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तत्त्वार्थ सूत्र में द्रव्य विमर्श

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तत्त्वार्थ सूत्र में द्रव्य विमर्श

भारत की दर्शन परम्परा अतिप्राचीन है। भारतीय आस्था एवं परम्परा की आधारशिला दर्शन पर स्थापित है अथवा अन्योन्याश्रय सम्बन्ध कहना अधिक उचित होगा। दर्शन की धुरी द्रव्य, तत्त्व, पदार्थ के केन्द पर ही घूमती है। द्रव्य शब्द केवल दर्शन का ही नहीं, अपितु भारतीय वाङ्मय, संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि समस्त प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं का अत्यन्त प्रचलित शब्द है। चाहे काव्य हो या व्याकरण, तत्त्वमीमांसा हो या आयुर्वेदशास्त्र, इनमें द्रव्य का भिन्न—भिन्न अर्थों में प्रयोग होता है। पाणिनी ने भी द्रव्य की व्युत्पत्ति दो प्रकार से बतलाई है तद्धित में और कृदन्त प्रकरण में। तद्धित में भी दो प्रकार से है—प्रथम वृक्ष या काष्ठ का विकार या अवयव द्रव्य है। द्वितीय—जिस प्रकार लकड़ी मनचाहा आकार ग्रहण कर लेती है उसी प्रकार द्रव्य भी होता है। कृदन्त प्रकरण के अनुसार द्रव्य की उत्पत्ति द्रु धातु से कर्मार्थक ‘यत्’ प्रत्यय से होती है जिसका अभिप्राय है प्राप्तियोग्य अर्थात् जिसे अनेक अवस्थायें प्राप्त होती हैं। दार्शनिक परिभाषा में द्रव्य इस प्रकार परिभाषित किया गया है—‘‘अद्रव्यत् द्रवति द्रोष्यति तास्तान् पर्यायान् इति द्रव्यम्’’ अर्थात् जो विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त हो रहा है और होगा वह द्रव्य है। जो अवस्थाओं के विनाश होते रहने पर भी ध्रुव बना रहता है वह द्रव्य है।

सत् सत्ता अथवा अस्तित्व द्रव्य का स्वभाव है। वह अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रखता। अत: अनादि अनन्त है। एक द्रव्य दूसरे द्रव्य से उत्पन्न नहीं होता। सभी द्रव्य स्वभाव सिद्ध हैं क्योंकि वे सब अनादि निधन हैं। अनादिनिधन को किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती। द्रव्य सदैव स्थायी रहता है। सभी भारतीय दर्शन द्रव्य की मीमांसा करते हैं क्योंकि यही दार्शनिक मीमांसा का प्रमुख स्रोत है। दार्शनिक दृष्टि जगत्, जीव, उनके दु:ख और दु:खों के उपाय के इर्द गिर्द ही घूमती है। उद्देश्य रूप द्रव्य के विषय में किसी भी दर्शन का मतभेद नहीं है परन्तु द्रव्य के स्वरूप एवं भेद में मतभेद दृष्टव्य है। जाति की अपेक्षा जीव पुद्गल आदि जितने पदार्थ हैं वे सब द्रव्य कहलाते हैं। द्रव्य शब्द में दो अर्थ छिपे हैं—द्रवणशीलता और ध्रुवता। जगत् का प्रत्येक पदार्थ परिणमनशील होकर भी ध्रुव है। अत: उसे द्रव्य कहते हैं। आशय यह है कि प्रत्येक पदार्थ अपने गुणों और पर्यायों का कभी उल्लंघन नहीं करता है।

चूँकि प्रस्तुत शोध—आलेख का विषय द्रव्य पर आधारित है एतदर्थ यहाँ तत्त्वार्थसूत्र के परिप्रेक्ष्य में इसका विवेचन किया गया है। आचार्य उमास्वामी ने तत्त्वार्थसूत्र के पंचम अध्याय में द्रव्य के दो लक्षणों को र्विणत किया है। जिनमें से प्रथम लक्षण है ‘‘सद्द्रव्य लक्षणम्’’ [१]अर्थात् सत् द्रव्य का लक्षण है। सत् का स्वरूप र्विणत करते हुए आचार्य लिखते हैं कि—उत्पाद—व्यय—ध्रौव्ययुत्तंकं सत्।[२] अर्थात् जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त होता है वह द्रव्य कहलाता है। यहाँ आचार्य का आशय यह है कि जो भी द्रव्य की संज्ञा को प्राप्त है वह इन तीनों से युक्त अवश्य ही होता है। ये तीनों एक दूसरे के अविनाभावी हैं। इन तीनों अवस्थाओं का स्वरूप इस प्रकार है—

