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तीर्थंकर जन्माभिषेक महिमा (हरिवंशपुराण से )

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तीर्थंकर जन्माभिषेक महिमा

(हरिवंशपुराण से)

तदनन्तर इन्द्र की आज्ञा और अपनी भक्ति के भार से कुबेर ने स्वयं आकर शुभ तीर्थजल से भगवान् के माता-पिता का अच्छी तरह अभिषेक किया और मनोज्ञ कल्पवृक्षों से उत्पन्न अन्यजन-दुर्लभ सुगन्ध और उत्तमोत्तम आभूषणों से उनकी पूजा की।।१।।

जिस प्रकार आकाश की लक्ष्मी अपने निर्मल उदर में चन्द्रमा को धारण करती है उसी प्रकार भगवान् की माता शिवादेवी ने प्रसिद्ध दिक्कुमारी देवियों के द्वारा पहले से ही शुद्ध किए गए अपने निर्मल उदर में जगत् के कल्याण के लिए सर्वप्रथम उस गर्भ को धारण किया जो उठती हुई प्रभा से युक्त था, अपने बन्धुजनरूपी समुद्र की वृद्धि को करने वाला था तथा सन्ताप के उदय को दूर करने वाला था।।२।।

उस गर्भरूपी फल के भार ने अत्यधिक दया से प्रेरित होकर ही मानो स्तनरूपी गुच्छों के भार से नम्रीभूत एवं पतली कमर वाली शिवादेवीरूपी लता को रंचमात्र भी बाधा नहीं पहुँचायी थी। न तो उसकी त्रिवलिरूपी तरंग की शोभा को नष्ट किया था, न श्वासोच्छ्वास से उसके अधररूपी पल्लव को बाधित किया था और न उसे आलस्य से युक्त ही होने दिया था।।३।।

अपने अत्यन्त गूढ़ गर्भ में भगवान् के शरीर की जो उत्पत्ति हुई थी उसे प्रकट करने के लिए ही मानो शिवादेवी के स्तनों का भार अत्यधिक दूध से परिपूर्णता को प्राप्त हो गया था तथा मेखला के सघन बन्धन से युक्त उसकी नितम्बस्थली उस स्तन के भार को धारण करने के गौरव से ही मानो अत्यधिक विस्तृत हो गयी थी।।४।।

उस समय भगवान् के प्रभाव से शिवादेवी का मन संसार की रक्षा करने तथा समस्त तत्त्वों के अवलोकन करने में अभ्यस्त रहता था, वचन सब प्रकार के संशय को नष्ट करने वाले हितकारी भाषण में अभ्यस्त रहता था और शरीर व्रतरूपी आभूषण के धारण करने तथा विनय के पोषण करने में अभ्यस्त रहता था।।५।।

भगवान् की माता देवांगनाओं के द्वारा सम्पादित एवं अनन्तगुणी कान्ति और बल को बढ़ाने वाला अमृतमय आहार करती थीं इसलिए उनका शरीर कृश होने पर भी अपनी प्रभा से दशों दिशाओं को सुवर्ण जैसी कान्ति का धारक करता हुआ बिजली के समान सुशोभित हो रहा था।।६।।

हाथीरूपी मगरमच्छों, उछलते हुए उन्नत अश्वरूपी मीन-समूहों, बड़े-बड़े रथरूपी जहाजों, राजाओं की सेनारूपी नदियों और जहाँ-तहाँ प्रवेश करते हुए मित्रोंरूपी तरंगों से प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हुए राजा समुद्रविजय उस समय सचमुच ही विशाल समुद्र की शोभा को धारण करते हुए वृद्धिंगत हो रहे थे।।७।।

इस प्रकार जो जगद्वलयरूपी वेला से पूजित थे, परस्पर में जिनका विशाल हर्ष निरन्तर बढ़ रहा था और जो इन्द्र की आज्ञा में लीन देव-देवियों के द्वारा की हुई विभूति से सहित थे ऐसे भगवान् के माता-पिता ने गर्भ के नौ माह सानन्द व्यतीत किए।।८।।

तदनन्तर वैशाख शुक्ल त्रयोदशी की शुभ तिथि में रात्रि के समय जब चन्द्रमा का चित्रा नक्षत्र के साथ संयोग था और समस्त शुभ ग्रहों का समूह जब यथायोग्य उत्तम स्थानों पर स्थित था तब शिवादेवी ने समस्त जगत् को जीतने वाले अतिशय सुन्दर पुत्र को उत्पन्न किया।।९।।

जो तीन ज्ञानरूपी उज्ज्वल नेत्रों के धारक थे तथा एक हजार आठ लक्षणों से युक्त नील कमल के समान सुन्दर शरीर को धारण कर रहे थे ऐसे जिनबालक ने अपनी कान्ति के द्वारा प्रसूतिकागृह के भीतर व्याप्त मणिमय दीपकों के कान्तिसमूह को कई गुणा अधिक कर दिया था।।१०।

उस समय जिनेन्द्ररूपी चन्द्रमा का उदय होने पर जो धवल पयोधर—मेघों को धारण करने वाली थी (पक्ष में धवल स्तनों से युक्त थी) अखण्ड—पूर्ण चन्द्रमा ही जिसका मुख था, (पक्ष में पूर्ण चन्द्रमा के समान जिसका मुख था), देदीप्यमान ताराओं के समूह ही जिसके आभूषण थे, (पक्ष में देदीप्यमान ताराओं के समूह के समान जिसके आभूषण थे), जो अत्यन्त सुन्दरी थी (पक्ष में हार से सुशोभित थी) और जो तरंगरूपी भुजपंजर के मध्य में वर्तमान थी ऐसी आकाशरूपी स्त्री का मदनरूपी महासागर ने अपनी इच्छानुसार चुम्बन किया था।।११।।

उस समय जो सुमेरुरूपी गम्भीर नाभि से युक्त थी, कुलाचलरूपी कण्ठ और स्तनों से सहित थी, बहती हुई नदियों के समूहरूपी हार के भार को धारण करने वाली थी, समुद्र का घेरा ही जिसका वस्त्र था तथा शब्दायमान वेदिका ही जिसकी मेखला थी, ऐसी जम्बूद्वीप की भूमि चल-विचल हो गयी जिससे ऐसी जान पड़ती थी मानो हर्ष के वशीभूत हो नृत्य ही कर रही हो।।१२।।

जो अनुत्तर विमानरूपी मुख से उज्ज्वल था, मोक्षरूपी मस्तक से सहित था, नौ अनुदिशरूपी ठोड़ी से युक्त था, नौ ग्रैवेयकरूपी ग्रीवा को धारण करने वाला था, स्वर्गरूपी शरीर से सहित था तथा मध्यम लोकरूपी कमर और अधोलोकरूपी जंघाओं से युक्त था ऐसा तीन लोकरूपी पुरुष उस समय चंचल हो उठा था सो ऐसा जान पड़ता था मानो कमर पर हाथ रखकर नृत्य ही कर रहा हो।।१३।।

उस समय जिनेन्द्र भगवान् के जन्म के प्रभाव से भवनवासी देवों के लोक में अपने आप शंखों का जोरदार शब्द होने लगा। समस्त व्यन्तर देवों के लोक में शीघ्र ही जोरदार पटह शब्द होने लगे। सूर्यलोक में िंसहनाद होने लगा और कल्पवासी देवों के भवनों में विशाल शब्द करने वाले घण्टा बज उठे।।१४।।

तदनन्तर जिनके मुकुट और िंसहासन कम्पायमान हो रहे थे, जिन्होंने अपने अवधिज्ञानरूपी नेत्र को प्रयुक्त किया था और उसके द्वारा जिनेन्द्र भगवान् के जन्म को जानकर जिन्हें अत्यधिक हर्ष उत्पन्न हुआ था, ऐसे तीनों लोकों में रहने वाले सुरेन्द्र तथा असुरेन्द्र चर्तुिणकाय के देवों को साथ ले बड़ी विभूति से भरतक्षेत्र की ओर चल पड़े।।१५।।

हाथ जोड़कर मस्तक से लगाते समय मुकुटों के अग्रभाग से टकाराए हुए कटकों के रत्नों की किरणों से जिन्होंने समस्त दिशाओं के अग्रभाग व्याप्त कर दिए थे ऐसे अत्यन्त शुद्ध सम्यग्दर्शन के धारक अहमिन्द्र देव यद्यपि अपने-अपने ही निवासस्थानों में स्थित रहे थे तथापि उन्होंने िंसहासन से सात कदम सामने आकर जिनेन्द्र भगवान् को नमस्कार किया था।।१६।।

असुरकुमार, नागकुमार, विद्युत्कुमार, अग्निकुमार, वायुकुमार, द्वीपकुमार, महोदधिकुमार, स्तनितकुमार और उदधिकुमार ये दश प्रकार के भवनवासी देव दशों दिशाओं को देदीप्यमान करते हुए जहाँ-तहाँ पृथ्वी से ऊपर आने लगे।।१७।।

जिनकी स्त्रियाँ मन को हरण करने में दक्ष, गीत तथा नाना प्रकार के नृत्यों से युक्त थीं, ऐसे िंकपुरुष, किन्नर, महोरग, राक्षस, पिशाच, भूत, यक्ष और गन्धर्व ये मध्यलोक में विशिष्ट प्रीति के रखने वाले आठ प्रकार के व्यन्तर देव चारों ओर से आने लगे।।१८।।

उज्ज्वल किरणों से युक्त ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और तारा नाम को धारण करने वाले पाँच प्रकार के प्रसिद्ध ज्योतिषी देवों का समूह एक साथ अपने-अपने विमानों से यहाँ आता हुआ ऐसा सुशोभित होने लगा मानो वह पृथ्वी पर एक दूसरा ही ज्योतिष लोक बनाने के लिए उद्यत हुआ हो।।१९।।

जो यथायोग्य अपनी-अपनी सात प्रकार की सेनाओं के सहित थे, ऐसे प्रथम स्वर्ग से लेकर सोलहवें स्वर्ग तक के सोलह इन्द्र आनन्द के वशीभूत हो समस्त स्वर्गों के देवों के साथ यहाँ आ पहुँचे।।२०।।

सौधर्मेन्द्र अपनी स्त्रियों के साथ उस ऐरावत नामक गजराज पर बैठा हुआ सुशोभित हो रहा था, जो चलते-फिरते हिमालय के समान जान पड़ता था तथा अनेक मुखों के भीतर दाँतों पर विद्यमान कमलसमूह की कलिकाओं पर नृत्य करती हुई देवांगनाओं के सुन्दर नृत्य से सुशोभित था।।२१।।

इन्द्र को चारों ओर से घेरे हुए देवों की वह सेना सुशोभित हो रही थी जिसने सात कक्षाओं का विभाग किया था, जो गोल आकार के सहित थी, स्वाभाविक पुरुषार्थ से युक्त थी तथा वङ्का आदि शस्त्रों के वन से जिसने आकाश के अन्तराल को रोक रखा था।।२२।।

तदनन्तर घोड़ों की बहुत बड़ी विराट् सेना थी जो अपने वेग से शीघ्रगामी वायु को शीघ्र ही जीत रही थी। जो अपनी हिनहिनाहट से तीन लोक के अन्तराल को संयुक्त तथा वियुक्त कर रही थी और आकाशरूपी समुद्र की उठती हुई तरंगों के समूह के समान जान पड़ती थी।।२३।।

तदनन्तर बैलों की वह सेना चारों ओर खड़ी थी जो कि सुन्दर मुख, सुन्दर अण्डकोश, नयन कमल, मनोहर कांदौल, पूँछ, शब्द, सुन्दर शरीर, सास्ना, सुवर्णमय खुर और सींगों से युक्त थी तथा अत्यधिक कान्ति से युक्त चन्द्रमा की प्रभा को धारण कर रही थी।।२४।।

तदनन्तर रथों की वह सेना भी सुशोभित हो रही थी जो स्वयं सात प्रकार से विभिन्न होने पर भी पर्वतों से अभेद्य थी, आकाशरूपी सागर में जो देवों के यानपात्र के समान जान पड़ती थी, प्रभा से जिसने सूर्य के देदीप्यमान रथ को जीत लिया था, जो अत्यन्त मनोहर थी और जिसका घेरा वलय के समान सुशोभित था।।२५।।

तत्पश्चात् जो चारों ओर से जल के छींटों की वर्षा कर रहे थे, जिनके शुण्डादण्ड ऊपर की ओर उठे हुए थे, जो बहुत भारी गर्जना कर रहे थे, जो आकार में बहुत भारी थे एवं जो बड़े-बड़े देवों से अधिष्ठित थे ऐसे मेघों की समानता धारण करने वाले हाथियों से रचित, अनेक प्रकार की रचनाओं से युक्त हाथियों की सेना भी वर्षा ऋतु की शोभा विस्तृत कर रही थी।।२६।।

हाथियों की सेना के बाद गन्धर्वों की वह सेना सुशोभित हो रही थी जिसने मधुर मूर्छना से कोमल वीणा, उत्कृष्ट बाँसुरी और ताल के शब्द से मिश्रित सातों प्रकार के आश्रित स्वरों से जगत् के मध्यभाग को पूर्ण कर दिया था, जो देव-देवांगनाओं से सुशोभित थी एवं सबको आनन्द उत्पन्न करने वाली थी।।२७।।

गन्धर्वों की सेना के बाद उत्कृष्ट नृत्य करने वाली नर्तकियों की वह सेना भी आकाश में प्रकट हुई थी जो कि नितम्बों के भार से मन्द-मन्द चल रही थी, समस्त रसों को पुष्ट करने वाली थी और वलयों से सुशोभित अपने शरीर से देवरूपी वृक्षों के मनरूपी पुष्पमंजरी को ग्रहण कर रही थी।।२८।।

