तत्वार्थश्लोकवार्तिकभाष्य में द्रव्य लक्षण

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तत्वार्थश्लोकवार्तिकभाष्य में द्रव्य लक्षण

डॉ. नरेन्द्र कुमार जैन (से.ने.प्राचार्य)

।। ए-७८, नेहरुनगर, गाजियाबाद (उ०प्र०)

आचार्य विद्यानन्द द्वारा विरचित ‘तत्वार्थश्लोकवार्तिकालंकार’[१] एक महत्वपूर्ण भाष्य ग्रन्थ है। इसको ‘तत्वार्थश्लोकवार्तिकभाष्य’ ‘तत्वार्थश्लोकवार्तिकव्याख्यान’ और ‘श्लोकवार्तिकभाष्य’ नामों से भी अभिहित किया जाता है।

द्रव्य का लक्षण सत्:

तत्वार्थश्लोकवार्तिक एक भाष्य ग्रन्थ होने से विशेष रूप से द्रव्य के स्वरूप का विवेचन उसमें वहीं किया गया, जहाँ मूल ग्रंथकार को अभीष्ट रहा है, फिर भी प्रसंगत: भाष्य में अन्यत्र भी द्रव्य से संबन्धित चर्चा उपलब्ध होती है। तत्वार्थसूत्र के द्रव्य विवेचन के सूत्र पंचम अध्याय के सूत्र संख्या दो, बत्तीस, उन्तालीस और एकतालीस की व्याख्याओं में प्रमुख रूप से दृष्टव्य हैं। जैनदर्शन में ‘सद्द्रव्यलक्षणम्[२] सत् को द्रव्य का लक्षण बताकर उसे उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक बताया है। द्रव्य गुणपर्यात्मक होता है। चेतन और अचेतन के रूप में सत् दो प्रकार का है, जिसमें अपनी जाति को छोड़े बिना अन्तरंग और बहिरंग निमित्त मिलने पर प्रतिसमय नवीन अवस्था की प्राप्ति एवं पूर्व अवस्था का त्याग होता रहता है, जिसे क्रमश: उत्पाद और व्यय के रूप में जाना जाता है।[३] भारतीय दर्शनों में सत्ता के स्वरूप के सम्बन्ध में विभिन्न विचारधारायें हैं। न्यायवैशेषिक और मीमांस दर्शन में सत्ता का अस्तित्व मात्रा या जाति रूप माना गया है, वेदान्त दर्शन सर्वव्यापक ब्रह्म का ही अस्तित्व स्वीकार करता है। सांख्य योग दर्शन में पारिणामि नित्यवाद के रूप में उत्पाद व्यय और ध्रौव्यरूप स्वीकार किया गया है।[४]

जो सत् है, वह द्रव्य है, द्रव्य गुणपर्याय वाला होता है। परम्परागत द्रव्य के लक्षणों के विषय में एकान्तवादियों के द्वारा उठाई गयीं आपत्तियों का निराकरण करते हुए आचार्य विद्यानंद लिखते हैं कि पूर्वपक्षी यदि यह कहते हैं कि सत् दव्य का लक्षण यदि विशेष सामान्य रूप से कहा गया है तो उसमें अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोष आ जाते हैं, क्योंकि विशेष रूप से द्रव्य को सत् मानने पर पर्यायों में भी द्रव्यत्व का प्रसंग उपस्थित होता है परन्तु पर्यायें द्रव्य नहीं होतीं, इसलिए इसमें अव्याप्ति दोष है। भूत, वर्तमान और भविष्य में अन्वय रूप से अनुयागी द्रव्य में सत् विशेष का अभाव है, वर्तमान द्रव्य में ही विशेष रूप से सत् होता है। इसलिए विशेष सत् को द्रव्य का लक्षण मानने पर उसमें अतिव्याप्ति और अव्याप्ति दोनों दोष आते हैं। सामान्य रूप से द्रव्य का लक्षण मानने पर शुद्ध द्रव्य ही द्रव्य हो सकेगा। इससें पुन: अव्याप्ति दोष उपस्थित होता है। क्योंकि अशुद्ध द्रव्यों में सामान्यरूप सत् का अभाव उपस्थित होता है। अत: शुद्ध या जीवत्व, पुद्गलत्व आदि विशेषणों सहित अशुद्ध द्रव्य में सामान्य रूप से द्रव्य का सत् लक्षण घटित हो जाता है।[५] जिस विशेष रूप से सत् द्रव्य का लक्षण स्वीकार करने में अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोष आते हैं, वह लक्षण स्वीकार करने योग्य नहीं है, सामान्य रूप से द्रव्य का लक्षण ही जैनदर्शन में स्वीकार हैं, जिसमें विशेष अशुद्ध द्रव्य भी सामान्य सत् के अंतर्गत आ जाते हैं। क्रम और युगपत् रूप से परिणमन कर रहीं अपनी पर्यायों में व्याप्त जीवत्व विशिष्ट जीव है। इसी तरह क्रम और युगपत् रूप से परिणमन कर रही अपनी पर्यायों में व्याप्त पुद्गलत्व से विशिष्ट जीव है। क्रमभावि और अक्रमभावि धर्मपर्याय से व्याप्त धर्मत्व विशिष्ट सत्ता धर्म द्रव्य है। इसी तरह अन्य द्रव्यों के संदर्भ में भी समझना चाहिए।[६]