उत्पाद—द्रव्य की नवीन पर्याय का उत्पन्न होना उत्पाद कहलाता है। जैसे—नरक से मनुष्य पर्याय में उत्पन्न होना, मनुष्य पर्याय का उत्पाद है।

व्यय —द्रव्य की पूर्व पर्याय का विनाश हो जाना व्यय कहलाता है। जैसे—नरक से मनुष्य पर्याय में उत्पन्न होना, नरक पर्याय का व्यय है।

ध्रौव्य

जो द्रव्य की दोनों पर्यायों में सर्वदा रहता है वह ध्रौव्य है। जैसे—नरक से मनुष्य पर्याय में उत्पन्न हो, इन दोनों अवस्थाओं में जीव नित्य विद्यमान रहता है यह ध्रौव्य है। यहाँ नरक पर्याय का व्यय हो रहा है, मनुष्य पर्याय का उत्पाद हो रहा है फिर भी दोनों अवस्थाओं में वही जीव विद्यमान रहता है। जो—जो भी द्रव्य हैं वे इन तीन गुणों सहित अवश्य ही होंगे। आचार्य समन्तभद्र स्वामी लिखते हैं कि—घट, मौलि और सुवर्ण को चाहने वालों को इन तीनों नाश, उत्पाद और स्थिति में शोक, प्रमोद और माध्यस्थ भाव को लोग निमित्त सहित प्राप्त करते हैं। जिसके दुग्ध लेने का व्रत है वह दही नहीं लेता। जिसका गोरस न लेने का व्रत है वह दोनों नहीं लेता। इससे मालूम होता है कि वस्तुतत्त्व त्रयात्मक है।[३]द्वितीय लक्षण को लक्षित करते हुए आचार्य लिखते हैं कि—‘‘गुणपर्ययवद् द्रव्यम्’’ [४]अर्थात् गुण और पर्याय वाला जो है वह द्रव्य है। यहाँ आचार्य उमास्वामी महाराज का आशय यह है कि जो गुण और पर्याय से सहित होता है वह द्रव्य कहलाता है। प्रत्येक द्रव्य गुण और पर्यायों का समूह है।[५] जैसे—जीव में ज्ञान और दर्शन गुण हैं और मतिज्ञानादि एवं चक्षुदर्शनादि पर्यायें होती हैं। यह द्रव्य का लक्षण पूर्व लक्षण से भिन्न नहीं है। सिर्पâ शब्द भेद है, अर्थभेद नहीं है क्योंकि पर्याय से उत्पाद और व्यय की तथा गुण से ध्रौव्य अर्थ की प्रतीति हो जाती है। इसी प्रसंग में आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी लिखते हैं कि—

दव्वं सल्लक्खणियं उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं।

गुण पज्जयासयं वा जं तं भण्णंति सव्वण्हू।।[६]

अर्थात् जो सत्ता है लक्षण जिसका ऐसा है, उस वस्तु को सर्वज्ञ वीतराग देव द्रव्य कहते हैंं अथवा उत्पाद—व्यय—ध्रौव्यसंयुक्त द्रव्य का लक्षण कहते हैं। अथवा गुण पर्याय का जो आधार है उसको द्रव्य का लक्षण कहते हैं।