प्रत्येक सेना में सात-सात कक्षाएँ थीं। उनमें से प्रथम कक्षा में चौरासी हजार घोड़े, बैल आदि थे फिर दूसरी-तीसरी आदि कक्षाओं में क्रम से दूने-दूने होते गए थे।।२९।।

अपनी-अपनी सेनाओं से युक्त समस्त इन्द्र भगवान् का जन्माभिषेक करने के लिए आकाश में व्याप्त हो जब तक सूर्यपुर आते हैं तब तक प्रसन्नता से युक्त एवं आदर से भरी दिक्कुमारी देवियाँ भगवान् का समस्त जातकर्म करने लगीं।।३०।।

देवियों में निर्मल हारों के धारण करने से सुशोभित एवं चमकते हुए मणियों के आभूषण और कानों के कुण्डलों से विभूषित, जगत्प्रसिद्ध विजया, वैजयन्ती, अपराजिता, जयन्ती, नन्दा, आनन्दा, नन्दिवर्धना और हृदय को आनन्दित करने वाली नन्दोत्तरा नाम की देवियाँ अपने स्तनों के समान स्थूल तथा अंग से विगलित होते हुए शृंगार रस के समान निर्मल जल से भरी हुई बड़ी ऊँची झारियाँ लिए हुए थीं।।३१-३२।।

यशोधरा, सुप्रसिद्धा, सुकीर्ति, सुस्थिता, प्रणिधि, लक्ष्मीमती, विचित्र गुणों से युक्त चित्रा और वसुन्धरा ये देवियाँ मणिमय दर्पण लेकर खड़ी थीं और चन्द्रमा से युक्त दिशाओं के समान सुशोभित हो रही थीं।।३३।।

इला, नवमिका, सुरा, पीता, पद्मावती, पृथ्वी, प्रवरकांचना और चन्द्रिका नाम की देवियाँ प्रभा से देदीप्यमान ताराओं के समान आभूषणों से सुशोभित तथा देदीप्यमान थीं। ये देवियाँ भगवान् की माता पर सफेद छत्र लगाए हुए थीं और चन्द्रमा के सहित रात्रियों के समान जान पड़ती थीं।।३४।।

श्री, धृति, आशा, वारुणी, पुण्डरीकिणी, अलम्बुसा, मिश्रकेशी और ह्री आदि देवियाँ हाथों पर चामर लिए खड़ी थीं तथा अधिक पेâनावली और तरंगों से युक्त आयी हुई कुलनदियों-गंगा आदि नदियों के समान सुशोभित हो रही थीं।।३५।।

देदीप्यमान कनकचित्रा, चित्रा, तीन लोक के देवों में प्रसिद्ध त्रिशिरा और सूत्रामणि, ये विद्युत्कुमारी देवियाँ उस समय जिनेन्द्र भगवान् के समीप अपनी चेष्टाओं से ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो मेघ के समीप अन्धकार को नष्ट करने वाली बिजलीरूपी लताएँ ही हों।।३६।।

उस समय समस्त विद्युत्कुमारियों में प्रधान रुचकप्रभा, रुचका, रुचकाभा और रुचकोज्ज्वला तथा दिक्कुमारियों में प्रधान विजय आदि चार देवियाँ विधिपूर्वक भगवान् का जातकर्म कर रही थीं।।३७।।

भगवान् के जन्मोत्सव के पूर्व ही कुबेर ने सूर्यपुर की अद्भुत शोभा बना रखी थी। उसके महलों पर बड़ी-बड़ी, ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं तथा वह इन्द्रलोक की शोभा को जीतने के लिए उद्यत सरीखा जान पड़ता था। अपने-अपने इन्द्रों सहित चारों निकायों के सुर और असुर आदर के साथ शीघ्र ही आकर जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति से उस नगर की तीन प्रदक्षिणाएँ दे उसकी शोभा देखने लगे।।३८।।

तदनन्तर सज्जनों का सखा और मर्यादा को जानने वाला इन्द्र नगर में प्रवेश कर शिवादेवी के महल के समीप खड़ा हो गया और वहीं से उसने आदर से युक्त, पवित्र एवं चंचलता से रहित इन्द्राणी को जात बालक के लाने का आदेश दिया। पति की आज्ञानुसार इन्द्राणी ने प्रसूतिका गृह में प्रवेश किया। उस समय आदर से भरी इन्द्राणी अत्यधिक सुशोभित हो रही थी।।३९।।

वहाँ उसने यत्नपूर्वक जिनमाता को प्रणाम कर मायामयी निद्रा में सुला दिया तथा देवमाया से एक दूसरा बालक बनाकर उनके समीप लिटा दिया। तदनन्तर इन्द्राणी ने कोमल हाथों से जिनबालक को उठाकर अपने स्वामी—इन्द्र के लिए दे दिया और देवों के राजा इन्द्र ने शिर से जिनबालक को प्रणाम कर दोनों हाथों से उन्हें ले लिया।।४०।।

जिन्होंने अपने मुखरूपी चन्द्रमा के द्वारा चन्द्रमा को जीत लिया था, नेत्रों से पुण्डरीक—सफेद कमल को जीत लिया था, शरीर की कान्ति से नीलकमलों के वन की शोभा को प्रमुख रूप से पराजित कर दिया था और अपने हाथों तथा पैरों से कमलों को पराभूत कर दिया था ऐसे जिनेन्द्र बालक को उस समय इन्द्र एक हजार नेत्रों से भी देखकर तृप्ति को प्राप्त नहीं हुआ—उसकी देखने की उत्कण्ठा ज्यों की त्यों बनी रही।।४१।।

वह इन्द्र जिसके मस्तक पर इन्द्रनीलमणि का ऊँचा चूड़ामणि सुशोभित हो रहा था, ऐसे जिनबालक को ऐरावत हाथीरूपी स्फटिकमय पर्वत के मस्तक पर विराजमान कर चला। उस समय वह इन्द्र चंचल चामर और छत्रों से अतिशय शोभायमान था और उनसे ऐसा जान पड़ता था मानों चंचल तरंगों के समूह से युक्त पेâन से भरा समुद्र ही चला जा रहा हो।।४२।।

ऐरावत हाथी के बत्तीस मुख थे, प्रत्येक मुख में आठ-आठ दाँत थे, प्रत्येक दाँत पर एक-एक सरोवर था, प्रत्येक सरोवर में एक-एक कमलिनी थी, एक-एक कमलिनी में बत्तीस-बत्तीस पत्र थे और एक-एक पत्र पर उत्तम रस से भरी हुई एक-एक अप्सरा नृत्य कर रही थी।।४३।।

उस प्रकार की लोकोत्तर विभूति के साथ देव लोग मेरु पर्वत के समीप पहँुचे तथा उसकी परिक्रमा देकर पाण्डुक नामक विशाल वनखण्ड में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने विशाल पाण्डुकशिला के ऊपर जो पाँच सौ धनुष ऊँचा िंसहासन है उस पर जिनबालक को विराजमान किया।।४४।।

तदनन्तर पूजा के उपकरणों को धारण करने वाले एवं नवीन उत्सव से आनन्दित देवांगनाओं के समूह जब चारों ओर खड़े थे, स्पष्ट तथा श्रेष्ठ रस, भाव, हाव और लय से देवों को अनुरंजित करने वाले श्रेष्ठ नृत्यकारों के समूह जब नृत्य कर रहे थे, सुमेरु पर्वत की सुविशाल गुफाओं से गूँजने वाली प्रतिध्वनि से वृद्धिंगत, दिशाओं के अन्तराल में फैलने वाले, जिनेन्द्र भगवान् के गुणों के समान अत्यन्त प्रकट एवं कानों को सुख देने वाले बजते हुए नगाड़ों और शंखों के शब्द तथा िंसहनाद और भेरियों की ध्वनियों से जब संसार का मध्यभाग परिपूर्ण हो रहा था, प्रकट होती हुई सुगन्धि से युक्त, नाना प्रकार के पटवास, धूपों के समूह और उत्तमोत्तम पुष्पों के समूह जब इधर-उधर आकाश तल को व्याप्त कर रहे थे और मुखरूपी पाण्डुक वन से उत्पन्न उत्कृष्ट गन्ध से हृदय को प्रिय लगने वाली सुन्दर वायु जब दिशाओं के मुख को अत्यन्त सुगन्धित कर रही थी तब अनेक शरीरों को धारण करने वाले इन्द्र ने देवों के साथ भक्तिपूर्वक, देवों के द्वारा लाए हुए, मणिमय और सुवर्णमय कुम्भों से च्युत, अत्यन्त सुगन्धित क्षीरसागर के शुभ जल से जिनेन्द्र भगवान् का स्वयं महाभिषेक करना शुरू किया।।४५ से ४८।।

उस समय सुमेरु पर्वत और क्षीरसागर के मध्य आकाश में हर्ष से भरी एवं देदीप्यमान मणियों के समूह से उज्ज्वल कलश हाथ में लिए देवों की पंक्तियाँ सब ओर खड़ी थीं, उनसे उस समय वह आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो बहुत-सी रस्सियों से बाँधकर कहीं ले जाया जा रहा हो।।४९।।

उस समय वहाँ ‘कलश लो, जल्दी दो और तुम भगवान् को शीघ्र ही मेरे सम्मुख धारण करो’ इस प्रकार कानों के लिए प्रिय शब्द हो रहे थे तथा वह कलशों की पंक्ति देवसमूह के एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती हुई शोभापूर्वक पाण्डुकवन में ऐसी प्रवेश कर रही थी मानो बड़े-बड़े हंसों की पंक्ति ही प्रवेश कर रही हो।।५०।।

आकाश में वेगशाली देवों के वशीभूत (हाथों में स्थित) सुवर्ण, मणि, रत्न और चाँदी से निर्मित कलशों की पंक्तियाँ आकाश में ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो सुन्दर पंखों की कान्ति से दिशाओं को व्याप्त करती हुई वेग से उड़ने वाले गरुड़ और हंसों की अनेक पंक्तियाँ ही हों।।५१।।

इन्द्र की भुजाओं के द्वारा उठाए हुए, मेघों के समान गर्जना करने वाले एवं उज्ज्वल जल से भरे हुए हजार कलशों से अभिषेक को प्राप्त होने वाले भगवान् ने मेरु पर्वत को सफेद कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि शुद्ध पदार्थ के आश्रय से अशुद्ध भी शुद्धता को प्राप्त हो जाता है।

भावार्थ —

भगवान् के अभिषेक जल से मेरु पर्वत सफेद-सफेद दिखने लगा।।५२।।

जिनशासन की प्राप्ति से जिनके प्रशस्त राग का उदय हो रहा था, जिनके शरीर में रोमांच प्रकट हुए थे और जिनका संसाररूपी सागर अत्यन्त अल्प रह गया था ऐसे अन्य समस्त स्वर्गों के इन्द्रों ने भी बड़े सन्तोष के साथ इच्छानुसार निर्मल जल से जिनेन्द्र भगवान् का अभिषेक किया था।।५३।।

तदनन्तर कोमल हाथों को धारण करने वाली शची आदि इन्द्राणियों ने आकर सुगन्धित द्रव्यों से भगवान् को उद्वर्तन—उबटन किया और अपने ही स्तनों के समान सुशोभित एक साथ उठाए हुए, शुभ जल से परिपूर्ण कलशों के द्वारा उनका अभिषेक किया।।५४।।

तदनन्तर इन्द्र आदि समस्त सुर और असुरों के समूह ने उत्तम वस्त्र, मणिमय आभूषण, माला तथा विलेपन से सुशोभित, कल्याण के पर्वत एवं अतिशय विशाल लक्ष्मी के स्वामी श्री जिनेन्द्रदेव का अरिष्टनेमि नाम रखकर उनकी प्रदक्षिणा दी और उसके बाद नाना प्रकार की स्तुतियों से उनका स्तवन किया।।५५।।

इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराण के संग्रह से युक्त जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराण में भगवान् के जन्माभिषेक का वर्णन करने वाला अड़तीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ।।३८।।


(१)

इन्द्र नेमि जिनेन्द्र की इस प्रकार स्तुति करने लगा—हे प्रभो! आपने समस्त श्रुतज्ञान, मतिज्ञान और अवधिज्ञान से विकसित, शुद्ध चेष्टाओं के धारक, जागरुक एवं विशिष्ट पदार्थों को दिखलाने वाली दृष्टि के द्वारा समस्त चराचर पदार्थों से युक्त तीनों जगत् को अच्छी तरह देख लिया है। आपने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यव्âचारित्र के भेद से त्रिविधता को प्राप्त निर्मल रत्नों से सुशोभित पूर्वभव सम्बन्धी उग्र तप से युक्त सोलहकारण भावनाओं के द्वारा तीर्थंकर नामक पुण्य प्रकृति का संचय किया है।।१।।

उसी तीर्थंकर प्रकृति को स्थिति तथा अनुभाग बन्ध के कारण अत्यन्त विशिष्ट एवं अद्भुत पुण्य के महोदयरूपी वायु के वेग से आपने देवसमूहरूपी कुलाचलों को विचलित किया है। उन्होंने आप के चरण युगल की सेवा की है। आप युग में मुख्य हैं तथा आपके मुखकमल के देखने सम्बन्धी तृप्ति से रहित भव्य जीवरूपी भ्रमरों के अत्यधिक स्तवनों की ध्वनि से वृद्धिंगत दुन्दुभियों के शब्द से आपका शुद्ध यश प्रकट हो रहा है।।२।।

