तत्त्वार्थसूत्र के कत्र्ता एवं जैन वाङ्मय को उनका अवदान

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तत्त्वार्थसूत्र के कत्र्ता एवं जैन वाङ्मय को उनका अवदान

तत्वार्थसूत्र जैन परंपरा का सर्वमान्य एवं प्रामाणिक ग्रंथ है, जिसे द्वितीय शताब्दी के आचार्य उमास्वामी ने संस्कृत भाषा की सूत्र शैली में निबद्ध किया है। इसमें सात तत्त्वों का विधिवत् विवेचन है। इस ग्रंथ के कत्र्ता के नाम और ग्रंथ के मंगलाचरण आदि अनेक विषयों पर दिगम्बर और श्वेताम्बर परंपरा में अनेक धारणाएं हैं, जिन पर प्रस्तुत शोधालेख में सप्रमाण विचार—विमर्श किया गया है। इस लेख का आधार साहित्य तत्त्वार्थसूत्र, सर्वार्थसिद्धि, सभाष्यतत्त्वार्थाधिगम, जैन शिलालेख संग्रह, पं. महेन्द्र कुमार न्यायाचार्य लिखित तात्पर्यवृत्ति की प्रस्तावना, पं. सुखलाल संघवी कृत तत्त्वार्थसूत्र की प्रस्तावना, डॉ. सागरमल जैन कृत तत्त्वार्थसूत्र और उसकी परम्परा और अन्य विभिन्न शोधालेख हैं। सर्वप्रथम यहाँ ग्रंथ के मंगलाचरण पर विचार किया गया है।

१. मंगलाचरण

‘मोक्षमार्गस्य नेतारं.....’ यह श्लोक तत्त्वार्थसूत्र का मंगलाचरण है या नहीं, यह एक विवादित पक्ष है, किन्तु इसका समाधान श्रुतसागरसूरि (१४८७—१५३३ ई.) की तात्पर्यवृत्ति से होता है, जहाँ ग्रंथ की उत्थानिका में आचार्य लिखते हैं कि—द्वैयाक नामक भव्य के प्रश्न का उत्तर देने के लिए आचार्यवर्य (उमास्वामी) इष्टदेवता को नमस्कार करते हैं अर्थात् मंगलाचरण लिखते हैं।

[१] इनसे पूर्व का एक प्रमाण आचार्य विद्यानन्द की आप्तपरीक्षा में मिलता है।

<ref>श्रीमत्तत्त्वार्थशास्त्रभ्दुतसलिलनिधेरिद्धरत्नोभ्दवस्य,
प्रोत्थानारम्भकाले सकलमलभिदे शास्त्रकारै: कृतं यत्।

विद्यानन्दै: स्वशक्त्या कथमपि कथितं सत्यवाक्यार्थसिद्धयै।।—आ. प. श्लोक १२३</ref> इस श्लोक में आप्तपरीक्षाकार ने ‘सकलमलभिदे’ विशेषण से इंगित किया है, जो कि तत्त्वार्थसूत्र के मंगलाचरण को सूचित करता है। साथ ही इस तथ्य का समर्थन ग्रंथ के उपसंहार से भी होता है कि उन्हें (आचार्य विद्यानन्द को) यह मंगलाचरण तत्त्वार्थसूत्रकार का ही मान्य है।[२] आचार्य अभयनन्दी ने भी तत्त्वार्थसूत्र की तात्पर्यवृत्ति में इसे ग्रंथ का मंगल श्लोक माना है।

