्ष के, जिनगेह मणिमय मूर्तियां। जयवंत होवें नित्य ही, चिंतामणी जिनमूर्तियां।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। चंदाकिरण सम धवल तंदुल, पुंज जिन आगे धरूँ। वर धर्म शुक्ल सुध्यान निर्मल, पाय आतम निधि वरूँ।।पृथ्वी.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। मंदार चंपक पुष्प सुरभित, लाय जिनपद पूजते। निज आत्मगुण कलिका खिले, जन भ्रमर तापे गूंजते।।पृथ्वी.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। मोदक पुआ बरफी इमरती, लाय जिन सन्मुख धरें। आत्मैकरस पीयूष मिश्रित, अतुल आनंद भव हरे।।पृथ्वी.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपक शिखा उद्योतकारी, जिन चरण में वारना। अज्ञान तिमिर हटाय अंतर, ज्ञानज्योती धारना।।पृथ्वी.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। दशगंध धूप मंगाय स्वाहा१ नाथ को अर्पण किया। वसु कर्म स्वाहा हेतु ही, निज आत्म को तर्पण किया।।पृथ्वी.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। अंगूर आम अनार गन्ना, लाय जिन पूजा करूँ। वर मोक्ष फल की आश लेकर, कर्म वंâटक परिहरूं।। पृथ्वीमयी दो वृक्ष के, जिनगेह मणिमय मूर्तियां। जयवंत होवें नित्य ही, चिंतामणी जिनमूर्तियां।।८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंध अक्षत पुष्प नेवज, दीप धूप फलादि ले। जिन कल्पतरु पूजत मनोवांछित सकल फल झट मिलें।।पृथ्वी.।।९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— यमुना सरिता नीर, वंâचन झारी में भरा। जिनपद धारा देत, शांति करो सब लोक में।।१०।। शांतये शांतिधारा। कमल वकुल अरविंद, सुरभित पूâलों को चुने। जिनपद पंकज अप्र्य, यश सौरभ चहुंदिश भ्रमे।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:।। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—सोरठा— अचलमेरु ईशान, वृक्ष आंवले सम कहा। नैऋत शाल्मलि जान, जिनगृह पूजूँ पुष्प ले।।१।। इति श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —हरिगीतिका— इस धातकी तरु उत्तरी, शाखा विषे जिनगृह महा। देवाधिदेव जिनेन्द्र की, प्रतिमा रतनमयि है वहां।। सुरभित पवन प्रेरित जिनालय, मणि ध्वजा नित फरहरें। वर अघ्र्य लेकर पूजते ही, कर्म शत्रू थर हरें।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरोरीशानकोणे धातकीवृक्षजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तरु शाल्मली की दक्षिणी, शाखा उपरि जिन धाम है। मृत्युंजयी जिनदेव की, प्रतिमा वहां अभिराम है।। सुरभित पवन प्रेरित करें, जिनगृह ध्वजा नित फरहरें। वर अघ्र्य लेकर पूजते ही, कर्म शत्रू थर हरें।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरोर्नैऋत्यकोणे शाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य दोहा— अचलमेरु के द्वय तरू, धातकि शाल्मलि जान। दोनों के जिनगेह को, अघ्र्य चढ़ाऊँ आन।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थसर्व-जिनबिंबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला जय जय अकृत्रिम जिनभवन, अघहरण जग चूड़ामणी। जय जय अकृत्रिम जिनप्रतिम, सब मूर्तियां चिन्तामणी।। जय जय अनादि अनन्त अनुपम, त्रिभुवनैक शिखामणी। जय मोह अहि के विष प्रहारण, नाथ! तुम गारुत्मणी१।।१।। सुरगिरि अचल उत्तर दिशी, उत्तर कुरू है भोगभू। तहँ धातकी तरु थल वृहत् , पे वेदिका अरु पीठ जू।। राजत उतुङ्ग महा मनोहर, मणिमयी ये तरु हरे। उन पे अकृत्रिम जिनसदन, मेरे सकल कलिमल हरें।।२।। तरु चार दिश की चार शाखा, मुख्य हैं उन एक में। जिनगृह अकृत्रिम शोभता, सुरगृह बने हैं तीन में।। इनमें सदा व्यंतर रहें, सम्यक्त्व रत्नों युत भने। परिवार तरु अगणित कहे परिवार सुर उन पे घने।।३।। फल मणिमयी है आंवले सम पत्तियाँ मरकतमणी। कोंपल पदममणि के बने, बहु पूâल नाना वर्णनी।। सब देवगृह में भी सदा, जिनधाम अनुपम राजते। उनकी करें जो वन्दना, सब पाप क्षण में नाशते।।४।। जिनराज सिंहासन रतन मणियों जड़ित अति सोहना। त्रय छत्र में मोती लटकते, शशिकिरण सम मोहना।। चौंसठ युगल सुर हाथ में, चामर लिये हैं भाव से। वर आठ मंगल द्रव्य सब, जिनराज सन्निध भासते।।५।। बहु देव देवी अप्सरायें, इन्द्रगण भी आवते। जिनवन्दना गुणगान पूजत, करत शीश नवावते।। संगीत बाजें विविध बजते, िंककणी घंटा घने। वीणा बजाते नृत्य करते, ताल दे देकर घने।।६।। खेचर युगलिया भक्ति से, जिनवंदना करते वहां। नर नारियां भूचर सदा, विद्या के बल फिरते वहां।। आकाशगामी ऋद्धि से, ऋषिगण वहां विचरण करें। जिनवंदना से बहु जनम के, पाप तत्क्षण परिहरेंं।७।। गणधर सुव्रतधर चक्रधर, हलधर गदाधर सर्वदा। श्रुतधर अशनिधर कुलधरा, जिनभक्ति करते शर्मदा।। अध्यात्म योगी वीतरागी, शुद्ध आतम ध्यावते। वर निर्विकल्प समाधिरत, हो परम आनन्द पावते।।८।। मैं भक्ति श्रद्धा भाव से, हे नाथ! तुम शरणा लिया। बस मृत्यु मल्ल पछाड़ने को, तुम निकट धरना दिया।। हे भक्त वत्सल ! दीनबन्धू! कृपा मुझ पर कीजिये। हे नाथ! अब तो मुझे, केवल ‘ज्ञानमति’ श्री दीजिये।।९।। —दोहा— शाश्वत श्री जिनगेह के, स्वयं सिद्ध जिनबिंब। मन वच तन से पूजहूँ, झड़े कर्म कटु निंब।।१०।। ॐ ह्रीं अचलमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलीवृक्षस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ- जिनबिंबेभ्यो जलमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. २७) अचलमेरु सम्बंधि षोडश वक्षारगिरि जिनालय पूजा —अथ स्थापना—अडिल्ल छंद— अचलमेरु के पूर्व, अपर दिश जानिये। सोलह गिरि वक्षार, कनकमयि मानिये।। इनके सोलह जिनगृह, शाश्वत सोहने। जिनप्रतिमा को यहां, जजूँ अघ को हने।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिपूर्वापरविदेहस्थषोडशवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। अथाष्टवंâ—(चाल-नंदीश्वर पूजा) गंगादिक निर्मल नीर, बाहर मल धोवे। जिन चरणों धारा देत, अंतर मल धोवे।। सोलह वक्षार गिरीन्द्र, तिन पर जिनधामा। उनमें श्री जिनबर बिंब, पूजूँ तज कामा।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। केशर कर्पूर घिसाय तन की ताप हरे। जिनपद में गंध चढ़ाय, भव आताप हरे ।। सोलह वक्षार गिरीन्द्र, तिन पर जिनधामा। उनमें श्री जिनबर बिंब, पूजूँ तज कामा।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। मोती सम अक्षत श्वेत, बहु मंगलकारी। जिन सन्मुख पुंज चढ़ाय, अक्षय सुखकारी।।सोलह.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। बेला मचवुंâद गुलाब, दशदिश गंध भरे। जिनचरणन पुष्प चढ़ाय, भव शर नष्ट करें।।सोलह.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। पायस ओदन वटकादि, कुछ क्षण भूख हरे। चरु से जिनवर पद पूज, भूख समूल हरे।।सोलह.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। रत्नन के दीप प्रकाश, बाहर तम नाशें। दीपक से जिनपद पूज, निज अंतर भासे।।सोलह.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। दशगंध विमिश्रित धूप, अग्नी संग जले। जिन सन्मुख खेवत आय, बहुविध कर्म जले।।सोलह.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। केला दाडिम खर्बूज, मन की तुष्टि करें। जिन सन्मुख पूज रचाय, आतम पुष्टि करें।। सोलह वक्षार गिरीन्द्र, तिन पर जिनधामा उनमें श्री जिनबर बिंब, पूजूँ तज कामा।।८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल चंदन आदिक लाय, अघ्र्य चढ़ावत हैं। ाqजन पद में अघ्र्य चढ़ाय, निजपद पावत हैं।। सोलह.।।९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— सीता नदी सुनीर, जिनपद पंकजधार दे। वेग हरुं भवपीर, शांतीधारा शांतिकर।।१०।। शांतये शांतिधारा। बेला कमल गुलाब, चंप चमेली ले घने। जिनवर पर अरविंद, पूजत ही सुख संपदा।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—सोरठा— अचलमेरु के पूर्व, पश्चिम दोनों तट विषें। सोलह गिरि वक्षार, पुष्पांजलि कर पूजहूँ।।१।। इति श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। राग भरतरी (ते गुरु मेरे उर बसो.....) मैं जिनपद पूजूँ सदा, मन वच काय लगाय। वंदत नव निधि संपदा, अतिशय मंगल थाय।।टेक।। सीतानदि उत्तर तटे, ‘चित्रवूâट’ वक्षार। ता गिरि पे इक जिनभवन, अविनाशी अविकार।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे चित्रवूâटवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पद्मवूâट’ वक्षार है, कांचन की द्युति जान। ताके जिनमंदिर विषे, जिनवर बिंब महान।।मैं जिनपद.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे पद्मवूâटवक्षारपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिनवूâट’ वक्षार है, ता गिरि पे चउ वूâट। सिद्धवूâट में जिनसदन, पूजत पुण्य अटूट।।मै जिनपद.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे नलिनवूâटवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘एकशैल’ वक्षार है, भूभृत अविचल मान। ताके जिनमंदिर विषें, अकृत्रिम भगवान।। मैं जिनपद.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे एकशैलवूâटवक्षारपर्वतस्थित-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। (राग भरतरी) मैं पूजूूँ जिनबिंब को, भक्ति भाव उर धार। जे नर वंदें भाव से, ते उतरें भव पार।। देवारण्य समीप से, है ‘त्रिवूâट’ वक्षार। ताके श्री जिनवेश्म को, पूजें इन्द्र अपार।।५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे त्रिवूâटवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वक्षाराचल ‘‘वैश्रवण’, अनुपम रत्न भंडार। ताका जिनमंदिर कहा, मोक्षमहल का द्वार।।मैं पूजूँ.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे वैश्रवणवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आत्मांजन’ वक्षार पे, खेचरगण आवन्त। ताके श्री जिनगेह को, मुनिगण नित्य नमंत।मैं पूजूँ.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे आत्मांजनवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अंजन नग वक्षार है, पूरे सुरगण आश। ताके जिनगृह पूजते, होते कर्म विनाश।। मैं पूजूूँ जिनबिंब को, भक्ति भाव उर धार। जे नर वंदें भाव से, ते उतरें भव पार।।८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे अंजनवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —अडिल्ल छंद— ‘श्रद्धावान’ वक्षार, कनकमय मानिये। भद्रसाल वन वेदी, निकट बखानिये।। तापे श्री जिनभवन विषें, जिनबिंब को। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, हरूँ जग द्वंद को।।९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे श्रद्धावान्वक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘विजटावान्’ कहा, वक्षार गिरीश पे। वूâट कहे हैं चार, रहे सुर तीन पे।। इक में श्री जिनभवन, विषें जिनबिंब को। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय,हरूं जग द्वन्द को।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे विजटावान्वक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आशीविष’ वक्षार, गिरी अनुपम जहाँ। सुर किन्नरगण, जिनवर यश गाते वहाँ।। तापे श्री जिनभवन, विषें जिनबिंब को। पूजूं अघ्र्य चढ़ाय, हरूं जग द्वन्द को।।११।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे आशीविषवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नग वक्षार ‘सुखावह’, सुखदातार है। ताके जिनगृह जजत, भविक भव पार है।। तापे श्री जिनभवन विषें जिनबिंब को। पूजूं अघ्र्य चढ़ाय, हरूं जग द्वन्द को।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे सुखावहवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘चंद्रमाल’ वक्षार, गिरी सुखकार है। भूतारण्य समीप, कनकमयि सार है।। तापे श्री जिनभवन विषें जिनबिंब को। पूजूं अघ्र्य चढ़ाय, हरूं जग द्वन्द को।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे चंद्रमालवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘सूर्यमाल’ वक्षार, जिनेश्वर गेह से। भविजन मन तम हरें, छुड़ा तन नेह से।। जिनवर गृह के सभी, जिनेश्वर बिंब को। पूजूं अघ्र्य चढ़ाय, हरूं जग द्वन्द को।।१४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानद्युत्तरतटे सूर्यमालवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नागमाल’ वक्षार, अतुल जिनगृह तहांं। नागेन्द्रादिक देव, करें पूजन वहां।। जिनवरगृह के सभी, जिनेश्वर बिंब को। पूजूं अघ्र्य चढ़ाय, हरूं जग द्वन्द को।।१५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानद्युत्तरतटे नागमालवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘देवमाल’ वक्षार मनोहर जानिये। देव पूज्य जिनगेह, वहां पर मानिये।। सुर नर पूजित, सर्वजिनेश्वर बिंब को। पूजूं अघ्र्य चढ़ाय, हरूं जग द्वन्द को।।१६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानद्युत्तरतटे देवमालवक्षारपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —दोहा— अचलमेरु के पूर्व अरु, पश्चिम के वक्षार। तिनके सोलह जिनभवन, अर्चूं बारंबार।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला चौपाई (चाल-रची नगरी छहमास) जयो वक्षार अचल अभिराम, जयो तिन पे जिनधाम ललाम। जयो जिनबिंब अकृत्रिम सार, जयो जिन पुंगव बारंबार।।१।। सभी वक्षार गिरी कनकाभ, सभी पे चार वूâट रत्नाभ। सभी पे नदि के तरफ महान, सुशोभित सिद्धवूâट परधान।।२।। गणीश्वर ध्यान धरें तुम नाथ, मुनीश्वर गण वंदें नत माथ। सुरेश्वर मिल पूजें जिनदेव, खगेश्वर आ नमते स्वयमेव।।३।। नरेश्वर स्तुति करें उदार, नचें सुर अपसरियां रुचि धार। सुरासुर किन्नरगण बहु आय, बजाते वीणा जिनगुण गाय।।४।। प्रभो तुम शिवतिय कांत महान, प्रभो तुम अनुपम शांत प्रधान। प्रभो तुम त्रिभुवन ईश जिनेश, प्रभो तुम तारन तरन महेश।।५।। हरो मेरे भव क्लेश अबार, करो मुझको भवदधि से पार। नहीं हो भव में आना पेâर, करो ऐसी मति नाथ अबेर।।६।। तुम्हीं मोहारिजयी जिननाथ! तुम्हीं मृत्युंजयि मुक्ति सनाथ। तुम्हीं मणि औषधि मंत्र अभेद्य, तुम्हीं भवरोग हरन को वैद्य।।७।। तुम्हीं मुनि जन मन कमल दिनेश, तुम्हीं भवि कुमुदाकर तारेश। तुम्हीं हो अघतम हर भास्वान, तुम्हीं पुण्यांकुर हित घन जान।।८।। प्रभो तुम दर्शन ज्ञान प्रपूर्ण, तुम्हीं अनवधि सुख वीरज पूर्ण। तुम्हीं हो शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध, तुम्हीं हो चिच्चैतन्य समृद्ध।।९।। तुम्हीं चिन्तामणि चिन्तित देत, तुम्हीं हो कल्पतरू अभिप्रेत। तुम्हीं तो कामधेनु महिमान, तुम्हीं पारसमणि में परधान।।१०।। प्रभो तुम नाम सकल सुख देत, वही इक भवदधि शोषण हेत। हृदय में मेरे बसो हमेश,यही है चाह मुझे परमेश।।११।। प्रभो जिनगुणसंपति का दान, करो मुझको निज भाक्तिक जान। नमूँ तुम पद को बारम्बार, करो सुख ‘ज्ञानमती’ सुखकार।।१२। —घत्ता— जय जय शिवभर्ता, भव दुखहर्ता, तुम जयमाला जो गावे। सो मंगल सुखकर, शिवसुंदरि वर, ‘ज्ञानमती’ लक्ष्मी पावे।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिंबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. २८) अचलमेरु सम्बंधि चौंतिस विजयार्ध जिनालय पूजा —अथ स्थापना—नरेन्द्र छंद— अचलमेरु के पूरब पश्चिम, क्षेत्र विदेह बखाने। तिनके बीचन बीच रजतगिरि है बत्तीस प्रमाने।। इसी मेरु के दक्षिण-उत्तर, भरतैरावत जानो। इन दोनोें के बीच रजतगिरि, शोभत हैं दो मानो।।१।। —दोहा— इन चौंतिस विजयार्ध के, चौंतिस श्री जिनधाम। आह्वानन विधि से यहाँ, पूजूँ करूँ प्रणाम।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिन-लयस्थसर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। व्योम१ गंग सम उज्ज्वल पानी, मणिमय झारी भरिये। श्रीजिनचरण सरोरुह पूजत, भव भव तृष्णा हरिये।। अचलमेरु के चौंतिस सुन्दर, रजताचल सरधानो। तिनके चौंतिस जिनगृह के, जिनबिंब जजत अघ हानो।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिन-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयज चंदन केशर वुंâकुम, घिस कर्पूर मिलावो। श्री जिनचरण सरोरुह चर्चत, भव भव ताप नशावो।। अचलमेरु के चौंतिस सुन्दर, रजताचल सरधानो। तिनके चौंतिस जिनगृह के, जिनबिंब जजत अघ हानो।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिन-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। चन्द्रकिरण सम धवल अखंडित, शाली धोकर लीजे। जिनवर चरण सरोरुह सन्मुख, सुंदर पुञ्ज धरीजे।।अचल.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिन-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। श्वेत कमल कल्हार मनोहर, खूब सुगंधित लाये। जिनवरचरण सरोरुह पूजत, कामबाण नश जाये।।अचल.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिन-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। पुआ अन्दरसा सेमई पायस, पेâनी लाडू लाये। श्रीजिनचरण सरोरुह पूजत, क्षुधा रोग नश जाये।।अचल.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिन-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। कनक दीप कर्पूर जलाकर, झिलमिल ज्योति करंता। श्री जिनवर की करूँ आरती, मोेह अन्धेर हरंता।।अचल.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिन-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगर तगर कृष्णागरु मिश्रित, धूप सुगंधित लेऊँ। दुष्ट कर्म को भस्म करो प्रभु, तुम सन्मुख मैं खेऊँ।।अचल.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिन-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। दाडिम केला पनस बिजौरा,नींबू थाल भरा के। श्री जिनचरण सरोरुह पूजूँ, शिवफल आश धरा के।। अचलमेरु के चौंतिस सुन्दर, रजताचल सरधानो। तिनके चौंतिस जिनगृह के, जिनबिंब जजत अघ हानो।।८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल चंदन आदिक सब लेकर, उसमें रत्न मिलाया। श्री जिनचरण सरोरुह सन्निध, उत्तम अघ्र्य चढ़ाया।। अचलमेरु के चौंतिस सुन्दर, रजताचल सरधानो। तिनके चौंतिस जिनगृह के, जिनबिंब जजत अघ हानो।।९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— गंगनदी की नीर, तुम पद धारा मैं करूॅँ। शांति करो जिनराज, चउसंघ को सबको सदा।।१०।। शांतये शांतिधारा। कमल केतकी पूâल, हर्षित मन से लायके। जिनवर चरण चढ़ाय, सर्वसौख्य संपति बढ़े।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—दोहा— अचलमेरु पूरब अपर, दक्षिण उत्तर जान। चौंतिस रूपाचल उपरि, जिनगृह जजूँ महान।।१।। इति श्रीअचलमेरुसम्बंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजिंल क्षिपेत्। —अडिल्ल छन्द— अचलमेरु के पूर्व, विदेह बखानिये। सीता उत्तर ‘कच्छा’, देश सुमानिये।। ताके मधि रूपाचल पे, जिनधाम को। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, तजूँ दु:ख थान को।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थसीतानदीउत्तरतटे कच्छादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुकच्छा’ अपर धातकी माहिं है। अचलमेरु के पूर्व, विदेहन माहिं है।। मध्य रजतगिरि के, श्री जिनगृह को जजूँ। अघ्र्य चढ़ाकर जिनप्रतिमा को नित भजूँ।।२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीउत्तरतटे सुकच्छादेशस्थितविजया-र्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अपर धातकी मध्य, अचल सुरगिरि कहा। ताके पूरब देश, ‘महाकच्छा’ लहा।। ताके मधि रजताचल, पर जिनगृह सदा। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, भजूँ सुख संपदा ।।३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे महाकच्छादेशस्थितविजया-र्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘कच्छकावती’ मध्य विजयार्ध है। ताके जिनगृह को, नित पूजें भव्य हैं।। तिनके श्री जिनबिंब, अकृत्रिम सोहते। अघ्र्य चढ़ाय जजूँ, सुर नर मन मोहते।।४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे कच्छकावतीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आवर्ता’ है देश, मध्य विजयार्ध है। तापे नव वूâटों में, इक विख्यात है।। सिद्धवूâट में जिनप्रतिमा को पूजते। अघ्र्य चढ़ाय जजें, नर दु:ख से छूटते।।५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे आवर्तादेशस्थितविजया-र्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘लांगलावर्ता’, मधि रूपाद्रि है। तापे सिद्धायतन, माहिं जिननाथ हैं।। मुनिपति से नित पूज्य, अकृत्रिम चैत्य हैं। अघ्र्य चढ़ाय जजूँ मैं, भवरुज१ वैद्य हैं।।