हे नाथ ! आपने यश से शुक्लीकृत जन्म से समस्त भारतवर्ष को पवित्र किया है। अत्यन्त श्रेष्ठ हरिवंशरूप विशाल उदयाचल के शिखामणिस्वरूप बालदिनकर जैसी कान्ति से आपने सूर्य के शरीर को जीत लिया है। हे विभो ! आपने अधिक कान्ति को धारण करने वाले शरीर के द्वारा पूर्णचन्द्र को जीत लिया है एवं इन्द्रनीलमणि जैसी कान्ति के समूह से आपने समस्त दिशाओं के मुखमण्डल को सुशोभित कर दिया है इसलिए हे नेमि जिनेन्द्र ! आपको नमस्कार हो।।३।।

हे परमेश्वर! हे विश्वजनीन! हे अप्रतिम—हे अनुपम! आप तीनों लोकों के गुरु हैं एवं उत्कट बुद्धि के धारक हैं। यहाँ उत्पन्न होते ही आपने अनुपम, प्रसिद्ध एवं मोक्ष का जो हितकारी मार्ग बतलाया है उसे स्वीकार कर तथा नाना प्रकार का तपकर भव्य जीव समस्त पापकर्मरूपी मल को विधिपूर्वक नष्ट कर पृथ्वी में वन्दनीय होंगे।।४।।

हे प्रणतप्रिय ! हे भक्तवत्सल ! अब आप जन्म-जरा-मरणरूपी रोगों से भयंकर संसाररूपी महादुःख के अपार सागर को पार कर मोक्षस्वरूप, समस्त लोक के उस शिखर को प्राप्त होंगे जहाँ पर उत्कृष्ट सीमा को प्राप्त समस्त गुणों के आधारभूत सिद्ध भगवान् रूप महापरमेष्ठी विराजमान रहते हैं और जिसे मुनिगण उत्कृष्ट, अद्वितीय, अविनाशी एवं आत्महितकारी पद कहते हैं।।५।।

जहाँ का उत्तम, महान् , आत्मगत, निरन्तर उदय में रहने वाला, अन्तरहित और अनन्त बल सम्पन्न सुख महापुरुषों को ही प्राप्त हो सकता है अभव्य जीवों को नहीं। हे स्वामिन् ! आप उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य स्वभाव वाले पदार्थों के निरूपण करने में निपुण शासन का उपदेश करने वाले हैं। इस संसार में समस्त जगत् की प्रभुता से सम्बद्ध एवं इन्द्र, नरेन्द्र आदि देव और मनुष्यों के विशेष महान् अभ्युदयों का कारणभूत जो सुख है वह भी आपके शासन की सेवा से ही प्राप्त होगा, अन्य मतों के आश्रय से नहीं। इसलिए सब आपका ही आश्रय लेवें, इस प्रकार आप के विषय में निश्चय—दृढ़ श्रद्धा को प्राप्त कर जो प्राणी इस पृथ्वी में निग्र्रन्थ बुद्धि के धारण करने में प्रवीण होते हैं—ाqनग्र्रन्थ मुद्रा धारण करते हैं। हे जिनेन्द्र ! वे ही प्राणी इस संसार में कृतकृत्यता को प्राप्त होते हैं।।६-७।।

हे भगवान् ! आप प्रिय एवं सर्वहितकारी वचनों के वैभव से सहित हैं, संसार का अन्त करने वाले हैं, आपने दिशाओं के अन्तराल को सुगन्धित कर दिया है, आप उत्कृष्ट संहनन, उत्कृष्ट संस्थान और उत्कृष्ट रूप से युक्त हैं, आप समस्त लक्षणों से सुशोभित हैं, आपके शरीर का रस रुधिर दूध के समान है, आप रस और भाव को जानने वाले हैं, आपका शरीर मल से रहित है, पसीना से रहित है, आप पृथ्वी में व्याप्त अनन्त बल से सहित हैं।।८।।

आपने संयमरूप आत्मबुद्धि से कामदेव को जीत लिया है। आप सुखरूपी सस्य से परिपूर्ण एवं अत्यन्त रक्षणीय भूमि की रक्षा करने वाले हैं। हे सबके रक्षक भगवन्! इस तरह आप अनन्त गुणों के धारक हैं। हे नाथ ! आपके गुणों की अभिलाषा से हम आपके प्रति नम्रीभूत हैं—आपको नमस्कार करते हैं।।९।।

हे नाथ ! यह अनेकों हजार योजन ऊँचा पर्वतों का राजा सुमेरु पर्वत भी मानो आपके योग का साधन हो गया। सो आपके सिवाय प्रचण्ड बुद्धि को धारण करने वाला ऐसा कौन महापुरुष है जो इसे श्रेष्ठ तथा देदीप्यमान स्नानपीठ बना सकने को समर्थ है।।१०।।

हे ईश! यह आपका ऐश्वर्य अपरिमित है, मानरूपी धन के धारक बड़े-बड़े देव तथा मनुष्यों के द्वारा माननीय है। हे जिनेन्द्र! इस संसार में स्वर्ग में उत्पन्न होने वाला भी ऐसा कौन दूसरा माननीय पुरुष है जो आपके समान ऐश्वर्य को प्राप्त कर सके।।११।।

हे भगवन्! बाल्यकाल में भी आप लोकोत्तर पराक्रम के धारक हैं, प्राणियों के हितकारक हैं, तीनों लोकों के द्वारा स्तुत्य हैं तथा आप नूतन भक्ति से भार से नम्रीभूत मनुष्यों के लिए शारीरिक और मानसिक सुख के करने वाले हैं।।१२।।

हे प्रभो! आप कामरूपी गजराज को नष्ट करने के लिए िंसह के समान हैं इसलिए आपको नमस्कार हो। आप क्रोधरूपी महानाग को वश में करने के लिए पक्षिराज गरुड़ के समान हैं इसलिए आपको नमस्कार हो। आप मानरूपी पर्वत को चकनाचूर करने के लिए वङ्का के समान हैं इसलिए आपको नमस्कार हो और आप लोभरूपी महावन को भस्म करने के लिए दावानल के समान हैं इसलिए आपको नमस्कार हो।।१३।।

आप ईश्वरता के धारण करने में धीर-वीर हैं अतः आपको नमस्कार हो। हे देव! आप विष्णुता से युक्त हैं अतः आपको नमस्कार हो। आप अर्हन्तरूप अचिन्त्य पद के स्वामी हैं अतः आपको नमस्कार हो और आप ब्रह्म पद को प्राप्त करने वाले हैं अतः आपको नमस्कार हो।।१४।।

इस प्रकार सत्य वचनों के समूह से देवों ने भगवान् की स्तुति कर उन्हें प्रणाम किया तथा भयंकर संसार से पार करने वाले भगवान् से उन्होंने यही एक वर माँगा कि हे भगवन् ! हम लोगों को उत्तम बोधि की प्राप्ति हो।।१५।।

अथानन्तर खेद रहित एवं विशाल बुद्धि के धारक देव सन्तोष की अधिकता से आकाश में जिन शंखों को अधिक मात्रा में फूक रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो अमृत के महासागर के मथने से जो अत्यन्त शुद्ध अमृत का पिण्ड निकला था उसे अधिक मात्रा में पी जाने के दोष से देव लोग चिरकाल तक पचा नहीं सके इसलिए उन्होंने उगल दिया हो उसी पीयूष-पिण्ड के टुकड़े हों। शंखों के शब्दों के साथ-साथ बजाए जाने वाले अत्यधिक गम्भीर ध्वनि से युक्त भेरी, मृदंग तथा पटह आदि को एवं अधिक मात्रा में बजने वाली बाँसुरी और वीणा के शब्द, ‘श्री जिनेन्द्र भगवान् के जन्माभिषेक का उत्सव हो चुका है’ इसकी घोषणा करने के लिए ही मानो जब समस्त लोक के अन्त तक एवं समस्त दिशाओं के अन्तराल में व्याप्त होने के लिए उठ रहे थे और जब विद्याधरों के समूह एवं देवांगनाओं के उन्नत संगीतमय शब्दों से सुन्दर श्रेष्ठ शृंगार, हास्य और अद्भुत रस से परिपूर्ण वाचिक, आंगिक, सात्त्विक और आहार्य इन चार प्रकार के अपने सुन्दर दिव्य अभिनेयों के प्रकट करने में प्रवृत्त अप्सराओं के समूह सुन्दर नृत्य कर रहे थे। तब सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र, सम्भ्रमपूर्वक विभ्रमों से शोभायमान उठते हुए ऐरावत हाथी के कन्धे पर धीर-वीर जिनेन्द्र को विराजमान कर सुमेरु पर्वत से उस शौर्यपुर की ओर चला जो शूरवीरता के पर्वत एवं िंसहों के समान बलवान् यादववंशी राजाओं से अधिष्ठित था। उस समय जिनेन्द्र भगवान् के ऊपर सफेद छत्र सुशोभित हो रहा था, चंचल चमरों की पंक्तियाँ उन पर ढोरी जा रही थीं और प्रकृष्ट गीतों से युक्त अप्सराओं के समूह उनकी अत्यन्त विशुद्ध कीर्ति गा रहे थे। सौधर्मेन्द्र ने उस समय समस्त आकाश को सब प्रकार की सेनाओं से पूर्ण कर रखा था। मार्ग में चलते हुए, हर्ष से परिपूर्ण, प्रणाम, स्तुति तथा संगीत के प्रयोग में लीन प्रसिद्ध देवों के समूह भगवान् का यथायोग्य अभिनन्दन कर रहे थे। त्रिलोकसम्बन्धी इन्द्रों का समूह भगवान् के चरण कमलों की सेवा में तत्पर था और भगवान् उसे महान् आनन्द प्राप्त करा रहे थे। इस प्रकार जो लोकोत्तर एवं अत्यन्त आश्चर्यकारी परम ऐश्वर्य को धारण कर रहे थे, शिवादेवी के पुत्र थे, ‘समृद्धि को प्राप्त होओ’ ‘बढ़ते रहो’ ‘जीवित रहो’ इत्यादि पुण्य शब्दों से उस समय जिनकी स्तुति हो रही थी, कुलाचलों से उत्पन्न अत्यधिक स्वच्छ जल से युक्त महानदियों की तरंगों के संसर्ग से शीतल, भोगभूमि सम्बन्धी कल्पवृक्षों के रंग-बिरंगे पुष्प-समूह के संयोग से आश्चर्यकारी सुगन्धि को धारण करने वाले तथा खेद दूर करने के लिए सम्भ्रमपूर्वक बहुत दूर से सम्मुख आए हुए मित्र के समान, शरीर के अनुकूल मन्द-मन्द समीर से जिनका आलिंगन हो रहा था, जो प्रभु थे, तीर्थंकर थे, कोमल शरीर के धारक थे, जो मन को हरण करने वाले तथा बाल्य अवस्था के अनुरूप वस्त्रों से सुशोभित विशिष्ट आभूषणों से युक्त थे, देदीप्यमान मालाओं से उज्ज्वल थे, बाल कल्पवृक्ष की उत्कृष्ट शोभा को तिरस्कृत करने वाले थे, मेघ के समान श्याममूर्ति के धारक थे, सफेद एवं उत्कृष्ट गन्ध से युक्त उत्तम चन्दन से लिप्त थे और इसके कारण जो उदित होती हुई सघन चाँदनी से आिंलगित प्रगाढ़ इन्द्रनीलमणि के पर्वत की शोभा को धारण कर रहे थे और देवों की सेना से आवृत थे ऐसे नेमिजिनेन्द्र शीघ्र ही उत्तर दिशा को उल्लंघ कर अपने उस शौर्यपुर नगर में जा पहँुचे जहाँ की दिशाओं का अन्तराल और आकाश उँची-उँची ध्वजाओं के समूह तथा वादित्रों की गम्भीर ध्वनि से व्याप्त था, जहाँ के बड़े-बड़े मार्ग, दिव्य और सुगन्धित जल की वृष्टि से सींचे जाकर फूलों की पड़ती हुई वर्षा से रुके हुए थे, जो लक्ष्मी का भण्डार था तथा मंगलाचारमय विधि-विधान से सुन्दर था, उस समय भगवान् नेमिनाथ पृथ्वी पर समस्त लोगों को आश्चर्य में डालने वाले आश्चर्य को प्रकट कर रहे थे।

बालक होने पर भी जिनकी शोभा बालकों जैसी नहीं थी अर्थात् जो प्रकृति से वयस्क के समान सुन्दर थे। जो कृष्ण तथा सौर्यपुर की प्रजारूपी शोभायमान कमलिनी को विकसित करने के लिए बालसूर्य थे और जो अतिशय ऊँचे ऐरावत—गजराज के मस्तक पर विराजमान थे ऐसे जिनबालकों को लेकर इन्द्र ने उन्हें माता की गोद में दिया। तदनन्तर विक्रिया शक्ति से युक्त इन्द्र ने स्वयं देदीप्यमान कन्धों की शोभा को पुष्ट करने वाली हजार भुजाएँ बनाकर उन्हें फैलाया तथा उन पर अत्यधिक सौन्दर्य से युक्त नाना प्रकार का नृत्य करने वाली हजारों देवियों को धारण किया। तत्पश्चात् इस लीला को जब सामने बैठै हुए यादव लोग बड़े हर्ष से देख रहे थे तथा अपने हृदय में जब इसे समस्त पृथ्वी के स्वामित्व के लाभ से भी अधिक समझ रहे थे तब राज्य में दक्ष इन्द्र ने महानन्द नाम का वह उत्तम नाटक किया जिसने सबके नेत्रों को विस्तृृत कर दिया था अर्थात् जिसे सब टकटकी लगाकर देख रहे थे। उत्सवपूर्वक प्रारम्भ किए हुए उत्तम ताण्डव नृत्य की अखण्ड शोभा के प्रयोग से सहित था, नाना प्रकार के वादित्रों की जातियों के समूह से जिसमें अभिनेय अंश वृद्धि को प्राप्त हो रहे थे, जो भौंहों के क्षोभ की लीला से सहित था, दिङ्मण्डल के भेद से सहित था, पृथ्वी के प्रताप से सहित था और नाना रसों के कारण जिसमें उदार भाव प्रकट हो रहा था। तदनन्तर इन्द्र ने भगवान् के माता-पिता को प्रणाम किया, उनकी पूजा की, अन्य मनुष्यों के लिए दुष्प्राप्य अमूल्य आभूषण आदि से उन्हें विभूषित किया, रक्षा के निमित्त जिनेन्द्र के दाहिने हाथ के अँगूठे में अमृतमय मुख्य आहार निक्षिप्त किया। क्रीडा के लिए भगवान् की समान अवस्था को धारण करने वाले देवकुमारों को उनके पास नियुक्त किया, कुबेर को यह आज्ञा दी कि तुम भगवान की अवस्था, काल और ऋतु के अनुकूल उनके कल्याण के योग्य समस्त व्यवस्था करना। इस प्रकार इन्द्र यह आज्ञा देकर भगवान् के माता-पिता से पूछकर तथा उनकी आज्ञा प्राप्त कर अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ चार निकाय के देवों से अनुगत समस्त इन्द्रों के साथ जैसा आया था वैसा चला गया। इन्द्र की यात्रा सफल हुई।

