तत्त्वार्थवार्तिक में वर्णित अणुव्रत और महाव्रत

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तत्त्वार्थवार्तिक में वर्णित अणुव्रत और महाव्रत

आचार्य अकलंकदेव द्वारा तत्त्वार्थसूत्र पर तत्त्वार्थवार्तिक ग्रन्थ लिखा गया है। इसमें प्रमेय का विचार आगमिक एवं दार्शनिक पद्धति से किया गया है। प्रस्तुत आलेख में अणुव्रत और महाव्रतों पर विचार किया जायेगा। जब व्रतों पर विचार करते हैं तो सर्वप्रथम व्रत के स्वरूप पर विचार करना भी आवश्यक है। तत्त्वार्थसूत्रकार लिखते हैं कि हिंसा, अनृत, अस्तेय, अब्रह्म तथा परिग्रह से विरति व्रत है।१

समन्तभद्राचार्य लिखते हैं कि अनिष्टपन और अनुपसेव्यपन के कारण छोड़नें के योग्य विषय से अभिप्रायपूर्वक जो निवृत्ति होती है वही व्रत है।२

पूज्यपाद आचार्य ने सवार्थसिद्धि में व्याख्या करते हुए लिखा कि प्रतिज्ञा करके जो नियम लिया जाता है, वह व्रत है या यह करने योग्य है, यह नहीं करने योग्य है, इस प्रकार नियम करना व्रत है।३

आचार्य अकलंकदेव ने व्रत के स्वरूप पर विशेष विवेचना करते हुए लिखा है कि विरमण का नाम विरति है। चारित्र मोहनीय कर्म के उपशम, क्षय और क्षयोपशम के निमित्त से औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिकचारित्र की प्रकटता होने से जो विरक्ति होती है, उसे विरति कहते हैं और अभिसन्धिकृत नियम व्रत कहलाता है। बुद्धिपूर्वक परिणाम या बुद्धिपूर्वक पापों का त्याग अभिसंन्धिकृत नियम व्रत कहलाता है।

बुद्धिपूर्वक परिणाम या बुद्धिपूर्वक पापों का त्याग अभिसन्धि है। यह ऐसा ही करना , अन्य प्रकार से निवृत्ति है, ऐसे नियम को अभिसन्धि है। अर्थात् बुद्धिपूर्वक किया हुआ नियम सर्वत्र व्रत कहलाता है। शुभ कार्यों में प्रवृत्ति और अशुभ से निवृत्ति ही व्रत है।४

व्रतमभिसन्धिकृतो नियम :

व्रत को जो स्वरूप पूर्ववर्ती आचार्य समन्तभद्र ने बताया इसके बाद पूज्यपाद आचार्य ने भी प्रतिपादन किया परन्तु आचार्य अकलंकदेव ने अभिसन्धिकृत: का अर्थ बुद्धिनपूर्वक परिणाम करके यह स्पष्ट कर दिया कि व्रत बुद्धिपूर्वक ही लिये जाते हैं। अत: इससे स्पष्ट है कि आज जो मुमुक्षुओं में यह धारणा बनती जा रही है कि व्रत सहज में होते हैं जब उसकी काललब्धि आयेगी तो व्रत सहज और स्वयं हो जायेंगे। अत: उक्त कथन से मुमुक्षुओं की यह ‘सहज’ की अवधारणा निर्मूल हो जाती है।