६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे लांगलावर्तादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कला’ मध्य, रजतगिरि सोहना। सिद्धवूâट जिनगृह से, जन मन मोहना।। तिनकी जिनप्रतिमा को, पूजूँ भाव से। अघ्र्य चढ़ाय जजूँ मैं अतिशय भाव से।।७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे पुष्कलादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कलावती’ मध्य विजयार्ध है। तापे जिनगृह पूजत, भव्य कृतार्थ हैं।। तिनकी मणिमय जिनप्रतिमा को मैं जजूँ। अघ्र्य चढ़ाय सदा मनवच तन से भजूूँ।।८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानद्युत्तरतटे पुष्कलावतीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —रोला छंद— अपरधातकी द्वीप अचल सुरगिरि पूरब में। देवारण्य समीप देश ‘वत्सा’ के मधि में।। रजतगिरी पर सिद्धवूâट में मणिमय प्रतिमा। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, उन्हीं की अतिशय महिमा।।९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे वत्सादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के पूर्व, ‘सुवत्सा’ देश विदेहा। तिस के बीचोंबीच, रजतगिरि रमत सदेहा।। नववूâटों में सिद्धवूâट पर, मणिमय प्रतिमा। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, उन्हीं की अतिशय महिमा।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे सुवत्सादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के पूर्व ‘महावत्सा’ वर देशा। तिसके मधि विजयार्ध बसे नित तास खगेशा।।नववूâटों.।।११।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे महावत्सादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘वत्सकावती’ अचल सुरगिरि के पूर्वा। रूपाचल ता मध्य, रमें तापे गंधर्वा।।नववूâटों.।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे वत्सकावतीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के पूरब ‘रम्या’ देश कहाता। ताके बीचोंबीच रजतगिरि शोभा पाता।।नववूâटों.।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे रम्यादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुरम्या’ कहा, सुपूर्व अचलमेरु के। ताके मध्य रजतगिरि, पे नव वूâट सुनीके।।नववूâटों.।।१४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे सुरम्यादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश कहा ‘रमणीया’ अपर धातकी खंड में। तिनके बीच रजतनग, त्रय कटनी हैं उसमें।।नववूâटों.।।१५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे रमणीयादेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुमंगलावती’ अचलमेरू पूरब में। तिसके मधि रूप्यादि तथा छहखंड उसी में।। नव वूâटों में सिद्धवूâट पर मणिमय प्रतिमा। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, उन्हीं की अतिशय महिमा।।१६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतानदीदक्षिणतटे मंगलावतीदेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —नरेन्द्र छंद— अपरधातकी मेरु अचल के पश्चिम सीतोदा दायें। भद्रसाल वन वेदी सन्निध, ‘पद्मा’ देश कहा जाये।। तामध रूपाचल मनहारी, सिद्धवूâट में जिनगेहा। रोग शोक दुख दारिद नाशे, जो जन पूजें धर नेहा।।१७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे पद्मादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु की अपर दिशा में, सीतोदा नदि के दायेंं। देश ‘सुपद्मा’ शोभा पाता, उसमें छहों खंड गायें।।तामध.।।१८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे सुपद्मादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अपर धातकी खंड द्वीप में, सीतोदा के दक्षिण में। देश ‘महापद्मा’ आरज खंड, कर्मभूमि शाश्वत उसमें।।तामध.।।१९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे महापद्मादेशस्थित्विज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के पश्चिम दिश में, देश ‘पद्मकावती’ कहा। तीर्थंकर श्रुतकेवलि गणपति, मुनिगण से नित पूर्ण रहा।।तामध.।।२०।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे पद्मकावतीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु के पश्चिम दिश में, ‘शंखा’ देश विदेह कहा। रूपाचल है मध्य उसी के, तीन कटनियों सहित रहा।। नव वूâटों में नदि के सन्निध, सिद्धवूâट पर जिनगेहा। रोग शोक दुख दारिद नाशे, जो जन पूजें धर नेहा।।२१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे शंखादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु की पश्चिम दिश में, ‘नलिना’ देश कहा जाता। ताके बीच रूप्यगिरि सुन्दर, विद्याधर के मन भाता।।नव.।।२२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे नलिनीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचलमेरु की पश्चिम दिश में, ‘कुमुद’ देश अतिरम्य कहा। ताके मध्य रजतगिरि सुन्दर, ऋषिगण विचरें नित्य वहां।।नव.।।२३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे कुमुददेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अपर धातकी सीतोदा के, दायें ‘सरिता’ देश कहा। ताके मध्य रूप्यगिरि है नित, इंद्रादिकगण रमें वहाँ।।नव.।।२४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीदक्षिणतटे सरितादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —रोला छंद—

‘वप्रा’ देश विदेह, अपर धातकी माहीं।

तामधि रजत गिरीन्द्र, सीतोदा तट ताहीं।। सिद्धवूâट जिनवेश्म, पूजूँ अघ्र्य चढ़ाई। इक सौ अठ जिनबिंब, सब विध मंगल दाई।।२५।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे वप्रादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुवप्रा’ रम्य, अचलमेरु पर आगे। रूप्याचल ता मध्य, नदि के निकट सुतापे।। सिद्धवूâट.।।२६।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे सुवप्रादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘महावप्रा’ सुविदेह, अपर धातकी तामें। रजताचल ता मध्य, तीन कटनियां तामें।।सिद्धवूâट.।।२७।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे महावप्रादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘वप्रकावती’ विदेह, ता मधि रजतगिरि है। नववूâटोें में एक, वूâट सुसौख्य भरी है।।सिद्धवूâट.।।२८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे वप्रकावतीदेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधा’ देश विदेह, अपर धातकी द्वीपे। विजयारध ता मध्य, नव वूâटों से दीपे।।सिद्धवूâट.।।२९।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे गंधादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुगंधा’ मािंह, रजतगिरी अमलाना। मुकुट सदृश नववूâट, सुर नर रमत सुथाना।।सिद्धवूâट.।।३०।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे सुगंधादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘गंधिला’ मध्य, रूपाचल अति सोहे। तापे यतिगण नित्य, आतम समरस जोहे।।सिद्धवूâट.।।३१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे गंधिलादेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधमालिनी’ देश, विजयारध ता बीचे। तापे सुरगण आय, क्रीड़ा करत सुनीके।।सिद्धवूâट.।।३२।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिसीतोदानदीउत्तरतटे गंधमालिनीदेशस्थित-विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —शंभुछंद— शुभ अपर धातकी दक्षिण में इक ‘भरत’ सुक्षेत्र कहाता है। गंगा सिन्धू नदि विजयारध इनसे छह खंड धराता है।। रूपाचल के नववूâटों में श्री सिद्धवूâट मन भाता है। मैं पूजूं अघ्र्य चढ़ाकर के, वह आतम सिद्धि कराता है।।३३।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिदक्षिणदिशि भरतक्षेत्रस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभ अपर धातकी उत्तर में, ‘ऐरावत’ क्षेत्र सुहाना है। रक्ता रक्तोदा रजतगिरी, इनमें छह खंड युत माना है।। रजताचल के नव वूâटों में, श्री सिद्धवूâट मन भाता है। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ा करके, वह आतम सिद्धि कराता है।।३४।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिउत्तरदिशि ऐरावतक्षेत्रस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य-हरिगीतिका छंद— वर धातकी के मध्य सुरगिरि, अचलमेरू नाम है। ताके सुपूरब अपर दिग्, सुविदेह बत्तिस मान हैं।। इस मेरु के दक्षिण भरत, ऐरावता उत्तर दिशी। इन सर्व के मधि रूप्यगिरि, पे जिनभवन हैं चौंतिसी।। —दोहा— ये चौंतिस जिनवेश्म१ हैं, अकृत्रिम सुखधाम। तिनके सब जिनबिंब को, नित प्रति करूँ प्रणाम।।१।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालय-स्थसर्वजिनबिंबेभ्यो पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनिंबबेभ्य: नम:। जयमाला —सोरठा— चौंतिस गिरि विजयार्ध, तिनके जिनमंदिर कहे। गाऊँ अब जयमाल, श्रद्धा से जिननाथ की।।१।। —त्रिभंगी छंद— जय अचलमेरु पूरब विदेह, सूरि प्रभ जिन नदि उत्तर में। सीता के दक्षिण जो विदेह, तीर्थेश विशालकीर्ति उसमें।। जय मेरु अपर में नदि के दक्षिण, जिन तीर्थंकर वङ्काधरा। जय सीतोदा के उत्तर में हैं, चन्द्रानन जिनराज वरा।।२।। राग—(हे दीनबन्धु श्रीपति...) हे देव! तुम्हें होत कभी जन्म रोग ना। स्व इष्ट का वियोग औ अनिष्ट योग ना।। हे नाथ! मेरी पूरिये बस एक कामना। ना होवे पेâर पेâर यहाँ भव में आवना।।३।। आनंत्य काल नाथ! मैं निगोद में रहा। फिर पंचपरावर्त में ही घूमता रहा।।हे नाथ.।।४।। त्रैलोक्य में जो कर्म योग्य वर्गणा कही। उन सबको ग्रहण कर चुका उच्छिष्ट सम रहीं।।हे नाथ.।।५।। इस तीन लोक क्षेत्र में सर्वत्र ही भ्रमा। ना एक भी प्रदेश बचा ना जहाँ जनमा।। हे नाथ.।।६।। अवसर्पिणी उत्सर्पिणी के चक्र अनन्ते। प्रत्येक को पूरा किया मैं जन्म मरण से।।हे नाथ.।।७।। तिर्यंच की जघन्य आयु पाय मैं मरा। जितने समय उसी में उतने ही जनम धरा।। हे नाथ.।।८।। एकेक समय वृद्धि करके जन्मता रहा। उत्कृष्ट आयु तीन पल्य तक भ्रमण रहा।। हे नाथ.।।९।। नारक में जघन आयु दश हजार वर्ष की। जितने समय थे उतनी बार हुआ नारकी।। हे नाथ.।।१०।। फिर आयु बढ़ाते हुए तैंतीस सागरा। सप्तम नरक में उच्च आयु धार के मरा।। हे नाथ.।।११।। नरगति में क्षुद्र आयु है अंतर्मुहूर्त की। जितने समय इस आयु में उतने ही बार भी।। हे नाथ.।।१२।। लघु आयु को धरा मरा फिर इक समय बढ़ा। ऐसे ही समय एक एक वृद्धि कर बढ़ा।। हे नाथ.।।१३।। उत्कृष्ट आयु तीन पल्य तक वहाँ गया। इस विधि से मनुष योनि में मैं घूमता रहा।। हे नाथ.।।१४।। देवायु क्षुद्र दश हजार वर्ष की अरे। जितने समय उसी में उतने सुर जनम धरे।। हे नाथ.।।१५।। लघु आयु से उतने जनम को पूर्ण जब किया। तब आगे एक-एक समय बढ़ते ही गया ।। हे नाथ.।।१६।। जब तक हुई इकत्तीस सागरा तक स्थिती। तब तक समय की वृद्धि से ली देव की गती।। हे नाथ.।।१७।। इस विध से चार गति में ही मैं पर्यटन किया। हे नाथ! मैंने मुक्ति का तो मार्ग ना लिया।। हे नाथ.।।१८।। नाना विभाव भाव जो मिथ्यात्व सहित हैं। मैं उन असंख्य लोकमात्र भाव धरे हैं ।। हे नाथ.।।१९।। ना कोई भाव श्ोष रहा जो नहीं किया। बस एक मात्र जो अपूर्व भावना लिया।। हे नाथ.।।२०।। हे देव! आज शुद्ध आत्मतत्व जान के। मैं सिद्ध के समान हूँ श्रद्धान ठान के।। हे नाथ.।।२१।। हे नाथ! तुम्हें पाय मैं निहाल हो गया। बस तीन रत्न से ही मालामाल हो गया।। हे नाथ.।।२२।। मैं याचना करूँ मुझे वरदान दीजिये। भव भव में रहे भक्ति तेरी ध्यान दीजिये।। हे नाथ.।।२३।। विदेह पूर्व अपर की जो आर्य भूमियाँ। शाश्वत हैं कर्मभूमि वहाँ तीर्थभूमियाँ।। हे नाथ! मेरी पूरिये बस एक कामना। ना होवे पेâर पेâर यहाँ भव में आवना।।२४।। तीर्थंकरों के जन्म वहाँ नित्य ही रहते। तीर्थेश चार आज भी हैं वहाँ विहरते।। हे नाथ.।।२५।। षट् काल भरत क्षेत्र ऐरावत विषे होते। तीर्थेश चौथे काल में हो पाप को धोते।। हे नाथ.।।२६।। इन सबको मेरा बार बार नमस्कार हो। यह नाव तेरी भक्ति से भवदधि से पार हो।। हे नाथ.।।२७।। —दोहा— जो नर श्रद्धा भाव से, पढ़ें सुने जयमाल। ‘ज्ञानमती’ सुख सम्पदा, सो पावे तत्काल।।२८।। ॐ ह्रीं श्रीअचलमेरुसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्ध-वूâटजिनालयस्थसर्वजिनिंबबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. २९) पश्चिम धातकीखण्ड भरतक्षेत्र वर्तमान तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-नरेन्द्र छंद पश्चिम द्वीपधातकी में वर, अचलमेरु नित सोहे। उसके दक्षिण दिश मेें, सुंदर भरत क्षेत्र मन मोहे।। वर्तमान चौबीस जिनेश्वर, चौथे युग में जानो। आह्वानन कर पूजन करके, भव भव का दु:ख हानो।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-स्रग्विणी छंद कर्ममल धोयके आप निर्मल भये। नीर ले आप पद वंâज पूजत भये।। तीर्थ करतार चौबीस को मैं जजूूँ। कर्मनिर्मूल कर स्वात्म अमृत चखूँ।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। मोह संतापहर आप शीतल भये। गंध से पूजते सवसंकट गये।।तीर्थ.।।२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

नाथ अक्षय सुखों की निधी आप हो। शालि के पुंज धर पूर्ण सुख प्राप्त हो।।तीर्थ.।।३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। काम को जीत कर आप शंकर बने। पुष्प से पूज कर हम शिवंकर बनें।।तीर्थ.।।४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। भूख तृष्णादि बाधा विजेता तुम्हीं। सर्व पकवान से पूज व्याधी हनी।।तीर्थ.।।५।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दोष अज्ञान हर पूर्ण ज्योती धरें। दीप से पूजते ज्ञान ज्योती भरें।।तीर्थ.।।६।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। शुक्लध्यानाग्नि से कर्म भस्मी किये। धूप से पूजते स्वात्म शुद्धी किये।।तीर्थ.।।७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्ण कृतकृत्य हो नाथ! इस लोक में। मैं सदा पूजहूँ श्रेष्ठ फल से तुम्हें।।तीर्थ.।।८।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। सर्वसंपत्ति धर नाथ अनमोल हो। अघ्र्य से पूजते स्वात्म कल्लोल हो।।तीर्थ.।।९।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुँजग शांतीकर सदा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -सोरठा- कोटि सूर्य से प्रभ अधिक, अनुपम आतम तेज। पुष्पांजलि कर पूजहूँ, कर्माञ्जन हर हेत।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -दोहा- ‘विश्वचंद्र’ तीर्थेश नित, करते भवि मन बोध। अघ्र्य चढ़कर मैं जजूँ, पाऊँ निज पर बोध।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविश्वचंद्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनवर ‘कपिल’ अतुल्य सुख, लक्ष्मी के भंडार। सुर इंद्रों से वंद्य पर, जजूँ हनूँ संसार।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीकपिलजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पंचपरावर्तन स्वयं, नाश भये शिव ईश। ‘वृषभदेव’ के पद कमल, नमूँ नमा निज शीश।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘प्रियतेज’ जिनेन्द्र का, मानस्तंभ अनूप। अस्सी कोशों तक करे, प्रभा जजूँ जिनरूप।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रियतेजजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाथ ‘प्रशमजिन’ क्रोध से, रहित तथापी आप। कर्मशत्रु संहारिया, जजॅूं हरूँ भव ताप।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रशमजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘विषमांग’ जिनेन्द्र तुम, साम्य सुधारस लीन। समरस अनुभव के लिये, मैं पूजूँ भवहीन।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविषमांगजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘चारितनाथ’ जिनेश का, यथाख्यात चारित्र। पंचमचारित हेतु मैं, जजूँ हरूँ दारिद्र।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीचारित्रनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘प्रभादित्य’ जिननाथ की, प्रभा अलौकिक ख्यात। कोटि सूर्य लज्जित हुये, पूजूँ मैं सुखदात।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रभादित्यजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘मुंजकेश’ जिन आपने, दशमुंडन का रूप। बतलाया मुनिराज को, पूजूँ तिहुंजग भूप।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमुंजकेशजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नग्न दिगम्बर रूप तुम, ‘वीतवास’ अभिराम। दु:खमूल परिग्रह कहा, नमूँ नमूँ शिवधाम।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवीतवासजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाथ ‘सुराधिप’ आप हैं, देवदेव के देव। पूजूँ भक्ति समेत मैं, लहूँ सौख्य स्वयमेव।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुराधिपजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘दयानाथ’ मुझ दीन पर, दया करो निज जान। मोह दुष्ट से रक्ष कर, भरो भेद विज्ञान।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीदयानाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘सहस्रभुज’ आपको, सहस नेत्र से देख। इंद्र तृप्त नहिं होत हैं, मैं पूजूँ पद देख।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसहस्रभुजजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘जिनसिंह’ महान तुम, कामहस्ति मद चूर। पाई आतम शक्ति को, जजूँ सौख्य भर पूर।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजिनसिंहजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनवर ‘रैवतनाथ’ ने, घात घातिया कर्म। भविजन को उपदेशिया, पूज लहूँ निज मर्म।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीरैवतनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘बाहु स्वामि’ गुण के धनी, कीर्ति ध्वजा फहरंत। जो पूजें तुम पद कमल, स्वातम सुख विलसंत।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीबाहुस्वामिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तीर्थंकर ‘श्रीमालि’ का, समवसरण अतिभव्य। मैं पूजूँ अतिभाव से, बनूँ पूर्ण कृतकृत्य।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीश्रीमालिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूज्य‘अयोग’ जिनेश तुम, मन वच काय निरोध। शेष कर्म चकचूर कर, किया मृत्यु प्रतिरोध।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअयोगजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। प्रभू ‘अयोगीनाथ’ ने, शुक्ल ध्यान को ध्याय। निज आतम को शुद्धकर, अविचल शिवपद पाय।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअयोगिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाथ ‘कामरिपु’ तीर्थकर, कामदेव मद नाश। धर्मतीर्थ के चक्र को, धारा मुक्ति सनाथ।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीकामरिपुजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री जिनवर ‘आरंभ’ तुम, सब आरंभ सुत्याग। निरारंभ परिग्रह रहित, कीना स्वपर विभाग।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीआरम्भजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नेमिनाथ’ भगवान तुम, नियम सार उपदेश। रत्नत्रय द्वयविध प्रगट, बने पूर्ण परमेश।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गर्भज्ञाति’ जिनराज तुम, पुनर्जन्म से मुक्त। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय मैं, होऊँ कर्म विमुक्त।।२३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीगर्भज्ञातिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘एकार्जित’ स्वामि को, जो पूजें धर भाव। अतिशय पुण्य उपाज्र्य के, पावें चारित नाव।।२४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीएकार्जितजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-रोला छंद पंचमहाकल्याण, स्वामी शिवपथ नेता। सकल तत्त्वविद् नाथ, कर्माचल के भेत्ता।। अष्ट द्रव्य से नित्य, प्रभुपद पूज रचाऊँ। चिच्चैतन्य स्वरूप, निज अनुभव सुख पाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविश्वचंद्राद्येकार्जितस्वामिपर्यंतचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- घाति चतुष्टय घात कर, प्रभु तुम हुए कृतार्थ। नव केवल लब्धी रमा, रमणी किया सनाथ।१।। चाल-हे दीनबन्धु श्रीपति प्रभु दर्श मोहनीय को निर्मूल किया है। सम्यक्त्व क्षायिकाख्य को परिपूर्ण किया है।। चारित्रमोह का विनाश आपने किया। क्षायिक चारित्र नाम यथाख्यात को लिया।।२।। संपूर्ण ज्ञानावर्ण का जब आप क्षय किया। वैâवल्य ज्ञान से त्रिलोक जान सब लिया।।