यहां गुण का स्वरूप करते हुए आचार्य लिखते हैं कि—‘‘द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा:।’’[७]अर्थात् जो द्रव्य के आश्रय से रहते हैं और जो अन्य गुणों में नहीं पाये जाते हैं वे गुण कहलाते हैं। जैसे—जीव के ज्ञानादि गुण, पुद्गल के स्पर्शादि गुण। ये स्पर्शादि गुण सिर्प पुद्गल द्रव्य के आश्रय से ही रहते हैं इनमें ज्ञानादि गुण नहीं पाये जा सकते। इसमें यह विशेषता है कि द्रव्य की अनेक पर्याय पलटते रहने पर भी जो द्रव्य से कभी पृथक् न हों, निरन्तर द्रव्य के साथ रहें उसे गुण कहते हैं।[८] गुण दो प्रकार के होते हैं—सामान्य गुण और विशेष गुण।

सामान्य गुणजो गुण सभी द्रव्यों में समान रूप से पाये जाते हैं उन्हें सामान्य गुण कहते हैं। जैसे—अस्तित्व, वस्तुत्व आदि।

विशेष गुणजो गुण एक द्रव्य को दूसरे द्रव्य से पृथक् करते हैं वे विशेष गुण कहलाते हैं। जैसे—ज्ञान, दर्शन, स्पर्श, गति आदि।

पर्याय का वर्णन करते हुए आचार्य लिखते हैं कि तद्भाव: परिणाम[९] अर्थात् उसका होना अथवा प्रतिसमय बदलते रहना परिणाम है और परिणाम को ही पर्याय कहा जाता है। यहां आचार्य यह कहना चाहते हैं कि गुणों के परिणमन को पर्याय कहते हैं। द्रव्य के विकार विशेष रूप से भेद को प्राप्त होते रहते हैं अत: ये पर्याय कहलाते हैं।[१०] जो सर्व ओर से भेद को प्राप्त करे वह पर्याय है। आचार्य देवसेन स्वामी के अनुसार गुणों के विकार को पर्याय कहते हैं।[११] अर्थात् जब गुणों में किसी प्रकार की विकृति आती है तो उसको ही पर्याय कहते हैं।

इन सब आचार्यों के द्वारा बताये गये स्वरूप में एक बात सामान्य यह है कि परिणमन शब्द का प्रयोग प्रत्येक आचार्य ने किया है। इससे यह प्रतीत होता है कि परिणमन का नाम ही पर्याय है। अत: जो द्रव्य में स्वभाव और विभाव रूप से सदैव परिणमन करती रहती है अथवा जो द्रव्य में क्रम से एक के बाद एक आती रहती है उसे पर्याय कहते हैं।

द्रव्य के सामान्य—विशेष गुण एवं पर्यायों को विशेष रूप से जानने के इच्छुकजन आलापपद्धति नामक ग्रंथ जो कि आचार्य देवसेन स्वामी द्वारा रचित है, का अध्ययन करें। आचार्य कहते हैं कि — जैसे गोरस अपने दूध — दही — घी आदिक पर्यायों से जुदा नहीं है, उसी प्रकार द्रव्य अपनी पर्यायों से जुदा अर्थात् पृथक् नहीं है और पर्याय भी द्रव्य से जुदे नहीं हैं। इसी प्रकार द्रव्य और पर्याय की एकता है। आचार्य कहते हैं कि द्रव्य और गुणों की एकता है। जैसे — एक आम द्रव्य है और उसमें स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण गुण हैं। यदि आम न हो तो जो स्पर्शादि गुण हैं, उनका अभाव हो जाय क्योंकि आश्रय के बिना गुण नहीं रह सकते हैं और यदि स्पर्शादि गुण न हों तो आम का अभाव हो जायेगा क्योंकि अपने गुणों से ही आम का अस्तित्व है।[१२]

द्रव्य के भेदद्रव्य के मुख्य रूप से दो भेद कहे गये हैं जीवद्रव्य और अजीव द्रव्य। आचार्य वीरसेन स्वामी ने द्रव्य के दो भिन्न रूप से भी भेद माने हैं—संयोग द्रव्य और समवाय द्रव्य।

संयोग द्रव्य—अलग—अलग सत्ता वाले द्रव्यों के मेल से जो उत्पन्न हो उसे संयोग द्रव्य कहते हैं। जैसे—दण्डी, छत्री, मौलि।

समवाय द्रव्य—जो द्रव्य में समवेत हो अर्थात् कथञ्चित् तादाम्त्य रखता हो उसे समवाय द्रव्य कहते हैं। जैसे—गलकण्ड, काना, कुबड़ा आदि।[१३]