आचार्य अकलंकदेव ने व्रतों को दो भागों में बाँटने का कारण सर्वप्रथम बताया है।५ कि व्यक्तियों के आत्मभूत धर्मों के दैविध्य होने से व्यक्तियों के द्वैविध्य के समान उन धर्मों के भी दो भेद हो जाते हैं अर्थात् व्यक्ति के भेद से व्रत दो प्रकार के होते हैं—‘देश सर्वतोऽणुमहती’ अर्थात् हिंसादि से एक देश विरक्त होना अणुव्रत और सम्पूर्ण रूप से विरक्ति महाव्रत है। आचार्य अकलंकदेव कहते हैं कि किसी व्यक्ति ने यह प्रतिज्ञा कर ली कि मैं हिंसा नहीं करूँगा, झूठ नहीं बोलूँगा इत्यादि प्रतिज्ञा के बावजूद भी वह भावना स्थिर रखने में असमर्थ है तो ऐसी स्थिति में क्या करें ? तो स्पष्ट किया है कि उन व्रतों की स्थिरता के लिये प्रत्येक व्रत की पाँच—पाँच भावनाओं को भावे तो व्रतों में स्थिरता आयेगी । जिन पच्चीस भावनाओं का वर्णन तत्त्वार्थ सूत्रकार ने किया है वे भावनाओं को भावे तो व्रतों में स्थिरता आयेगी। जिन पच्चीस भावनाओं का वर्णन तत्त्वार्थ सूत्रकार ने किया है वे भावनायें मुख्यरूप से महाव्रतियों को है क्योंकि कुन्दकुन्द आचार्य ने चारित्रपाहुड़ में महाव्रत की परिभाषा बताकर ७ इन व्रतों की पाँच—पाँच भावनायें भी गिनाई है। इस सूत्र से स्पष्ट होता है कि ये भावनायें अणुव्रती और महाव्रती दोनों को मानना चाहिए क्योंकि आचार्य अकलंकदेव ने स्पष्ट कहा है कि कोई पुरूष यह प्रतिज्ञा कर लेता है कि मैं झूठ नहीं बोलूंगा, हिंसा नहीं करूंगा, पर स्त्री गमन नहीं करूंगा इत्यादि। ऐसी भावना स्थिर रखने में असमर्थ है तो ये पाँच—पाँच भावनायें भावे ८ ज्ञातव्य है कि पर स्त्री गमन का त्याग अणुव्रती के होता है। महाव्रती तो स्त्रीभाव के त्यागी हैं। अत: अकलंक ने यह स्पष्ट कर दिया कि ये पाँच—पाँच भावनायें अणुव्रती और महाव्रती दोनों को व्रतों में स्थिरता के लिए भाना चाहिए।

तत्त्वार्थवार्तिक में अकलंक कहते हैं कि इन भावनाओं के सिवा और भी जिन बातों से व्रतों की दृढ़ता रहती है वे हैं व्रतों की विरोधी हो रही पाप क्रियाओं में प्रतिवूâल भावनायें भावते हुए सामान्यरूप से सम्पूर्णव्रतों की स्थिरता के लिये और भी इस प्रकार भावनायें करनी चाहिये कि हिंसादि पापों के करने से इस लोक में भी और परलोक में भी अपाय (अनर्थ) और अवद्य (निन्दा) दर्शन होता है।९ इसी प्रकार इनके सिवा हिंसादि के विषय में और भी भावनाएं हैं, वे भी मानी चाहिए जैसा सूत्रकारा कहते हैं कि ये हिंसा , झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह रूप पाप दु:ख रूप ही हैं।१०

हिंसादि पाप दु:ख स्वरूप ही है इसको सिद्ध करते हुए कहते हैं कि ‘कारण कारणे वा धनप्राणवत’। जैसे धन से अन्न आता और अन्न से प्राणों की स्थिति होती है। अत: कारण के कारण में कार्य का उपचार करके धन को प्राण कहते हैं उसी प्रकार हिंसादि पाप असाता वेदनीय कर्म के कारण है और असाता वेदनीय कर्म दु:ख रूप ही है। इस प्रकार आचार्य अकलंकदेव दार्शनिक शैली में हिंसादि को दु:खरूप ही है, सिद्ध करते हैं।११

आचार्य अकलंकदेव कहते हैं कि जिस प्रकार ये भावनायें भावपूर्वक भाने से व्रत को पूर्णता प्रदान करती है उसी प्रकार इस लोक सम्बन्धी प्रयोजन की नहीं अपेक्षा कर ये मैत्री आदिक भावनायें भी यदि भायी जावें तो व्रत सम्पत्ति स्थिर होती है। प्राणीमात्र में मैत्री, गुणिजनों में प्रमोद, जीवों में करूणा तथा विरूद्ध चित्तवालों में माध्यस्थ्यभाव रखना इन चार भावनाओं का विशेषरूप विचार करते हुए व्रती को अपना, आत्मा सर्वदा संस्कारित रखना चाहिये।