पूर्वपक्ष के रूप में सांख्य मत का उल्लेख करते हुए ग्रंथकार ने लिखा है कि वे नित्य सत् को ही द्रव्य का लक्षण मानकर ‘यही वही है’ ऐसा सत्व के एकत्व का प्रत्यभिज्ञान होने का पक्ष रखते हैं। यदि सत् को अनित्य माना जाता है तब सादृश्य प्रयभिज्ञान सम्भव होने पर भी ‘यही वही है’ ऐसा एकत्व प्रत्यभिज्ञान घटित नहीं हो पायगा। सभी कालों में सत् के नित्यत्व को सिद्ध कर रहा एकत्व प्रत्यभिज्ञान नाम का प्रमाण बाधकों से रहित है। बौद्ध सत् को प्रतिक्षण उत्पाद और व्ययात्मक होने से नाशशील मानते हैं। उनके अनुसार पहली पर्याय नष्ट होकर दूसरे क्षण में अन्य पर्याय उत्पन्न हो जाती है।[७]

उपर्युक्त पूर्वपक्षियों के समाधन में तत्वार्थश्लोकवार्तिककार ने सूत्रकार का ‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्[८] सूत्र उपस्थित कर लिखा है कि ‘उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक सत् है। इसको परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा है कि अपनी जातियों (जीवत्व, पुद्गल आदि) का परित्याग नहीं करके (चेतन व अचेतन द्रव्य के) परिणामान्तरों की प्राप्ति हो जाना उत्पाद है और स्वजाति का त्याग किये बिना पूर्ववर्ती भावों का विनाश हो जाना व्यय है। ‘ध्रुव’ गतिस्थैर्ययो:’ इस तुदादि गण व ‘ध्रुव स्थैर्य’ इस भ्वादि गण की स्थिर क्रिया के अर्थ वाली ‘ध्रुवति’ धातु से अच् प्रतयय करने पर ‘ध्रुव’ शब्द निष्पन्न होता है। इस ध्रुव का कर्म व भाव ध्रौव्य है। तद्धित मं ‘ष्यञ्’ प्रत्यय करने पर भी ‘ध्रौव्य’ शब्द बन जाता है। इस तरह सत् उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक है। सत् के इस लक्षण से सर्वथा एकान्तवादियों का पक्ष ध्वस्त हो जाता है और यह सिद्ध होता है कि वस्तु भेदाभेदात्मक है।[९]

यह कहना भी असंगत है कि ध्रौव्य युक्त सत् को द्रव्य का लक्षण तथा उत्पादव्ययात्मक सत् को पर्याय का लक्षण स्वीकार कर लेना चाहिए। क्योंकि जैनसिद्धान्त के अनुसार सत्-सत्ता एक ही है और सत् द्रव्य अनन्तपर्यायों वाला है। द्रव्य सत्ता और पर्याय सत्ता के रूप में दो प्रकार की सत्ताएं नहीं हैं अन्यथा इनसे परे एक महासामान्य द्रव्य को स्वीकार करना पड़ेगा। असत् पदार्थों के अस्तित्व से सत् स्वीकार करना (वैशेषिक) महासामान्य सत्व भी खरविषाण की तरह द्रव्य नहीं कहलायेगा। महासामान्य को सत् स्वरूप स्वीकार करने पर सत् के रूप में द्रव्य सिद्ध हो ही जाता है और यह भी सिद्ध होता है कि द्रव्य असत् रूप नहीं है।[१०] क्योंकि मृद आदि द्रव्य-उपादान हो रहीं पर्यायें ही घट आदि कार्यों का प्रागभाव है तथा उपादेय की उत्पत्ति ही उपादान का ध्वंस है। स्वभावान्तरों से स्वभाव की व्यावृत्ति हो जाने का परिणाम अन्योन्यभाव है। त्रैकालिक भेद को बनाये रखने वाली परिणतियाँ अत्यन्ताभाव है। तात्पर्य यह कि अभाव, भावस्वरूप ही है। न्यायवैशेषिक, ब्रह्माद्वैतवादी जो सत्ता को केवल नित्य मानते हैं, उनके मत में विशेष भेद करने वाले लिंगों का अभाव है। उनके यहाँ नित्य और अनेक में समवायी सत्ता को स्वीकार किया गया है।जैन दृष्टिकोण से एकान्त मन्तव्यों का व्यवच्छेदक सत्, उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक माना गया है, जो अनन्तात्मक पर्यायों के साथ तदात्मक हो रहा है। पर्यायें भी उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक हैं।[११]