अजीव द्रव्य के पुन: पाँच भेद होते हैं—पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल।[१४] अत: सामान्य से द्रव्य के ६ भेद भी कहे जाते हैं। अब इन छहों भेदों के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए आचार्य लिखते हैं कि—

जीवद्रव्य—‘

‘उपयोगों लक्षणम्’[१५] अर्थात् जीव का लक्षण उपयोग है। यहाँ आचार्य का आशय यह है कि जो उपयोग अर्थात् आत्मा के अनुविधायी (साथ—साथ रहने वाला) परिणाम से सहित है उसे जीव कहते हैं। वह उपयोग दो प्रकार का बताया गया है। ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग। ये भी आठ और चार भेद वाले हैं। किसी वस्तु का जानना ज्ञानोपयोग कहलाता है। और किसी वस्तु का जानने से पहले जो सामान्य अवलोकन करना है वह दर्शन कहलाता है। ज्ञान साकार, सविकल्पक और दर्शन निराकार, र्नििवकल्पक होता है, यही दोनों में अन्तर होता है। अन्य लक्षण भी कई आचार्यों ने प्रर्दिशत किये हैं—चेतना जिसका लक्षण है वह जीव है। जो जीता था, जीता है, जीवेगा, वह जीव कहलाता है। आचार्य नेमिचन्द्र स्वामी ने ९ अधिकारों में जीव के स्वरूप को बताया है। वे कहते हैं कि—जीव, उपयोगमय, अमूर्तिक, कर्ता, स्वदेहपरिमाण, भोक्ता, संसारस्थ, सिद्ध, स्वभाव से ऊध्र्वगमन, इन नव अधिकारों में जीव के स्वरूप को बताया गया है। जीव के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए आचार्य नेमिचन्द्र स्वामी लिखते हैं कि जो तीनों कालों में इन्द्रिय, बल, आयु और श्वांसोच्छवास से जीता है वह व्यवहार नय से जीव है और निश्चयनय से जो चेतना से सहित है वह जीव है।[१६]

जीव के मुख्य रूप से दो भेद हैं—संसारी और मुक्त। जो कर्मों से सहित हैं, इसी संसार में चारों गतियों में भ्रमण करते हुए दु:ख प्राप्त करते हुए दु:ख प्राप्त करते रहते हैं वे संसारी जीव कहलाते हैं। जैसे—मनुष्य, तिर्यञ्च, नारकी, देव आदि। जो आठों कर्मों से रहित होते हैं, लौटकर इस संसार में कभी नहीं आयेंगे वे मुक्त जीव कहलाते हैं। जैसे—सिद्ध जीव।

पुद्गलद्रव्य

‘‘स्पर्श—रस—गन्ध—वर्णवन्त: पुद्गला:’’[१७] यहां आचार्य उमास्वामी पुद्गल द्रव्य का स्वरूप बताते हुए लिखते हैं कि जो स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण वाला है वह पुद्गलद्रव्य कहलाता है।

स्पर्श आठ प्रकार का है—हल्का, भारी, रूखा, चिकना, कड़ा, नरम, ठण्डा, गरम। रस पाँच प्रकार का है—खट्टा, मीठा, कड़वा, कषायला, चरपरा। गन्ध दो प्रकार की है—सुगन्ध और दुर्गन्ध। वर्ण पाँच प्रकार का है—काला, पीला, नीला, लाल, सफेद। इन बीस पर्यायों में से यथायोग्य भेदों से जो सहित होता है वह पुद्गल कहलाता है। आचार्य अकलंक स्वामी पुद्गल का स्वरूप कहते हैं कि—भेद और संघात से पूरण और गलन को प्राप्त हों वे पुद्गल हैं। अथवा जीव जिनको शरीर, आहार, विषय और इन्द्रिय उपकरण आदि के रूप में निगलें अर्थात् ग्रहण करें वे पुद्गल हैं।[१८]