तदनन्तर अपना-अपना कार्य पूरा कर दिक्कुमारी देवियों ने आर्यपुत्री, जिनबालक सहित माता शिवादेवी के पास आकर उन्हें प्रणाम किया और उसके बाद वे प्रकृष्ट हर्ष से युक्त अपने शरीर की प्रभाओं से दशों दिशाओं को देदीप्यमान करती हुई अपने-अपने स्थानों पर चली गयीं। इधर गुणसमूहरूपी किरणों के समूह से समस्त जगत् को आनन्दित करने वाले, बालक होने पर भी वृद्ध जैसी क्रिया से युक्त बन्धुवर्ग तथा देवों के द्वारा लालित नेमिजिनेन्द्ररूपी चन्द्रमा दिन-प्रतिदिन बढ़ते हुए लक्ष्मी से सुशोभित होने लगे। गौतम स्वामी कहते हैं कि वह स्तवन उन नेमिजिनेन्द्र के जन्माभिषेक से सम्बन्ध रखने वाला है जिनके सातिशय प्रभाव ने तीनों लोकों को व्याप्त कर रखा है, जो पाप को दूर करने वाले हैं, एक पुण्य का ही मार्ग बताने वाले हैं, संसार में सारभूत हैं, मोक्ष के निकट हैं, भव्य जीवों को हर्ष उत्पन्न करने वाले हैं, प्रमाद को हरने वाले हैं, धर्म का उपहार देने वाले हैं, सब लोग बड़े हर्ष से जिनका नाम श्रवण करते हैं, जिनका स्मरण करते हैं और जिनका अच्छी तरह कीर्तन करते हैं। पढ़ा गया, सुना गया और सदा चिन्तवन किया गया वह स्तोत्र इस लोक में साक्षात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यव्âचारित्ररूपी सम्पत्ति को करता है, मानसिक और शारीरिक सुख प्रदान करता है, शान्ति करता है, पुष्टि करता है, तुष्टि और सम्पत्ति को सम्पन्न करता है तथा परलोक में अनेक कल्याणों की प्राप्ति में कारणभूत उत्कृष्ट पुण्यास्रव का स्वयं कारण है, समस्त पाप कर्मों के हजारों प्रकार के आस्रवों का निवारण करता है और पूर्वभव में सर्वदा स्नेह तथा मोह आदि भावों से संचित भयंकर से भयंकर पापों का नाश करता है। यह मुख्य स्तोत्र जिनेन्द्र भगवान् में सातिशय भक्ति उत्पन्न करे। इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराण के संग्रह से युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराण में जन्माभिषेक के समय इन्द्र द्वारा कृत स्तुति का वर्णन करने वाला उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त हुआ।।३९।।

(३)

अथानन्तर, जब अभिषेक की विधि समाप्त हो चुकी तब इन्द्राणी देवी ने हर्ष के साथ जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव को अलंकार पहनाने का प्रयत्न किया।।१।।

जिनका अभिषेक किया जा चुका है ऐसे पवित्र शरीर को धारण करने वाले भगवान् वृषभदेव के शरीर में लगे हुए जलकणों को इन्द्राणी ने स्वच्छ एवं निर्मल वस्त्र से पोंछा।।२।।

भगवान् के मुख पर, अपने निकटवर्ती कटाक्षों की जो सफेद छाया पड़ रही थी उसे इन्द्राणी जलकण समझती थी अतः पोंछे हुए मुख को भी वह बार-बार पोंछ रही थी।।३।।

अपनी सुगन्धि से स्वर्ग अथवा तीनों लोकों को लिप्त करने वाले अतिशय सुगन्धित गाढ़े सुगन्ध द्रव्यों से उसने भगवान् के शरीर पर विलेपन किया था।।४।।

यद्यपि वे सुगन्ध द्रव्य उत्कृष्ट सुगन्धि से सहित थे तथापि भगवान् के शरीर की स्वाभाविक तथा दूर-दूर तक फैलने वाली सुगन्ध ने उन्हें तिरस्कृत कर दिया था।।५।।

इन्द्राणी ने बड़े आदर से भगवान् के ललाट पर तिलक लगाया परन्तु जगत् के तिलकस्वरूप भगवान् क्या उस तिलक से शोभायमान हुए थे ?।।६।।

इन्द्राणी ने भगवान् के मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों की माला से बना हुआ मुकुट धारण किया था। उन मालाओं से अलंकृतमस्तक होकर भगवान् ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो कीर्ति से ही अलंकृत किए गए हों।।७।।

यद्यपि भगवान् स्वयं जगत् के चूड़ामणि थे और सज्जनों में सबसे मुख्य थे तथापि इन्द्राणी ने भक्ति से निर्भर होकर उनके मस्तक पर चूड़ामणि रत्न रखा था।।८।।

यद्यपि भगवान् के सघन बरौनी वाले दोनों नेत्र अंजन लगाए बिना ही श्यामवर्ण थे तथापि इन्द्राणी ने नियोग मात्र समझकर उनके नेत्रों में अंजन का संस्कार किया था।।९।।

भगवान् के दोनों कान बिना वेधन किए ही छिद्र सहित थे, इन्द्राणी ने उनमें मणिमय कुण्डल पहनाए थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो भगवान् के मुख की कान्ति और दीप्ति को देखने के लिए सूर्य और चन्द्रमा ही उनके पास पहँुचे हों।।१०।।

मोक्षलक्ष्मी के गले के हार के समान अतिशय सुन्दर और मनोहर मणियों के हार से त्रिलोकीनाथ भगवान् वृषभदेव के कण्ठ की शोभा बहुत भारी हो गयी थी।।११।।

बाजूबन्द, कड़ा, अनन्त (अणत) आदि से शोभायमान उनकी दोनों भुजाएँ ऐसी मालूम होती थीं मानो कल्पवृक्ष की दो शाखाएँ ही हों।।१२।।

भगवान् के कटिप्रदेश में छोटी-छोटी घण्टियों (बोरों) से सुशोभित मणिमयी करधनी ऐसी शोभायमान हो रही थी मानो कल्पवृक्ष के अंकुर ही हों।।१३।।

गोमुख के आकार के चमकीले मणियों से शब्दायमान उनके दोनों चरण ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो सरस्वती देवी ही आदरसहित उनकी सेवा कर रही हो।।१४।।

उस समय अनेक आभूषणों से शोभायमान भगवान् ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी का पुंज ही प्रकट हुआ हो, ऊँची शिखा वाली रत्नों की राशि ही हो अथवा भोग्य वस्तुओं का समूह ही हो।।१५।।

अथवा अलंकारसहित भगवान् ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो सौन्दर्य का समूह ही हो, सौभाग्य का खजाना ही हो अथवा गुणों का निवासस्थान ही हो।।१६।।

स्वभाव से सुन्दर तथा संगठित भगवान् का शरीर अलंकारों से युक्त होने पर ऐसा शोभायमान होने लगा था मानो उपमा, रूपक आदि अलंकारों से युक्त तथा सुन्दर रचना से सहित किसी कवि का काव्य ही हो।।१७।।

इस प्रकार इन्द्राणी के द्वारा प्रत्येक अंग में धारण किए हुए मणिमय आभूषणों से वे भगवान् उस कल्पवृक्ष के समान शोभायमान हो रहे थे जिसकी प्रत्येक शाखा पर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं।।१८।।

इस तरह इन्द्राणी ने इन्द्र की गोदी में बैठे हुए भगवान् को अनेक वस्त्राभूषणों से अलंकृत कर जब उनकी रूप-सम्पदा देखी तब वह स्वयं भारी आश्चर्य को प्राप्त हुई।।१९।।

इन्द्र ने भी भगवान् के उस समय की रूपसम्बन्धी शोभा देखनी चाही परन्तु दो नेत्रों से देखकर सन्तुष्ट नहीं हुआ इसीलिए मालूम होता है कि वह द्व्यक्ष से सहस्राक्ष (हजारों नेत्रों वाला) हो गया था—उसने विक्रिया शक्ति से हजार नेत्र बनाकर भगवान् का रूप देखा था।।२०।।

उस समय देव और असुरों ने अपने टिमकाररहित नेत्रों से क्षण भर के लिए मेरु पर्वत के शिखामणि के समान सुशोभित होने वाले भगवान् को देखा।।२१।।

तदनन्तर इन्द्र आदि श्रेष्ठ देव उनकी स्तुति करने के लिए तत्पर हुए, सो ठीक ही है, तीर्थंकर होने वाले पुरुष का ऐसा ही अधिक प्रभाव होता है।।२२।।

हे देव, हम लोगों को परम आनन्द देने के लिए ही आप उदित हुए हैं। क्या सूर्य के उदित हुए बिना कभी कमलों का समूह प्रबोध को प्राप्त होता है ?।।२३।।

हे देव, मिथ्याज्ञानरूपी अन्धकूप में पड़े हुए इन संसारी जीवों के उद्धार करने की इच्छा से आप धर्मरूपी हाथ का सहारा देने वाले हैं।।२४।।

हे देव, जिस प्रकार सूर्य की किरणों के द्वारा उदय होने से पहले ही अन्धकार नष्टप्राय कर दिया जाता है उसी प्रकार आपके वचनरूपी किरणों के द्वारा भी हम लोगों के हृदय का अन्धकार नष्ट कर दिया गया है।।२५।।

हे देव, आप देवों के आदि देव हैं, तीनों जगत् के आदिगुरु हैं, जगत् के आदि विधाता हैं और धर्म के आदिनायक हैं।।२६।।

हे देव, आप ही जगत् के स्वामी हैं, आप ही जगत् के पिता हैं, आप ही जगत् के रक्षक हैं और आप ही जगत् के नायक हैं।।२७।।

हे देव, जिस प्रकार स्वयं धवल रहने वाला चन्द्रमा अपनी चाँदनी से समस्त लोक को धवल कर देता है उसी प्रकार स्वयं पवित्र रहने वाले आप अपने उत्कृष्ट गुणों से सारे संसार को पवित्र कर देते हैं।।२८।।

हे नाथ, संसाररूपी रोग से दुःखी हुए ये प्राणी अमृत के समान आपके वचनरूपी औषधि के द्वारा निरोग होकर आपसे परम कल्याण को प्राप्त होंगे।।२९।।

हे भगवान्, आप सम्पूर्ण क्लेशों को नष्ट कर इस तीर्थंकररूप परम पद को प्राप्त हुए हैं अतएव आप ही पवित्र हैं, आप ही दूसरों को पवित्र करने वाले हैं और आप ही अविनाशी उत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप हैं।।३०।।

हे नाथ, यद्यपि आप कूटस्थ हैं—नित्य हैं तथापि आज हम लोगों को कूटस्थ नहीं मालूम होते क्योंकि ध्यान से होने वाले समस्त गुण आप में ही वृद्धि को प्राप्त होते रहते हैं। भावार्थ—जो कूटस्थ (नित्य) होता है उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता अर्थात् न उनमें कोई गुण घटता है और न बढ़ता है, परन्तु हम देखते हैं कि आपमें ध्यान आदि योगाभ्यास से होने वाले अनेक गुण प्रतिसमय बढ़ते रहते हैं, इस अपेक्षा से आप हमें कूटस्थ नहीं मालूम होते।।३१।।

हे देव, यद्यपि आप बिना स्नान किए ही पवित्र हैं तथापि मेरु पर्वत पर जो आपका अभिषेक किया गया है वह पापों से मलिन हुए इस जगत् को पवित्र करने के लिए ही किया गया है।।३२।।

हे देव, आपके जन्माभिषेक से केवल हम लोग ही पवित्र नहीं हुए हैं किन्तु यह मेरू पर्वत, क्षीरसमुद्र तथा उन दोनों के वन (उपवन और जल) भी पवित्रता को प्राप्त हो गए हैं।।३३।।

हे देव, आपके अभिषेक के जलकण सब दिशाओं में ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो संसार को आनन्द देने वाला और घनीभूत आपके यश का समूह ही हो।।३४।।

हे देव, यद्यपि आप बिना लेप लगाए ही सुगन्धित हैं और बिना आभूषण पहने ही सुन्दर हैं तथापि हम भक्तों ने भक्तिवश ही सुगन्धित द्रव्यों के लेप और आभूषणों से आपकी पूजा की है।।३५।।