कुछ विद्वानों का मत है कि सर्वार्थसिद्धि में इस मंगलाचरण का कत्र्ता आचार्य उमास्वामी मान्य होते तो वे निश्चित रूप से मंगलाचरण की उत्थानिका एवं व्याख्या लिखते, अतएव मंगलाचरण एवं उसकी टीका पूज्यपादाचार्य की रचना है। यह तर्वâ तो ग्राह्य करने योग्य लगता है, किन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा होता तो सर्वार्थसिद्धि का तत्त्वार्थर्वाितक नामक वृहद् टीका लिखने वाले आचार्य अकलंकदेव इसको सर्वार्थसिद्धि पर मंगलाचरण मानकर इसकी उत्थानिका एवं व्याख्या का निरूपण अवश्य करते, किन्तु आचार्य अकलंक ने ऐसा नहीं किया। इसका कारण यह हो सकता है कि पूर्वाचार्यों के प्रति सम्मान एवं बहुमान के कारण ही अकलंकदेव ने भी आचार्य पूज्यपाद का अनुकरण कर इसकी व्याख्या न की हो। जिस प्रकार आचार्य पूज्यपाद ने व्याख्या नहीं लिखी, उसी प्रकार अकलंकस्वामी ने भी नहीं लिखी और इसी परंपरा का निर्वहन आगे आचार्य विद्यानन्द ने भी किया है। समस्त श्वेताम्बर आचार्यों ने न ही इस मंगल श्लोक को ग्रंथ में स्थान दिया है और न ही किसी तत्त्वार्थसूत्र की श्वेताम्बरीय व्याख्या में इसका वर्णन किया है। इस आधार पर अनुमान से यह कहा जा सकता है कि किन्हीं दिगम्बर विद्वान् ने तत्त्वार्थसूत्र की प्राचीन पाण्डुलिपियों के आधार पर श्वेताम्बर प्रभाव से मंगलाचरण रहित ग्रंथ की प्रतिलिपि की होगी, जिसके आधार पर बाद में अन्य पाण्डुलिपियाँ कराई गई होंगी और वर्तमान में उपलब्ध छपे ग्रंथों का आधार ये ही प्रतिलिपियाँ रही हों और इसी आधार पर मंगलाचरण के विषय में विवाद उत्पन्न हुआ होगा। अत: उपर्युक्त प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मंगलाचरण तत्त्वार्थसूत्र का है तथा इसके रचयिता आचार्य उमास्वामी हैं।

२. तत्त्वार्थसूत्रकत्र्ता का नाम :

आचार्य विद्यानन्द ने तत्त्वार्थश्लोकर्वाितक में गृद्धपिच्छाचार्य को तत्त्वार्थसूत्र का रचयिता कहा है—एतेन गृद्धपिच्छाचार्यपर्यन्तमुनिसूत्रेण व्यभिचारता निरस्ता। यद्यपि इस पंक्ति में ‘मुनिसूत्रेण’ पद प्रयुक्त है, जिससे साक्षात् तत्त्वार्थसूत्र अर्थ नहीं निकलता है और वर्तमान काल में गृद्धपिच्छ की सूत्ररूप में अथवा समग्ररूप में एक ही रचना मान्य है, जिसे हम तत्त्वार्थसूत्र नाम से संबोधित करते हैं। एक अन्य रचना आप्तपरीक्षा की स्वोपज्ञ टीका में लिखा है—‘तत्त्वार्थसूत्रकारैरुमास्वातिप्रभृतिभि.......’ इस श्लोक में तत्त्वार्थसूत्र के कत्र्ता का नाम आचार्य उमास्वाति उद्धृत किया है। अत: यह निश्चित है कि आचार्य विद्यानन्द को गृद्धपिच्छ तथा उमास्वाति—ये दोनों नाम अभीप्सित थे। इनके पश्चाद्वर्ती आचार्य वीरसेन, जिनका काल (८८३ ई. से ९२३ ई.) नौवीं शताब्दी है, ने धवला के जीवस्थान के कालानुयोद्वार में तत्त्वार्थसूत्र और उसके कत्र्ता गृद्धपिच्छाचार्य का नामोल्लेख एक सूत्र में किया है—तह गृद्धपिच्छाइरियप्पयादितच्चत्थसुत्ते वि ‘वर्तनापरिणामक्रिया: परत्वापरत्वे च कालस्य’ इति दव्वकालो परूविदो। इसी क्रम में आचार्य वादिराजसूरि ने पाश्र्वनाथचरित के एक श्लोक में लिखा है—

अतुच्छगुणसम्पातं गृद्धपिच्छं नतोऽस्मि तम्।

पक्षीकुर्वन्ति यं भव्या निर्वाणायोत्पतिष्णव:।।[३]