बौद्धों अनुसार सत् नित्य और एक नहीं है। सत् सत् ऐसी अन्वयात्मक शुद्ध सत् आकार वाली भी सत्ता नही है क्योंकि सत्व कोई वस्तुभूत सत्ता नहीं है, असत्पने की आवृत्ति करके उस सत् को कल्पित कर लिया गया है। इसी तरह सत् भी असत् का निषेध रूप होकर सत्ता रूप होकर सत्ता रूप से कल्पित कर लिया गया है। नित्य स्थूल आदि कोई भी पदार्थ नहीं है। वस्तुत: क्षणिक असाधराण, सूक्ष्म ऐसे उत्पाद, व्यय स्वभावों वाले स्वलक्षण ही सत् का स्वरूप हो सकता है। बौद्धों के इस एकान्त का व्यवच्छेद करने के लिए जैनाचार्यों ने द्रव्य के लक्षण में ध्रौव्य शब्द को प्रयोग किया है। इस प्रकार सत् उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक है। पुन: बौद्ध प्रतिप्रश्न करते हैं कि उत्पादि त्रय किय प्रकार दूसरे उत्पादि के विना सत् स्वरूप हैं, उसी प्रकार सत् वस्तु को भी उत्पादि के विना सत् स्वरूप मान लेना चाहिए। यदि ऐसा मानते हैं कि उत्पाद, विनाश आदि का अन्य उत्पाद आदि से योग हो जाने पर सत् है, तब इसमें अनवस्था दोष आयेगा क्योंकि फिर दूसरे का तीसरे और तीसरे से चौथे इस प्रकार आगे भी उनका सत्पना सिद्ध करने के लिए क्रम नहीं टूटेगा। आचार्य विद्यानंद ने लिखा है कि उपर्युक्त मत प्रज्ञाकर (बौद्ध विज्ञान) का है जो अप्रज्ञा का द्योतक है एवं निराधार है। क्योंकि सत् स्वरूप वस्तु के साथ उन उत्पाद आदि धर्मों के सर्वथा भेद की असिद्धि है। तात्पर्य यह कि उत्पाद आदि, सत् से सर्वथा भिन्न नहीं है। इसलिए उत्पाद आदि को सिद्ध करने के लिए अन्य उत्पाद आदि को सिद्ध करने के लिए ...... उत्पाद आदि में लक्ष्य लक्षण भाव बन जाता है। इस प्रकार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनों की एकता से युक्त द्रव्य है। यहाँ ‘युक्त’ शब्द को स्पष्ट करते हुए आचार्यश्री ने लिखा है कि ‘युज’ धातु समाधानार्थक तादात्म्य अर्थ का व्याख्यान करती है, जो सत् में स्थापित है, जिससे उत्पादिक का सत् से भेद का कथन नहीं होता। इससे सर्वथा अभेद भी नहीं है, जिससे लक्ष्य लक्षण का विरोध भी नहीं बनता।[१२]

सत् नित्यानित्य :