हे भगवन् , आप तेजस्वी हैं और संसार में सबसे अधिक तेज धारण करते हुए प्रकट हुए हैं इसलिए ऐसे मालूम होते हैं मानो मेरु पर्वत के गर्भ से संसार का एक शिखामणि—सूर्य ही उदय हुआ हो।।३६।।

हे देव, स्वर्गावतरण के समय आप ‘सद्योजात’ नाम को धारण कर रहे थे, ‘अच्युत’ (अविनाशी) आप हैं ही और आज सुन्दरता को धारण करते हुए ‘वामदेव’ इस नाम को भी धारण कर रहे हैं अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं।।३७।।

जिस प्रकार शुद्ध खानि से निकला हुआ मणि संस्कार के योग से अतिशय देदीप्यमान हो जाता है उसी प्रकार आप भी जन्माभिषेकरूपी जातकर्म संस्कार के योग से अतिशय देदीप्यमान हो रहे हैं।।३८।।

हे नाथ, यह जो ब्रह्माद्वैतवादियों का कहना है कि सब लोग परं ब्रह्म की शरीर आदि पर्यायें ही देख सकते हैं उसे साक्षात् कोई नहीं देख सकते’ वह सब झूठ है क्योंकि परं ज्योतिःस्वरूप आप आज हमारे प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहे हैं।।३९।।

हे देव, विस्तार से आपकी स्तुति करने वाले योगिराज आपको पुराणपुरुष, पुरु, कवि और पुराण आदि मानते हैं।।४०।।

हे भगवन् , आपकी आत्मा अत्यन्त पवित्र है इसलिए आपको नमस्कार हो आपके गुण सर्वत्र प्रसिद्ध हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप जन्म-मरण का भय नष्ट करने वाले हैं और गुणों के एकमात्र उत्पन्न करने वाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो।।४१।।

हे नाथ, आप क्षमा (पृथ्वी) के समान क्षमा (शान्ति) गुण को ही प्रधान रूप से धारण करते हैं इसलिए क्षमा अर्थात् पृथिवीरूप को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो, आप जल के समान जगत् को आनन्दित करने वाले हैं इसलिए जलरूप को धारण करने वाले आपको नमस्कार हो।।४२।।

आप वायु के समान परिग्रहरहित हैं, वेगशाली हैं और मोहरूपी महावृक्ष को उखाड़ने वाले हैं इसलिए वायुरूप को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो।।४३।।

आप कर्मरूपी र्इंधन को जलाने वाले हैं, आपका शरीर कुछ लालिमा लिए हुए पीतवर्ण तथा पुष्ट है और आपका ध्यानरूपी तेज सदा प्रदीप्त रहता है इसलिए अग्निरूप को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो।।४४।।

आप आकाश की तरह पापरूपी धूलि की संगति से रहित हैं, विभु हैं, व्यापक हैं, अनादि अनन्त हैं, निर्विकार हैं, सबके रक्षक हैं इसलिए आकाशरूप को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो।।४५।।

आप याजक के समान ध्यानरूपी अग्नि में कर्मरूपी साकल्य का होम करने वाले हैं इसलिए याजकरूप को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो, आप चन्द्रमा के समान निर्वाण (मोक्ष अथवा आनन्द) देने वाले हैं इसलिए चन्द्ररूप को धारण करने वाले आपको नमस्कार हो।।४६।।

और आप अनन्त पदार्थों को प्रकाशित करने वाले केवलज्ञानरूपी सूर्य से सर्वथा अभिन्न रहते हैं इसलिए सूर्यरूप को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो। हे नाथ! इस प्रकार आप पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, याजक, चन्द्र और सूर्य इन आठ मूर्तियों को धारण करने वाले हैं तथा तीर्थंकर होने वाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो।

भावार्थ

—अन्य मतावलम्बियों ने महादेव की पृथ्वी, जल आदि आठ मूर्तियाँ मानी हैं, यहां आचार्य ने ऊपर लिखे वर्णन से भगवान ऋषभदेव को ही उन आठ मूर्तियों को धारण करने वाला महादेव मानकर उनकी स्तुति की है।।४७।।

हे नाथ! आप महाबल अर्थात् अतुल्य बल के धारक हैं अथवा इस भव से पूर्व दसवें भव में महाबल विद्याधर थे इसलिए आपको नमस्कार हो, आप ललितांग हैं अर्थात् सुन्दर शरीर को धारण करने वाले अथवा नौवें भव में ऐशान स्वर्ग के ललितांग देव थे इसलिए आपको नमस्कार हो, आप धर्मरूपी तीर्थ को प्रवर्ताने वाले ऐश्वर्यशाली और वङ्काजंघ हैं अर्थात् वङ्का के समान मजबूत जंघाओं को धारण करने वाले हैं अथवा आठवें भव में वङ्काजंघ नाम के राजा थे ऐसे आपको नमस्कार हो।।४८।।

आप आर्य अर्थात् पूज्य हैं अथवा सातवें भव में भोगभूमिज आर्य थे इसलिए आपको नमस्कार हो, आप दिव्य श्रीधर अर्थात् उत्तम शोभा को धारण करने वाले हैं अथवा छठे भव में श्रीधर नाम के देव थे ऐसे आपके लिए नमस्कार हो, आप सुविधि अर्थात् उत्तम भाग्यशाली हैं अथवा पाँचवे भव में सुविधि नाम के राजा थे इसलिए आपको नमस्कार हो, आप अच्युतेन्द्र अर्थात् अविनाशी स्वामी हैं अथवा चौथे भव में अच्युत स्वर्ग के इन्द्र थे इसलिए आपको नमस्कार हो।।४९।।

आपका शरीर वङ्का के खम्भे के समान स्थिर है और आप वङ्कानाभि अर्थात् वङ्का के समान मजबूत नाभि को धारण करने वाले हैं अथवा तीसरे भव में वङ्कानाभि नाम के चक्रवर्ती थे ऐसे आपको नमस्कार हो। आप सर्वार्थसिद्धि के नाथ अर्थात् सब पदार्थों की सिद्धि के स्वामी तथा सर्वार्थसिद्धि अर्थात् सब प्रयोजनों की सिद्धि को प्राप्त हैं अथवा दूसरे भव में सर्वार्थसिद्धि विमान को प्राप्त कर उसके स्वामी थे इसलिए आपको नमस्कार हो।।५०।।

हे नाथ ! आप दशावतारचरम अर्थात् सांसारिक पर्यायों में अन्तिम अथवा ऊपर कहे हुए महाबल आदि दश अवतारों में अन्तिम परमौदारिक शरीर को धारण करने वाले नाभिराज के पुत्र वृषभदेव परमेष्ठी हुए हैं इसलिए आपको नमस्कार हो।

भावार्थ—

इस प्रकार श्लेषालंकार का आश्रय लेकर आचार्य ने भगवान् वृषभदेव के दस अवतारों का वर्णन किया है, उसका अभिप्राय यह है कि अन्य मतावलम्बी श्रीकृष्ण विष्णु के दस अवतार मानते हैं। यहाँ आचार्य ने दस अवतार बतलाकर भगवान् वृषभदेव को ही श्रीकृष्ण-विष्णु सिद्ध किया है।।५१।।

हे देव! इस प्रकार आपकी स्तुति कर हम लोग इसी फल की आशा करते हैं कि हम लोगों की भक्ति आप में ही रहे। हमें अन्य परिमित फलों से कुछ भी प्रयोजन नहीं है।।५२।।

इस प्रकार परम आनन्द से भरे हुए इन्द्रों ने भगवान् ऋषभदेव की स्तुति कर उत्सव के साथ अयोध्या चलने का फिर विचार किया।।५३।।

अयोध्या से मेरु पर्वत तक जाते समय मार्ग में जैसा उत्सव हुआ था उसी प्रकार फिर होने लगा। उसी प्रकार दुन्दुभि बजने लगे, उसी प्रकार जय-जय शब्द का उच्चारण होने लगा और उसी प्रकार इन्द्र ने जिनेन्द्र भगवान् को ऐरावत हाथी के कन्धे पर विराजमान किया।।५४।।

वे देव बड़ा भारी कोलाहल, गीत, नृत्य और जय-जय शब्द की घोषणा करते हुए आकाशरूपी आँगन को उल्लंघ कर शीघ्र ही अयोध्यापुरी आ पहुँचे।।५५।।

जिनके शिखर आकाश को उल्लंघन करने वाले हैं और जिन पर लगी हुई पताकाएँ वायु के वेग से फहरा रही हैं ऐसे गोपुर दरवाजों से वह अयोध्या नगरी ऐसी शोभायमान होती थी मानो स्वर्गपुरी को ही बुला रही हो।।५६।।

उस अयोध्यापुरी की मणिमयी भूमि रात्रि के प्रारम्भ समय में ताराओं का प्रतिबिम्ब पड़ने से ऐसी जान पड़ती थी मानो कुमुदों से सहित सरसी की अखण्ड शोभा ही धारण कर रही हो।।५७।।

दूर तक आकाश में वायु के द्वारा हिलती हुई पताकाओं से वह अयोध्या ऐसी मालूम होती थी मानो कौतूहलवश ऊँचे उठाए हुए हाथों से स्वर्गवासी देवों को बुलाना चाहती हो।।५८।।

जिनमें अनेक सुन्दर स्त्री-पुरुष निवास करते थे ऐसे वहाँ के मणिमय महलों को देखकर निःसन्देह कहना पड़ता था कि मानो उन महलों ने इन्द्र के विमानों की शोभा छीन ली थी अथवा तिरस्कृत कर दी थी।।५९।।

वहाँ पर चूना गची के बने हुए बड़े-बड़े महलों के अग्रभाग पर सैकड़ों चद्रकान्तमणि लगे हुए थे, रात में चन्द्रमा की किरणों का स्पर्श पाकर उसमें पानी झर रहा था जिससे वे मणि मेघ के समान मालूम होते थे।।६०।।

उस नगरी के बड़े-बड़े राजमहलों के शिखर अनेक मणियों से देदीप्यमान रहते थे, उनसे सब दिशाओं में रत्नों का प्रकाश फैलता रहता था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो वह नगरी इन्द्रधनुष ही धारण कर रही हो।।६१।।

उस नगरी का आकाश कहीं-कहीं पर पद्मरागमणियों की किरणों से कुछ-कुछ लाल हो रहा था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो सन्ध्याकाल के बादलों से आच्छादित ही हो रहा हो। ६२।।

वहाँ के राजमहलों के शिखरों में लगे हुए देदीप्यमान इन्द्रनीलमणियों से छिपा हुआ ज्योतिश्चक्र आकाश में दिखाई ही नहीं पड़ता था।।६३।।

उस नगरी के राजमहलों के शिखर पर्वतों के शिखरों के समान बहुत ही ऊँचे थे और उन पर शरद् ऋतु के मेघ आश्रय लेते थे सो ठीक ही है क्योंकि जो अतिशय उन्नत (ऊँचा या उदार) होता है वह किसका आश्रय नहीं होता ? ।।६४।।

उस नगरी का सुवर्ण का बना हुआ परकोटा ऐसा अच्छा शोभायमान हो रहा था मानो अपने में लगे हुए रत्नों की किरणों से सुमेरु पर्वत की शोभा की हँसी ही कर रहा हो।।६५।।

अयोध्यापुरी की परिखा उद्धत हुए जलचर जीवों से सदा क्षोभ को प्राप्त होती रहती थी और चञ्चल लहरों तथा आवर्तों से भयंकर रहती थी इसलिए किसी बड़े भारी समुद्र की लीला धारण करती थी।।६६।।

भगवान् वृषभदेव की जन्मभूमि होने से वह नगरी शुद्ध खानि की भूमि के समान थी और उसने करोड़ों पुरुषरूपी अमूल्य महारत्न उत्पन्न भी किए थे।६७।।

अनेक प्रकार के फल तथा छाया देने वाले और अनेक प्रकार के वृक्षों से भरे हुए वहाँ के बाहरी उपवनों ने कल्पवृक्षों की शोभा तिरस्कृत कर दी थी।।६८।।

उसके समीपवर्ती प्रदेश को घेरकर सरयू नदी स्थित थी जिसके सुन्दर किनारों पर सारस पक्षी सो रहे थे और हंस मनोहर शब्द कर रहे थे।।६९।।

वह नगरी अन्य शत्रुओं के द्वारा दुर्लघ्य थी और स्वयं अनेक योद्धाओं से भरी हुई थी इसीलिए लोग उसे ‘अयोध्या’ (जिससे कोई युद्ध नहीं कर सके) कहते थे। उसका दूसरा नाम विनीता भी था और वह आर्यखण्ड के मध्य में स्थित थी इसलिए उसकी नाभि के समान शोभायमान हो रही थी।।७०।।

देवों की सेनाएँ उस अयोध्यापुरी को चारों ओर से घेरकर ठहर गयी थीं जिससे ऐसी मालूम होती थी मानो उसकी शोभा देखने के लिए तीनों लोक ही आ गए हों।।७१।।

तत्पश्चात् इन्द्र ने भगवान् वृषभदेव को लेकर कुछ देवों के साथ उत्कृष्ट लक्ष्मी से सुशोभित महाराज नाभिराज के घर में प्रवेश किया।।७२।।

और वहाँ जहाँ पर देवों ने अनेक प्रकार की सुन्दर रचना की है ऐसे श्रीगृह के आँगन में बालकरूपधारी भगवान् को िंसहासन पर विराजमान किया।।७३।।

महाराज नाभिराज उन प्रियदर्शन भगवान् को देखने लगे, उस समय उनका सारा शरीर रोमांचित हो रहा था, नेत्र प्रीति से प्रपुâल्लित तथा विस्तृत हो रहे थे।।७४।।