प्रभु दर्शनावरण के क्षय से दर्श अनंता। सब लोक औ अलोक को लखते हो तुरंता।।३।। दानांतराय नाश के अनंत प्राणि को। देते अभय उपदेश तुम वैâवल्य दान जो।। लाभांतराय का समस्त नाश जब किया। क्षायिक अनंत लाभ का तब लाभ प्रभु लिया।।४।। जिससे परमशुभ सूक्ष्म दिव्य नंत वर्गणा। पुद्गलमयी प्रत्येक समय पावते घना।। जिससे न कवलाहार हो फिर भी तनू रहे। कुछ हीन पूर्वकोटि वर्ष तक टिका रहे।।५।। भोगांतराय नाश के अतिशय सुभोग हैं। सुरपुष्पवृष्टि गंध उदकवृष्टि शोभ हैं।। पद के तले वर पद्म रचें देवगण सदा। सौगंध्यशीत पवन आदि सौख्य शर्मदा।।६।। उपभोग अंतराय का क्षय हो गया जभी। प्रभु सातिशय उपभोग को भी पा लिया तभी।। सिंहासनादि छत्र चमर तरु अशोक हैं। सुरदुंदुभी भाचक्र दिव्यध्वनि मनोज्ञ हैं।।७।। वीर्यान्तराय नाश से आनन्त्य वीर्य है। होते न कभी श्रांत आप महावीर हैं।। प्रभु चार घाति नाश के नव लब्धि पा लिया। आनन्त्यज्ञान आदि चतुष्टय प्रमुख किया।।८।। प्रभु आप सर्वशक्तिमान कीर्ति को सुना। इस हेतु से ही आज यहाँ मैं दिया धरना।। अब तारिये न तारिये यह आपकी मरजी। बस ‘ज्ञानमती’ पूरिये यदि मानिये अरजी।।९।। -दोहा- गुण समुद्र के गुण रतन, को गिन पावे पार। मात्र अल्पमती मैं पुन:, क्या कह सवूँâ अवार।।१०।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.३०) पश्चिम धातकीखण्ड ऐरावतक्षेत्र वर्तमान तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-अडिल्ल छंद अपरधातकी में, ऐरावत जानिये। वर्तमान चौबीस, जिनेश्वर मानिये।। तिनकी पूजा करूँ, भक्ति उर लायके। शुद्ध बुद्ध परमातम गुण चित ध्यायके।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकर समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ चाल-नंदीश्वरपूजन की सुरगंगा का शुचि नीर, तनुमल शुद्ध करे। जिनचरण सरोरुह धार, मनमल शुद्ध करे।। चौबीसों श्री जिनचंद, परमानंद सही। जो पूजें धर आनंद, पावें स्वात्म मही।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। वंâचनद्रव सम शुचिगंध, तन की ताप हरे। जिन चरण सरोरुह चर्च, भव संताप हरे।।चौबीसों.।।२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। शशि रश्मि सदृश सित धौत, तंदुल गंध भरे। अक्षय आतम सुख हेत, तुम ढिग पुंज धरें।।चौबीसों.।।३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। अरविंद कुमुद मचवुंâद, सुरभित मन भावें। मदनारिजयी पदवंâज, पूजत हरषावें।।चौबीसों.।।४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। घेवर बरफी पकवान, ताजे थाल भरे। निज आत्मसुधारस हेतु, तुम ढिग भेंट धरें।।चौबीसों.।।५।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। घृतदीपक जगमग ज्योति, तुम अज्ञान हरे। पूजत जिनचरण सरोज, मन की भ्रांति टरे।।चौबीसों.।।६।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कृष्णागरु धूप सुंगध, खेवत धूम उड़े। जिनपद की पंकज भक्ति करते सौख्य बढ़े।।चौबीसों.।।७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। केला एला बादाम, उत्तम सरस लिये। निज के अखंड सुख हेतु, तुम पद अप्र्य किये।।चौबीसों.।।८।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। वसुविध शुभ अघ्र्य बनाय, तुम पद मैं पूजूँ। रत्नत्रय निधि को पाय, संकट से छूटूूँ।।चौबीसों.।।९।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुँजग शांतीकर सदा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -सोरठा- त्रिभुवन गुरु भगवान्, अनुपम सुख की खान हो। मैं पूजूँ धर ध्यान, सकल विघन घन को हरी।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -नरेन्द्र छंद- श्रीमान् ‘साधित’ तीर्थंकर को, सुरपतिगण मिल पूजें। जो इनको नित वंदन करते, उनके अघरिपु धूजें।। नव क्षायिक लब्धी हेतु मैं, प्रभु को अघ्र्य चढ़ाऊँ। निज आतम अनुभव अमृत को, पीकर तृप्ती पाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसाधितजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘जिन स्वामी’ तीर्थंकर जग में, अनुपम हित उपदेशी। प्रभु तुम नाम मंत्र ही जग में, रोग शोक दुख भेदी।।नव.।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजिनस्वामिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘स्तमितेन्द्र’ जिनेन्द्र विश्व में, परमानंद प्रदाता। निश्चल मन से जो नित पूजें, वे पावें सुख साता।।नव.।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीस्तमितेन्द्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अत्यानंदधाम’ जिनवर जी, परमानंद सुख कर्ता। सुर नर किन्नर सुरललनागण, पूजें भव दुख हर्ता।।नव.।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअत्यानंदजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पुष्पोत्पुâल्ल’ नाथ इस जग में, भविजन मन हरसावें। सबको आत्यंतिक सुख हेतु, धर्मामृत बरसावें।।नव.।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपुष्पोत्पुâल्लजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘मँडित’ जिनवर तीर्थंकर, श्री सर्वज्ञ कहाते। शत इंद्रों से वंदित नितप्रति, जो पूजें सुख पाते।।नव.।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमंडितजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘प्रहितदेव’ जिनदेव त्रिजगपति, धर्मचक्र के धारी। दश धर्मों का करें प्रवर्तन, भवि जीवन हितकारी।।नव.।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रहितदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘मदनसिद्ध’ सब काम क्रोध मद, माया लोभ नशाके। परम सुखास्पद धाम लिया है, आठों कर्म जलाके।।नव.।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमदनसिद्धजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘हसदिंद्र’ जिनेश्वर सुखकर, विषय कषाय जयी हैं। मुनिगण उनके पदपंकज भज, पावें मोक्षमही हैं।।नव.।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीहसदिंद्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘चंद्रपाश्र्व’ जिन अतुल चंद हैं, मुनिमनकुमुद विकासी। जो नित पूजें भक्ति भाव से, पावें निजसुखराशी।।नव.।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीचंद्रपाश्र्वजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अब्जबोध’ तीर्थंकर जग में, भविजनकमल खिलाते। जन्मजात बैरी प्राणी को, प्रेम पियूष पिलाते।।नव.।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअब्जबोधजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘जिनबल्लभ’ तीर्थंकर मुक्ती, ललना के वर माने। सम्यग्दृष्टि जन उनको भज, निज पर को पहचाने।।नव.।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजिनबल्लभजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘सुविभूतिक’ तीर्थंकर भवहर, त्रिभुवन विभव सनाथा। पूजक जन उनको वंदत हैं, नित्य नमाके माथा।।नव.।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुविभूतिकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देव ‘कुकुद्भास’ तीर्थंकर, धर्मध्वजा फहराते। जो जन पूजें भक्ति भाव से, आत्मसुधारस पाते।। नव क्षायिक लब्धी हेतु मैं, प्रभु को अघ्र्य चढ़ाऊँ। निज आतम अनुभव अमृत को, पीकर तृप्ती पाऊँ।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीकुकुद्भासजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नाथ सुवर्ण’ परम तीर्थंकर, वर्ण रहित अशरीरी। जो उनके पदपंकज पूजें, होवें चरम शरीरी।।नव.।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुवर्णनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तीर्थंकर ’हरिवासक’ भवहर, भवि दुख शमन करे हैं। हरि हर ब्रह्मा बुद्ध सूर्य शशि, तुम पद नमन करे हैं।।नव.।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीहरिवासकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘प्रियमित्र’ भविक जनगण के, मित्र परम उपकारी। सुर ललनायें भक्तिभाव से, गावें गुण अविकारी।।नव.।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रियमित्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। भवहर ‘धर्मदेव’ तीर्थेश्वर, अविचल धाम विराजें। सुर किन्नरियाँ वीणा लेकर, भक्ति के स्वर साजें।।नव.।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीधर्मदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘प्रियरत’ तीर्थंकर लखते, तीन लोक त्रयकाला। जो जन श्रद्धा से नित वंदे, उनके वे प्रतिपाला।।नव.।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रियरतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नंदिनाथ’ भवि को आनंदें, सुरगण उनको वंदे। परम अतींद्रिय सौख्य पाय के, भोगें परमानंदें।।नव.।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनंदिनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अश्वानीक’ जिनेश्वर तुम हो, शम दम के अवतारी। परमप्रशमसुख वे पा लेते, जो पूजें सुखकारी।।नव.।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअश्वानीकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पूर्वनाथ’ सुख लिया अपूरब, क्षपक श्रेणि पर चढ़के। निजभक्तों को भी सुख अनुपम, देते हैं बढ़ चढ़के।।नव.।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपूर्वनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पाश्र्वनाथ’ सुख लिया अपूरब, क्षपक श्रेणि पर चढ़के। निजभक्तों को भी सुख अनुपम, देते हैं बढ़ चढ़के।।नव.।।२३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘चित्रहृदय’ जिन चित्र विचित्रित, पंच परावर्तन को। कर समाप्त निज गुण विचित्र सब पाया वंदू उनको।।नव.।।२४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीचित्रहृदयजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-अडिल्ल छंद वर्तमान चौबीस जिनेश्वर को जजूँ। श्रद्धा भक्ति समेत सतत उनको भजूँ।। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय नमाऊँ भाल मैं। निज गुण संपति लहूँ तुरत खुशहाल मैं।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसाधितादिचित्रहृदयपर्यंतचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- लोकोत्तर फलप्रद तुम्हीं, कल्पवृक्ष जिनदेव। नमूँ नमूूं तुमको सदा, करूँ भक्तिभर सेव।।१।। -गीताछंद- जय जय जिनेश्वर धर्म तीर्थेश्वर जगत विख्यात हो। जय जय अखिल संपत्ति के भर्ता भविकजन नाथ हो।। लोकांत में जा राजते त्रैलौक्य के चूड़ामणी। जय जय सकल जग में तुम्हीं हो ख्यात प्रभु चिंतामणी।।२।। एकेन्द्रियादिक योनियों में नाथ! मैं रुलता रहा। चारों गती में ही अनादि से प्रभो! भ्रमता रहा।। मैं द्रव्य क्षेत्र रु काल भव औ भाव परिवर्तन किये। इनमें भ्रमण से ही अनंतानंत काल बिता दिये।।३।। बहुजन्म संचित पुण्य से दुर्लभ मनुष योनी मिली। हा! बालपन में जड़सदृश सज्ज्ञान कालिका ना खिली।। बहुपुण्य के संयोग से प्रभु आपका दर्शन मिला। बहिरात्मा औ अंतरात्मा का स्वयं परिचय मिला।।४।। तुम सकल परमात्मा बने जब घातिया आहय हुये। उत्तम अतीन्द्रिय सौख्य पा प्रत्यक्ष ज्ञानी तब हुये।। फिर शेष कर्म विनाश करके निकल परमात्मा बने। कल-देह वर्जित निकल अकल स्वरूप शुद्धात्मा बने।।५।। हे नाथ! बहिरात्मा दशा को छोड़ अंतर आतमा। होकर सतत ध्याऊँ तुम्हें हो जाऊँ मैं परमातमा।। संसार का संसरण तज त्रिभुवन शिखर पे आ बसूँ। निज के अनंतानंत गुणमणि पाय निज में ही बसूँ।।६।। -दोहा- तुम प्रसाद से भक्तगण, हो जाते भगवान्। ‘ज्ञानमती’ निज संपदा, पाकर के धनवान्।।७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं.३१) पश्चिम धातकीखण्ड विहरमाण बीस तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-गीता छंद पश्चिम सुधातकि खंड में वर पूर्व अपर विदेह हैं। उनमें सदा विहरें जिनेश्वर चार अनुपमदेह हैं।। ये सूरिप्रभ व विशालकीर्ती वङ्काधर चंद्रानना। आह्वानन कर पूजूँ इन्हें होवे निजात्म प्रभावना।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभविशाल-कीर्ति-वङ्काधरचंद्रानननामचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभविशाल-कीर्ति-वङ्काधरचंद्रानननामचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभविशाल-कीर्ति-वङ्काधरचंद्रानननामचतुा\वशतितीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-चामर छंद पवित्र नीर स्वर्ण भृंग में भराय लाइया। जिनेन्द्र पाद पद्म में त्रिधार को कराइया।। अनंत ज्ञान दर्श सौख्य वीर्य हेतु अर्चना। जिनेन्द्र! आश पूरिये करूँ अनंत वंदना।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। पवित्र गंध लेय नाथ पाद पद्म चर्चिया। समस्त ताप नाश हेतु आप चर्ण अर्चिया।।अनंत।।२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। अखंड श्वेत शालि पुंज आपको चढ़ाय के। अखंड संपदा मिले प्रभो तुम्हें मनाय के।। अनंत ज्ञान दर्श सौख्य वीर्य हेतु अर्चना। जिनेन्द्र! आश पूरिये करूँ अनंत वंदना।।३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। गुलाब श्वेत लाल पीत वर्ण के लिये। जिनेंद्र आप चर्ण में चढ़ाय मोद पा लिये।।अनंत।।४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। सुहाल खीर मोदकादि थाल में भराइया। प्रभो! तुम्हें चढ़ाय भूख व्याधि को नशाइया।।अनंत।।५।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। वूâपर ज्योति ज्वाल के जिनेन्द्र आरती करूँ। समस्त चित्त मोह नाश ज्ञान भारती भरूँ।।अनंत।।६।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। सुगंध धूप अग्नि पात्र के सुखेयके अबे। समस्त पाप पुंज को जलाय दो प्रभो अबे।।अनंत।।७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। इलायची बदाम द्राक्ष आपको चढ़ावते। शिवांगना वरें स्वयं समस्त सौख्य धावते।।अनंत।।८।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जलादि अर्घ में सुवर्ण पुष्प को मिलाय हूँ। निजात्म तीन रत्न हेतु आपको चढ़ाय हूँ।।अनंत।।९।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थितश्रीसूरिप्रभ-आदि-विहरमाण-चतुस्तीrर्थंकरेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- नाथ! पादपंकेज, जल से त्रयधारा करूँ। अतिशय शांती हेत, शांतीधारा विश्व में।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार गुलाब, पुष्पांजलि अर्पण करूँ। मिले आत्म सुख लाभ, जिनपद पंकज पूजते।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -सोरठा- विहरमाण जिनराज, समवसरण में राजते। पुष्पांजलि कर आज, जजॅूँ जिनेश्वर को यहाँ।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -शंभु छंद- धातकी खंड में अचलमेरु, पूरब विदेह सीता उत्तर। विजया नगरी में नागराज, पितु माता भद्रा लोकोत्तर।। रवि चिन्ह धरे प्रभु ‘सूरिप्रभ’ त्रिभुवन भर में उद्योत करें। नित आत्म रसास्वादी साधू, वंदे हम भी जयघोष करें।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थित-विहरमाण-श्रीसूरिप्रभजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पश्चिम धातकी में अचलमेरु, पूरब विदेह नदि के दक्षिण। परिपुंडरीकिणी पिता विजय, माता विजया उत्तम लक्षण।। शशि चिन्ह धरें भवतम हरते, तीर्थेश ‘विशालकीर्ति’ मानें। सुर किन्नरगण स्तुति करते, उन प्रभु की हम पूजा ठानें।।२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थित-विहरमाण-श्रीविशालकीर्तिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री अचलमेरु पश्चिमविदेह, सीतोदा के दक्षिण तट में। है पुरी सुसीमा पिता पद्मरथ, सरस्वती माँ से जन्में।। है चिन्ह शंख प्रभु लोकोत्तम, तीर्थेश ‘वङ्काधर’ कहलाते। परमाल्हादक सुख के भोक्ता, तुम पूजन कर हम गुण गाते।।३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थित-विहरमाण-श्रीवङ्काधरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री अचलमेरु पश्चिम विदेह, सीतोदा नदि के उत्तर में। वर पुंडरीकिणी नगरी के, नृप की रानी से प्रभु जन्में।। तुम वृषभचिन्ह है ‘चंद्रानन’, मेरा मन कुमुद खिला दीजे। मैं भक्ती से तुम पद पूजूँ, मेरा निज राज्य दिला दीजे।।४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थित-विहरमाण-श्रीचंद्राननजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्र्य-दोहा- तीर्थंकर जग के पिता, विहरमाण सुर वंद्य। पूजूँ अर्घ चढ़ाय के, हरूँ सकल जग द्वंद्व।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रस्थसूरिप्रभ-आदिविहरमाण-चतुस्तीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:।