उपर्युक्त श्लोक में ग्यारहवीं शताब्दी के आचार्य वादिराजसूरि ने गृद्धपिच्छ शब्द लिपिबद्ध किया है। इतना अवश्य है कि इस श्लोक में गृद्धपिच्छ का नाम आया है और उनसे जुड़ी किसी कथा का कुछ संकेत इसमें नहीं है। इन साक्ष्यों के अतिरिक्त जैनधर्म की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता के अनगिनत साक्ष्य श्रवणबेलगोला में यत्र—तत्र बहुधा मिलते हैं। ये साक्ष्य वहाँ के मंदिरों एवं पर्वतों पर शिलालेख के रूप में आज भी प्राचीन कन्नड़ भाषा में लिपिबद्ध हैं। इनमें शिलालेख संख्या ४०, ४२, ४३, ४७ और ५० में गृद्धपिच्छाचार्य इस पद का उल्लेख आया है। किन्तु इसी क्रम में शिलालेख संख्या १०५ और १०८ में उमास्वाति नाम भी उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। शिलालेख इस प्रकार है—

श्रीमानुमास्वातिरयं यतीशस्तत्त्वार्थसूत्रं प्रकटीचकार,

यन्मुक्तिमार्गाचरणोद्यतानां पाथेयमघ्र्यं भवति प्रजानाम्।
तस्यैव शिष्योऽजनि गृद्धपिच्छद्वितीयसंज्ञस्य बलाकपिच्छ:,
यत्सूक्तिरत्नानि भवन्ति लोके मुक्तांगनामोहनमण्डनानि।।[४]

इसके अतिरिक्त पं. फूलचन्द्रजी सिद्धान्त शास्त्री ने स्वविवेचित तत्त्वार्थसूत्र में इस ग्रंथ के रचयिता के नाम पर विस्तृत विचार किया है। इसमें उन्होंने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रचलित चार धारणाओं पर मन्तव्य प्रस्तुत किया है। ग्रंथकर्ता के नाम पर गृद्धपिच्छ, वाचक उमास्वाति, गृद्धपिच्छ उमास्वाति और गृद्धपिच्छ उमास्वामी—ये चार विचारधारायें हैं। इनमें से पण्डितजी ने गृद्धपिच्छ नाम ही स्वीकार किया है। ग्रंथकार के नाम के संबन्ध में उपलब्ध प्राचीनतम साक्ष्यों से लेकर वर्तमान विद्वत्—विचार—अम्बुधि तक जितने भी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर प्राचीनता की दृष्टि से आचार्य विद्यानन्द सर्वाधिक प्रामाणिक हैं। अत: ग्रंथकार का नाम उमास्वामी तथा गृद्धपिच्छ सर्वाधिक प्राचीन प्रमाण है।

दिगम्बर परंपरा इन्हें कुन्दकुन्द स्वामी का शिष्य मानती है। जबकि श्वेताम्बर परंपरा के अनुसार प्रज्ञापनासूत्र के रचयिता, श्यामाचार्य के गुरु हारितगोत्रीय ‘स्वाति’ ही तत्त्वार्थसूत्र के प्रणेता हैं।[५] १६वीं—१७वीं शताब्दी के धर्मसागर की तपागच्छ की पट्टावली को यदि अलग कर दिया जाय तो अन्य किसी श्वेताम्बर ग्रंथ या पट्टावली आदि में ऐसा निर्देश भी नहीं है कि उमास्वाति श्यामाचार्य के गुरु थे। पं. जुगलकिशोरजी मुख्तार तथा पं. नाथूराम प्रेमी—इन दोनों विद्वानों ने दशवीं शताब्दी से पूर्व का कोई साक्ष्य उपलब्ध हुआ नहीं माना है।[६] तत्त्वार्थसूत्र की उमास्वामिकृत प्रशस्ति इस प्रकार है—

वाचकमुख्यस्य शिवश्रिय: प्रकाशयशस: प्रशिष्येण।

शिष्येण घोषनन्दिक्षमणस्यैकादशांगविद:।।११।।

वाचनया च महावाचकक्षमणमुण्डपादशिष्यस्य।
शिष्येण वाचकाचार्यमूलनाम्न: प्रथितकीर्ते:।।२।।

न्यग्रोधिकाप्रसूतेन विहरता पुरवरे कुसुमनाम्नि।
कौभीषिणिना स्वातितनयेन वात्सीसुतेनाघ्र्यम्।।३।।

अर्हद्वचनं सम्यग्गुरूक्रमेणागतं समुपधार्य।।
दु:खार्तं च दुरागमविहतमिंत लोकमवलोक्य।।४।।

इदमुच्चैर्नागरवाचकेन सत्त्वानुकम्पया दृब्धम्।
तत्त्वार्थाधिगमाख्यं स्पष्टमुमास्वतिमा शास्त्रम्।।५।।