मायामयी निद्रा दूर कर इन्द्राणी के द्वारा प्रबोध को प्राप्त हुई माता मरुदेवी भी हर्षितचित्त होकर देवियों के साथ-साथ तीनों जगत् के स्वामी भगवान् वृषभदेव को देखने लगी।।७५।।

वह सती मरुदेवी अपने पुत्र को उदय हुए तेज के पुंज के समान देख रही थी और वह उससे ऐसी सुशोभित हो रही थी जैसी कि बालसूर्य से पूर्व दिशा सुशोभित होती है।।७६।।

जिनके मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं ऐसे जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव के माता-पिता अतिशय प्रसन्न होते हुए इन्द्राणी के साथ-साथ इन्द्र को देखने लगे।।७७।।

तत्पश्चात् इन्द्र ने नाना प्रकार के आभूषणों, मालाओं और बहुमूल्य वस्त्रों से उन जगत्पूज्य माता-पिता की पूजा की।।७८।।

फिर वह सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उन दोनों की इस प्रकार स्तुति करने लगा कि आप दोनों पुण्यरूपी धन से सहित हैं तथा बड़े ही धन्य हैं क्योंकि समस्त लोक में श्रेष्ठ पुत्र आपके ही हुआ है।७९।।

इस संसार में आप दोनों ही महाभाग्यशाली हैं, आप दोनों ही अनेक कल्याणों को प्राप्त होने वाले हैं और लोक में आप दोनों की बराबरी करने वाला कोई नहीं है क्योंकि आप जगत् के गुरु के भी गुरु अर्थात् माता-पिता हैं।।८०।।

हे नाभिराज! सच है कि आप ऐश्वर्यवाली उदयाचल हैं और रानी मरुदेवी पूर्व दिशा हैं क्योंकि यह पुत्ररूपी परम ज्योति आपसे ही उत्पन्न हुई है।।८१।।

आज आपका यह घर हम लोगों के लिए जिनालय के समान पूज्य है और आप जगत्पिता के भी माता-पिता हैं इसलिए हम लोगों के लिए सदा पूज्य हैं।।८२।।

इस प्रकार इन्द्र ने माता-पिता की स्तुति कर उनके हाथों में भगवान् को सौंप दिया और फिर उन्हींं के जन्माभिषेक की उत्तम कथा कहता हुआ वह क्षण भर वहीं पर खड़ा रहा।।८३।।

इन्द्र के द्वारा जन्माभिषेक की सब कथा मालूम कर माता-पिता दोनों ही हर्ष और आश्चर्य की अन्तिम सीमा पर आरूढ़ हुए।।८४।।

माता-पिता ने इन्द्र की अनुमति प्राप्त कर अनेक उत्सव करने वाले पुरवासी लोगों के साथ-साथ बड़ी विभूति से भगवान् का फिर भी जन्मोत्सव किया।।८५।।

उस समय पताकाओं की पंक्ति से भरी हुई वह अयोध्या नगरी ऐसी मालूम होती थी मानो कौतुकवश स्वर्ग को बुलाने के लिए इशारा ही कर रही हो।।८६।।

उस समय वह अयोध्या नगरी स्वर्गपुरी के समान मालूम होती थी, नगरवासी लोग देवों के तुल्य जान पड़ते थे और अनेक वस्त्राभूषण धारण किए हुए नगरनिवासिनी स्त्रियाँ अप्सराओं के समान जान पड़ती थीं।।८७।।

शब्द से समस्त दिशाएँ बहरी हो गयी थीं।।८८।।

उस समय नगर की सब गलियाँ रत्नों के चूर्ण से अलंकृत हो रही थीं और हिलती हुई पताकाओं के वस्त्रों से उनमें धूप का आना रुक गया था।।८९।।

उस समय उस नगर में सब स्थानों पर पताकाएँ हिल रही थीं (फहरा रही थीं) जिससे ऐसा जान पड़ता था मानों वह नगर नृत्य ही कर रहा हो। उसके गोपुर-दरवाजे बँधे हुए तोरणों से शोभायमान हो रहे थे जिससे ऐसा मालूम होता था मानो वह अपने मुख की सुन्दरता ही दिखला रहा हो, जगह-जगह वह नगर सजाया गया था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वस्त्राभूषण ही धारण किए हो और प्रारम्भ किए हुए संगीत के शब्द से उस नगर की समस्त दिशाएँ भर रही थीं जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वह आनन्द से बातचीत ही कर रहा हो अथवा गा रहा हो।।९०-९१।।

इस प्रकार आनन्द से भरे हुए समस्त पुरवासी जन गीत, नृत्य, वादित्र तथा अन्य अनेक मङ्गल कार्यों में व्यग्र हो रहे थे।।९२।।

उस समय उस नगर में न तो कोई दीन रहा था, न निर्धन रहा था, न कोई ऐसा ही रहा था जिसकी इच्छाएँ पूर्ण नहीं हुई हों और न कोई ऐसा ही था जिसे आनन्द उत्पन्न नहीं हुआ हो।।९३।।

इस तरह सारे संसार को आनन्दित करने वाला वह महोत्सव जैसा मेरु पर्वत पर हुआ था वैसा ही अन्तःपुर सहित इस अयोध्या नगर में हुआ।।९४।।

उन नगरवासियों का आनन्द देखकर अपने आनन्द को प्रकाशित करते हुए इन्द्र ने आनन्द नामक नाटक करने में अपना मन लगाया।।९५।।

ज्यों ही इन्द्र ने नृत्य करना प्रारम्भ किया त्यों ही संगीत विद्या के जानने वाले गन्धर्वों ने अपने बाजे वगैरह ठीक कर विस्तार के साथ संगीत करना प्रारम्भ कर दिया।।९६।।

पहले किसी के द्वारा किए हुए कार्य का अनुकरण करना नाट्य कहलाता है, वह नाट्य, नाट्यशास्त्र के अनुसार ही करने के योग्य है और उस नाट्यशास्त्र को इन्द्रादि देव ही अच्छी तरह जानते हैं।।९७।।

जो नाट्य या नृत्य शिष्य-प्रतिशिष्यरूप अन्य पात्रों में संक्रान्त होकर भी सज्जनों का मनोरंजन करता रहता है यदि उसे स्वयं उसका निरूपण करने वाला ही करे तो फिर उसकी मनोहरता का क्या वर्णन करना है ?।।९८।।

तत्पश्चात् अनेक प्रकार के पाठों और चित्र-विचित्र शरीर की चेष्टाओं से इन्द्र के द्वारा किया हुआ वह नृत्य महात्मा पुरुषों के देखने और सुनने योग्य था।।९९।।

उस समय अनेक प्रकार के बाजे बज रहे थे, तीनों लोकों में फैली हुई कुलाचलों सहित पृथिवी ही उसकी रंगभूमि थी, स्वयं इन्द्र प्रधान नृत्य करने वाला था, नाभिराज आदि उत्तम-उत्तम पुरुष उस नृत्य के दर्शक थे, जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव उसके आराध्य (प्रसन्न करने योग्य) देव थे और धर्म, अर्थ, काम इन तीन पुरुषार्थों की सिद्धि तथा परमानन्दरूप मोक्ष की प्राप्ति होना ही उसका फल था। इन ऊपर कही हुई वस्तुओं में से एक-एक वस्तु भी सज्जन पुरुषों को प्रीति उत्पन्न करने वाली है फिर पुण्योदय से पूर्वोक्त सभी वस्तुओं का समुदाय किसी एक जगह आ मिले तो कहना ही क्या है ?।।१००-१०२।।

उस समय इन्द्र ने पहले त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) रूप फल को सिद्ध करने वाला गर्भावतार सम्बन्धी नाटक किया और फिर जन्माभिषेकसम्बन्धी नाटक करना प्रारम्भ किया।।१०३।।

तदनन्तर इन्द्र ने भगवान् के महाबल आदि दशावतार सम्बन्धी वृत्तान्त को लेकर अनेक रूप दिखलाने वाले अन्य अनेक नाटक करने प्रारम्भ किए।।१०४।।

उन नाटकों का प्रयोग करते समय इन्द्र ने सबसे पहले पापों का नाश करने के लिए मंगलाचरण किया और फिर सावधान होकर पूर्वरंग का प्रारम्भ किया।।१०५।।

पूर्वरंग प्रारम्भ करते समय इन्द्र ने पुष्पाञ्जलि क्षेपण करते हुए सबसे पहले ताण्डव नृत्य प्रारम्भ किया।।१०६।।

ताण्डव नृत्य के प्रारम्भ में उसने नान्दी मङ्गल किया और फिर नान्दी मंगल कर चुकने के बाद रंगभूमि में प्रवेश किया। उस समय नाट्यशास्त्र के अवतार को जानने वाला और मंगलमय वस्त्राभूषण धारण करने वाला वह इन्द्र बहुत ही शोभायमान हो रहा था।।१०७।।

जिस समय वह रंगभूमि में अवतीर्ण हुआ था उस समय वह वैशाख-आसन से खड़ा हुआ था अर्थात् पैर फैलाकर अपने दोनों हाथ कमर पर रखे हुए था और चारों ओर से मरुत् अर्थात् देवों से घिरा हुआ था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो मरुत् अर्थात् वातवलयों से घिरा हुआ लोकस्कन्ध ही हो।।१०८।।

रंगभूमि के मध्य में पुष्पाञ्जलि बिखेरता हुआ वह इन्द्र ऐसा भला मालूम होता था मानो अपने पान करने से बचे हुए नाट्यरस को दूसरों के लिए बाँट ही रहा हो।।१०९।।

वह इन्द्र अच्छे-अच्छे वस्त्राभूषणों से शोभायमान था और उत्तम नेत्रों का समूह धारण कर रहा था इसलिए पुष्पों और आभूषणों से सहित किसी कल्पवृक्ष के समान सुशोभित हो रहा था।।११०।।

जिसके पीछे अनेक मदोन्मत्त भौंरे दौड़ रहे हैं ऐसी वह पड़ती हुई पुष्पाञ्जलि ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो आकाश को चित्र-विचित्र करने वाला इन्द्र के नेत्रों का समूह ही हो।।१११।।

इन्द्र के बड़े-बड़े नेत्रों की पंक्ति जवनिका (परदा) की शोभा धारण करने वाली अपनी फैलती हुई प्रभा से रंगभूमि को चारों ओर से आच्छादित कर रही थी।।११२।।

वह इन्द्र ताल के साथ-साथ पैर रखकर रंगभूमि के चारों ओर घूमता हुआ ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो पृथ्वी को नाप ही रहा हो।।११३।।

जब इन्द्र ने पुष्पाञ्जलि क्षेपण कर ताण्डव नृत्य करना प्रारम्भ किया तब उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए देवों ने स्वर्ग अथवा आकाश से पुष्पवर्षा की थी।।११४।।

उस समय दिशाओं के अन्तभाग तक प्रतिध्वनि को विस्तृत करते हुए पुष्कर आदि करोड़ों बाजे एक साथ गम्भीर शब्दों से बज रहे थे।।११५।।

वीणा भी मनोहर शब्द कर रही थी, मनोहर मुरली भी मधुर शब्दों से बज रही थी और उन बाजों के साथ ही साथ ताल से सहित संगीत के शब्द हो रहे थे।।११६।।

वीणा बजाने वाले मनुष्य जिस स्वर वा शैली से मिलाकर बजा रहे थे सो ठीक ही है, एक सी वस्तुओं में मिलाप होना ही चाहिए।।११७।।

उस समय वीणा बजाती हुई किन्नर देवियाँ कोमल, मनोहर, कुछ-कुछ गम्भीर, उच्च और सूक्ष्मरूप से गा रही थीं।।११८।।

जिस प्रकार उत्तम शिष्य गुरु का उपदेश पाकर मधुर शब्द करता है और अनुमानादि के प्रयोग में किसी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करता हुआ अपने उत्तम वंश (कुल) के योग्य कार्य करता है उसी प्रकार बंशी आदि बाँसों के बाजे भी मुख का सम्बन्ध पाकर मनोहर शब्द कर रहे थे और नृत्य-संगीत आदि के प्रयोग में किसी प्रकार का विवाद (विरोध) नहीं करते हुए अपने वंश (बाँस) के योग्य कार्य कर रहे थे।।११९।।

इस प्रकार इन्द्र ने पहले तो शुद्ध (कार्यान्तर से रहित) पूर्वरंग का प्रयोग किया और फिर करण (हाथों का हिलाना) तथा अङ्गहार (शरीर का मटकाना) के द्वारा विविधरूप में उसका प्रयोग किया।।१२०।।

वह इन्द्र पाँव, कमर, कण्ठ और हाथों को अनेक प्रकार से घुमाकर उत्तम रस दिखलाता हुआ ताण्डव नृत्य कर रहा था।।१२१।।

जिस समय वह इन्द्र विक्रिया से हजार भुजाएँ बनाकर नृत्य कर रहा था, उस समय पृथ्वी उसके पैरों के रखने से हिलने लगी थी मानो फट रही हो, कुलपर्वत तृणों की राशि के समान चञ्चल हो उठे थे और समुद्र भी मानो आनन्द से शब्द करता हुआ लहराने लगा था।।१२२-१२३।।

उस समय इन्द्र की चञ्चल भुजाएँ बड़ी ही मनोहर थीं, वह शरीर से स्वयं ऊँचा था और चञ्चल वस्त्र तथा आभूषणों से सहित था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो जिसकी शाखाएँ हिल रही हैं, जो बहुत ऊँचा है और जो हिलते हुए वस्त्र तथा आभूषणों से सुशोभित है ऐसा कल्पवृक्ष ही नृत्य कर रहा हो।।१२४।।

