तत्त्वार्थसूत्र में ध्यान एक विश्लेषण

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तत्त्वार्थसूत्र में ध्यान एक विश्लेषण

भारतीय संस्कृति की अविच्छिन्न और विशाल परम्परा में विभिनन मतवादों या आचार-विचारों का अदभुत समन्वय है। यद्यपि वे विभिन्न आचार-विचार अपनी विशिष्टताओं के कारण अपना अलग-अलग अस्तित्व रखते हैं। तथापि उनमें एकसूत्रता भी पर्याप्त है। कितने ही ऐसे तत्त्व हैं जो प्रकारान्तर से एक दूसरे के पर्याय अथवा एक दूसरे के पूरक हैं। भारतीय ध्यान परम्परा भी इस दृष्टिबोध का अपवाद नहीं है। भारतवर्ष में अनेक दर्शनों के होते हुए भी प्रत्येक दर्शन का लंक्ष्य आत्मिक शांति है। उसकी प्राप्ति के लिए सभी दर्शनों ने ध्यान-योग पर बल दिया है। यह ही एक ऐसा विषय है जो सर्व दर्शनों में मान्य है। इस ध्यान-योग की परम्परा में भारत की तीन प्रमुख धारायें अन्तर्भुक्त हैं। वे हैं-वैदिक परम्परा, बौद्ध परम्परा और जैन परम्परा।

वैदिक परम्परा :

वेदिक परम्परा के अनेक ग्रन्थों में आत्मिक विकास हेतु ध्यान-योग की चर्चा मिलती है। ध्यान-योग का उल्लेख योगपद्धति-संहिता, ब्राह्वण ग्रन्थों, उपनिषदों, महाभारत, गीता, स्मृति ग्रन्थों, भागवतपुराण और शैवागम आदि में प्राप्त होता है। परन्तु इसे सम्यक स्वरूप महर्षि पतञ्जलि ने प्रदान किया है। इनके द्वारा रचित ‘पातञ्जल योगसूत्र’ पर अनके टीकायें भी लिखी गयी हैं, जिनमें व्यास भाष्य को सबसे ज्यादा प्रामाणिक माना गया है।

बौद्ध परम्परा :

वैदिक परम्परा की भाँति ही बौद्ध परम्परा में भी ध्यान-योग विषयक साहित्य उपलब्ध है। साधना के लिए इसे अनिवार्य माना गया है क्योंकि यह नैतिक आचार-विचार के द्वारा चरित्र को विकसित एवं सशक्त करता है। बौद्ध ग्रन्थ मज्झिमनिकाय और मिलिन्दप्रश्न में ध्यान योग का विशद वर्णन प्राप्त है।

जैन परम्परा :

जैन परम्परानुसार सांसारिक परिभ्रमण से मुक्त होने के लिए आत्मकल्याण हेतु ध्यान-योग अत्यन्त आवश्यक है। जैनग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र, तत्त्वानुशासन, आदिपुराण, ध्यानशतक, समाधितन्त्र इष्टोपदेश, ज्ञानार्णव, उपासकाध्ययन और योगयसारप्राभृत आदि ग्रन्थों में ध्यान-योग का विशद वर्णन प्राप्त होता है। हम यहाँ तत्त्वार्थसूत्र में निहित ध्यान का विश्लेषण करने का प्रयत्न करेंगे।

तत्त्वार्थसूत्र (मोक्षशास्त्र) :

इस ग्रन्थ के प्रणेता आचार्य उमास्वामी हैं। इनका समय विक्रम की पहली से चौथी शताब्दी विद्वानों ने सिद्ध किया है। आचार्य उमास्वामी ने इस ग्रन्थ में समस्त जैनागम का सार भर दिया है। इस ग्रन्थ पर दिगम्बर और श्वेतामबर दोनों सम्प्रदाय के आचार्यों ने टीकाएं व भाष्य लिखे हैं। मोक्षमार्ग एवं उसकी सिद्धि के लिए यह एक अद्वितीय ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ के नवम अध्याय में निर्जरा तत्त्व के अन्तर्गत ध्यान का वर्णन उपलब्ध है। इस अध्याय के बीसवें सूत्र में तप के अन्तरंग भेदों के अंतर्गत सूत्र संख्या २७ से ४७वें तक के ध्यान का उल्लेख किया गया है, जिसका विस्तार इसी अध्याय के २७वें सूत्र से लेकर ४४वें सूत्र तक है। योग का वर्णन छठवें अध्याय के प्रथम सूत्र[१] में अवश्य है, जो श्रद्धा, ज्ञान च चारित्र रूप न होकर मन-वचन-काय की प्रवृत्ति रूप है। इस ग्रन्थ के ‘आस्रव निरोध: संवर:’[२] सूत्र की तुलना हम पतञ्जलि के सूत्र ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोध’[३] से कर सकते हैं। सभी एकार्थवाची हैं और योगदर्शन की योग की परिभाषा से भी यह सिद्ध हो रहा है।