सत् न सर्वथा नित्य है और न सर्वथा अनित्य है, पर वह है कैसा इसका समाधान ‘तद्भावाव्ययं नित्यं’[१३] तत्वार्थसूत्र के इस सूत्र में किया गया है। विवक्षित पदार्थ का जो भाव है, वह तदभाव है, जो ‘यह वही है’ ऐसे प्रत्यभिज्ञान प्रमाण द्वारा समझा जा सकता है। इससे कदाचित् भी विनाश हो जाने का अभाव है। इस दृष्टि से तदभाव से विनाश नहीं होने को नित्स माना गया है। ‘एकसम्बन्धिज्ञानपरसम्बन्धिस्मारकम्’ के अनुसार तदभाव से उत्पाद नहीं होना भी नित्य में गर्भित है। यह स्वत: सिद्ध है कि व्यय की निवृत्ति होते ही उसी समय उत्पाद की निवृत्ति सिद्ध हो जाती है। तात्पर्य यह है कि उत्तर आकार के उत्पाद की पूर्व आकार के विनाश के साथ व्याप्ति है।[१४] अन्यत्व अतदभाव है ‘पूर्व परिणाम से यह परिणाम अन्य है’ इस प्रकार प्रत्यभिज्ञान स्परूप अन्वय प्रत्यय से, अतदभव को समझा जा सकता है। उत्पाद और व्यय का योग होने से अतदभाव का प्रयोजक अध्रौव्य-अनित्य है। जैस कि आचार्य समन्तभद्र ने लिखा है - नित्यं तदेवेदमिति प्रतीतेर्न नित्यमन्यत्प्रतीतिसिद्धे: । नतद्विरुद्धं बहिरंन्तरंगनिमित्तनैमित्तिकयोगतस्ते।।[१५] जो पहले था वह ही यह है, ऐसी प्रतीति होने से अर्थ नित्य है। बहिरंग और अन्तरंग रूप में निमित्त नैमित्तिक परिणातियों के योग से नित्य और अनित्य रूप धर्म एक पदार्थ में विरुद्ध नहीं है। सर्वथा नित्य और सर्वथा अनित्य मानने पर क्रम से और युगपत् अर्थक्रिया नहीं बन सकती। अर्थक्रिया से रहित वस्तु खरविषाण के समान निरर्थक है।</ref>त० श्लोक ३५९, ३६०</ref> यहाँ आचार्य विद्यानंद ने नित्यत्व और अनित्यत्व किसी कारण से विरुद्ध नहीं हैं, इसके समाधान में सूत्रकार के ‘अर्पितानर्पितसिद्धे’[१६] सूत्र का अवतरण करते हुये लिखा है कि ‘अर्पितानर्पित सिद्धे:’ को हेतु तथा तदभाव-अव्यय होना नित्य, अतदभाव-व्यय सहित होना अनित्य को साध्य बना लिया जाये तब अनेकान्तात्मक वस्तु में र्अिपत-प्रधानता (एक धर्म की विवक्षा) तथा अनर्पित-अप्रधानता (प्रयोजन न होने पर अविवक्षा) से नित्य-अनित्य आदि परस्पर विरुद्ध धर्म विरोध रहित होकर एक वस्तु में सिद्ध हो जाते हैं। इसको न्यायवाक्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि एक वस्तु में इतर अनित्य के साथ विद्यमान नित्य स्वरूप धर्म विरुद्ध नहीं होता, यह प्रतिज्ञा वाक्य है। उसमें अर्पित और अनर्पित सिद्ध हो जाने से, हेतु है, नय के भेदों के समान, यह अन्वय दृष्टान्त है। सत् नित्यरूप और अनित्यरूप अर्पित-प्रधानता से तथा अनर्पित-अप्रधानता से क्यों विवक्षित हो जाते हैं, इसका समाधान इस प्रकार दिया गया है कि द्रव्यार्थिक नय से द्रव्य स्वरूप अर्पित है और पर्यायार्थिक नय से अविवक्षित होकर अनर्पित है। इसके विपरीत द्रव्यार्थिक नय से अनर्पित और पर्यायार्थिक नय से अर्पित वस्तु का अनित्य स्वरूप सिद्ध होता है।[१७]

एक वस्तु में नित्य और अनित्य आदि मानने पर उभय, विरोध वैयाधिकारण, शंकर, व्यतिकर, संशय, अनवस्था और अप्रतिपत्तिक इन आठ दोषो के आने का प्रसंग उपस्थित होता है। आचार्य इसका समाधानपूर्वक उत्तर देते हैं कि प्रमाण ज्ञान की प्रधानता से एक वस्तु में नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों से तीसरी ही जाति की नित्यानित्यात्मक प्रतीति हो जाती है। इसलिए उभय, विरोध आदि दोष नहीं आते हैं। नित्य, अनित्य दोनों प्रतिकूल धर्मों को एक वस्तु रूप मानना उभय दोष नित्य, अनित्य आदि दो रूपों का एक अभिन्न वस्तु में होना असंभव है, यह विरोध दोष है। ये दोनों दोष वस्तु को प्रमाण से सकलादेशी मानने पर सत्, उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यात्मक सिद्ध हो जाता है। इसलिए उभय और विरोध दोष नहीं आ सकते, क्योंकि अनेकान्तात्मक सत् सर्वथा नित्य और सर्वथा अनित्य दोनों दूषित एकान्तों से रहित अलग तरह का नित्यानित्यात्मक है। नित्य अन्तिय का एकत्र उपालम्भ हो जाने से विरोध दोष भी नहीं है। तीसरी ही जाति वाली नित्यानित्यात्मक वस्तु सिद्ध हो जाने से अनवस्था, वैयाधिकरण,संकर और व्यतिकर दोष भी नहीं आ सकते। वस्तु की समीचीन प्रतिपत्ति होने से प्रतिपत्ति दोष नहीं नहीं आता है।[१८]