यस्तत्त्वाधिगमाख्यं ज्ञास्यति च करिष्यते च तत्रोक्तम्।
सोऽव्याबाधसुखाख्यं प्राप्स्यत्यचिरेण परमार्थम्।।६।।

अर्थ

जनके दीक्षागुरु ग्यारह अंग के धारक ‘घोषनन्दि’ क्षमण थे और प्रगुरु वाचकमुख्य ‘शिवश्री’ थे; वाचना (विद्याग्रहण) की दृष्टि से जिसके गुरु ‘मूल’ नामक वाचकाचार्य और प्रगुरु महावाचक ‘मुण्डपाद’ थे जो गोत्र से ‘कौभीषणि’ थे जो ‘स्वाति’ पिता और ‘वात्सी’ माता के पुत्र थे; जिनका जन्म ‘न्यग्रोधिका’ में हुआ था और जो ‘उच्चनागर’ शाखा के थे; उन उमास्वाति वाचक की गुरु—परंपरा से प्राप्त श्रेष्ठ आर्ह उपदेश को भली प्रकार धारण करके तथा तुच्छ शास्त्रों और हतबुद्धि दु:खित लोक को देखकर प्राणियों को अनुकम्पा से प्रेरित होकर यह ‘तत्त्वार्थाधिगम’ नाम का स्पष्ट शास्त्र विहार करते हुए ‘कुसुमपुर’ नामक महानगर में रचा है। जो इस तत्त्वार्थशास्त्र को जानेगा और उसके कथनानुसार आचरण करेगा, वह अव्याबाधसुख नामक परमार्थ मोक्ष को शीघ्र प्राप्त होगा। डॉ. हर्मन जैकोबी ने जर्मन अनुवाद तत्त्वार्थ में तत्त्वार्थसूत्र पर कार्य किया है ये इस प्रशस्ति को उमास्वातिकृत स्वीकारते हैं। उपर्युक्त प्रशस्ति में दिगम्बर मान्य किसी भी विचारधारा से सहमति नहीं प्रतीत होती है। चाहे कुन्दकुन्द को गुरु स्वीकार करना हो, या गोत्र का विषय हो दिगम्बर प्रसिद्ध कोई भी मान्यता इस प्रशस्ति से पुष्ट नहीं होती है। चूँकि कुन्दकुन्द का समय ई. पू. प्रथम शताब्दी मान्य है, अत: इस आधार पर इनका समय भी ई. पू. प्रथम शताब्दी से लेकर टीकाकार आ. पूज्यपाद के ५—६वीं शताब्दी के मध्य मानना ही उचित है।

३. सूत्रकार के रूप में उमास्वामी :

दिगम्बर परंपरा में आचार्य उमास्वामी की मान्यता जन—मानस के पटल पर एक सूत्रकार के रूप में ही अंकित है। इसका एक मात्र कारण यह है कि इस परंपरा में तत्त्वार्थसूत्र के अतिरिक्त इनकी अन्य कोई रचना मान्य नहीं है। संस्कृत भाषा में निबद्ध सूत्र शैली के इस ग्रंथ का महत्त्व तो इसका अर्थवेत्ता ही समझ सकता है। मात्र ‘च’ पद का प्रयोग करके इन्होंने कितने ही विषय का संक्षिप्तीकरण किया है। इस ग्रंथ के प्रथम अध्याय के आठवें सूत्र में प्रथम बार ‘च’ पद का प्रयोग ग्रंथकर्ता ने किया है तथा अंतिम बार दशवें अध्याय के छठें सूत्र में इसका प्रयोग किया है। श्वेताम्बर मान्य पाठ में भी ‘च’ पद का प्रथम प्रयोग प्रथम अध्याय के आठवें सूत्र में है तथा अंतिम प्रयोग दशवें अध्याय के छठें सूत्र में है। इसी क्रम में इस सूत्र—ग्रंथ का सबसे छोटा सूत्र ‘नाणो:’ है तथा सबसे दीर्घ सूत्र ‘गतिजातिशरीरांगो.....’ इत्यादि है। सूत्रकार आचार्य उमास्वामी ने जिस प्रवीणता के साथ इस ग्रंथ का सृजन किया है, उतनी ही चतुराई से तदाधारित सर्वार्थसिद्धि के रचयिता आचार्य पूज्यपाद ने उसका स्पष्टीकरण किया है। प्रत्येक स्थल पर पूज्यपादस्वामी ने पाठक के अन्तस्थ में उत्पन्न होने वाली समस्त शंकाओं का निर्मूलन किया है। वैसे भी सूत्रशैली के ग्रंथ का प्ररूपण करना कोई सामान्य कार्य नहीं है, किन्तु आचार्य उमास्वामी का समय तथा उनसे संबन्धित पूर्वापर काल इस प्रकार की रचनाओं के लिए प्रसिद्ध है—यथा पातञ्जलसूत्र, योगसूत्र, सांख्यसूत्र, न्यायसूत्र, वैशेषिकसूत्र, ब्रह्मसूत्र, परीक्षामुखसूत्र इत्यादि। जैन साहित्य में सूत्र शैली की यह परंपरा उमास्वामी से प्रारंभ होकर ग्यारहवीं—बारहवीं शताब्दी तक अस्तित्व में रही है यद्यपि वर्तमान समय में इनका अभाव ही देखने में आता है, किन्तु इसका कारण भी स्पष्ट है कि इस प्रकार की रचना के लिए बुद्धि की अतीव प्रखरता, विषय की अद्भुत पकड़ तथा जिस भाषा में रचना करनी हो उस पर व्याकरणात्मक दृष्टि से असाधारण नियंत्रण होना चाहिए, तभी इस प्रकार का कोई ग्रंथ मूत्र्तरूप ग्रहण कर सकता है और यह लिखने में जरा भी संकोच नहीं हो रहा कि इन सभी लक्षणों से आचार्य पूज्यपाद परिपूर्ण थे, जिससे ऐसी अद्भुत रचना का अमृतपान आज जन—सामान्य कर रहा है।