ध्यान का स्वरुप :

जैनागम में ध्यान का विस्तृत वर्णन किया गया है। ‘ध्यान को मोक्ष (परम सुख) की प्राप्ति का उपाय माना गया है।[४] मोक्ष के कारण सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र हैं जिन्हें मोक्षमार्ग माना जाता है।[५] जन्ममरणादि दु;खों से दुखी एवं सुख इच्छुक प्राणी सम्यकमार्ग के अभाव में चतुर्गति रूप परिभ्रमण कर रहें हैं। इससे भी अनभिज्ञ हैं कि परमसुख तो निजात्मा में ही है, जिसकी प्राप्ति का उपाय ध्यान है।

ध्यानशब्द ‘धयैचिन्तायाम्’ धातु से बनता है जिसका अर्थ चिन्तन का एकाग्रीकरण करना है। एकाग्रता का नाम ही ध्यान है। व्यक्ति जिस समय जिस भाव का चिन्तन करता है उस समय वह उस भाव के साथ तन्मय होता है इसलिए जिस किसी देवता, मंत्र या अर्हन्तादि को ध्याता है उस समय वह उस रूप हो जाता है। शुद्ध भावों से शुद्धात्मा का ध्यान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ध्यान का लक्षण-तत्त्वार्थसूत्र में इस प्रकार है - उत्तम संहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ।[६]

अर्थात् उत्तम संहनन वाले का एक विषय में चित्तवृति का रोकना ध्यान है तो अन्तर्मुहूर्त तक होता है।

उत्तम संहनन का अर्थ वङ्कावृषभनाराच और नाराच ये तीन संहनन है। ध्यान तीनों संहनन वाले कर सकते हैं परन्तु मोक्ष की प्राप्ति प्रथम संहनन से ही होती है।

ध्यान के अवलम्बन भूत द्रव्य या पर्याय को ‘अग्र’ और अग्र प्रधान वस्तु को एकाग्र कहते हैं। एकाग्र में चिन्ता का निरोध करना अर्थात् अन्य अर्थों की चिन्ता या विचार छोड़कर एक का विचार करना ध्यान कहलाता है। ध्यान का विषय एक ही अर्थ होता है। जब तक चित्त में नाना प्रकार के विचार आते रहेंगे तब तक ध्यान नहीं कहला सकता है। अत: एकाग्रचिन्तानिरोध का नाम ही ध्यान है।

इस ध्यान के लक्षण में जो एकाग्र का ग्रहण है वह व्यग्रता की विनिवृत्ति के लिए है। ज्ञान ही वस्तुत: व्यग्र्र होता है ध्यान नहीं। ध्यान को तो एकाग्र कहा जाता है।[७] चित्त को एकाग्र करने के लिए इष्टानिष्ट बुद्धि के मूल मोह का त्याग आवश्यक है क्योंकि इसके अभाव में ही चित्त स्थिर हो सकता है। ‘सर्वार्थसिद्धि में चित्त के विक्षेप का त्याग करना ही ध्यान कहा गया है।[८]

ध्यान का काल अन्तर्मुहूर्त है। किसी एक अर्थ में बहुकाल तक चित्त को लगाना कठिन है। अत: अन्तर्मुहूर्त के लिए भी एकाग्रचिन्ता निरोध दुर्धर है। ‘एक दिन या महिने भर तक भी ध्यान में रहने की बात सुनने में आती है परन्तु यह सम्भव नहीं है क्योंकि इतने काल तक एक ही ध्यान में रहने से इन्द्रियों का उपघात ही हो जायेगा’।[९] अन्तर्मुहूर्त में निश्चल रूप से एकाग्रचिन्ता निरोध द्वारा समस्त कर्मों का क्षय हो जाता है।

ध्यान के भेद :

प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से ध्यान के दो भेद कहे गये हैं। तत्त्वार्थसूत्र में कथित ध्यान के चार भेदों[१०] को इनके माध्यम से ही दो भागों में विभक्त किया गया है। ‘आर्त, रौद्र ये दो ध्यान अप्रशस्त एवं धर्म, शुक्ल ध्यान प्रशस्त ध्यान हैं।’[११]


जीवों के पाप रूप आशय के वश से तथा मोह, मिथ्यात्व कषाय और तत्त्वों के अयथार्थ रूप विभ्रम से उत्पन्न हुआ ध्यान प्रशस्त है।

पुण्य रूप आशय के वश से तथा शुद्ध लेश्या के अवलम्बन से वस्तु के यथार्थ स्वरूप चिन्तवन से उत्पन्न हुआ ध्यान अप्रशस्त एवं असमीचीन है। इसके अलावा शुभ, अशुभ और शुद्धि की अपेक्षा ध्यान के तीन भेद हो सकते हैं।[१२] आर्त-रौद्र अशुभ, धम्र्यध्यान शुभ और शुक्लध्यान शुद्ध ध्यान है। अशुभ ध्यान संसार का हेतु है। इसलिए धवला में इसका ग्रहण नहीं किया गया है। ‘धवला में ध्यान के दो भेद धम्र्य और शुक्ल ही स्वीकार्य हैं।[१३]