जयमाला -रोला छंद- जयो जयो जिनराज, तुम महिमा मुनि गावें। जयो जयो जिनराज, गणधर भी शिर नावें।। जयो जयो जिनराज, गुण अनंत के स्वामी। जयो जयो जिनराज, त्रिभुवन अंतर्यामी।।१।। ज्ञानावरण विनाश, ज्ञान अनंत प्रकाशा। दर्शनावरण विनाश, केवल दर्श प्रकाशा।। सर्व मोह को चूर, सौख्य अनंत विकासा। अंतराय कर दूर, वीर्य अनंत विकासा।।२।। हे प्रभु आप अनंत, चार चतुष्टय धारी। शत इंद्रों से वंद्य, त्रिभुवन जन मनहारी।। नाथ! आप की जाप, कर्म कलंक विनाशे। जपूँ जपूँे दिनरात, अनुपम सौख्य प्रकाशे।।३।। अहो! जगत के सूर्य, मुनिमन कमल विकासी। अहो जगत के चंद्र, भविजन कुमुद विकासी।। अहो भविकजन बंधु, तुम सम नहिं हितकारी। त्रिभुवन जन अभिवंद्य, नमूँ नमूँ सुखकारी।।४।। तीनलोक के आप, एक सुमंगल कत्र्ता। हरो सकल दुख ताप, सब सुख मंगल कत्र्ता।। तीन लोक में आप, सर्वोत्तम मुनि मानें। हरो हरो भव ताप, लोकोत्तम जग जाने।।५।। तीन लोक में आप, सबके लिये शरण हो। नमूँ नमूँ नत माथ, मेरे आप शरण हो।। सर्व उपद्रव दूर करके सब सुख दीजे। ‘ज्ञानमती ’ सुख पूर, मिले कृपा अब कीजे।।६।। -घत्ता- जय जय जिनराजा, जग सिरताजा, निजहितकाजा तुमहिं जजूँ। प्रभु निज पद दीजे, ढील न कीजे, अरज सुनीजे नित्य भजूँ।।७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वापरविदेहक्षेत्रविहरमाणश्रीसूरिप्रभविशाल- कीर्तिवङ्काधरचंद्रानननामचतुस्तीर्थंरेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ३२) पश्चिम धातकीखण्ड नवदेवता पूजा अथ स्थापना-नरेन्द्र छंद अपरधातकी खंड द्वीप में भरतैरावत सुंदर। पूर्व अपर दिश सोलह सोलह देश विदेह मनोहर।। जिनवर मुनिगण जिनवृष आगम, जिनप्रतिमा जिनमंदिर। आह्वानन कर जजूँ यहाँ पर, जजते इन्हें पुरंदर।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-चाल नंदीश्वर पूजा सरयू नदि का जल स्वच्छ, जिनपद धार करूँ। अघ धुलकर मन हो स्वच्छ, निजपद प्राप्त करूँ।। नव देवों को नित अर्च, नवनिधि रिद्धि भरूँ। नव नव प्रतिभा को सर्ज, अभिनव सिद्धि वरूँ।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। काश्मीरी केशर पीत, प्रभु पद चर्च करूँ। मिल जावे निजगुण शीत, श्रद्धा भक्ति धरूँ।।नव.।।२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: चंदनंं निर्वपामीति स्वाहा। शशि किरणों सम अति श्वेत, अक्षय से पूजूँ। निज के अखंडगुण हेतु, जिनपद नित पूजूँ।। नव देवों को नित अर्च, नवनिधि रिद्धि भरूँ। नव नव प्रतिभा को सर्ज, अभिनव सिद्धि वरूँ।।३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। बेला मचवुंâद गुलाब, पुष्प चढ़ाऊँ मैं। हो जावे निज सुख लाभ, आप रिझाऊँ मैं।।नव.।।४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। खुरमा रसगुल्ला मिष्ट, ताजे लाऊँ मैं। हो क्षुधा वेदनी नष्ट, आप चढ़ाऊँ मैं।।नव.।।५।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। कर्पूर ज्योति उद्योत, आरति करते ही। होवे निजज्ञान प्रद्योत, घट तम विनशे ही।।नव.।।६।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। वर धूप सुगंधित खेय, कर्म जलाऊँ मैं। जिनवर पद पंकज सेय, सौख्य बढ़ाऊँ मैं।।नव.।।७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। एला केला बादाम, पिस्ता भर थाली। अर्पण करते निष्काम, मनरथ नहिं खाली।।नव.।।८।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल फल वर अर्घ चढ़ाय, जिनवर गुण गाऊँ। रत्नत्रय निधि को पाय, अतिशय सुख पाऊँ।।नव.।।९।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सिद्धाचार्यो-पाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- यमुना सरिता नीर, प्रभु चरणों धारा करूँ। मिले निजात्म समीर, शांतीधारा शं करें।।१०।। शांतये शांतिधारा। सुरभित खिले सरोज, जिनचरणों अर्पण करूँ। निर्मद करूँ मनोज, पाऊँ निजसुख संपदा।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- परम पुरुष परमात्मा, परमानंद निमग्न। पुष्पांजलि कर पूजहूँ, करूँ मोह अरिभग्न।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -चौपाई- अचलमेरु के पूरब दिश, ‘कच्छा’ देश विदेह प्रसिद्ध। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहकच्छादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुकच्छा’ में छहखंड, नदी तरफ में आरजखंड। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहसुकच्छादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महाकच्छा’ अतिशायि, आर्यखंड है सब सुखदायि। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहमहाकच्छादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘कच्छकावती’ अनूप, आर्यखंड दर्पण चिद्रूप। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहकच्छकावतीदेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आवर्ता’ विदेह छहखंड, आर्यखंड में सौख्य अमंद। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।५।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहआवर्तीदेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘लांगलावर्ता’ सिद्ध, आर्यखंड में रिद्धि समृद्ध। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।६।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहलांगलावर्तादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कला’ में छहखंड, आर्यखंड में है भविवृंद। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहपुष्कलादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पुष्कलावती’ महान, वहाँ करें भविजन कल्यान। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।८।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहपुष्कलावतीदेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतानदि के दक्षिण दिक्क, ‘वत्सा’ देह विदेह समृद्ध। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।९।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहवत्सादेशस्थित-आर्यखंडे-अर्हंत्सि-द्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुवत्सा’ अतिशय रम्य, भविजन भजें आत्मसुख साम्य। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।१०।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहसुवत्सादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महावत्सा’ सुखधाम, आर्यखंड में धर्म ललाम। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।११।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहमहावत्सादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘वत्सकावती’ विशाल, आर्यखंड में भव्य खुशाल। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।१२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहवत्सकावतीदेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रम्या’ देश विदेह महान, चारणऋद्धि विहरें गुणखान। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।१३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहरम्यादेशस्थितआर्यखंडे-अर्हंत्सि-द्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुरम्या’ में छहखंड, शाश्वत कर्म भूमि सुख वंâद। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।१४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहसुरम्यादेशस्थितआर्यखंडे-अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘रमणीया’ वर देश महान, भविजन भरते पुण्य निधान। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।१५।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहरमणीयादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘मंगलावती’ अनूप, भविजन बने स्वात्मसुख भूप। जिनवर मुनिगण जिनवर धाम, जिनवर बिंब जजूँ अभिराम।।१६।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपूर्वविदेहमंगलावतीदेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -नरेन्द्र छंद- अचल मेरु के पश्चिम दिश में, सीतोदा दक्षिण में। भद्रसाल वेदी के पासे, ‘पद्मा’ देश अपर में।। जिनवर मुनिगण जिनवृष, जिनश्रुत, जिनप्रतिमा जिनआलय। नमूँ नमूँ नित भक्ति भाव से, पाऊँ सौख्यसुधालय।।१७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहपद्मादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुपद्मा’ के छहखंडों, मध्य आर्यखंड सोहे। भविजन नित्य धर्म धारण कर, सुरगण का मन मोहें।।जिनवर.।।१८।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहसुपद्मादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महापद्मा’ सुखकारी, आर्यखंड की सुषमा। धर्म धुरंधर भव्य रहें नित, गावें जिनगुण महिमा।।जिनवर.।।१९।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहमहापद्मादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पद्मकावती’ मनोहर, आर्यखंड की महिमा। श्रावक नित्य क्रिया षट् पालें, गावें जिनगुण गरिमा।।जिनवर.।।२०।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहपद्मकावतीदेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शंखा’ देश विदेह अपर में, तीर्थंकर अवतरते। देव इंद्र मिल करें महोत्सव, मुनिगण का मन हरते।।जिनवर.।।२१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहशंखादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिना’ देश विदेह सुहाना, कमलनयन अप्सरियां। जिनगुण गातीं नर्तन करतीं, भक्ति करें किन्नरियां।।जिनवर.।।२२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहनलिनादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘कुमदा’ देश विदेह मनोहर, जिनवृष सूर्य चमकता। मुनि मन कमल खिलाता नित प्रति, मोह अंधेरा हरता।।जिनवर.।।२३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहकुमदादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सरित्’ के मध्य, आर्यखंड में मानव। असि मषि आदि षट् क्रिया से, हरें पापरिपु दानव।।जिनवर.।।२४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहसरित्देशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। भूतारण्य वेदिका सन्निध, सीतोदा उत्तर में। ‘वप्रा’ देश विदेह शोभता, आर्यखंड शुभ उसमें।। जिनवर मुनिगण जिनवृष, जिनश्रुत, जिनप्रतिमा जिनआलय। नमूँ नमूँ नित भक्ति भाव से, पाऊँ सौख्यसुधालय।।२५।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहवप्रादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुवप्रा’ छहखंडों में, आर्यखंड अतिसोहे। ईति भीति परचक्र अनावृष्टि अतिवृष्टि न होहें।।जिनवर.।।२६।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहसुवप्रादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘महावप्रा’ गुणशाली, वहाँ गुणीजन बसते। मुनिगण चक्री हलधर आदि, आर्यखंड में रमते।।जिनवर.।।२७।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहमहावप्रादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘वप्रकावती’ सुहाता, आर्यखंड मनहारी। नदियों के कलकलरव से वहाँ, रमें सर्व नर नारी।।जिनवर.।।२८।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहवप्राकावतीदेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधा’ देश विदेह वहाँ पर, गुणगण पुष्प खिले हैं। मानव जन की कीर्ति सुगंधी, सब दिश में पैâले हैं।।जिनवर.।।२९।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहगंधादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुगंधा’ छह खंडों में, आर्यखंड सुरभित है। तीर्थंकर की पुण्य सुगंधी, त्रिभुवन में प्रसरित है।।जिनवर.।।३०।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहसुगंधादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘गंधिला’ महा मनोहर, आर्यखंड की शोभा। तीर्थंकर का अतिशय देखत, सुरगण का मन लोभा।।जिनवर.।।३१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहगंधिलादेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधमालिनी’ देश वहाँ पर, आर्यखंड अतिशोभे। मुनिमन कमल विकासी भास्कर, सहस किरण से शोभे।।जिनवर.।।३२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिपश्चिमविदेहगंधमालिनीदेशस्थित-आर्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -चौपाई छंद- अपर धातकी दक्षिण दिश में, गंगा सिंधू नदियाँ इसमें। आर्यखंड में जिनवर होते, जिनगृह वंदत अघमल धोते।।३३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिदक्षिणदिव्äा्âभरतक्षेत्रार्यखंडे अर्हंत्सि-द्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। उत्तर दिश में ऐरावत है, छह खंड मध्य आर्यखंड शुभ है। जिनवर मुनिगण जिनप्रतिमायें, पूजत ही सब पाप पलायें।।३४।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधि-उत्तरदिक्भरतक्षेत्रार्यखंडे अर्हंत्सिद्धाचा-र्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-गीता छंद इस अपर धातकि खंड में शुभ कर्मभू चौंतीस हैं। सबमें कहे छह खंड उनके मध्य आरज खंड है।। तीर्थेश चक्री मुनिवरा जिनधर्म जिनश्रुत आदि हैं। जिनबिंब जिनगृह को जजूँ ये सर्व सुखकर ख्यात हैं।१।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितअर्हंत्सिद्धाचा-र्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस अपर धातकि द्वीप में नित आर्यिकायें विहरतीं। ये धर्ममूर्ति महाव्रतों से शुद्ध मानों सरस्वती।। वर ज्ञान ध्यान तपो निरत इक साटिका परिग्रह धरें। इनको जजें हम भक्ति से ये भक्त पातक परिहरें।।२।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थितसर्वार्यिकाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। इस द्वीप में तीर्थंकरों के गर्भ जन्मोत्सव हुये। तप ज्ञान मोक्ष कल्याण के थल पूज्य पावन हो गये। गणधर मुनीश्वर के वहाँ तक ज्ञान मुक्ति स्थान जो। मैं पूजहूँ नित अर्घ ले इन तीर्थक्षेत्र स्थान को।।३।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थिततीर्थंकरगणधर-मुनिगणपंचकल्याणकादितीर्थक्षेत्रेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -गीता छंद- जय जय जिनेश्वरदेव तीर्थंकर प्रभू जिन केवली। जय सिद्ध परमेष्ठी सकल गणधर गुरू श्रुतकेवली।। जय जय गुरू आचार्यवर उवझाय साधूगण मुनी। जिनधर्म जिनआगम जिनेश्वर बिंब जिनगृह सुख खनी।।१।। नव देवता जयशील हैं ये कर्मभूमी में रहें। ये सर्व मंगल लोक में उत्तम शरणमय हो रहे।। इनकी करूँ मैं वंदना कर जोड़ नाऊँ शीश को। इनकी करूँ मैं अर्चना शत शत झुकाऊँ शीश को।।२।। जिनकेवली को रोग हो आहार भी लेकर जियें। श्रुत में कहा है मांस भक्षण साधुगण निर्लज्ज हैं।। जिनधर्म के कुछ गुण नहीं सुर देविगण बलि मांगते। इस विध कहें जो मूढ़ जन वे दर्शमोहनि बांधते।।३।। जो केवली श्रुत संघ को जिनधर्म सुर को दोष दें। वे मोहनी दर्शन अशुभ को बांध कर दुख भोगते।। ये सब असत् अपवाद हैं हे नाथ! मैं इनसे बचूँ। सम्यक्त्व निधि रक्षित करूँ हे नाथ! भवदुख से बचूँ।।४।। क्रोधादि अशुभ कषाय का उद्रेक जब अति तीव्र हो। चारित्र मोहनि बंध हो नहिं चरित धारण शक्ति हो।। चारित्र मोह अनादि से हे नाथ! निर्बल कर रहा। मेरी अनंती आत्म शक्ति छीनकर दुख दे रहा।।५।। करके कृपा हे नाथ! अब चारित्र मोह निवारिये। चारित्र संयम पूर्ण हो भवसिंधु से अब तारिये।। प्रभु आप ही पतवार हो मुझ नाव भवदधि में पंâसी। अब हाथ का अवलंब दो ना देर कीजे मैं दुखी।।६।। इन आठ कर्मों में अधिक बलवान एकहि मोह है। इसके अठाइस भेद हैं बहु भेद सर्व असंख्य हैं।। ये मोहनी ही स्थिती अनुभाग बंध करे सदा। ये मोहनी संसार का है मूल कारण दु:खदा।।७।। हे नाथ! ऐसी शक्ति दो मैं सर्व ममता छोड़ दूँ। निजदेह से भी होउं निर्मम सर्व परिग्रह छोड़ दूँ।। निज आत्म से ममता करूँ निज आत्म की चर्चा करूँ। निज आत्म में तल्लीन हो जिन आत्म की अर्चा करूँ।।८।। ऐसा समय तुरतहिं मिले, निजध्यान के सुस्थिर बनूँ। उपसर्ग परिषह हों भले, निज तत्त्व में ही थिर बनूँ।। निज आत्म अनुभव रस पियूँ, परमात्म पद की प्राप्ति हो। निज ‘ज्ञानमति’ ज्योती दिपे, जो तीन लोक प्रकाशि हो।।९।। -दोहा- जब तक नहिं परमात्म पद, तुम पद में मन लीन। एक घड़ी भी नहिं हटे, बनूँ आत्म लवलीन।।१०।। ॐ ह्रीं पश्चिमधातकीखंडद्वीपसंबंधिचतुिंस्त्रशत्कर्मभूमिस्थित-अर्हंत्सि-द्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ३३) पुष्करार्ध द्वीप संबंधि इष्वाकार जिनालय पूजा

—अथ स्थापना—नरेन्द्र छन्द—

पुष्करार्ध में दक्षिण-उत्तर, इष्वाकार गिरी हैं। कनकवर्णमय शाश्वत अनुपम, धारें अतुलसिरी हैं।। इन दोनों पे दो जिनमंदिर, पूजत पाप पलानो। आह्वानन कर जिनप्रतिमा का, विधिवत् पूजन ठानो।।१।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधिदक्षिणोत्तर-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधिदक्षिणोत्तर-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधिदक्षिणोत्तर-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्।

—अथाष्टकं—नरेन्द्र छंद—

तीन लोक भर जाय प्रभो मैं, इतना नीर पिया है। फिर भी प्यास बुझी नहिं विंâचित्, यातें शरण लिया है।। हृदय ताप उपशांती हेतू, शीतल जल ले आया। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।१।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मोह राग की दावानल में, चिर से झुलस रहा हूँ। विंâचित् मन की दाह मिटी नहिं, अब तुम पास खड़ा हूँ।। रागदाह हर शीतल हेतू, हरि चंदन घिस लाया। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।२।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। जन्म मरण के बहु दु:खों से, अब मैं श्रांत हुआ हूँ। अन्य नहीं निरवारण समरथ, यातें पूज रहा हूँ।। अक्षय अव्यय निजपद हेतू, उज्ज्वल अक्षत लाया। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।३।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। मकरध्वज१ ने चिर भव-भव में, मुझको अधिक छला है। मारविजेता२ तुमको सुनके, ली अब शरण भला है।। काममोहयमत्रिपुरारी३ हर४! विविध कुसुम मैं लाया। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।४।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। संख्यातीते तीन लोक सम, अन्न प्रभो! खाया मैं। फिर भी भूख अगनि निंह बुझती, इससे अकुलाया मैं।। स्वातम अमृत स्वाद हेतु मैं, बहुविध व्यंजन लाया। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।५।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। बहुविध दीपक विद्युत आदी, तम हरने हित लाया। फिर भी अंतर अंधकार को, दूर नहीं कर पाया।। स्वपर भेद विज्ञान हेतु मैं, मणिदीपक ले आया।। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।६।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अष्ट कर्म दु:ख देते जग में, इनको शीघ्र जलाऊँ। धूप सुगंधित अग्निपात्र मेें, श्रद्धा सहित जराऊँ।। आतम शुद्धी करने हेतू, पूजन करने आया। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।७।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। बहुविध सरस मधुर फल खाये, फिर भी तृप्ति न पाई। आत्मसुधारस अनुभव पाने, प्रभु तुम पूज रचाई।। ज्ञानानन्द स्वभावी हो तुम, यह सुन शरणे आया। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।८।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल चंदन अक्षत आदी ले, अघ्र्य सजाकर लाया। नित्य निरंजन चिच्चिन्तामणि, रत्न कमाने आया।। तुमसे हे प्रभु अखिल ज्ञान निधि, प्राप्त हेतु मैं आया। इष्वाकार अचल जिनमंदिर, पूजत मन हरषाया।।९।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —दोहा— कनक भृंग में मिष्ट जल, सुरगंगा१ समश्वेत। जिनपद धारा देत ही, भव भव को जल देत।।१०।। शांतये शांतिधारा। वकुल सरोरुह मालती, पुष्प सुगंधित लाय। पुष्पांजलि अर्पण करूं, सुख संपति अधिकाय।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य —सोरठा— शाश्वत जिन आगार१, मणिरत्नों से परिणमें। प्रभु करिये भवपार, नितप्रति अर्चूं भाव से।।१।। इति पुष्करार्धद्वीपसंबंधिइष्वाकारगिरिस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —रोला छन्द— पुष्करार्ध वर द्वीप, ताके दक्षिण माहीं। इष्वाकार गिरीश, अद्भुत अतुल कहाहीं।। तापे सिद्ध सुवूâट, जिनप्रतिमा अविकारी। पूजूँ अघ्र्य बनाय, जल फल से भर थारी।।१।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधिदक्षिणदिशि इष्वाकारपर्वताqस्थतसिद्धवूâटजिनालय-स्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तृतिय द्वीप के माहिं, उत्तर दिश में जानो। इष्वाकार नगेश, अनुपम रूप बखानो।। तापे जिनवरगेह, सिद्धवूâट मनहारी। पूजूँ अघ्र्य बनाय, जल फल से भर थारी।।२।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधिउत्तरदिशि इष्वाकारपर्वताqस्थतसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य— वंâचनदेह सुकांति, दो पर्वत मन मोहे। चार चार हैं वूâट, सुर किन्नर गृह सोहें।। उनमें इक इक सिद्ध-वूâट जिनालय दो हैं। पूरण अघ्र्य चढ़ाय, पूजूँ शिवसुख हो हैं।।१।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधिदक्षिणोत्तरदिशायां सिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला —दोहा— अशरण के प्रभु तुम शरण, निराधार आधार। तुम गुणगणमणि मालिका, लेउं वंâठ में धार।।१।। —तोटक छंद— जय इष्वाकार जिनेश गृहं, जय मुक्तिवधू परमेश गृहं। जय नाथ त्रिलोकपती तुम हो, जय नाथ अनंत गुणांबुधि हो।।१।। जय साधु मनोम्बुज भानु समं, जय भव्य कुमोदनि चन्द्र समं। जय भक्त मनोरथ पूरक हो, जय सर्व दुखांकर चूरक हो।।२।। जय कल्पतरू सम सौख्य भरो, जय वांछित वस्तु प्रदान करो। जय संसृति रोेग महौषधि हो, जय तारक भव्य भवोदधि हो।।३।। जय तुंग चतु:शत योजन है, जय विस्तृत सहज सुयोजन है। जय लम्बे आठ सु लाख कहे, द्वय शैल सुवर्णिम कांति लहे।।४।। मुनिवृंद वहाँ नित भक्ति करें, निज आतम बोध विकास करें। खगवृंद वहाँ नित आवत हैं, जिनपाद सरोरुह ध्यावत हैं।।५।। सुर अप्सरियाँ बहु नृत्य करें, गुण गावत चित्त उमंग भरें। करताल मृदंग बजावत हैं, निज कर्म कलंक नशावत हैं।।६।। द्वय पे जिनमंदिर स्वर्णमयी, जिनबिम्ब मणीमय रत्नमयी। छवि सौम्य विराग विदोष कही, द्युति से रवि रश्मि लजे सबही।।७।। जिनपाद सरोरुह शर्ण लिया, प्रभु अर्ज सुनो हमरी कृपया। यमपाश विपाश हरो प्रभुजी, सब भाव विभाव हरो प्रभुजी।।८।। हम आश धरें तुम पाद प्रभो, अब वेग उबार भवोदधि सो। मुझ ‘ज्ञानमती’ सुख शांति करो, जिनदेव! सभी गुण पूर्ण करो।।९।। —घत्ता— जय इष्वाकारा, पर्वत सारा, जय जिनमंदिर नित्य नमूँ। जय जिनगुण गाके, कर्म नशाके, नित्य निरंजन सिद्ध बनूँ।।१०।। ॐ ह्रीं पुष्करार्धद्वीपसंबंधि-इष्वाकारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ३४) मंदरमेरु पूजा अथ स्थापना-नरेन्द्र छंद पुष्करार्ध वर द्वीप पूर्व में मंदिर मेरू सोहे। उसके सोलह जिनमंदिर में जिनप्रतिमा मन मोहे।। भक्ति भाव से आह्वानन कर पूजा पाठ रचाऊँ। भव भव के संताप नाश कर स्वात्म सुख को पाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-भुजंगप्रयात छंद पयोराशि को नीर झारी भराऊँ। प्रभो के पदाम्भोज धारा कराऊँ।। जजूँ मेरु मंदर जिनालय अभी मैं। न पाऊँ पुनर्जन्म को फिर अभी मैं।