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तीर्थंकर माता ने देखे सोलह सपने

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तीर्थंकर माता ने देखे

तर्ज—ये क्या है......

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तीर्थंकर माता ने देखे सोलह सपने।
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वे पूछ रहीं उनके फल स्वामी से अपने।।

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ये माँ हैं, इस जगती की। गुण गरिमा हैं इस पृथिवी की।
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ये पाएंगी जिनवर शिशु को। तीर्थंकर नाथ परम प्रभु को।।
ये माँ हैं......।। टेक.।।
पहले सपने में ऐरावत हाथी देखा।

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उत्तुंग बैल के बाद शेर को भी देखा।।
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ये क्या कहने आए हैं ? त्रैलोक्य विजयी को लाए हैं।
त्रय ज्ञानी सुत को पाएंगी। ये शक्तिमान शिशु लाएंगी।।
ये माँ हैं......।।१।।

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स्नान युक्त लक्ष्मी दो मालाएं देखीं।
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जन्माभिषेक सद्धर्मप्रवर्तक फल देंगी।।
फिर देखा, चंदा मामा। इनका फल खुशियों का पाना।
प्रभु सूर्यबिम्ब का फल क्या है ? तेजस्वी बालक पाया है।।
ये माँ हैं......।।२।।

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दो मछली अष्टम सपने में देखीं स्वामी।
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इसका फल अतिशय उत्तम सुत जग में नामी।।
फिर देखे कलश युगल मैंने। अमृत से भरे आवंâठ सजे।
]इसका फल बोलो प्रभु क्या है ? वह शिशु पाएगा निधियाँ है।।
ये माँ हैं......।।३।।

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कमलों से युक्त सरोवर रत्नों का सागर।
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फिर सह पीठ अरु दिव्य विमान दिखा आकर।।
हे स्वामी इनका फल क्या है ? शुभ लक्षण ज्ञान की माया है।
त्रैलोक्यपती सुत आएगा। स्वर्गों से चय कर आएगा।।
ये माँ हैं......।।४।।

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नागेन्द्र विमान रतन राशी देखी मैंने।
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निर्धूम अग्नि को देख बहुत हर्षी थी मैं।।
हे प्रभु इनका शुभ फल क्या है ? बतलाओ होगा कल क्या है ?
अवधिज्ञानी गुणरत्नमयी। होगा सुत पापों से विरहित।
ये माँ हैं......।।५।।

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मानो माँ ने तत्क्षण तीर्थंकर पा ही लिया।
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उत्तर पाकर ऐसा आनन्दित हृदय हुआ।।
ये सपने सच हैं अपने। इन्हें देखे सब जिनवर माँ ने।
‘चंदना’ तभी प्रभु मात बनीं। तीर्थंकर माँ जगमात बनीं।।
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