अन्य आचार्योंं द्वारा प्रणीत ग्रन्थों के अध्ययन के पश्चात् भी ध्यान के चार भेद आर्त, रौद्र, धम्र्य और शुक्ल ही सिद्ध होते हैं।

आर्तध्यान :

दु:खावस्था को प्राप्त जीव का जो ध्यान है वह आर्तध्यान कहलाता है।[१४] ‘आर्तशब्द ऋत’ अथवा अर्ति इनमें किसी एक से बना है। इनमें ऋत का अर्थ दु:ख है और अर्ति की ‘अर्दनं अर्ति’ ऐसी निरुक्ति होकर उसका अर्थ पीड़ा पहुंचाना है। इसमें जो होता है वह आर्त है।[१५]

संसारी जीव को प्रति समय कलुषित परिणाम वर्तते रहते हैं इनमें कुछ इष्ट वियोग जनित, कुछ अनिष्ट जहनत कुछ प्रतिकूल वेदना जनित और कुछ आगामी भोगों की तृष्णा जनित होते हैं। ये सभी प्रकार के परिणाम आर्तध्यान कहलाते हैं। यह नियम से अघ:पतन के कारण होते हैं। परिग्रह में आसक्त होना, कुशील रूप प्रवृत्ति करना, कृपणता करना, ब्याज लेकर आजीविका चलाना, अत्यन्त लोभ करना, भय करना, उद्वेग करना और अतिशय शोक करना आर्तध्यान के बाह्य चिह्न हैं।

तत्त्वार्थसूत्र में इसे चार भागों में विभक्त किया गया है -

१. अनिष्ट योगज आर्तध्यान २. इष्टवियोगज आर्तध्यान ३. वेदना जनित आर्तध्यान ४. निदान सम्बन्धी आर्तध्यान

(१) अनिष्टयोगज आर्तध्यान -

अनिष्ट एवं अप्रिय वस्तुओं के संयोग होने पर जो संक्लेश होता है वह अनिष्ट संयोगज आर्तध्यान है। तत्त्वार्थसूत्रकार भी अमनोज्ञ पदार्थ के प्राप्त होने पर उसके वियोग के लिए चिंता सातत्य का होना प्रथम आर्तध्यान कहते हैं।[१६]

विष, कण्टक शत्रु और शस्त्रादि बाधाकारी अप्रिय वस्तुओं के मिल जाने पर ‘ये मुझसे कैसे दूर हों, इस प्रकार की सबल चिंता आर्त है। स्मृति को दूसरे पदार्थ की ओर न ले जाकर बार-बार उसी में लगाये रखना स्मृति समन्वाहार है।

(२) इष्टवियोगज आर्तध्यान -

‘मनोज्ञ वस्तु के वियोग होने पर उसकी प्राप्ति की सतत चिंता करना इष्टवियोगज आर्तध्यान है।’[१७]

मनोज्ञ अर्थात् अपने इष्ट धन, ऐश्वर्य, स्त्री-पुरुष, कुटुम्ब, मित्र आदि सांसारिक भोगों के पदार्थों के वियोग होने पर उसकी प्राप्ति के लिए संकल्प अर्थात् लगातार चिंता करना दूसरा आर्तध्यान जानना चाहिए।

(३) वेदनाजनित आर्तध्यान -

‘वेदनायश्च’[१८] रोगादि के कारण शारीरिक वेदना होने पर उसे दूर करने की सतत चिन्ता करना वेदना जनित आर्तध्यान है। वेदना शब्द यद्यपि सुख और दु:ख दोनों अर्थों में विद्यमान है पर यहाँ आर्तध्यान का प्रकरण होने से दु:ख वेदना का ग्रहण किया गया है। वातादि विकार जनित दु:ख रूप वेदना के होने पर उसका अभाव कैसे होगा इस प्रकार की निरन्तर चिन्ता तृतीय आर्तध्यान है।

(४) निदान समबन्धी आर्तध्यान -

‘निदानञ्च’[१९] प्रीति विशेषता तीव्रकामादि वासना से आगे के भवों में भी कायक्लेश के बदले विषय सुखों की आकांक्षा करना निदान है। निदान के लिए ही मन:प्रणिधान का होना चतुर्थ आर्तध्यान है।