महाव्रतियों द्वारा उक्त सभी भावनाओं का चिन्तन करने से नवीन पापास्रव रूकेगा१२ परन्तु संवेग और वैराग्य के लिये संसार और शरीर के स्वभाव का चिन्तन करना चाहिये। आचार्य अकलंकदेव अपनी तार्किक बुद्धि से कहते हैं कि जो संसार और शरीर के स्वभाव का चिन्तन करेगा उसे आरम्भ परिग्रह में दोष दिखेंगे। तो वह व्रती इनसे विरत होगा और इनसे विरत होना ही धर्म है और धर्म से धर्म में , धार्मिकों में, धर्मश्रमण में और धार्मिक—दर्शन में बहुमान होता है। उनके प्रति मानसिक आह्लाद होता है। उत्तरोत्तर गुणों की प्रतिपत्ति (प्राप्ति) में श्रृद्धा और वैराग्य होता है। यही संसार शरीर भोगोपभोग वस्तु से निर्वेद होता है तथा भगवान भाने वाला मानव अच्छी तरह से व्रतों का पालन करता है। आगे आचार्य अकलंकदेव दार्शनिक शैली से प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि ये सभी व्रतभावनायें सर्वपदार्थों को जो सर्वथा नित्य मानता है अथवा अनित्य उन एकान्तवादियों के एकान्तमत में ये भावनायें नहीं बन सकती अपितु नित्यानित्य आत्मद्रव्य में ये सभी भावनायें बन सकती है।

अणुव्रत और महाव्रतों की चर्चा में व्रत के स्वरूप में हिंसा आदि पाँच पापों से विरत होना सो व्रत कहा है। अत: हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील एवं परिग्रह को वार्तिक में विस्तार से विवेचित किया गया है जो यहाँ अपेक्षित नहीं है।

इस प्रकार इन भावनाओं के द्वारा जिसका चित्त स्थिर हो गया है, जो हिंसादि पापों को जीव के नाश अथवा अहित का कारण समझता है और इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों के कौतूहल से जो निरूत्सुक हो चुका है, समस्त प्राणियों में मैत्री, प्रमोद, कारूण्य और माध्यस्थ भावों के प्रणिधान से जो वात्सल्य भाव धारण कर चुका है, जिसने शरीर के स्वभाव को अच्छी तरह से पहिचान लिया तथा जो मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है, ऐसे जिस पुरूष के व्रत है वही शल्यों से रहित होता हुआ व्रती कहलाता है।

आचार्य उमास्वामी ने ‘नि:शल्यो व्रती’ अर्थात् माया, मिथ्यात्त्व और निदान इन तीन शल्यों से रहित को व्रती कहा है।

तत्त्वार्थवार्तिक में व्रती के लक्षण को लेकर आचार्य अकलंक स्वामी ने ८ वार्तिक लिखी है१३ जिसमें शंका उपस्थित की गई नि:शल्यत्व और व्रतित्व ये दोनों के विरूद्ध है अर्थात् पृथक—पृथक है क्योंकि नि:शल्यत्व होने से व्रती नहीं हो सकता। कोई दण्ड के सम्बन्ध में छत्री नहीं हो सकता। अत: व्रत के सम्बन्ध से व्रती कहना चाहिये और शल्य के अभाव से नि:शल्य। अत: व्रत या नि:शल्य। अत: व्रत या नि:शल्य में ये एक से एक से व्रती सिद्ध हो जाने से दो विशेषण देना निरर्थक है। यदि व्रती होने से नि:शल्य है तो व्रती ही कहना चाहिये नि:शल्य नहीं। यदि नि:शल्य होने से व्रती है तो नि:शल्य ही कहना चाहिये व्रती नहीं। इस प्रकार नि:शल्यों व्रती में फल विशेष नहीं है क्योंकि ‘नि:शल्य कहो या व्रती कहो’ दोनों विशेषणों से विशिष्ट एक ही व्यक्ति इष्ट है।