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलय चंदनादी सुवासीत लाऊँ। प्रभो आपके पाद में नित चढ़ाऊँ।।जजूँ.।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। धवल शालि तंदुल लिया थाल भरके। चढ़ाऊँ तुम्हें पुंज सद्भाव धर के।।जजूँ.।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। जुही केतकी पुष्पमाला बनाऊँ। महा काम शत्रुंजयी को चढ़ाऊँ।। जजूँ मेरु मंदर जिनालय अभी मैं। न पाऊँ पुनर्जन्म को फिर अभी मैं।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। कलावंâद लाडू इमरती बनाके। क्षुधा व्याधि नाशूँ प्रभू को चढ़ाके।।जजूँ.।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। शिखा दीप की लौ उद्योतकारी। तुम्हें पूजते ज्ञान प्रद्योत भारी।।जजूँ.।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगनि पात्र में धूप खेऊँ सदा मैं। करम की भसम को उड़ाऊँ मुदा मैं।।जजूँ.।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। अनन्नास अमरूद अमृत फलों से। जजूँ मैं बचूं कर्म अरि के छलोें से।।जजूँ.।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जलादी वसू द्रव्य से अर्घ करके। चढ़ाऊँ तुम्हें सर्वदा प्रीति धर के।।जजूँ.।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपस्थमंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- परम शांति के हेतु, शांती धारा मैं करूँ। सकल विश्व में शांति, सकल संघ में हो सदा।।१०।। शांतये शांतिधारा। चंपक हरसिंगार, पुष्प सुगंधित अर्पिते। होवे निज सुखसार, दुख दारिद्र पलायते।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- मंदरमेरू जिनभवन, सर्वसौख्य भंडार। पुष्पांजली चढ़ाय के, जजूँ नित्य चित धार।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -दोहा- पुष्करार्धवर पूर्व में, मंदर मेरु महान। भद्रसाल पूरब दिशी, जजूँ जिनालय आन।।१।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। भद्रसाल दक्षिण दिशा, जिनगृह शाश्वत सिद्ध। तिन में जिनवर बिंब को, जजूँ मिले सब सिद्ध।।२।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। भद्रसाल में अपरदिश, जिन मंदिर सुखकार। जिन प्रतिमा को पूजहूँ, मिले भवोदधि पार।।३।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मंदरमेरु भूमि में, भद्रसाल वन जान। उत्तर दिश जिन भवन को, जजूँ मोक्ष हित मान।।४।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिभद्रसालवनस्थित-उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -गीता छंद- वर द्वीप पुष्कर अर्ध में, मंदरगिरी कनकाभ है। जिनवर न्हवन से पूज्य उत्तम, सुरगिरी विख्यात है।। नंदन विपिन१ पूरब दिशी, जिनगेह अनुपम मणिमयी। पूजूँ सकल जिनबिंब को, जो वीतरागी छविमयी।।५।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिनंदनवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। निज और पर का करें अंतर, जो निरंतर मुनिवरा। विचरण करें जिनवंदना हित, वे सदैव दिगम्बरा।। नंदन विपिन दक्षिण दिशी, जिनगेह अनुमप मणिमयी। पूजूँ सकल जिनबिंब को, जो वीतरागी छविमयी।।६।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिनंदनवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। यमराज का भय नाशते, सब कामना पूरी करें। शुद्धात्म रस प्यासे मुनी की, भावना पूरी करें।। नंदन विपिन पश्चिम दिशी, जिनगेह अनुमप मणिमयी। पूजूँ सकल जिनबिंब को, जो वीतरागी छविमयी।।७।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिनंदनवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। भव राग आग बुझावने, तुम भक्ति गंगा नीर है। स्थान जो इसमें करें, उनकी हरे सब पीर हैं।। नंदन विपिन उत्तर दिशी, जिनगेह अनुमप मणिमयी। पूजूँ सकल जिनबिंब को, जो वीतरागी छविमयी।।८।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिनंदनवनस्थितउत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -रोला छंद- मंदरमेरु माहिं, वन सौमनस सुहावे। पूरब दिश जिनगेह, पूजत सौख्य उपाये।। राग द्वेष अर मोह, शत्रु महा दुख देते। प्रभु तुम भक्ति प्रसाद, तुरत नशें त्रय एते।।९।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मेरु चतुर्थ महान, वन सौमनस बखाना। दक्षिण दिश जिनधाम, मृत्युंजय परधाना।।रागद्वेष.।।१०।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मंदरमेरु अनूप, वन सौमनस विशाला। पश्चिम दिश जिनवेश्म, देता सौख्य रसाला।।रागद्वेष.।।११।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मंदरमेरु माहिं, वन सौमनस कहा है। उत्तर दिश जिनधाम, शाश्वत शोभ रहा है।।रागद्वेष.।।१२।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थित-उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाराच छंद-(चाल-पाश्र्वनाथ देव सेव....) पुष्करार्ध पूर्व खंड द्वीप में सुमेरु है। तास पांडुके वने सुपूर्व दिक्क में रहे।। जैन वेश्म शासता जिनेश बिंब सोेहने। पूजहूँ चढ़ाय अघ्र्य कर्म कीच धोवने।।१३।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिपांडुकवनस्थितपूर्वदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मंदराद्रि पांडुकेसु दक्षिणी दिशा तहां। साधु वृंद वंदना जिनेश की करे वहाँ।।जैन वेश्म.।।१४।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितदक्षिणदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मेरु जो चतुर्थ है चतुर्थ रम्य जो वनी। पश्चिमी दिशी सुकल्प वृक्ष पंक्तियां घनी।। जैन वेश्म शासता जिनेश बिंब सोेहने। पूजहूँ चढ़ाय अघ्र्य कर्म कीच धोवने।।१५।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थितपश्चिमदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मंदराचले चतुर्थ जो वनी प्रसिद्ध है। उत्तरी दिशा तहां मनोज्ञता विशिष्ट है।।जैन वेश्म.।।१६।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिसौमनसवनस्थित-उत्तरदिक्जिनालयजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। पूर्णाघ्र्य-सोरठा सोलह श्री जिनधाम, मंदर मेरु में कहे। जिनवर बिंब महान, अर्चूं पूरण अघ्र्य ले।।१।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सत्रह सौ अठबीस, जिनवर प्रतिमा नित नमूँ। नित्य नमाऊँ शीश, पूरण अर्घ चढ़ाय के।।२।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसंबंधिषोडशजिनालयमध्यविराजमानएकसहस्रसप्त-शतअष्टािंवशतिजिनप्रतिमाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मंदर मेरु विदिक्क, पांडुक आदि शिला कहीं। नमूँ नमूँ प्रत्येक, जिन अभिषेक पवित्र हैं।।३।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुपांडुकवनविदिक्स्थितपांडुकादिशिलाभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला -दोहा- जय जय मंदर मेरु नित, जय जय श्री जिनदेव। गाऊँ तुम जयमालिका, करो विघन घन छेव।।१।। शेर छंद-चाल-हे दीन बंधु.... जैवंत मूर्तिमंत मेरु मंदराचला। जैवंत कीर्तिमंत जैन बिंब अविचला।। जैवंत ये अनंतकाल तक भि रहेंगे। जैवंत मुझ अनंत सुख निमित्त बनेंगे।।१।। जै भद्रसाल आदि चार वन के आलया। जै जै जिनेन्द्र मूर्तियों से वे शिवालया।। जै नाममंत्र भी उन्हों का सारभूत है। जो नित्य जपे वो लखे आतम स्वरूप हैं।।२।। भव भव में दुख सहे अनंत काल तक यहाँ। ना जाने कितने काल मैं निगोद में रहा।। तिर्यंचगती में असंख्य वेदना सही। नरकों के दु:ख को कहें तो पार ही नहीं।।३।। मानुष गती में आयके भी सौख्य न पाया। नाना प्रकार व्याधियोंं ने खूब सताया।। अनिष्ट योग इष्ट का वियोग तब हुआ। तब आर्त रौद्र ध्यान बार बार कर मुआ।।४।। संक्लेश से मर बार बार जन्म को धरा। आनंत्य बार गर्भवास दु:ख को भरा।। मैं देव भी हुआ यदी सम्यक्त्व बिन रहा। संक्लेश से मरा पुन: एकेन्द्रिय हो गया।।५।। हे नाथ सभी दु:ख से मैं ऊब चुका हूँ। अब आपकी शरणागती में आके रुका हूूँ।। करके कृपा स्वहाथ का अवलंब दीजिये। मुझ ‘ज्ञानमती’ को प्रभो! अनंत१ कीजिये।।६।। -घत्ता छंद- गुणगण मणिमाला, परम रसाला, जो भविजन निज वंâठ धरें। वे भव दावानल, शीघ्र शमन कर, मुक्ति रमा को स्वयं वरें।।७।। ॐ ह्रीं मंदरमेरुसम्बन्धिषोडशजिनालयजिनबिम्बेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ३५) मन्दरमेरु संबंधि षट् कुलाचल जिनालय पूजा —अथ स्थापना—गीता छंद— मंदरगिरी के दक्षिणोत्तर, हिमवनादिक नग कहे। षट् कुलगिरी ये सासते, जिन पे जिनालय षट् रहें।। सुर नर असुर खगपति सदा, अर्चन करें वंदन करें। शक्ती नहीं वहं जाय की, इत थाप के अर्चन करें।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थसर्व-जिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ—(चाल—हे दीनबन्धु)— गंगा नदी को नीर हेम पात्र में भरूं। जैनेन्द्र पाद अर्च सकल ताप को हरूँ।। हिमवान आदि छह गिरी पे जैनभवन हैं। जो पूजते हैें उनके करें पाप शमन हैं।।१। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। काश्मीरि केशरादि में कर्पूर मिलाया। जिन पादपद्म चर्च मोह ताप मिटाया।।हिमवान.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। कामोद श्याम जीरकादि शालि लाइये। वर पुंज को रचाय, मोक्ष सौख्य पाइये।। हिमवान आदि छह गिरी पे जैन भवन हैं। जो पूजते हैें उनके करें पाप शमन हैं।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। मचवुंâद मालती गुलाब पुष्प लाइये। श्रृंगारहारमारजयी१ को चढ़ाइये।।हिमवान.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। बादाम कलाकन्द मोतीचूर के लाडू। जिनेश को चढ़ाय क्षुधा व्याधि को काटूं।।हिमवान.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। प्रदीप वर्धमान२ ज्योति जगमगात है। तुम पूजते निजात्म ज्योति जगमगात है।।हिमवान.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। कृष्णागरु कर्पूर मिश्र धूप खेइये। आतम गुणों की गंध हेतु नाथ सेइये।।हिमवान .।।७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। एला बदाम पुंग३ चिरोंजी मंगाइया। निज संपदा के हेतु, नाथ को चढ़ाइया।।हिमवान.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। नीरादि अघ्र्य लेय रत्नथाल में भरूं। अक्षयनिधी के हेतु नाथ अर्चना करूँ।। हिमवान आदि छह गिरी पे जैनभवन हैं। जो पूजते हैें उनके करें पाप शमन हैं।।९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिदक्षिणोत्तरदिक्षट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— पद्म सरोवर नीर, सुवरण झारी में भरूं। जिनपद धारा देय, भव वारिधि से उत्तरूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा।। सुवरण पुष्प मंगाय, प्रभु चरणन अर्पण करूं। वर्ण गंध रस फास, विरहित निज पद को वरूं।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -दोहा- पूरब पुष्कर द्वीप के, षट् कुलगिरि अभिराम। पृथक् पृथक् पूजा निमित, पुन पुन करूं प्रणाम।।१।। इति श्रीमंदरमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजिंल क्षिपेत्। —शम्भु छंद— पूरब पुष्कर में हिमवन गिरि, स्वर्णाभ अतुल अभिरामा है। ग्यारह वूâटों में अनुपम इक, जिन सिद्धवूâट परधाना है।। तामध्य पदम द्रह बीच कमल, श्रीदेवी परिकर सह राजे। शाश्वत जिनगृह जिनबिम्ब जजूँ, सब मोह करम अरिदल भाजें।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिहिमवन्पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। रजताभ महाहिमवन गिरि पे, हैं आठ वूâट जन मनहारी। अनुपम इक सिद्धायतन मध्य जिनगेह अकृत्रिम सुखकारी।। द्रह महापद्म मधि कमल बीच, ह्री देवी परिकर सह राजें। शाश्वत जिनगृह जिनबिंब जजूँ, सब मोह करम अरिदल भाजें।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिमहाहिमवन्पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। निषधाचल तप्त कनक कांती, द्रह कहा तिगिंछ कमल बीचे। धृतिदेवी रहती परिकर सह, नववूâटों से अद्भुत दीखें।। सुर सिद्धवूâट वंदें नत हो, मणि मुकुटों से जिनपद चूमें। हम अघ्र्य चढ़ाकर नित पूजें, फिर भव वन में न कभी घूमें।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिनिषधपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नीलाचल छवि वैडूर्यमणी द्रह केसरि मध्य कमल तामें। कीर्ती देवी रहती उसमें इक सिद्धवूâट नव वूâटों में।। मुनि वैरागी भी जा करके, जिनगृह को वंदन करते हैं। जो पूजें उनको भक्ति सहित, वे भव वारिधि से तरते हैं।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिनीलपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। रुक्मी पर्वत चांदी सम है, द्रह पुंडरीक में कमल खिले। बुद्धी देवी परिवार सहित, उसमें रहती मनकमल खिले।। नित आठ वूâट में सिद्धवूâट, जिनभवन अनूपम तामें हैं। हम पूजें अघ्र्य चढ़ा करके, निरुपम सुखसंपति तामें हैं।।५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिरूक्मीपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शिखरी कुलगिरि वंâचन छविमय, ग्यारह वूâटों युत शोभे हैं। महपुंडरीक द्रह के भीतर, पंकज पर लक्ष्मी शोभे हैं।। पर्वत पर है इक सिद्धवूâट, उसमें जिनमंदिर रतनों का। जिनबिंब जजें हम अघ्र्य लिये, जिनभक्ती है भवदधि नौका।।६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिशिखरिपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिंबेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

—पूर्णाघ्र्य-दोहा—

षट् कुल पर्वत के कहे, षट् जिनमंदिर जान। पूजूँ पूरण अघ्र्य ले, मिले भेद विज्ञान।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला —सोरठा— शाश्वत जिन आगार१, पृथ्वीकायिक परिणमें। उनमें जिनवर बिंब, तिनके गुण कीर्तन करूं।।१।। चाल—(हे दीनबन्धु) जयवंत षट् हिमवंत आदि कुलगिरी सारे। जैनेन्द्र मूर्तिमंत अतुल धन धरें प्यारे।। श्री सिद्धवूâट जैनसद्म को प्रणाम है। आनन्द कन्द श्रीजिनन्द को प्रणाम है।।१।। हिमवन गिरी सुचार लाख२ मील का ऊँचा। नग है महाहिमवंत मील आठ लख ऊँचा।। निषधाद्रि सोल लाख मील तुंग कहा है। नीलाद्रि में इसी तरह प्रमाण रहा है।।२।। इन पर्वतों की तलहटी में स्वर्ण वेदियां। उन बीच के उद्यान में हैं वृक्ष पंक्तियाँ।। तोरण कनकमयी हैं देव के भवन बने। वापी तलाब वुंâड वूâट आदि हैं घने।।३।। षट् पर्वतों पे दोय तरफ वेदियां बनीं। उन मध्य रम्य उपवनों की पंक्तियां घनीं।। इन उपरि ग्यारे आठ नौ नौ आठ ग्यार हैं। क्रम से कहे ये वूâट जो कि रत्नसार१ हैं।।४।। नग बीच द्रहों में असंख्य कमल खिले हैं। जो पृथ्वीकायिक मणिमयी सौगंध्य मिले हैं।। श्री आदि देवियां वहां परिवार समेता। जिनमात की सेवा के लिये बद्ध हमेशा।।५।। प्रत्येक कमल में सुरों के महल बने हैं। प्रत्येक में जिनधाम सदा पाप हने हैं।। षट् पर्वतों पे एक एक सिद्धवूâट हैं। उनमें जिनेशगेह में जैनेन्द्र रूप हैं।।६।। सौ इन्द्र सपरिवार विभव साथ ले आवें। दर्शन करें वंदन करें आनन्द से भावें।। पूजा करें संगीत औ नर्तन करें सदा। इन्द्राणियां औ अप्सरा भी नृत्यतीं मुदा।।७।। खग नारियां खेचर वहां पे भक्ति करे हैं। भूचर२ मनुज विद्या के बल से दर्श करे हैं।। चारण ऋषी आकाशगमन कर वहां जाते। जिनवंदना करें निजात्म ध्यान लगाते।।८।। कलिकाल में जाने की वहां शक्ति नहीं है। अतएव मैं परोक्ष में ही भक्ति लही है।। हे नाथ! कृपादृष्टि मुझ पे आज कीजिये। संसार महासिंधु से उबार लीजिये।।९।। —घत्ता— जय जय जिनराजा, धर्म जिहाजा, जो तुम गुण कीर्तन करहीं। सो ‘ज्ञानमती’ वर शिवलक्ष्मी धर, झट जिनगुण संपति वरहीं।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषट्कुलाचलस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिंबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ३६) मन्दरमेरु संबंधि चार गजदंत जिनालय पूजा —अथ स्थापना—अडिल्ल छंद— मंदरमेरू विदिश चार गजदंत हैं। तापे शाश्वत जैनभवन विलसंत हैं।। इन्द्रादिक नित आय, झुकाते माथ को। आह्वानन कर पूजूँ, शिवतिय नाथ को।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। अथाष्टवंâ—रोला छंद—(अहो जगत गुरुदेव) रेवा नदी सुतीर्थ, सलिल भर वंâचन झारी। जन्म जरा अरु मरण, ताप नाशो गुणधारी।। मंदरमेरू पास, चार गजदंत कहे हैं। ताके जिनगृह पूज, समकित रतन गहे हैं।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयागिरि घनसार, सौरभ अति गुंजारे। रोग शोक हर नाथ, पदयुग जजूँ तुम्हारे।।मंदरमेरू.।।२। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। चन्द्र किरण समश्वेत, तंदुल धोय चढ़ाए। रत्नत्रय निधि हेतु, पूूजूँ मन हरषाए।।मंदरमेरू.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। परिजात अरविंद, वुंâद प्रसून चढ़ाऊँ। मकरकेतुजितनाथ१, हरष हरष गुण गाऊं।।मंदरमेरू.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। घृत शर्वâर क्षीरान्न, घेवर मोदक लीने। शक्ति अनंत जिनेश, तुम पद पूजन कीने।।मंदरमेरू.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। हेमपात्र घृतपूर, ज्योति उद्योत करे है। मन मंदिर का मोह, नाश उद्योत करे है।।मंदरमेरू.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगर तगर वर धूप, चहुँदिश धूम करे है। कर्म कलंक जलाय, क्षण में सौख्य भरे है।।मंदरमेरू.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। जंभीरी नारंग, दाडिम आम्र मंगाये। उत्तम शिवफल हेत, जिनवर चरण चढ़ाये।।मंदरमेरू.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल गंधाक्षत पूâल, नेवज दीप जलाके। धूप फलों से पूर्ण, अघ्र्य चढ़ाऊं आके।।मंदरमेरु.।।९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदन्तस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— क्षीरोदधि उनहार, उज्ज्वल जल ले भृंग में। श्री जिनचरण सरोज, धारा देते भव मिटे।।१०।। शांतये शांतिधारा। सुरतरु के सुम लेय, प्रभु पद में अर्पण करूँ। कामदेव मद नाश, पाऊँ आनंद धाम मैं।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—सोरठा— पूर्व सुपुष्कर द्वीप, चारों में विदिशा कहे। चार गिरी गजदंत, तिनके जिनमंदिर जजूं।।१।। इति श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्गजदंतपर्वतस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —अडिल्ल छंद— मंदरमेरु महान विदिश आग्नेय है। हस्तिदंत सौमनस रजत छवि देय है।। मीनकेतु जितनाथ जिनालय मणिमयी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय चहूँ गुण शिवमयी।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधि-आग्नेयदिक्स्थितसौमनसगजदन्तपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुरगिरि चौथे भूमि विदिश नैऋत्य है। विद्युत्प्रभ गजदंत कनक छवि देय है।। मीनकेतु जितनाथ जिनालय मणिमयी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय चहूँ गुण शिवमयी।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिनैऋत्यविदिक्स्थितविद्युत्प्रभगजदन्तसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। गंधमादनाचल वायव्य विदिश कहा। कनक कांतिमय अकृत्रिम अनुपम रहा।।