‘ये चारों आर्तध्यान कृष्ण नील और कापोत लेश्या वालों के होते हैं। ये अज्ञान मूलक, तीव्र पुरुषा जन्य, पाप प्रयोगाधिष्ठान, नाना संकल्पों से आकुल, विषय तृष्णा से परिव्याप्त, धर्माश्रय परित्यागी, कषाय स्थानों से युक्त, अशान्तिवर्धक, प्रमादमूल, अकुशल कर्म के कारण, कटुकफल वाले, असाता बन्धक और तिर्यंच गति ले जाने वाले होते हैं।’[२०]

‘यह आर्तध्यान अविरत, देशविरत और प्रमत्त संयत जीवों के होता है।’[२१] असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक के सभी जीव अविरत कहलाते हैं, संयतासंयत जीव देशविरत कहलाते हैं और प्रमाद से युक्त क्रिया करने वाले जीव प्रमत्तसंयत कहलाते हैं। इनमें अविरत और देशविरत जीवों के चारों आर्तध्यान ही होते हैं क्योंकि वे असंयम रूप परिणामों से युक्त होते हैं। प्रमत्तसंयतों के निदान के अलावा बाकी के तीनों आर्तध्यान प्रमाद के उदय की तीव्रता के कारण होते हैं। पुराण साहित्य में मुनियों द्वारा निदान करने के कई उदाहरण हैं पर इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने प्रमत्तसंयत अवस्था में निदान किया क्योंकि भावलिंगी साधु के आगामी भोगों की आकांक्षा होती ही नहीं और कदाचित् होती भी है तो उस समय वह साधु भावलिंगी नहीं रहता।

यह आर्तध्यान संसार का कारण है। इसका फल तिर्यञ्च गति है।

रौद्रध्यान

‘रुद्र का अर्थ क्रूर आशय है, इसका कर्म या इसमें होना वाला भाव रौद्र है। इससे युक्त ध्यान रौद्र ध्यान है।[२२] जो पुरुष प्राणियों को रुलाता है वह रुद्र, क्रूर अथवा सब जीवों में निर्दय कहलाता है ऐसे जीवों में जो ध्यान होता है, उसे रौद्र ध्यान कहते हैं। इसका आधार क्रोध कषाय है। यह ध्यान भी अशुभ (अप्रशस्त) है। इसमें जीव की प्रकृति पाप रूप होती है एवं पाप में वह गर्व महसूस करता है। तत्त्वार्थसूत्र में इसका लक्षण इस प्रकार है -

‘हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयो:’[२३]

अर्थात् हिंसा, असत्य, चोरी और विषय संरक्षण के लिए सतत चिंतन करना रौद्र है वह अविरत और देशविरत के होता है। इस सूत्र के अनुसार इसके भी चार भेद किये जा सकते हैं। ‘स्थानांग’ में इसका उल्लेख किया गया है।[२४]

(१) हिंसानंद रौद्रध्यान

तीव्र कषाय के उदसे से हिंसा में आनन्द मानना हिंसानंद रौद्रध्यान है। इस ध्यान से युक्त जीव को अपने या दूसरे के द्वारा अन्य प्राणियों को मारने, काटने या पीड़ित किये जाने पर हर्ष होता है। वह अपने आपको इसमें ही सुखी मानता है। उसका स्वभाव निर्दयी एवं बुद्धि पापमयी हो जाती है।[२५]

(२) मृषानन्द रौद्रध्यान

जिन पर दूसरों को श्रद्धान न हो सके ऐसी अपनी बुद्धि के द्वारा कल्पना की हुई युक्तियों के द्वारा दूसरों को ठगने के लिए झूठ बोलने के संकल्प का बार-बार चिन्तन करना मृषानन्द रौद्र ध्यान है। इसके कारण व्यक्ति अपने कार्य की सिद्धि के लिए झूठ बोलकर दूसरों को संकट में डाल देता है।

(३) चौर्यानन्द रौद्रध्यान

जबरदस्ती अथवा प्रमाद से प्रतीक्षा पूर्वक दूसरे के धन हरण का संकल्प सोचना चौर्यानन्द रौद्रध्यान है। जो तीव्र क्रोध व लोभ से व्याकुल रहता है उसका चित्त दूसरों का सामान हड़पने में ही लगा रहता है। ऐसे जीव को चोरी में ही आनन्द प्राप्त होता रहता है।

(४) विषय संरक्षणानन्द रौद्रध्यान

चेतन-अचेतन रूप अपने परिग्रह में यह मेरा है मैं इसका स्वामी हूँ इस प्रकार ममत्व रखकर उसके अपहरण करने वाले का नाश कर उसकी रक्षा करने के संकल्प का बार-बार चिन्तन करना विषय संरक्षणानन्द नाम का चौथा रौद्रध्यान है। ऐसा जीव काम भोग के साधनादि सांसारिक वैभव के संचय और संरक्षण में सदा व्यस्त रहता है और सतत उनका ही चिन्तन करता है।[२६]