उक्त शंका का समाधान सहेतुक दिया है और कहा है कि उभय विशेषण विशिष्ट होने से नि:शल्यो व्रती कहना दोष नहीं । अंगागीभाव विवक्षित होने से नि:शल्योंव्रती कहना अनुचित नहीं है।

नि:शल्यत्त्व और व्रतित्व में अंग —अंगि भाव विवक्षित है क्योंकि केवल हिंसादि विरक्ति रूप व्रत के सम्बन्ध में व्रती नहीं होता जब तब कि शल्यों का अभाव न हो। शल्यों का अभाव होने पर ही व्रत के सम्बन्ध से व्रती होता है। उदाहरण दिया गया है कि जैसे बहुत दूध और घी वाला गोमान कहा जाता है। बहुत दूध और घृत के अभाव में बहुत सी गायों के होने पर भी गोमान कहा जाता है। जो कि नि:शल्य होता वही व्रती होता है।

उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि व्रत वही है जो नि:शल्य होकर व्रत पालन करता है। केवल व्रत पालन करें और नि:शल्य न हो तो व्रती नहीं है नि:शल्य है और व्रत नहीं है तो भी व्रती नहीं।

व्रती की यह परिभाषा अणुव्रती और महाव्रती दोनों पर बराबर लागू होती है। इसीलिये आगे सूत्र कहना पड़ा कि ‘आगार्यनगारश्च’ अर्थात् अगारी गृहस्थ और अनगारी — मुनि के भेद से व्रती दो प्रकार के हैं:—

अगार जिसके है, वह अगारी कहलाता है जिसके अगार नहीं है, वह अनगारी कहलाता है। इस प्रकार अगारी—अनगारी की परिभाषा करने पर प्रश्न उठता है कि किसी कारणवश जो घर छोड़कर वन में रहने लगा उसके (गृहस्थ) अनगारपना सिद्ध होगा। इसका समाधान आचार्य अकलंकदेव ने किया है कि यहाँ भावागार विवक्षित है।१५

इसी प्रकार सम्पूर्णव्रतों का पालन न कर एक देशव्रत पालन करता है तब भी वही व्रती है। जैसा घर के कोठे में रहने वाले भी नगरवासी कहा जाता है। अठारह हजार शील और चौरासी लाख उत्तरगुणों को धारण करने वाला मुनि जैसे पूर्णव्रती है वैसे अणुव्रतधारक संयतासंयत व्रती नहीं है फिर भी अणुव्रतधारी भी व्रती कहलाता ही है।

हिंसादि पाँचों पापों में से किसी एक पाप का त्याग करने से अगारी नहीं अपितु पाँचों का एक देश त्याग करने वाला अगारी है। इसलिये सूत्रकार को सूत्र बनाना पड़ा कि ‘अणुव्रतोऽगारी’ अर्थात् अणुव्रतों का धारक अगारी है। यहाँ पर प्रश्न उठता है कि जिस प्रकार अणुव्रतोऽगारी सूत्र दिया उस प्रकार महाव्रतोऽनगारी सूत्र भी देना चाहिये था परन्तु इस विषय में न सर्वार्थसिद्धि में समाधान है और न तत्त्वार्थवार्तिक में परन्तु आचार्य विद्यानन्द ने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक में समाधान दिया है।

तत्र चाणुव्रतोंऽगारी सामथ्र्यात्स्यान्महाव्रत:।

अनगार इति ज्ञेयमत्र सूचांतराद्विना।।

वहाँ अगारी और अनगार दो व्रतियों का निरूपण करने के अवसर पर सूत्र द्वारा एक सूक्ष्मव्रत वाले को अगारी कह देने की सामथ्र्य से यहाँ अन्य सूत्र के बिना ही ‘महान व्रतों की धारी पुरूष अनगार है’ यो दूसरा व्रती समझ लेना चाहिये।