४. उमास्वामी / उमास्वाति का व्यक्तित्व एवं कृतित्व :

व्यक्तित्व—प्राचीन समय के किसी भी आचार्य के व्यक्तित्व का परिचय उनकी रचनाओं से होता था, अथवा उनके शिष्य, प्रशिष्य स्व—रचनाओं में गुरु का महिमा—मण्डन करते थे, अथवा परवर्ती ग्रंथकार आदर—ज्ञापन हेतु पूर्वाचार्यों का उल्लेख करते थे। किन्तु गृद्धपिच्छाचार्य के निजी जीवन के संबंध में स्वयं गृद्धपिच्छाचार्य ने कुछ नहीं लिखा है। श्वेताम्बर परंपरा में पं. सुखलालजी संघवी ने तत्त्वार्थसूत्र की प्रस्तावना में इन्हें उत्तर भारत के निग्र्रंन्थ संघ के कोटिकगण की उच्चानगरी शाखा का कहा है तथा वास्तविक नाम वाचक उमास्वाति लिखा है। इन्होंने गृद्धपिच्छ विशेषण को बहुत बाद का मानते हुए ९वीं—१०वीं शताब्दी का माना है। इनका जन्मस्थल सतना के निकट स्थित नागौद नामक ग्राम कहा है। पश्चात् में ये उच्चैर्नागर शाखा में दीक्षित हुए। यह शाखा भी सतना के समीप उँचेहरा (उच्च—नगर) नामक नगर से प्रारंभ हुई है। पं. नाथूराम ‘प्रेमी’ ने नगरतालु (मैसूर) के शिलालेख सं. ४६ में उद्धृत श्लोक के आधार पर उमास्वामी को यापनीय माना है। इस श्लोक में उमास्वामी ‘श्रुतकेवलिदेशीय’ विशेषण लगा है यही विशेषण यापनीय संघाग्रणी शाकटायन आचार्य के साथ भी जुड़ा है। इसी आधार पर पं. नाथूरामजी प्रेमी ने उन्हें यापनीय माना है।

कृतित्व—दिगम्बर—परंपरा मात्र तत्त्वार्थसूत्र को ही इनकी रचना मानती है। परवर्तीकाल में लिखित उमास्वामी श्रावकाचार भी इनकी कृति मानी जाती थी, किन्तु बीसवीं शताब्दी के कई विद्वानों ने सूक्ष्मता से विचार करके इस तथ्य का निरसन किया है। जबकि श्वेताम्बर—परंपरा में तत्त्वार्थसूत्र के अतिरिक्त तत्त्वार्थाधिगमभाष्य तथा प्रशमरतिप्रकरण भी इनकी रचना के रूप में स्वीकृत है।

५. ग्रंथ का नामकरण :