यह रौद्रध्यान अत्यन्त अशुभ है। कृष्ण आदि तीन खोटी लेश्यओं के बल से उत्पन्न होता है। यह संसार बुद्धि का करने वाला है और खासतौर से नरक गति के पापों को उत्पन्न करने वाला है। यह ध्यान नरक गति की जड़ है।

यह छठे गुणस्थान के पूर्व पाँच गुणस्थानों में होता है। छठवें गुणस्थानवर्ती को रौद्र ध्यान नहीं हो सकता क्योंकि छठवें गुणस्थान में पापों का पूर्णरूप से त्याग होता है।

धम्र्य ध्यान

‘जो धर्म से युक्त होता है वह धम्र्य है’[२७] अत: धर्म से युक्त ध्यान ही धम्र्यध्यान है। रागद्वेषमूलक समस्त पर पदार्थों का त्यागकर श्रेयोमार्ग में स्थित साधक साम्यता का अभ्यास करने के लिए ध्यान को ध्याता है वह धम्र्यध्यान है। जिससे धर्म का परिज्ञान हो वह धम्र्यध्यान है। आर्जव, लघुत्व, मार्दव और उपदेश ये इसके लक्षण हैं।[२८] रागद्वेष के परित्याग पूर्वक तत्त्वार्थ एवं तत्त्व आदि का चिन्तन अन्तरंगधर्मध्यान एवं ‘पञ्चपरमेष्ठी की भक्ति आदि एवं उसके अनुकूल शुभानुष्ठान से बहिरंग धम्र्यध्यान होता है।[२९] बारह भावनाओं को और दशलक्षण धर्मों का चिन्तवन, जिन और साधुओं के गुणों का कीर्तन करना, विनय-दान संपन्नता, श्रुत, शील और संयम में रत होना ये सब बातें धर्मध्यान में होती हैं।[३०] आचार्य उमास्वामी महोदय ने धम्र्यध्यान का लक्षण इस प्रकार कहा है -

आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयायधम्र्यम् ।[३१]

अर्थात् आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान विचय इनकी विचारणा के लिए मन को एकाग्र करना धम्र्यध्यान है।

आज्ञा विचय -

उपदेष्टा आचार्यों का अभाव हाने से स्वयं मन्दबुद्धि होने से, कर्मों का उदय होने से और पदार्थों के सूक्ष्म होने से तथा तत्त्व के समर्थन में हेतु तथा दृष्टान्त का अभाव होने से सर्वज्ञ प्रणीत आगम को प्रमाण करके ‘यह इसी प्रकार है, क्योंकि जिन अन्यथावादी नहीं होते’ इस प्रकार गहन पदार्थ के श्रद्धान द्वारा अर्थ का अवधारणा कर सर्वज्ञ की आज्ञा को प्रकाशित करना आज्ञा-विचय धम्र्यध्यान है।

अपाय विचय -

मिथ्यादृष्टि जीव जन्मान्ध पुरुष के समान सर्वज्ञ प्रणीत मार्ग से विमुख होते हैं, उन्हें सन्मार्ग का परिज्ञान न होने से वे मोक्षार्थी पुरुषों को दूर से ही त्याग देते हैं, इस प्रकार सन्मार्ग के अपाय का चिन्तन करना अपाय चिय धम्र्यध्यान है।

विपाक विचय -

ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के प्रकृति, प्रदेश, स्थिति और अनुभाग रूप चार प्रकार के बन्धों के विपाक फल का विचार करना विपाक विचय नाम का धम्र्यध्यान है।

संस्थान विचय -

तीनों लोकों के संस्थान, प्रमाण और आयु आदि का चिन्तन करना संस्थान विचय धम्र्यध्यान कहा गया है। ज्ञानार्णव में संस्थान विचय के चार भेद कहे हैं।

पिण्डस्थं च पदस्थं च, रूपातीतं रूपवर्जितम् ।[३२]

चतुर्धाध्यानमाम्नातं, भव्यराजीवभास्करै: ।।

मन्त्र वाक्यों में स्थिति पदस्थ, निजात्मा का चिंतवन पिण्डस्थ, सर्वचिद्रूप का चिन्तन रूपस्थ और निरंजन का ध्यान रूपातीत है।

‘बाह्य और अभ्यंतर के भेद को धम्र्यध्यान से दो भेद भी किये हैं।[३३]

धम्र्यध्यान में जीव को मन्द-तीव्र आदि विशुद्धि के आधार पर पीत, पद्म और शुक्ल लेश्यायें होती हैं। वास्तविक धम्र्यध्यान मिथ्यादृष्टि नहीं कर सकता क्योंकि जो प्रमाण व नय के द्वारा वस्तु का निश्चय करके उसे नहीं जानता, वह ध्यान की भावना के द्वारा भी आराधक नहीं हो सकता। यह अविरतसम्यग्दृष्टि, देशविरत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्त संयत जीवों के होता है।