उस समय इन्द्र के हिलते हुए मुकुट में लगे हुए रत्नों की किरणों के मण्डल से व्याप्त हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो हजारों बिजलियों से ही व्याप्त हो रहा होे।।१२५।।

नृत्य करते समय इन्द्र की भुजाओं के विक्षेप से बिखरे हुए तारे चारों ओर फिर रहे थे और ऐसे मालूम होते थे मानो फिरकी लगाने से टूटे हुए हार के मोती ही हों।।१२६।।

नृत्य करते समय इन्द्र की भुजाओं के उल्लास से टकाराए हुए तथा पानी की छोटी-छोटी बूँदों को छोड़ते हुए मेघ ऐसे मालूम होते थे मानो शोक से आँसू ही छोड़ रहे हों।।१२७।।

नृत्य करते-करते जब कभी इन्द्र फिरकी लेता था तब उसके वेग के आवेश से फिरती हुई उसके मुकुट के मणियों की पंक्तियाँ अलातचक्र की नाई भ्रमण करने लगती थीं।।१२८।।

इन्द्र के उस नृत्य के क्षोभ से पृथिवी क्षुभित हो उठी थी, पृथिवी के क्षुभित होने से समुद्र भी क्षुभित हो उठे थे और उछलते हुए जल के कणों से दिशाओं की भित्तियों का प्रक्षालन करने लगे थे।।१२९।।

नृत्य करते समय वह इन्द्र क्षण भर में एक रह जाता था, क्षण भर में अनेक हो जाता था, क्षण भर में सब जगह व्याप्त हो जाता था, क्षण भर में छोटा सा रह जाता था, क्षण भर में दूर पहुँच जाता था, क्षण भर में आकाश में दिखाई देता था, क्षण भर में पास ही दिखाई देता था, क्षण भर में फिर जमीन पर आ जाता था, इस प्रकार विक्रिया से उत्पन्न हुई अपनी सामथ्र्य को प्रकट करते हुए उस इन्द्र ने उस समय ऐसा नृत्य किया था मानो इन्द्रजाल का खेल ही किया हो।।१३०-१३१।।

इन्द्र की भुजारूपी शाखाओं पर मन्द-मन्द हँसती हुई अप्सराएँ लीलापूर्वक भौंहरूपी लताओं को चलाती हुई, शरीर हिलाती हुई और सुन्दरतापूर्वक पैर उठाती रखती हुई (थिरक-थिरककर) नृत्य कर रही थीं।।१३२।।

उस समय कितनी ही देवनर्तकियाँ वद्र्धमान लय के साथ, कितनी ही ताण्डव नृत्य के साथ और कितनी ही अनेक प्रकार के अभिनय दिखलाती हुई नृत्य कर रही थीं।।१३३।।

कितनी देवियाँ बिजली का और कितनी ही इन्द्र का शरीर धारण कर नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रवेश तथा निष्क्रमण दिखलाती हुई नृत्य कर रही थीं।।१३४।।

उस समय इन्द्र की भुजारूपी शाखाओं पर नृत्य करती हुई वे देवियाँ ऐसी शोभायमान हो रही थींं मानो कल्पवृक्ष की शाखाओं पर फैली हुई कल्पलताएँ ही हों।।१३५।।

वह श्रीमान् इन्द्र नृत्य करते समय उन देवियों के साथ जब फिरकी लगाता था तब उसके मुकुट का सेहरा भी हिल जाता था और वह ऐसा शोभायमान होता था मानो कोई चक्र ही घूम रहा हो।।१३६।।

हजार आँखों को धारण करने वाला वह इन्द्र फूले हुए विकसित कमलों से सुशोभित तालाब के समान जान पड़ता था और मन्द-मन्द हँसते हुए मुखरूपी कमलों से शोभायमान, भुजाओं पर नृत्य करने वाली वे देवियाँ कमलिनियों के समान जान पड़ती थीं।।१३७।।

मन्द हास्य की किरणों से मिले हुए उन देवियों के मुख ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानों अमृत के प्रवाह में डूबे हुए विकसित कमल ही हों।।१३८।।

कितनी ही देवियाँ कुलाचलों के समान शोभायमान उस इन्द्र की भुजाओं पर आरूढ़ होकर नृत्य कर रही थीं और ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो शरीरधारिणी लक्ष्मी ही हों।।१३९।।

ऐरावत हाथी के बाँधने के खम्भे के समान लम्बी इन्द्र की भुजाओं पर आरूढ़ होकर कितनी ही देवियाँ नृत्य कर रही थीं और ऐसी मालूम होती थीं मानो कोई अन्य वीर-लक्ष्मी ही हो।।१४०।।

नृत्य करते समय कितनी ही देवियों का प्रतिबिम्ब उन्हीं के हार के मोतियों पर पड़ता था जिससे वे ऐसी मालूम होती थीं मानो इन्द्र की बहुरूपिणी विद्या ही नृत्य कर रही हो।।१४१।।

कितनी ही देवियाँ इन्द्र के हाथों की अँगुलियों पर अपने चरण-पल्लव रखती हुई लीलापूर्वक नृत्य कर रही थीं और ऐसी मालूम होती थीं मानो सूचीनाट्य (सूई की नोक पर किया जाने वाला नृत्य) ही कर रही हों।।१४२।।

कितनी ही देवियाँ सुन्दर पर्वों सहित इन्द्र की अँगुलियों के अग्रभाग पर अपनी नाभि रखकर इस प्रकार फिरकी लगा रही थीं मानो किसी बाँस की लकड़ी पर चढ़कर उसके अग्रभाग पर नाभि रखकर मनोहर फिरकी लगा रही हों।।१४३।।

देवियाँ इन्द्र की प्रत्येक भुजा पर नृत्य करती हुई और अपने नेत्रों के कटाक्षों को फैलाती हुई बड़े यत्न से संचार कर रही थीं।।१४४।।

उस समय उत्सव को बढ़ाता हुआ वह नाट्यरस उन देवियों के शरीर में खूब ही बढ़ रहा था और ऐसा मालूम होता था मानो उनके कटाक्षों में प्रकट हो रहा हो, कपोलों में स्फुरायमान हो रहा हो, पाँवों में फैल रहा हो, हाथों में विलसित हो रहा हो, मुखों पर हंस रहा हो, नेत्रों में विकसित हो रहा हो, अंगराग में लाल वर्ण हो रहा हो, नाभि में निमग्न हो रहा हो, कटिप्रदेशों पर चल रहा हो और मेखलाओं पर स्खलित हो रहा हो।।१४५-१४७।।

नृत्य करते हुए इन्द्र के प्रत्येक अंग में जो चेष्टाएँ होती थीं वही चेष्टाएँ अन्य सभी पात्रों में हो रही थीं जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो इन्द्र ने अपनी चेष्टाएँ उन सबके लिए बाँट ही दी हों।।१४८।।

उस समय इन्द्र के नृत्य में जो रस, भाव, अनुभाव और चेष्टाएँ थी वे ही रस, भाव, अनुभाव और अन्य सभी पात्रों में थीं जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो इन्द्र ने अपनी आत्मा को ही उनमें प्रविष्ट करा दिया हो।।१४९।।

अपने भुजदण्डों पर देवनर्तकियों को नृत्य कराता हुआ वह इन्द्र ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो किसी यन्त्र की पटियों पर लकड़ी की पुतलियों को नचाता हुआ कोई यान्त्रिक अर्थात् यन्त्र चलाने वाला ही हो।।१५०।।

वह इन्द्र नृत्य करती हुई उन देवियों को कभी ऊपर आकाश में चलाता था, कभी सामने नृत्य करती हुई दिखला देता था और कभी क्षण भर में उन्हें अदृश्य कर देता था, इन सब बातों से वह किसी इन्द्रजाल का खेल करने वाले के समान जान पड़ता था।।१५१।।

नृत्य करने वाली देवियों को अपनी भुजाओं के समूह पर गुप्तरूप से जहाँ-तहाँ घुमाता हुआ वह इन्द्र हाथ की सफाई दिखलाने वाले किसी बाजीगर के समान जान पड़ता था।।१५२।।

वह इन्द्र अपनी एक ओर की भुजाओं पर तरुण देवों को नृत्य करा रहा था और दूसरी ओर की भुजाओं पर तरुण देवियों को नृत्य करा रहा था तथा अद्भुत विक्रिया शक्ति दिखलाता हुआ अपनी भुजारूपी शाखाओं पर स्वयं भी नृत्य कर रहा था।।१५३।।

इन्द्र की भुजारूपी रंगभूमि में वे देव और देवांगनाएँ प्रदक्षिणा देती हुई नृत्य कर रही थीं इसलिए वह इन्द्र नाट्यशास्त्र के जानने वाले सूत्रधार के समान मालूम होता था।।१५४।।

उस समय एक ओर तो दीप्त और उद्धत रस से भरा हुआ ताण्डव नृत्य हो रहा था और दूसरी ओर सुकुमार प्रयोगों से भरा हुआ लास्य नृत्य हो रहा था।।१५५।।

इस प्रकार भिन्न-भिन्न रस वाले, उत्कृष्ट और आश्चर्यकारक नृत्य दिखलाते हुए इन्द्र ने सभा के लोगों में अतिशय प्रेम उत्पन्न किया था।।१५६।।

इस प्रकार जिसमें श्रेष्ठ गन्धर्वों के द्वारा अनेक प्रकार के बाजों का बजाना प्रारम्भ किया गया था ऐसे आनन्द नामक नृत्य को इन्द्र ने बड़ी सज-धज के साथ समाप्त किया।।१५७।।

उस समय वह नृत्य किसी उद्यान के समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार उद्यान काँस और ताल (ताड़) वृक्षों से सहित होता है उसी प्रकार वह नृत्य भी काँसे की बनी हुई झाँझों के ताल से सहित था, उद्यान जिस प्रकार ऊँचे-ऊँचे बाँसों के फैलते हुए शब्दों से व्याप्त रहता है उसी प्रकार वह नृत्य भी उत्कृष्ट बाँसुरियों के दूर तक फैलने वाले शब्दों से व्याप्त था, उद्यान जिस प्रकार अप्सर अर्थात् जल के सरोवरों से सहित होता है उसी प्रकार वह नृत्य भी अप्सर अर्थात् देवनर्तकियों से सहित था और उद्यान जिस प्रकार सरस अर्थात् जल से सहित होता है उसी प्रकार वह नृत्य भी सरस अर्थात् शृङ्गार आदि रसों से सहित था।।१५८।।

महाराज नाभिराज मरुदेवी के साथ-साथ वह आश्चर्यकारी नृत्य देखकर बहुत ही चकित हुए और इन्द्रों के द्वारा की हुई प्रशंसा को प्राप्त हुए।।१५९।।

ये भगवान् वृषभदेव जगत् भर में ज्येष्ठ हैं और जगत् का हित करने वाले धर्मरूपी अमृत की वर्षा करेंगे इसलिए ही इन्द्रों ने उनका वृषभदेव नाम रखा था।।१६०।।

अथवा वृष श्रेष्ठ धर्म को कहते हैं और तीर्थंकर भगवान् उस वृष अर्थात् श्रेष्ठ धर्म से शोभायमान हो रहे हैं इसलिए ही इन्द्र ने उन्हें ‘वृषभ-स्वामी’ इस नाम से पुकारा था।।१६१।।

अथवा उनके गर्भावतरण के समय माता मरुदेवी ने एक वृषभ देखा था इसलिए ही देवों ने उनका ‘वृषभ’ नाम से आह्वान किया था।।१६२।।

इन्द्र ने सबसे पहले भगवान् वृषभनाथ को ‘पुरुदेव’ इस नाम से पुकारा था इसलिए इन्द्र अपने पुरुहूत (पुरु अर्थात् भगवान् वृषभदेव को आह्वान करने वाला) नाम को सार्थक ही धारण करता था।।१६३।।

तदनन्तर वे इन्द्र भगवान् की सेवा के लिए समान अवस्था, समान रूप और समान वेष वाले देवकुमारों को निश्चित कर अपने-अपने स्वर्ग को चले गए।।१६४।।

इन्द्र ने आदरसहित भगवान् को स्नान कराने, वस्त्राभूषण पहनाने, दूध पिलाने, शरीर के संस्कार (तेल, कज्जल आदि लगाना) करने और क्रीडा कराने के कार्य में अनेक देवियों को धाय बनाकर नियुक्त किया था।।१६५।।

तदनन्तर आश्चर्यकारक चेष्टाओं को धारण करने वाले भगवान् वृषभदेव अपनी पहली अवस्था (शैशव अवस्था) में कभी मन्द-मन्द हँसते थे और कभी मणिमयी भूमि पर अच्छी तरह चलते थे, इस प्रकार वे माता-पिता का हर्ष बढ़ा रहे थे।।१६६।।

भगवान् की वह बाल्य अवस्था ठीक चन्द्रमा की बाल्य अवस्था के समान थी क्योंकि जिस प्रकार चन्द्रमा की बाल्य अवस्था जगत् को आनन्द देने वाली होती है उसी प्रकार भगवान् की बाल्य अवस्था भी जगत् को आनन्द देने वाली थी, चन्द्रमा की बाल्य अवस्था जिस प्रकार नेत्रों को उत्कृष्ट आनन्द देने वाली होती है उसी प्रकार उनकी बाल्यावस्था नेत्रों को उत्कृष्ट आनन्द देने वाली थी और चन्द्रमा की बाल्यावस्था जिस प्रकार कला मात्र से उज्ज्वल होती है उसी प्रकार उनकी बाल्यावस्था भी अनेक कलाओं-विद्याओं से उज्ज्वल थी।।१६७।।