सर्वार्थसिद्धि के प्रत्येक अध्याय के अन्त में लिखा है ‘‘इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिकायां, ..... अध्याय: समाप्त:’ इस पंक्ति से ग्रंथ का नाम तत्त्वार्थ स्पष्ट होता है। पं. पूâलचन्द सिद्धान्तशास्त्री ने भी तत्त्वार्थ नाम ही माना है। सर्वार्थसिद्धि की पुष्पिका में (९३८) तत्त्वार्थवृत्ति नाम भी दिया है—

स्वर्गापवर्गसुखमाप्तुमनोभिरार्यैजैंनेन्द्रशासनवरामृतसारभूता।

सर्वार्थसिद्धिरिति सुद्रिरुपात्तनाम, तत्त्वार्थवृत्तिरनिशं मनसा प्रधार्या।।१।।

इस श्लोक में सर्वार्थसिद्धि का अन्य नाम तत्त्वार्थवृत्ति कहा है, जिससे मूल ग्रंथ का नाम तत्त्वार्थ स्पष्ट होता है। परवर्ती आचार्य विद्यानन्द ने ‘मुनिसूत्रेण’ तथा ‘तत्त्वार्थसूत्रकारै:’ पद का क्रमश: तत्त्वार्थश्लोकर्वाितक तथा आप्तपरीक्षा की स्वोपज्ञ टीका में प्रयोग किया है। इसके बाद के आचार्य वीरसेन ने धवला में ‘तच्चत्थसुत्ते’ अर्थात् तत्त्वार्थसूत्र का प्रयोग किया है। श्रवणबेलगोला के शिलालेखों में भी तत्त्वार्थसूत्र शब्द लिखा है।

पूर्वापर इस धारा को देखें तो प्राचीतम प्रमाण स्वयं में सर्वार्थसिद्धि है। अत: प्राचीन नाम तो तत्त्वार्थ ही प्रतीत होता है, किन्तु सूत्र शैली में निरूपित होने से पश्चाद्वर्ती काल में सूत्र शब्द तत्त्वार्थ के साथ रूढ़ हो गया होगा, क्योंकि परवर्ती सभी आचार्यो एवं ग्रंथकारों ने तत्त्वार्थसूत्र पद का प्रयोग किया है। इस आलेख का निष्कर्ष यह है कि तत्त्वार्थसूत्र का मंगलाचरण आचार्य उमास्वामी द्वारा विरचित है। तत्त्वार्थसूत्र के कत्र्ता का नाम उमास्वाति तथा गृद्धपिच्छ मानना उचित है। सूत्रकार के रूप में आचार्य उमास्वामी की एक मात्र रचना तत्त्वार्थसूत्र ही स्वीकार है। ग्रंथ का नाम तत्त्वार्थ है, किन्तु परवर्ती काल में इसका सूत्र शब्द के साथ प्रयोग रूढ़ हो गया है। इसके बाद अतिरिक्त भी अनेक ऐसे विषय हैं जिन पर अभी पुन: शोध की आवश्यकता है। दोनों परम्पराओं के सूत्रों पर तर्क—संगत तुलनात्मक अध्ययन भी इसी क्रम में अपेक्षित है।

टिप्पणी

  1. निग्र्रंथाचार्यवर्य: अतिनिकटीभवत्पमनिर्वाणेनासानभव्येन द्वैयाकनाम्ना भव्यवरपुण्डरीकेण स्पपृष्ट:’ भगवन्, किमात्मनेहितम् ? इति। भगवानपितत्प्रशनवशात् ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणोपक्षितसन्मार्गसम्प्राप्यो मोक्षो हित:’ इति प्रतिपादयितुकाम इष्टदेवता वशेषं नमस्करोति—मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्। ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्ध्ये।। तात्पर्यवृत्ति, पृ. १
  2. िंक पुनस्तत्वपरमेष्ठिनो गुणस्तोत्रं शास्त्रादौ सूत्रकार: प्राहुरिति निगद्यते।
  3. तत्त्वार्थश्लोकर्वाितक, पृ. ६
  4. आप्तपरीक्षा, श्लोक ११९
  5. धवला, पु. ५/३१६
  6. पाश्र्वनाथचरित, १/१६


डॉ. आनन्दकुमार जैन
निर्वाण भवन, बी—२/२४९, लेन सं. १४१
अनेकान्त जुलाई—सितम्बर २०१० पेज नं. १६ से २१