पुद्गल के चार भेद आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने कहे हैं—स्कन्ध, स्कन्धदेश, स्कन्ध प्रदेश और परमाणु। अनन्त समस्त परमाणुओं का मिलकर एक पिण्ड बनता है उसे स्कन्ध कहते हैं। पुद्गल स्कन्ध का आधा भाग स्कन्धदेश कहलाता है। स्कन्ध के आधे का आधा अर्थात् चौथाई भाग स्कन्धप्रदेश है और जिसका भाग नहीं हो सकता वह परमाणु है।[१९]

पुद्गल द्रव्य के दो भेद हैं—अणु और स्कन्ध।[२०]

अणु—एक प्रदेश में होने वाले स्पर्शादि पर्याय को उत्पन्न करने की सामथ्र्य रूप से जो कहे जाते हैं वे अणु कहलाते हैं। इसका विशेष स्वरूप प्रर्दिशत करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी लिखते हैं—

अत्तादि अत्तमज्झं अत्तंतं णेव इंदियेगेज्झं।

जं दव्वं अविभागी तं परमाणु विआणादि।।[२१]

अर्थात् जिसका आदि, मध्य और अन्त एक है और जिसे इन्द्रियां ग्रहण नहीं कर सकतीं ऐसा जो विभाग रहित द्रव्य है उसे परमाणु जानना चाहिये। सरल भाषा में जिसका कोई दूसरा भाग नहीं हो सकता वह अणु हैं

स्कन्ध—जिनमें स्थूल रूप से पकड़ना, रखना आदि व्यापार का स्कन्धन अर्थात् संघटना होती है वे स्कन्ध कहलाते हैं। अथवा दो या दो से अधिक परमाणुओं के समूह को स्कन्ध कहते हैं।

स्कन्ध के ६ भेद हैं—

१. बादर—बादर—जो पुद्गलपिण्ड को दो खण्ड करने पर अपने आप फिर नहीं मिलते हैं वे बादर—बादर स्कन्ध कहलाते हैं। जैसे—काष्ठ, पाषाणादि।

२. बादर—जो पुद्गलपिण्ड खण्ड—खण्ड किये जाने पर भी अपने आप मिल जाते हैं वे बादर स्कन्ध कहलाते हैं। जैसे दुग्ध, घृत, तेल आदि।

३. बादर—सूक्ष्म—जो देखने में तो स्थूल हों किन्तु हस्तादिक से ग्रहण करने में नहीं आते, वे बादर—सूक्ष्म स्कन्ध हैं। जैसे—धूप, चन्द्रमा की चाँदनी आदि।

४. सूक्ष्मबादर—जो होते तो सूक्ष्म हैं, परन्तु स्थूल जैसे प्रतिभासित होते हैं वे सूक्ष्म—बादर कहे जाते हैं। जैसे—स्पर्श, रस, गन्ध, शब्द आदि।

५. सूक्ष्म—जो अतिसूक्ष्म हैं और इन्द्रियों से ग्रहण करने में भी नहीं आते हैं वे सूक्ष्म कहलाते हैं। जैसे—कर्मवर्गणा आदि।

६. सूक्ष्म—सूक्ष्म—जो कर्मवर्गणाओं से भी अतिसूक्ष्म हैं वे सूक्ष्म—सूक्ष्म स्कन्ध कहलाते हैं। जैसे—द्वयणुक स्कन्ध आदि।[२२]

अणु की उत्पत्ति भेद से और स्कन्ध की उत्पत्ति भेद, संघात और भेद—संघात से होती है। पुद्गल द्रव्य की मुख्य रूप से १० पर्यायें हैं—शब्द, बन्ध, सौक्ष्म्य, स्थौम्य, संस्थान, भेद, तम, छाया, आतप, अद्योत। पुद्गल संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेशी होते हैं। अणु एक प्रदेशी होता है फिर भी उपचार से उसको बहुप्रदेशी कहा गया है। पुद्गल द्रव्यों के उपकारों का उल्लेख करते हुए आचार्य लिखते हैं कि शरीर, वचन, मन, श्वांसोच्छवास, सुख, दु:ख, जीवन, मरण ये पुद्गल के उपकार हैं।[२३]