गुण और पर्याय युक्त द्रव्य :

‘गुणपर्ययवद् द्रव्यम्’ को भी सूत्राकार ने द्रव्य कहा है। वार्तिककार ने ‘द्रव्य’ शब्द की निरुक्ति करते हुए लिखा है कि ‘द्रवतिद्रोष्यत्यदुदुत्तांस्तान् पर्यायानिति द्रव्यमित्यपि न विरुध्यते।’[१९] अर्थात् जो अपनी उन उन पर्यायों का वर्तमान में द्रवण कर रहा है, भवष्यि में द्रवण करेगा और जो भूतकाल में द्रवण कर चुका है, वह द्रव्य है। द्रव्य स्वभाव से ही तीनों काल अपनी तदात्मक पर्यायों में द्रवण करती रहती है। द्रव्य में पर्यायों का सामान्य की अपेक्षा नित्य योग है, इसमें कोई विरोध नहीं है। विशेष की अपेक्षा पर्यायों का नित्य ही योग नहीं है, उनका कदाचित् होना सिद्ध है।[२०] ‘द्रव्य’ को परिभाषित करते हुए सूत्रकार के ‘द्रव्याणि’ सूत्र की व्याख्या में भी भाष्यकार ने स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘दु्र गतो-धातु से कर्म और कर्ता में ‘यत्’ प्रत्यय करने पर द्रव्य शब्द सुघटित हो जाता है। स्व और पर कारणों से उत्पाद और व्यय रूप पर्यायों को जो प्राप्त हो वह द्रव्य है।[२१] ‘द्रयते’ बहाये जा रहे-गममन कर रहे हैं जोव वह द्रव्य है एवं द्रव्य स्वतंत्र होकर पर्यायों को द्रवण करते हैं-प्राप्त करते हैं।[२२] द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव प्रत्यय पर हैं तथा अपनी स्वाभाविक शक्ति स्व प्रत्यय है। ब्राह्य प्रत्ययों के रहने पर भी यदि द्रव्य में स्वयं उस पर्याय की योग्यता न हो तो पर्यायान्तर की प्राप्ति नहीं हो सकती। दोनों मिलने पर ही पर्याय उत्पन्न होती है।जैसे पकने योग्य उड़द यदि बोरे में पड़ा है तो पाक नहीं हो सकता। यादि घोटक (न पकने योग्य) उड़द उबलते हुए पानी में भी डाला जाये तो भी नहीं पकता।[२३] इस तरह कर्म और कर्तृ साधन बन जाने से स्याद्वादियों के यहाँ विरोध दोष नहीं आता। परन्तु सर्वथा एकान्तवादियों के यहाँ विरोध होने से कर्तृ, कर्म व्यवस्था नहीं बन सकती। उनके यहाँ द्रव्यों का पर्यायों में अनुगमन नहीं बन सकता, जिससे पर्यायें स्वमेव असिद्ध हैं। वस्तुत: द्रव्य के पराधीन हो रहे स्वभावों को ही पर्यायत्व सिद्ध होता है, सर्वथा भेद में नहीं।[२४] तात्पर्य यह कि गुणों और पर्यायों का द्रव्य में नित्य योग बना रहता है, अविनाशी गुण तो द्रव्य में सदा विद्यमान रहते हैं। उत्पाद विनाश शीन पर्यायें विशेष रूप में कदाचित् पायी जा रहीं सदा नहीं ठहरतीं, परन्तु समान्य की अपेक्षा कोई न कोई पर्याय द्रव्य में बनी ही रहती हैं। जैसे आत्मा में चेतन गुण नित्य विद्यमान हैं, परन्तु चेतना गुण के परिणाम घटज्ञान, पटज्ञान, श्रुतज्ञान, चक्षुदर्शन आदि कदाचित् ही होते हैं। पर्यायें सदा अवस्थित नहीं रहतीं।

