Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


डिप्लोमा इन जैनोलोजी के फॉर्म भरने की अंतिम तारीख ३१ जनवरी २०१८ है |

णमोकार माहात्म्य

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


णमोकार माहात्म्य

रचयिता— श्री डॉ. सुपार्श्वकुमार जी जैन
मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)


अरिहंत वही होता है जो, चार घातिया करता क्षय।

अघाति कर्म का सर्वनाश कर, सिद्ध प्रभु होते अक्षय।१।

सर्व संघ को अनुशासन में, रखते हैं आचार्य प्रभु ।
मोक्षमार्ग का पाठ पढ़ाते , कहलाते उपाध्याय विभु।२।

अट्ठाईस मूल गुणों का नित, पालन करते हैं मुनिजन।
त्रियोग सहित भक्तिभाव से, नमन सभी करते बुधजन।३।

पंच पद पैंतीस अक्षर में, ब्रह्माण्ड समाया है।
‘भारतीय’ जैनाजैनों को, यही मंत्र नित भाया है।४।

त्रियोग सहित जो भक्तिभाव से, महामंत्र को करे नमन।
वज्र पाप—पर्वत का जैसे, क्षण में कर देता विघटन।५।

तीन लोक में महामंत्र यह, सर्वोपरि है सर्वोत्कृष्ट ।
अद्भुत है अनुपम है यह, वैभव है इसका प्रकृष्ट ।६।

पाताल मध्य व ऊर्ध्वलोक में, महामंत्र सुख का कारण।
उत्तम नरभव देवगति अरू, पंचम गति में सहकारण।७।

भाव सहित जो पढ़ता प्रतिदिन, दु:खनाशक सुखकारक है।
स्वर्गादिक अभ्युदय दाता, अंत मोक्ष सुखदायक है।८।

जीव जन्मते ही यदि वह इस महामंत्र को सुनता है।
सुगति प्राप्त करता है यदि वो , अंत समय इसे गुनता है।९।

विपदायें सब टल जाती है, भाव सहित करता चिंतन।
मार्ग सुलभ हो जाता है जब, मनसे मंत्र का करे मनन।१०।

व्रत धारी यदि महामंत्र को, निज कंठ में धरता है।
धन विद्या व ऋद्धिधरों से, श्रेष्ठ सदा ही रहता है।११।

महारत्न चिंतामणि से भी, कल्पद्रुम से है बढ़कर।
महामंत्र यह अनुमान है, नहीं लोक में कुछ समतर।१२।

गरूड़ मंत्र जैसे विकराल, सर्पों का विषनाशक है।
उससे श्रेष्ठ मंत्र है यह, सकल पाप का घातक है।१३।

नाते रिश्तेदार सभी ये, एक जन्म के हैं साथी।
स्वर्ग मोक्ष सुख देकर मंत्र, पंचम गाqत का है साथी।१४।

विधिपूर्वक भाव रहित जो, लाख बार मंत्र जपता है।
कहते हैं ज्ञानीजन उनको तीर्थंकर कर्म ही बंधता है।१५।

परम योगी ध्यानी जन नित ही महामंत्र यह ध्याते हैं।
परम तत्व है यही परमपद ऋषिगण यह समझाते हैं।१६।

शत साठ (१६०) विदेहवासी भी, महामंत्र यह जपते हैं।
कर्मों का वे क्षयकर क्षण में, भवसागर से तरते हैं।१७।

कर्मक्षेत्र वासी भी जब यह, णमोकार जप जपते हैं।
स्वर्गादिक वैभव को पाकर, अंत मोक्षसुख लभते हैं।१८।

जिनधर्म अनादि जीव अनादि, महामंत्र भी अनादि है।
अनादि हैं जपने वाले भी, मंत्र ध्यानी भी अनादि है।१९।

महामंत्र को ध्याकर ही वे, सिद्ध हुए होंगे आगे।
हृदय में जो नहीं धारता, मुक्त नहीं होगा आगे।२०।

सार है यह जिनशासन का द्वाद्वशांग का है आधार।
मनमें मंत्रको ध्याता उसका, कर क्या सकता है संसार।२१।

उठते बैठते जागते सोते, करो मंत्र का नित सुमिरन।
सब पापों का क्षय वो करता, होता नहीं कभी कुमरन।२२।

चौरासी लख मंत्रों का यह, बना हुआ अधिराजा है।
इसीलिए तो अनादिकाल से, हर हृदय में विराजा है।२३।

परमेष्ठी वाचक यह मंत्र, निज हृदय जो धरता है।
यश पूजा ऐश्वर्य को पाकर भव—सागर से तरता है।२४।

सब पापों के क्षय करने में, महामंत्र यह काफी है।
मोक्ष सदन तक लेजाने में, यही अकेला साथी है।२५।

देवी देवता जितने जग में, महामंत्र के किंकर हैं।
पूजा भक्ति करते प्रतिदिन, सेवा में नित तत्पर हैं।२६।

सातिशयी इस महामंत्र को, जो प्राणी नित ध्याता है।
विघ्न बाधा दूर हों उसकी, सुख—शांति वो पाता है।२७।

अनंत भवों के पापों को क्षय, करता है यह क्षणभर में।
आधि व्याधि जगमारी को यह, हरलेता है पलभर में।२८।

परमंत्रों परंतंत्रो का वश, नहीं चले इसके आगे ।
भूत पिशाच डाकिनी शकिनी सुनते मंत्र सभी भागे।२९।

ध्याता है जो मंत्र सदा ही, सभी कार्य होते हैं सफल ।
निराश कभी न होता जगमें, कभी नहीं होता असफल।३०।

मंगलों में मंगल है यह, उत्तमों में है उत्तम।
शरण गहो केवल इसकी ही, सहज मिलेगा मोक्षसदन।३१।

संकटों का है यह साथी, सुख का है अनुपम आधार।
भव—सागर में जो घबराता, कर देता है बेड़ापार।३२।

पग—पग पर इस महामंत्र को, मन ही मन जो ध्याता है।
कार्मों का वो क्षय है करता, अतं मोक्षसुख पाता है।३३।

प्रतिकूलता भी हो जाती , सदा ही तेरे मन अनुकूल।
भूल सुधर जाती है जबसे, शूल भी बन जाते हैं फूल।३४।

महामंत्र के नित जपने से, कर्म शक्ति होती कम।
पापपुण्य हो उदय में आता, मिट जाते हैं सारे गम।३५।

महामंत्र के चिंतक को कभी, अशुभकर्म का बंध नहीं।
निजमें वह तल्लीन ही रहता, परसे कुछ सबंध नहीं।३६।

कर्म निर्जरा होती उसके, प्रति समय है असंख्य गुणी।
श्रावकोचित क्रिया है करता, अंत समय होता है मुनी।३७।

पांचों परमेष्ठी प्रभु जी, निज आतम में ही स्थित है।
भय आशा स्नेह लोभ से, कभी न होता विचलित है।३८।

त्रिलोक व्यापी महामंत्र यह, त्रिकाल पूज्यहै सदा यही।
त्रिजग में है सर्वश्रेष्ठ यह, तीन भुवन में सार यही।३९।

भाव सहित इस महामंत्र का, अखण्ड पाठ जो करता है।
सहयोगी बन जाता है जग, जन्म मरण क्षय करता है।४०।

दोहा

महामंत्र की महिमा का, कैसे करूं गुणगान ।
निज हृदय धारण करो, पाओ मोक्ष निधान।।,

वीतराग वाणी
माह—मई /जून २०१४