धर्मद्रव्य

जो जीव और पुद्गलों को चलने में उदासीन रूप से सहायक है वह धर्मद्रव्य है। जैसे—मछली को पानी, पतंग को हवा, रेलगाड़ी को पटरी आदि। यहां विशेष बात यह है कि धर्मद्रव्य मात्र चलते हुए जीव—पुद्गल को ही सहायता करता है, नहीं चलने वाले को जबरदस्ती नहीं चलाता है। अतएव गति में उदासीन कारण होता है धर्मद्रव्य। धर्मद्रव्य की सत्ता वैज्ञानिक भी ईथर नामक पदार्थ के रूप में स्वीकार करते हैं। धर्मद्रव्य तीनों लोकों में तिल में तेल के समान भरा हुआ है। यह एक ही द्रव्य है। यह असंख्यात प्रदेशी होता है क्योंकि लोकाकाश के भी असंख्यात प्रदेश हैं और यह सम्पूर्ण लोकाकाश में फैला हुआ है इसलिए यह असंख्यात प्रदेश वाला है।

अधर्म द्रव्य

जो जीव और पुद्गलों को ठहरने में उदासीन रूप से सहायक है वह अधर्मद्रव्य है। जैसे—पथिक को ठहरने में वृक्ष की छाया सहायक होती है। यहाँ पर भी विशेष बात यह है कि अधर्मद्रव्य मात्र ठहरते हुए जीव और पुद्गल को ही ठहरने में सहायक है न कि किसी को जबरदस्ती रोकता है क्योंकि यह ठहरने में उदासीन रूप से सहायक है सक्रिय रूप से नहीं। यह द्रव्य भी सम्पूर्ण लोकाकाश में तिल में तेल के समान भरा हुआ है। इसलिए यह भी असंख्यात प्रदेश वाला है। यह द्रव्य भी एक ही है।

आकाशद्रव्य

जो समस्त द्रव्यों को ठहरने के लिए अवगाह अर्थात् स्थान देता है उसे आकाश द्रव्य कहते हैं। यह द्रव्य भी एक ही है। परन्तु जितने स्थान में छहों द्रव्य पाई जाती हैं वह लोकाकाश कहलाता है और शेष भाग अलोकाकाश कहलाता है। वैसे तो आकाश द्रव्य अनन्त प्रदेशी है परन्तु लोकाकाश असंख्यात प्रदेश वाला है। अलोकाकाश में मात्र आकाश ही आकाश है वहां अन्य कोई भी द्रव्य नहीं पाई जाती है। अवगाहनत्व आकाशद्रव्य का उपकार है।

कालद्रव्य

—जो स्वयं पलटते हुए अन्य द्रव्यों को भी पलटने में सहायक होता है उसे कालद्रव्य कहते हैं। कालद्रव्य के दो भेद हैं—व्यवहारकाल और निश्चयकाल।

व्यवहारकाल—जो क्रम से अतिसूक्ष्म होता हुआ प्रर्दिशत होता है वह व्यवहार काल कहलाता है। यद्यपि व्यवहारकाल, निश्चयकाल का पर्याय है तथापि जीव—पुद्गल के परिणामों से वह जाना जाता है।

इसलिए जीव—पुद्गलों के नवजीर्णता रूप से कहा जाता है कि घड़ी, घण्टा, महीना, वर्ष आदि को व्यक्त करता है वह व्यवहारकाल है।

निश्चयकाल—वर्तना ही लक्षण है जिसका वह है निश्चयकाल। व्यवहारकाल का जो आधार है अथवा हेतु है वह निश्चयकाल कहलाता है। यह नित्य है, क्योंकि वह अपने गुण—पर्याय स्वरूप द्रव्य से सदा अविनाशी है। निश्चयकाल समयादि व्यवहारकाल में अविनाभाव निमित्त होने से अस्तित्व को धारण करता है क्योंकि पर्याय से पर्यायी का अस्तित्व ज्ञात होता है। कालद्रव्य रत्नों की राशि के समान एक प्रदेशी होता है परन्तु अनन्त समय वाला होता है इसलिए एक प्रदेशी होने के कारण इसको कायवान् नहीं कहा गया है। यह अस्तिकाय की कोटि में नहीं रखा गया। वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व ये कालद्रव्य के उपकार हैं।[२४]