‘यह धम्र्यध्यान मोक्ष का कारण है।[३४] धम्र्यध्यान में लीन जीव के नवीन अशुभ कर्मों का ग्रहण नहीं होता, पुराने कर्मों की निर्जरा होती है और शुभ कर्मों का आस्रव होता है। स्वर्गादिक के उत्तम सुख की प्राप्ति में भी यही कारण है।

शुक्ल ध्यान -

‘जिसमें शुचि गुण का सम्बन्ध है वह शुक्लध्यान है। जैसे मैल हट जाने से वस्त्र शुचि होकर शुक्ल कहलाता है उसी तरह निर्मल गुण युक्त आत्मपरिणति भी शुक्ल है।[३५] ध्यान करते हुए साधु को बुद्धिपूर्वक राग समाप्त हो जाने पर जो निर्विकल्प समाधि होती है उसे शुक्लध्यान कहते हैं। उसकी उत्तरोतर वृद्धिंगत चार श्रेणियाँ हैं। पहली श्रेणी में अबुद्धिपूर्वक ही ज्ञान में ज्ञेय पदार्थ की तथा योग प्रवृत्तियों की संक्रान्ति होती रहती है। अगली श्रेणियों में यह नहीं रहती।

यह शुक्लध्यान रत्नदीपक की ज्योति की भांति निष्कंप होकर ठहरता है। श्वास का निरोध इसमें करना नहीं पड़ता अपितु स्वयं ही हो जाता है। धर्मध्यान तो सालम्बन ध्यान है लेकिन यह ध्यान निरालम्बन ध्यान है। यह साक्षात् मोक्ष का कारण है।

‘इस शुक्ल ध्यान की चार श्रेणियां हैं - पृथक्त्ववितर्कवीचार, एकत्ववितर्कवीचार, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती और समुच्छिन्नक्रियानिवृत्।[३६]

(१) पृथक्तव वितर्क वीचार -

पहले के दो ध्यान एकाश्रय वाले, सवितर्क और सवीचार होते हैं।[३७] वितर्क का अर्थ श्रुत है।[३८] अर्थ, व्यञ्जन और योग की संक्रांति वीचार है।[३९] अर्थात् पृथक्तव अर्थात् भेद रूप से वितर्क श्रुत का वीचार (संक्रान्ति) जिस ध्यान में होती है, वह पृथक्तव वितर्क वीचार नाम शुक्ल ध्यान है।

‘जिस प्रकार अपर्याप्त उत्साह से बालक अव्यवस्थित और मौथरे शस्त्र के द्वारा भी चिरकाल में वृक्ष को छेदता है उसी प्रकार चित्त की सामथ्र्य को प्राप्त कर जो द्रव्य परमाणु और भाव परमाणु का ध्यान कर रहा है वह अर्थ और व्यञ्जन तथा काय और वचन में पृथक्तव रूप से संक्रमण करने वाले मन के द्वारा मोहनीय कर्म की प्रकृतियों का उपशम और क्षय करता हुआ पृथक्तव वितर्क वीचार ध्यान को धारण करने वाला होता है। फिर शक्ति की कमी से योग से योगान्तर, व्यञ्जन से व्यञ्जनान्तर, अर्थ से अर्थान्तर को प्राप्त कर मोहराज का विधूनन कर ध्यान से निवृत्त होता है यह पृथक्तव वितर्क वीचार ध्यान है।[४०]

(२) एकत्ववितर्कवीचार -

‘इस ध्यान के द्वारा ध्याता एक ही योग का आश्रय लेकर एक ही द्रव्य का चिन्तन करता है, इसलिए इसे एकत्व वितर्क ध्यान कहा गया है।[४१] यह अवीचार ध्यान है।[४२] जो समूल मोहनीय कर्म का दाह करना चाहता है, जो अनन्तगुणी विशुद्धि विशेष को प्राप्त होकर बहुत प्रकार की ज्ञानावरणी की सहायभूत-प्रकृतियों के बन्ध को रोक रहा है, जो कर्म की स्थिति को न्यून और नाश कर रहा है, जो श्रुतज्ञान के उपयोग से युक्त है, जो अर्थ, व्यञ्जन और योग की संक्रान्ति से रहित है। निश्चल मन वाला है, क्षीण कषाय है और वैडूर्यमणि के समान निर्लेप हैं इस प्रकार एकत्ववितर्क ध्यान कहा गया है।[४३]

(३) सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाती -

यह ध्यान वितर्क रहित, अवीचार, सूक्ष्मक्रिया वाले आत्मा के होता है। एकत्ववितर्क शुक्लध्यानरूपी अग्नि के द्वारा जिसने चार घातिया कर्मरूपी र्इंधन को जला दिया है। वह जब आयु कर्म में अन्तर्मृहर्त काल शेष रहता है तब सब प्रकार के वचनयोग, मनोयोग और बादर काययोग को त्यागकर सूक्ष्मकाययोग का आलम्बन लेकर सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यान को स्वीकार करते हैं। परन्तु जब उनकी (सयोगी जिन की) आयु अन्तर्मुहर्त शेष रहती है तब समुद्घात के द्वारा चार कर्मों की स्थिति को समान करके अपने पूर्व शरीर प्रमाण होकर सूक्ष्मकाययोग के द्वारा सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती ध्यान को स्वीकार करते हैं।[४४]