तत्त्वार्थवार्तिक में कहा है कि अणूनि व्रतानि अस्य सोऽणुव्रत:। अणु है व्रत जिसके वह अणुव्रत कहलाता है। फिर प्रश्न है कि व्रतों में अणुपना कैसे ? आचार्य अकलंकदेव समाधान देते हैं कि सर्व सावद्य योग की निवृत्ति असम्भव होने से अणुव्रत कहलाते हैं। अणुव्रती द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय त्रस प्राणियों के व्यपरोपण से मन , वचन, काय से निवृत्त अहिंसाणुव्रती कहलाता है।

स्नेह, द्वेष और मोह के आवेश से बोले जाने वाले असत्य का त्यागी सत्याणुव्रती होता है।

अन्य को पीड़ाकारक और राजभय आदि से परित्यक्त जो अदत्त है, उस अदत्त से निवृत्ति अचौर्याणुव्रत है।

उपात्त (दूसरे के द्वारा गृहीत) अनुपात (दूसरे के द्वार अनुगृहीत कुमार, कन्या आदि से परस्त्री से विरक्त होना ब्रह्मचर्याणुव्रत है।)

धन धान्य क्षेत्रादि दस प्रकार के ब्राह्य परिग्रह का स्वेच्छा से परिमाण कर लेना परिग्रह परिमाणुव्रत है।

अणुव्रतीश्रावक के इन पाँच व्रतों के अतिरिक्त दिग्विरति, देशविरति, अनर्थ—दण्डविरति, सामायिक, प्रोषधोवपास, उपभोग परिभोग परिमाण और अतिथि संविभागव्रत भी होते हैं। आचार्य अकलंकदेव कहते हैं कि ‘ततो बहिर्महाव्रत प्रसिद्धि’ अर्थात् अहिंसाणुव्रती परिमित दिशा की अवधि के बाहर मन, वचन, काय योग और कृत कारित तथा अनुमोदन आदि सर्व विकल्पों के द्वारा हिंसादि सर्व सावद्य से निवृत्त हो जाता है, अत:दिग्विरति व्रतधारी के दिग्विरति बाहर महाव्रतत्त्व जानना चाहिये। इसी प्रकार देशविरति के भी महाव्रतत्त्व होता है और सामायिक में अणु और स्थूल हिंसा आदि से निवृत्त होने के कारण इसमें भी महाव्रतपना समझना चाहिये परन्तु यह महाव्रतपना अगारी के उपचार से कहा है।

वार्तिककार अकलंकदेव ने अनर्थदण्ड के विषय में कहा है कि मध्य में अनर्थदण्ड का ग्रहण पूर्वोत्तर अतिरेक के आनर्थ के ज्ञापनार्थ है। पूर्व में कहे गये दिग्व्रत और देशव्रत तथा आगे कहे जाने वाले उपभोग परिभोग परिमाण व्रत से अवधृत मर्यादा में भी निष्प्रयोजन गमन आदि तथा मर्यादित विषयों का भी सेवन आदि नहीं करना चाहिये। इस प्रकार अतिरिक्त निर्वृति की सूचना देने के लिये मध्य में अनर्थदण्डवचन को ग्रहण किया गया।

दिग्देशानर्थविरति इत्यादि सूत्र में जो ‘सम्पन्न’ शब्द आया है उस सम्बन्ध में पूज्यपाद एवं अकलंक ने व्याख्यायित नहीं किया परन्तु विद्यानन्द श्लोकवार्तिक में कहते हैं कि१७ सम्पन्न शब्द साभिप्राय है जैसे कोई बड़ा श्रीमान् (धनाढ्य) निज सम्पत्ति से अपने को भाग्यशाली मानता रहता है, मेरे कभी लक्ष्मी का वियोग नहीं होवे ऐसी सम्पन्न बने रहने की अनुक्षण भावना रहती है। उसी प्रकार गृहस्थ उन व्रतों से अपने को महान सम्पत्तिशाली बने रहने का अनुभव करता रहता है।