गुणपर्यायवान् द्रव्य के लक्षण का प्रयोजन:

द्रव्यों का समुदाय सत् महाद्रव्य है। जिसका लक्षण उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक सत् है। ध्र्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि व्यवहार नय के अनुसार अर्पण करने पर उनमें द्रव्यत्व है। उसका असाधारण लक्षण गुणपर्यायत्व है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार द्रव्य का लक्षण ‘क्रियागुणवत्समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम्’[२५] माना गया है। अर्थात् जो क्रियावान, गुणवान् तथा समवायिकारण है, वह द्रव्य है। उनके यहाँ आकाश, काल, दिक्, आत्मा इन चार द्रव्यों को व्यापक मानकर क्रिया रहित स्वीकार किया गया है तथा पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन इन पांच द्रव्यों में ही क्रिया मानी गई है। आचार्य विद्यानंद ने लिखा है कि वैशेषिक का उक्त द्रव्य लक्षण ठीक नहीं है क्योंकि क्रिया सहित उस लक्षण में अव्याप्ति दोष आता है तथा क्रिया रहित आकाश आदि द्रव्यों में क्रिया का अभाव है। इसी तरह गुणवत्व नक्षण भी अव्याप्ति दोष से युक्त है। समवायिकारणत्व भी द्रव्य का लक्षण ठीक नहीं, क्योंकि इससे गुण और कर्म भी द्रव्यत्व को प्राप्त हो जायेंगे। इनमें समवाय सम्बन्ध से गुणत्व और कर्मत्व जाति समवेत हो रही है। यही उनकी समवायित्व से कारणता है। वैशेषिक का यह कहना भी निराधार है कि गुणत्व और कायत्व सामान्य है। किसी के कार्य नहीं है। इसलिए इनके समवायिकारण गुण या कर्म नहीं हो सकते। क्योंकि सामान्य सदृशपरिणाम लक्षण वाला है, जिसमें कथंचित् कार्यपना सिद्ध किया जा चुका है। इसलिए गुणत्व, कार्यत्व और सामान्यों का कथंचित् अनित्यत्व भी अनिष्ट नहीं है। सर्वथा नित्य पदार्थों में प्रत्यभिज्ञान का होना असंभव है, इस दृष्टि से सामान्य को कथंचित् नित्य भी कहा जा सकता है।[२६]

गुणवद् द्रव्यम् और पर्यायवद् द्रव्यम्:

गुणवद् द्रव्यम् और पर्यायवद् अनेकान्त की सिद्धि के लिए कहा गया है। द्रव्य के सहभावी परिणाम गुण हैं। अनन्तधर्मात्मक द्रव्य में गणों की अपेक्षा सहानेकान्त है। क्रमभावी अंश पर्यायें हैं, ऐसी अनेक पर्यायों की अपेक्षा क्रमानेकान्त है। क्रम और युगपद्रूप में अर्थक्रिया करने वाली सत् है। दोनों में से कोई एक को मानने पर वस्तु स्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता।[२७]

योगाचार-विज्ञानवादी ग्राह्याकार, ग्राहकाकार और संवेदनाकार के रूप में एक संवेदन को ग्रहण करने वाले एक बहिरंग और अंतरंग तत्व में एकसाथ अनेक धर्मों के अधिकरण का प्रतिक्षेव करते हैं, वे कैसे परीक्षक हो सकते हैं, वेद्य, वेदक, वित्ति, वेत्ता इन आकारों के पृथक भाव को परोक्ष रूप से जान रहे ज्ञान में सम्वेदन आकार को भी प्रत्यक्ष रूप जानने की इच्छा रखते हुए वे बौद्ध वस्तु में एकसाथ विद्यमान अनेक धर्मों के निराकरण करने में समर्थ नहीं है। इसलिए उन्हें सहानेकान्त अवश्य स्वीकार करना चाहिए। बौद्धों का यह कहना भी असंगत है कि शुद्ध सम्वेदनाद्वैत में प्रत्यक्ष आकार और परोक्ष आकार वास्तविक नहीं है, कल्पित हैं। सम्वेदन तो स्वकीय स्वरूप में ही संलग्न है। इसका प्रत्युत्तर जैनाचार्य यह देते हैं कि इसमें मो परमार्थभूत और अपरामार्थभूत आकार वाला एक सम्वेदन वलात् आ जाता है। यह कहना भी न्याय संगत नहीं है किे विज्ञान का परमार्थ आकार ही वास्तविक सत् है, संवेदन का कल्पित आकार सत् नहीं है क्योंकि इससे तो विज्ञानवादियों ने एक समय में सत्व स्वभाव और असत्य स्वभाव से आक्रान्त हो रहे एक सम्वेदन को स्वीकार ही कर लिया है। अनेकान्तवाद में कथंचित् असत्व दोनों धर्म एक सम्वेदन में व्यवस्थित हो जाते हैं। अन्यथा एकान्त रूप में किसी के यहां भी अभीष्ट तत्व की व्यवस्था नहीं बन सकती। वस्तुत: वस्तु का वस्तुत्व, अपने स्वरूपों का उपादान और परकीय रूप का परित्याग इस व्यवस्था से आपादन करने योग्य है। इसलिए सहानेकान्त अवश्य स्वीकार करना चाहिए क्योंकि एक शुद्ध ज्ञान में प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों आकार विद्यमान हैं। गुणवद् द्रव्यम् कहने का प्रयोजन यही सिद्ध करता है।[२८]