द्रव्यों की विशेषतायें—

परिमाण की अपेक्षा से कथन करने पर ज्ञात होता है कि जीव और पुद्गल द्रव्य अनंतानंत हैं, धर्म, अधर्म आकाश द्रव्य एक—एक हैं एवं काल द्रव्य असंख्यात हैं। मूर्तिक—अमूर्तिक की अपेक्षा धर्म, अधर्म, आकाश और काल अमूर्तिक एवं पुद्गल मूर्तिक और जीव द्रव्य मूर्तिक—अमूर्तिक दोनों है। सक्रियता की अपेक्षा जीव और पुद्गल द्रव्य ही सक्रिय हैं शेष चारों द्रव्य निष्क्रिय हैं। प्रदेशों की अपेक्षा एक जीव, धर्म और अधर्म द्रव्य असंख्यात प्रदेशी हैं, आकाश द्रव्य अनंत प्रदेशी है, काल द्रव्य एक प्रदेशी है एवं पुद्गल द्रव्य एक, संख्यात, असंख्यात और अनंत प्रदेशी है। शुद्धता की अपेक्षा धर्म, अधर्म, आकाश और काल द्रव्य सदा शुद्ध हैं एवं जीव और पुद्गल शुद्ध—अशुद्ध दोनों होते हैं। चेतनता की अपेक्षा से जीवद्रव्य मात्र चेतन है शेष पाँचों द्रव्य अचेतन हैं। जीवद्रव्य कत्र्ता है शेष पाँचों द्रव्य कारण हैं। उपकार की अपेक्षा जीव, मात्र जीवों पर ही उपकार करता है, पुद्गल, धर्म और अधर्म द्रव्य जीव और पुद्गल पर उपकार करते हैं, आकाश द्रव्य पाँचों द्रव्यों पर और कालद्रव्य छहों द्रव्यों पर उपकार करता है। उपकारी की अपेक्षा से जीव पर छहों द्रव्य उपकार करते हैं, पुद्गल द्रव्य पर जीव को छोड़कर सभी द्रव्य, धर्म और अधर्म द्रव्य पर आकाश और काल द्रव्य, आकाश द्रव्य पर कालद्रव्य और कालद्रव्य पर आकाश द्रव्य उपकार करता है। भेदों की अपेक्षा धर्म और अधर्म द्रव्य के कोई भेद नहीं हैं एवं शेष चारों द्रव्यों के भेद होते हैं। अवगाहन की अपेक्षा से जीवद्रव्य का लोकाकाश के असंख्यातवें भाग में, असंख्यात बहुभाग में और सर्वलोक में रहने का स्थान है। पुद्गल द्रव्य का एकप्रदेश, संख्यातप्रदेश, असंख्यातप्रदेश में है, धर्म, अधर्म द्रव्य का लोकाकाश प्रमाण रहने का स्थान है। आकाश द्रव्य सवर्गत है। काल द्रव्य एकप्रदेश प्रमाण है। कालद्रव्य को छोड़कर शेष पाँचों द्रव्य अस्तिकाय हैं। सामान्य गुणों की अपेक्षा सभी द्रव्यों के ६ सामान्य गुण हैं। विशेष गुणों की अपेक्षा जीवद्रव्य के चार ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य, पुद्गल के चार स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण, धर्मद्रव्य का गतिहेतुत्व, अधर्मद्रव्य का स्थितिहेतुत्व, आकाशद्रव्य का अवगाहनत्व और कालद्रव्य का वर्तनाहेतुत्व है। स्वभावों की अपेक्षा जीव और पुद्गल के २१ स्वभाव हैं, धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्य के १६ एंव कालद्रव्य के १५ स्वभाव हैं। पर्याय की अपेक्षा धर्म, अधर्म, आकाश और काल इनकी अर्थपर्याय होती है परन्तु जीव और पुद्गल की अर्थ और व्यञ्जन दोनों पर्यायें होती हैं। छहों द्रव्यों में मात्र जीवद्रव्य ही उपादेय है एवं शेष द्रव्य ज्ञेय हैंं