मीनकेतु जितनाथ जिनालय मणिमयी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय चहूँ गुण शिवमयी।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिवायव्यविदिक्स्थितगंधमादनगजदन्तपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। माल्यवंत गजदंत, विदिश ईशान में। नीलमणी सम कांति, वूâट नव तास में।। मीनकेतु जितनाथ जिनालय मणिमयी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, चहूँ गुण शिवमयी।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधि-ईशानविदिक्स्थितमाल्यवंतगजदन्तपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य— चार कोण में चार कहे गजदंत जो। हस्तिदंत सम लम्बे हैं अन्वर्थ जो।। उनपे श्री जिनमंदिर अनूपम राजते। जिनप्रतिमा को पूजत ही दुख भाजते।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिचतुर्विदिक्स्थितचतुर्गजदन्तपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य परिपुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला —सोरठा— गजदंतों के चार, जिनचैत्यालय शासते। तिनकी गुण मणिमाल, मैं अब गाऊँ भाव से।।१।। —रोला छंद— जय जय मंदरमेरु, विदिशा के गजदंता। जय जय श्री जिनगेह, भव भव पाप हरंता।। जय जय सौमनसाद्रि, विद्युत्प्रभ अभिरामा। निषधाचल अर मेरु संस्पर्शे शुभ नामा।।२।। गंधमादनो नाम, माल्यवान अभिरामा। नीलगिरी अर मेरु संस्पर्शे गुण धामा।। प्रथम तृतिय पर सात, वूâट मनोहर सोहें। दुतिय चतुर्थे माहिं, नव नव हैं मन मोहे।।३।। मेरु निकट के वूâट सिद्धायतन कहे हैं। उनमें श्री जिनगेह, शाश्वत सिद्ध रहे हैं।। शेष वूâट पे रम्य, देवों के गृह माने। देवगृहों के मध्य, श्री जिनभवन बखाने।।४।। नग के दोनों ओर, रम्य तलहटी जानो। उपवन वेदी छोर, मणिमय तोरण मानो।। गिरि ऊपर दो ओर, वेदी उपवन सोहें। वापी तरुवर पंक्ति, सुरनर के मन मोहें।।५।। चारण ऋषिगण आय, जिन स्तवन करे हैं। आतम ध्यान लगाय, अन्तद्र्वंद हरे हैं।। अकृत्रिम जिनबिंब, वंदे पाप नशावें। परमान्द पियूष, पीकर निज सुख पावें।।६।। स्वर्गपुरी से नित्य, सुर-सुरललना आके। वीणा आदि बजाय, नृत्य करें गुण गाके।। विद्याधर नर नार, जिनवर स्तुति पढ़े हैं। मोह महारिपु मार, शिव सोपान चढ़े हैंं।।७।। वीतराग जिनमूर्ति निरख निरख हरषाते । भविजन तुम गुण गाय निज मन कमल खिलाते।। ग्रन्थों के विस्तार, तुम गुणमाल कहें हैं। गणधर भी गुण रत्न, गणत न पार लहें हैं।।८।। इस विध सुन तुम कीर्ति, मैंने शरण लही है। जो कुछ हो कत्र्तव्य, करिये आज वही है।। हे प्रभु! तुमको छोड़ और नहीं मुझ स्वामी। जो चाहो सो नाथ! करिये अंतरयामी।।९।। मुझको कुछ ना चाह, एक यही अब चाहूं। सब संकल्प विकल्प, तज तेरे गुण गाउँâ।। हे देवों के देव, करो कामना पूरी। तुम त्रिभुवन के नाथ! रहे न बात अधूरी ।।१०।। —घत्ता— तुम गुणमणिमाला, जगप्रतिपाला, जो भविजन वंâठे धरहीं। सो ‘ज्ञानमती’ ले, निज संपति ले, तत्क्षण भवसागर तरहीं।।११।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिविदिक्स्थितचतुर्गजदंतपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ३७) मन्दरमेरु सम्बन्धी पुष्करतरु शाल्मलितरु जिनालय पूजा —अथ स्थापना—नरेन्द्र छंद— पुष्करतरु से अंकित पुष्कर, द्वीप जु सार्थक नामा। सुरगिरि के दक्षिण-उत्तर में, भोगभूमि अभिरामा।। उत्तरकुरु ईशान कोण में, पद्मवृक्ष मन मोहे। देवकुरू नैऋत में शाल्मलि, तरु पे सुरगण सोहें।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। अथाष्टवंâ—लक्ष्मीधरा छंद—(नाथ तेरे कभी होते...) तीर्थवारी महास्वच्छ झारी भरी। तीर्थकर्तार के पाद धारा करी।। दो तरू शाख पे दोय जिनमंदिरा। पूजते जो उन्हें लेय शिव इंदिरा१।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। स्वर्णद्रव के सदृश वुंâकुमादी लिये। राग की दाह को मेटने पूजिये।।दो तरू.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। सोम१ रश्मी सदृश श्वेत अक्षत लिये। आत्मनिधि पावने पुंज रचना किये।। दो तरू शाख पे दोय जिनमंदिरा। पूजते जो उन्हें लेय शिव इंदिरा।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। कुन्द मंदार मल्ली सुमन ले लिये। मारहर२ नाथ पादाब्ज में अर्पिये।।दो तरू.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य:पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। गूझिया औ तिकोने भरे थाल में। भूख व्याधी हरो नाथ पूजूँ तुम्हें।।दो तरू.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। प्रज्वलित दीप लेके करूं आरती। चित्त में हो प्रगट ज्ञान की भारती।।दो तरू.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: दीपंं निर्वपामीति स्वाहा। धूप दशगंध ले अग्नि में खेवते। मोह शत्रू जले आप पद सेवते।।दो तरू.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। आम नींबू नरंगी सु अंगूर हैं। पूज लें आत्मपीयूष को पूर हैं।।दो तरू.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। नीर गंधादि ले स्वर्ण थाली भरूँ। नाथ पद पूजते सर्वसिद्धी वरूं।।दो तरू.।।९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करवृक्षशाल्मलीवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— यमुना सरिता नीर, वंâचन झारी में भरा। जिनपद धारा देत, शांति करो सब लोक में।।१०।। शांतये शांतिधारा। वकुल कमल अरविंद, सुरभित पूâलों को चुने। जिनपद पंकज अप्र्य, यश सौरभ चहुँ दिश भ्रमे।।११। दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—सोरठा— पृथ्वीकायिक वृक्ष, सर्वरत्नमय सोहने। ताके श्रीजिन सद्म, मन वच तन से पूजहूँ।।१।। इति श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करशाल्मलिवृक्षस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —नरेन्द्र छंद— मंदरमेरू से इशान में पद्मवृक्ष१ रत्नों का। उसकी उत्तर शाखा पे है, जिनमंदिर भव नौका।। जलगंधादिक अघ्र्य सजाकर, नितप्रति पूज रचाऊँ। परम अतीन्द्रिय ज्ञान सौख्यमय, अविचल पद को पाऊँ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिईशानकोणे पुष्करवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुरगिरि के नैऋत्य कोण में, शाल्मली तरु जानो। उसकी दक्षिण शाखा पर, जिनगेह अकृत्रिम मानो।। जलगंधादिक अघ्र्य सजाकर, नितप्रति पूज रचाऊँ। परम अतीन्द्रिय ज्ञान सौख्यमय, अविचल पद को पाऊँ।।।।२। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिनैऋत्यकोणे शाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य-दोहा— पुष्कर शाल्मलि वृक्ष के, अमित१ वृक्ष परिवार। तिन सबके जिनगेह को, पूजूँ भवदधि तार।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपुष्करशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला —सोरठा— स्वयंसिद्ध जिनराज, अकृत्रिम जिनगेह में। पूर्ण करो मम आश, गाऊँ अब जयमालिका।।१।। तोटक छंद (चाल—जय केवल भानु....) जय पुष्कर वृक्ष महाफलदं, जय शाल्मलि वृक्ष महासुखदं। जय वृक्ष तने जिनमंदिर को, जय सिद्धिवधू प्रिय जिनवर को।।२।। तरु में मरकतमणि नीलम के, कर्वेâतन स्वर्णमयी पत्ते। बहुवर्ण रतनमय अंकुर हैं, रतनों के फल औ पुष्प कहे।।३।। तरु सिद्ध अनादि अनंत कहे, तहं चामर िंककणि आदि रहें। अति तुंग सघन द्रुम शोभ रहे, शुभ वायु चले हिलते तरु हैं।।४।। इन शाख विषे जिनमंदिर जी, महिमा वरणंत पुरंदर२ जी। सुर इंद्र नरेंद्र फणीन्द्र सदा, गुण गावत भक्ति भरे सु मुदा।।५।। जिननाथ! त्रिलोक पिता तुम हो, तुमही भववारिधि तारक हो। बिन कारण बंधु तुम्हीं प्रभु हो, तिहुंलोक तने तुमही गुरु हो।।६।। तुम शंकर विष्णु विधी तुम ही, तुम बुद्ध हितंकर ब्रह्म तुम्हीं। भुवनैक शिरोमणि देव तुम्हीं, शरणागत रक्षक देव तुम्हीं।।७।। तुम ज्योति चिदंबर मुक्तिपती, तुम पूर्ण दिगंबर विश्वपती। सरवारथसिद्धि विधायक हो, समता परमामृत दायक हो।।८।। तुम भक्त मनोरथ पूर्ण करें, क्षण में निज संपति पूर्ण भरें। यमराज महाभट चूर्ण करें, वर ‘ज्ञानमती’ सुख तूर्ण वरें।।९।। —घत्ता— तुम जिनवर भास्कर, कर्म भरम हर, शिव संपति कर शरण लही। जो तुम गुणमाला, पढ़े रसाला, सो पावहिं शिव सौख्य मही।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिधातकीशाल्मलिवृक्षस्थितजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ३८) मन्दरमेरु संबंधि सोलह वक्षार जिनालय पूजा अथ स्थापना—गीता छंद मंदरगिरी के पूर्व पश्चिम, सीत सीतोदा बहें। उनके उभय तट की तरफ, वक्षार सोलह हैं कहें।। स्वर्णाभतनु गिरि पे जिनेश्वर, भवन सोलह जानिये। आह्वानना करके सदा, जिनदेव पूजन ठानिये।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् —अथाष्टवंâ—तोटक छंद— पद्माकर१ नीर भरे कलसा, पद पंकज धार करूं हरसा। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयागिरि चंदन स्वर्णसमा, जिनपाद जजूँ नित माथ नमा। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। सित अक्षत चंद्र समान लिये, प्रभु पुंज करूं तुम संमुख ये। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। मचवुंâद गुलाब, जुही सुमना, मदनारिजयी को जजूँ सुमना। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। घृत पूरित मालपुआदि लिये, क्षुधरोग विनाश करो प्रभु ये। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। मणि दीप कपूर जले उसमें, जिनपूजत मोह नशे क्षण में। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। दशगंध हुताशन१ संग जले, अरि कर्म चमू२ भयवंत टले। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फल आम्र अनार सुथाल भरे, फल उत्तम इच्छित सौख्य भरे। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जल आदिक द्रव्य लिये कर में, तुम पूजत इष्ट लहूँ वर मैं। वक्षारगिरी जिन सद्म जजूँ, भव व्याधि हरो पद पद्म भजूं।।९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— सीतानदी सुनीर, जिनपद पंकज धार दे। वेग हरूं भवपीर, शांतीधारा शांतिकर।।१०।। शांतये शांतिधारा।। बेला कमल गुलाब, चंप चमेली ले घने। जिनवर पद अरविंद, पूजत ही सुख संपदा।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य —दोहा— परमानंद पयोधि में, मग्न रहें जिनराज । तिनकी पूजा हेतु मैं, सुमन चढ़ाऊँ आज।।१।। इति श्रीमंदरमेरुसंबंधिवक्षारनगस्थाने मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —नरेन्द्र छंद— मंदरमेरू सीतानदि के, उत्तर में वक्षारा। भद्रसाल वेदी के सन्निध ‘‘चित्रवूâट’’ अति प्यारा।। तापर चार वूâट नदि सन्निध, सिद्धवूâट मनहारी। श्री वैâवल्यरमा वरने को, नित पूजूँ सुखकारी।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थितचित्रवूâटवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘‘पद्मवूâट’’ वक्षार दूसरा, वन उपवन से सोहे। सुर किन्नर गन्धर्व खगेश्वर, जिन गुण गाते सोहें।। मृत्युंजयि की प्रतिमा राजे, सिद्धवूâट मनहारी। श्री वैâवल्यरमा वरने को, नित पूजूँ सुखकारी।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थितपद्मवूâटवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘‘नलिनवूâट’’ वक्षार अचल है, अनुपम निधि को धारे। देव देवियाँ भक्ति भाव से, आ जिन सुयश उचारें।। कर्मविजयि १ की प्रतिमा उसमें, सिद्धवूâट मनहारी। श्री वैâवल्यरमा वरने को, नित पूजूँ सुखकारी।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थितनलिनवूâटवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘‘एकशैल’’ वक्षार अचल पे, अगणित भविजन आते। सम्यक्रत्न हाथ में लेते, जिनवर के गुण गाते।। मृत्युंजयि की प्रतिमा सुन्दर, सिद्धवूâट मनहारी। श्री वैâवल्यरमा वरने को, नित पूजूँ सुखकारी।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थितएकशैलवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतानदि के उत्तर में, जो देवारण्य समीपे। गिरि वक्षार ‘‘त्रिवूâट’’ नाम का, कनक वर्णमय दीपे।। ता पर चार वूâट नदि पासे, सिद्धवूâट मनहारी। श्री वैâवल्यरमा वरने को, नित पूजूँ सुखकारी।।५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थितत्रिवूâटवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वक्षाराचल नाम ‘‘वैश्रवण’’ शोभे सुरभवनों से। इन्द्रचक्रवर्ती धरणीपति, पूजें नित रतनोें से।। मृत्युंजयि की प्रतिमा सुन्दर, सिद्धवूâट मनहारी। श्री वैâवल्यरमा वरने को, नित पूजूँ सुखकारी।।६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थितवैश्रवणवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अंजन’ नग वक्षार मनोहर शाश्वत सिद्ध कहा है। सुरललनायें क्रीड़ा करतीं, अद्भुत ऋद्धि जहाँ है।। मृत्युंजयि की प्रतिमा सुन्दर, सिद्धवूâट मनहारी। श्री वैâवल्यरमा वरने को, नित पूजूँ सुखकारी।।७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थितअंजनवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आत्मांजन’ वक्षार आठवां, सुर किन्नर मिल आवें। जिनमहिमा को समझ समझकर, समकित ज्योति जगावें।।मृत्युं.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपूर्वविदेहस्थितआत्मांजनवक्षारपर्वतसिद्धवूâट-जिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अपर विदेह नदी सीतोदा, दक्षिण दिश में जानोे। भद्रसाल ढिग वक्षाराचल, ‘श्रद्धावान’ बखानो।। मृत्युंजयि की प्रतिमा सुन्दर, सिद्धवूâट मनहारी। श्री वैâवल्यरमा वरने को, नित पूजूँ सुखकारी।।९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थितश्रद्धावान्वक्षारपर्वतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘विजटावान’ अचल सुन्दर है, वेदी उपवन तापे। इंद्र नमन करते मणियों युत, विलसत मुकुट झुकाके।।मृत्युं.।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थितविजटावान्वक्षारपर्वतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘आशीविष’ वक्षार अकृत्रिम, द्रुमपंक्तीवन सोहे। विद्याबल से श्रावकगण आ, पूजन कर मल धोवें।।मृत्युं.।।११।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थित-आशीविषवक्षारपर्वतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अचल ‘सुखावह’ सुख को देता, जो जिन गुण आलापे। गगनगमनचारी ऋषियों के, पावन युगल वहाँ पे।।मृत्युं.।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थितसुखावहवक्षारपर्वतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतोदा के उत्तर तट पे, भूतारण्य समीपे। ताके सन्निध ‘‘चन्द्रमालगिरि’’, रचना अद्भुत दीपे।।मृत्युं.।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थितचन्द्रमालवक्षारपर्वतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘सूर्यमाल’ वक्षार सूर्य सम, सुवरण आभा धारे। सुरवनिताएँ नित आ आकर, जिनवर कीर्ति उचारें।।मृत्युं.।।१४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थितसूर्यमालवक्षारपर्वतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नागमाल’ वक्षार अनूपम, विद्याधरगण आवें। जन्म जन्म दु:ख नाशन कारण, जिनवर के गुण गावें।।मृत्युं.।।१५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थितनागमालवक्षारपर्वतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘देवमाल’ वक्षार गिरी पे, देव देवियां आके। वीणा ताल मृदंग बजा कर, नृत्य करें हर्षाके ।।मृत्युं.।।१६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिपश्चिमविदेहस्थितदेवमालवक्षारपर्वतसिद्ध-वूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य—अडिल्ल छन्द— मंदरमेरू के पूरब पश्चिम विषे। सोलह गिरि वक्षार अकृत्रिम नित दिसें।। ताके सोलह जिनमंदिर पूजों सदा। रोग शोक दु:ख दारिद निंह होवे कदा।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिन-बिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:। जयमाला —दोहा— भवविजयी जिनराज हैं, भव संकट हरतार। भविजन तुम गुण गायके, होते भवदधि पार।।१।। -शम्भु छन्द- जय जय मंदरमेरू चौथा, ताके पूरब दिश सीता है। जय जय सुरगिरि के पश्चिम दिश, सीतोदा नदी सुगीता है।। दोनों नदि के दक्षिण उत्तर, हैं चार चार वक्षारगिरी। नदि कहीं विभंगा मध्य-मध्य, जो द्वादश हैं जल स्वच्छ भरी।।२।। इन पर्वत और नदी के मधि, वर क्षेत्र विदेह कहाते हैं। ये अंतराल के क्षेत्र सभी, बत्तीस गिनाए जाते हैं।। इन सबमें आरजखंड कहे, उनमें तीर्थंकर होते हैं। चक्री बलदेव हरी प्रतिहरि, ये महापुरुष नित होते हैं।।३।। वक्षार गिरी हैं सब सोलह, जो कनकवर्ण आभाधारी। सब में हैं वूâट सुचार चार, मणि वंâचनमय शोभाकारी।। प्रत्येक गिरी पर नदी निकट, जो सिद्धवूâट कहलाता है। उसमें अकृत्रिम स्वयंसिद्ध, जिनमंदिर शोभा पाता है।।४।। जिनभवनों में जिनप्रतिमायें, हैं शाश्वत सिद्ध कही जातीं। बहु रत्नों की सुन्दर आकृति, छवि वीतराग मन को भाती।। रत्नों के सिंहासन ऊपर, प्रतिमा पद्मासन से राजें। भामंडल की कांती ऐसी, जिससे कोटी सूरज लाजेें।।५।। मणि मुक्ता लटक रहीं जिनमें, त्रय छत्र फिरें महिमाशाली। ढोरें नित चौंसठ चमर यक्ष, निर्झर तम श्वेत चमकशाली।। वसु मंगल द्रव्य अनूपम हैं, मंगल घट धूप घड़े शोभें। मणि वंâचन की मालायें औ, पुष्पों की माला मन लोभें।।६। मानस्तंभों में जिनमूर्ती, दर्शन कर मान गलित होवे। सब अद्भुत रचना रत्नमयी, दर्शक का मिथ्या मल धोवे।। प्रतिमंदिर इक सौ आठ बिंब, सब पाप कलाप नशाते हैं। मुक्तीलक्ष्मी के प्रिय वल्लभ, सबको शिवमार्ग दिखाते हैं।।७।। जो दर्शन पूजन करते हैं, वे रत्नत्रय निधि पाते हैं। जो वंदन करें परोक्ष सदा, वे भी स्वातम सुख पाते हैं।। बस नाथ! सुयश तुम सुन करके, चरणों में आन पुकारा है। अब मुझको भी प्रभु पार करो, बस तेरा एक सहारा है।।८।। —घत्ता— सब कर्म निवंâदा, हर भव पंâदा, आनंदवंâदा जो ध्यावें। निज ‘ज्ञानमती’ कर, निज संपति भर, मुक्तिरमा वर सुख पावें।।९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरुसंबंधिषोडशवक्षारपर्वतस्थितषोडशसिद्धवूâटजिना-लयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ३९) मन्दरमेरु संबंधि चौंतीस विजयार्ध जिनालय पूजा —अथ स्थापना—गीता छंद— वर अर्ध पुष्करद्वीप में, जो मेरु मंदर नाम है। ताके सुपूरब अपर में, बत्तीस देश ललाम हैं।। दक्षिण सु उत्तर भरत ऐरावत कहे जो क्षेत्र हैं। चौंतीस इनके मध्य रूपाचल अकृत्रिम देह हैं।।१।। —दोहा— इनके चौंतिस जिनभवन, जिनप्रतिमा गुणखान। थापूं भक्ति समेत मैं, करो सकल कल्याण।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरो:पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरो:पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वत-स्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरो:पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्ध-पर्वतस्थितसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। —अथाष्टवंâ—नाराच छंद— (चाल—पाश्र्वनाथ देव सेव....) तीर्थरूप शुद्ध स्वच्छ सिंधु नीर लाइये। गर्भवास दु:ख नाश आप को चढ़ाइये।। रूप्य अद्रि के जिनेन्द्र, गेह पूजते चलो। रोग शोक नाश के, अखंड सौख्य ले भलो।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। वुंâकुमादि अष्टगंध, से जिनेन्द्र पूजिये। राग आग दाह नाश, पूर्ण शांत हूजिये।।रूप्य अद्रि.।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। चन्द्र तुल्य श्वेत शालि, पुंज को रचाइये। देह सौख्य छोड़ आत्म, सौख्य पुंज पाइये।।रूप्य अद्रि.।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। वुंâद केतकी गुलाब, वर्ण वर्ण के लिए। मारमल्लहारि१ तीर्थनाथ चर्ण में दिये।।रूप्य अद्रि.।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। खीर पूरिका जलेबियाँ भराय थाल मेें। आप पाद पूजते क्षुधा महाव्यथा हने।।रूप्य अद्रि.।।५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीप में कपूर ज्योति अंधकार को हने। आरती करंत अंतरंग ध्वांत को हने।।रूप्य अद्रि.।।६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप गंध लेय अग्निपात्र में जलाइये। मोह कर्म भस्म को, उड़ाय सौख्य पाइये।।रूप्य अद्रि.।।७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। मातुलिंग२ आम्र सेव सन्तरा मंगाइये। आप पूजते हि सिद्धि संपदा सुपाइये।।रूप्य अद्रि.।।८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। नीर गंध अक्षतादि अघ्र्य को बनाइये। मुक्ति अंगना निमित्त नाथ को चढ़ाइये।। रूप्य अद्रि के जिनेन्द्र, गेह पूजते चलो। रोग शोक नाश के, अखंड सौख्य ले भलो।।९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतस्थितसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —सोरठा— गंगनदी को नीर, तुम पद में धारा करूं। शांति करो जिनराज, चउसंघ को सबको सदा।।१०।। शांतये शांतिधारा।। कमल केतकी पूâल, हर्षित मन से लायके। जिनवर चरण चढ़ाय, सर्व सौख्य संपति बढ़े।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। —अथ प्रत्येक अघ्र्य—सोरठा— बत्तिस क्षेत्र विदेह, भरतैरावत एक इक। सब चौंतिस जिनगेह, पुष्पांजलि कर पूजहूँ।।१।। इति श्रीमंदरमेरुसंबंधिविजयार्धपर्वतस्थाने मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। —गीताछंद– मंदर सुमेरू पूर्व में सीता नदी के उत्तरे। वन भद्रसाल समीप ‘कच्छा’ देश अति सुन्दर शरे।। तामध्य रूपाचल अतुल नववूâट से मन को हरे। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थकच्छादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अनुपम ‘सुकच्छा’ देश में, षट् खंड रचना जानिये। तामध्य विजयारध अतुल बहुभांति महिमा मानिये।। विद्याधरी वीणा बजाकर, भक्ति भर पूजा करें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थसुकच्छादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुंदर ‘महाकच्छा’ कहा, तामध्य रूपाचल सही। वन वेदिका वापी सुरों के, गेह की अनुपम मही।। मुनिवृंद करते वंदना, निज कर्म कलिमल को हरें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थमहाकच्छादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘कच्छकवती’ सुविदेह में, रचना अकृत्रिम जानिये। तामध्य रूपाचल अतुल, नववूâट संयुत मानिये।। आकाशगामी ऋषि मुनी, श्रावक सदा भक्ती करें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थकच्छकावतीदेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर देश ‘आवर्ता’ सरस, तामध्य विजयारध गिरी। गाते जिनेश्वर का सुयश नित, यक्ष किन्नर किन्नरी।। शाश्वत जिनालय वंदना, करते भविक भक्ती भरें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थआवर्तादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। है क्षेत्र ‘लांगलिवर्तिका’ भविजन सदा जन्में वहां। भव बल्लियों को काट कर, शिव प्राप्त कर सकते वहां।। इस मध्य रजताचल सुखद, बहु भव्य के कल्मष हरें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थलांगलावर्तादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। धन धान्य पूरित संपदा यह ‘पुष्कला’ वर देश है। जिस मध्य रूपाचल कहा, हरता भविक मन क्लेश है।। देवांगनायें नित मधुर संगीत जहँ पर उच्चरें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थपुष्कलादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘पुष्कलावति’ देश में, विजयार्ध बीचोंबीच है। नववूâट में इक जिनसदन१, नाशे भविक भव कीच है।। स्वात्मैक परमानंद अमृत, के रसिक गुण विस्तरें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थपुष्कलावतीदेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘वत्सा’ विदेह अतुल्य ता मधि, आर्यखंड निरापदा। इस देश के बस बीच में है, रूप्यगिरि वर शर्मदा२।। त्रैलोक्यनायक के गुणों की, कीर्ति बुधजन विस्तरें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थवत्सादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुन्दर ‘सुवत्सा’ देश में शाश्वत रजतगिरि सोहना। नववूâट रत्नों के बने, सुरसद्म से मन मोहना।। सुर अप्सरा मर्दल सुवीणा, को बजा नर्तन करें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।१०।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थसुवत्सादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मनहर ‘महावत्सा’ विषे, विजयार्ध पर्वत सोहता। गंधर्व देवों के मधुर संगीत, से मन मोहता।। मुनि वीतरागी के तहां, ध्यानाग्नि से भव वन जरें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।११।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थमहावत्सादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘वत्सकावति’ देश में, रूपादि अनुपम मानिये। विद्याधरों की पंक्तियों से, भीड़ तहँ पर जानिये।। इन्द्रादिगण आके वहां, मणिमौलि नत वंदन करें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।१२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थवत्सकावतीदेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर देश ‘रम्या’ मध्य में, रजताद्रि रत्नों की खनी। भव के विजेता नाथ की, महिमा जहां अतिशय घनी।। सौ इन्द्र मिल कर पूजने को, आ रहे भक्ती भरे । श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।१३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थरम्यादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सुंदर ‘सुरम्या’ देश में, विजयार्ध पर्वत सोहना। किन्नर गणों की बांसुरी, ध्वनि से मधुर मन मोहना।। वर ऋद्धिधारी मुनि तहां, बहुभक्ति से विचरण करें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।१४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थसुरम्यादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शुभदेश ‘रमणीया’ विषे, विजयार्ध गिरि रजताभ१ है। विद्याधरों की श्रेणियां, जिनमंदिरों से सार्थ हैं।। नग तीन कटनी से सहित, बहु भांति की रचना धरें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।१५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थरमणीयादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। वर ‘मंगलावति’ देश में, रजताद्रि बीचोंबीच है। जो जन नहीं श्रद्धा करें, रूलते सदा भव बीच हैं।। खगपति१ सदा परिवारयुत, जिनवर सुयश वर्णन करें। श्री सिद्धवूâट जिनेन्द्र मंदिर, पूज शिवलक्ष्मी वरें।।१६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपूर्वविदेहस्थमंगलावतीदेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —रोला छंद— मंदरमेरू अपर, नदी के दक्षिण जानो। भद्रसाल के पास, ‘पद्मा’ देश बखानो।। मध्य अचल विजयार्ध जिनगृह से सुखकारी। पूजूँ अघ्र्यं चढ़ाय, भव भव दुख परिहारी।।१७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थपद्मादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुपद्मा’ जान, मधि रजताद्रि बखाना। अनुपम सुख की खान, खेचरपति से माना।। सिद्धवूâट ता मािंह जिनमंदिर सुखकारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, भव भव दुख परिहारी।।१८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसुपद्मादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘महापद्मा’ सुविदेह, रजताचल अभिरामा। नववूâटों युत श्रेष्ठ, सुर गावें जिन नामा।। सिद्धवूâट ता मािंह जिनमंदिर सुखकारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, भव भव दुख परिहारी।।१९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थमहापद्मादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘पद्मकावती’ तामधि रजतगिरी है। कनक रतन से पूर्ण अविचल सौख्यश्री है।। सिद्धवूâट ता मािंह, जिनमंदिर सुखकारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, भव भव दुख परिहारी।।२०।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थपद्मकावतीदेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शंखा’ देश विदेह देव असंख्य वहां पे। आते रहते नित्य प्रमुदित चित्त तहां पे।। ताके मधि विजयार्ध, जिनगृह से सुखकारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, भव भव दुख परिहारी।।२१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थशंखादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘नलिना’ देश विदेह, भव्य नयन मन मोहे। ताके मधि विजयार्ध नववूâटों युत सोहे।। सिद्धवूâट ता मािंह, जिनमंदिर सुखकारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, भव भव दुख परिहारी।।२२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थनलिनादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘कुमुदा’ देश विदेह, मध्य रजतगिरि सोहे। भविमन कुमुद विकास, चन्द्र किरण सम सोहे।। सिद्धवूâट ता मािंह, जिनमंदिर सुखकारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, भव भव दुख परिहारी।।२३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थकुमुदादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘सरिता’ देश सुमध्य, अनुपम रजतगिरी है। जिनवच सरिता तत्र, भविमन पंक हरी है।।सिद्ध.।।२४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसरितादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। सीतोदा नदि जान, ताके उत्तर भागे। ‘वप्रा’ देश महान, रूपाचल मधि भागे।। सिद्धवूâट ता मािंह, जिनमंदिर सुखकारी। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय, भव भव दुख परिहारी।।२५।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थवप्रादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुवप्रा’ रम्य, तामधि रजतगिरी है। सुर ललनायें नित्य, आवें भक्ति भरी हैं।।सिद्ध.।।२६।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसुवप्रादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘महावप्रादेश’ तामें रहें नगेशा। जिनगुण गाते नित्य, ब्रह्मा विष्णु महेशा।।सिद्ध.।।२७।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थमहावप्रादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘वप्रकावती’ रजताचल मधि धारे। मुनिगण जिनवर दर्श, करते सुयश उचारें।।सिद्ध.।।२८।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थवप्रकावतीदेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधा’ देश विदेह, रूपाचल से सोहे। स्वातम रस पीयूष, पीके मुनि शिव जोहें।।सिद्ध.।।२९।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थगंधादेशस्थितविजयार्धपर्वत-सिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘सुगंधा’ रम्य, जिनवच सुरभि वहां है। जन मन होत सुगंध, नग विजयार्ध वहां है।।सिद्ध.।।३०।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थसुगंधादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। देश ‘गंधिला’ जान, जन मन कमल खिलावे। मध्य रजत नग सिद्ध, जिनवच सुधा पिलावे।।सिद्ध.।।३१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थगंधिलादेशस्थितविजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘गंधमालिनी’ देश, मधि रजताद्रि तहां है। श्रद्धावंत मलंत, का सम्यक्त्व वहाँ है।।सिद्ध.।।३२।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिपश्चिमविदेहस्थगंधमालिनीदेशस्थितविज-यार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —कुसुमलता छंद— पूरब पुष्कर द्वीप अर्ध मेें, ‘भरतक्षेत्र’ दक्षिण दिश जान। बीचोंबीच कहा विजयारध, तिस ऊपर नव वूâट महान।। इनमें से इक सिद्धवूâट पर, जिनमंदिर अविचल अभिराम। गर्भवास दुख नाशन कारण, अघ्र्य चढ़ाय करूं परणाम।।३३।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिभरतक्षेत्रस्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। मंरदमेरू के उत्तर दिश, ‘ऐरावत’ वर क्षेत्र महान। मध्य रजतगिरि चांदी सम है, त्रय कटनी युत अतुल निधान।। तिस पर सिद्धवूâट में जिनगृह, अकृत्रिम अनुपम सुखकार। पुनर्जन्म दु:ख नाशन हेतू, अघ्र्य चढ़ाय जजूँ रुचि धार।।३४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थितविजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिना-लयस्थजिनबिम्बेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। —पूर्णाघ्र्य— मंदरमेरू के पूरब औ, पश्चिम दिश बत्तीस विदेह। दक्षिण अरु उत्तर दिश में हैं, भरतक्षेत्र ऐरावत एह।। इन सबके मधि रजतगिरी हैं, चौंतिस रजतवर्ण उनहार। सबके इक-इक चैत्यालय को, अघ्र्य चढ़ाय नमूं गुणधार।।१।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरो: पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्ध-पर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थजिनबिम्बेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य—ॐ ह्रीं अर्हं शाश्वतजिनालयस्थसर्वजिनबिंबेभ्यो नम:। जयमाला —दोहा— दर्श ज्ञान सुख वीर्य ये, चार अनंत प्रमाण। मेरे भी गुण पूरिये, चहुँगति से कर त्राण।।१।। —सखी छंद—(चाल—आलोचना पाठ)— पुष्कर वर पूर्व कहावे, मंदरगिरि मध्य सुहावे। गिरि पूरब अपर दिशा में, बत्तिस विजयारध तामें।।२।। दक्षिण दिश भरत सुक्षेत्रा, उत्तर ऐरावत क्षेत्रा। इनके दो रजत गिरीशा, होते सब मिल चौंतीसा।।३।। इन पे जिनधाम कहे हैं, वे सब भव क्लेश दहे हैं। उन वंदत सकल सुरेशा, हम पूजत यहीं हमेशा।।४।। मंदरगिरि पूर्व विदेहे, सीता नदि मध्य बहे हैं। अठ क्षेत्र नदी उत्तर में, जिन ‘भद्रबाहु’ उन इक में।।५।। अठ क्षेत्र नदी दक्षिण में, तीर्थेश ‘भुजंगम’ उनमें। मंदरगिरि अपर विदेहे, सीतोदा नदी बहे है।।६।। अठ क्षेत्र नदी दक्षिण में, ‘ईश्वर’ तीर्थंकर उनमें। अठ क्षेत्र नदी उत्तर में, जिनवर ‘नेमिप्रभ’ उनमें।।७।। ये चार जिनेश्वर नित ही, विहरें सु विदेहनि बिचहीं। बत्तीस विदेह कहे हैं, तहं पे षट् खंड रहे हैं।।८।। सबमें आरजखंड इक है, तीर्थंकर जनम सतत हैं। ये शाश्वत तीर्थ करंता, नित विहरमाण भगवंता।।९।। भविजन को नित सुख देते, भवभय संकट हर लेते। यह सुन मैं शरणे आयो, भव भव दुख से अकुलायो।।१०।। हे नाथ! अरज इक मेरी, सुनिये निंह करिये देरी। इस जग में भ्रमण करायो, प्रभु काल अनंत गमायो।।११।। चिरकाल निगोद निवासा, मुश्किल से हुआ निकासा। पृथ्वी जल अग्नि पवन में, तनु धर धर किया मरण मैं।।१२।। जब वनस्पती तनु पायो, नाना विध स्वांग धरायो। किंह पूâल फलों की ढ़ेरी, कहिं कोंपल पत्र घनेरी।।१३।। कोई काटे रौंदे खाये, कोई भाजी साग पकाये। किंह दमड़ी मूल्य बिकाये, कहिं करवत चीर दुखाये।।१४।। जो दु:ख सहे अनजाने, नहिं मुख से जाय बखाने। अजि कठिन कठिन त्रस हूवो, लट शंख तनू धर मूवो।।१५।। चिंवटी खटमल तन धारे, बिच्छू आदिक अवतारे। मधुमक्खी भ्रमर जु हूवो, तन धर धर पुनि पुनि मूवो।।१६।। पंचेन्द्रिय पशु तन धार्यो, किंह व्रूâर पशू बन मार्यो। संक्लेशभाव से मर्यो, तब नरकगती में पर्यो।।१७।। दुख भोगे तहाँ अनन्ता, तुम जानत हो भगवंता। नर योनि लई जब मैंने, तहँ भोगे भोग सु मैंने।।१८।। फिर भी नहिं साता पायो, नाना विध कष्ट उठायो। किंह इष्ट वियोग सह्यो है, आनिष्ट संयोग भयो है।।१९।। कहिं धन जन नष्ट हुए हैं, कहिं परिजन दुष्ट हुए हैं। कहिं तन में व्याधि व्यथा है, समरथ अन्याय रचा है।।२०।। सुरयोनि लिया भी दु:खी, समकित बिन कभी न सुक्खी। भवनत्रिक में मन व्याधी, कर्मनि की आदि उपाधी।।२१।। इस विध चहुँगति दुख पायो, सुख लेश निमित भरमायो। जिनराज कृपा तुम पाई, समकित निधि हाथ में आई।।२२।। जब तक प्रभु मुक्ति न होवे, यह सम्यव्â रतन न खोवे। बस यह ही अरज सुनीजे, अंतिम सु समाधी कीजे।।२३।। —घत्ता— जय जय चौंतीसा, रजतगिरीशा, जय जिनगृह चौंतीस जजूँ। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ शिवसुख संपति, हो मुझ प्रापति तुमहिं भजूँ।।२४।। ॐ ह्रीं श्रीमंदरमेरâसंबंधिचतुिंस्त्रशत्विजयार्धपर्वतसिद्धवूâटजिनालयस्थ-जिनबिम्बेभ्यो जयमाला निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ४०) पूर्व पुष्करार्धद्वीप भरतक्षेत्र वर्तमान तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-गीता छंद वर पूर्व पुष्कर द्वीप में, जो भरत क्षेत्र महान् है। उसमें चतुर्थकाल में हों तीर्थकर भगवान हैं।। उन वर्तमान जिनेश्वरों की मैं करूँ इत थापना। पूजूँ अतुल बहु भक्ति से, चाहूँ सदा हित आपना।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर समूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-अडिल्ल छंद सीतानदि को नीर कलश भर लाइये। जिनवर पद पंकज में धार कराइये।। वर्तमान चौबीस जिनेश्वर को जजूँ। रोग शोक भय नाश सहज सुख को भजूँ।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयज चंदन गंध सुगंधित लाइये। तीर्थंकर पद पंकज अग्र चढ़ाइये।।वर्तमान.।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। उज्ज्वल अक्षत मुक्ता फल सम लाइये। जिनवर आगे पुंज चढ़ा सुख पाइये।।वर्तमान.।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। वकुल कमल चंपक बेला सुमनादि ले। मदनजयी जिनपाद पद्म पूजूँ भले।। वर्तमान चौबीस जिनेश्वर को जजूँ। रोग शोक भय नाश सहज सुख को भजूँ।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। कलावंâद मोदक घृत मालपुआ लिये। क्षुधा व्याधिक्षय हेतू आज चढ़ा दिये।।वर्तमान.।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। घृत दीपक की ज्योति जले जगमग करे। तुम पूजा तत्काल मोह तक क्षय करे।।वर्तमान.।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगर तगर सित चंदन आदि मिलायके। अग्निपात्र में खेऊँ भाव बढ़ायके।।वर्तमान.।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। अनंनास अंगूर आम आदिक लिये। महामोक्षफल हेतु तुम्हें अर्पण किये।।वर्तमान.।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जलगंधादिक अघ्र्य लिया भर थाल मैं। रत्नत्रय निधि हेतु जजूँ त्रयकाल मैें।।वर्तमान.।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुँजग शांतीकर सदा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -सोरठा- ज्ञान चेतनारूप, परमेष्ठी चिद्रूप हैं। पुष्पांजलि से पूज, सकल दु:ख दारिद हरूँ।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -चौपाई- श्री ‘जगन्नाथ’ तीर्थंकर, सुरगणनुत भव्य हितंकर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजगन्नाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तीर्थेश ‘प्रभास’ कहाते, सुरनर मुनिपति यश गाते। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रभासनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘स्वर स्वामी’ जिनदेवा, सुर करते तुम पद सेवा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीस्वरस्वामिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘भरतेश’ जिनेश महंता, पूजें भविजन गुणवंता। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीभरतेशजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘दीर्घानन’ जिन राजा, वे सिद्ध करें सब काजा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीदीर्घाननजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘विख्यात कीर्ति’ तीर्थंकर, उन वाणी सर्व प्रियंकर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविख्यातकीर्तिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अवसानि’ जिनेश्वर जग में, उनका यश है त्रिभुवन में। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअवसानिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिननाथ ‘प्रबोध’ सुहितकर, उन नाम मंत्र भी दुखहर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रबोधजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिन ‘तपोनाथ’ जग स्वामी, त्रिभुवन के अंतर्यामी। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीतपोनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिन ‘पावक’ नाम तुम्हारा, आतम अनुभव दातारा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपावकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘त्रिपुरेश्वर’ जगपति तुम हो, चिन्मूर्ति चिदंबर तुम हो। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीत्रिपुरेश्वरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘सौगत’ देव हमेशा, तुम ध्याते विष्णु महेशा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसौगतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘वासव’ नाथ हमारे, भव भव के संकट टारें। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवासवनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनराज ‘मनोहर’ नामी, सुख दायक त्रिभुवन स्वामी। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमनोहरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शुभ कर्म ईश’ तीर्थंकर, सब भविजन को क्षेमंकर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशुभकर्मईशजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनराज ‘इष्टसेवित’ तुम, कर इष्ट अनिष्ट हरो तुम। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीइष्टसेवितजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘विमलेन्द्र’ जिनेन्द्र सुखालय, संपूर्ण गुणों के आलय। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविमलेन्द्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘धर्मवास’ सुखदाता, भक्तों के भाग्य विधाता। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीधर्मवासजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जग मान्य ‘प्रसाद’ जिनेश्वर, तुम त्रिभुवन के परमेश्वर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रसादजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘प्रभामृगांक’ जिनेशा, तुम पूजें सकल सुरेशा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रभामृगांकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘उज्झित कलंक’ जिनराजा, तुमही भव जलधि जहाजा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीउज्झितकलंकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘स्फटिक प्रभाख्य’ जिनेश्वर, सब प्राणिमात्र के ईश्वर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीस्फटिकप्रभाजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनराज ‘गजेन्द्र’ महंता, निज आतम सुख विलसंता। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीगजेन्द्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनदेव ‘ध्यान जय’ जिष्णू, तुम पूजक बनें सहिष्णू। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीध्यानजयजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्य-दोहा- इंद्रिय विषयों से विरत, परम अतींद्रिय सौख्य। नमूँ नमूँ तीर्थेश सब, पाऊँ सौख्य मनोज्ञ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीजगन्नाथादिध्यानजयपर्यंतचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला चाल (हे दीनबंधु.....) देवाधिदेव आप सकल दोष दूर हो। देवाधिदेव आप सकल सौख्य पूर हो।। निज आतमा को आप ही परमात्मा किया। निज में ही आप मग्न हो निजधाम पा लिया।।१।। क्रोधादि शत्रुओं का आपने दमन किया। संपूर्ण कषायों को आपने शमन किया।। इंद्रिय विषय को जीत अतीन्द्रिय सुखी हुये। प्रत्यक्ष ज्ञान से ही आप केवली हुये।।२।। संपूर्ण उपद्रव टले हैं आप जाप से। संपूर्ण मनोरथ फले हैं आप नाम से।। प्रभु आपको न इष्ट का वियोग हो कभी। होवे नहीं अनिष्ट का संयोग भी कभी।।३।। सबके लिये आराध्य इष्ट आप ही कहे। सबही अनिष्ट नष्ट हों क्षण मात्र ना रहें।। संपूर्ण रोग शोक भी तुम भक्त के टलें। धन धान्य अतुल सौख्य भी होवें भले भले।।४।। इस जग में मुक्ति अंगना के नाथ आपही। निजकी अनंत ऋद्धियों के साथ आपही।। चैतन्य चमत्कार परमसौख्य धाम हो। चित्पिंड हो अखंड ही त्रिभुवन ललाम हो।।५।। मैं आपकी शरणागती में आज आ गया। अपनी अमूल्य ज्ञान कला को भी पा गया।। ये ज्ञान निधी भवदधी में डूब ना जावे। करिये कृपा जो मुक्ति तक भी साथ में आवे।।६।। हे नाथ! मोहराज को अब दूर कीजिये। निजके अखंड गुण समस्त पूर्ण कीजिये। मुझ शत्रु जो यमराज उसे चूर्ण कीजिये। मुझ स्वात्म सुधारस प्रवाह पूर दीजिये।।७।। -दोहा- आत्यंतिक सुख शांतिमय, तीर्थंकर भगवान्। ‘ज्ञानमती’ लक्ष्मी मुझे, दे कीजे धनवान।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ४०) पूर्व पुष्करार्धद्वीप भरतक्षेत्र वर्तमान तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-गीता छंद वर पूर्व पुष्कर द्वीप में, जो भरत क्षेत्र महान् है। उसमें चतुर्थकाल में हों तीर्थकर भगवान हैं।। उन वर्तमान जिनेश्वरों की मैं करूँ इत थापना। पूजूँ अतुल बहु भक्ति से, चाहूँ सदा हित आपना।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर समूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-अडिल्ल छंद सीतानदि को नीर कलश भर लाइये। जिनवर पद पंकज में धार कराइये।। वर्तमान चौबीस जिनेश्वर को जजूँ। रोग शोक भय नाश सहज सुख को भजूँ।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: जलं निर्वपामीति स्वाहा। मलयज चंदन गंध सुगंधित लाइये। तीर्थंकर पद पंकज अग्र चढ़ाइये।।वर्तमान.।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। उज्ज्वल अक्षत मुक्ता फल सम लाइये। जिनवर आगे पुंज चढ़ा सुख पाइये।।वर्तमान.।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। वकुल कमल चंपक बेला सुमनादि ले। मदनजयी जिनपाद पद्म पूजूँ भले।। वर्तमान चौबीस जिनेश्वर को जजूँ। रोग शोक भय नाश सहज सुख को भजूँ।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। कलावंâद मोदक घृत मालपुआ लिये। क्षुधा व्याधिक्षय हेतू आज चढ़ा दिये।।वर्तमान.।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। घृत दीपक की ज्योति जले जगमग करे। तुम पूजा तत्काल मोह तक क्षय करे।।वर्तमान.।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: दीपं निर्वपामीति स्वाहा। अगर तगर सित चंदन आदि मिलायके। अग्निपात्र में खेऊँ भाव बढ़ायके।।वर्तमान.।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: धूपं निर्वपामीति स्वाहा। अनंनास अंगूर आम आदिक लिये। महामोक्षफल हेतु तुम्हें अर्पण किये।।वर्तमान.।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: फलं निर्वपामीति स्वाहा। जलगंधादिक अघ्र्य लिया भर थाल मैं। रत्नत्रय निधि हेतु जजूँ त्रयकाल मैें।।वर्तमान.।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुँजग शांतीकर सदा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -सोरठा- ज्ञान चेतनारूप, परमेष्ठी चिद्रूप हैं। पुष्पांजलि से पूज, सकल दु:ख दारिद हरूँ।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -चौपाई- श्री ‘जगन्नाथ’ तीर्थंकर, सुरगणनुत भव्य हितंकर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजगन्नाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। तीर्थेश ‘प्रभास’ कहाते, सुरनर मुनिपति यश गाते। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रभासनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘स्वर स्वामी’ जिनदेवा, सुर करते तुम पद सेवा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीस्वरस्वामिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘भरतेश’ जिनेश महंता, पूजें भविजन गुणवंता। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीभरतेशजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘दीर्घानन’ जिन राजा, वे सिद्ध करें सब काजा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीदीर्घाननजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘विख्यात कीर्ति’ तीर्थंकर, उन वाणी सर्व प्रियंकर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविख्यातकीर्तिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अवसानि’ जिनेश्वर जग में, उनका यश है त्रिभुवन में। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअवसानिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिननाथ ‘प्रबोध’ सुहितकर, उन नाम मंत्र भी दुखहर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रबोधजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिन ‘तपोनाथ’ जग स्वामी, त्रिभुवन के अंतर्यामी। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीतपोनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिन ‘पावक’ नाम तुम्हारा, आतम अनुभव दातारा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपावकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘त्रिपुरेश्वर’ जगपति तुम हो, चिन्मूर्ति चिदंबर तुम हो। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीत्रिपुरेश्वरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘सौगत’ देव हमेशा, तुम ध्याते विष्णु महेशा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसौगतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘वासव’ नाथ हमारे, भव भव के संकट टारें। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवासवनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनराज ‘मनोहर’ नामी, सुख दायक त्रिभुवन स्वामी। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमनोहरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘शुभ कर्म ईश’ तीर्थंकर, सब भविजन को क्षेमंकर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशुभकर्मईशजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनराज ‘इष्टसेवित’ तुम, कर इष्ट अनिष्ट हरो तुम। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीइष्टसेवितजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘विमलेन्द्र’ जिनेन्द्र सुखालय, संपूर्ण गुणों के आलय। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविमलेन्द्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘धर्मवास’ सुखदाता, भक्तों के भाग्य विधाता। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीधर्मवासजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जग मान्य ‘प्रसाद’ जिनेश्वर, तुम त्रिभुवन के परमेश्वर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रसादजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘प्रभामृगांक’ जिनेशा, तुम पूजें सकल सुरेशा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीप्रभामृगांकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘उज्झित कलंक’ जिनराजा, तुमही भव जलधि जहाजा। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीउज्झितकलंकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘स्फटिक प्रभाख्य’ जिनेश्वर, सब प्राणिमात्र के ईश्वर। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीस्फटिकप्रभाजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनराज ‘गजेन्द्र’ महंता, निज आतम सुख विलसंता। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीगजेन्द्रजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। जिनदेव ‘ध्यान जय’ जिष्णू, तुम पूजक बनें सहिष्णू। मैं पूजूँ अघ्र्य चढ़ाके, दुख संकट दूर भगाके।।२४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीध्यानजयजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -पूर्णाघ्य-दोहा- इंद्रिय विषयों से विरत, परम अतींद्रिय सौख्य। नमूँ नमूँ तीर्थेश सब, पाऊँ सौख्य मनोज्ञ।।१।। ॐ ह्रीं श्रीजगन्नाथादिध्यानजयपर्यंतचतुा\वशतितीर्थंकरेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। जाप्य- ॐ ह्रीं त्रिलोकसम्बन्धिअर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्म- जिनागमजिनचैत्यचैत्यालयेभ्यो नम:। जयमाला चाल (हे दीनबंधु.....) देवाधिदेव आप सकल दोष दूर हो। देवाधिदेव आप सकल सौख्य पूर हो।। निज आतमा को आप ही परमात्मा किया। निज में ही आप मग्न हो निजधाम पा लिया।।१।। क्रोधादि शत्रुओं का आपने दमन किया। संपूर्ण कषायों को आपने शमन किया।। इंद्रिय विषय को जीत अतीन्द्रिय सुखी हुये। प्रत्यक्ष ज्ञान से ही आप केवली हुये।।२।। संपूर्ण उपद्रव टले हैं आप जाप से। संपूर्ण मनोरथ फले हैं आप नाम से।। प्रभु आपको न इष्ट का वियोग हो कभी। होवे नहीं अनिष्ट का संयोग भी कभी।।३।। सबके लिये आराध्य इष्ट आप ही कहे। सबही अनिष्ट नष्ट हों क्षण मात्र ना रहें।। संपूर्ण रोग शोक भी तुम भक्त के टलें। धन धान्य अतुल सौख्य भी होवें भले भले।।४।। इस जग में मुक्ति अंगना के नाथ आपही। निजकी अनंत ऋद्धियों के साथ आपही।। चैतन्य चमत्कार परमसौख्य धाम हो। चित्पिंड हो अखंड ही त्रिभुवन ललाम हो।।५।। मैं आपकी शरणागती में आज आ गया। अपनी अमूल्य ज्ञान कला को भी पा गया।। ये ज्ञान निधी भवदधी में डूब ना जावे। करिये कृपा जो मुक्ति तक भी साथ में आवे।।६।। हे नाथ! मोहराज को अब दूर कीजिये। निजके अखंड गुण समस्त पूर्ण कीजिये। मुझ शत्रु जो यमराज उसे चूर्ण कीजिये। मुझ स्वात्म सुधारस प्रवाह पूर दीजिये।।७।। -दोहा- आत्यंतिक सुख शांतिमय, तीर्थंकर भगवान्। ‘ज्ञानमती’ लक्ष्मी मुझे, दे कीजे धनवान।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिभरतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्यो जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:। -शंभु छंद- ढाईद्वीप विधान भक्ति से, जो नर-नारी करते हैं। वे कर्मभूमि में मनुज बने, मुनि हो भव सार्थक करते हैं।। नर सुरगति के अभ्युदय पाय, सब मनवांछित को लभते हैं। वैâवल्य ‘ज्ञानमति’ रवि किरणों, से जग आलोकित करते हैं।।१।। ।।इत्याशीर्वाद:।। (पूजा नं. ४१) पूर्व पुष्करार्धद्वीप ऐरावतक्षेत्र वर्तमान तीर्थंकर पूजा अथ स्थापना-नरेन्द्र छंद पूरब पुष्कर ऐरावत के, वर्तमान तीर्थंकर। चिच्चैतन्य सुधारस प्यासे, भविजन को क्षेमंकर।। उनको इत आह्वानन करके, पूजूँ मन वच तन से। आतम अनुभव अमृत हेतु, वंदूँ अंजलि करके।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर- समूह! अत्र अवतर-अवतर संवौषट् आह्वाननं। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर- समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशतितीर्थंकर- समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं। अथाष्टवंâ-गीता छंद अगणित कुओं का नीर पीया, प्यास फिर भी ना बुझी। इस हेतु जल से पूजहूँ, अब मेट दो बाधा सभी।। चौबीस तीर्थंकर जगत में, सर्व सुख दातार हैं। जो पूजते तुम चरण अंबुज, वे भवोदधि पार हैं।।१।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। भव सिंधु में भी चाह दावानल हमें झुलसा रहा। इस हेतु चंदन से जजूँ, अब दु:ख नहिं जाता सहा।।चौबीस.।।२।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा। निज आत्म सुख जो सहज मेरा, खंड खंड हुआ सभी। उसके अखंडित हेतु अक्षत, पुंज से पूजूँ अभी।।चौबीस.।।३।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधि-ऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। इस मदन ने बस जगत में, जन सर्व को वश में किया। इसके निमूलन हेतु सुरभित, सुमन तुम अर्पण किया।। चौबीस तीर्थंकर जगत में, सर्व सुख दातार हैं। जो पूजते तुम चरण अंबुज, वे भवोदधि पार हैं।।४।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। तन में क्षुधा व्याधी सदा, औषधि न कुछ उसके लिये। इस हेतु उत्तम सरस व्यंजन, आप ढिग अर्पण किये।।चौबीस.।।५।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। अज्ञान तम अति घोर छाया, आप र दीखे नहीं। इस हेतु दीपक से जजूँ, निज ज्ञान रवि प्रगटे सही।।चौबीस.।।६।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। इन कर्म ने मुझ संपदा को, लूट ली मुझ पास से। इस हेतु इनको नाश करने, धूप खेऊं चाव से।।चौबीस.।।७।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। वांछित मिले इस हेतु जग में, देव सब पूजे सदा। पर सफल अब तक ना हुआ, इस हेतु फल तुम अर्पता।।चौबीस.।।८।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। नीरादि में वर रत्न धरके, अघ्र्य सुंदर ले लिया। अनमोल निज संपत्ति हेतु, अघ्र्य तुम अर्पण किया।।चौबीस.।।९।। ॐ ह्रीं पूर्वपुष्करार्धद्वीपसंबंधिऐरावतक्षेत्रस्थवर्तमानकालीनचतुा\वशति-तीर्थंकरेभ्य: अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। -सोरठा- तीर्थंकर परमेश, तिहुँजग शांतीकर सदा। चउसंघ शांतीहेत, शांतीधारा मैं करूँ।।१०।। शांतये शांतिधारा। हरसिंगार प्रसून, सुरभित करते दश दिशा। तीर्थंकर पद पद्म, पुष्पांजलि अर्पण करूँ।।११।। दिव्य पुष्पांजलि:। अथ प्रत्येक अघ्र्य -सोरठा- सिद्धि वधू भरतार, निज में ही रमते सदा। भुक्ति मुक्ति करतार, इसी हेतु भविजन जजें।।१।। इति मण्डलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्। -चौपाई- श्री ‘शंकर’ जिनदेवजी, जग में शं करतार। अघ्र्य चढ़ाकर मैं जजूँ, होवे निज पद सार।।१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशंकरजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘अक्षवास’ जिनराज को, मिला सौख्य निर्वाण। हृदय कर्णिका में सदा, मुनिजन करते ध्यान।।२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअक्षवासजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘नग्नाधिप’ देव तुम, बहिरंतर निग्र्रंथ। नग्न दिगम्बर रूप तुम, सत्य मोक्ष का पंथ।।३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनग्नाधिपजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘नग्नाधिपतीश’ हो, नमन करें सुरवृंद। मैं पूजूँ नित अघ्र्य ले, हरो सकल दुख द्वंद।।४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनग्नाधिपतीशजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। नाथ ‘नष्टपाखंड’ को, विश्व नमाता माथ। मैं भी अघ्र्य चढ़ाय के, फिर ना होऊँ अनाथ।।५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनष्टपाखंडजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘स्वप्नदेव’ जिननाथ को, नमूँ नमूँ तन शीश। हरो अमंगल विश्व के, भरो सकल सुख ईश।।६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीस्वप्नदेवजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। आप ‘तपोधन’ आत्मधन, पाकर भये सुतृप्त। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय के, पाऊँ सौख्य प्रशस्त।।७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीतपोधनजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘पुष्पकेतु’ जिनराज हैं, मुक्तिरमा भरतार। पूजूँ अघ्र्य चढ़ाय के, पाऊँ सौख्य अपार।।८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीपुष्पकेतुजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘धार्मिक’ जिनराज का, धर्मचक्र हितकार। जो भविजन शरणा गहें, नाशें निज संसार।।९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीधार्मिकजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘चंद्रकेतु’ भगवान को, नमते नाग नरेश। स्याद्वाद अम्भोधि के, वर्धन हेतु महेश।।१०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीचंद्रकेतुजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘अनुरक्त’ सुज्योति को, नमन करूँ शतवार। तुम में जो अनुरक्त जन, वे उतरें भव पार।।११।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीअनुरक्तसुज्योतिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘वीतराग’ जिनदेव के, चरण कमल का ध्यान। जो जन करते भाव से, पावें सौख्य निधान।।१२।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवीतरागजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘उद्योत’ जिनेश तुम, ज्ञान भानु तमहार। पूजूँ सकल विभाग तज, लहूँ ज्ञान भंडार।।१३।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीउद्योतजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘तमोपेक्ष’ भगवान के, गुणगण अपरंपार। गणधर भी नहिं गा सवेंâ, मैं पूजूं सुखसार।।१४।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीतमोपेक्षजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘मधुनाद’ जिनेन्द्र को, सुरनर खगपति आय। पूजें भक्ति बढ़ाय के, मैं पूजूँ हरषाय।।१५।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमधुनादजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

श्री ‘मरुदेव’ महान हो, अद्भुत तुम माहात्म्य। मैं पूजूँ नित भक्ति से, होऊँ सब जन मान्य।।१६।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीमरुदेवीजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘दमनाथ’ जिनेश को, नमें जितेन्द्रिय साधु। मैं भी पूजूँ अघ्र्य ले, हरूँ सकल दु:ख वाघ।।१७।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीदमनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘वृषभस्वामि’ आनंदघन, चिन्मय ज्योति स्वरूप। जो पूजें श्रद्धान धर, पावें सौख्य अनूप।।१८।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीवृषभस्वामिजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। अहो ‘शिलातन’ तीर्थपति, व्रतगुणशील निधान। तुम्हें जजें जो भक्ति से, करें अमंगल हान।।१९।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीशिलातनजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। ‘विश्वनाथ’ के ज्ञान में, झलके विश्व समस्त। त्रैकालिक पर्याययुत, सकल वस्तु प्रत्यक्ष।।२०।। ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविश्वनाथजिनेन्द्राय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा। श्री ‘महेन्द्र’ भगवान हैं, त्रिभुवनपति महनीय। मैं पूजूँ नित आप मुझ, हरो दशा दयनीय।।२१।। ॐ ह्रीं अर्हं श्री