‘क्रमवर्तिन : पर्याया:’ पर्यायें क्रमवर्ती होती हैं। प्रत्येक गुण की एक समय में एक पर्याय होती है। इस तरह से अनन्तानन्त पर्यायें क्रम से होती रहती हैं। सूत्रकार ने इसलिए पर्ययवद् द्रव्यम् कहा है। क्रम अनेकान्त और अक्रम अनेकान्त का निराकरण करने वाले बौद्ध, सांख्य, ब्रह्माद्वैतवादियों आदि का निराकरण ‘गुणपर्ययवद् द्रव्यम्’ से हो जाता है।[२९] आचार्य विद्यानंद ने तीन प्रकार के एकान्तवादियों के प्रति तीन सूत्रों का समदाय समझाकर न्यायिक व्यवस्था दी है -

१. द्रव्यम् (पक्ष) गुणवत् (साध्य) द्रव्यत्वान्यथानुपपत्ते: (हेतु)

२. द्रव्यम् (पक्ष) पर्ययवत् (साध्य) द्रव्यत्वान्यथानुपपत्ते: (हेतु)

३. द्रव्यम् (पक्ष) गुणपर्ययवदत् (साध्य) द्रव्यत्वान्यथानुपपत्ते: (हेतु)

गुण और पर्याय में अन्तर :

गुण अन्वयी होते हैं और पर्याय व्यतिरेकी। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि द्रव्य में भेद करने वाले धर्म को गुण कहते हैं और द्रव्य के विकार को पर्याय कहते हैं। इन दोनों से युक्त द्रव्य होता है तथा वह अयुतसिद्ध और नित्य होता है।[३०] द्रव्याभ्या निर्गुणा: गुणा:[३१] अर्थात् जो द्रव्य के आश्रित हों, गुण रहित हों, वे गुण हैं। वस्तुत: गुणों के द्वारा ही द्रव्य का अस्तित्व सिद्ध होता है। यदि भेदक गुण न हों ते द्रव्यों में सांकर्य उत्पन्न हो जाये। जो निरन्तर द्रव्य में रहते हैं और गुण रहित हैं, वे गुण हैं। यह स्पष्ट होते हुए भी कि द्रव्य आधार है और गुण आघेय पर गुण द्रव्य से कथंचित् अभिन्न है, गुण का दूसरा नाम विशेष भी है, जो स्वयं विशेष रहित हों, वे गुण हैं जैसे द्रव्य में गुण पाये जाते हैं, गुण में अन्य गुण नहीं रहतें। गुण पर्यायों में भी पाये जाते हैं क्योंकि वे भी द्रव्य के आश्रय से रहते हैं। इसलिए पर्यायें भी विशेष रहित होती हैं। परन्तु गुण का लक्षण पर्यायों में नहीं जाता क्योंकि पर्यायें कदाचित्त होती हैं।[३२] सूत्रकार ने लिखा है कि ‘तदभाव: परिणाम:’[३३] द्रव्य का जो परिणमन होता है, वह परिणाम पर्याय है। पर्याय व्यतिरेकी होते हुए भी वह द्रव्य से कथंचित् ऐक्य है, क्योंकि उनको एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इनमें जो भेद या नानात्व पाया जाता है, उसके निम्न कारण है -[३४]