सभी आचार्यों ने द्रव्य के स्वरूप को समान रूप से स्वीकार किया है। सभी ने गुण और पर्याय से सहित और उत्पाद—व्यय—ध्रौव्य से जो सहित है उसी को द्रव्य माना है। द्रव्य के भेदों में भी कभी भेद दिखाई नहीं दिए। ६ भेद आदिनाथ स्वामी ने बताये थे तो ६ भेद ही महावीर स्वामी ने भी बतलाये। परन्तु अन्य दर्शनों में अलग—अलग भेद माने गए हैं जिनमें तर्कसंग्रह में र्विणत नवभेदों को लगभग सभी ने स्वीकार किया है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, दिशा, काल, आत्मा और मन ये नव द्रव्य स्वीकार किये गये हैं। इनमें से पृथ्वी, जल, अग्नि वायु और मन का तो पुद्गल में अन्तर्भाव हो जाता है। द्रव्यमन का पुद्गल में और भावमन का जीव में अन्तर्भाव हो जाता है। दिशा का आकाश में अन्तर्भाव हो जाता है। शेष तो हम स्वीकार ही करते हैं। इस तरह द्रव्यों की संख्या ६ ही उपयुक्त है।

कालद्रव्य के विषय में श्वेताम्बर परम्परा में ही दो मत हैं। एक मत तो काल को द्रव्य के रूप में स्वीकार करता है और दूसरा मत काल को स्वतन्त्र द्रव्य नहीं मानता है। दूसरे मत के अनुसार सूर्यादि के निमित्त से जो दिन — रात, घड़ी — घंटा, पल — विपल आदि रूप काल अनुभव में आता है, यह सब पुद्गल की पर्याय है। किन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि इन जीव—पुद्गल आदि द्रव्यों का परिणमन किसके निमित्त से होता है ? यदि कहा जाय कि उत्पन्न होना, व्यय होना और ध्रुव रहना यह प्रत्येक दव्य का स्वभाव है तो इसके लिए अन्य निमित्त की क्या आवश्यकता ? तो इसके लिए यह तर्क है कि इस तरह सर्वथा स्वभाव से ही प्रत्येक द्रव्य का परिणमन माना जाता है तो गति, स्थिति और अवगाह को भी स्वभाव से मान लेने में क्या आपत्ति है। इस अवस्था में मात्र जीव और पुद्गल दो द्रव्य शेष रहेंगीं, शेष का अभाव हो जायेगा।

द्रव्यों से एक तथ्य ध्यातव्य है कि छहों द्रव्य लोक में ठसाठस भरे हुए हैं, एक—दूसरे से मिले हुए हैं फिर भी वे अपना—अपना स्वरूप नहीं छोड़ते हैं। परन्तु यह जीवद्रव्य अन्य द्रव्यों के कारण से अपने स्वरूप को तो नहीं छोड़ता लेकिन उनके कारण विकृत अवश्य हो जाता है। हमें कभी भी अपने स्वरूप को न छोड़कर मात्र स्वभाव में लीन रहना चाहिए तभी हमारा कल्याण हो सकता है।

टिप्पणी

  1. त. सू. ५/२९
  2. वही ५/३०
  3. आ. मी. ५९—६०
  4. त. सू. ५/३८
  5. स. सि. ५/२/२६७
  6. पं. का. गा. १०, प्र. सा. २/३—४
  7. ७. त. सू. ५/४१
  8. न्या. टीका सूत्र ७८
  9. त. सू. ५/४२ १६.
  10. स. सि. ५/३८/२३१
  11. आ. प. सूत्र १५
  12. पं. का. गाथा १३
  13. ध. १/१, १, १/१७
  14. त. सू. ५/१, ३९
  15. वही २/८
  16. बृ. द्र. सं. गाथा २—३
  17. त. सू. ५/२३
  18. त. वा. ५/१/२४
  19. पं. का. गा. ७४
  20. त. सू. ५/२५
  21. नियमसार गा. २६
  22. पं. का. गा. ७६
  23. त. सू. ५/१९—२०
  24. वही ५/२२
आलोक कुमार जैन
शोधार्थी जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय लाडनूं, (राजस्थान)
अनेकांत जनवरी—मार्च २०११ पे. नं. ८९ से ९६