भगवान् के मुखरूपी चन्द्रमा पर मन्द हास्यरूपी निर्मल चाँदनी प्रकट रहती थी और उससे माता-पिता का सन्तोषरूपी समुद्र अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होता रहता था।।१६८।।

उस समय भगवान् के मुख पर जो मनोहर मन्द हास्य प्रकट हुआ था वह ऐसा जान पड़ता था मानो सरस्वती का गीतबन्ध अर्थात् संगीत का प्रथम राग ही हो अथवा लक्ष्मी के हास्य की शोभा ही हो अथवा कीर्तिरूपी लता का विकास ही हो।।१६९।।

भगवान् के शोभायमान मुखकमल में क्रम-क्रम से अस्पष्ट वाणी प्रकट हुई जो कि ऐसी मालूम होती थी मानो भगवान् की बाल्य अवस्था का अनुकरण करने के लिए सरस्वती देवी ही स्वयं आयी हों।।१७०।।

इन्द्रनीलमणियों की भूमि पर धीरे-धीरे गिरते पड़ते पैरों से चलते हुए बालक भगवान् ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो पृथिवी को लाल कमलों का उपहार ही दे रहे हों।।१७१।।

सुन्दर आकार को धारण करने वाले वे भगवान् माता-पिता के मन में सन्तोष को बढ़ाते हुए देव बालकों के साथ-साथ रत्नों की धूलि में क्रीडा करते थे।।१७२।।

वे बाल भगवान् चन्द्रमा के समान शोभायमान होते थे क्योंकि जिस प्रकार चन्द्रमा अपने आल्हादकारी गुणों से प्रजा को आनन्द पहुँचाता है उसी प्रकार वे भी अपने आल्हादकारी गुणों से प्रजा को आनन्द पहुँचा रहे थे और चन्द्रमा का शरीर जिस प्रकार चाँदनी से व्याप्त रहता है उसी प्रकार उनका शरीर भी कीर्तिरूपी चाँदनी से व्याप्त था।।१७३।।

जब भगवान् की बाल्यावस्था व्यतीत हुई तब इन्द्रों के द्वारा पूज्य और महाप्रतापी भगवान् का कौमार अवस्था का शरीर बहुत ही सुन्दर हो गया।।१७४।।

जिस प्रकार चन्द्रमण्डल की वृद्धि के साथ-साथ ही उसके कान्ति, दीप्ति आदि अनेक गुण प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं उसी प्रकार भगवान् के शरीर की वृद्धि के साथ-साथ ही अनेक गुण प्रतिदिन बढ़ते जाते थे।।१७५।।

उस समय उनका मनोहर शरीर, प्यारी बोली, मनोहर अवलोकन और मुसकाते हुए बातचीत करना यह सब संसार की प्रीति को विस्तृत कर रहे थे।।१७६।।

जिस प्रकार जगत् के मन को हर्षित करने वाले चन्द्रमा की वृद्धि होने पर उसकी समस्त कलाएँ बढ़ने लगती हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के हृदय को आनन्द देने वाले जगत्पति—भगवान् के शरीर की वृद्धि होने पर उनकी समस्त कलाएँ बढ़ने लगी थीं।।१७७।।

मति, श्रुत और अवधि ये तीनों ही ज्ञान भगवान् के साथ-साथ ही उत्पन्न हुए थे इसलिए उन्होंने समस्त विद्याओं और लोक की स्थिति को अच्छी तरह जान लिया था।।१७८।।

वे भगवान् समस्त विद्याओं के ईश्वर थे इसलिए उन्हें समस्त विद्याएँ अपने आप ही प्राप्त हो गयी थीं सो ठीक ही है क्योंकि जन्मान्तर का अभ्यास स्मरण शक्ति को अत्यन्त पुष्ट रखता है।।१७९।।

वे भगवान् शिक्षा के बिना ही समस्त कलाओं में प्रशंसनीय कुशलता को, समस्त विद्याओं में प्रशंसनीय चतुराई को और समस्त क्रियाओं में प्रशंसनीय कर्मठता (कार्य करने की सामथ्र्य) को प्राप्त हो गए थे।।१८०।।

वे भगवान् सरस्वती के एकमात्र स्वामी थे इसलिए उन्हें समस्त वाङ्मय (शास्त्र) प्रत्यक्ष हो गए थे और इसलिए वे समस्त लोक के गुरु हो गए थे।।१८१।।

वे भगवान् पुराण थे अर्थात् प्राचीन इतिहास के जानकार थे, कवि थे, उत्तम वक्ता थे, गमक (टीका आदि के द्वारा पदार्थ को स्पष्ट करने वाले) थे और सबको प्रिय थे क्योंकि कोष्ठबुद्धि आदि अनेक विद्याएँ उन्हें स्वभाव से ही प्राप्त हो गयी थीं।।१८२।।

उनके क्षायिक सम्यग्दर्शन ने उनके चित्त के समस्त मल को दूर कर दिया था और स्वभाव से विस्तार को प्राप्त हुई सरस्वती ने उनके वचन सम्बन्धी समस्त दोषों का अपहरण कर लिया था।।१८३।।

उन भगवान् के स्वभाव से ही शास्त्रज्ञान था, उस शास्त्रज्ञान से उनके परिणाम बहुत ही शान्त रहते थे। परिणामों के शान्त रहने से उनकी चेष्टाएँ जगत् का हित करने वाली होती थीं और उन जगत् हितकारी चेष्टाओं से वे प्रजा का पालन करते थे।।१८४।।

ज्यों-ज्यों शरीर के साथ-साथ उनके गुण बढ़ते जाते थे त्यों-त्यों समस्त जनसमूह और उनके परिवार के लोग हर्ष को प्राप्त होते जाते थे।।१८५।।

इस प्रकार वे भगवान् माता-पिता के परम आनन्द को, बन्धुओं के सुख को और जगत् के समस्त जीवों की परम प्रीति को बढ़ाते हुए वृद्धि को प्राप्त हो रहे थे।।१८६।।

चरम शरीर को धारण करने वाले भगवान् की सम्पूर्ण आयु चौरासी लाख पूर्व की थी।।१८७।।

वे भगवान् दीर्घदर्शी थे, दीर्घ आयु के धारक थे, दीर्घ भुजाओं से युक्त थे, दीर्घ नेत्र धारण करने वाले थे और दीर्घ सूत्र अर्थात् दृढ़ विचार के साथ कार्य करने वाले थे इसलिए तीनों ही लोकों की सूत्रधारता-गुरुत्व को प्राप्त हुए थे।।१८८।।

भगवान् वृषभदेव कभी तो, जिनका पूर्वभव में अच्छी तरह अभ्यास किया है ऐसे लिपि विद्या, गणित विद्या तथा संगीत आदि कलाशास्त्रों का स्वयं अभ्यास करते थे और कभी दूसरों को कराते थे।।१८९।।

कभी छन्दशास्त्र, कभी अलंकार शास्त्र, कभी प्रस्तार नष्ट उद्दिष्ट संख्या आदि का विवेचन और कभी चित्र खींचना आदि कला शास्त्रों का मनन करते थे।।१९०।।

कभी वैय्याकरणों के साथ व्याकरण सम्बन्धी चर्चा करते थे, कभी कवियों के साथ काव्य विषय की चर्चा करते थे और कभी अधिक बोलने वाले वादियों के साथ वाद करते थे।।१९१।।

कभी गीतगोष्ठी, कभी नृत्यगोष्ठी, कभी वादित्रगोष्ठी और कभी वीणागोष्ठी के द्वारा समय व्यतीत करते थे।।१९२।।

कभी मयूरों का रूप धरकर नृत्य करते हुए देवविंâकरों को लय के अनुसार हाथ की ताल देकर नृत्य कराते थे।।१९३।।

कभी विक्रिया शक्ति से तोते का रूप धारण करने वाले देवकुमारों को स्पष्ट और मधुर अक्षरों से श्लोक पढ़ाते थे।।१९४।।

कभी हंस की विक्रिया कर धीरे-धीरे गद्गद बोली से शब्द करते हुए हंसरूपधारी देवों को अपने हाथ से मृणाल के टुकड़े देकर सम्मानित करते थे।।१९५।।

कभी विक्रिया से हाथियों के बच्चों का रूप धारण करने वाले देवों को सान्त्वना देकर या सूँड़ में प्रहार कर उनके साथ आनन्द से क्रीडा करते थे।।१९६।।

कभी मुर्गों का रूप धारण कर रत्नमयी जमीन में पड़ते हुए अपने प्रतिबिम्बों के साथ ही युद्ध करने की इच्छा करने वाले देवों को देखते थे या उन पर हाथ फैरते थे।।१९७।।

कभी विक्रिया शक्ति से मल्ल का रूप धारण कर वैर के बिना ही मात्र क्रीडा करने के लिए युद्ध करने की इच्छा करने वाले गम्भीर गर्जना करते हुए और इधर-उधर नृत्य सा करते हुए देवों को प्रोत्साहित करते थे।।१९८।।

कभी क्रौञ्च और सारस पक्षियों का रूप धारण कर उच्च स्वर से व्रेंâकार शब्द करते हुए देवों के निरन्तर होने वाले कर्णप्रिय शब्द सुनते थे।।१९९।।

कभी माला पहने हुए, शरीर में चन्दन लगाए हुए और इकट्ठे होकर आए हुए देव बालकों को दण्ड क्रीडा (पड़गर का खेल) में लगाकर नचाते थे।।२००।।

कभी स्तुति पढ़ने वाले देवों के द्वारा निरन्तर गाये गये और कुन्द, चन्द्रमा तथा गङ्गा नदी के जल के छींटों के समान निर्मल अपने यश को सुनते थे।।२०१।।

कभी घर के आँगन में आलस्यरहित देवियों के द्वारा बनाई हुई रत्नचूर्ण की चित्रावलि को आनन्द के साथ देखते थे।।२०२।।

कभी अपने दर्शन करने के लिए आयी हुई प्रजा का, मधुर और स्नेहयुक्त अवलोकन के द्वारा तथा मन्द हास्य और आदरसहित संभाषण के द्वारा सत्कार करते थे।।२०३।।

कभी बावड़ियों के जल में देवकुमारों के साथ-साथ आनन्दसहित जलक्रीडा का विनोद करते हुए क्रीडा करते थे।।२०४।।

कभी हंसों के शब्दों से शब्दायमान सरयू नदी का जल प्राप्त कर उसमें पानी के आस्फालन से शब्द करने वाले लकड़ी के बने हुए यन्त्रों से जलक्रीडा करते थे।।२०५।।

जलक्रीडा के समय मेघकुमार जाति के देव भक्ति से धारागृह (फव्वारा) का रूप धारण कर चारों ओर से जल की धारा छोड़ते हुए भगवान् की सेवा करते थे।।२०६।।

कभी नन्दनवन के साथ स्पर्धा करने वाले वृक्षों की शोभा से सुशोभित नन्दन वन में मित्ररूप हुए देवों के साथ-साथ वनक्रीडा करते थे।।२०७।।

वनक्रीडा के विनोद के समय पवनकुमार जाति के देव पृथ्वी को धूलिरहित करते थे और उद्यान के वृक्षों को धीरे-धीरे हिलाते थे।।२०८।।

इस प्रकार देवकुमारों के साथ अपने-अपने समय के योग्य क्रीडा और विनोद करते हुए भगवान् वृषभदेव सुखपूर्वक रहते थे।।२०९।।

इस प्रकार जो तीन लोक के अधिपति-इन्द्रादि देवों के द्वारा पूज्य हैं, आश्रय लेने योग्य हैं, सम्पूर्ण गुणरूपी मणियों की खान हैं और पवित्र शरीर के धारक हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव महाराज नाभिराज के पवित्र घर में दिव्य सुख भोगते हुए देवकुमारों के साथ-साथ चिरकाल तक क्रीडा करते रहे।।२१०।।

वे भगवान् पुण्यकर्म के उदय से प्रतिदिन इन्द्र के द्वारा भेजे हुए सुगन्धित पुष्पों की माला, अनेक प्रकार के वस्त्र तथा आभूषण आदि श्रेष्ठ भोगों का अपना अभिप्राय जानने वाले सुन्दर देवकुमारों के साथ प्रसन्न होकर अनुभव करते थे।।२११।।

जिन के चरणकमल मनुष्य, सुर और असुरों के द्वारा पूजित हैं, जो बाल्य अवस्था में भी वृद्धों के सामन कार्य करने वाले हैं, जो लीला, आहार, विलास और वेष से चतुर, उत्कृष्ट तथा ऊँचा शरीर धारण करते हैं, जो जगत् के जीवों के मन को प्रसन्न करने वाले अपने वचनरूपी किरणों के द्वारा उत्तम आनन्द को विस्तृत करते हैं, निर्मल हैं और कीर्तिरूपी फैलती हुई चाँदनी से शोभायमान हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव बाल चन्द्रमा के समान धीरे-धीरे वृद्धि को प्राप्त हो रहे थे।।२१२।।

ताराओं की पंक्ति के समान चंचल लक्ष्मी के झूले की लता के समान, समुचित विस्तृत और वक्षःस्थल पर पड़े हुए बड़े भारी हार को धारण किये हुए तथा करधनी से सुशोभित चाँदनीतुल्य वस्त्रों को पहने हुए वे जिनेन्द्ररूपी चन्द्रमा नक्षत्रों के समान देवकुमारों के साथ क्रीडा करते हुए अतिशय सुशोभित होते थे।।२१३।।

इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह में भगवज्जातकर्मोत्सववर्णन नाम का

चौदहवाँ पर्व समाप्त हुआ।।१४।।