तत्त्वार्थवार्तिक में अणुव्रतीश्रावक का वैशिष्ट्य बताये हुए कहा है कि दिग्देशानर्थ इत्यादि सूत्र में ही सल्लेखना को जोड़ा जा सकता था परन्तु उस सूत्र में सल्लेखना इसलिये नहीं जोड़ा क्योंकि घर का त्याग नहीं करने वाले के लिये दिग्विरति आदि सप्त प्रकार के शील का उपदेश है और घर का त्याग कर देने पर उस गृहस्थ के श्रावकव्रत रूप से ही सल्लेखना होती है।अत: इस वैशिष्टय के साथ यह भी बताना इष्ट था कि सल्लेखना केवल दिग्विरित आदि सात शीलव्रतों के धारण करने वाले श्रावकों को ही नहीं अपितु महाव्रती साधु के भी सल्लेखना होती है। अत: सल्लेखना के लिये सूत्र पृथक करना पड़ा।१८

सूत्रकार ने जब अणुव्रतों और सप्तशीलव्रतों के अतिचारों के अतिचारों को बताया तो इसके पूर्व सम्यग्दृष्टि के अतिचारों की चर्चा की। अत:प्रश्न उठता है कि अणुव्रतों के अतिचारों के पूर्व सम्यगदृष्टि के अतिचार क्यों कहें ? इसका समाधान पूज्यपाद ने नहीं किया अपितु वार्तिककार ने किया है । ये सम्यग्दृष्टि के अतिचार अणुव्रती और महाव्रती दोनों के लिये है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि तत्त्वार्थवार्तिक में अणुव्रतों के साथ महाव्रतों की चर्चा पारिशेष न्याय से की है। परन्तु यह स्पष्ट हो जाता है कि जो गृहस्थ अणुव्रत और सप्तशीलों का पालन करता है वह महाव्रतों की शिक्षा के लिये है। अणुव्रतों के पालन के साथ जब तक सप्तशीलों का पालन नहीं करता जब तक महाव्रतों की ओर कदम नहीं बढ़ा सकता है।

संदर्भ—

१. तत्त्वार्थसूत्र अ.७ /सू. । २. रत्नकरण्डश्रावकाचार परि.

३. सर्वार्थसिद्धि अ. ७/१/३४२/६ ४. तत्त्वार्थवार्तिक अ. ७/१/२/३

५. तत्त्वार्थवार्तिक अ./७/२० ६. तत्त्वार्थसूत्र अ./७/सू.२

७. चारित्र पाहुड़ गाथा ३१ पृष्ठ ९०

८. न हिनस्मि, नानृतं वदामि, नादत्त माददे नाड़गनां स्पृशामि न परिग्रहमुवा ददे। त.वा. सूत्र २/पृष्ठ—५३५

९. तत्त्वार्थवार्तिक अ. ७/९ १०. तत्त्वार्थवार्तिक अ.७/१०

११. तत्त्ववार्थवार्तिक आ.७ वार्तिक।

१२. अभिनवाऽकुशल कर्मादान निवृत्ति परेण महाव्रत धारिण क्रियाकलाप प्रणिधातव्य: ? (नवीन पापास्त्रवको रोकने में सावधान महाव्रती द्वारा क्या इतना ही क्रिया कलाप धारण करना चाहिये। क्या इतनी ही भावनायें भाने योग्य है ?)

१३. तत्त्वार्थराज. अ. ७/१८, १—८ १४. तत्त्वार्थराज. १९ वा. २

१५. तत्त्वार्थवार्तिक ७/२१ १६. वही ७/२१

१७. तत्त्वार्थश्लोक वा. ७/२१/ पृष्ठ —६०४

१८. वेश्यापरित्यागिन: दिग्विरत्यादि सप्ततय शीलोपदेश:। वेश्यापरित्यागेन तु श्रावकत्वेनैव गृहिण: सल्लेखने त्येवमर्थो भेदनेनोपदेश:।

जयपुर (राजस्थान)