१. द्रव्य और पर्याय में परिणाम का भेद है।

२. दोनों में शक्तिमान और शक्तिभाव का भेद है।

३. दोनों में संज्ञा का भेद है।

४. दोनों में संख्या का भेद है।

५. दोनों में स्वलक्षण का भेद है और

६. प्रयोजन का भेद है।

पर्याय रहित द्रव्य और द्रव्य रहित पर्याय अर्थक्रिया करने में समर्थ नहीं हो सकते। इसलिए दोनों को वास्तविक मानना आवश्यक है। इस प्रकार तत्वार्थश्लोकवार्तिकभाष्य में आचार्य विद्यानंद द्वारा विभिन्न एकान्तवादियों द्वारा मान्य द्रव्य के लक्षण की समीक्षा करके सूत्रकार द्वारा बताये गये द्रव्य लक्षण को ही युक्तियुक्त सिद्ध किया है। तीर्थंकरों के परम्परा से प्राप्त अनेकान्तात्मक वस्तु तत्व के चिंतन के आलोक में सत्, द्रव्य, उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य गुण और पर्याय आदि वस्तु स्वरूप के प्रतिपादक पारिभाषिक शब्दों की व्युत्पत्तिपरक प्रमाणिक अर्थसंगति बैठाकर स्याद्वाद पद्धति से स्वसिद्धान्त को मण्डित किया है तथा न्यायवैशेषिक, बौद्ध, सांख्ययोग, ब्रह्माद्वैत आदि विभिन्न संप्रदायों के द्रव्य स्वरूप विषयक एकपक्षीय दृष्टिकोणों के प्रत्येक पक्ष को गंभीरता से पूर्वपक्ष के रूप में प्रस्तुत कर उनमें गुण दोषों के उदभावन पूर्वक द्रव्य के स्वरूप की कथंचित् नित्यानित्यात्मक एवं भेदाभेदात्मक व्यवस्था दी है। यद्यपि कि आचार्य विद्यानंद से पूर्व उन्हें आचार्य कुन्दकुन्द, समन्तभद्र, सिद्धसेन, अकलंक जैसे प्रखर ताकिक जैन नैयायिकों का प्रगाढ़ चिंतन उपलब्ध था, पर जैनेत्तर एकान्तवादी दर्शनों के सिद्धान्तों का विस्तृत वर्गीकरण कर उनका वर्गीकरण कर उनका विस्तृत समीक्षण प्रस्तुत किया जाना उनके अदभुत वैदुष्य का परिचायक है।

टिप्पणी

  1. आचार्य विद्यानंद, त० श्लोक, पुस्तक ६, भाषा टीकाकार पं. माणिकचंद कोन्देय, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, जीवाराज जैन ग्रंथमाला, सोलापुर, द्वि०सं० सन् २०११
  2. आचार्य उमास्वामी, तत्वार्थसूत्र, ५.२९
  3. आचार्य पूज्यपाद, सर्वार्थसिद्धि, ५.३०
  4. डॉ. नरेन्द्र कुमार जेन, समन्तभद्र अवदान, स्याद्वाद प्रसारिणी सभा, जयपुर प्र०सं० सन् २००१
  5. त० श्लोक ५,१ पृष्ठ ३४८, ४३१
  6. वही, ३४९
  7. वही, ३५०
  8. त० सूत्र, ५.२०
  9. त० श्लोक ५.३०.३५१
  10. वही, ५.३५२.५३
  11. वही, ३५३,३५४
  12. वही, ३५३, ३५६
  13. त० सू०, ५.३०
  14. त० श्लोक ३५८
  15. आचार्य समन्तभ्र, स्वयम्भूस्त्रोत्रम् ४३
  16. त० सूत्र, ५.३०
  17. वही, ५.३२
  18. वही, ५.३२, ३६४, ३६५
  19. त०सूत्र, ५.३९
  20. त०श्लोक ५.३९.९३३
  21. त०सूत्र, ५.२
  22. त०श्लोक ५.२.१६
  23. आचार्य अकलंक, तत्वार्थवार्तिक, ५.२
  24. त०श्लोक ५.२
  25. वैशेषिक दर्शन, १.१.१५
  26. त०श्लोक ५.३८ पृष्ठ ३९४
  27. वही, ५.३९ ३९७
  28. वही, ४००
  29. वही, ३९९
  30. सर्वार्थसिद्धि, ५.३८
  31. त०सूत्र ५.४१
  32. स०सि० ५.४१
  33. त०सूत्र, ५.४२
  34. आचार्य समन्तभद्र, आप्तमीमांस, ७१ और ७२