(४) समुच्छिन्नक्रियानिवृत्ति -

सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती ध्यान के उपरान्त केवली समुच्छिन्न क्रियानिवृत्ति ध्यान को प्रारंभ करते हैं। इससे प्राणपान के प्रचार रूप क्रिया का तथा सब प्रकार के काययोग वचनयोग और मनोयोग के द्वारा होने वाली आत्मप्रदेश परिस्पन्द रूप क्रिया का उच्छेद हो जाने से इसे समुच्छिन्न क्रियानिवृत्ति ध्यान कहते हैं।[४५]

प्रारंभ के दो शुक्ल ध्यान सम्पूर्ण श्रुत के धारक को होते हैं।[४६] प्रथम शुक्ल ध्यान के धारक मुनि होते हैं। द्वितीय शुक्ल ध्यान क्षीणकषाय गुणस्थान में ही संभव है।[४७] काययोग वाले केवलि के सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती ध्यान एवं अयोग केवलि के व्युपरतक्रियानिवृर्ति्त ध्यान होता है।[४८]

‘स्त्रियों को शुक्ल ध्यान नहीं होता, क्योंकि उनका चित्त शुद्ध नहीं होता और स्वभाव से शिथिल परिणाम होते हैं। प्रतिमास रक्तस्राव की चिंता से शंका हमेशा बनी रहती है।[४९] इस कारण यह पंचमगुणस्थान से ऊपर भी नहीं जा सकती है।

प्रथमशुक्लध्यान के फलस्वरूप संवर, निर्जरा और अमर सुख की प्राप्ति होती है, लेकिन मुक्ति की प्राप्ति नहीं होती। द्वितीय ध्यान के फलस्वरूप तीन घातिया कर्मों का नाश होता है। तृतीय ध्यान से योग का क्रमश: नाश होता है एवं चतुर्थध्यान में शैलशी अवस्था के काल के क्षीण होने पर सब कर्मों से मुक्त हुआ यह जीव एक समय में सिद्धावस्था को प्राप्त होता है।

उपसंहार

जैन परम्परा में ध्यान का एक विशिष्ट एवं उच्च स्थान है। तत्त्वार्थसूत्र ध्यान का ग्रन्थ न होकर मोक्षमार्ग को प्रतिपादित करने वाला ग्रन्थ है। इसमें निर्जरा तत्त्व के अन्तर्गत तप के भेदों में ध्यान का वर्णन अवश्य किया गया है, लेकिन ज्ञानार्णव, उपासकाध्ययन, ध्यान शतक, योगशतक आदि ग्रन्थों में इसका विशद और विस्तृत वर्णन है।

जैन साहित्य में प्रचुर मात्रा में ध्यान से संबन्धित सामग्री उपलब्ध होते हुए भी जन सामान्य इससे अनभिज्ञ है। अत: जैन ध्यान को जनसामान्य तक पहुंचाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है एवं पूर्वाचार्यों द्वारा रचित ध्यान के अनुपलब्ध साहित्य को खोजना आवश्यक है। इसलिए शोधकर्ताओं को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

डॉ. मुकेश जैन अनेकान्त जन०-मार्च २०१२

टिप्पणी

  1. कार्यवाड्.मन: कर्म योग: (तत्त्वार्थसूत्र ६/१)
  2. तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ९ सूत्र १
  3. योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:। पातञ्जलयोगसूत्रम्
  4. मोक्षोपायो योगो ज्ञानश्रद्धानचरणात्मक:। (अभिज्ञान चिन्तामणि १/७७)
  5. आत्मायत्तं निरबाघमतीन्द्रियमनश्वरम् । घातियाकर्मक्षयोद्भूतं तन्मोक्षसुखं विदु:।। तत्त्वानुशासन २४२
  6. तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ९ सूत्र २७
  7. एकाग्रग्रहणं चात्र वैयग्रयविनिवृत्तये। व्यग्रं हि ज्ञानमेव स्याद्धयानमेकाग्रमुच्यते।। (तत्त्वानुशासन ५९)
  8. चित्तविक्षेपत्यागोध्यानम् ! सवार्थसिद्धि ९/२०/४३९/८)
  9. स्यादेतत् ध्यानोपयोगेन दिवसमासाद्यवस्थाननान्तर्मुहूर्तादिति:तन्न, किं कारणम् ? इन्द्रियोपघात प्रसंगात् । (राजवार्तिक, ९/२७/२२)
  10. आर्तरौद्रधम्र्यशुक्लानि। (तत्त्वार्थसूत्र ९/२८)
  11. अट्टंच रूद्द सहियं दोण्णिवि झाणामि अप्पसत्थाणि। धम्मं मुक्कुं च दुवे पसत्थ झाणाणि णेयाणि।। (मूलाचार ३९४)
  12. ज्ञानार्णव ३/२७-२८
  13. धवला पुस्तक नं. १३ पृ. १०
  14. तत्त्वार्थवृत्ति ९/२८ पृ. ४९७
  15. सवार्थसिद्धि ९/२८/८७४
  16. आर्तममनोज्ञस्य संप्रयोगेतद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारा। तत्त्वार्थसूत्र-९/३०
  17. विपरीतं मनोज्ञस्य। तत्त्वार्थसूत्र ९/३१
  18. तत्त्वार्थसूत्र ९/३२
  19. तत्त्वार्थसूत्र ९/३३
  20. तत्त्वार्थराजवार्तिक, अध्याय ९, सूत्र ३३ पृ. ७९२
  21. तत्त्र्वाथसूत्र ९/३४
  22. रुद्र:क्रूराशयस्तस्य कर्मतत्र भवं वा रौद्रम् । सवार्थसिद्धि ९/२८/४४५/१०
  23. तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय ९ सूत्र ३५
  24. रोद्दे झाणे चउव्विहे पं.तं. हिंसाणुबन्धि मोसाणुबन्धि तेणाणुबन्धि रक्खखणाणुबन्धि स्थानांग, पृ. १८८
  25. ज्ञानार्णव २६/५
  26. सद्दाइविसय साहणधण सारक्खण परायणमणिट्ठं । सत्वाभि संकण परोवधयकलुसाउलंचित्तं ।। ध्यानशतक २२
  27. सवार्थसिद्धि ९/३६/४५०/४
  28. धम्मस्सलक्खणं से अज्जक्लहुगत्तमद्दवीव समा उवदेसणा य सुत्ते णिसग्गजाओ रुचीओ दे ।। (भगवती आराधना/मूल टीका १७०९/१५४१)
  29. पञ्चपरमेष्ठीभक्तयादि तदनुकूलशुभानुष्ठानं पुनर्बहिरं धर्मध्यानं भवति (द्रव्यसंग्रह/टीका/४८/२०५/३)
  30. जिण-साहु-गुणक्कित्रण-पसंसृणा-विणय-दाणसंपण्णा। सुद सील संजमरदा धम्मज्झाणे मुणेयव्वा ।। धवला गाथा ५५/७६
  31. तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ९ सूत्र ३६
  32. ज्ञानार्णव ३७/१
  33. चारित्रसार १७२/३
  34. परे मोक्ष हेतू तत्त्वार्थसूत्र ९/२९
  35. (क) सवार्थसिद्धि ९/२८/४५/११ (ख) राजवार्तिक, ९/२८/६२७/३१
  36. पृथक्तवैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरतक्रियानिवर्तीनि। (तत्त्वार्थसूत्र ९/३९) भगवती आराधना/मू/१८७८-१८७९, द्रव्य संग्रह/टीका/४८/२०३/३
  37. एकाश्रये सवितर्कवीचारे पूर्वे । तत्त्वार्थसूत्र ९/४१
  38. वितर्क: श्रुतम् । तत्त्वार्थसूत्र ९/४३
  39. वीचारोऽर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्ति: । तत्त्वार्थसूत्र ९/४४
  40. (क) सर्वार्थसिद्धि ९/४४/४५६/१ (ख) महापुराण २१/१७०-१७३
  41. जेणेगमेव दव्वं जोगेणेगेण अण्णदरेण । खीण कसायो ज्झायदि तेणेगत्तं तयंभणियं ।। भगवती आराधाना /मू. १८८३/१६८५
  42. तत्त्वार्थसूत्र ९/४२
  43. सर्वार्थसिद्धि ९/४४/४५६/४
  44. सर्वार्थसिद्धि ९/४४/४५६/८
  45. सर्वार्थसिद्धि ९/४४/४५७/६ राजवार्तिका ९/४४/१/६३५/११ चारित्रसार २०९/३
  46. (क) सर्वार्थसिद्धि ९/४४/४५४/११ (ख) शुक्ले चाद्ये पूर्वविद: (तत्त्वार्थसूत्र ९/३७)
  47. भगवती आराधना /मू. /१८८१
  48. (क) सर्वार्थसिद्धि ९/४०/४५४/७ (ख) परे केवलिन:/३८/यैकयोगकाययोगायोगानाम् /४० । (तत्त्वार्थसूत्र ९/३७, ४०)
  49. चित्त सोहिण तेसिं ढिल्लं भावं तहा सहावेण। विज्जदि मासा तेसिं इत्थीसु ण संकया झाणा ।। (सूत्तपाहुड, २६)